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समाज और संस्कृति

दिखावे का छल।

February 18, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

दिखावे का छल। / The deception of appearances

आज की दुनियाँ हर क्षण बदल रही है और इसमें मेहनतकश को छलने के तमाम नए अवसर सृजित किये जा रहे हैं। इसमें एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जो मध्यम वर्गको लड़ाने के नित नए पैंतरे खोजता रहता है। मध्यम वर्ग बिना किसी चिन्तन के नए भ्रम का शिकार होता रहता है क्योंकि शिकारी रोज नए जाल का प्रयोग कर रहा है। रोज नए कांटे लगाकर मध्यम वर्ग को रिझाने की साजिशें रची जा रही हैं। चूँकि मध्यम वर्ग संगठित वर्ग नहीं है इस लिए उस मकड़ जाल में फंसता चला जाता है। कहीं कोई तथा कथित चिकित्सक के रूप में अनावश्यक सलाह से जबरदस्ती के ऑपरेशन करके लूटने की साजिश करता है कहीं कोर्ट कचहरी के चक्कर में वह अनायास फंस जाता है। लोग दूर से उसे लड़ाकर अपना उल्लू साधते हैं। एक बहुत बड़ा चक्कर उसे जाति के खानों में डालकर लड़वाने का है। बहुत पुरानी पुस्तक के बारे में भ्रम फैलाकर लड़वाने की साजिश होती है और कहीं भाषा के नाम पर। हर हालत में मरना या शिकार आम आदमी को ही होना है।

मध्यम वर्ग को दिखावे के जञ्जाल में फँसाने के लिए कतिपयएक्टर, कतिपय खिलाड़ी, कतिपय यू ट्यूबर, नेतृत्वकारी शक्ति, तथाकथित अभिजात्य वर्ग, नवोदित रईस सभी लगे हैं। बाज़ारवाद हावी हो चला है छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक को फँसाने की भयङ्कर साजिश है और अधिकाँश मध्यम वर्ग बेखबर है। यहाँ कुछ दिखावे की ओर ध्यान आकृष्ट कर सचाई परोसने का प्रयास कुछ बिन्दुओं के आधार पर करने जा रहा हूँ। बाकी आप जानते हैं समझदारी हटी, दुर्घटना घटी।

दिखावे के कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दु / Some important points of appearance –

01- जन्म, जन्मदिन और केक / Births, Birthdays, and Cakes

02 – दुष्प्रचार और यथार्थ / Misinformation and Reality

03 – पाँच सितारा विद्यालय / Five-Star Schools

04 – पहनावा / Clothing

05 – अनावश्यक गैजेट्स / Unnecessary Gadgets

06 – बाजार वादी संस्कृति / Market-driven culture

07 – अध्यात्म से दूरी / Disconnection from spirituality

08 – अनावश्यक डर / Unnecessary fear

09 – स्वास्थ्य उपेक्षा /Neglect of health

10 – शीतल पेय, डब्बा बन्द अखाद्य पदार्थ / Soft drinks, canned and inedible items

11 – वैचारिक भटकाव / Ideological distraction

 12 – पारवारिक विघटन / Family disintegration                            

13 – समाज और सामाजिक रिश्ते / Society and social relationships

14 – मूल्य अवमूल्यन / Price Depreciation

15 –  तुलना / Comparison                                     

 

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विविध•समाज और संस्कृति

बसन्त पञ्चमी

January 22, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बसन्त पञ्चमी के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म ग्रन्थों में कई कथाएं प्रचलित हैं भगवान शिव की सगाई के दिन के रूप में यह वर्णित है। कुछ कथाएं इसे पृथ्वी पर जीवन की शुरआत का दिन मानती हैं लेकिन माघ मास की इस पञ्चमी को अधिकांशतः सरस्वती पूजा अर्थात माँ शारदे की आराधना का दिवस माना जाता है। प्राचीन समय से ही ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के जन्म दिवस या प्रागट्य दिवस के रूप में मनाते हैं।

बसन्त पञ्चमी का समय व शुभ मुहूर्त –

बसन्त पञ्चमी इस बार 23 जनवरी 2026 को मनाई जायेगी क्यों कि बसन्त पञ्चमी  तिथि की शुरुआत 22 जनवरी 2026 यानी गुरुवार की रात 1 बजकर 30 मिनट से प्रारम्भ होगी और 23 जनवरी की रात 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगी. इसीलिए उदय तिथि के अनुसार शुक्रवार को ही मां सरस्वती की पूजन करना शुभ माना जाएगा।

