सम्बन्धित साहित्य का पुनः अवलोकन
व्यावहारिक रूप से यह समस्त तत्सम्बन्धी शोध विषय को ज्ञानात्मक धरातल उपलब्ध कराता है मानव के पास विश्लेषणात्मक बुद्धि है जहाँ वह अपने चिन्तन मन्थन को तर्क सङ्गत समझता है वहीं दूसरे विद्वान जो उस विषय पर पहले कार्य कर चुके होते हैं उसके लिए प्रकाश स्तम्भ का कार्य करते हैं। तत्सम्बन्धी ज्ञान सङ्कलन, हस्तान्तरण और सम्वर्धन में शोध की महती भूमिका होती है।
* * सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय व परिभाषा / Meaning and definition of the study of related literature –
शोधार्थी को वैचारिक आधार पूर्व के शोध अध्ययन व तत्सम्बन्धी साहित्य से मिलता है असल में हर बार कार्य प्रारम्भ से शुरू अधिक समय लेगा इसलिए पूर्व शोध जो नींव तैयार करते हैं नई इमारत उस पर मजबूती से खड़ी होती है पूर्व शोध कार्यों का लाभ उठाते हुए उनके निष्कर्ष, उनके अनुभव, उनका विश्लेषण नए शोधार्थियों को काफी कुछ सचेत कर देता है। सम्बंधित साहित्य का अध्ययन एक आवश्यक व वैज्ञानिक चिन्तन का परिणामी चरण है।
सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय उस साहित्य से है जो विषयानुकूल है और जिसके प्रदत्त प्रस्तुत शोध में सहायक हो सकते हैं यह कलेवर नवीन शोध हेतु दिशा बोधक का कार्य करता है और पलायनवादी सोच विकसित होने से पूर्व व्यावहारिक धरातल प्रदान करता है। इस समस्त ज्ञान को शोधार्थी अपने प्राप्त कलेवर में जोड़ता है और विकास के नए अग्रिम सोपान तय करता है।इस सम्बन्ध में जॉन डब्लू बेस्ट का मानना है कि –
“व्यावहारिक रूप में सम्पूर्ण ज्ञान पुस्तकों और पुस्तकालयों में मिल सकता है। अन्य प्राणियों से भिन्न मानव को अतीत से प्राप्त ज्ञान को प्रत्येक पीढ़ी के साथ नए ज्ञान के विस्तृत भण्डार के रूप में प्रारम्भ करना चाहिए।ज्ञान के विस्तृत भण्डार के रूप में उसका निरन्तर योगदान प्रत्येक क्षेत्र में मानव द्वारा किये गए प्रयासों की सफलता को सम्भव बनाता है।”
आँग्ल अनुवाद
“Practically all knowledge can be found in books and libraries. Humans, unlike other creatures, must build on past knowledge to create a new storehouse of knowledge with each generation. Its continuous contribution as a vast repository of knowledge makes possible the success of human endeavors in every field.”
इसी सम्बन्ध में बोर्ग महोदय का मानना है कि
“किसी भी क्षेत्र का साहित्य उसकी नींव को बनाता है, जिसके ऊपर भविष्य का कार्य किया जाता है। यदि हम साहित्य का पुनर्निरीक्षण द्वारा प्रदान किये गए ज्ञान की नींव बनाने में असमर्थ होते हैं तो हमारा कार्य सम्भवतः तुच्छ और प्रायः उस कार्य की नक़ल मात्र ही होती है जोकि पहले ही किसी के द्वारा किया जा चुका है।”
आँग्ल अनुवाद
“The literature of any field forms the foundation upon which future work is built. If we fail to build on the foundation of knowledge provided by reviewing the literature, our work is likely to be trivial and often merely a copy of what has already been done by someone else.”
* * सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन की आवश्यकता क्यों ? / Why is there a need to review the related literature?
01 – अग्रिम योजना निर्धारण
02 – मात्रात्मक व गुणात्मक विश्लेषण
03 – तत्सम्बन्धी ज्ञान के विविध ज्ञान से जुड़ने हेतु
04 – पूर्वाग्रहों से मुक्ति हेतु
05 – परिकल्पना बनाने हेतु
06 – उद्देश्य निर्धारण हेतु
07 – परिणामों व निष्कर्षों के सम्यक विवेचन हेतु
* * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का महत्त्व –
वास्तव में शोध कार्य समाज के उत्थान में व्यक्ति या शोधार्थी का सहयोग है। उसे जब यह पता होता है कि इस क्षेत्र में इतना कार्य हो चुका है तब वह उसका आधार से आगे अपने कार्य को अंजाम देगा अन्यथा पुनरावृत्ति की संभावना रहेगी।इसके महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है।–
01 – अनुसन्धान सम्बन्धी ज्ञान सम्वर्धन
02 – दिशात्मक बोध हेतु
03 – परिकल्पना निर्माण हेतु
04 – उद्देश्य निर्धारण व स्पष्टीकरण
05 – दोहराव से बचाव
06 – उपकरण चयन
07 – शोध सामग्री एकत्रीकरण हेतु
08 – विधि निर्धारण में
09 – आत्म निरीक्षण व परिमार्जन
10 – शोध परिणाम विश्लेषण
11 – सुझावों के समृद्धीकरण में
* * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का उद्देश्य / The purpose of re-observation in research work –
शोध कार्य में गम्भीरता व दिशात्मक बोध जागरण और अधिक प्रभावी हो जाता है जब शोधार्थी उद्देश्य के सम्बन्ध में क्रिस्टल क्लियर होता है। किसी भी अनुसंधान के पुनः अवलोकन के पीछे निम्न उद्देश्य कहे जा सकते हैं। –
01 – व्याख्या, सिद्धान्त, परिकल्पना प्रदत्तीकरण
02 – यथार्थ अवलम्बन
03 – परिकल्पना निर्धारण
04 – सम्यक विधियों व तथ्य सङ्कलन में सहायक
05 – सांख्यिकीय विश्लेषण निर्धारण
06 – तुलनात्मक विवेचन
07 – निष्कर्ष विवेचन
08 – सकारात्मक चिन्तन व धैर्य सम्वर्धन
09 – सीमाएं, सुधार व अंर्तदृष्टि विकास
10 – समस्या का समुचित समाधान
* * सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन स्रोत / Review sources of related literature –
01 – पत्र पत्रिकाएं
02 – तत्सम्बन्धी पुस्तकें
03 – पाठ्य सामग्री
04 – मासिक, त्रैमासिक, अर्ध वार्षिक, वार्षिक शोध समीक्षाएं
05 – विश्वकोश
06 – लघु शोध व शोध ग्रन्थ
07 – विशिष्ट शब्द कोष
08 – शोध ग्रन्थ सूचियां
09 – तत्सम्बन्धी वेव साइट
10 – दैनिक समाचार पत्र के विशिष्ट कॉलम
11 – शोध अध्ययन संक्षिप्तीकरण

