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शोध

Review of related literature

January 16, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सम्बन्धित साहित्य का पुनः अवलोकन

व्यावहारिक रूप से यह समस्त तत्सम्बन्धी शोध विषय को ज्ञानात्मक धरातल उपलब्ध कराता है मानव के पास विश्लेषणात्मक बुद्धि है जहाँ वह अपने चिन्तन मन्थन को तर्क सङ्गत समझता है वहीं दूसरे विद्वान जो उस विषय पर पहले कार्य कर चुके होते हैं उसके लिए प्रकाश स्तम्भ का कार्य करते हैं। तत्सम्बन्धी ज्ञान सङ्कलन, हस्तान्तरण और सम्वर्धन में शोध की महती भूमिका होती है।

* * सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय व परिभाषा / Meaning and definition of the study of related literature –

शोधार्थी को वैचारिक आधार पूर्व के शोध अध्ययन व तत्सम्बन्धी साहित्य से मिलता है असल में हर बार कार्य प्रारम्भ से शुरू अधिक समय लेगा इसलिए पूर्व शोध जो नींव तैयार करते हैं नई इमारत उस पर मजबूती से खड़ी होती है पूर्व शोध कार्यों का लाभ उठाते हुए उनके निष्कर्ष, उनके अनुभव, उनका विश्लेषण  नए शोधार्थियों को काफी कुछ सचेत कर देता है। सम्बंधित साहित्य का अध्ययन एक आवश्यक व वैज्ञानिक चिन्तन का परिणामी चरण है।

सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय उस साहित्य से है जो विषयानुकूल है और जिसके प्रदत्त प्रस्तुत शोध में सहायक हो सकते हैं यह कलेवर नवीन शोध हेतु  दिशा बोधक का कार्य करता है और पलायनवादी सोच विकसित होने से पूर्व व्यावहारिक धरातल प्रदान करता है। इस समस्त ज्ञान को शोधार्थी अपने प्राप्त कलेवर में जोड़ता है और विकास के नए अग्रिम सोपान तय करता है।इस सम्बन्ध में जॉन डब्लू बेस्ट का मानना है कि –

“व्यावहारिक रूप में सम्पूर्ण ज्ञान पुस्तकों और पुस्तकालयों में मिल सकता है। अन्य प्राणियों से भिन्न मानव को अतीत से प्राप्त ज्ञान को प्रत्येक पीढ़ी के साथ नए ज्ञान के विस्तृत भण्डार के  रूप में प्रारम्भ करना चाहिए।ज्ञान के विस्तृत भण्डार के  रूप में उसका निरन्तर योगदान प्रत्येक क्षेत्र में मानव द्वारा किये गए प्रयासों की सफलता को सम्भव बनाता है।”

आँग्ल अनुवाद

“Practically all knowledge can be found in books and libraries. Humans, unlike other creatures, must build on past knowledge to create a new storehouse of knowledge with each generation. Its continuous contribution as a vast repository of knowledge makes possible the success of human endeavors in every field.”

इसी सम्बन्ध में बोर्ग महोदय का मानना है कि

“किसी भी क्षेत्र का साहित्य उसकी नींव को बनाता है, जिसके ऊपर भविष्य का कार्य किया जाता है। यदि हम साहित्य का पुनर्निरीक्षण द्वारा प्रदान किये गए ज्ञान की नींव बनाने में असमर्थ होते हैं तो हमारा कार्य सम्भवतः तुच्छ और प्रायः उस कार्य की नक़ल मात्र ही होती है जोकि पहले ही किसी के द्वारा किया जा चुका है।”

आँग्ल अनुवाद

 “The literature of any field forms the foundation upon which future work is built. If we fail to build on the foundation of knowledge provided by reviewing the literature, our work is likely to be trivial and often merely a copy of what has already been done by someone else.”

* * सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन की आवश्यकता क्यों ? / Why is there a need to review the related literature?

01 – अग्रिम योजना निर्धारण

02 – मात्रात्मक व गुणात्मक विश्लेषण

03 – तत्सम्बन्धी ज्ञान के विविध ज्ञान से जुड़ने हेतु

04 – पूर्वाग्रहों से मुक्ति हेतु

05 – परिकल्पना बनाने हेतु

06 – उद्देश्य निर्धारण हेतु

07 – परिणामों व निष्कर्षों के सम्यक विवेचन हेतु

* * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का महत्त्व –

वास्तव में शोध कार्य समाज के उत्थान में व्यक्ति या शोधार्थी का सहयोग है। उसे जब यह पता होता है कि इस क्षेत्र में इतना कार्य हो चुका है तब वह उसका आधार से आगे अपने कार्य को अंजाम देगा अन्यथा पुनरावृत्ति की संभावना रहेगी।इसके महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है।–

01 – अनुसन्धान सम्बन्धी ज्ञान सम्वर्धन

02 – दिशात्मक बोध हेतु

03 – परिकल्पना निर्माण हेतु

04 – उद्देश्य निर्धारण व स्पष्टीकरण

05 – दोहराव से बचाव

06 – उपकरण चयन

07 – शोध सामग्री एकत्रीकरण हेतु

08 – विधि निर्धारण में

09 – आत्म निरीक्षण व परिमार्जन

10 – शोध परिणाम विश्लेषण

11 – सुझावों के समृद्धीकरण में

 * * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का उद्देश्य / The purpose of re-observation in research work –

शोध कार्य में गम्भीरता व दिशात्मक बोध जागरण और अधिक प्रभावी हो जाता है जब शोधार्थी उद्देश्य के सम्बन्ध में क्रिस्टल क्लियर होता है। किसी भी अनुसंधान के पुनः अवलोकन के पीछे निम्न उद्देश्य कहे जा सकते हैं। –

01 – व्याख्या, सिद्धान्त, परिकल्पना प्रदत्तीकरण 

02 – यथार्थ अवलम्बन

03 – परिकल्पना निर्धारण

04 – सम्यक विधियों व तथ्य सङ्कलन में सहायक

05 – सांख्यिकीय विश्लेषण निर्धारण

06 – तुलनात्मक विवेचन

07 – निष्कर्ष विवेचन              

08 – सकारात्मक चिन्तन व धैर्य सम्वर्धन

09 – सीमाएं, सुधार व अंर्तदृष्टि विकास

10 – समस्या का समुचित समाधान

* * सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन स्रोत / Review sources of related literature –

01 – पत्र पत्रिकाएं

02 – तत्सम्बन्धी पुस्तकें

03 – पाठ्य सामग्री

04 – मासिक, त्रैमासिक, अर्ध वार्षिक, वार्षिक शोध समीक्षाएं 

05 – विश्वकोश

06 – लघु शोध व शोध ग्रन्थ

07 – विशिष्ट शब्द कोष

08 – शोध ग्रन्थ सूचियां

09 – तत्सम्बन्धी वेव साइट

10 – दैनिक समाचार पत्र के विशिष्ट कॉलम

11 –  शोध अध्ययन संक्षिप्तीकरण  

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शोध

ज्ञान मीमांसा  [EPISTEMOLOGY]

January 2, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ज्ञान से आशय /Meaning of knowledge-ज्ञान (Knowledge) से आशय है किसी विषय या तथ्य का बोध या सत्य जानकारी होना, जो शिक्षा, अनुभव या सूझ से प्राप्त होता है।

ज्ञान की विविध परिभाषाएँ / Various definitions of knowledge –   ज्ञान शब्द संस्कृत की ‘ज्ञा’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘जानना’ या ‘पहचानना’ है।

प्लेटो महोदय के अनुसार

“विचारों की दिव्य व्यवस्था और आत्मा-परमात्मा के स्वरूप को जानना ज्ञान है।“

“Knowing the divine system of thoughts and the nature of the soul and God is knowledge.”

