सामान्य रूप से मानसिक स्वास्थय को मानस के व्यवस्थित रूप से कार्य करने से लिया जाता है। मानसिक स्वास्थय समायोजन की वह प्रक्रिया है जिसमें निरन्तरता, सामंजस्य और समझौता को समाविष्ट कर जीवन को सकारात्मक दिशा की क्षमता विद्यमान है। मानसिक स्वास्थय जहाँ मानस की समग्रता की ओर इंगित करता है वहीं बहुत से विद्वतजन मानसिक स्वास्थय को सुखी, आनन्द पूर्वक जीवनयापन का आधार मानते हैं।
मानसिक स्वास्थय की परिभाषाएं / Definitions of mental health –
मानसिक स्वास्थय की विशेषताओं के आधार पर इसकी विविध विमाओं के आधार पर इसे विवेचित किया जाता है। मानसिक स्वास्थय को विविध विद्वानों ने इस प्रकार पारिभाषित किया है।
जे ० ए ० हैडफील्ड महोदय का मानना है –
“सामान्य रूप से मानसिक स्वास्थय सम्पूर्ण व्यक्तित्व का सामंजस्य पूर्णता के साथ कार्य करना है।”
“In general, mental health is the harmonious functioning of the whole personality.”
Head Field, J.A , 1952, pp 1 -2
एक अन्य प्रसिद्द विद्वान् कट्स एवं मोसले महोदय कहते हैं –
“मानसिक स्वास्थय वह योग्यता है जो हमें अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों में समायोजन करने में सहायक होती हैं।”
“Mental Health is the ability which helps us to seek adjustment in the difficult situations of our life.”
– Cuts & Mosale,1941,pp 4
के ० ए ० मिनिगर महोदय का मानना है –
“मानसिक स्वास्थय को मानव मात्र के एक दूसरे तथा दुनिया के साथ अधिक से अधिक प्रभावपूर्ण एवं आनन्द दायक समायोजन के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है।”
“Let us define mental health as the adjustment of human beings to the world and to each other with a maximum of effectiveness and happiness.” – Minigar, K.A. 1967, p 46.
उक्त विविध परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि मन की स्वस्थ दशा से युक्त व्यक्ति मानसिक स्वास्थय का धनी कहा जाएगा। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व इस प्रकार का विकसित हो जाता है जो विविध जनों और अपने वातावरण के साथ संयमित, सन्तुलित व सामंजस्य पूर्ण व्यवहार करने में समर्थ होता है।
मानसिक स्वास्थय अवधारणा की विशेषताएं / Characteristics of the concept of mental health-
01 – शारीरिक स्वास्थय, मानसिक स्वास्थय का आधार / Physical health: the foundation of mental health.
02 – कार्य कुशलता व मानसिक स्वास्थय / Work Efficiency and Mental Health
03 – नैतिकता और मानसिक स्वास्थय / Ethics and Mental Health
04 – सामाजिक सामन्जस्य और मानसिक स्वास्थय / Social Cohesion and Mental Health
05 – पूर्ण मानसिक स्वास्थ्य मिथ्या / The Myth of Perfect Mental Health
06 – आर्थिक परिक्षेत्र व मानसिक स्वास्थय / Economic sphere and mental health
07 – पारिवारिक जीवन और मानसिक स्वास्थय / Family life and mental health
08 – गतिशील धारणा है मानसिक स्वास्थय / Mental health is a dynamic concept
मानसिक स्वस्थ व्यक्ति की विशेषताएं / Characteristics of a mentally healthy person –
शरीर का स्वास्थय से युक्त होना वात, पित्त, कफ के सन्तुलन पर अवलम्बित होता है इसी प्रकार मानसिक स्वास्थय का प्रमुख आलम्ब है शारीरिक स्वास्थय। सामान्यतः मानसिक रूप से सशक्त व्यक्ति में निम्न विशेषताओं देखने को मिलते हैं।
01 – स्वास्थय के प्रति जागरूकता / Health awareness
02 – आत्म विश्वास व सकारात्मकता / Self-confidence and positivity
03 – लोच पूर्णता व सम्यक जीवन दर्शन / Flexibility and a balanced philosophy of life
04 – सामञ्जस्य क्षमता / Ability to adapt
05 – विवेक आधारित सहनशीलता / Tolerance based on discernment
06 – आत्म सम्मान के प्रति सचेष्ट / Conscious of self-respect
07 – स्वमूल्यांकन क्षमता / Self-assessment ability
08 – वातावरण व यथार्थ का सम्यक तालमेल / Proper coordination of environment and reality
मानसिक स्वास्थय वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है व्यक्ति के रूप में समस्त जीवनचर्या व राष्ट्र के रूप में यह प्रगति का प्रमुख कारक है। अतः इस पर ध्यान अपेक्षित है।
आज यदि हमें प्राकृतिक सौन्दर्य प्रभावित करता है, पसन्द आता है तो इनके प्रतिरूप भी भाते हैं। वर्तमान काल खण्ड दृश्य कला, श्रव्य कला और इनके समन्वित रूप अर्थात श्रव्य दृश्य कला से प्रभावित है। आज अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर बहुत कुछ सकारात्मक व नकारात्मक परोसा जाता है। जो लोग यह अभिव्यक्तियाँ देते हैं उन्हें कलाकार कहा जाता है। गायक, सङ्गीतकार, विदूषक, नायिका, नायक, नर्तक, जादूगर, सर्कस में रिंग मास्टर और नाटक कार सभी अपनी कलाओं का प्रदर्शन करते हैं अर्थात अपनी कलाओं का निष्पादन करते हैं। इस कला को हम निष्पादन कला (Performing Art ) कहते हैं।
निष्पादन कला से आशय व परिभाषाएं / Meaning and Definitions of Performing Arts –
वास्तव में निष्पादन कला उस कला को कहा जाता है जिसमें कलाकार अपने शरीर मुख मंडल आवाज तथा भाव भंगिमाओं का प्रयोग करके दर्शकों के समक्ष सीधे अपनी कला का प्रदर्शन करता है। इसमें पार्श्व में कार्य कर रहे कलाकारों को शामिल किये बिना काम नहीं चल सकता क्यों कि वे भी निष्पादन कर रहे हैं और दिखाई देने वाला कलाकार भी उससे ताल मेल बैठाता है। सम्बन्ध में विकिपीडिआ का मानना है कि –
” निष्पादन कला में पाँच मूल अवयव शामिल हैं कलाकार की उपस्थिति, समय, स्थान, शरीर और कलाकार और जनता के बीच सम्बन्ध।”
“Performance art comprises five fundamental elements: the artist’s presence, time, space, the body and the relationship between the artist and the audience.”