विविध क्षेत्रों में बसन्त पञ्चमी –

माँ शारदे की आराधना, पूजा का यह दिवस इस विविधता वाले देश में अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में विवाहोपरान्त पहली बसन्त पञ्चमी के दिन विवाहित जोड़ा पीत वस्त्र धारण कर मन्दिरों में जाते हैं। पंजाब में इस दिन पतङ्ग उड़ाई जाती हैं और पतंग उत्सव मनाते हैं पीले चावल बना कर खाते हैं सिख बन्धु पीले रंग की पगड़ी भी पहनते हैं। बिहार प्रान्त में भगवान मार्तण्ड अर्थात सूर्य देव की मूर्ति की स्थापना की गई, इस दिन सूर्य पूजन दिवस के रूप में पूर्ण साजसज्जा व उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल में विधिवत मूर्ति स्थापित कर पूर्ण श्रद्धा से मनाई जाती है शेष परिक्षेत्र में भी विधिवत मान शारदे की उपासना होती है। कतिपय लोग भगवान शिव की आराधना करने के साथ इस दिन विवाह का विशिष्ट दिन मानते हैं। मुस्लिम समुदाय के सूफी सन्त भी इस दिन को विशेष दिन मानते हैं। चिश्ती वंश के मुस्लिम सूफी सन्त इस दिनदिल्ली की प्रसिद्द निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करते हैं।

बसन्त पञ्चमी मनाने का ढंग –

विद्या, बुद्धि, वाणी की शुद्धता, स्मरण शक्ति और कलाओं में सिद्धि हेतु इस दिन माँ की आराधना करते हैं इस वर्ष अभिजित मुहूर्त: प्रात:काल 11:53 से दोपहर 12:38 बजे तक है। इस दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि के उपरांत स्वच्छ धवल या पीत वस्त्र धारण करे जाते हैं यहाँ तक की आसन भी इसी रंग का लेना विशेष शुभ माना जाता है। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर सङ्कल्प लेते हैं। सामान्यतः इस मन्त्र से मान शारदे का आवाहन होता है –

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।

उक्त ध्यान मंत्र के सस्वर वाचन उपरान्त मां शारदे को पुष्प, रोली, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, अर्पित किया जाता है।

तदोपरान्त वाग्देवी के श्री चरणों में पुस्तक, कलम, कला साधन व वाद्य यंत्रों आदि को रखकर वन्दन करते हैं 

मां सरस्वती को फल, पुष्प व नैवेद्य अर्पण करने के बाद पुनः  ​‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः‘, अथवा ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः ‘मंत्र का जप करें.

बसन्त पञ्चमी के  दिन मां सरस्वती की आरती के बिना  उनकी पूजा अधूरी रहती है, इसलिए माँ शारदे की आरती अवश्य की जानी चाहिए।

बसन्त पञ्चमी का दिन गीत, संगीत, नृत्य, लेखन तथा कला साधना के प्रारम्भ हेतु अत्यंत ही शुभ और फलप्रदाता माना जाता  है. नवीन कार्यों की शुरुआत व मांगलिक कार्य हेतु  भी बसंत पंचमी का दिन शुभ माना जाता है.इस दिन विद्यार्थी अध्ययन हेतु उपयोगी वस्तुओं का दान देते हैं और माँ शारदे का आशीष लेते हैं। पीले वस्त्र धारण करते हैं पीले पुष्प चढ़ाना अच्छा माना जाता है प्रकृति भी अपना पीला श्रृंगार करती है सरसों के पुष्प प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं। बासन्ती मिष्ठान आज का प्रमुख प्रसाद रहता है। केसर हलवा विशेषतः इस दिन प्रमुखता से खाया जाता है।

अन्त यह कहना समीचीन होगा कि यदि कर्मकाण्ड पूर्ण न भी हो पाएं और सच्चे मन से मान शारदे के ध्यान के साथ दृढ़ संकल्पित होकर साधना में पूर्ण मनोयोग से तत्पर होते हैं तो यह दिवस विशेष फल प्रदाता है। बसन्त पञ्चमी  पर्व के आगमन के साथ खेतों में सरसों, गेहूं आदि फसलें लहलहाने लगती हैं. प्रकृति में इस कालखण्ड में नवजीवन, उल्लास और सौंदर्य का संचरण होता है. सनातन हिन्दू धर्म में पीला रंग चाहे हल्दी का हो या सरसों का, बसन्त का प्रतीक माना जाता है. यह रंग विद्या की देवी मां शारदे को भी अत्यन्त प्रिय है. इसी  कारण बसन्त पञ्चमी महापर्व पर लोग विशेष रूप से पीले परिधान धारण कर पीले ही व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हैं।