अल्बर्ट आइंस्टीन महोदय के अनुसार –

 “अनुभव ही ज्ञान है, बाकी सब सिर्फ जानकारी है।”

“Experience is knowledge, everything else is just information.”

मगध विश्व विद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की  विद्वान प्राचार्य के मत में  –

“नॉलेज और ज्ञान के दार्शनिक विवेचन में सर्वाधिक प्रमुख भेद यही है कि नॉलेज सिर्फ सत्य होता है जबकि ज्ञान सत्य और असत्य दोनों ही रूपों में पाया जाना संभव है।”

“The most important difference in the philosophical discussion of knowledge and wisdom is that knowledge is only true whereas wisdom can be found in both true and false forms.”

उक्त सम्पूर्ण परिभाषाओं के अध्ययन से स्पष्ट है कि यदि ज्ञान को सामान्य अर्थों में लिया जाए तो इसे आंग्ल भाषा में सामान्यतः knowledge कहा जाता है जिसका अर्थ जानना, सीखना, अनुभव लेना, कुशल होना या सत्यता के प्रमाणित होने से है।

ज्ञान मीमांसा से आशय / Meaning of Epistemology –

            अंग्रेजी भाषा का शब्द Epistemology ग्रीक भाषा के दो शब्दों ‘Episteme’ और Logos शब्द से मिलकर बना है। जिनका अर्थ क्रमशः ज्ञान और विज्ञान है। दूसरे शब्दों में एपिस्टेमोलोजी से आशय है ज्ञान का सिद्धान्त जिसे दर्शन की भाषा में ज्ञान मीमांसा कहा जाता है। ज्ञान मीमांसा में मुख्यतः तीन प्रश्न शामिल हैं –

01 – ज्ञान – उद्गम (स्रोत ) व वास्तविक ज्ञान

02 – ज्ञान का स्वरुप – आभास बनाम सत्य

03 – ज्ञान – प्रामाणिक विश्वसनीयता  व वैधता

ज्ञान का क्षेत्र व्यापक है इसे असीम कहना भी तार्किक होगा इसमें ज्ञान स्थापन, विश्लेषण, संश्लेषण सभी शामिल है जो आगमन, निगमन, सूक्ष्म तार्किक विवेचन व ज्ञान की सत्यता की कसौटी पर आधारित समस्याएं को शामिल करता है। उक्त समस्त परिक्षेत्रों के प्रश्नों का विवेचन ज्ञान की जिस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है  वह ज्ञान मीमांसा के नाम से जानी जाती है।

ज्ञान मीमांसा के सिद्धान्त / Principles of Epistemology –

किसी भी तथ्य, तर्क, सिद्धान्त को सत्यता की कसौटी पर कसने के क्रम में ज्ञान मीमांसा हेतु बहुत से सिद्धांत प्रचलित हैं उनमें से कतिपय प्रमुख सिद्धांतों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।

01 – संशय वाद / Scepticism –  संशयवाद इस या उस ज्ञान को संशय की दृष्टि से नहीं देखता बल्कि यह किस्से भी प्रकार की ज्ञान प्राप्ति की संभावना के दावे को ही खारिज कर देता है। टी एच हक्सले महोदय का विचार है कि –

“किसी भी व्यक्ति के लिए यह कहना अनुचित है कि वह किसी भी तर्क वाक्य के वस्तुगत सत्य के बारे में निश्चित है। संशयवादी पूर्ण स्वीकार एवं पूर्ण नकार के मध्य स्थित हैं। “

“It is unreasonable for anyone to say that he is certain of the objective truth of any proposition. The skeptic stands between absolute acceptance and absolute denial.”

02 – अनुभव वाद / Empiricism –

 यह वह ज्ञान शास्त्रीय सिद्धांत है जो ज्ञान का एक मात्र साधन इन्द्रियानुभूत ज्ञान को स्वीककार करता है। इसके समर्थन में जॉन लॉक महोदय कहते हैं कि –

“ऐसी कोई भी चीज़ हमारी बुद्धि में नहीं होती, जो पहले अनुभव में नहीं होती।”

“There is nothing in our intellect, which was not previously in our senses.”

03 – बुद्धिवाद / Rationalism – सामान्यतः हम स्वीकार करते हैं कि ज्ञान, बुद्धि व अनुभव दोनों की उपज है लेकिन बुद्धिवाद वह सिद्धांत है जो ज्ञान का साधन, उद्गम, स्रोत केवल बुद्धि को ही स्वीकार करते हैं बुद्धिवादियों के अनुसार –

 “सिर्फ विश्लेषणात्मक (Analytic) तथा प्रागनुभविक (Apriori) ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है और ऐसे ज्ञान का स्रोत है बुद्धि।”

“Only analytical and apriori knowledge is real knowledge and the source of such knowledge is intellect.

04 – प्रत्यय वाद/ Idealism

05 – यथार्थ वाद / Realism

06 – व्यवहार वाद / Pragmatism

ज्ञान मीमांसा की प्रकृति एवं क्षेत्र / Nature and Scope of Epistemology –

जब हम मीमांसात्मक विवेचन ज्ञान के आधार पर अनुभव, प्रमाण, बुद्धि, सत्य, व विश्वास का सम्बल लेकर करते हैं तो यह विवेचन ज्ञान मीमांसात्मक विवेचन कहलाता है। यह दर्शन शास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रही है। ज्ञान विश्वास का आधार लेकर चलता है सत्य की प्राप्ति हेतु प्रमाणों को लेकर सम्यक विवेचन करता है यही ज्ञान मीमांसा की मूल प्रकृति है। ज्ञान मीमांसा का क्षेत्र संकुचित न होकर अत्यन्त व्यापक है। जब तथ्यों, विचारों, सिद्धान्तों को ज्ञान की तार्किक कसौटी पर कसने का प्रयास प्रारम्भ होता है इसके व्यापक परिक्षेत्र के दर्शन प्रारम्भ हो जाते हैं। 

ज्ञान के स्रोत (Sources of Knowledge) –

ज्ञान मीमांसात्मक विवेचन में ज्ञान के प्रमुख स्रोत मुख्यतः निम्न हैं –

01 – इन्द्रियानुभव [Sense experience]

02 – तर्क बुद्धि [Reason]

03 – आप्त वचन [Authority]

04 – अन्तः प्रज्ञा [Intuition]

ज्ञान मीमांसा की प्रमुख अवधारणाएं / Key concepts of epistemology –

01 – प्रागनुभाविक तथा अनुभवाश्रित [A Priory and a Posteriori]

