सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि भावात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक पक्ष का विकास शिक्षा शिक्षण के माध्यम से किया जाता है। इसमें से क्रियात्मक पक्ष के मूल्यांकन हेतु प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। पहले भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि, सङ्गीत, व्यावसायिक विषय, कौशल, प्रशिक्षण कार्य क्रम, भूगोल आदि में प्रयोगात्मक परीक्षा का चलन था पर वर्तमान में हिन्दी, अंग्रेजी, विविध मानविकी विषय में भी प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। कुछ विषयों की उपलब्धियों का मूल्याङ्कन प्रयोगात्मक परीक्षा के बिना संभव ही नहीं है। विद्यार्थियों के विकास के दृष्टिकोण से इन परीक्षाओं का विशेष महत्त्व है।
प्रयोगात्मक परीक्षा के उद्देश्य / Objectives of Practical Examination :-
01 – लिखित परीक्षा के पूरक के रूप में / To supplement the written examination
02 – उपलब्धियों के व्यावहारिक मापन व मूल्यांकन हेतु / For practical measurement and evaluation of achievements
03 – शिक्षार्थियों के सम्यक विकास हेतु / For the holistic development of learners
04 – यथार्थ वाद के उद्देश्यों की पूर्ति / To fulfill the objectives of realism
05 – कौशल विकास का मूल्यांकन / Assessment of skill development
06 – क्रियात्मक विकास का मूल्यांकन / Assessment of functional development
07 – विद्यार्थियों के व्यक्तित्व गठन हेतु / For personality development of students
08 – जीवन के यथार्थ अवलम्बन हेतु / For real life support
प्रयोगात्मक परीक्षा की प्रविधियाँ / Techniques of Practical Examination
01- प्रदत्त कार्य मूल्याङ्कन / Assigned Task Evaluation
02 – व्यावहारिक कार्य मूल्यांकन / Practical Task Evaluation
03 – निरीक्षण व मौखिक का सम्यक सम्मिश्रण / A Proper Combination of Observation and Oral Testing
04 – क्रिया सम्पन्नता मूल्यांकन / Activity Completion Evaluation
05 – यथार्थ गणना के आधार पर / Based on accurate calculations
06 – Proper use of equipment
06 – उपकरणों का यथोचित प्रयोग / Proper use of equipment
07 – परिणाम मूल्यांकन /Result evaluation
08 – कार्य व पृच्छा के आधार पर / Based on tasks and questions
प्रयोगात्मक परीक्षा की विशेषताएं / Features of the practical exam
01 – ज्ञानात्मक व्यावहारिकता व उपयोगिता का मूल्याङ्कन / Evaluation of cognitive practicality and utility
02 – क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों का मूल्यांकन / Evaluation of practical objectives
03 – ज्ञान व कौशल मूल्यांकन / Assessment of knowledge and skills
04 – रुचियों का मूल्यांकन / Assessment of interests
05 – व्यक्तिगत क्षमता का मूल्यांकन / Assessment of individual abilities
06 – नकल पर पूर्ण प्रतिबन्ध / Complete prohibition of cheating
07 – व्यावहारिक स्थितियों में मूल्यांकन / Assessment in practical situations
08 – विश्वसनीयता व वैधता में सकारात्मक वृद्धि / Positive increase in reliability and validity
प्रयोगात्मक परीक्षा के दोष / Limitations of Experimental Examination –
भारत ऋषियों मुनियों की ज्ञान परम्परा से जुड़ा है। हमारे पूर्वज, ऋषि, मुनि ने आदि काल से आत्म को समझने की कोशिश की, इस नश्वर संसार से उसका क्या सम्बन्ध रहा। इस शोध में बहुत से पड़ाव और तत्व शामिल होते चले गए। क्रमशः अन्तिम सत्य और मानव व्यक्तित्व का अध्ययन करने की विशद आवश्यकता महसूस की गयी। सत्य और अंतिम सत्य की तलाश का कार्य शिक्षा के माध्यम से बखूबी अंजाम दिया गया और मानव व्यक्तित्व का ज्ञान मनोविज्ञान की श्रेणी में आया। भारत में शिक्षा मनोविज्ञान परम सत्य के दार्शनिक सत्य पर अवलम्बित रहा।
मनोविज्ञान को मन का विज्ञान, व्यवहार के विज्ञान आदि नामों से भी जाना गया। व्यावहारिक पक्ष जुड़ने की कारण इसकी आवश्यकता ने नित्य नए आकाश छुए और आज इसका परिक्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। सम्पूर्ण की बात न कर आज हम केवल शिक्षा मनोविज्ञान के सम्बन्ध में विचार करेंगे। प्रसिद्द भारतीय विचारक एस ० के ० मंगल अपनी पुस्तक शिक्षा मनोविज्ञान के पृष्ठ 21 पर लिखते हैं –
“शिक्षा मनोविज्ञान व्यावहारिक मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें मनोविज्ञान विषय के नियम, सिद्धान्त एवं क्रिया विधि आदि को शिक्षा के क्षेत्र में काम में लाने का प्रयत्न किया जाता है।”
आंग्ल अनुवाद
“Educational psychology is that branch of practical psychology in which an attempt is made to use the rules, principles and methods of psychology in the field of education.”
EDUCATIONAL PSYCHOLOGY: Concept & definitions
शैक्षिक मनोविज्ञान: अवधारणा और परिभाषाएँ –
हमारे यहाँ सब कुछ पाश्चात्य ज्ञान से तलाशने की आदत पड़ी और आजादी के बाद भी शासन उसी से प्रभावित रहा इसीलिये भी हम परमुखापेक्षी होते हुए बात की शुरुआत अरस्तु से करते हैं मनोविज्ञान विकास अवधारणा को स्पष्ट करते हुए स्किनर महोदय का मानना है कि –
“शिक्षा मनोविज्ञान का आरम्भ अरस्तु के समय से माना जा सकता है। पर शिक्षा मनोविज्ञान के विज्ञान की उत्पत्ति यूरोप में पेस्टोलॉजी, हर्बर्ट, और फ्रोबेल के कार्यों से हुई, जिन्होंने शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया।”
“Educational psychology can be traced back to the time of Aristotle. But the science of educational psychology originated in Europe with the work of Pestalozzi, Herbart, and Froebel, Who tried to make education psychological.”
शिक्षा के द्वारा सत्य विवेचित, शोधित, स्थापित होता है और मानव मन उसे निर्दिष्ट करता है विविध अवधारणायें शिक्षा मनोविज्ञान की महती आवश्यकता अनुभूत करते हैं और विविध विज्ञ जन उसे इस तरह पारिभाषित करते हैं।
सीखने सिखाने को बुनियादी आवश्यकता मानते हुए स्किनर महोदय कहते हैं –
“शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जो शिक्षण एवम् सीखने से सम्बन्धित है।”
“Educational Psychology is that branch of psychology which deals with teaching and learning.” Skinner, 1958, p.1
कुछ इसी तरह की भावों की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है क्रो व क्रो के इन विचारों में –
“शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक के सीखने सम्बन्धी अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”
“Educational Psychology describes and explains the learning experiences of an individual from birth through old age.” – Crow & Crow, 1973, p.7
समाज और शिक्षा को अभिन्न मानते हुए नौल व अन्य कहते हैं –
” शिक्षा मनोविज्ञान मुख्य रूप से शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया से परिवर्तित या निर्देशित होने वाले मानव व्यवहार के अध्ययन से सम्बन्धित है।”
“Educational Psychology is concerned primarily with the study of human behaviour as it is changed or directed under the social process of education”
– Noll & others: Journal of Educational Psychology, 1948, p.361
प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक पील महोदय ने संक्षिप्त व सार गर्भित परिभाषा दी है –
“शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा का विज्ञान है। “
“Educational Psychology is the science of Education.” – Peel,1956, p.8
शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र
Scope of Educational Psychology-
सम्पूर्ण परिवेश नित्यप्रति बदल रहा है यह परिवर्तन प्रकृति का नियम है बदलती हुई इस दुनिया की समस्याएं भी नित्य नया नया आकार ले रही हैं ऐसी स्थिति में इसका निश्चित क्षेत्र परिसीमन सम्भव नहीं है और इसे अपरिमित स्वीकार करना पड़ेगा चूँकि यहाँ हम शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र की बात कर रहे हैं इसलिए कुछ बिन्दु स्पष्टीकरण हेतु अधिगमकर्ता के दृष्टिकोण से रखने का प्रयास है। –
01 – विशेष योग्यता अध्ययन /Special ability study
02 – वंशानुक्रम वातावरण अध्ययन / Heredity, environment study
03 – सीखने सम्बन्धी अनुभव अध्ययन / Learning experience study
04 – मूल प्रवृत्तियों का अध्ययन / Basic instinct study
05 – परिस्थितिगत व्यवहार का अध्ययन / Study of situational behaviour
06 – प्रेरणाओं के प्रभाव का अध्ययन / Study of the effect of motivations
07 – मानसिक, शारीरिक, संवेगात्मक प्रतिक्रियायों का अध्ययन / Study of mental, physical and emotional reactions
08 – तत्सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन / Study of related problems
09 – शिक्षा के अंगो सम्बन्धी अध्ययन / Study related to parts of education
10 – विविध गुण अवगुण अध्ययन / Study of various merits and demerits
उक्त कुछ बिंदु देने का प्रयास अवश्य किया गया है लेकिन इसके अतिरिक्त इससे अधिक बिन्दु इसमें शामिल किये जा सकते हैं जैसा कि डगलस व हॉलेंड के इन विचारों से स्पष्ट है –
“शिक्षा मनोविज्ञान की विषय सामग्री शिक्षा की प्रक्रियाओं में भाग लेने वाले व्यक्ति की प्रकृति, मानसिक जीवन और व्यवहार है।”
“The subject matter of Educational Psychology is the nature, mental life and behaviour of the individual undergoing the process of education.” – Douglas & Holland, pp 29-30
इसकी व्यापकता को समझने हेतु स्किनर के ये शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं –
“शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में वह सब ज्ञान और विधियां सम्मिलित हैं, जो सीखने की प्रक्रिया से अधिक अच्छी प्रकार समझने और अधिक कुशलता से निर्देशित करने के लिए आवश्यक है। ”
“Educational psychology takes for its province all information and techniques pertinent to a better understanding and a more efficient direction of the learning process.” – Skinner
सीखने के स्थानान्तरण से आशय किसी सीखे हुए कार्य या सीखे हुए विषय का विविध परिस्थितियों में प्रयोग करने से है। जब कोई मानव किसी विषय या कौशल या सीखा गया या अर्जित ज्ञान अन्य स्थितियों में प्रयोग करना है तो इसे प्रशिक्षण का या अधिगम का स्थानान्तरण कहा जाता है।इसे पारिभाषित करते हुए क्रो व क्रो महोदय कहते हैं –
“सीखने के एक क्षेत्र में प्राप्त होने वाले ज्ञान या कुशलताओं का तथा सोचने, अनुभव करने और कार्य करने की आदतों का, सीखने के दूसरे क्षेत्र में प्रयोग करना साधारणतः प्रशिक्षण का स्थानान्तरण कहा जाता है।”
“The carry-over of habits of thinking, feeling or working of knowledge or of skills, from one learning area to another, usually is referred to as the transfer of training.” 1973, p.323
अधिगम के स्थानान्तरण को समझाते हुए कोलेनसिक महोदय कहते हैं –
“स्थानान्तरण, पहली परिस्थिति से प्राप्त ज्ञान, कुशलता, आदतों, अभियोग्यताओं या अन्य क्रियाओं का दूसरी परिस्थिति में प्रयोग करना है।”
“Transfer is the application of carry over the knowledge, skills, habits, attitudes or other responses from one situation in which time are initially acquired to some other situation.”