    

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समाज और संस्कृति

माघ

January 8, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

माघ

माघ माह की मघ बदरिया का चिन्तन हमें एक विशिष्ट ज्ञान प्रवाह से जोड़ देता है और एक शरद अहसास कराता है। यह माह हिन्दू राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग और हिन्दू चन्द्र पञ्चाङ्ग का ग्यारहवाँ मास है। इस माह का नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की माघ नक्षत्र के निकटतम स्थिति से उद्भवित हुआ है। माघ माह का अद्भुत आनन्द माँ गङ्गा की निकटतम कुटिया में जाड़े, बूँदाबाँदी, अद्भुत वायु व गङ्गा प्रवाह और मौन चिन्तन के समय अन्तर में महसूस किया जाता है। यथा आनन्द वर्णन दुष्कर है।

माघ मास व माघ मेला –

माघ, मेघ, मेधा का अद्भुत समन्वयन इस माह में दिखता है इस वर्ष 2026 में 3 जनवरी को माघ मेले का शुभारम्भ हुआ है प्रथम पवित्र स्नान पौष पूर्णिमा को होता है। यह मेला 40 दिन से अधिक चलता है और महाशिव रात्रि को इसका समापन होता है अर्थात 15 फरवरी 2026 को प्रयागराज में यह पूरा हो जाएगा। कतिपय विद्वानों के अनुसार इस वर्ष 4 जनवरी से माघ माह का प्रारम्भ हुआ है व इसका समापन 01 फरबरी 2026 को होगा। बहुत सारे लोग कल्पवास प्रयाग तट पर करते हैं। एक मान्यता के अनुसार समग्र नदियों व कूपों का जल इस अवधि में परम पावस हो जाता है। ब्रह्म मुहूर्त इस काल खण्ड का विशेष महत्त्व रखता है।

भगवान कृष्ण और माघ –

यह माह भगवान कृष्ण को समर्पित है यद्यपि भगवान कृष्णका जन्म इस माह नहीं हुआ था भगवान कृष्ण से जुड़ते ही इसमें विशिष्ट आयाम जुड़ जाते हैं। हमारे मन मानस में इनका चिर युवा स्वरुप विद्यमान है इनका बचपन इतना विशिष्ट कि आज भी हर हिन्दुस्तानी मान अपने बच्चे को लाड़ से कान्हा पुकारती है। किशोरावस्था और किशोरीजी की धूम ऐसी कि बालिकाओं में लोकप्रिय होने पर आज भी लोग कह देते हैं कैसा कन्हैया बना घूम रहा है। युद्ध के मैदान से ज्ञान सम्प्रेषण आज भी भगवद्गीता के प्रति हमारे मन मानस में विद्यमान है। गुरुता ऐसी कि सहज स्वीकारा जाता है -कृष्णम वन्दे जगद्गुरु। भारत में आज भी इनके बचपन से युवा स्वरुप का पूजन होता है।

हिन्दी माह के बारह माह चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण (सावन), भाद्रपद (भादो), अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ, व फाल्गुन (फागुन) हैं। इसमें माघ 11 नम्बर पर आता है।

पावन माघ मास का महत्त्व व मान्यताएं –

विविध शास्त्रों के आधार पर कहा जाता है कि इस पावन माघ मास में विविध पावन नदियों का जल अमृत सदृश हो जाता है। इस माह का ब्रह्म मुहूर्त स्नान विगत पाप नाशिनी क्षमता को धारण करने वाला है।

पावन माघ मास में सूर्योदय से पूर्व स्नान की अधिक महत्ता है। यदि पावन नदी के  जल में स्नान का अवसर उपलब्ध नहीं है तो घर पर भी जल में काले तिल व गंगा जल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।

[A] महत्त्व –

1 – इस माह में ब्रह्म मुहूर्त स्नान आरोग्य व सकारात्मक ऊर्जा प्रदाता है। तिल का प्रयोग शनि व सूर्य दोष निवारक की भूमिका का निर्वहन करता है।

2 – इस माह सात्विक भोजन करने से तामस प्रवृत्तियों का निरोध होता है व वाणी प्रभावी व ओजपूर्ण बनती है। चिन्तन में भटकाव नहीं होता।

