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काव्य

एजुकेशन आचार्य को लगना होगा।Education Aacharya ko lagna hoga.

November 26, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आलू का सोना बनाने से नहीं होगा,खुद को कुन्दन कर दिखाना होगा।

स्वप्न दिखाने से दर्शन तो नहीं होगा,भव्य श्री राम मन्दिर बनाना  होगा।

अब केवल जाग जाने से नहीं होगा,देश प्यारा है काम भी करना होगा।

दोस्तों बात करने से कुछनहीं होगा,आगेबढ़ सब करके दिखाना होगा।

अब सोचकर सो जाने से नहीं होगा,काम को अंजाम तक  लाना होगा।

केवल शिक्षण- शुल्क से नहीं  होगा,कोर्स करने कॉलेज में आना होगा।

सदा टिप -टॉप रह  घर नहीं चलता,मेहनत के गुर को,अपनाना  होगा।

हीरो दिखने से अब कुछ नही होता,पेशानी पे श्रम कण चमकाना होगा।

वासना में खोना है काम दरिन्दे का,इन्सां को ताजिन्दगी निभाना होगा।

गाल बजाने से अब कुछ नहीं होगा,जज़्बा है तो आदर्श दिखाना होगा।

खानदान वाले,जमाने अब  जा चुके,क़ुव्वत है तो मैदान में आना होगा।

प्यार से कहते हैं अब भी जागजाओ,नहीं तो झिंझोड़ कर जगाना होगा।

घबराकर छिटकजाने से नहीं होगा,जापान, चीन से सीख  बढ़ना होगा।

किसान एकबीज से बहुत करता है,उसेउसका हिस्सातो दिलाना होगा।

सिर्फ उत्पादन  बढ़ाने से नहीं होगा,उसे हाट  में ठीक से खपाना होगा।

मसखरी बहुत करी हिन्दोस्ताँ वालो,गम्भीरता से काम पर लगना होगा।

हमारे बुजुर्ग हमें यहाँतक खींच लाये,हमें कर्म की हद से गुजरना होगा।

जमाने में नकल से ही सबनहीं होगा,हिकमतेअक़ल से भी चलना होगा।

सपनों को सजाने से कुछ नहीं होगा,योग्य रण नीति को अपनाना होगा।

सिर्फ लिख कर बताने से नहीं होगा,एजुकेशन आचार्य को लगना होगा।

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काव्य

आत्मबोध भर देती है।[AATM BODH BHAR DETI H]

November 24, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

माँ बच्चे को हाथ का साथ देती है।

प्रथम गुरु रूप में योगदान देती है।

निज चेहरे पर शिकन ओढ़ लेती है

शिशु मुस्तकबिल को दिशा देती है । । 

अद्भुत पीड़ा है, जो सुकून देती है,

सब दर्दोगम सह, ओठ सी लेती  है,

शिशुमुख देख खुशी से जी लेती है,

माँ तो माँ है रो लेती है,हंस लेती है ।।

धैर्य से सारा परिवार, संजो लेती है,

अपमान के अश्रुघूँट भी पी लेती है,

अपने सपनों में नवरंग नहीं लेती है

शिशु प्रगति अरमान ले जी लेती है ।।

वह स्वयम के लिए कुछ नहीं लेती,

परिवार की झोली, भर ही देती है।

सर्व न्यौछावर कर परिवार खेती है,

तिलतिल जल घर द्वारसजा देती है।

माँ कर्जे में डूब बलैयाँ ले लेती है

वो  ममता हमें ऋणी कर देती है

तपस्वी तप को वही दिशा देती है,

जीवन मन्थन हलाहल पी लेती है ।।

भूख,चोट,पीड़ा सभी सह लेती है,

फूँक से भी अनन्त प्यार दे देती है,

जादुई फूँक में प्यार उड़ेल देती है,

हर लाल को कर्जदार कर देती है।।

समय का हर निशाँ चहरे पे लेती है

जो चीख कर हम सबसे कह देती है,

हर सलवट में वो दर्द  छिपा लेती है

खास आसविश्वास से माँ जी लेती है ।।

आँसू पी पीकर निज ग़म खा लेती है,

पावन सद आशीष हमें वो दे देती है,

यथा शक्ति सारे अवगुण हर लेती है,

नवजीवन हेतु आत्मबोध भर देती है ।।

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काव्य

आध्यात्मिक पथ, हमें घर पहुँचायेंगे।

November 19, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

चलो, अब अच्छाइओं को साथ लेते हैं,
काले घने अँधेरे, आपस में बाँट लेते हैं
आओ हम सब मिल नया गीत गाते हैं,
होश खोए सुषुप्त भाइयों को जगाते हैं।