बिहार के लोक सेवा आयोग हेतु प्रयुक्त दृष्टि IAS की पुस्तक कला एवं संस्कृति के पृष्ठ 8 पर निष्पादन कला के सम्बन्ध में बताया गया –
“कला का वह रूप जो मुख्यतः दृश्य प्रकृति का होता है जैसे वास्तु कला, मूर्ती कला, चित्र कला, फोटो ग्राफी,वीडिओ ग्राफी इत्यादि।”
“That form of art which is primarily visual in nature—such as architecture, sculpture, painting, photography, Videography, etc.”
वर्तमान में हमें इसके विविध रूप परिलक्षित होते हैं।
निष्पादन कला के विविध प्रकार / Various forms of performing arts –
01 – नृत्य / Dance
02 – रंग मंच / Theatre
03 – जादू / Magic
04 – कठपुतली का खेल / Puppet Play
05 – गीत – सङ्गीत / Song Music
06 – नाटक / Drama
07 – सर्कस / Circus
08 – भाषण / Speech
09 – पार्श्व प्रस्तुति व प्रस्तुति / Background presentation and presentation
निष्पादन कला प्रबन्धन हेतु प्रमुख तत्व / Key Elements of Performing Arts Management –
01 – आत्मविश्वास व निष्ठा / Self-confidence and Dedication
02 – विद्युत व्यवस्था / Electrical System
03 – टीम की दक्षता / Team Efficiency
04 – व्यवधान निवृत्ति व्यवस्था / System for Handling Disruptions
05 – मेक अप कक्ष व ड्रेसिंग कक्ष की उत्तम व्यवस्था / Excellent arrangements for make-up and dressing rooms
06 – सम्यक परिधान / Appropriate attire
07 – तत्सम्बन्धी विविध कार्यों में सम्यक तालमेल / Proper coordination of related tasks
08 – समय प्रबन्धन / Time management
सचमुच इस कला में असीम शक्ति छिपी है यह हँसते को रुला सकती है और रोते हुए को हंसा सकती है। प्रेरणा के सारे पायदान इसके माध्यम से चढ़े जा सकते हैं। अध्यापन कला या भाषण भी निष्पादन कला ही है।
शिक्षण को प्रभावित करने वाले तथ्य / Factors affecting teaching
यह दुनियाँ है और निरन्तर परिवर्तनशील है। बदलती हुई इस दुनिया के शिक्षण को प्रभावित करने वाले कारक भी परिवर्तनशील हैं। सामान्यतः शिक्षण सूत्र, शिक्षण प्राविधि और शैक्षणिक रणनीति या व्यूह रचना को इसका प्रमुख कारक मन जाता है और ये भी ठीक है लेकिन बहुत से कारक शिक्षण को प्रभावित करते हैं जिन्हे हम इस प्रकार बिन्दुवत विवेचित कर सकते हैं। –
01 – विषय वस्तु का सम्यक ज्ञान / Thorough knowledge of the subject matter
02 – शैक्षणिक योग्यता / Educational qualifications
03 – विविध शैक्षणिक कौशलों का ज्ञान / Knowledge of various pedagogical skills
04 – शिक्षक प्रवृत्ति / Teacher Disposition
05 – शिक्षण अभिरुचि / Teaching Aptitude
06 – अनुभव व प्रबन्धन / Experience and Management
07 – शिक्षक प्रबन्धन सम्बन्ध / Teacher-Management Relationship
आज सूचनाएं विद्युत की गति से उड़ान भर रही हैं इन सूचनाओं में ज्ञान है, विज्ञान है और अज्ञान भी। सूचनाओं की यह दुनियाँ विविध समाजों पर विविध असर रखती है प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से कहा जा सकता है कि सूचनाएं स्वाभाविक हैं, कृत्रिम हैं और रण नीतिक योजना से युक्त भी। गलत सूचनाएँ भ्रमित कर जन आक्रोश को उद्वेलित भी कर देती हैं। मिथ्या सूचनाएं बड़े बड़े घटनाक्रम को उद्भवित करने की क्षमता रखती हैं। सत्य और असत्य में निर्णायक स्तर भी सूचना द्वारा ही स्थापित होता है। सूचनाएं ज्ञान के ही पर्याय के रूप में भूमिका का निर्वहन करती हैं। सूचनाओं की दुनियाँ समस्त विश्व को दिशा देने में सक्षम है। सचमुच अद्भुत दुनियाँ है सूचनाओं की।
भ्रम और यथार्थ / Illusion and Reality –
आज जो भी सूचनाएं सम्प्रेषित हो रही हैं ख़ास कर आधुनिक सञ्चार क्रान्ति के दौर में मानव को दिग्भ्रमित करने वाली हैं क्योंकि उनमें सच और झूठ का सम्मिश्रण है। प्रसारित ज्ञान का स्तर अलग स्तर का है जिसमें सच के साथ झूठ की चाशनी भी है कहीं इसके पीछे आर्थिक लाभ है तो कहीं सामाजिक विघटन के बीज रोपित होते हुए दीख पड़ते हैं। आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स (A. I) की व्यवस्था ने और उलझन पैदा कर दी है। सच और झूठ की पहचान और भी दूभर हो गयी है। विविध जिम्मेदार चैनल नीर क्षीर विवेक का प्रयास कर सच को आवाम के सामने रखने का क्षमता भर प्रयास करते हैं फिर भी बहुत सी सूचनाओं की जाँच नहीं हो पाती।