3 – भगवान विष्णु का मन्त्र ‘ऊँ नमः भगवते वासुदेवाय’ इस माह में विशिष्ट शक्ति प्रदाता है। नियमित सूर्य अर्घ्य व ब्रह्म मुहूर्त जागरण नेत्र सम्बन्धी विकारों को क्षय करने में सक्षम है।

4 – इस माह में गरम कपड़े, कम्बल, गुड़, तिल सेवन, सूर्य उपासना, सूर्य नमस्कार विविध शारीरिक दोष निवारण में सक्षम भूमिका का अधिक तीव्रता से निर्वहन करता है।

[B] – मान्यताएं –

01 – माघ माह को देवताओं के महीने के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस माह में देवता मानव रूप में पृथ्वी पर आकर स्नान दान, ध्यान, सत्संग करते हैं इसीलिये इसे देवताओं का स्नान काल भी कहा जाता है।   

02 – पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक स्नान का यह अवसर देवताओं की सकारात्मक ऊर्जा का सञ्चयन करता है।

03 – इस समय कल्पवास विशिष्ट ऊर्जा से जुड़ आध्यात्मिक चिन्तन पथ प्रशस्त करता है व सकारात्मकता को अक्षुण्ण बनाने का प्रयास करता है।

04 – माघी पूर्णिमा को देवता अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं इस दिन पावन नदियों में स्नान करने वाले इनके विशेष कृपा पात्र बनते हैं।

05 – मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसन्त पञ्चमी, माघी पूर्णिमा, सकारात्मक ऊर्जा का अक्षय प्रसरण में समर्थ हैं लेकिन मौनी अमावस्या को शुभ मांगलिक कार्य जैसे शादी, गृह प्रवेश आदि का निषेध है।

उक्त सम्पूर्ण विवेचन और विज्ञ जनों का सत्संग यह बताता है कि इस अवधि में प्रगति उन्मुख होने हेतु बनाई गयी रणनीतियाँ और उन पर अमल हमें शीघ्रता से लक्ष्योन्मुख करता है।        

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समाज और संस्कृति

देव दीपावली

November 4, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

देव दीपावली का तात्पर्य देवताओं द्वारा मनाये जाने वाली दीपावली से है, यह कार्तिक मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है। कहा जाता है  भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक दैत्य का वध इस दिन ही किया था, इससे देवताओं में खुशी व्याप्त हो गयी और उन्होंने  खुशी में स्वयं काशी में दीप  प्रज्जवलित किये तथा  उत्सव मनाया। इसलिए इस विशिष्ट पर्व को त्रिपुरोत्सव या त्रिपुरारी पूर्णिमा के रूप में भी जाना जाता है। लोग इस दिन पावस नदियों में स्नान और दीपदान करते है। पतित पावनी भागीरथी में स्नान विशेष शुभ स्वीकार किया जाता है।

तिथि व सम्यक समय –

इस वर्ष देव दीपावली का पर्व 5 नवंबर 2025 दिन बुधवार को है । चूँकि देव दीपावली की पूजा प्रदोष काल में की जाती है।इस लिए पूजा का शुभ समय 5 नवंबर को शाम 5 बजकर 15 मिनट से 7 बजकर 50 मिनट तक रहेगा क्योंकि प्रदोष काल का समयावधि यही है।

देव दीपावली का इतिहास –

 यूँ तो देव दीपावली का इतिहास देवाधिदेव शंकर द्वारा त्रिपुरासुर के वध से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह वध कार्तिक पूर्णिमा के दिन हुआ और जीत की खुशी में भगवान् शिव की नगरी में देवताओं द्वारा देव दीपावली का आयोजन हुआ।