02 – विश्लेषणात्मक तथा संश्लेषणात्मक [Analytic and Synthetic]

03 – साक्षात ज्ञान तथा विवरण ज्ञान [Knowledge by Acquaintance and knowledge by Description]

        (i) ज्ञाता / Knower

        (ii) ज्ञेय / knowable

        (iii) ज्ञान / knowledge

ज्ञान मीमांसा एवं शिक्षा / Epistemology and Education

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Uncategorized•शोध

INTERVIEW

December 27, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

साक्षात्कार

जब आमने सामने बैठकर निरीक्षण और पृच्छा के आधार पर जानकारी प्राप्त की जाती है इस जानकारी के आधार पर मूल्याङ्कन व परिणामों का विश्लेषण किया जाता है इस प्राविधि को साक्षात्कार कहा जाता है।

साक्षात्कार से आशय / Meaning of Interview – साक्षात्कार वह व्यक्तिनिष्ठ व आत्मनिष्ठ विधि है जिससे उद्देश्य केन्द्रित प्रश्नों के आधार पर योग्यताओं, गुणों, समस्याओं आदि के बारे में जानकारी एकत्रित की जाती है। विविध समस्याओं का यथार्थ अधिगम उपयुक्त निर्देशन हेतु साक्षात्कार महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करता है। साक्षात्कार के आशय को स्पष्ट करते हुए गुड व हॉट महोदय ने कहा –

“किसी उद्देश्य हेतु किया गहन वार्तालाप ही साक्षात्कार है।”

अंग्रेजी अनुवाद –

“An interview is an in-depth conversation with a purpose.”

इस सम्बन्ध मेंP.V.Yong ये  के विचार भी मनन करने योग्य हैं –

“साक्षात्कार को एक क्रम बद्ध प्रणाली माना जा सकता है , जिसके द्वारा एक व्यक्ति, दूसरे के आन्तरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप से प्रवेश करता है, जो उसके लिए सामान्यतः तुलनात्मक रूप से अपरिचित है।”

अंग्रेजी अनुवाद –

“Interview may be regarded as a systematic method by which one person enters, more or less imaginatively, into the inner life of another, who is generally comparatively unknown to him.”

एक अन्य प्रसिद्द विद्वान् जॉन डब्लू बेस्ट (John W. Best ने अपने विचार अत्यन्त सरल शब्दों में प्रगटित किये –

“साक्षात्कार एक प्रकार से एक मौखिक प्रश्नावली है। इसके अन्तर्गत उत्तर लिखने के स्थान पर आमने सामने की स्थिति में विषयी मौखिक उत्तर देता है।”

“The interview, is in a sense, an oral type of questionnaire. Instead of writing the response, the subject or interviewee gives the needed information verbally in a face to face relationship.”

उक्त परिभाषाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि शैक्षिक व मनोवैज्ञानिक स्तर संपन्न की गई वह प्रक्रिया साक्षात्कार कहलाती है जो दो व्यक्तियों को निकट लाती है और उनके सम्बन्ध में हमारे ज्ञान में वृद्धि करती है। यह तथ्यों की प्रमाणिकता सिद्ध करने में मदद करती है।

साक्षात्कार के प्रकार / Types of Interview – साक्षात्कार के प्रकार को अच्छी तरह अध्ययन करने हेतु इसे वर्गीकृत कर एक एक का स्पष्टीकरण आवश्यक है इसे मोटे तौर पर इस तरह अभिव्यक्त कियता जा सकता है।

[A] – कार्य के अनुसार [According to functions]

I – निदानात्मक साक्षात्कार (Diagnostic Interview)

II – उपचारात्मक साक्षात्कार (Treatment Based Interview)

III – अनुसन्धान साक्षात्कार (Research Interview)

[B] – भाग लेने वालों के अनुसार (According to Participants) –

I – व्यक्तिगत साक्षात्कार (Individual Interview)

II – सामूहिक साक्षात्कार (Group Interview)

[C] – सम्पर्क अवधि के अनुसार (According to Length of contact) –

I – अल्पकालिक सम्पर्क (Short term contact)

II – दीर्घ कालीन सम्पर्क (Prolong contact)

अध्ययन विधि के आधार पर साक्षात्कार / Interview based on study method –

I – अनिर्देशित साक्षात्कार / Unguided Interview

II – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार /Objective based Interview  

III – पुनरावर्तित साक्षात्कार (Repeated Interview)

साक्षात्कार प्राविधि के गुण / Merits of Interview Technique –

01 – शिक्षित, अशिक्षित व सभी पक्षों का अध्यययन 

02 – समस्या आधारित महत्त्वपूर्ण विश्वसनीय प्राविधि

03 – वैश्विक घटनाओं के प्रभाव का अध्ययन सम्भव

04 – मनोवैज्ञानिक अध्ययन सम्भव

05 – अभिवृत्तियों, भावनाओं, संवेगों का प्रभावी अध्ययन

06 – प्रत्यक्ष निरीक्षण असम्भव होने पर भी अध्ययन सम्भव

07 – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार से तत्सम्बन्धी सङ्कलन सम्भव

08 – प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच सम्भव

09 – तत्सम्बन्धी समस्त तथ्यों का संकलन

10 – वार्तालाप से अप्रत्याशित तथ्य जानकारी सम्भव

साक्षात्कार प्राविधि की सीमाएं  / Limitations of Interview Technique

01 – उपयुक्त मनोवैज्ञानिक तथा योग्य साक्षात्कार कर्त्ता प्राप्ति दुष्कर

02 – हाँ, नहीं में उत्तर प्राप्ति पर विश्लेषण दुष्प्रभावित 

03 – विश्वसनीयता सन्दिग्ध 

04 – आत्मनिष्ठ प्राविधि

05 – वैयक्तिकता का प्रभाव

06 – विविध सामाजिक पृष्ठ भूमि का प्रभाव

07 – अमितव्ययी

08 – साक्षात्कार प्रदाता की गलत सूचना हानिकारक

09 – अतिशयोक्ति सम्भव

10 – पारस्परिक व्यक्तित्व का प्रभाव

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शिक्षा•शोध

META PHYSICS AND EDUCATION

December 21, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा

ब्रह्माण्ड के यथार्थ स्वरुप और उसमें मनुष्य के जीवन की तात्त्विक विवेचना तत्त्व मीमांसा के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसी के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य और उनकी प्राप्ति के उपाय विवेचित किये जाते हैं और इस आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि जीवन दर्शन के आधार पर समाज के उद्देश्य निर्धारित होते हैं जिन्हें शिक्षा अपना उद्देश्य बना लेती है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षा के विविध अंग सहयोग करते हैं इसीलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण विधि , शिक्षक, विद्यार्थी, अनुशासन सभी जीवन दर्शन के आलोक में क्रियान्वित होते हैं। अतः यह पूर्णतया स्पष्ट है कि इन सभी शिक्षा के अंगों का विकास तत्त्व मीमांसा के आधार पर होता है।

विविध दर्शन की तात्त्विक विवेचना हमें बताती है कि विविध दर्शन चाहे वह आदर्शवाद, प्रकृतिवाद,  प्रयोजनवाद, अस्तित्ववाद कोई भी हो। तत्त्व मीमांसा में उसकी व्याख्या का प्रभाव इनके शैक्षिक उद्देश्यों व इसके अन्य अंगों पर पड़ता है जिसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा के विविध घटक

Metaphysics and various components of education

शिक्षा के विविध घटकों की तत्त्व मीमांसात्मक विवेचना निम्न शिक्षा के उद्देश्य स्व आलोक में प्रस्तुत करती दीख पड़ती है –

A – शिक्षा के उद्देश्य –

01 – शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य / Social objectives of education – सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा इस प्रकार करती है जिससे मानव समाज से सामंजस्य बिठाकर समाज ,राज्य, राष्ट्र सबकी प्रगति में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। बॉसिंग महोदय कहते हैं कि

“The function of education is concerned to be the adjustment of man to environment and that the most enduring satisfaction may accrue (अक्रू= अर्जित) to the individual and to the society.”