लगभग मिलते जुलते विचार कई विद्वानों ने सम्प्रेषित किये उनमें से एक विद्वान सोरेनसन महोदय ने सरल शब्दों में अभिव्यक्ति इस प्रकार दी –
“स्थानान्तरण में एक उपस्थिति में अर्जित ज्ञान,प्रशिक्षण और आदतों का किसी दूसरी परिस्थिति में स्थानान्तरित किये जाने का उल्लेख होता है।”
“Transfer refers to the transfer of knowledge, training and habits acquired in one situation to another situation.” 1948, p.387
स्थानान्तरण के प्रकार / Types of transfer
प्रशिक्षण का स्थानान्तरण मुख्य रूप से दो प्रकार का होता है –
1-सकारात्मक अधिगम -स्थानान्तरण (Positive transfer of learning)
2-नकारात्मक अधिगम -स्थानान्तरण (Negative transfer of learning)
कुछ अन्य विचारक इसे निम्न दो भागों में भी बाँटते हैं।
1-उदग्र अधिगम स्थानान्तरण / Vertical transfer of learning
2-क्षैतिज अधिगम स्थानान्तरण / Horizontal transfer of learning
or
2-समानान्तर अधिगम स्थानान्तरण / Parallel transfer of learning
अधिगम स्थानान्तरण के सिद्धान्त / Principles of Transfer of Learning –
1 – मन का अनुशासन अवलम्बित शक्ति सिद्धान्त / Discipline of the mind based power theory –
इस सम्बन्ध में प्रसिद्द भारतीय दार्शनिक डॉ ० एस ० एस ० माथुर महोदय अपनी पुस्तक ‘शिक्षा मनोविज्ञान’ के पृष्ठ 358 पर लिखते हैं –
“सामान्य रूप से स्मृति सतर्कता, कल्पना, अवधान, इच्छा शक्ति व भाव आदि मस्तिष्क की शक्तियाँ एक दूसरे से स्वतन्त्र हैं और यह भी मन जाता है कि इनमें से प्रत्येक सुनिश्चित इकाई के रूप में हैं।”
आंग्ल अनुवाद –
“Generally the powers of the brain like memory, alertness, imagination, attention, will power and emotions are independent of each other and it is also believed that each of these exists as a definite unit.”
इसी सम्बन्ध में प्रसिद्द शिक्षा विद एस ० के ० मंगल ने उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करते हुए अपनी पुस्तक ‘शिक्षा मनोविज्ञान’ के पृष्ठ 282 – 283 पर लिखा –
आंग्ल अनुवाद –
“Generally the powers of the brain like memory, alertness, imagination, attention, will power and emotions are independent of each other and it is also believed that each of these exists as a definite unit.”
इसी सम्बन्ध में प्रसिद्द शिक्षा विद एस ० के ० मंगल ने उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करते हुए अपनी पुस्तक ‘शिक्षा मनोविज्ञान’ के पृष्ठ 282 – 283 पर लिखा –
2 – समान तत्वों का सिद्धान्त / Principle of similar elements –
समान तत्वों का सिद्धान्त की महत्ता को बताते हुएप्रसिद्द भारतीय दार्शनिक डॉ ० एस ० एस ० माथुर महोदय अपनी पुस्तक ‘शिक्षा मनोविज्ञान’ के पृष्ठ 359 पर क्रो एवं क्रो के विचार को उद्धृत किया है –
“आधुनिक मनोविज्ञान वेत्ता इस तथ्य पर आश्वस्त हैं कि मानसिक क्रियाएं ; जैसे विचार करना, अवधान, स्मृति और तर्क आदि;अलग अलग अपना अस्तित्व नहीं रखती हैं। परन्तु किसी भी स्थिति में ये सब मानसिक क्रियाएं एक दूसरे से मिलकर क्रियाशील होती हैं। “
आंग्ल अनुवाद –
“Modern psychologists are convinced of the fact that mental functions; such as thinking, attention, memory and reasoning etc.; do not exist separately. But in any situation, all these mental functions function in conjunction with each other.”
विविध मनोवैज्ञानिकों ने विविध परीक्षणों के माध्यम से पाया कि अनेक परीक्षणों में जिनमें क्रियाएं समान थीं स्थानान्तरण पाया गया। गेट्स महोदय लिखते हैं –
“यह देखा गया है की समान तत्वों से अधिगमान्तरण का अनुपात अधिक होता है।”
“It has been observed that the rate of transfer is higher with similar elements.”
3 – सामान्य और विशिष्ट तत्वों का सिद्धान्त (Theory of ‘G’ and ‘S’ factors)
मानव में दो प्रकार की बुद्धि होती है सामान्य और विशिष्ट और इन्हीं का सम्बन्ध सामान्य योग्यता और विशिष्ट योग्यता से होता है स्पीयरमैन और विविध मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि इन दोनों प्रकार की योग्यता में से स्थानांतरण केवल सामान्य योग्यता का होता है। इसी लिए कुछ विद्वान् इसे सामान्यीकरण का सिद्धान्त (Principle of generalization) कहना पसंद करते हैं भाटिया महोदय के अनुसार –
“विशिष्ट योग्यताओं का स्थानान्तरण नहीं होता है, पर सामान्य योग्यता का कुछ होता है।”
“There is no transfer in special abilities but there is some in general ability.”
अधिगम स्थानान्तरण हेतु आवश्यक तत्व / Essential elements for transfer of learning
01-निश्चित परिस्थिति /Certain situation –
किसी विशेष परिस्थिति का ज्ञान या कौशल न होने पर पहले सीखे ज्ञान या कौशल का प्रयोग विकल्प रूप में हमारे द्वारा किया जाता है लेकिन रायबर्न महोदय का मानना है –
“स्थानान्तरण, निश्चित परिस्थितियों में निश्चित मात्रा में हो सकता है।”
“There is a certain amount of transference that can take place under certain conditions.” – Ryburn (p213)
02- अधिगमार्थी की सामान्य बुद्धि / General intelligence of the learner
गैरट (Garret p 318 -319) महोदय के अनुसार –
“हाई स्कूल में अध्ययन करने वाले सामान्य बुद्धि के सर्वश्रेष्ठ छात्रों में निम्नतम सामान्य बुद्धि के छात्रों की अपेक्षा स्थानान्तरण करने की योग्यता 20 गुना अधिक होती है।”
“The best average students in high school have a 20 times greater ability to transfer than those with the lowest average intelligence.”
03- अधिगमार्थी की शैक्षिक योग्यता / Educational qualification of the learner
मर्सेल महोदय के अनुसार –
“जब हम किसी बात को वास्तव में सीख लेते हैं तभी उसका स्थानान्तरण कर सकते हैं।”
“Whenever we have really learned anything, we can transfer it.” Mursell (p.225)
04- समान विषयवस्तु /Same subject matter
भाटिया (Bhatiya, p 315 ) महोदय के अनुसार -“यदि दो विषय पूर्ण रूप से समान हैं, तो 100 प्रतिशत स्थानान्तरण हो सकता है। यदि विषय बिलकुल भिन्न है, तो तनिक भी स्थानान्तरण न होना सम्भव है। ”
“If two subjects are completely similar, there may be 100 percent transfer. If the subjects are completely different, there may be no transfer at all.”
05- समान अध्ययन विधियां / Common study methods –
भाटिया (Bhatiya, p 215 ) के अनुसार –
“जिन विषयों की अध्ययन विधियां समान होती हैं उनमें थोड़ा पर वास्तविक स्थानान्तरण होता है।”
“There is little but real transfer between subjects that have similar study methods.”
06- स्थानान्तरण हेतु प्रशिक्षण / Training for transfer
गैरेट(Garrett, p.319) ने लिखा है – “विद्यालय कार्य में स्थानान्तरण की सर्वोत्तम विधि है -स्थानान्तरण की शिक्षा देना।”
“The best way to get transfer in school work is to reach for transfer.”
07- रूचि, अरुचि के विषयों का प्रभाव / Effect of subjects of interest and disinterest-
रूचि के विषय में अधिगम और अन्य क्षेत्र हेतु स्थानान्तरण सुगम व तीव्र गति से होगा क्यों कि एक क्षेत्र की निष्पत्ति से दूसरे क्षेत्र की निष्पत्ति प्रभावित होती है। जैसा कि यलोन व वीनस्टीन ने भी लिखा है। –
“अधिगम के स्थानान्तरण से अभिप्राय है -एक कार्य की निष्पत्ति दूसरी निष्पत्ति से प्रभावित होती है। “
“Transfer of learning means that performance on one task is affected by performance of another task.” – Yelon and Weinstein
08 – अधिगमार्थी की इच्छा /Learner’s desire –
मर्सेल (Mursel, p. 302 ) के अनुसार
“किसी नई परिस्थिति की अधिगम स्थानान्तरण की एक अनिवार्य शर्त है कि सीखने वाले में उसे हस्तान्तरित करने की इच्छा अवश्य होनी चाहिए।”
“An essential condition for the transfer of learning to a new situation is that the learner must have the desire to transfer it.”