वर्तमान में देव् दीपावली की काशी में शुरुआत का प्रसंग प्रमोद यादव जी के दैनिक जागरण के 01 /11 / 2025 के झंकार से ज्ञात हुआ जो कृतज्ञता युक्त साधुवाद सहित लेकर आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ। उन्होंने बताया कि काशी में देवदीपावली की शुरुआत महारानी अहिल्या बाई होल्कर से जुडी है उनके द्वारा पञ्च  गंगा घाट पर बनाये गए हज़ारा दीप स्तम्भ से देव दीपावली मनाने का सिलसिला प्रारम्भ हुआ एक उत्साही युवक नारायण गुरु ने पोथियों की बातों को नई कल्पना दी। केंद्रीय देव दीपावली समिति का गठन हुआ। 1986 में पहली बार पञ्च गंगा सहित 6 घाटों पर दीपमालाएं जगमगाईं तो शहर में उत्साह की लहर दौड़ गई। अगले वर्ष श्रीमठपीठाधीश्वर जगद्गुरु रामगोपलाचार्य का संरक्षण मिला तो दीप मालाएं 12 घाटों तक बढ़ीं। फिर उत्सव दो गुना होकर 24 घाटों तक पहुँचा। काशी नरेश विभूति नारायण सिंह और कई अन्य के योगदान से 1994 तक उत्सव ने भव्यता के नए कीर्तिमान स्थापित किये। अब गंगा के घाटों तक ही नहीं कुंड , सरोवरोंऔर मंदिरों तक भी यह एत्सव पहुँच गया है। हरि प्रबोधिनी एकादशी पर गीतगंगा के प्रवाह के साथ देव दीपावली के अनुष्ठान शुरू हो जाते हैं।

देव दीपावली और दीपावली में प्रमुख अन्तर –

इन अन्तरों को अपनी सुविधानुसार इस प्रकार क्रम दे सकते हैं –

  • जैसा कि पूर्व में बताया गया कि यह उत्सव देव – दीपावली देवताओं द्वारा त्रिपुरासुर का भगवान् शिव द्वारा वध कर दिए जाने के कारण मनाया गया जबकि दीपावली को राम के अयोध्या में वन आगमन व रावण पर विजय से जोड़कर देखा जाता है यह अयोध्यावासियों की प्रमुख देन माना जाता है।
  • देव दीपावली के प्रमुख आराध्य देव देवाधिदेव भगवान शंकर को स्वीकार किया जाता है जबकि दीवाली की प्रमुख आराध्य माता लक्ष्मी हैं।

03 – देव दीपावली प्रमुखतः भागीरथी के तट पर मनाते हैं वहीं गंगा स्नान, दीपदान व आरती करते हैं      जबकि दीपावली घर घर माता लक्ष्मी के पूजन के साथ मनाया वाला पर्व है।

04 – सबसे प्रमुख अंतर के रूप में कहा जा सकता है कि देव दीपावली देवताओं द्वारा पृथ्वी पर आकर मनाया जाने वाला पर्व है जबकि दीपावली को धन व समृद्धि के रूप में मनाया जाता है।

देव दीपावली मनाने की विधि –

01 – इस दिन प्रातः काल पवित्र नदी में स्नान किया जाता है । भोर में पानी में थोड़ा सा गंगाजल डालकर घर पर भी अपनी सुविधानुसार स्नान किया जा सकता है।

02 – घर के देव स्थल या मन्दिरों में साफ-सफाई की जाती है तथा देवाधिदेव भगवान शिव व अन्य देवी-देवताओं की पूजा अर्चना विधि-विधान से की जाती है।

03 – सर्वप्रथम देवाधिदेव भगवान शिव का जलाभिषेक किया जाता है, पंचामृत से स्नान कराकर श्वेत चन्दन, भांग, धतूरा, बेल पत्र, फल – फूल और श्वेत वस्त्र अर्पित किया जाता है। शुद्ध देशी घी का दीपक जलाकर आरती करने का प्रावधान है।

04 – सूर्यास्त के उपरान्त घर के मन्दिर में, पावस नदियों के तट पर और तुलसी के चौरे में मिट्टी के दीए जलाए जाने चाहिए। भगवान् का भोग, आरती व दीपदान क्षमतानुसार किया जाता है

05 – इस दिन तामसिक भोजन जैसे लहसुन, प्याज और मांसाहार नहीं किया जाना चाहिए।

06 – आजकल लोग घर, खेत खलिहान में भी दीपक प्रज्ज्वलित करने को शुभ मानते हैं।

07 – एक मान्यता के अनुसार इस दिन चौमुखी दीपक जलाने से अकाल मृत्यु के भय से रक्षा होती है।

वर्तमान देव दीपावली का महत्व –

01 – यह धार्मिक आयोजन भगवान शिव की त्रिपुरासुर पर विजय की खुशी में देवताओं द्वारा पृत्वी आकर किये दीपदान के कारण महत्ता प्राप्त है।

02 -दूसरा कारण दार्शनिक है दीप प्रज्ज्वलन अन्तस के तम को मिटाकर हमें पावस करता है लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार जैसे दुर्गुणों को मिटाकर आत्मशुद्धि  का पावन सन्देश प्रदान करता है।