अतः जनमानस को स्वविवेक के आधार पर विश्लेषण करना होगा। उत्तेजना पैदा करने वाले लोग इन भोले भाले लोगों को अपना शिकार बना लेते हैं। डिजिटल अरेस्ट इसी तरह का एक झूठ को आलम्ब देता हुआ प्रयास है।
Role of Information in human life / मानव जीवन में सूचना की भूमिका –
अत्याधिक सुख या दुःख की एक सूचना मानव जीवन को समाप्त करने की क्षमता रखती है और फिर हार्ट अटैक जैसी बातों को प्रश्रय मिलता है एक सूचना जीवन में उत्साह का संचरण करने की क्षमता रखती है। इससे समूचा जीवन प्रभावित होता है। प्रेरणा प्रदान करने की ताक़त सूचना सम्प्रेषण से ही विविध सकारात्मक आयाम पाती है। सेना की जीत हो या टीम की विजय, आलम्ब यह सूचना या विचार सम्प्रेषण ही बनता है। जहाँ एक सूचना या विचार किसी को आत्महत्या हेतु प्रेरित करता है वहीं एक विचार या सूचना बहुत से लोगों को आत्म ह्त्या से दूर रहने की संचेतना विकसित करती है। अद्भुत आकाश है सूचनाओं की इस विलक्षण दुनियाँ का।
POSITIVE INFORMATION INTAKE MAKE YOUR PERSONALITY/ सकारात्मक सूचना संग्रहण आपकाव्यक्तित्व निर्माणक –
हमारा मानस शरीर के प्रत्येक हिस्से की सञ्चेतना रखता है और किसी भी हिस्से पर होने वाले किसी भी प्रभाव के प्रति मस्तिष्क जागरूक रहता है। इसी तरह जो सूचनाएँ आज पटल पर हैं उनमें से जब मानस केवल सकारात्मक सूचनाओं का अवलम्ब लेना सीख जाता है तब व्यक्तित्व के गढ़ने की शुरुआत होती है।
आज अद्भुत समय है हमारे हजारों मित्र हैं विविध सोशल प्लेटफार्म पर बहुत से लोग सभी से जुड़े होते हैं बहुत से रिश्ते बनते हैं लेकिन वो कन्धा मिलना मुश्किल होता है जो अवलम्ब बने। इन परिस्थितियों में सकारात्मक अवलम्ब सूचना के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण से आता है। जिस प्रकार की संवेदनशीलता मष्तिष्क शरीर के प्रत्येक अवयव के प्रति रखता है वैसा संवेदनशील शील व्यक्तित्व सकारात्मक सूचनाओं के संग्रहण से आधारिक अवलम्ब प्राप्त करता है और निम्न बदलाव दृष्टिगत होते हैं। –
01 – व्यापक दृष्टिकोण / Broad Vision
02 – सहृदयता / Kindness
03 – सम्यक व्यवहार / Righteous Behavior
04 – भेदभाव परक चिन्तन का अन्त / End of Discriminatory Thinking
05 – विशिष्ट जागरूकता / Special Awareness
06 – सर्वजन के प्रति संवेदनशीलता / Sensitivity to All
07 – निर्भयता / Fearlessness
08 – स्वानुशासन / Self-Discipline
09 – स्वास्थय सचेतता/ Health Awareness
सृजनात्मक व विध्वंशक / Creative and Destructive –
सूचनाएं दो धारी तलवार की तरह हैं इनमें सृजन की अपूर्व क्षमता है तो विनाश के बीज भी छिपे हैं। हमारी जागरूकता ही हमारे दृष्टिकोण में सृजन के तत्व उद्भवित कर सकती है सच मानिये -सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। समाज में अलग अलग वैचारिक आधार वाले लोग रहते हैं जिनपर इन सूचनाओं का प्रभाव भी अलग होता है। मिथ्या सूचनाएं या विध्वंशात्मक सूचनाएं जान बूझ कर अराजक तत्वों द्वारा समाज में पहुंचाई जाती हैं जिसका घातक असर कई बार दृष्टिगत हो चुका है। आजकल कई राजनैतिक दल भी इस मिथ्या प्रचार को हवा देकर वातावरण को विषाक्त करने का कार्य कर रहे हैं
अन्ततः सार रूपेण कहा जा सकता है कि इन सूचनाओं के प्रति नीर क्षीर विवेक जाग्रत करने की नितान्त आवश्यकता है। हमारे शिक्षालयों की इसमें महती भूमिका है। ऐसे विषाक्त पाठ्यक्रम को भी हटाने की आवश्यकता है जो समाज की सहृदयता छीनकर उसमें कट्टरता का जहर फैलाने का कार्य करते हैं। सूचनाओं के प्रति सम्यक विश्लेषण व संश्लेषण परमावश्यक है इसलिए तुरन्त किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न की जाए। बुद्धिजीवी वर्ग की भी जिम्मेदारी है की वह सत्य स्थापन में अपनी भूमिका का निर्वहन करे। ।
(Knowledge generation and child centered education / ज्ञान सृजन और बाल केंद्रित शिक्षा)
स्कूल और स्कूल के बाहर, ज्ञान सृजन और बाल केंद्रित शिक्षा से आप क्या समझते हैं। What do you understand by knowledge generation and child-centered education, in and out of school ?