अधिगम स्थानान्तरण में शिक्षक की भूमिका/ Role of teacher in transfer of learning –
जिस तरह से माता पिता एक शिशु के लिए पूरी दुनियाँ होते हैं ठीक उसी तरह अध्यापक बालक के विद्यालय में प्रवेश के उपरान्त उसकी दुनियाँ की सर्वाधिक प्रेरक शक्ति है इस लिए उसकी प्रेरणा और अधिगम स्थानान्तरण में उसकी भूमिका सर्वाधिक है शिक्षा के अंगों व विविध तत्व कैसे अधिगम स्थानान्तरण में सहायक हो सकते हैं। आइये देखते हैं इन बिन्दुओं के आलोक में –
01 – पाठ्यक्रम / Curriculum
02 – शिक्षण विधियाँ / Teaching Methods
03 – अनुशासन / Discipline
04 – अध्यापक भूमिका / Teacher Role
05 – छात्र / Students
06 – पूर्व ज्ञान व नवीन ज्ञान की सम्बद्धता /Relation between previous knowledge and new knowledge
07 – सैद्धान्तिकता व व्यवहार का समन्वय / Coordination of theory and practice
08 – स्वप्रयत्न को बढ़ावा / Promotion of self-effort
09 – नवीन अधिगम साधनों की पारस्परिक निर्भरता बोध / Understanding the interdependence of new learning tools
10 – सकारात्मक स्थानान्तरण हेतु प्रेरकत्व / Motivation for positive transfer
उक्त विविध तत्वों से यह स्पष्ट है कि उक्त के अतिरिक्त और भी बहुत सारे बिंदु हो सकते हैं जहां अध्यापक बालक की अधिगम स्तनांतरण में मदद करे क्यों कि आज दुनियाँ बहुत तेजी से बदल रही है और शिक्षा के सारे अंग बदलते परिवेश के साथ तालमेल करने में जुटे हैं। लेकिन अध्यापक भी समाज का अंग है और यदि समाज ,अध्यापक को समस्या मुक्त रखने में भूमिका का सम्यक निर्वहन करेगा तो अधिगम स्थानान्तरण सम्यक व विकासोन्मुख होगा।
ज्यों ही हमारी आँख एक नवजात शिशु के रूप में खुलती है हमें विलक्षण जगत के दर्शन होते हैं और बहुत सारे बन्धनों से हम बँधते जाते हैं इस अद्भुत सृष्टि का सृजन करने वाला सृष्टा हमारी ज्ञान परिधि से दूर रहता है और हम उसे ईष्ट या ईश कहते हैं और हम सब ईश अंश है वह पूर्ण है हम उसके अंश मात्र हैं सृजन की सम्पूर्ण शक्ति उस परम पिता में सन्निहित है लेकिन वह सृजन की शक्ति मानव में भी निहित है। जिसे सृजनात्मकता कहते हैं।
सृजनात्मकता से आशय / Meaning of creativity –
दुनियाँ में विध्वंश और सृजन की शक्तियाँ विद्यमान हैं जिन व्यक्तित्वों को दीर्घ काल तक याद रखा जाता है वे सृजन की शक्ति से संपन्न होते हैं आज विद्यार्थियों को सृजनात्मकता से जोड़ने के लिए यह परमावश्यक है कि उन्हें प्रारम्भ से एक वातावरण प्रदान किया जाए जो नवनिर्माण में सहयोगी हो। सृजनात्मकता से आशय उन शक्तियों से है जो आने वाले कल के लिए नव सिद्धान्त, नव वस्तु, नवोन्मेषी नियम या उस विचार को जन्म देते हैं जो आने वाले कल की प्रगति में सहयोगी हो।ऐसी शक्ति या क्षमता सृजनात्मकता कहलाती है।
सृजनात्मकता सम्बन्धी विविध परिभाषाएं
Various definitions of creativity –
विविध विज्ञ जनों ने अपने विचार स्तर के आधार पर सृजनात्मकता को पारिभाषित करने का प्रयास किया है कुछ प्रसिद्द विचारकों की परिभाषाएं दृष्टव्य हैं।
क्रो एवम् क्रो के अनुसार
“सृजनात्मकता मौलिक परिणामों को व्यक्त करने की मानसिक प्रक्रिया है।”
“Creativity is a mental process to express the original outcomes.”
ड्रेवडाहल (Drevdahal) के अनुसार –
“सृजनात्मकता व्यक्ति की वह योग्यता है जिसके द्वारा वह उन वस्तुओं या विचारों का उत्पादन करता है जो अनिवार्य रूप से नए हों और जिन्हे वह व्यक्ति पहले से न जानता हो।”
“Creativity is the capacity of a person to produce composition, products or ideas which are essentially new or novel and previously unknown to the producer.”
Skinner(स्किनर) महोदय के अनुसार
“सृजनात्मक चिन्तन का अर्थ है कि व्यक्ति की भविष्यवाणियां या निष्कर्ष नवीन, मौलिक, अन्वेषणात्मक तथा असाधारण हों। सृजनात्मक चिन्तक वह है जो नए क्षेत्र की खोज करता है, नए निरीक्षण करता है, नई भविष्यवाणियां करता है और नए निष्कर्ष निकालता है।”
“Creative thinking means that the predictions and or inferences for the individual are new, original, ingenious, unusual. The creative thinker is one who explores new areas and makes new observations, new predictions, new inferences.” 1973 p 529
स्टेन (Sten) महोदय के अनुसार
“जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो, जो किसी समय में समूह द्वारा उपयोगी मान्य हो, वह कार्य सृजनात्मक कहलाता है।”
“When it results in a novel work that is accept as tenable or useful or satisfying by a group at some point in time.”
कॉल एवम् ब्रूस (Colle and Bruce) के अनुसार
“सृजनात्मक एक मौलिक उत्पादन के रूप में मानव मन को ग्रहण करके अभिव्यक्त करने और गुणांकन करने की योग्यता एवम् क्रिया है।”
“Creativity is an ability and activity of man’s mind to group, express and appreciate is the form of an original product.”
सृजनात्मकता के कारक / Factors of creativity –
सृजनात्मक मानव होने के लिए उसमें कुछ तत्वों का समावेशन आवश्यक है जिन्हे कुछ विद्वानों ने आवश्यक सोपानों के रूप में भी वर्णित किया है। मन (Munn)महोदय ने सृजनात्मकता के चार कारकों का वर्णन किया है जो इस प्रकार हैं।
01 – तैयारी (Preparation )
02 – इन्क्यूबेशन Incubation -(समस्या से अलगाव)
03 – प्रेरणा व सहज बोध (Motivation & Illumination)
04 – जाँच पड़ताल व पुनरावृत्ति (Verification & Revision)
गिलफोर्ड [Guilford, J.P] के अनुसार
इन्होंने भी सृजनात्मकता हेतु चार कारकों को महत्त्वपूर्ण माना, जो इस प्रकार हैं –
01 – वर्तमान परिस्थिति से परे जाने की योग्यता (Ability to go beyond the current situation)
02 – समस्या की पुनर्व्याख्या (Re- explanation of Problem)
03 – सामन्जस्य (Adjustment)
04 – अन्यों के विचारों में परिवर्तन (Changing the thought of others)
सृजनात्मकता का पोषण / Nurturing of creativity –
सृजनात्मकता पर न तो किसी का एकाधिकार है और न यह प्रतिभा सम्पन्न लोगों की चेरी है। यह एक दिन में नहीं आती बल्कि निरन्तर चिंतन का परिणाम है। माता, पिता, अध्यापक, विद्यालय, मोटिवेशनल स्पीकर,पुस्तकें सभी इसमें अपनी भूमिका अभिनीत करते हैं। यह ईश्वर प्रदत्त व अर्जित ऐसा गन है जो स्वभाव का अंग बन जाता है और फिर उसी तरह की आदतों का निर्माण होता है। संस्थानों व अध्यापकों द्वारा निम्न बिन्दुओं के आलोक में सृजनात्मकता का पोषण किया जा सकता है।–
01 -स्वप्रेरकत्व को प्रश्रय / fostering self-motivation
02 – स्वविवेक आधारित उत्तर देने की स्वतन्त्रता / Freedom to answer based on one’s own discretion
03- स्वअभिव्यक्ति के अवसर / Opportunities for self expression
04 – मौलिकता को प्रोत्साहन / Encourage originality
05 – लचीलेपन की ग्राह्यता / Flexibility of acceptance
06 – उचित अवसरों की उपलब्धता / Availability of appropriate opportunities
07 – स्वस्थ आदतों का विकास / Development of healthy habits
08 – स्वयं के आदर्श का प्रस्तुतीकरण / Presentation of self-ideal
09 – मूल्याँकन प्रणाली में सुधार / Improvement in the evaluation system
10 – सामुदायिक सृजनात्मक प्रस्तुतियाँ / Community creative presentations
11 – सृजनात्मक चिन्तन अवरोध से बचाव / Avoiding the blockage of creative thinking
12 – झिझक दूर करना / remove hesitation
13 – उचित वातावरण प्रदान करना / provide appropriate enviro
कर्ट लेविन महोदय मूलतः एक जर्मन मनोवैज्ञानिक थे इनका 1890 में हुआ और ये बाद में अमेरिका जाकर बस गए अपने शोध के आधार पर इन्होने 1917 में मनोविज्ञान के क्षेत्र सिद्धान्त पर महत्त्व पूर्ण कार्य किया। अमेरिका के स्टेन फोर्ड(Stanford) और आईऔवा (Iowa) विश्वविद्यालय में इन्होने प्रोफेसर के रूप में योगदान दिया।
कर्ट लेविन महोदय ने अपने क्षेत्र सिद्धान्त सम्बन्धी विचारों को अभिव्यक्त करते हुए कहा
“मानव व्यवहार व्यक्ति और वातावरण दोनों का प्रतिफल है। जिसे सांकेतिक रूप में B = f (P.E) द्वारा प्रदर्शित किया जा सकता है। “
“Human behaviour is the function of both the person and the environment expressed is symbolic term B = f (P.E).”