03 – यह भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है  इस दिन वाराणसी जैसे शहरों में भागीरथी के तट  पर लाखों दीये जलाकर एक भव्य और अलौकिक दृश्य उदीयमान होता है जो भारत को एक सूत्र में बांधने के साथ सांस्कृतिक गरिमा प्रदान करता  है।

04 – भारतीय पौराणिक कथाओं ने इसके महत्त्व को स्वीकारते हुए स्वीकार किया कि इस  दिन किए गए दान, व्रत और पूजा का फल हजार गुना बढ़ जाता है,  एवम् गंगा में स्नान को आत्मशुद्धि के  प्रतीक के रूप में स्वीकार किया जाता है।

05 – जनजागरण, उत्साह वर्धन व सात्विकता के प्रसार में इस पर्व की बहुत महत्ता आज के समय में भी है।      

हमारे पर्व त्यौहार हमें एकता सूत्र में आबद्ध कर इस भाग दौड़ की जिन्दगी में सुकून के पल प्रदान करते हैं। परिवार और समाज से जुड़ने के अवसर प्रदान करते हैं अंतस में  घुली कालिमा के प्रभाव में कमी लाते हैं  और हमें सात्विकता से जोड़ते हैं।

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विविध•समाज और संस्कृति

चातुर्मास के सृष्टि सञ्चालक -महाकाल

July 6, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

06 जुलाई 2025 अर्थात अषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी (देव शयनी एकादशी) से सृष्टि का सञ्चालन महाकाल के हाथ में आ जाता है और सम्पूर्ण चातुर्मास भगवान् भोले, हमारे महादेव सृष्टि सञ्चालक की भूमिका का निर्वहन करते हैं।

चातुर्मास – जिन चार महीनों की अवधि चातुर्मास कहलाती है उसका प्रारम्भ देव शयनी एकादशी अर्थात अषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष एकादशी से होता है और कार्तिक माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तक चलता है ये चार माह ही चातुर्मास कहलाते हैं। इसमें सोलह्कला सम्पूर्ण भगवान् श्री विष्णु विश्राम की अवस्था में रहते हैं।

देव शयनी एकादशी –

सनातन हिन्दू धर्म की दिव्यता विविध अनुष्ठानों त्यौहारों दिवसों के माध्यम से भी परिलक्षित होती है। एकादशी का हिन्दू धर्म में विशिष्ट स्थान है। प्रत्येक वर्ष 24 एकादशी होती हैं इनकी संख्या 26 तब होती है जब मलमास या अधिक मास आता है अषाढ़ मास  के शुक्ल पक्ष की एकादशी देवशयनी एकादशी के नाम से जानी जाती है। यह भगवान विष्णु की विश्राम अवधि विविध शास्त्रों में वर्णित है।

            विविध विचारक इसे योग निद्रा अवधि या ऊर्जात्मक विश्राम भी कहते हैं ,जब भगवान विष्णु जगत के पालन कर्त्ता योग निद्रा में होते हैं तब सृष्टि सञ्चालन महाकाल भगवान् शिव में केन्द्रित हो जाता है। पद्म नाभा या देवशयनी एकादशी आध्यात्मिक रूप से महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

चार माह का संयम और माहात्मय –

इन चार माह में शुभ कार्य सम्पादित करने से बचा जा सकता है विवाह,गृह,प्रवेश, मुण्डन, यज्ञोपवीत संस्कार आदि इस समय वर्जित रहते हैं। इस समय ध्यान, साधन, व्रत, स्वानुशासन व आत्म संयम पर दिया जाता है।

देव शयनी एकादशी के बारे में कहा गया है की इस दिन भगवान् विष्णु का पूजन करने व व्रत रखने से त्रिदेवों की आराधना का पूण्य फल प्राप्त होता है। चातुर्मास में चूँकि सृष्टि सञ्चालन भगवान् भोले बाबा के हाथ होता है अतः शिव उपासना करने पर विष्णु उपासना के भी सभी फल प्राप्त होते हैं।

साधना समय, व्रत व भोजन व्यवस्था –

देवशयनी एकादशी से प्रारम्भ होने वाला यह कालखण्ड जिसे विष्णु शयनी एकादशी भी कहा जाता है पद्म पुराण में इसकी सम्यक विवेचना मिलती है इसमें व्रत रखकर प्रत्येक दिन सूर्योदय के समय स्नान ध्यान आदि से निवृत्त होकर श्री हरि विष्णु भगवान् की आराधना करते हैं। अपने अपने क्षेत्रों और विश्वास के अनुसार भगवान् भोले को स्मरण किया जाता है देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास में नियम संयम से रहने का शुभ संकल्प लिया जाता है। शिव उपासना के पीछे तर्क यहभी है कि यह सम्पूर्ण काल खण्ड भगवान् शिव को अत्यन्त मनोहर लगता है इस बीच काँवड़िये भगवान् शिव की आराधना उपासना कर विष्णु उपासना का फल भी अर्जित करते हैं।