बाल केन्द्रित ज्ञान Child Centered Knowledge –
जब ज्ञान को इस प्रकार अधिगमित कराने का प्रयास होता है कि उसके केन्द्र में बालक होता है तब इसे बाल केन्द्रित ज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें अधिगम विषयवस्तु बालक की रूचि, आवश्यकता व क्षमता पर आधारित होती है। इस प्रक्रिया में बालक की रचनात्मक क्षमता को क्रियाशील इस प्रकार किया जाता है जिससे वह प्राकृतिक तरीके से जिज्ञासु बने और अपने आप करके सीखने की ओर प्रवृत्त हो।
स्कूल में बाल केन्द्रित ज्ञान / Child Centered Knowledge in School –
स्कूल में बाल केन्द्रित ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए सामान्यतः निम्न कारकों के सकारात्मक प्रयोग करने का प्रयास रहता है।
01 – नैतिक शिक्षा आधारित कहानियों द्वारा / Moral lessons based stories
02 – खेल द्वारा शिक्षण /Learning through play
03 – विज्ञान प्रयोगशाला का व्यवस्थित प्रयोग /Systematic use of the science laboratory
04 – परियोजना पद्धति या करके सीखने जैसी शिक्षण विधियों का उपयोग।/ Use of teaching methods such as project method or learning by doing
05 – व्यावहारिकता का सम्मिश्रण / A blend of practicality
06 – पलायनवादिता का पूर्ण परित्याग / Complete abandonment of escapism
07 – नीर क्षीर विवेक जागरण / Awakening the discernment between right and wrong
08 – पाठ्यक्रम में सकारात्मक परिवर्तन /Positive changes in the curriculum
स्कूल के बाहर बाल केन्द्रित ज्ञान / Child-centered learning outside of school –
01 – अनुभव आधारित अधिगम व्यवस्था / Experiential Learning System
05 – रूचि आधारित सञ्चार सामिग्री का विकास / Development of interest-based communication materials
06 – शैक्षिक वृत्त चित्र / Educational Documentary
07 – सामाजिक कौशल / Social Skills
08 – विविध टोलियों का सकारात्मक कार्य / Positive Work of Various Groups
09 – आत्म निर्भरता विधियों का सम्यक विकास / Proper Development of Self-Reliance Methods
स्कूल के बाहर बाल केन्द्रित शिक्षा की बात हो या स्कूल के अन्दर बाल केन्द्रित शिक्षा की बात, एक तरह से यह देश की आधार शिला को सशक्त बनाने का महत्त्वपूर्ण उपागम है। अतः सरकारी और गैर सरकारी मष्तिष्कों को इस दिशा में गम्भीर प्रयास करने होंगे। व्यक्तिगत स्तर पर भी उन्नयन को अंगीकार करने के साथ इसे जन आन्दोलन का रूप दिए जाने की आवश्यकता है। शैक्षिक उन्नयन के साथ सङ्कीर्ण मानसिकता के तिरस्कार की आवश्यकता है।
आज की दुनियाँ में यह देखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति अपने सामंजस्य पूर्ण व्यवहार से अधिकाँश लोगों के साथ तालमेल बैठा लेता है और कोई नहीं। जब कोई भी व्यक्ति समाज की अपेक्षाओं, विविध परिस्थितियोँ और वातावरण के साथ ताल मेल नहीं बैठा पाता तो उसे कुसमायोजित व्यक्ति कहा जाता है और इस व्यवहार को कुसमायोजन कहा जाता है। कुसमायोजन की स्थिति में सन्तुलन बिगड़ जाता है आवश्यकतानुसार व्यवहार दिखाई नहीं पड़ता।
कुसमायोजन (Maladjustment) से आशय –
कुसमायोजन (Maladjustment) एक तरह की व्यवहारिक व मानसिक स्थिति है, जिसमें प्रभावित मानव अपने वातावरण, परिस्थितियों व स्वयं के साथ प्रभावी ढंग से सामन्जस्य बैठाने में असफल रहता है। इसके सामान्यतः तनाव, अवसाद, चिन्ता, अत्याधिक क्रोध, सामाजिक अलगाव, अल्प आत्मविश्वास व हीन भावना का मानव व्यक्तित्व में प्रभाव बढ़ जाता है।
कुसमायोजन की परिभाषायें–
क्रो एवं क्रो महोदय ने इस सम्बन्ध में कहा –
“कुसमायोजन (Maladjustment) तब होता है जब व्यक्ति की आवश्यकताओं और उसकी संतुष्टि से संबंधित परिस्थितियों के बीच कोई संबंध नहीं रह जाता है।”
आंग्ल अनुवाद
“Maladjustment occurs when there is a disconnect between the individual’s needs and the circumstances that satisfy them.” -Crow and Crow
Dictionary.com के अनुसार –
“कुसमायोजन अपने परिवेश की मांगों पर सफलतापूर्वक और संतोषजनक ढंग से प्रतिक्रिया करने में असमर्थता है”।
आंग्ल अनुवाद –“Maladjustment is the inability to respond successfully and satisfactorily to the demands of one’s environment”.
मनोवैज्ञानिक शब्दकोश (Psychological Dictionary) के अनुसार:
“कुसमायोजन एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति वातावरण या जीवन की माँगों के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहता है।”
“Maladjustment is a condition in which a person fails to cope with the demands of the environment or life.”
विविध मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि –
कुसमायोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने व्यवहार को सामाजिक या व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार समायोजित नहीं कर पाता है।
उक्त विवेचन के आधार पर इस व्यावहारिक परिभाषा को स्वीकार किया जा सकता है –
यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति की आवश्यकताओं और वातावरण के बीच सामंजस्य नहीं बन पाता, और वह अजीब या संघर्षपूर्ण व्यवहार करने लगता है।
कुसमायोजन के कारण/Causes of maladjustment–
मानव के कुसमायोजित होने के पीछे बहुत से कारण हैं उनमें से प्रमुख कारणों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
01 – पारिवारिक वातावरण।Family environment.