यहाँ
B = Behaviour (व्यवहार)
P = Person (व्यक्ति )
f = Field (क्षेत्र )
E = Environment (वातावरण)
लेविन द्वारा जो उक्त शब्द प्रयोग में लाये गए इन सबके साथ व्यवहार में मनोवैज्ञानिक शब्द भी शामिल है जैसे व्यवहार से आशय मनोवैज्ञानिक व्यवहार से है इनकी फील्ड साइकोलॉजी(Field Psychology) को टोपोलॉजिकल साइकोलॉजी (Topological Psychology) व वेक्टर साइकोलॉजी (Vector Psychology) नाम से भी जानते हैं।
लेविन के क्षेत्र सिद्धान्त में शामिल है जीवन परिक्षेत्र, वेक्टर्स व कर्षण तथा तलरूप (Topology)
जीवन परिक्षेत्र –
[वेक्टर (प्रेरक शक्ति)→ मनोवैज्ञानिक व्यक्ति ( P ) ⇶बाधाएं ⇶ मनोवैज्ञानिक वातावरण + बाधाएं ⇉⇉⇉→ लक्ष्य] जीवन क्षेत्र के बाहर का घेरा
वेक्टर्स व कर्षण –
लेविन ने अपने क्षेत्र सिद्धान्त को समझाने में जो वेक्टर्स और कर्षण का प्रयोग किया है उसका आशय यह है कि मानव के जीवन परिक्षेत्र में दो तरह की शक्तियां कार्य करती हैं जिनको हम सकारात्मक कर्षण शक्ति व नकारात्मक कर्षण शक्ति कह सकते हैं जीवन दायरे में लक्ष्य की और ले जाने वाली शक्ति सकारात्मक कर्षण शक्ति कहलाती है और लक्ष्य से दूर ले जाने वाली नकारात्मक कर्षण शक्ति कहलाती है।
इन विशिष्ट कर्षण शक्तियों की वजह से व्यक्ति लक्ष्य की ओर या लक्ष्य से दूर भागता है। इनके प्रभाव से ही लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में बढ़ने हेतु पर्याप्त प्रोत्साहन, प्रेरणा या विपरीत दिशा हतोत्साह का अनुभव करता है।
तल रूप (TPOPLOGY) –
यह अवधारण लेविन महोदय को गणित के परिक्षेत्र से प्राप्त हुई गणित में तलरूप प्रदर्शन ज्यामितीय आकृतियों का प्रयोग होता है इसी अभिव्यक्ति को भीतरी (Inside) और बाहरी (Outside) तथा सीमा रेखा (Boundary) द्वारा होती है। कौन किसके बाहर , कौन किसके भीतर, कौन किसके पीछे है। इसी कारण टोपोलॉजी की भाषा में अण्डाकार आकृति, गोल आकृति, अनियमित बहुभुज में इनकी रचना और आकृतियों में इतनी विविधता होने के बाद भी कोई अन्तर नहीं माना जाता। लेविन ने टोपोलॉजी की अवधारणा का मानव के जीवन परिक्षेत्र में प्रत्यक्षीकरण और अन्तःक्रियाओं के परिणामस्वरूप विविध बदलावों को दिखाने के लिए बहुत अच्छा उपयोग किया।
Learning and outcomes : Lewin’sField Theory –
अधिगम का सम्बन्ध मानव के व्यवहार में आने वाले परिवर्तन से है व्यक्ति के व्यवहार में होने वाला यह परिवर्तन क्षेत्र सिद्धांत के आधार पर इस प्रकार समझाया जा सकता है।
लेविन यह मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति का एक जीवन दायरा होता है और उसी के मनोवैज्ञानिक दायरे में वह विचरण कर रहा होता है अपने जीवन दायरे के बारे में उसका खुद का प्रत्यक्षीकरण होता है अपनी इसी संज्ञानात्मक संरचना के आधार पर उसे तत्कालीन परिस्थिति और उसमें लक्ष्य प्राप्ति हेतु की जाने वाली क्रियाओं का बोध होता है इस लक्ष्य प्राप्ति हेतु उसे मनोवैज्ञानिक तनाव होता है जो दो तरह से दूर हो सकता है एक तो यह कि उसे लक्ष्य की प्राप्ति हो जाए या फिर दूसरे इस तरह कि वह अपने जीवन दायरे का पुनः व्यवस्थापन करे। उदाहरण स्वरुप IAS का सपना लेकर चलने वाला असफल होने पर पुनः नए ढंग से तैयारी करे या किसी और पद से जुड़ने के प्रयास में परिवर्तन करे।
अधिगम की यह मनोदशा लेविन के अनुसार यह सिद्ध करती है कि लक्ष्य प्राप्ति हेतु परिस्थिति व समय विशेष पर व्यक्ति अपने जीवन दायरे में परिवर्तन करता है और इसके तीन आधार होते हैं –
01 — भेदी करण [Differentiation]
02 — सामान्यीकरण [Generalization]
03 — पुनः संरचना [Re- structuring]
लेविन की इस अधिगम प्रक्रियाओं या व्यवहार परिवर्तन को बोध गम्य बनाने हेतु भारतीय विद्वान एस ० के ० मंगल महोदय ने निम्न तथ्यों या बिन्दुओं को समाहित किया गया जिससे इसकी व्यवहारिकता दृष्टिगत होती है।
01 — अभिप्रेरणा और अधिगम [Motivation and learning]
02 — समस्या समाधान योहयता का विकास [Development of problem solving ability]
03 — आदतों का निर्माण [Habit Formation]
04 — अधिगम व बौद्धिकता पूर्ण व्यवहार [Learning and intelligent behaviour]
EDUCATIONAL IMPLICATIONS OF FIELD THEORY
क्षेत्र सिद्धान्त की शैक्षिक उपयोगिता –
01 — अध्यापक द्वारा व्यक्तिगत भिन्नताओं के आधार पर पृथक निर्देश/Separate instruction by the teacher based on individual differences
02 — उद्देश्य व लक्ष्य स्पष्टीकरण से उसकी प्राप्ति / Achievement of objectives and goals through clarification
03 — सूझबूझ व अन्तःदृष्टि का विकास / Development of understanding and insight
04 — अधिगम क्षेत्र का उचित नियोजन, संगठन व व्यवस्थीकरण / Proper planning, organization and systematization of the learning area
05 — विभेदीकरण, सामान्यीकरण व संरचनाकरण का उपयुक्त प्रशिक्षण / Appropriate training of differentiation, generalization and structuring
06 — अधिगम का उचित नियोजन व्यवस्था तथा प्रबन्धीकरण / Proper planning and management of learning
07 — ‘जीवन दायरे के बाहर का प्रभाव नहीं’ विचार का अधिगम में प्रयोग / Use of the idea of ’no influence from outside the sphere of life’ in learning
अधिगम या सीखना ही वह जादुई शब्द है जो हमें मानवों की पंक्ति में खड़ा करता है सभी मानव जीवन में नित्य नये अनुभवों को अधिगमित कर व्यवहार में लाते हैं अनुभव, शब्दावली, व्यवहार सभी में नित्य संशोधन और प्रगति की यह यात्रा ही अधिगम है यह केवल पुस्तकें एक निर्धारित समयावधि में हमें नहीं सिखातीं बल्कि हम जीवन पर्यन्त इस मानसिक प्रक्रिया का आनन्द उठाते हैं।
अधिगम या सीखना एक जन्मजात प्रक्रिया है सीखना अनुभवजन्य है विविध विचारकों ने अधिगम या सीखने को इस प्रकार पारिभाषित किया गया है कुछ परिभाषाएं इस प्रकार हैं –
गेट्स व अन्य
“अनुभव के द्वारा व्यवहार में होने वाले परिवर्तन को सीखना या अधिगम कहते हैं।” –
“Learning is the modification of behaviour through experiences,” 1946,p 318
किंग्सले एवं गैरी
“अभ्यास अथवा प्रशिक्षण के फलस्वरूप नवीन तरीके से व्यवहार करने अथवा व्यवहार में परिवर्तन लाने की प्रक्रिया को सीखना कहते हैं। “
“Learning is the process by which behaviour is originated or changed through practice and training.” 1957, p.12
मॉर्गन व गिल्लीलैंड के अनुसार –
“Learning is some modification in the behaviour of the organism as a result of experience which is retained for at least a certain period of time.”
“सीखना अनुभव के परिणामस्वरूप जीव के व्यवहार में कुछ संशोधन है जो कम से कम एक निश्चित अवधि तक बरकरार रहता है।”
क्रो व क्रो के अनुसार –
“सीखना आदतों,ज्ञान और अभिवृत्तियों का अर्जन है। इसमें कार्यों को करने के नवीन तरीके सम्मिलित हैं और इसकी शुरुवात व्यक्ति द्वारा किसी भी बाधा को दूर करने अथवा नवीन परिस्थितियों में अपने समायोजन को लेकर होती है। इसके माध्यम से व्यवहार में उत्तरोत्तर परिवर्त्तन होता रहता है यह व्यक्ति को अपने अभिप्राय अथवा लक्ष्य को पाने में समर्थ बनाती है। “
“Learning is the acquisition of habits, knowledge and attitudes, it involves new ways of doing things, and it operates in an individual’s attempts to overcome obstacles or to adjust to new situations. It represents progressive change in behaviour…… It enables him to satisfy interests or to attain goals.” 1973. p.225
FACTOR INFLUENSING LEARNING / सीखने को प्रभावित करने वाले कारक –
अधिगम को प्रभावित करने वाले कारकों पर यदि यथार्थ चिन्तन, मन्थन किया जाए तो अत्याधिक विस्तार में जाने की आवश्यकता महसूस होगी। हम यहाँ स्नातक व स्नातकोत्तर के दृष्टिकोण से व भारतीय परिवेश के उच्च शिक्षा स्तर के अधिगम प्रभावी कारकों का अध्ययन करेंगे। उच्च शिक्षा की संस्थाएं जो अस्तित्व में हैं उनमें लगभग 80 % स्ववित्त पोषित संस्थान हैं और 20 % सरकारी। इन्हें सरकारी प्रशासनिक व्यवस्था के साथ व्यक्तिगत प्रबन्धन के द्वारा चलाया जाता है। ऐसी स्थिति में निम्न पाँच महत्त्वपूर्ण कारक अधिगम को प्रभावित करने वाले नज़र आते हैं साथ ही अन्य विविध तत्वों पर भी विचार करना होगा –
01 – प्रबन्धन व विश्वविद्यालय से सम्बन्धित कारक / Factors related to management and university
02 – अधिगमार्थी सम्बन्धित कारक / Learner related factors
03 – शिक्षक सम्बन्धी कारक / Teacher related factors
04 – पाठ्यक्रम सम्बन्धी कारक / Curriculam related factors
05 – प्रक्रिया से सम्बन्धित कारक / Process related factors
01 – प्रबन्धन व विश्वविद्यालय से सम्बन्धित कारक / Factors related to management and university
(A) – महाविद्यालय प्रबन्धन का अधिगम पर प्रभाव
(B) – विश्वविद्यालय का अधिगम पर प्रभाव
02 – अधिगमार्थी सम्बन्धित कारक / Learner related factors –
यहाँ दृष्टिकोण व विद्यार्थी की विविध क्षमताएं सीधे सीधे अधिगम पर प्रभाव डालते हैं
(A) – मानसिक स्वास्थय / Mental health
(B) – शारीरिक स्वास्थय / Physical health
(C) – मूलभूत क्षमता / Basic capability
(D) – अभिप्रेरणा स्तर / Motivation level
(E) – सकारात्मक दृष्टिकोण / Positive attitude
(F) – दृढ़ इच्छा शक्ति / Strong will power
(G) – महत्वाकांक्षा / Ambition
03 – शिक्षक सम्बन्धी कारक / Teacher related factors
(A) – व्यक्तित्व / Personality
(B) – शिक्षण कला / Pedagogy
(C) – शिक्षण कौशल / Teaching skills
(D) – शिक्षण सूत्र / Teaching formula
(E) – मानसिक स्वास्थय / Mental health
(F) – समायोजन स्तर / Adjustment level
04 – पाठ्यक्रम सम्बन्धी कारक / Curriculam related factors –
(A) – यथार्थ धरातल आधारित पाठ्यक्रम / real ground based curriculum
05 – प्रक्रिया से सम्बन्धित कारक / Process related factors
(A) – परिस्थिति / Situation.
(B) – वातावरण / Environment
(C) – संसाधन / Resources
अन्य विविध कारक / Other miscellaneous factors –
(A) – स्मरण / Remembrance
(B) – विस्मरण / Oblivion / Forgetting
(C) – थकान / Fatigue
(D) – ध्यान केन्द्रीयकरण / Concentration of attention
(E) – अभिप्रेरणा नियोजन /motivation planning
कैली महोदय के अनुसार –
“अभिप्रेरणा, अधिगम प्रक्रिया के उचित व्यवस्थापन में केन्द्रीय कारक होता है। किसी प्रकार की भी अभिप्रेरणा सभी प्रकार के अधिगम में अवश्य उपस्थित रहनी चाहिए।”
आंग्ल अनुवाद –
“Motivation is a central factor in the proper organization of the learning process. Motivation of any kind must be present in all types of learning.”