“शिक्षा का कार्य मनुष्य को पर्यावरण के अनुरूप ढालना है और यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति और समाज दोनों को ही सबसे स्थायी संतुष्टि प्राप्त हो।”     

02 – व्यक्तित्त्व का पूर्ण विकास / Complete development of personality – शिक्षा के द्वारा समग्र क्षमताओं का सम्यक विकास होना चाहिए जैसा कि गांधीजी ने कहा –

“By education I mean an all round drawing out of the best in child and man – body, mind and spirit.”

“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के भीतर की सर्वोत्तम विशेषताओं – शरीर, मन और आत्मा – को समग्र रूप से बाहर निकालना है।”

03 – चारित्र, ज्ञान व स्वस्थ आदतों का विकास /Development of character, knowledge and healthy habits. – इस तरह के विकास से सामान्यतः सभी दार्शनिक सहमति रखतेहैं जैसाकि ड्रेवर महोदय का विचार है –

“Education is a process in which and by which the knowledge, character and behavior of the young are shaped and molded.”

“शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा युवाओं के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को आकार दिया जाता है।”

04 – पूर्ण जीवन की तैयारी का उद्देश्य / The purpose of preparing for a fulfilling life –

हर्बर्ट की तरह कई विद्वान् पूर्ण जीवन की तैयारी पर बल देते हैं जैसाकि डीवी महोदय ने भी कहा –

“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”

“शिक्षा व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने परिवेश को नियंत्रित करने और अपनी संभावनाओं को पूरा करने में सक्षम बनाएंगी।”

05 – समग्र व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य / Aim for holistic personal development – बालक में निहित गुणों के विकास की बात विविध दर्शन करते हैं इन्ही विचारों से सहमति जताते हुए विवेका नन्द जी कहतेहैं –

“Education is the manifestation of perfection already in man”

“शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”

06 – सभी स्थितियों में सामंजस्यपूर्णता का उद्देश्य / Aim for harmony in all situations –

जीविकोपार्जन की क्षमता हासिल करना हो या प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को ढालना, शिक्षा और इससे जुड़े दर्शनों की तात्त्विक विवेचना उसे सामंजस्यपूर्ण बनाने पर जोर देती है। जैसा कि रबीन्द्र नाथ टैगोर के इन शब्दों से दृष्टिगत होता है। –

“The highest education is that which does not merely give us information but makes our life in harmony with all existence.”

“सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंज स्यपूर्णबनाती है।”

B- शिक्षा का पाठ्यक्रम / Curriculum of education –

जहाँ आदर्शवादी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के साथ नैतिकता को पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं वहीं प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में स्वानुभव विविध विज्ञान, गणित आदि के स्थापन के साथ इन्द्रिय प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं। प्रयोजनवादी सामाजिक तात्कालिक समस्याओं से सम्बंधित विषयों का चयन करना चाहते हैं।

C – शिक्षण विधियाँ / Teaching methods —

आदर्शवादी – प्रवचन, कहानी कथन, दृष्टान्त, तर्क विधि  

प्रकृतिवादी – स्वानुभव, इन्द्रिय प्रशिक्षण, खेल विधि, भ्रमण द्वारा  

प्रयोजनवादी – करके सीखना, प्रयोगात्मक विधि, अन्वेषण, संश्लेषण, प्रदर्शन

D –   अध्यापक /Teacher —

आदर्शवादी –  आदर्श, विशिष्ट ज्ञानी  

प्रकृतिवादी –  परदे के पीछे / केवल वातावरण बनाने वाला / अधिगम प्रकृति द्वारा 

प्रयोजनवादी –  मित्र व पथ प्रदर्शक

E – शिक्षार्थी / Student   —

आदर्शवादी –  अनुकरण प्रधान, आज्ञा पालक  

प्रकृतिवादी –  स्वेच्छाचारी, प्रकृति अनुगामी   

प्रयोजनवादी – मित्र

F – अनुशासन / Discipline   —

आदर्शवादी –  कठोर अनुशासन, आज्ञा पालक   

प्रकृतिवादी –  प्राकृतिक अनुशासन    

प्रयोजनवादी – स्व अनुशासन

       

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Uncategorized•शोध

QUESTIONNAIRE

December 15, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

QUESTIONNAIRE (प्रश्नावली)

प्रश्नावली उस क्रमबद्ध तालिका को कहा जाता है जो वांछित विषयवस्तु के सम्बन्ध में विविध सूचनाएं अर्जित करने में योग देती है। इसके माध्यम से उद्देश्य समर्पित  प्रश्नों का एक क्रम बना लिया जाता है जो आवश्यक सूचनाएं एकत्रित करने हेतु आवश्यक होता है। प्रसिद्द विद्वान लुण्डबर्ग महोदय के अनुसार –

“मूल रूप में प्रश्नावली उत्तेजनाओं का समूह है जिनके प्रति शिक्षित व्यक्तियों को दिखाया जाता है। जिससे इन उत्तेजनाओं के प्रति उनके मौखिक व्यवहार का निरीक्षण किया जा सके।”

“Fundamentally, the questionnaire is a set of stimuli of which literate people are exposed in order to observe their verbal behaviour under these stimuli.”

 – G.A.Lundberg, op. cit., p183

एक अन्य विद्वान् गुड व हैट महोदय के अनुसार –

“प्रश्नावली एक प्रकार का उत्तर प्राप्त करने का साधन है, जिसका स्वरुप ऐसा होता है कि उत्तरदाता उसकी पूर्ति स्वयं करता है।”

“In general the word questionnaire refers to a device for securing answers to questions by using a form which the respondent fills in himself.”  – Goode & Hatt.

एक भारतीय चिन्तक आर० ए ० शर्मा महोदय के अनुसार

“प्रश्नावली के अन्तर्गत प्रश्नों की सूची या कथनों की सूची को सम्मिलित किया जाता है। न्यादर्श के सदस्यों को प्रश्नों का उत्तर स्वयं भरना होता है सदस्य अपनी विचारधारा, अभिवृत्ति,तथा परिचित सूचनाओं तथा तथ्यों को स्वयं अंकित करते हैं ।”

“The questionnaire consists of a series of questions or statements of which respondents are asked to respond the questions frequently asked for facts of the opinions or preferences of the respondents.”