संस्थाओं में मानस का सार बाँट देते हैं
वो मेरी बाजारी कीमत को बाँट लेते हैं,
आवश्यकतायें निरन्तर मुझे चिढ़ाती हैं,
व्यवस्थाएं तयशुदा पथ से, भटकाती हैं।

लेकिन सारी जगह एक जैसा मञ्जर है,
कहीं चाक़ू लगता है तो कहीं खंजर है,
अंश मेरी ऊर्जा का मुझे धैर्य बँधाता है,
श्रमरुपी ऊर्जा का संचय न हो पाता है।

मेरा आजअब मुझे आइना दिखाता है,
आगत जालिम मञ्जर,चेतना जगाता है,
चलो चलें,महत्वपूर्ण साधन हो जाते हैं,
छोड़ो सब कुछ स्वकर्म में खो जाते हैं।

ऐ मौत शिद्दत से तेरा इन्तजार करते हैं,
जिन्दादिली से हम दो दो हाथ करते हैं,
आखिर कब जज्बातों का रैला आएगा,
परेशां न हो,खुशियों का मेला आएगा।

ठहरो मत क्यों वक्त बरबाद करते हो,
खुद को मिटा दुनियाँ आबाद करते हो,
ज़िन्दगी का चलन है ये चलती जाती है,
रास्ते में कभी खुशियाँ या ग़म लाती है।

ये ज़िन्दगी का सफर,यूँ बढ़ा जाता है,
पथ में शीत,लूह का ठिकाना आता है,
ये जिन्दगी की मन्जिल पर ले जाती है,
जन्म का सफर अन्त में मौत लाता है।

जीवन यात्रा में आशा के झोंके आते हैं,
बस ये अनायास आ, हमें गुदगुदाते हैं,
ये सब जीवन को नीरसता से बचाते हैं,
ये कर्तव्यबोध व दायित्व कहे जाते हैं।

जब इस सफर में सम्पूर्ण रंग आता है,
संभल नहीं पाते सफर निपट जाता है,
अज्ञानी व चोर भ्रमवश खुश दीखते हैं,
जीवनसन्ध्या में डगमगा कर चीखते हैं।

मायावश हमें अद्भुत मञ्जर दीखते हैं,
भ्रम के भँवर में हम धीरे-धीरे रीतते हैं,
पुस्तकालय, पोथियाँ ज्ञानिक समन्दर हैं,
जितने हैं बाहर,उससे ज्यादा अन्दर हैं।

बाहर की यात्रा हमें,दरबदरकरती है,
अन्तस यात्रा अद्भुत सुकून भरती है,
बाहरवाली दौड़ में, हम खो जाएंगे,
आध्यात्मिक पथ, हमें घर पहुँचायेंगे।

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काव्य

सब झूठा है संसार।[SB JHUTHA H SANSAAR]

November 6, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

इतने सब,जो सपने आए कहाँ गए,

सपने में जो अपने आए, कहाँ गए,

देखो,हम घर बार छोड़कर बैठे हैं,

सारा  कारोबार,  छोड़कर बैठे  हैं।

 

मेरी मछली  खाकर वो  किधर गए,

कर्जा ले भइया अब वो खिसक गए,

देखो, वो  तो  तिलक  लगाए बैठे हैं,

सबके हिस्से का मुर्गा, खाए बैठे हैं।

 

उनके सिरसे बाल न जाने कहाँ गए,

नए  नए  टोटके  उनको  सिखा गए,

देखो,बालों का व्यापार चलाए बैठे हैं,

तरह  तरह  के  गुर  अजमाए बैठे हैं।

 

नकलची नकल में पकड़ा था हमने,

फेल हुआ, कई  बार, वो कॉलेज में,

देखो कॉलेज, व्यापार बनाए बैठे हैं,

शिक्षामन्दिर पर घात लगाए बैठे हैं।

 

कॉलेज के पंखे टोंटी जो पचा गया,

कई लोग कहते थे जाने कहाँ गया,

देखो,नेता वाली कैप लगाए बैठे हैं,

नकली प्रगतिजाल बिछाये  बैठे  हैं।

 

