भद्रा/ Bhadra

भद्रा काल  वह सामयिक अवधि है जिसे पञ्चाङ्ग में विश्टि करण समयावधि के नाम से जाना जाता है एक तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। 11 करण होते हैं – उनमें से एक है विश्टि करण। विविध करणों में से एक करण को  विष्टि करण के नाम से जाना जाता है इसे अच्छा नहीं माना जाता है. इसी विष्टि करण को भद्रा के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा के समय शुभ कार्य वर्जित रहते हैं।

            कल्याणकारी या  मङ्गलकारी को भद्रा का शाब्दिक अर्थ स्वीकार किया जाता है लेकिन विश्टि करण के कारण इस काल को अशुभ मानते हुए इस काल में  विवाह, गृह प्रवेश, गमन हेतु प्रस्थान को वर्जित किया गया है जबकि यह काल युद्ध या शत्रु विजय हेतु शुभ माना जाता है।

भद्रा परिचय – भारतीय पौराणिक कथाओं भद्रा भगवान् सूर्य और छाया की पुत्री व शनि देव की भगिनी हैं छाया अर्थात संवर्णा की इस पुत्री की आकृति उग्र व स्वभाव तीक्ष्ण था विविध देवताओं के आशीर्वाद के कारण वे मंगलकारी व लोकहित कार्यों में प्रवृत्त हुईं फिर भी समय समय पर इनका उग्र स्वभाव विनाशकारी सिद्ध होता है। भद्रा के सम्बन्ध में यह स्वीकार्य है कि जब भद्रा पृथ्वी लोक पर है तब अशुभ है लेकिन स्वर्ग व पाताल में यह दोष मुक्त हो जाती है।

भद्रा सम्बन्धी वैज्ञानिक दृष्टिकोण – भद्रा काल को कुछ वैज्ञानिक कारणों से भी अशुभ मन जाता है इस समय चन्द्रमा और सूर्य की जो स्थिति होती है वह ऊर्जा का असन्तुलन पैदा करता है इस काल में मानसिक अशान्ति  निर्णयन क्षमता का आकलन करने पर ज्ञात हुआ की इस समय निर्णयन क्षमता निम्न कोटि की होती है।  वैज्ञानिकों ने विविध कालों का तुलनात्मक अध्ययन किया व पाया मौसम व खगोलीय स्थिति के कारण इस समय यात्रा करने पर अधिक बाधाएँ देखने को मिलती हैं।  इस समय प्रकृति व मानव भी उग्रता की शिकार हो जाती है।

भद्रा काल व भारत – भारतीय जातकों में अधिकाँश लोग समय को जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं। हम समय का सम्मान कर सही समय में अपने पञ्चाङ्ग को भी सम्मान देते हुए कार्यों को सम्पन्न करते हैं हमारे शास्त्र उद्घोष करते ही हैं कि – “कालो हि दुरतिक्रमः

इसका आशय है कि समय को कोई नहीं बदल सकता।

इसी वजह से हिन्दुस्तानी पंचांग देखकर कार्य करने को कल्याणकारी मानते हैं भद्रा काल का हमारे जीवन में महत्त्व पूर्ण स्थान है।

सावधानी सूचक भद्रा – भद्रा हमें सचेत करती है कि हर काल खण्ड हर कार्य के लिए उचित नहीं होता, कार्यों को उस समय संपन्न करना उचित रहता है जब प्रकृति की ऊर्जा सन्तुलन में होती है। यह भौतिक कार्यों के सम्पादन की जगह तपस्या व चिन्तन, मनन का काल है। यह अशुभ की घोषणा करके वास्तव में हमें सचेत ही करता है।

क्या  न करें और क्या करेंभद्रा काल में?  

  • करने योग्य कार्य अर्थात स्वीकार्य कार्य – आवश्यकता के अनुसार निम्न कार्य सम्पादित किए जा सकते हैं। 

01 – आवश्यक होने पर युद्ध किया जा सकता है।

02 – शत्रु विजय की व्यूह बद्ध कोशिश

03 – लक्ष्य समर्पित उपासना

04 – तंत्रो व मन्त्रों की साधना

05 – दुष्कर कठिन तपश्चर्या

  • न करने योग्य अर्थात वर्जित कार्य

01 – सगाई करके नवजीवन के लिए यह समय उचित नहीं है।

02 – नव निर्मित घर का गृह प्रवेश            

03 – विवाह कार्य सम्पादन

04 – नामकरण सँस्कार

05 – नया सौदा या व्यवसाय या व्यावसायिक प्रतिष्ठान का प्रारम्भ

06 – धार्मिक अनुष्ठान व माङ्गलिक कार्य

भद्रा दोष निवारण –

कभी कभी इस तरह की स्थितियाँ होती हैं कि कार्य सम्पादन परमावश्यक प्रतीत होता है ऐसी स्थिति में इन निवारण उपायों के साथ कार्य सम्पादित किये जा सकते हैं –

01 – श्री हनुमत आराधना

02 – भगवन शनि आराधना  

03 – भद्रा पूजन

04 – काला तिल व काले वस्त्र का दान

05 – “ॐ शनैश्चराय नमःमंत्र का जप

 

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