उक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रश्नावली प्राविधि अधिक वैध व विश्वसनीय है क्योंकि इसमें प्रश्नों के उत्तर स्वयं उन सदस्यों द्वारा अंकित किये जाते हैं। शोधार्थी प्रदत्तों के सङ्कलन हेतु इस प्राविधि का प्रयोग करते हैं।

अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएं / Characteristics of a good questionnaire –

एक अच्छी प्रश्नावली में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए –

01 – प्रश्नावली के महत्त्व बताने वाला विनम्र मुख पत्र (cover letter)

02 – सम्यक निर्देशन

03 – एक विचार एक प्रश्न

04 – संक्षिप्त व बोधगम्य

05 – सार्थक सूचना संग्रहण में सक्षम

06 – स्वच्छ, सुन्दर त्रुटि रहित छपाई 

07 – वस्तुनिष्ठ व निष्पक्ष

08 – प्रश्न क्रम सरल से कठिन

09 – द्विअर्थी, दुष्कर व अप्रिय कथनों से रहित

10 – उद्देश्य केन्द्रित प्रश्नमाला

प्रश्नावली के प्रकार / Types of Questionnaire –

01 – प्रतिबन्धित प्रश्नावली

02 – अप्रतिबन्धित प्रश्नावली

03 – चित्रमयी प्रश्नावली

04 – मिश्रित प्रश्नावली

प्रश्नावली निर्माण सम्बन्धी विविध प्रमुख तथ्य(Various important facts related to questionnaire preparation) -

01 – उद्देश्य आधारित स्वरुप निर्धारण

02 – सम्यक प्रश्नावली लेखन

03 – विज्ञ जनों व तत्सम्बन्धी सहयोगियों का सहयोग

04 – प्राथमिक परीक्षण

05 – त्रुटिहीन उत्तम छपाई

प्रश्नावली के गुण –

01 -विस्तृत क्षेत्र से सूचना प्राप्ति सम्भव

02 – दुरूह क्षेत्रों के लोगों से भी सम्पर्क सम्भव

03 – मितव्ययी

04 – सोचने विचारने का सम्यक समय

05 – वस्तुनिष्ठता

06 – साक्षात्कार के दोषों से मुक्ति

07 – पूर्ण स्पष्ट निर्देश

08 – सम्यक वर्गीकरण सम्भव

09 – विश्वसनीय व वैध

10 – सांख्यकीय विश्लेषण सुगम

प्रश्नावली के दोष –

01 – विस्तृत प्रश्नावली

02 – भ्रम पूर्ण शब्दावली 

03 – वस्तुनिष्ठता का अभाव

04 – असंगत क्रम

05 – छपाई की कमियाँ

06 – व्यापकता का अभाव

07 – असुविधाजनक क्रम से अंकन मूल्याङ्कन दुष्कर

08 – सम्यक निर्देश अभाव

09 – एक पक्षीय

प्रश्नावली के विविध गुण, दोषों व विविध उपादानों का सम्यक विवेचन से यह पूर्णतया स्पष्ट है कि कतिपय कमियों के साथ यह एक समंक संग्रहण का उत्तम विकल्प है।

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शोध

Item analysis

December 10, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पद विश्लेषण (Item analysis)

पद विश्लेषण उद्देश्य समर्पित पदों के सङ्कलन की एक व्यावहारिक व्यवस्था है। इसके अनुसार सम्यक पदों का संग्रहण किया जाता है और कमजोर पदों को व अनावश्यक पदों को हटा दिया जाता है पद विश्लेषण के माध्यम से उद्देश्य समर्पित पदों को एकत्रित कर लिया जाता है। इस प्रकार की विशेषता वाले पदों का एकत्रीकरण करते हैं जिससे परीक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति सम्भव हो सके। परीक्षण के उद्देश्य इन तथ्यों पर अवलम्बित होते हैं।

1 – अभ्यर्थी चयन

2 – वर्गीकरण

3 – अनुस्थिति प्रदान करना

4 – व्यक्तिगत भिन्नता

5 – पूर्व कथन

6 – प्रगति सुनिश्चयन

पद विश्लेषण के कार्य (Functions of Item Analysis) – पद विश्लेषण के द्वारा जिन कार्यों को सम्पादित किया जाता है उन्हें इस प्रकार क्रम प्रदान किया जा सकता है।

1 – अपेक्षित पदों का चयन

2 – अनुपयुक्त पद निरस्तीकरण

3 – पद परिमार्जन

पद विश्लेषण की आवश्यकता क्यों ? - Why is there a need for phrase analysis?

परीक्षण जितना सशक्त और व्यवस्थित होगा उतना ही वह अच्छे परिणाम देने में समर्थ होगा। इसीलिए परीक्षण तैयार करते समय प्रत्येक पद को पद विश्लेषण के माध्यम से उद्देश्य समर्पित करने की आवश्यकता महसूस होती है। उद्देश्य पूर्ति हेतु वैध व विश्वसनीय पदों की आवश्यकता महसूस की जाती है अतः पूरा परीक्षण व्यवस्थित व उत्तम बनाने हेतु निम्न वजह से पद विश्लेषण की आवश्यकता की गहनतम अनुभूति होती है –

1 – सम्पूर्ण परीक्षण को प्रतिनिधि कारी बनाने हेतु

2 – द्विअर्थी व कमजोर पद हटाने हेतु

3 – निर्धारित पद संख्या हेतु आवश्यक चयन

4 – समस्या निदानीकरण हेतु स्पष्ट संकेत देने हेतु

5 – कठिनाई स्तर बोध

6 – विभेदकारी क्षमता निर्धारण

7 – समानान्तर प्रारूप तैयार करने हेतु

8 – शक्ति परीक्षण हेतु पद विश्लेषण आवश्यक, गति परीक्षणों हेतु नहीं

9 – सांख्यिकीय विशेषता का आधार ले तर्क संगत परीक्षण निर्माण हेतु 

पद विश्लेषण की विशेषताएं (Characteristics of Item Analysis) –

01 – उद्देश्यानुसार पद चयन

02 – प्रत्येक पद की वास्तविक स्थिति की जानकारी

03 – निर्देशों की अस्पष्टता का निदान

04 – परीक्षार्थियों की क्षमता का पूर्ण ज्ञान

05 – उपयुक्त शिक्षण विधि चयन में सहायक

06 – लम्बी परीक्षाओं को सारगर्भित संक्षिप्त रूप देना

07 – मापन हेतु उपयुक्त परीक्षण की प्राप्ति सम्भव

08 – चक्रीय प्राविधि

09 – सांख्यिकीय विश्लेषण सुगम

10 – ध्येय परक परीक्षण निर्माण सम्भव





 
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शोध

Report Writing

July 6, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

रिपोर्ट लेखन

शोध की दुनिया अपने आप में परिश्रम और लगन के विविध आयामों को अपने आप में समेटकर विशिष्ट कहानी का सृजन करती है। यह बताती है कि समस्त परिकल्पना, उद्देश्य, विश्लेषण, संश्लेषण, गणनाएं किसी शीर्षक के इर्द-गिर्द  क्यों परिभ्रमण कर रही थीं और ज्ञान के समुद्र मंथन से क्या प्राप्त हुआ है? जो आने वाले कल में भविष्य को दिशा निर्देश देने में सक्षम है। इस कार्य को सम्पादित करता है रिपोर्ट लेखन।