वादोंका सिरमौर हुआ करता था,वो,

भाषण लच्छेदार दिया करता था,वो,

देखो खाँसखाँस,फाँस लगाए बैठे हैं,

सब दुनियाँ  दागदार  बताए  बैठे हैं।

 

मोटावाला थुलथुल बाबा कहाँ गया,

चलने से लाचार फिर भी चला गया,

देखो,वेट घटे, दूकान लगाए बैठे हैं,

नकली   कारोबार  चलाए  बैठे  हैं।

 

सूखे,अच्छनमियाँ शहर से भाग गए,

लम्बे अरसे बाद यहाँ पर प्रकट भए,

देखो,फिटनेस दरबार लगाए बैठे हैं,

सुगठित होनेका प्रचार कराए बैठे हैं।

 

पैठ थी, मलाईदार पद पर चले गए,

रोग उनके लाइलाज  होते चले गए,

देखो,चेहरा रॉबदार  बनाए  बैठे  हैं,

जुए में पकड़े गए,मार खाए  बैठे हैं।

 

अच्छे पद  पर, रिश्वत  लेते  धरे  गए,

जाने किसके पैसे खाकर चमक गए,

देखो,सर्वसुधारक बोर्ड लगाए बैठे हैं,

रिश्वत  के  पैसे  पर, अब भी  एैंठे हैं।

 

देशहित छोड़ स्वार्थ करते चले गए,

हमने उनको अपना माना,ठगे गए,

देखो,आपस में लड़ने तैयार बैठे हैं,

दुश्मन वहाँ नहीं,यहीं गद्दार बैठे हैं।

 

विद्वानों की सूची में, जो  गिने  गए,

सिद्धान्तों की लिस्ट दिखा,चले गए,

देखो,जेलों में दरबार लगाए बैठे हैं,

सब झूठा है संसार सिखाए बैठे हैं।

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काव्य

 शुभ दिवाली ,शुभ दीपोत्सव [Shubh Diwali, Shubh Deepotsav ]

November 4, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

भविष्य जब अतीत के पृष्ठ खोलेगा,हमारी मूर्खता के कृत्य पढ़कर रो लेगा।

हमारी अन्तर्कलह जब हिंडोलेगा,दौड़ में पिछड़ने के राज सब समझ लेगा।

जब वह लड़ने का मर्म समझेगा,छुआछूत,जातिवाद के कपट को जी लेगा।

प्रान्त काअलगाव वाद पढ़ लेगा,अर्ध-विकसित होने का रहस्य समझ लेगा।

 

युवा  विगत सोन-चिरैया ढूंढेगा,उस शोध  में प्राचीन,वेद व दर्शन समझेगा।

भारतीय ज्ञान-सार तत्त्व चुनेगा, तब भारत का ज्ञान-शौर्य कलश  चमकेगा।

भारत सुदूर अतीत स्वर  लेगा, चाणक्य, चन्द्र गुप्त के  यथार्थ को परखेगा।

चेतनपंख   संवार  उठ बैठेगा,अरण्य  रोदन  की  काल्पनिकता  समझेगा।

 

नव-चिन्तन,नव-स्वर  शोधेगा,अन्तः मन सारे पुरातन-व्यथा रहस्य खोलेगा।

पापछोड़,स्वर्णिम पृष्ठ खोलेगा,जाग्रत नव भारत नव चेतना के स्वर बोलेगा।

कालिमा युक्त भाव खो  देगा,नवसम्बल,नवपौरुष लेकर नवभारत दौड़ेगा।

नूतनगति, नूतनऊर्जा ले लेगा,भूल कलुषता जयजय जन-गण-मन  बोलेगा।

 

नवऊर्जा ज्ञानशिखर चमकेंगे,विलुप्त प्राच्य- ज्ञान अक्षर,गोचर हो दमकेंगे।

नालन्दा व तक्षशिला ठुमकेंगे,ज्ञान गौरव मण्डित भारत ज्ञान घट छलकेंगे।

युगयुगीन पसरे अँधेरे भागेंगे,सर्वहारा मुहल्ले, श्रम-जीवी गीत गुन गुनायेंगे।

दीपोत्सव से तम विदा करेंगे,सकल विश्व मस्तक पर, शुभ तिलक लगाएंगे।

 