02 – शारीरिक कारण।/Physical reasons.
03 – मानसिक कारण। /Mental reasons.
04 – सामाजिक कारण।/ Social reasons
05 – आर्थिक कारण ।/ .Economic reasons
06 – निराशाजन्य अनुभव।/Depressing experiences.
07 – व्यक्तिगत कारण/ Personal reasons.
08 – क्षेत्र विशेष के कारण / Reasons specific to the area
09 – शैक्षणिक कारण / Educational reasons
कुसमायोजन का निदान व उपचार (Diagnosis & Remedies of Maladjustment) / Diagnosis and treatment of maladjustment –
कुसमायोजित व्यक्ति को स्वस्थ जीवन में वापस लाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
01 – सम्यक प्रेरणा व निर्देशन /Proper motivation and guidance
02 – प्रेमपूर्ण और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार / Loving and compassionate behavior
03 – सकारात्मक वातावरण / Positive environment
04 – परामर्श (Counseling)
05 – स्वस्थ वातावरण / Healthy environment
06 – रुचि के अनुसार कार्य / Work according to interests
07 – मानसिक चिकित्सा / Psychiatric therapy
08 – शारीरिक चिकित्सा / Physical therapy
09 – सामंजस्य शक्ति विकास कार्यक्रम / Cohesion development program
10 – सामाजिक कौशल विकास / Social skills development
सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि भावात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक पक्ष का विकास शिक्षा शिक्षण के माध्यम से किया जाता है। इसमें से क्रियात्मक पक्ष के मूल्यांकन हेतु प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। पहले भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि, सङ्गीत, व्यावसायिक विषय, कौशल, प्रशिक्षण कार्य क्रम, भूगोल आदि में प्रयोगात्मक परीक्षा का चलन था पर वर्तमान में हिन्दी, अंग्रेजी, विविध मानविकी विषय में भी प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। कुछ विषयों की उपलब्धियों का मूल्याङ्कन प्रयोगात्मक परीक्षा के बिना संभव ही नहीं है। विद्यार्थियों के विकास के दृष्टिकोण से इन परीक्षाओं का विशेष महत्त्व है।
प्रयोगात्मक परीक्षा के उद्देश्य / Objectives of Practical Examination :-
01 – लिखित परीक्षा के पूरक के रूप में / To supplement the written examination
02 – उपलब्धियों के व्यावहारिक मापन व मूल्यांकन हेतु / For practical measurement and evaluation of achievements
03 – शिक्षार्थियों के सम्यक विकास हेतु / For the holistic development of learners
04 – यथार्थ वाद के उद्देश्यों की पूर्ति / To fulfill the objectives of realism
05 – कौशल विकास का मूल्यांकन / Assessment of skill development
06 – क्रियात्मक विकास का मूल्यांकन / Assessment of functional development
07 – विद्यार्थियों के व्यक्तित्व गठन हेतु / For personality development of students
08 – जीवन के यथार्थ अवलम्बन हेतु / For real life support
प्रयोगात्मक परीक्षा की प्रविधियाँ / Techniques of Practical Examination
01- प्रदत्त कार्य मूल्याङ्कन / Assigned Task Evaluation
02 – व्यावहारिक कार्य मूल्यांकन / Practical Task Evaluation
03 – निरीक्षण व मौखिक का सम्यक सम्मिश्रण / A Proper Combination of Observation and Oral Testing
04 – क्रिया सम्पन्नता मूल्यांकन / Activity Completion Evaluation
05 – यथार्थ गणना के आधार पर / Based on accurate calculations
06 – Proper use of equipment
06 – उपकरणों का यथोचित प्रयोग / Proper use of equipment
07 – परिणाम मूल्यांकन /Result evaluation
08 – कार्य व पृच्छा के आधार पर / Based on tasks and questions
प्रयोगात्मक परीक्षा की विशेषताएं / Features of the practical exam
01 – ज्ञानात्मक व्यावहारिकता व उपयोगिता का मूल्याङ्कन / Evaluation of cognitive practicality and utility
02 – क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों का मूल्यांकन / Evaluation of practical objectives
03 – ज्ञान व कौशल मूल्यांकन / Assessment of knowledge and skills
04 – रुचियों का मूल्यांकन / Assessment of interests
05 – व्यक्तिगत क्षमता का मूल्यांकन / Assessment of individual abilities
06 – नकल पर पूर्ण प्रतिबन्ध / Complete prohibition of cheating
07 – व्यावहारिक स्थितियों में मूल्यांकन / Assessment in practical situations
08 – विश्वसनीयता व वैधता में सकारात्मक वृद्धि / Positive increase in reliability and validity
प्रयोगात्मक परीक्षा के दोष / Limitations of Experimental Examination –
प्रश्न – शिक्षण व्यूह रचना से समझते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। शिक्षण व्यूह रचनाओं के प्रकार बताइए।
Question – What do you understand by teaching strategy? Describe its main characteristics. Explain the types of teaching strategies.
शिक्षण व्यूह रचना से आशय / Meaning of teaching strategy-
शिक्षण व्यूह रचना से आशय शिक्षक द्वारा बनाई गई उस योजना से है जो वह अधिगम को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए बनाता है। रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर शिक्षण व्यूह रचना के बारे में कहा –
“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”
आंग्ल अनुवाद
“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”
शिक्षण व्यूह रचना सचमुच अधिगम को प्रभावी बनाने का कारगर उपाय है। इसी लिए ई स्टॉंस व मौरिस (1972) ने अपनी पुस्तक टीचिंग प्रैक्टिस प्रॉब्लम्स एण्ड पर्स्पेक्टिव्स में कहा –
“शिक्षण व्यूह रचना से तात्पर्य किसी पाठ के शिक्षण हेतु अपनाई गई उस सामान्यीकृत योजना से है जिसमें संरचना, अनुदेशनात्मक उद्देश्यों के रूप में वांछित विद्यार्थी व्यवहार तथा व्यूह रचना को प्रयोग में लाने के लिए आवश्यक युक्तियों की रूपरेखा का समावेश हो।”
“Teaching strategy is a generalized plan for a lesson which includes structure, desired learner behaviour in terms of goals of instruction and an outline of planned tactics necessary to implement the strategy.”