एक कहावत है जंगल में मोर नाचा किसने देखा, इसका आशय है कि यदि किसी अच्छे कार्य को देखने वाला कोई  नहीं तो इसका कोइ मतलब नहीं दूसरे शब्दों में यदि कोई उपलब्धि किसी के संज्ञान में नहीं आ रही तो महत्वहीन है। शोध रिपोर्ट या रिपोर्ट लेखन का यह दायित्व है कि वह किये गए कार्य की महत्ता प्रतिपादित करे तथा सबके संज्ञान में लाये।

रिपोर्ट लेखन,  शोधकार्य के अंतिम चरण के रूप में स्वीकार किया जाता है और यह विशिष्ट कौशल के द्वारा सम्पादित होता है इसे लिखने में अत्याधिक सावधानी की अपेक्षा रहती है। इसीलिए इस उद्देश्य पूर्ति हेतु विशेषज्ञों की राय व निर्देशन महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इसका उद्देश्य शोध के लाभ को उन तक पहुंचाना है जिनके लिए यह किया गया है शब्द और लेखन का ढंग ऐसा हो जो बोध ग्राह्य हो।

रिपोर्ट लेखन के विविध चरण / Various steps of report writing –

यह शोध कार्य का अंतिम चरण होने के नाते श्रम साध्य और समस्त कार्य का प्रतिनिधित्व करने वाला मुखड़ा है जो विशेष सावधानी की अपेक्षा रखता है इसीलिये अधिगम के दृष्टिकोण से इसके विविध चरणों को इस प्रकार व्यवस्थित कर सकते हैं। –

01 – समग्र का संश्लेषणात्मक तार्किक विश्लेषण / Synthetic logical analysis of the whole

02 – अन्तिम परिणति की तैयारी /Preparing for the final outcome

03 – कच्चा मसौदा/ Rough draft

04 – शुद्धिकरण और पुनः लेखन / Correction and rewriting

05 – ग्रन्थ सूची की तैयारी / Preparation of Bibliography

06 – अन्तिम परिमार्जित रिपोर्ट लेखन / final revised report writing

रिपोर्ट लेखन हेतु रिपोर्ट लेखक के आवश्यक गुण /Essential qualities of a report writer for report writing-

शोध कर्त्ता या रिपोर्ट लेखक इतनी ठोकरें शोध कार्य के दौरान खा चुका होता है कि इस हेतु आवश्यक गुण उसमें विकसित हो जाते हैं लेकिन सामान्य रूप से इन गुणों का होना गरिमायुक्त स्वीकार किया जाता है।

01 – सम्यक स्वनियन्त्रक / Proper self control

02 – त्वरित निर्णयन क्षमता / Quick decision making ability

03 – सम्यक कौशल विकास / Proper skill development

04 – तथ्यों के प्रति तटस्थ / Neutral to facts

05 – शोध मूल्यांकन में सक्षम / Capable of research evaluation

06 – सम्यक प्रबंधकीय गुण / Proper managerial skills

07 – यथार्थवादी / Realistic

08 – क्षमता को उत्कृष्टता में बदलने को तत्पर / Willing to transform potential into excellence

शोध रिपोर्ट हेतु सावधानियाँ /Precautions for research report –

यद्यपि विश्व विद्यालय द्वारा प्रदत्त प्रारूप से बँधकर कार्य किया जाता है और विविध मानकों का भी ध्यान रखा जाता है फिर भी रिसर्च रिपोर्ट को अधिक प्रभावी बनाने हेतु कुछ सावधानियाँ अपेक्षित हैं –

01 – शोध रिपोर्ट के आकार का निर्धारण /Determining the size of a research report

02 – रुचिपूर्ण / Interesting

03 – चार्ट, ग्राफ और तालिकाओं का सम्यक प्रयोग /Judicious use of charts, graphs and tables

04 – मौलिकता व तार्किक विश्लेषण / Originality and logical analysis

05 – शुद्ध व सम्यक प्रारूप / correct and proper format

06 – परामर्शित स्रोतों की स्पष्ट ग्रन्थ सूची / Clear bibliography of sources consulted

07 – परिशिष्टों का सूचीकरण / Listing of Appendices

08 – विश्वसनीय / Reliable

09 – जटिलताओं से मुक्त / Free from complications

10 – आकर्षक, स्पष्ट,स्वच्छ मुद्रण / Attractive, clear, clean printing

अन्त में यह कहना तर्क संगत होगा के बदलते परिवेश के साथ नित्य प्रति परिवर्तनों का दौर जारी है इस लिए हमें वक़्त के साथ कदम ताल करना होगा और समय के साथ नवीनतम परिवर्तित रिपोर्ट लेखन के साथ तालमेल बैठाना होगा।

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शोध

RESEARCH INTEGRITY

July 4, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शोध अखण्डता

Meaning of research integrity / शोध अखण्डता से आशय

आज पूरा विश्व विकास के दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर नित्य नए विकास के आयाम गढ़ने के लिए अग्रसर है और विकास के ये सोपान शोध की मज़बूत नींव पर ही खड़े होते हैं। ऐसी स्थिति में शोध अखण्डता अत्याधिक महत्त्व पूर्ण हो जाती है। शोध अखण्डता, शोधकर्त्ता के शोध कार्य के प्रति दृष्टिकोण पर निर्भर करती है। और उम्मीद करती है कि शोध कर्त्ता कर्त्तव्य निष्ठ, ईमानदार, जिम्मेदार और कार्य को पारदर्शी ढंग से परिपूर्ण करने वाला होगा वह अपने शोधकार्य के प्रति इतना समर्पित होगा कि उसका कार्य विश्वसनीयता के मानदण्डों पर खरा उतरे। इसीलिये शोध अखण्डता को स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है की शोध अखण्डता से आशय है कि – शोध कार्य को पूर्ण करने में पेशेवर सिद्धांतों के पालन के साथ नैतिक मानदण्डों को प्रश्रय देना।