ई – अधिगम, अधिगम का वह प्रकार है जिसमें अधिगम हेतु मुख्य रूप से इलेक्ट्रॉनिक माध्यम या स्रोतों की मदद ली जाती है, इसमें दृश्य व दृश्य- श्रव्य साधनों के माध्यम से अधिगम को सरल बनाया जाता है इन साधनों में माइक्रो फोन, दृश्य व दृश्य श्रव्य टेप सी ० डी ०, डी ० वी ० डी ०, पेन ड्राइव, हार्ड डिस्क आदि प्रयोग किया जाता है। इलेक्ट्रॉनिक अधिगम में सूचना व सम्प्रेषण तकनीकी का प्रयोग मुख्यतः होता है इसके अन्तर्गत टेली कॉन्फ्रेंसिंग, कम्प्यूटर कॉन्फ्रेंसिंग, वीडिओ कॉन्फ्रेंसिंग, ऑन लाइन लाइब्रेरी, ई मेल, चैटिंग आदि आते हैं। इन सबमें इण्टरनेट व वेव तकनीकी प्रयुक्त की जाती है। आधुनिकतम कम्प्यूटर, बहु माध्यम नेट वर्किंग, इलेक्ट्रॉनिक अधिगम के प्रमुख सहायक हैं।
रोजेन वर्ग महोदय (2001) ने बताया –
“ई – अधिगम से तात्पर्य इण्टरनेट तकनीकियों के ऐसे उपयोग से है जिनसे विविध प्रकार के ऐसे रास्ते खुलें जिनके द्वारा ज्ञान और कार्य क्षमताओं में वृद्धि की जा सके।”
“E-learning refers to the use of Internet technologies that open up a variety of avenues through which knowledge and work abilities can be enhanced.”ई–अधिगम के लाभ / Benefits of e-learning – 1- कभी भी कहीं भी अधिगम0 2- प्रभावी अधिगम सामग्री 0 3- शिक्षण विधियों का प्रभावी अधिगम 0 4- स्वगति से अधिगम 0 5- तत्सम्बन्धी गैजेट्स का सम्यक उपयोग 0 6- परम्परागत संसाधन से वंचितों को वरदान 0 7- मानसिक स्तर, कौशल व रूचि अनुसार अध्ययन 0 8- आवश्यकतानुसार अध्ययन 0 9- उपचारात्मक व निदानात्मक शिक्षण 10 – विविधता में एकता के दर्शन 11 – गुणवत्ता युक्त प्रभावी माध्यम 12 – स्व क्षमतानुसार अध्ययनई–अधिगम की सीमाएं / Limitations of e-learning –01 – शिक्षा का यांत्रिकीकरण 02 – अधिगम कर्त्ताओं की नकारात्मकता 03 – वांछित कौशलों का अभाव 04 – अन्तः क्रिया का अभाव 05 – व्यक्तिगत संसाधनों का अभाव 06 – साधनविहीन विद्यालय 07 – प्रशिक्षण रहित शिक्षक08 – ऊर्जा संसाधनों का अभाव 09 – जागरूकता अभाव 10 – परम्परागत रूढ़िवादी सोच
व्यक्तित्व
विकास में मानव का सम्पूर्ण परिकलन छिपा है यह एक दिन में नहीं गढ़ा जा सकता। मानव
व्यक्तित्व परिमार्जन उसकी निरन्तर विकास यात्रा का परिणाम है। स्वभाव की चन्द
विमाएँ न तो इसका प्रतिनिधित्व कर सकती हैं न स्वयं का आकलन सर्वश्रेष्ठ निर्णय हो
सकता है । दुनिया दीर्घकाल में आपको बार बार परख कर आपके व्यक्तित्व पर दृढ
विश्वास जमाती है। व्यक्तित्व को दिशा देने वाली पिताश्री के मुख से सुनीं चन्द
पंक्तियाँ जेहन में आ रही हैं, जो याद आता है आपकी झोली में रखता हूँ –
आदमी वह है जो मुसीबत में
परेशान न हो
कोई मुश्किल नहीं ऐसी है जो आसान न हो
यह है दुनियाँ यहाँ दिन ढलते ही शाम आती है
सुबह हर रोज लेकर नया पैगाम आती है
यह हमेशा से है इस दौर औ दुनियाँ का चलन
चाँद सूरज को भी लग जाता है इक रोज ग्रहण
जानी बूझी हुई बातों से अनजान न हो
आदमी वह है जो मुसीबत में परेशान न हो .
आज जो कहने जा रहा हूँ, वह
बहुत सामान्य है और आपको लगेगा कि आपको पता था यह थोड़ा सा परिवर्तन जीवन का परिवर्तक बिन्दु भी हो
सकता है हम सँवर सकते हैं बात किताबी नहीं है बल्कि अनुभव के खजाने के कुछ विचार
हैं मुझे लगता है ये व्यक्तित्व को सही आयाम देने में अवश्य सक्षम होंगे .
व्यक्तित्व विकास के आठ उपाय / Eight tips of personality development –
1 – स्वयम्
से प्यार / Love yourself
2 – परिधान
/Apparel
3 – सद्
सङ्गति / Good fellowship
4 – धैर्य
व जोश का समागम / Patience
and passion
5 – अद्यतन
जानकारी / updated
information
6 – सम्प्रेषण
कौशल / communication
skills
7 – मुस्कराहट
का सम्यक प्रयोग / use of
smile
8 – व्यापक
दृष्टिकोण अभ्युदय / Comprehensive
outlook
1 – स्वयम् से प्यार / Love
yourself –
सृष्टि ने मानव शरीर के रूप में अद्भुत देन
हमें दी है साथ दिया है विचार विश्लेषण में सक्षम मानस। हम विचार सकते हैं कि यह
शरीर वह आलम्ब है जो जीवन पर्यन्त कर्म करेगा। अतः इसको व्यवस्थित रखना हमारा परम
दायित्व है प्राणायाम, व्यायाम, योगासन, मालिश आदि के द्वारा
इसे दीर्घ काल तक सक्षम, सुडौल, सुन्दर, आकर्षक रखा जा सकता है
तो फिर क्यों न हम इश्वर प्रदत्त का सर्वोत्तम उपयोग उक्त रूप में करें। स्वयम् से
प्यार के प्रतिफल में चुस्ती, फुर्ती, सक्षमता, के रूप में आकर्षक
व्यक्तित्व आपको प्राप्त होगा।
2 – परिधान /Apparel –
अपनी विकास यात्रा के प्रारम्भिक काल में
परिधान की आवश्यकता व शक्ति को हमने पहचान लिया था इसीलिये पेड़ की पत्तियाँ, छालें, विभिन्न पशु चर्म के उपयोग से आगे बढ़कर आज
के आकर्षक परिधानों तक की यात्रा हमने पूर्ण की है। आज विभिन्न आकार, प्रकार, का आकर्षक रंगों में परिधान उपलब्ध हैं।
हमें अपनी कद, काठी, मर्यादा, क्षमता, समय
ध्यान में रखकर अपने अनुरूप चरण से शीर्ष तक परिधान चयनित करने चाहिए। सही
चयन आपके व्यक्तित्व को और आकर्षक बना देगा।
3 – सद् सङ्गति / Good
fellowship –
यह बहुत बड़े आयाम को अपने अन्दर समेटे है और
इसीलिये यह हमें अंदर बाहर दोनों
परिक्षेत्रों में सुदर्शनीय स्थिति में लाती है यह सङ्गति अच्छे आवश्यक साहित्य, अच्छे विचार, सार्थक व्यक्तित्वों, दिशा बोधक वर्तमान व
पुरातन प्रेरक प्रसंगों की भी हो सकती है। हमारे यहां के चित्र उपस्थिति सामग्री
सभी हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं इसलिए बहुत सावधानी पूर्वक जिन्दगी
बितानी चाहिए। याद रखें सद् सङ्गति प्रवृत्तियों को संयमित रखती है और हमारे आचरण
व चरित्र का उच्चीकरण करती है और इसी पुनीत भाव से जुडी कुछ पंक्तियाँ आभार सहित
प्रस्तुत करता हूँ किसी विशिष्ट व्यक्तित्व की –
श्वाँस खींचने से पूर्व ठीक से विचार लो, कि;
श्वाँस धारने की कौन नीति होनी चाहिए,
मान या गुमान, अभिमान का विधान हो या;
कर्म में मनुष्यता प्रतीत होनी चाहिए,
काँच के खिलौने सी छुई मुई जिन्दगानी,
बड़ी सावधानी से व्यतीत होनी चाहिए,
और;भूल करना तो स्वभाव है
मनुष्य का
पर मूल में तो भावना पुनीत होनी चाहिए।
उक्त सब कुछ सम्भव होगा यदि हम सद् सङ्गति में होंगे।
4 – धैर्य व जोश का समागम / Patience and passion –
याद रखें हमारे दो प्रमुख शत्रु आलस्य और अधैर्य हमें चतुरता पूर्वक
गिरफ्त में ले लेते हैं और अच्छा खासा व्यक्तित्व बेचारे की श्रेणी में जा कर खड़ा
हो जाता है। होश के साथ जोश हो तो सोने पर सुहागा है। वरना यही कहोगे की वो तो
अभागा है। असल में धैर्य वह आलम्ब है जो हमको यथोचित व्यवहार सिखाता है और हम
सफलता की सीढ़ियां अपने सही निर्णय के आधार पर चढ़ते जाते हैं। याद रखें धैर्य व जोश
का समागम वह कार्य करा जाता है जिसका
अनुकरण करने को दुनिया विवेश होती है।आभार सहित लेता हूँ पँक्तियाँ जिनमें क्या खूब कहा गया है। –
है वही सूरमा इस जग में जो अपनी राह बताता है,
कोई चलता पद-चिन्हों पर, कोई
पद-चिन्ह बनाता है।
मुझे लगता है की यदि
व्यक्तित्व गढ़ना है तो पद चिन्ह बनाने की अपनी सक्षमता सिद्ध करनी ही होगी।
5 – अद्यतन जानकारी / updated information-
समय के साथ चलते हुए यदि उससे आगे निकलना है तो अपनी प्रासंगिकता
बनाए रखनी पड़ेगी। इसलिए यह परम आवश्यक है की हम अपनी जानकारी के स्तर को अद्यतन
रखें। प्रत्येक समस्या समाधान में हमारा
प्रयास समाधान की ओर ले जाने वाला होना चाहिए उलझाने और लटकाने वाला नहीं।
विचार विनिमय, प्रभावशाली विश्लेषण तभी सम्भव होगा जब उसकी
अद्यतन जानकारी हमारे पास होगी और तभी हम अपनी या अपने व्यक्तित्व की कोइ छाप छोड़
सकेंगे। त्वरित
समस्या को यदि त्वरित समाधान मिल जाए तो समस्या विकराल होने से बच जाती है और यह
त्वरित संज्ञान और निदान क्षमता पर निर्भर करती है। अतः अद्यतन जानकारी परम आवश्यक
है।
6 – सम्प्रेषण कौशल / Communication skills –
यहाँ यह समझना नितान्त आवश्यक है कि सम्प्रेषण बोलकर
और लिख कर दोनों तरीके से किया जाता है और यह प्रभावी तब होता है जब यह उस भाषा
में हो, जिस तक पहुँचाना है। जिस तरह संस्कृत निष्ठ
बाल्मीकि रामायण का जब बाबा तुलसी ने सरल भाषा में प्रस्तुतीकरण किया तो यह सहज
सम्प्रेषणीय बन गयी।
जब बुद्ध जी से पुछा गया की ज्ञान किस भाषा में सम्प्रेषित हो तब
उनका जवाब था जिस भाषा में समझ में आये।
सम्प्रेषण की कला जादू सा
प्रभाव रखती है और इसमें निपुण जादुई व्यक्तित्व वाला स्वीकार किया जाता है। इन
शब्दों और कहने के अन्दाज से बहुत बड़ी जान संख्या को प्रभावित किया जा सकता है।
शास्त्री जी, इन्दिरा जी, विनोबाजी, विवेका नन्द जी और वर्तमान में मोदीजी इसी
श्रेणी में हैं। एक ही कथा अलग अलग श्री
अलग अलग प्रभाव छोड़ती है। इसीलिये कहा जाता है सफल वक्ता सफल व्यक्तित्व।
मेरा कहना हे कि –
प्रेम और सद्भाव का झरना, तब
झर-झर बहता जाता,
यदि तथ्य निरूपण में हमको सम्प्रेषण कौशल आता।
7 – मुस्कुराहट का सम्यक प्रयोग / Use of smile –
मुस्कराहट कई प्रश्नों