तम की विदा, हम मुस्कायेंगे,दीपोत्सव पर होने वाले शुभ नव तराने गाएंगे।

भेद-भाव छोड़,हम इतरायेंगे,सत्य की दिवाली होगी, दीपक झिलमिलाएँगे।

शुभ दीपपर्व आशा दिलाएगा,भारत का  बच्चा बच्चा  जन-गण-मन  गायेगा।

विकल-विश्व आशा से देखेगा,शुभ-दिवाली,शुभ-दीपोत्सव सारा जग बोलेगा।

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काव्य

मैं व्यथा हूँ [M VYATHA HUN]

October 31, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

 

मैं व्यथा हूँ ,

यानि अन्तर्मन की कलह कथा हूँ।

जब जब मैं मन में कोई अन्तर्द्वन्द उलझाता हूँ,

अपने जन्म  हेतु अनुकूलतम  अवसर पाता हूँ,

मन का चैन , तन का सुकून सब  खा  लेता हूँ,

जिसके मन में पलता हूँ उसी को डस लेता हूँ।।

 

मैं व्यथा हूँ ,

यानि अन्तर्मन की कलह कथा हूँ।

घोर अवसर-वादी हूँ, मस्तिष्क जकड़  लेता हूँ,

प्रगतिपथ पर बढ़नेवालों के पग पकड़ लेता हूँ,

सारे  प्रगतिशील  विचार सिरे से कुचल देता हूँ,

ज्ञान को अज्ञान के झंझावातों मेंजकड़ लेता हूँ।।

 

मैं व्यथा हूँ ,

यानि अन्तर्मन की कलह कथा हूँ।

व्यसन -वासना स्वार्थ से फलता- फूलता हूँ  मैं,

सरल अधकचरा औ  अन्धविश्वासी ढूंढता हूँ मैं,

उसी के रक्त से स्वयं को जी भर  सींचता हूँ मैं,

कल्पना,प्रगति,विकास उड़ानें  रद्द करता हूँ मैं।।

 

मैं व्यथा हूँ ,

यानि अन्तर्मन की कलह कथा हूँ।

जब किसी चेतन के सितारे गर्दिश  में लाता हूँ,

साजिशन उसका  हम-दर्द करीबी हो जाता हूँ,

उस  मस्तिष्क पर निज मकड़जाल फैलाता हूँ,

पुरानी  गलत यादों  को  कुरेद कर  जगाता हूँ।।

 

मैं व्यथा हूँ,

यानि अन्तर्मन की कलह कथा हूँ।

कभी- कभी मैं अपने अन्त को निश्चित पाता हूँ,

आत्मविश्वासी सहृदयी को जकड़ नहीं पाता हूँ,

सकारात्मक सोच  से  मैं, स्वयं बिखर जाता हूँ,

सद्ज्ञान  के आलोक में, मैं ठहर नहीं पाता हूँ।।

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काव्य

मेक इन इण्डिया /[MAKE IN INDIA]

October 25, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मैं अन्दर से ठोस होता जा रहा था,यानि अपनी लोच खोता जा रहा था,

मैं मज़बूर था, हँस नहीं सकता था,भारत के वो मूल्य खोता जा रहा था।

 

मैं मरा था कोई मुझे गुनगुना रहा था, मै धरा था स्वगीत मैं सुन पा रहा था,

अधर मौन थे बोल नहीं सकता था ,स्पन्दनहीन मूल्य-तौल न सकता था।

 

उन मूल्यों से  पाश्चात्य गढ़ रहा था, मैं अपंग था वो तेजी से  चल रहा था,

मैं जड़,अपने झगड़ों  में खोया था,उसका विकास देख मन मन रोया था।

 

पीछे रह गया बहुत कुछ खोया था,मेरे अहम् ने  ही विष- बीज बोया था,

जाँत-पाँत, ऊँच-नीच गढ़ डाला था,समरस उपवन को मसल डाला था।

 

एजुकेशन आचार्य मुझे जगा रहा था,झिंझोड़ कर गौरव-गीत सुना रहा था,

पुरातन कर्म आधारित वर्ण-व्यवस्था वाले,  सिद्धान्तों को  समझा रहा था।

 

जोश का नया ओज मेरे मृततन में,मानो घुल- कर अविरल समा रहा था,

युवा-शक्ति की असीम ऊर्जा ले मै,उच्चता-शिखर पर चढ़ा  जा रहा था।

 