शिक्षण व्यूह रचना की प्रमुखविशेषताएं/ Special features of teaching strategy –
01 – इसके माध्यम से पाठ के निर्धारित उद्देश्य प्राप्ति सुगम हो जाती है।
02 – शिक्षण व्यूह रचना के माध्यम से अधिगम प्रभावी व विशेष उद्देश्यों के प्रति समर्पित किया जा सकता है।
03 – शिक्षण व्यूह रचना द्वारा अधिगम पूर्ण होता है कोइ अंश छूट नहीं पता।
04 – शिक्षण युक्ति के माध्यम से शिक्षण आव्यूह को सशक्त बनाया जाता है।
05 – इसमें प्रमुख ध्यान अधिगम उद्देश्य की प्राप्ति पर रहता है जो अनुशासन की व्यवस्था स्वयमेव कर देता है।
06 – अलग अलग तरह के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर एक ही पाठ के लिए पृथक शिक्षण व्यूह रचना है।
07 – शिक्षार्थियों द्वारा मिलने वाले पृष्ठ पोषण के आधार पर शिक्षण व्यूह रचना में परिवर्तन किया जाता है।
08 – इसका लचीलापन इसे विविध परिस्थितियों में सफल बनाता है।
09 – इसमें शिक्षार्थी, शिक्षण अधिगम उद्देश्य व शिक्षण व्यूह रचना का व्यावहारिक संतुलन दृष्टव्य होता है।
10 – इसमें आवश्यकता, रुचियाँ, अधिगम परिस्थितियों और सुविधाओं का सम्यक सम्मिश्रण मिलता है।
शिक्षण व्यूह रचना के प्रकार / Types of teaching strategies –
भारत में अध्यापन एक परम पवित्र कार्य है इसकी व्यूह रचना जिस तरह की जाती है उसमें देखा जा सकता है एक में अध्यापक अधिनायक की तरह से कार्य करता दीखता है और दूसरे में व्यूह रचनाएं जनतांत्रिक रूप से किया जाता है दोनों आधार पर बनने वाली विविध व्यूह रचनाओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –
[A ] – अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचनाएं –
01 – व्याख्यान व्यूह रचना / Lecture Strategy
02 – वर्णन व्यूह रचना / Narrative Strategy
03 – विवरण व्यूह रचना / Description Strategy
04 – व्याख्या व्यूह रचना / Explanation Strategy
05 – प्रदर्शन व्यूह रचना / Demonstration Strategy
06 – ट्यूटोरियल व्यूह रचना / Tutorial Strategy
07 – दृष्टांत व्यूह रचना / Illustrations Strategy
08 – अभिक्रमित अनुदेशन व्यूह रचना / Programmed Instruction Strategy
उक्त सम्पूर्ण व्यूह रचनाएं यह उद्घोषणा करती हैं कि शिक्षा को समय के साथ चलने के लिए इन व्यूह रचनाओं का सम्यक प्रयोग आवश्यक है और प्रशिक्षण महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे सूक्ष्म शिक्षण की तरह तैयारी करानी होगी।
भारत में व्यूह शब्द आते ही अभिमन्यु का स्वाभाविक ध्यान आता है जो चक्र व्यूह का अन्तिम द्वार तोड़ने में इस लिए असफल रहा क्योंकि उसको भेदन का ज्ञान मिल नहीं पाया था ठीक इसी तरह यदि अध्यापक शिक्षण अधिगम को प्रभावी बनाना चाहता है तो सही व्यूह रचना परम आवश्यक है अपने उद्देश्य के साथ सम्पूर्ण तत्सम्बन्धी ज्ञान उसके पास होता है एक सही व्यूह रचना उसे अवश्य उद्देश्य प्राप्ति में सफल बनाएगी।
रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर बताया –
“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”
आंग्ल अनुवाद
“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”
व्याख्यान व्यूह रचना से आशय / Meaning of lecture strategy –
आदिकाल से भारत में इस व्यूह रचना का प्रयोग होता रहा है पहले गुरु चबूतरे पर बैठकर और शिष्य भूमि पर बैठ कर इसका लाभ लेते रहे हैं। आज विद्यार्थी बैठ कर और अध्यापक खड़े होकर इस व्यूह रचना का लाभ लेते हैं। यद्यपि इसकी गणना अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचना के तहत आती है लेकिन इसके माध्यम से सम्पूर्ण अधिगम परिक्षेत्र से शिक्षार्थी का परिचयीकरण ही नहीं बल्कि साक्षात्कार हो जाता है और वे अपनी पात्रता के अनुसार उसे अधिगमित करते हैं। व्याख्यान व्यूह रचना एक महत्त्वपूर्ण व्यूह रचना है इस सम्बन्ध में रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकीके 2014के संस्करण में पृष्ठ 243 पर बताया –
“व्याख्यान व्यूह रचना से अभिप्राय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाये जाने वाले ऐसे प्रारूप या कार्य योजना से है जिसके द्वारा वह किसी विषय विशेष के एक अंश या इकाई को इस प्रकार प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है ताकि विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक एवं भावात्मक व्यवहार से सम्बन्धित विशिष्ट शिक्षण अधिगम उद्देश्यों की उपलब्धि ठीक प्रकार की जा सके।”
“Lecture strategy” means a format or plan of action designed and used by a teacher. By which he tries to present a part or unit of a particular subject in such a way So that specific teaching-learning objectives related to the cognitive and emotional behaviour of students can be achieved properly.”