का जवाब है, इससे कई चिन्ताओं को हवा में उड़ाने की ताक़त
मिलती है यदि आपके पास बच्चों सी निस्वार्थ मुस्कान है तो समझिए आप सौभाग्यशाली
हैं। मुस्कराहट इसलिए नहीं होती कि जिंदगी में खुशियाँ बहुत हैं बल्कि यह इसलिए
होती है कि जिन्दगी में हार न मानने का जज्बा अधिक है।
किसी ने क्या खूब कहा है कि –
बाँटो मुस्कुराहट इतनी कि
किसी आँख में पानी न हो।
जियो जिन्दगी जिन्दादिली से
जीत कभी बेमानी न हो।
विषम स्थिति में आपकी मुस्कुराहट आपके बहुत से गुणों की अभिव्यक्ति
करती हैं याद रखिये रोते हुए उतने समाधान नहीं मिलते जितने सहज मुस्कान के साथ
मिलते हैं। आपकी मुस्कराहट आपके व्यक्तित्व में गजब का इजाफा करती है। आपक
व्यक्तित्व खुशनुमा व्यक्तित्व कहलाता है। दूरदर्शन पर रामायण के राम और महाभारत के कृष्ण
की मुस्कराहट से आप प्रभावित तो हुए ही होंगे जब कि यह अभिनय था।
सत्य कितना प्रभावी होगा।
8 – व्यापक दृष्टिकोण अभ्युदय / Comprehensive outlook-
वह व्यक्तित्व ज्यादा प्रभावी होता है जो जितने बड़े क्षेत्र के उत्थान में
योग देता है और जो केवल अपने लिए नहीं जीता। इस संस्कृत श्लोक में कितने सहजता से
यह बात कही गयी है –
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्
उदारचरितानां तू वसुधैव कुटुम्बकम।
भारतीय दर्शन, अष्टाङ्ग योग इतनी क्षमता रखते हैं की यदि
इनका अध्ययन किया जाए तो संकीर्ण दृष्टिकोण विकसित हो ही नहीं सकता। गीताएं, वेद, पुराण इसी क्रम में आते हैं। इसीलिए यथा सम्भव
इनका अध्ययन किया जाए। लोग आपके
व्यक्तित्व के कायल हो जाएंगे।
व्यक्तित्व शब्द पुरातन काल खण्ड का एक महत्त्वपूर्ण विषयवस्तु है
अथर्ववेद में सतोगुणी, रजोगुणी,और
तमोगुणी व्यक्तित्वों के बारे में बताया है यह त्रिगुणी अवधारणा मानव चेतना की
यात्रा के अंश हैं सत्व,स्थिरता का रज सक्रियता का तथा तम जड़त्व से
सम्बद्ध है। इन्हें आगे चलकर सांख्य दर्शन ने अपनाया। श्रीमद्भगवद्गीता में
व्यक्तित्व पर सारगर्भित दिशा निर्देश है। सामान्य अर्थों में व्यक्तित्व को बाहरी
सौन्दर्य व सद्गुणों के समाविष्ट स्वरुप के रूप में देखा जाता है।
पाश्चात्य दृष्टिकोण में व्यक्तित्व आंग्ल भाषा
के Personality शब्द का समानार्थी है।यह शब्द लेटिन के परसोना (Persona)
से विकसित हुआ जिससे आशय है नकली चेहरा या
मुखौटा अर्थात उस काल में शरीर रचना, पोशाक, रंगरूप आदि वाह्यगुण व्यक्तित्व में समाहित
स्वीकार किये गए।
विभिन्न दृष्टिकोणों व मतों के कारण अलग अलग
विद्वतजनों ने इसे अलग अलग तरह से पारिभाषित किया उनमें से कुछ यहां द्रष्टव्य हैं
यथा –
Allport / आलपोर्ट महोदय के अनुसार
“Personality is the dynamic
organisation within the individual of those psychophysical systems that
determine his unique adjustment to his environment.”
“व्यक्तित्व,
व्यक्ति
में उन मनोदैहिक व्यवस्थाओं का संगठन है जो वातावरण के साथ उसका सुसमायोजन स्थापित
करता है। ”
munn,N.L
के अनुसार
“Personality may be defined as
the most characteristic integration of an individual’s structures, modes of
behaviour, interests attitudes, capacities, abilities, and aptitudes.”
“व्यक्तित्व एक व्यक्ति के गठन व्यवहार के
तरीकों, रुचियों,
दृष्टिकोणों,
क्षमताओं
और तरीकों का सबसे विशिष्ट संगठन है।”
May and
Hartshorn महोदय का मानना है कि –
“Personality
is that which makes one effective and gives influence over others.”
“व्यक्तित्व, व्यक्ति का वह स्वरुप है जो उसे प्रभावशाली
बनाता है और दूसरों को प्रभावित करता है। ”
Drever महोदय इस सम्बन्ध में कहते हैं –
“Personality
is a term used for the integrated and dynamic organization of the physical,
mental, moral, and social qualities of the individual, as that manifests itself
to other people, in the give and take social life.”
“व्यक्तित्व शब्द का प्रयोग, व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, और सामाजिक गुणों के सुसंगठित और गत्यात्मक
संगठन के लिए किया जाता है, जिसे वह अन्य व्यक्तियों के साथ अपने सामाजिक जीवन के आदान प्रदान
में व्यक्त करता है।”
व्यक्तित्व
के प्रकार / Types
of Personality –
व्यक्तित्व
के कोई निश्चित प्रकार नहीं बताये जा सकते इसीलिये विविध विद्वानों द्वारा इन्हें
अलग अलग तरह से वर्गीकृत किया गया है।सामान्यतः इन्हें निम्न तीन भागों में बाँटकर
अध्ययन करेंगे –
1 – शरीर बनावट के आधार पर (Based on body composition)
2 – समाजशास्त्रीय प्रकार (Sociological type)
3 – मनोवैज्ञानिक प्रकार (Psychological type)
1 – शरीर बनावट के आधार पर (Based on body composition)–
क्रेचमर
(Kretschmer) महोदय इन्हें चार भागों में बाँटा है जो इस
प्रकार है –
A – मिलनसार (Pyknic) – सामान्य कद काठी के मृदुभाषी व्यक्ति मित्रता, अच्छे स्वभाव और मिलनसारिता के गुण से युक्त
होते हैं ये समाज से मिलकर चलते हैं।
B – एकान्तप्रिय (Leptosome) – ये कमजोर, शर्मीले, चुप
रहने वाले, अन्तर्मुखी प्रवृत्ति के होते हैं।इन्हें
एकान्त पसन्द होता है।
C – चुस्त (Athletic) – इस प्रकार के व्यक्ति का सीना चौड़ा व उभरा, कन्धे चौड़े, मजबूत
माँसपेशियाँ, ताक़तवर भुजाएं, हृस्टपुष्ट स्वस्थ शरीर होता है। इन्हे चुस्त(Athletic) व्यक्तित्व वाला कहते हैं।
D – मिश्रित (Dysplastic) -इस तरह के व्यक्ति लम्बे, चौड़े, मोटे होते हैं और इनमें ऊपर वर्णित प्रकारों का
आंशिक सम्मिश्रण होता है।
2 – समाजशास्त्रीय प्रकार (Sociological type)-
स्प्रेंगर
/ Spranger महोदय ने अपनी पुस्तक “Types of Men” में 6 प्रकार के व्यक्तित्व बताए हैं –
1 – वैचारिक (Theoretical) – दार्शनिक, आविष्कारक, वैज्ञानिक आदि को इसमें स्थान दिया जाता
है।
2 – आर्थिक (Economic) – ऐसे व्यक्ति धन को अधिक महत्ता प्रदान करते
हैं। व्यवसायी, दुकानदार, उद्योगी
आदि इसके अन्तर्गत आते हैं।
3 – सौन्दर्यात्मक (Esthetic) – सौन्दर्य
व कला को महत्ता प्रदान करने वाले इस श्रेणी में आते हैं। यथा चित्रकार, साहित्यकार, कलाकार
आदि।
4 – धार्मिक (Religious) – ईश्वर में आस्था रखने वाले,सशक्त आध्यात्मिक पक्ष वाले लोग इसमें आते हैं
जैसे संत, पुजारी, पादरी, भक्त, मुल्ला
मौलवी इसके तहत आते हैं।
5 – सामाजिक (Social) – सामाजिक हितों व सामाजिक समस्याओं से जूझने
वाले लोग इसमें गिने जाते हैं जैसे विनोबाजी, गाँधीजी, नेल्सन मंडेला,दयानन्द सरस्वती आदि।
6 – राजनैतिक (Political) – सत्ता, नियन्त्रण, प्रभुसत्ता, राज
व्यवस्था के दावपेचों से उलझने वाला इस क्षेत्र में आता है जैसे नेता, मन्त्री, आदि।
3 – मनोवैज्ञानिक प्रकार (Psychological type)-
मनोवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर जिन विद्वानों ने व्यक्तित्व का वर्ग
विभाजन किया है उनमें C.G.JUNG को सर्वाधिक स्वीकार किया जाता है इनका पुस्तक
“Psychological
Types” दिया गया विवरण आज भी महत्ता रखता है इन्होने
व्यक्तित्त्व वर्गीकरण इस प्रकार किया है –
1 – बहिर्मुखी (Extrovert)
– ऐसा
व्यक्तित्व बहुत सामाजिक बाहरी दुनिया से मेलजोल बढ़ाने वाला व्यक्तिगत धन या
स्वास्थ्य की कम परवाह कर नई परिस्थितियों से सुसमायोजन कर लेता है। इनका
आत्मविश्वास बहुत अच्छा होता है, ये विज्ञापन, भाषण कला, प्रकाशन आदि के द्वारा दूसरों को अपने अनुकूल
बना लेते हैं यथा शास्त्रीजी, श्रीमति इन्दिरा गाँधी,
नरेन्द्र मोदी जी,
विवेकानन्द जी आदि को समझा जा सकता है।
2 – अन्तर्मुखी (Introvert)
– ये
बहुधा अपनेआप में खोये रहते हैं किताबें पढ़ना, निर्धनता में खुश रहना,
सामाजिक व्यवहार निर्वाहन में संकोची,
स्वयं के प्रगटन से परे,
शीघ्र दुःखी होने वाला,
कम लोचपूर्ण दृष्टिकोण,
संसार की परवाह न कर स्वपथ पर अग्रसर,
कम बोलने वाला, बहिर्मुखी से अधिक कार्य क्षमता वाला होता
है।
3 – उभयमुखी (Ambivert)
– ऐसे
व्यक्ति किन्ही परिस्थितियों में अन्तर्मुखी व भिन्न परिस्थिति में बहिर्मुखी
व्यक्तित्व वाले होते हैं आपने भी देखा होगा एक अच्छा लिखने वाला और बोलने वाला
एकान्त में कार्य करना पसन्द करता है।
जुंग
महोदय ने इस सिद्धान्त की आगे और व्याख्या की है जिससे यह बहुत बड़ा हो जाता है
उसने अंतर्मुखी व बहिर्मुखी को चार चार भागों में बांटा है –
1 – विचार प्रधान (Ideological)
2 – तर्क बुद्धि प्रधान (Logic minded)
3 – भाव प्रधान (Sentimental)
4 – दिव्य दृष्टि प्रधान (Celestial vision)
इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्तित्व को
कई प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है। क्रो व क्रो ने विभिन्न दृष्टिकोणों की आलोचना हुए कहा –
“A general criticism of such
classifications is the tendency to place emphasis upon one or another phase of
development and to deal with extremes rather than with the mediocrity of human
nature.”