Essential elements for research integrity/शोध अखण्डता हेतु आवश्यक तत्व –

निम्न तत्वों को सम्मिलित कर शोध अखण्डता को उच्चस्तर का बनाये रखा जा सकता है। –

01 – वस्तुनिष्ठता / Research objectivity

 02 – विश्वसनीयता / Reliability

03 – निष्पक्षता युक्त पारदर्शिता / Transparency with fairness

04 – साहित्यिक चोरी से अलगाव / Non-plagiarism

05 – जिम्मेदारी युक्त जवाबदेही / Meaning of accountability with responsibility

06 – स्वतन्त्रता / Independence   

07 – उपयुक्त लचीला पन / Appropriate flexibility

08 – सम्यक गोपनीयता / Appropriate confidentiality 

09 – उच्च नैतिक मानदण्ड / High ethical standards

10 – निष्कर्षों की जिम्मेदारी / Responsibility for findings

उक्त तथ्यों का ईमानदारी से परिपालन करके शोध अखण्डता को प्रश्रय दिया जा सकता है, शोध अखण्डता व्यक्तिगत शोधकर्त्ताओं को सामाजिक जिम्मेदारी का अहसास कराती है शोध समुदाय और शोध जगत हेतु शोध अखण्डता नींव की मज़बूत आधारशिला है। इससे जिम्मेदार आचरण निर्देशित होता है शोध प्रतिभागियों को गरिमा युक्त सम्मान प्राप्त होता है। सत्य, निष्पक्षता को आलम्ब मिलता है।

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शोध

IMPACT FACTOR

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रभाव कारक

काल चक्र परिभ्रमण के साथ पत्रिकाओं का अस्तित्व हमेशा से रहा है और रहेगा। विविध जर्नल में से कोई जर्नल प्रतिष्ठित की श्रेणी में आता है तो उसका आधार बनता है इम्पैक्ट फैक्टर (IMPECT FACTOR) . यह एक तरह से उस जर्नल की प्रभाव और प्रतिष्ठा की माप है। इससे यह ज्ञात होता है कि इसमें उपस्थित लेखों को कितनी बार उद्धृत किया गया है।इम्पैक्ट फैक्टर (IMPACT FACTOR) की गणना/ Calculation of IMPACT FACTOR

 – इसकी गणना के माध्यम से जर्नल की सापेक्षिक गुणवत्ता व महत्त्व को प्रदर्शित किया जाता है इसकी गणना एक निर्धारित वर्ष में जर्नल में प्रकाशित लेखों को पिछले दो वर्षों में उद्धृत किये जाने वाले औसत अंक के रूप में जो संख्या प्राप्त होती है उसे उसका इम्पेक्ट फैक्टर कहा जाता है।

उदाहरण के लिए यदि किसी जर्नल का 2024 का इम्पैक्ट फैक्टर 3.0 है, तो इसका मतलब है 2022 और 2023 में पब्लिश्ड लेखों को 2024 में औसतन 3 बार उद्धृत किया गया। यहाँ यह जानना भी आवश्यक है कि इम्पैक्ट फैक्टर की गणना सामान्यतः जॉर्नल साइटेशन रिपोर्ट (JSR) में प्रकाशित की जाती है।

इम्पैक्ट फैक्टर (IMPACT FACTOR) का महत्त्व/ Importance of IMPACT FACTOR,  –

01 – श्रम साध्य लेखन को दिशा / Direction for laborious writing

02 – जर्नल हेतु उपयुक्त मानक / Appropriate standards for the journal

03 – प्रकाशकों को दिशा बोध / Direction for publishers

04 – जर्नल को प्रसिद्धि / fame to the journal

05 – नए शोध कर्त्ताओं को प्रेरणा / Inspiration to new researchers

06 – लेखकों की मान्यता स्थापन / Establishment of recognition of authors

07 – अभिप्रेरक /Motivator

इम्पैक्ट फैक्टर (IMPACT FACTOR) की सीमाएं/ Limitations of IMPACT FACTOR,  –

01 – समग्र प्रभाव का आकलन /Assessment of overall impact

02 – व्यक्तिगत लेखों की गुणवत्ता आकलन में विफल / Fails to assess the quality of individual articles

03 – बेईमानी को प्रश्रय / Encouraging dishonesty

04 – शोध मूल्यांकन हेतु इस पर आश्रय उचित नहीं / It is not appropriate to rely on it for research evaluation

05 – पक्षपात पूर्ण /Biased

अन्ततः यह स्वीकार किया जा सकता है कि यह एक महत्त्वपूर्ण मानक है लेकिन केवल इसी पर निर्भरता उचित नहीं। अतः शोध मूल्यांकन में इसे मात्र मानदण्ड न माना जाए।

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शोध

Collection of data

April 21, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

समंकों का एकत्रीकरण

किसी शोध कार्य को सम्पन्न करने हेतु जब हम उस विषय का परिचय दे चुके होते हैं और तत्सम्बन्धी साहित्य का अध्ययन कर चुके होते हैं और इसके बाद के महत्त्वपूर्ण चरण पर पहुँचते हैं तो समंकों का एकत्रीकरण सबसे अधिक आवश्यक होता है। सारी गणना, विश्लेषण, परिणाम और उसकी व्याख्या को इसके अवलम्बन की आवश्यकता होती है।समंकों का संग्रहण अपने शोध के अनुसार किया जाता है। ये समंक दो प्रकार के होते हैं जिन्हें विविध प्रकार से हम संग्रहीत करते हैं।

प्राथमिक समंक और इनका संग्रहण / Primary data and its collection

द्वित्तीयक समंक और इनका संग्रहण / Secondary data and its collection 

प्राथमिक समंक और इनका संग्रहण / Primary data and its collection – 

            प्राथमिक समंक उन समंकों को कहा जाता है जिन्हे प्रथम बार नवीन सिरे से इकठ्ठा किया जाता है और इसी कारण ये वास्तविक होते हैं। प्राथमिक समंकों के एकत्रीकरण में व्यावहारिक रूप से अधिक श्रम आवश्यक होता है।

द्वित्तीयक समंक और इनका संग्रहण / Secondary data and its collection  –

            द्वित्तीयक समंक उन समंकों को कहा जाता है जिन्हें पहले ही किन्ही अन्य माध्यमों से इकट्ठे किया जा चुका होता हैं विविध सांख्यिकीय प्रक्रियाएं पहले ही से पूर्ण की जा चुकी होती हैं। इनका अपने शोध की आवश्यकतानुसार आधार रूप में प्रयोग किया जाता है और इस स्रोत का स्पष्टीकरण भी कर दिया जाता है।

            उक्त दोनों प्रकार का संग्रहण चयनित शोध के अनुसार निर्धारित किया जाता है प्राथमिक और द्वित्तीयक समंक अलग अलग तरह से इकट्ठे किये जाते हैं प्राथमिक समंकों को मूल रूपेण इकठ्ठा किया जाता है जबकि द्वित्तीयक समंक कोइ इकट्ठे कर चुका होता है। इनका केवल संकलन स्वनुसार करना होता है। आइये इनके संग्रहण की प्रविधियों पर दृष्टिपात करते हैं।

 प्राथमिक समंक संग्रहण प्रविधियाँ  / Primary data collection techniques –

इस हेतु प्रयोग में लाई जाने वाली प्रविधियाँ इस प्रकार हैं –

                                [A]  अवलोकन प्राविधि /Observation technique –

पी ० वी ० यंग (P V Yong ) ने इसे समझाते हुए बताया –

“अवलोकन स्वाभाविक घटना का उसके घटित होने के समय पर आँख के माध्यम से क्रमबद्ध एवम् विचारपूर्वक किया हुआ अध्ययन है। अवलोकन का उद्देश्य जटिल सामाजिक घटना, सांस्कृतिक प्रतिरूप अथवा मानव व्यवहार के अन्तर्गत सार्थक अन्तर्सम्बन्धित तत्वों की प्रकृति एवम् विस्तार को प्रकट करना होता है।”

“Observation is a systematic and deliberate study through the eye of spontaneous occurrence at the time they occur. The purpose of observation is to perceive the nature and extent of significant interrelated elements within complex social phenomena, cultural pattern or human conduct.”