दृढ़ था मैं नव- विश्वास आ रहा था, प्रगति का नया सा  नशा छा रहा था,

श्वाशों में बवण्डर बढ़ा जा रहा था, नवीन ऊँचाइयों  में उड़ा जा रहा था।

 

कलुष  हटा, मीत पास आ रहा था,बहुत शोर था, भारत गढ़ा जा रहा था,

अतीत-गौरव फिर घर आ रहा था,’मेक-इन-इण्डिया’ उजाला ला रहा था।

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काव्य

सब के लिए आनन्द [ सर्वे भवन्तु सुखिनः ]

October 24, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जिसमें हो सुकून वही राह ढूँढते हैं,

जो भी हो पसन्द वो खुशबू सूँघते हैं,

सम्बन्धों की खैर तो छोड़िए ज़नाब,

वो हमें औ हम उन्हें कहाँ पूछते हैं ?

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काव्य

दिवाली गीत  [DIWALI GEET ]

October 23, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रकाश का पावन- पर्व आया है ,

रंगोली  से  आँगन,  सजाया  है,

नफरतों के जलने से हुई रोशनी

उस रोशनी में प्रेम से नहाया है।

 

तम का यौवनदर्प तोड़ मुस्काया है,

अमावस को पूनम सा चमकाया है,

अँधेरा कायम  रहने  की सोच पर,

नव-चिन्तन का बज्राघात आया  है।

 

रजकणों ने मिलके दिया बनाया है,

जीवन-बाती तेल  यहाँ की माया है,

सम्बन्धों  के  खेलों  ने  भरमाया है,

ऐसा  लगता नया-उजाला आया है।

 

क्या मन ने तम का किया सफाया है,

या तो मन पर अन्धकार का साया है,

कर लो पावन सुन्दर- मौका आया है,

भरलो प्रकाश अवसर ने कहवाया है।

 

साफ हुआ घर मनका नम्बरआया है,

पूर्व मलिनताओं की लगती छाया  है ,

तजो कट्टरता पावस अवसर आया है,

नव- दीवाली, नव -सन्देशा  लाया है।

 

त्यौहारों का गुच्छ बना कर लाया है,

लक्ष्मी स्वागत करो, ये कहलाया है,

मन पर पड़े कहीं से काली छाया है,

आशा दीप चेतन ज्योति लेआया है।

 

 

चेतनता  का महा-दीप है, ईश्वर ही,

हर चेतन ने प्रकाश वहीं से पाया है,

माया के भ्रम ने हमको भरमाया है,

निज से वार्तालाप  नहीं हो पाया है।

 

 

जज्बातों का नया सा रेला आया है ,

भारत के हर गाँव में मेला लाया है,

जागो भारत, मौसम भी  हर्षाया है,

नवजगमग ने अन्तर्मन हुलसाया है।

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काव्य

इतिहास में अमर होगे। ( Itihas m  amar hoge )

October 20, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सिर्फ रैली निकालने से नहीं होगा,

किया है काम तो खुद ही बोलेगा ,

तुम समाज तोड़ने का खेल खेलोगे,

इकदिन सिर पकड़ कर रो लोगे।

 

सच्चाई परतों से बाहर आती  है ,

झूठ की  बदबू भी सूँघी जाती  है।

आवाम  सरलता में मारी जाती है,

पता है कि,गलती तुमने क्या की  है।

 

कब  तलक उसे  यूँ ही  भरमाओगे,

याद रखो कि किए की सजा पाओगे।

धन- दौलत जो  भी  तुम   बनाओगे,

यहाँ से कुछ नही साथ ले जा पाओगे।

 

कर्म -फल    ही   साथ   तेरे    जाएंगे,

आँसू  रख  लो  तुम्हारे  काम  आएंगे।

पछता,पछताकर जब तुम इधर देखोगे,

अपने  दुष्कृत्यों के काले मञ्जर  देखोगे।

 

करोगे याद और हर बात याद आएगी,

तुम्हारे दुष्कर्मों से कौम  भी शर्माएगी ,

काश ये अपने  वंश में  न  पैदा होता ,

या कि मर जाता जब ही ये पैदा होता।

 

इसलिए काम नेक करने का ठेका ले लो,

बुरे  कर्मों  से   बुराई  से  तौबा  कर  लो ,

अच्छे कर्मों की गर दौलत तुम कमा लोगे,

स्वर्णिम अक्षर में  इतिहास में अमर होगे।

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