“इस
प्रकार के वर्गीकरणों की एक सामान्य आलोचना यह है कि यह विकास के किसी न किसी पहलू
पर बल देते हैं और सामान्य मानव स्वभाव की अपेक्षा उसके उग्र रूपों की व्याख्या
करते हैं।”
व्यक्तित्व
विशेषक / Traits
of Personality –
व्यक्तित्व
का निर्धारण उसकी विशेषता या गुणों के आधार पर होता है। गैरट महोदय कहते
हैं –
“Personality
traits are distinctive ways of behaving more or less permanent for a given
individual. Personality traits are neat short ways of describing the multifold
aspects of behaviour.”
“व्यक्तित्व के गुण व्यवहार करने की निश्चित
विधियाँ हैं जो प्रत्येक व्यक्ति में बहुत कुछ स्थाई होती हैं। व्यक्तित्व के गुण, व्यवहार के बहुसंख्यक स्वरूपों का वर्णन करने की
स्पष्ट और संक्षिप्त विधियां हैं।”
व्यक्तित्व
के अंगों को हम दो भागों में विभक्त कर विशेषता बता सकते हैं –
1 – प्रत्यक्ष – शारीरिक विशेषक
2 – अप्रत्यक्ष (क्रिया आधारित) – बौद्धिक, सामाजिक, संवेगात्मक,चारित्रिक व अन्य विशेषक।
उक्त
विशेषक भी अपने आप में बहुत से गुण रखते हैं जिन्हे इस प्रकार विवेचित कर सकते
हैं।
A – शारीरिक विशेषक (Physical Traits) B – बौद्धिक विशेषक (Intellectual Traits)
सामाजिक विशेषक (Social Traits)
संवेगात्मक विशेषक (Emotional Traits)
चारित्रिक विशेषक (Character Traits)
अन्य
विशेषक (Other
Traits)
व्यक्तित्व
के सिद्धान्त / Theories
of Personality –
मनोवैज्ञानिकों
हेतु यह परमावश्यक हो गया कि व्यक्तित्व का अध्ययन किया जाए लेकिन सच्चाई यह है कि
एक नहीं बहुत से कारक हैं जो व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं विविध वैयक्तिक
धारणाओं के आधार पर विविध सिद्धांतों का उदय हुआ है उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण
सिद्धांत देने का यहां प्रयास है –
मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त – यह मत सिग्मण्ड
फ्रायड की देन है फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व का निर्माण इड (Id),
इगो (Ego),
सुपर इगो (Supar
Ego) से हुआ है।
इड (Id) अचेतन मन है इसमें मूल
प्रवृत्तियों व प्राकृतिक इच्छाओं का निवास है ये शीघ्र संतुष्ट होना चाहती हैं
तृप्ति चाहती हैं।
इगो (Ego) चेतना बुद्धि, तर्क तथा इच्छा शक्ति
है।
सुपर इगो (Supar Ego) इसका निर्माण आदर्शों
से होता है।
Sigmund Freud ने ईगो के बारे में कहा –
“Ego is the part of Id which has been
modified by its proximity to the external world and the influence the later has
on it and which serves the purpose of receiving stimuli and projecting the
organism from them ,like the cortical layer with which a particle of living
subustance surrounds itself.”
“इगो, इड का वह भाग है जो
वाह्य संसार के अनुमान और संभावना से परिष्कृत होता है और उसका कालान्तर में
प्रभाव भी पड़ता है, जो प्राणी को उद्दीपन
करने एवं उसके इर्द गिर्द जमी परत के अंश के रूप में व्याप्त रहता है।”
Sigmund Freud ने सुपर ईगो के बारे में कहा –
“Super Ego that expect of the ego which
makes possible the processes of self observation and what is commonly called
conscience.”
“सुपर ईगो, ईगो का वह पक्ष है जो
आत्म निरीक्षण की प्रक्रिया को सम्भव बनाता है जिसे सामान्य रूप से चेतना कहते
हैं। ”
Sigmund Freud महोदय का मानना है कि
मानव के व्यक्तित्व का निर्माण इन्हीं तत्वों से मिलकर होता है जो विभिन्न रूप में
परिलक्षित होते हैं।
रचना (Constitution) सिद्धान्त –
इस विचार धारा के प्रतिपादक शैलडॉन / SHELDON महोदय हैं इन्होने
व्यक्तित्व के प्राथमिक आधारों की संख्या तीन बताई है –
1 – गोलाकृति (Endomorphy) –
इस तरह के लोगों का
व्यक्तित्व अलग तरह से परिलक्षित होता है इस व्यक्तित्व के मनुष्य गोल गर्दन, माँस पेशियों का पूर्ण
विकसित न होना, चर्बी की वृद्धि आदि गुणों से युक्त होते
हैं।
2 – आयताकृति (Mesomorphy) –
इस तरह के व्यक्तित्व
में मुख्यतः माँस पेशियों व हड्डियों का विकास परिलक्षित होता है।
3 – लम्बाकृति (Ectomorphy) –
इस तरह के
व्यक्तित्वों में केंद्रीय स्नायु संस्थान के माँस पेशी तन्तु विकसित होते हैं।
इस मत के
अनुसार मूलतः यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि इसमें शरीर के विभिन्न अंगों को
व्यक्तित्व निर्माण का आधार माना जाता है।
प्रतिकारक (Factorial) प्रणाली सिद्धान्त –
इस मत का प्रतिपादन आर ० बी ० कैटल (R.
B. Cattell) महोदय द्वारा किया गया। इन्होने बताया मानव
चरित्र अनेक कारकों से युक्त होता है इनके अनुसार निम्न तथ्य प्रतिकारक चरित्र का
निर्माण करते हैं –
चरित्र की सुन्दरता (Fitness of
Character)
सामाजिकता (Sociability)
भावात्मक एकता (Emotional
Integration)
कल्पनाशीलता (Imagination)
अभिप्रेरक (Motivator)
उत्सुकता (curiosity)
लापरवाही (Negligence)
उक्त आधारों पर कैटल महोदय ने कहा –
“Personality is, that permits a prediction
of what a person will do in a given situation.”
“व्यक्तित्व वह है जो
किसी विशेष परिस्थिति में जो कार्य करता है उसका प्रतिरूप ही व्यक्तित्व है। ”
ऑलपोर्ट (Allport) का सिद्धान्त –
व्यक्तित्व के सम्बन्ध में गोर्डन डब्ल्यू
ऑलपोर्ट (Gordon W. Allport) का सिद्धान्त वंशक्रम
वातावरण वैयक्तिक भेद पर अवलम्बित है इन्होने वंशक्रम के द्वारा निर्धारित
व्यक्तित्व के जटिल मिश्रण के प्रति न्याय करने ,सामाजिक,स्वाभाविक तथा
मनोवैज्ञानिक कारणों के प्रति न्याय करने को कहा है। तथा साथ में विभिन्न
सम्प्रदायों तथा व्यक्तित्वों की नवीनता को भी मान्यता देनी चाही है। इन्होने
स्पष्टतः स्वीकार किया की प्रवृत्तियों,विशेषताओं तथा वातावरण
के प्रति समायोजन से व्यक्तित्व का गठन होता है।
उक्त सिद्धांतों के
अतिरिक्त भी विविध सिद्धांत भी अपनी धमक रखते हैं। व्यक्तित्व के सिद्धान्तों में विविध
दृष्टिकोणों का समावेशन करने पर इसका विशेष वृहत प्रखण्ड प्रस्तुत किया जा सकता है
लेकिन इसे यहीं विराम दिया गया है।
अभिप्रेरणा
से आशय व परिभाषाएं (Meaning and definitions of motivation)-
अभिप्रेरणा जीव की वह आन्तरिक स्थिति है जो उसमें क्रियाशीलता
उत्पन्न करती है और अपनी उपस्थिति तक चलाती रहती है। यह वह जादू है जो मानव को
उसकी शक्तियों से साक्षात्कार कराता है यदि इसकी दिशा ठीक है तो यह एक ऐसा उपागम
है जो लक्ष्य की प्राप्ति सुगम कर देता है। अर्थात यह सीधे सीधे हमारे व्यवहार को
प्रभावित करता है। वुडवर्थ महोदय कहते हैं –
“A
motive is a state of the individual which disposes him for certain behaviour
and for seeking certain goals.”
“अभिप्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह समूह है जो
किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ती के लिए निश्चित व्यवहार को स्पष्ट करती है।”
जब
कि जॉनसन (Johnson)
महोदय का विचार
है कि –
“Motivation
is the influence of general pattern of activities indicating and directing the
behaviour of the organism.”
“अभिप्रेरण सामान्य क्रियाकलापों का प्रभाव है
जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती है।”
गुड
महोदय का
अभिप्रेरणा के विषय में मत है –
“Motivation
is the process of arousing, sustaining and regulating an activity.” – Good
“अभिप्रेरणा किसी कार्य को प्रारम्भ करने, जारी रखने तथा सही दिशा में लगाने की प्रक्रिया
है।”
मैग्डूगल
(McDougall) महोदय का विचार है कि –
“Motives
are conditions physiological and psychological within the organism that
disposes it to act in certain ways.”