P.V.Young. Scientific social survey and Research. New Delhi. Prentic Hall India (p) limited (1956)  p. 154

(01) – नियन्त्रण आधारित / Control based

(a) – नियन्त्रित अवलोकन /Controlled observation

पी ० वी ० यंग (P V Yong ) के अनुसार –

“नियन्त्रित अवलोकन सुनिश्चित एवम् पूर्व व्यवस्थित योजनाओं के अनुसार सम्पन्न किया जाता है, जिसमें यथेष्ट प्रायोगिक प्रक्रिया सम्मिलित की जा सकती है।”

“Controlled Observation is carried on according to define pre-arranged plans which may include considerable experimental Procedure.”

P.V.Young. op. cit. p. 164

(b) – अनियन्त्रित अवलोकन / Uncontrolled observation

गुडे एवम् हैट (Goode and Hatt) के अनुसार 

“सामाजिक सम्बन्धों के विषय में अधिकांश ज्ञान जो लोगों के पास है, अनियन्त्रित अवलोकन से व्युत्पादित होता है।”

“Most of the knowledge which people have, about social relations is derived from uncontrolled observation whither participant or non-participant .

W.J.Goodeand P,K.Hatt: p.120

(02) – सहभागिता आधारित / Participation based

(a) – सहभागी अवलोकन / Participant observation –

सहभागी अवलोकन को असंरचित अवलोकन (Unstructured Observation) भी कहते हैं। इसमें अध्ययन से सम्बन्धित समूह का अंग बनकर अवलोकन कर्त्ता तत्सम्बन्धी क्रियाओं में खुद सहभागी बनकर अवलोकन करता है तथा आंकड़े प्राप्त करके अभिलेख तैयार करता है।

(b) – असहभागी अवलोकन / Non-participant observation-

असहभागी अवलोकन को संरचित अवलोकन (Structured Observation) भी कहा जाता है। इसमें खुद सहभागी न बनकर सामान्य परिस्थितियों में सम्बन्धित समूह के व्यक्तियों का अवलोकन किया जाता है।

                                  [B]   साक्षात्कार प्राविधि (Interview Technique) –

जब शोधकर्त्ता तत्सम्बन्धी प्रयोज्य से उसकी मनोवृत्तियों, रुचियों, योग्यताओं, अभिवृत्तियों से सम्बन्धित तथ्यों का सङ्कलन आमने सामने की बातचीत के माध्यम से करता है। तो इसे साक्षात्कार प्राविधि कहा जाता है। इस सम्बन्ध में जॉन डब्लू बेस्ट (John W Best) के अनुसार

“साक्षात्कार एक मौखिक प्रश्नावली है। उत्तर को लिखे बिना विषयी अथवा साक्षात्कार देने वाला आमने सामने आत्मीयता से वांछित सूचना मौखिक रूप से देता है।”

“The interview is an oral questionnaire installed of writing the response, the subject or interviewer gives the needed information verbally in a face to face relationship.”

 John W Best op.cit. p.182

साक्षात्कार से सम्बन्धित तथ्यों के आधार पर सामान्य रूप से चार भागों में विभक्त किया जा सकता है।

1 – उद्देश्य समर्पित साक्षात्कार /Objective dedicated interview –

2 – अन्तः क्रिया आधारित साक्षात्कार / Interaction based interview

3 – संख्या आधारित साक्षात्कार / Number based interview

4 – संरचना आधारित साक्षात्कार / Structure based interview

1 – उद्देश्य समर्पित साक्षात्कार /Objective dedicated interview –

  • a- निदानात्मक साक्षात्कार / diagnostic interview
  • b- उपचारात्मक साक्षात्कार / therapeutic interview
  • c- शोध साक्षात्कार / research interview

2 – अन्तः क्रिया आधारित साक्षात्कार / Interaction based interview

      a- केन्द्रित साक्षात्कार / Focused interview

  • b- अनिर्देशित साक्षात्कार / Unguided interview
  • c- पुनरावृत्त साक्षात्कार / Repeated interview

3 – संख्या आधारित साक्षात्कार / Number based interview

  • a- व्यक्तिगत साक्षात्कार
  • b- सामूहिक साक्षात्कार

4 – संरचना आधारित साक्षात्कार / Structure based interview

  • a- संरचित साक्षात्कार / Structured interview
  • b- असंरचित साक्षात्कार / Unstructured interview(

                                             [C] – समाजमितीय प्राविधि ( Sociometric Technique) –

विविध सामाजिक परिस्थितियों व समूह के सदस्यों के पारस्परिक व्यावहारिक सम्बन्धों व पसन्द नापसन्द का  समाजमिति प्राविधि द्वारा किया जाता है। समाजमितिका अर्थ स्पष्ट करते हुए जॉन डब्लू बेस्ट (John W Best)  महोदय ने लिखा है –

“समाजमिति सामाजिक सम्बन्धों का वर्णन करने के लिए एक प्राविधि है, जो एक समूह में व्यक्तियों के मध्य विद्यमान है।”

“Sociometry is a technique of describing social relationships that exist between individuals in a group.”

 John W Best op.cit. p.191

समाजमितीय तकनीक से प्राप्त आंकड़ों को समाजमितीय मेट्रिक्स , समाज आलेख, समाजमितीय सूचकांक आदि के द्वारा विश्लेषित किया जा सकता है।

द्वित्तीयक समंकों का संग्रहण / Collection of Secondary Data

जब द्वित्तीयक समंकों की बात करते हैं तो इसका सीधा सा आशय है कि वह समंक जो पहले ही उपलब्ध है इसको न केवल एकत्रित किया गया है बल्कि इसका विश्लेषण भी किया जा चुका है। द्वित्तीयक समंकों का प्रयोग करते समय शोधार्थी को विविध स्रोतों पर गौर करना होता है। समझ बूझ कर उनका चयन शोधार्थी पर निर्भर करता है। सामान्यतः ये प्रकाशित होते हैं। यथा :-

1 – विविध आधिकारिक वेव साइट्स से

2 – शासन के विविध प्रकाशनों में

3 – अन्तर्राष्ट्रीय निकायों व उनके सहायक संगठनों का प्रकाशन

4 – तकनीकी व व्यापक पत्रिकाओं द्वारा

5 – पुस्तक,पत्रिकाओं व समाचार पत्रों से

6 – विविध बैंक, स्टॉक एक्सचेंज, संघों की रिपोर्ट से

7 – विश्व विद्यालय व अर्थशास्त्रियों की रिपोर्ट द्वारा

8 – विविध ई पत्रिकाओं से

9 – सार्वजनिक रिकार्ड, आंकड़ों व ऐतिहासिक प्रकाशित दस्तावेजों से  

10 – अन्य विविध स्रोतों से    

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