इन चार महीनों में दिन में एक बार भोजन करने का विधान है वैज्ञानिक व आध्यात्मिक दृष्टिकोण से उत्तम स्वास्थय बनाये रखने के लिए सावन के महीने में साग, भाद्र पद माह में दधि या दही का निषेध है। इसी तरह आश्विन मास में दूध तथा कार्तिक मॉस में दाल का सेवन उचित नहीं माना जाता है। प्राचीन ऋषि मनीषियों विज्ञान वेत्ताओं ने उत्तम स्वास्थय को दृष्टिगत रखते हुए यह विधान दिया है। समस्त चराचर की निर्विघ्न विकास यात्रा में चातुर्मास का विशेष स्थान है। इन दिनों तामसिक भोजन ग्रहण न कर और संयमित जीवन यापन के माध्यम से स्वयं को स्वस्थ रखने का प्रयास हो।

भगवान् भोले नाथ सबको आलम्ब प्रदान कर प्रगति उन्मुख करें और भारतीय संचेतना के इन शब्दों को पोषण प्रदान करें व कृपा दृष्टि बनाएरखें।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

           

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समाज और संस्कृति

दिशा बोधक चिन्तन।

May 5, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मेरे सम्मानित साथियो

विविध विचारशील मनुष्य के मानस में कभी कभी अद्भुत वेशकीमती विचार सृजित होते हैं जिसे कालान्तर में वह भूल जाता है। विचार गुम हो जाता है और कभी कभी चिन्तन पूर्णतः निठल्ला भी हो सकता है।

यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि सृजित विचार के संचयन हेतु मनुष्य का टाइम फ्री जोन  में होना परम आवश्यक है उदाहरण के लिए मैं 58 वर्ष की आयु में चिन्तन हेतु मुक्त होना चाहता था, स्थितियाँ भी सृजित हुईं लेकिन जीविकोपार्जन व आर्थिक आवश्यकता की पूर्ती हेतु मुझे आज भी कार्य करना पड़ता है। जो स्वतंत्र चिंतन में बाधक है और मुझे समाज की समस्याओं पर चिन्तन से विरत करता है। सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है सबकी प्रगति एक साझा जिम्मेदारी है। हम नाकारा होकर स्वयम् को विरत नहीं कर सकते

            आप महसूस कर रहे होंगे और वह सही है कि आज का शीर्षक है – दिशा बोधक चिन्तन।

मेरे वैश्विक समकालीन साथियो,

 आज हम जिस दुनियाँ में जी रहे हैं और अपने अध्ययन, अधिगम के आधार पर चिन्तन के लायक हो सके हैं। वहाँ हमारे द्वारा जीविकोपार्जन हेतु किए कार्य, हमारा बहुमूल्य चिन्तन का समय छीन लेते हैं। निःसन्देह कार्य करना अच्छी बात है लेकिन समय का ऐसा नियोजन भी परम आवश्यक है कि हम अपने रूचि के क्षेत्र में कार्य हेतु समय निकाल सकें यथा – चिन्तन आधारित सृजन।

आप सभी ने यह महसूस किया होगा कि कभी विचारों का अँधड़ चलता है। बहुत से विचार मानस में मचलते हैं और कभी विचार शून्यता की सी स्थिति हो जाती है। कोई विचार शब्दों की लड़ी बन कागज़ पर नहीं उतर पाता। अक्सर मेरे साहित्यकार साथी, गजलकार, कवि और सार्थक बहस में प्रतिभागी मेरे मित्र यह कहते हैं कि आज पता नहीं क्या हुआ कोई विचार आया ही नहीं और कभी कहते हैं कि आज सृजन पर माँ शारदे की कृपा हो गयी

उक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि कोई भी समय विशेष हो सकता है और उस समय पर अन्य जीविकोपार्जन हेतु कार्य की मजबूरी दुनियाँ को कुछ सार्थकता से वंचित कर देती है।आज U.K, U.S.A, सम्पूर्ण यूरोप, सम्पूर्ण एशिया के समकालीन साथी विचारकों के विचारों से हम वंचित हैं कभी भाषा अवरोध बनती है, कभी समय। समय हो तो कई भाषाएँ सीखकर लाभ उठाया जा सकता है।