“अभिप्रेरणा वह शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दशाएं
हैं जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।”
एक
अन्य महत्त्व पूर्ण विचारक पी. टी. यंग
महोदय का विचार है –
“Motivation
is the process of arousing action sustaining the activities in progress and
regulating the pattern of activity.”
“प्रेरणा व्यवहार को जागृत करके क्रिया के विकास
का पोषण करने तथा उसकी विधियों को नियमित करने की प्रक्रिया है।”
उक्त
विचारकों के विचारों के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि अभिप्रेरणा या
प्रेरणा आवश्यकता से उत्पन्न मनोव्यावहारिक क्रिया है जो लक्ष्य प्राप्ति की दिशा
में कार्यों का सम्पादन कराती है।
अभिप्रेरणा के सिद्धान्त / Principles of motivation –
अभिप्रेरणा हेतु बहुत से सिद्धान्त व मान्यताएं विविध मनोवैज्ञानिकों
द्वारा बताये गए हैं इन सिद्धान्तों द्वारा विविध प्रकार से अभिप्रेरणा की
व्याख्या की गयी है। जिन्हें अपनी सुविधा के अनुसार इस प्रकार अनुक्रमित किया जा
सकता है –
1 – शारीरिक सिद्धान्त / Physiological Theory
–
शरीर की मनोदशा हमेशा एक जैसी नहीं होती इसमें समय समय पर विविध
परिवर्तन परिलक्षित होते हैं और इसी कारण शरीर में प्रतिक्रियाएं भी होती रहती हैं
और इस प्रतिक्रिया के मूल को यदि हम जानने का प्रयास करें तो वह अभिप्रेरणा ही है।
उद्दीपन अनुक्रिया सिद्धान्त वह सिद्धान्त है जो व्यवहारवादियों
द्वारा प्रति पादित किया गया है यह सीखने के सिद्धांत पर ही आधारित है इनके अनुसार
मनुष्य का सम्पूर्ण व्यवहार शरीर द्वारा उद्दीपन के परिणाम स्वरुप होने वाली
अनुक्रिया है ये मानते हैं की अभिप्रेरणा की इसमें भूमिका नहीं है कोई भी
प्रतिक्रिया विशुद्ध रूप से विशिष्ट अनुक्रिया ही है।
इस मान्यता में विविध तथ्यों व अनुभव की अवहेलना की गयी है यद्यपि
उद्दीपकों द्वारा विविध अनुक्रियाएं होती हैं लेकिन किसी प्रतिक्रिया के होने में
मूलतः अभिप्रेरणा का हाथ होता है।
3 – मूल प्रवृत्यात्मक सिद्धान्त / Instinct Theory –
इस सिद्धान्त के अनुसार किसी
भी मानव का व्यवहार जन्मजात मूल प्रवृत्तियों द्वारा निर्धारित व संचालित होता है
इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मैक्डूगल महोदय द्वारा किया गया लेकिन यह सिद्धान्त
अभिप्रेरणा की पूर्ण व्याख्या करने में
सक्षम नहीं है ।
4 – मनो – विश्लेष्णात्मक सिद्धान्त / Psycho-analysis Theory –
यह सिद्धान्त मनोवैज्ञानिक फ्रायड की देन
स्वीकारा जाता है यह सिद्धान्त बताता है कि मनुष्य का अभिप्रेरणात्मक व्यवहार दो
कारकों द्वारा संचालित होता है . जिनमें से एक तो मूल प्रवृत्तियाँ ही हैं और
दूसरा है अवचेतन मन। वह यह भी मानता है कि
दो ही मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं जीवन मूल प्रवृत्ति और दूसरी मृत्यु मूल
प्रवृत्ति जो उसे क्रमशः सृजनात्मक व
विध्वंशात्मक व्यवहार हेतु प्रेरित करते हैं। मूल प्रवृत्ति सम्बन्धी यह विचार
मनोवैज्ञानिकों को मान्य ही नहीं और दूसरे अवचेतन मन के अलावा चेतन मन और
अर्ध चेतन मन के द्वारा भी व्यवहार संचालित होता है अतः फ्रायड महोदय भी पूर्ण
स्वीकार्य नहीं।
5-
अन्तर्नोद
सिद्धान्त / Drive
Theory –
यह सिद्धान्त प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक हल महोदय
की देन है इन्होने यह बताया कि मनुष्य की आवश्यकताओं के कारण उसमें तनाव पैदा होता
हे जिसे मनोविज्ञान की भाषा में अन्तर्नोद उच्चारित करते हैं ये अन्तर्नोद ही उसके
विशिष्ट व्यवहार का कारण है कुछ समय पश्चात मनोवैज्ञानिकों ने शारीरिक आवशयकताओं
के साथ मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को भी जोड़ लिया लेकिन फिर भी यह सिद्धान्त अपूर्ण
ही रहा क्योंकि यह मानव के उच्च ज्ञानात्मक व्यवहार की व्याख्या में सक्षम नहीं बन
सका।
6
– इच्छा
आधारित सिद्धान्त / Desire based theory –
इस मत के अनुसार मानव का व्यवहार इच्छा will
द्वारा निर्धारित होता है बौद्धिक मूल्यांकन
द्वारा सृजित इच्छा द्वारा अभिप्रेरणा को दिशा मिलाती है और संकल्प को बल मिलता है
लेकिन संवेग/Emotions व प्रतिवर्त/Reflexis तो इच्छा से अभिप्रेरित नहीं होते।
7 – कुर्ट लेविन सिद्धान्त / Kurt
Levin Theory –
यह सिद्धान्त एक महत्त्वपूर्ण अधिगम सिद्धान्त है जो यह मानता है कि
सीखने में अभिप्रेरणा महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है यह सिद्धान्त संयोग,
स्मृति, गतिशील प्रक्रिया,
व्याख्या, भग्नाशा, आकांक्षा स्तर सभी को समाहित करता है जो मूलतः
साक्षी पृष्ठभूमि पर आधारित है।
उक्त
विवेचन यह स्पष्ट करता है कि अभिप्रेरणा किसी एक कारक से निर्धारित नहीं होती
इसीलिये बॉल्स / Bolles
तथा फौफ्मैन
/ Pfaffman का पर्यावरण आधारित प्रोत्साहन सिद्धान्त व मैसलो/ Maslow का मांग सिद्धान्त भी अभिप्रेरणा के अपूर्ण
सिद्धान्त की श्रेणी में ही आते हैं।
अभिप्रेरणा के प्रकार / Types of motivation –
वास्तव में अभिप्रेरणा दो प्रकार की होती है
जिन्हे हम आन्तरिक अभिप्रेरणा व वाह्य अभिप्रेरणा में वर्गीकृत कर सकते हैं।
[A] – आन्तरिक अभिप्रेरणा / Internal Motivation –
इस प्रेरणा को धनात्मक, सकारात्मक, जन्मजात
प्राकृतिक, प्राथमिक अभिप्रेरणा के नाम से भी जाना जाता
है। आन्तरिक अभिप्रेरणा उसे कहा जाता है जो आन्तरिक अभिप्रेरकों / Internal Motives अर्थात भूख, प्यास, आत्म रक्षा, काम, आदि के कारण उत्पन्न होते हैं।इसमें मानव स्वयं
प्रेरित होकर अपनी इच्छा से कार्य करता है।
[B] – वाह्य अभिप्रेरणा / External Motivation –
इसे ऋणात्मक, कृत्रिम, सामाजिक, द्वित्तीयक
अर्जित, अभिप्रेरणा के नाम से भी जाना जाता है। वाह्य
अभिप्रेरणा उसे कहा जाता है जो वाह्य अभिप्रेरकों / External Motives अर्थात बाहरी स्थितियों आत्म सम्मान, उच्च सामाजिक स्थान, डॉक्टर, नेता, न्यायाधीश आदि बनने की इच्छा के कारण उत्पन्न
होते हैं। निन्दा, प्रशंसा, आलोचना, प्रतियोगिता, पुरस्कार आदि वाह्य अभिप्रेरक हैं।
अभिप्रेरणा के प्रकारों को बताने के लिए तरह तरह के वर्गीकरण प्रस्तुत किये जाते हैं
लेकिन यदि हम उनका निष्पक्ष विश्लेषण करें तो उक्त दो ही प्रकार के तहत ही उन्हें
रखा जा सकता है। एक और तथ्य विश्लेषण
योग्य है की अभिप्रेरणा हेतु प्रेरक आंतरिक हो या वाह्य उसका वास्तविक स्वरुप तो
आन्तरिक ही होता है उसे ऊर्जा तो आन्तरिक
शक्ति से अभिप्रेरण के रूप में मिलती है जो लक्ष्य प्राप्ति तक उसको उत्साहित रखती
है।
अधिगम में प्रेरणा की भूमिका / Role
of motivation in learning –
अधिगम में अभिप्रेरणा की भूमिका निर्विवाद है
यह वह शक्ति है जो सीखने की गति को तीव्र कर देती है प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक वुड
वर्थ महोदय ने कहा –
उक्त समीकरण चीख चीख कर कह रहा है कि योग्यता
के साथ प्रेरणा होने पर ‘सोने पर सुहागा’ वाली कहावत चरितार्थ होती है।
वास्तव में प्रेरणा अध्यापक के हाथ में ऐसा
महत्त्वपूर्ण उपागम है जिससे देश का भविष्य, हमारे विद्यार्थियों का कल सँवारा जा सकता है
उनकी अन्तर्निहित क्षमता को उत्कृष्ट रूप से उभारा जा सकता है। राष्ट्र को समर्पित
सेवा भावी युवा तैयार किये जा सकते हैं। शैक्षिक उत्कृष्टता के प्रदत्त सोपान तय
किये जा सकते हैं अधिगम क्षेत्र में नए प्रतिमान गढ़े जा सकते हैं। तत्सम्बन्धी कुछ
बिन्दु इस प्रकार दिए जा सकते हैं –
01- उत्सुकता जागृति
02- ऊर्जा व्यवस्थापन
03- ध्यान संकेन्द्रण
04- अनवरतता
05- रूचि परिमार्जन
06- स्वस्थ आदतें
07- निर्णयन क्षमता
08- अधिगम इच्छा
09- आवश्यकता पूर्ति
सक्षमता
10- सम्यक मार्ग दर्शन
11 – सम्यक साधन चयन
12 – आशावादी भविष्य
विकास यात्रा में
अभिप्रेरणा ऐसा शक्तिशाली साधन है जो हमारे सपने, हमारे अभीप्सित, हमारे लक्ष्य हमें
दिला सकता है। एण्डरसन/Anderson महोदय ने उचित ही कहा है। –
“Learning
will proceed best if motivated.”
“सीखने की प्रक्रिया
सर्वोत्तम रूप से आगे बढ़ेगी यदि वह अभिप्रेरित होगी।”
अभिप्रेरणा कुशल अध्यापक के हाथ में शिक्षा
जगत का अमूल्य वरदान है स्किनर/Skinner महोदय तो अभिप्रेरणा को
सीखने का राज मार्ग बताते हैंउन्होंने कहा –