व्याख्यान व्यूह रचना से लाभ / Benefits of Lecture Strategy –
वह व्यूह रचना जो तमाम आलोचनाओं से जूझ कर अधिगमार्थियों व शिक्षाविदों को लाभ दे रही है उसके लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –
01 – शिक्षण गतिविधियों पर स्वइच्छानुसार अंकुश / Voluntary control of teaching activities
02 – सृजनात्मकता, विश्लेषण व मूल्याङ्कन हेतु सम्यक चिंतन का विकास / Developing critical thinking for creativity, analysis, and evaluation
03 – मितव्ययी व्यूह रचना / Economical strategy
04 – प्रेरणात्मक वातावरण सृजन में सहयोगी / Helps create an inspiring environment
05 – लचीलापन / Flexibility
06 – विचारों, अवधारणाओं की श्रंखलाबद्ध प्रस्तुति सम्भव / Performs a systematic presentation of ideas and concepts
07 – तार्किक नियोजन / Logical planning
08 – व्यक्तित्व के गुणों की छाप छोड़ना सम्भव / It is possible to leave an impression of personality traits
09 – व्यवहार के भावात्मक पक्ष को सकारात्मक दिशा देना सम्भव / It is possible to give positive direction to the emotional aspect of behavior
व्याख्यान व्यूह रचना की सीमाएं / Limitations of Lecture Strategy –
02 – रूचि, आवश्यकता व योग्यता स्तर का ध्यान नहीं / Not considering interest, need, and ability levels
03 – एक पक्षीय सम्प्रेषण / One-sided communication
04 – प्रयोगात्मक कौशलों व क्रियात्मक गतिविधियों का अभाव / Lack of practical skills and hands-on activities
05 – केवल शाब्दिक सम्प्रेषण की सफलता सन्दिग्ध / The success of verbal communication alone is questionable.
06 – शिक्षण अधिगम से अर्जित अनुभव के प्रयोगीकरण का अभाव / Lack of application of teaching-learning experience.
07 – अपूर्ण व त्रुटिपूर्ण ज्ञान सम्प्रेषण सम्भव / Incomplete and inaccurate knowledge transmission is possible
08 – पुनरावृत्ति व विषय से भटकाव / Repetition and distraction
09 – आवश्यक तैयारी व कुशल सम्प्रेषण का अभाव / Lack of necessary preparation and effective communication
10 – स्मृति स्तर को चिन्तन स्तर से प्रभावी मानना / Believing the memory level as more effective than the thinking level
व्याख्यान व्यूह रचना को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सुझाव / Suggestions for making Lecture Strategy more effective –
यदि हम सम्पूर्ण व्याख्यान को उसके अलग अलग हिस्सों में बांटे तो यह स्पष्ट होगा कि व्याख्यान में नियोजन, प्रस्तुतीकरण और मूल्याङ्कन के रूप में तीन महत्त्वपूर्ण चरण समाहित हैं। इसलिए इस प्रत्येक चरण में सुधार अपेक्षित होंगेजिन्हे इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है। –
[A] – नियोजन सम्बन्धी सुझाव / Planning tips
01 – पूर्व ज्ञान व विषय वस्तु का सम्बन्ध विवेचन।/ Analysis of the relationship between prior knowledge and subject matter
02 – स्पष्ट उद्देश्य निर्धारण / Crystal Clear objective setting;
03 – अधिगम स्तर आधारित सम्प्रेषण / Learning level based communication
04 – विषय वस्तु पर अधिकार / Mastery of the subject matter
05 – आत्मविश्वास युक्त सम्प्रेषण / Confident communication
06 – विविध विश्वसनीय ज्ञान स्रोतों से विषयवस्तु का चयन / Selecting content from a variety of reliable knowledge sources
07 – अधिगम -शिक्षण प्रभावी वातावरण सृजन / Creating an effective learning – teaching environment
08 – रूचि, ध्यान, उत्साह का सम्यक सृजन / Properly cultivate interest, attention and enthusiasm.
09 – विविध विधियों व सहायक साधनों का सम्यक प्रयोग / Properly utilize various methods and aids.
[B] – प्रस्तुतीकरण सम्बन्धी सुझाव / Presentation tips –
01 – प्रभावी अधिगम हेतु निरन्तर सजगता व क्रियाशीलता / Constant alertness and activity for effective learning
02 – उत्साहयुक्त प्रभावी सम्प्रेषण / Enthusiastic and effective communication
03 – क्रमबद्ध व तार्किक आधार / Systematic and logical approach
04 – अधिगम उद्देश्यों पर विशेष ध्यान / Focus on learning objectives
05 – सार्वजनिक संबोधन प्रणाली का उपयोग /use of public address system
06 – आवश्यकतानुसार विविध विधियों का प्रयोग / Use a variety of methods as needed
07 – नवीनतम श्रव्य दृश्य साधनों का प्रयोग / Use the latest audio-visual aids
08 – आवश्यकतानुसार साझेदारी का प्रयोग / Use partnerships as needed
09 – महत्त्वपूर्ण तथ्य व सूचना सम्प्रेषण का रेखाङ्कन / Outline of important facts and information communication
10 – पुनरावृत्ति व भटकाव से सावधान / Beware of repetition and deviation
02 – अधिगम स्तर उन्नयन मूल्याङ्कन/ Learning Level Improvement Assessment
03 – व्याख्यान आधारित अधिगम मूल्यांकन / Lecture-Based Learning Assessment
04 – पक्षपात रहित सम्यक प्रश्न वितरण / Fair, Unbiased Question Distribution
05 – उद्देश्य आधारित मूल्यांकन / Objective-Based Assessment
06 – पृष्ठ पोषण के निर्देशों पर ध्यान / Follow nutrition guidelines
07 – प्रश्नावली या मौखिक प्रश्नों द्वारा / Through questionnaires or oral questions
08 – सतत स्व आलोचनात्मक मूल्यांकन / Continuous self-critical assessment
प्रस्तुत समस्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी कौशल या व्यूह रचना में निरन्तर परिमार्जन की गुन्जायिश बनी रहती है लेकिन अपनी सजगता से इसे काफी प्रभावी बनाया जा सकता है नए सम्प्रत्ययों, विश्वसनीय सूचनाओं, आगामी जानकारियों और नवीनतम ज्ञान का प्रयोग कर व्याख्यान को निरंतर समृद्ध करने की आवश्यकता हमेशा रहेगी। निरन्तर छोटे तथ्यों नवीनतम ज्ञान व तार्किक क्रमबद्ध सम्प्रेषण द्वारा व्याख्यान और प्रभावी बन पड़ेगा। आवश्यकता है विविध परिस्थितियों में सम्यक समायोजन की।
ब्रह्माण्ड के यथार्थ स्वरुप और उसमें मनुष्य के जीवन की तात्त्विक विवेचना तत्त्व मीमांसा के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसी के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य और उनकी प्राप्ति के उपाय विवेचित किये जाते हैं और इस आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि जीवन दर्शन के आधार पर समाज के उद्देश्य निर्धारित होते हैं जिन्हें शिक्षा अपना उद्देश्य बना लेती है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षा के विविध अंग सहयोग करते हैं इसीलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण विधि , शिक्षक, विद्यार्थी, अनुशासन सभी जीवन दर्शन के आलोक में क्रियान्वित होते हैं। अतः यह पूर्णतया स्पष्ट है कि इन सभी शिक्षा के अंगों का विकास तत्त्व मीमांसा के आधार पर होता है।
विविध दर्शन की तात्त्विक विवेचना हमें बताती है कि विविध दर्शन चाहे वह आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, प्रयोजनवाद, अस्तित्ववाद कोई भी हो। तत्त्व मीमांसा में उसकी व्याख्या का प्रभाव इनके शैक्षिक उद्देश्यों व इसके अन्य अंगों पर पड़ता है जिसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।
तत्त्व मीमांसा और शिक्षा के विविध घटक
Metaphysics and various components of education
शिक्षा के विविध घटकों की तत्त्व मीमांसात्मक विवेचना निम्न शिक्षा के उद्देश्य स्व आलोक में प्रस्तुत करती दीख पड़ती है –
A –शिक्षा के उद्देश्य –
01 – शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य / Social objectives of education – सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा इस प्रकार करती है जिससे मानव समाज से सामंजस्य बिठाकर समाज ,राज्य, राष्ट्र सबकी प्रगति में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। बॉसिंग महोदय कहते हैं कि
“The function of education is concerned to be the adjustment of man to environment and that the most enduring satisfaction may accrue (अक्रू= अर्जित) to the individual and to the society.”
“शिक्षा का कार्य मनुष्य को पर्यावरण के अनुरूप ढालना है और यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति और समाज दोनों को ही सबसे स्थायी संतुष्टि प्राप्त हो।”
02 – व्यक्तित्त्व का पूर्ण विकास / Complete development of personality – शिक्षा के द्वारा समग्र क्षमताओं का सम्यक विकास होना चाहिए जैसा कि गांधीजी ने कहा –
“By education I mean an all round drawing out of the best in child and man – body, mind and spirit.”
“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के भीतर की सर्वोत्तम विशेषताओं – शरीर, मन और आत्मा – को समग्र रूप से बाहर निकालना है।”
03 – चारित्र, ज्ञान व स्वस्थ आदतों का विकास /Development of character, knowledge and healthy habits. – इस तरह के विकास से सामान्यतः सभी दार्शनिक सहमति रखतेहैं जैसाकि ड्रेवर महोदय का विचार है –
“Education is a process in which and by which the knowledge, character and behavior of the young are shaped and molded.”
“शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा युवाओं के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को आकार दिया जाता है।”
04 – पूर्ण जीवन की तैयारी का उद्देश्य / The purpose of preparing for a fulfilling life –
हर्बर्ट की तरह कई विद्वान् पूर्ण जीवन की तैयारी पर बल देते हैं जैसाकि डीवी महोदय ने भी कहा –
“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”
“शिक्षा व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने परिवेश को नियंत्रित करने और अपनी संभावनाओं को पूरा करने में सक्षम बनाएंगी।”
05 – समग्र व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य / Aim for holistic personal development – बालक में निहित गुणों के विकास की बात विविध दर्शन करते हैं इन्ही विचारों से सहमति जताते हुए विवेका नन्द जी कहतेहैं –
“Education is the manifestation of perfection already in man”
“शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”
06 – सभी स्थितियों में सामंजस्यपूर्णता का उद्देश्य / Aim for harmony in all situations –
जीविकोपार्जन की क्षमता हासिल करना हो या प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को ढालना, शिक्षा और इससे जुड़े दर्शनों की तात्त्विक विवेचना उसे सामंजस्यपूर्ण बनाने पर जोर देती है। जैसा कि रबीन्द्र नाथ टैगोर के इन शब्दों से दृष्टिगत होता है। –
“The highest education is that which does not merely give us information but makes our life in harmony with all existence.”
“सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंज स्यपूर्णबनाती है।”
B- शिक्षा का पाठ्यक्रम / Curriculum of education –
जहाँ आदर्शवादी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के साथ नैतिकता को पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं वहीं प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में स्वानुभव विविध विज्ञान, गणित आदि के स्थापन के साथ इन्द्रिय प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं। प्रयोजनवादी सामाजिक तात्कालिक समस्याओं से सम्बंधित विषयों का चयन करना चाहते हैं।