प्रश्न उठता है कि समय तो सबके पास समान है कोई इतने ही समय में विशिष्ट बन जाता है और कोई जड़ की स्थिति में रहता है। एक दिन में 86400 सैकण्ड होते हैं और इस समय का सार्थक नियोजन व उस पर अमल हमें सार्थक दिशा बोध दे सकता है। उम्र की और अच्छे स्वास्थय की एक सीमा है और सार्थक दिशाबोधक सृजन हेतु, वैश्विक समाज के सार्थक दिग्दर्शन हैं अच्छा स्वास्थय और अच्छी सोच दोनों आवश्यक है।

इस स्थिति के सम्यक विवेचन से स्पष्ट है कि गुरुओं का दायित्व और गुरुत्तर हो जाता है कि वे अपने विद्यार्थियों को उनके युवा काल में ही यह समझाएं कि वे   कठोर परिश्रम और उपार्जन करें। इस आधार पर अपने लिए टाइम फ्री जोन बना सकें। चिन्तन की शक्ति पैसे से नहीं खरीदी जा सकती लेकिन धन चिन्तन में परोक्ष रूप से सहयोग तो करता है। अतिरिक्त धनभोगी को विलास की ओर ले जाकर अभिशप्त करता है। लेकिन एक चिन्तक को स्वस्थ चिन्तन की ओर ले जाकर विश्व के लिए उपयोगी बनाता है।

विचारों से जुड़ने हेतु आत्मीय धन्यवाद।

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समाज और संस्कृति

जालियाँ वाला बाग़

April 12, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ਜਾਲੀਆਂ ਵਾਲਾ ਬਾਗ

भारत के पंजाब प्रान्त में स्वर्ण मन्दिर के पास एक जगह है जिसे जालियाँ वाले बाग़ के नाम से जाना जाता है। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के दिन उस सङ्कीर्ण निकासी वाले बाग़ में लोग त्यौहार को खुशी खुशी मनाने व रॉलेट एक्ट से सम्बन्धित शान्ति पूर्ण सभा का हिस्सा बनने के लिए एकत्रित हुए इसमें बच्चे, बूढ़े, नौजवान, महिलायें सभी तरह के व सभी आयु वर्ग के लोग शामिल थे।

 अधिकाँश सदस्यों के विरोध के बावजूद 10 मार्च 1919 को दिल्ली की विधान सभा से अराजक और क्रान्तिकारी गतिविधियों को रोकने हेतु जो कला क़ानून पारित हुआ उसे रॉलेट एक्ट के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः इस एक्ट के द्वारा ब्रिटिश सरकार को यह अधिकार मिलना था कि वह किसी भी व्यक्ति को बिना किसी सबूत के दो वर्ष कैद रख सके। इसमें किसी मुकदमें को चलाने की भी आवश्यकता नहीं थी।

यही नहीं समाचार पत्रों की स्वतन्त्रता भी इस माध्यम से समाप्त हो रही थी गिरफ्तार होने वाले को यह जानने का अधिकार भी नहीं था कि वह क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है जब कोइ निर्दोष साबित होने पर छूट भी जाता था तो उसे जमानत राशि जमा करनी पड़ती थी और वह किसी भी राजनैतिक, धार्मिक, शैक्षिक कार्यक्रम में भाग नहीं ले सकता था।

इन दमनकारी युद्धकालीन नीतियों के खिलाफ जगह विरोध के स्वर उठ रहे थे, भारत की ब्रिटिश सरकार श्रृंखलाबद्ध ढंग से दमनकारी आपात कालीन व्यवस्थाएं बनाकर भारतीय क्रान्ति के अग्रदूतों का यथा सम्भव विनाश करना चाहती थी। इस आहट को महसूस कर जालियाँ वाले बाग़ में शान्ति पूर्ण सभा आयोजित हो रही थी।

ह्त्या काण्ड निर्देश व नर संहार आयोजन –

भारत के इतिहास में ऐसे कई दिवस  पड़ते हैं जो निर्दोष भारतीयों के खून से रँगे है माँ भारती के पंजाब प्रान्त की हमारी रणबाँकुरी प्रजाति से  आमने सामने शस्त्र सहित भिड़ना अंग्रेजों की औकात से बाहर था इसीलिये जब हजारों निहत्थों का रैला शान्ति पूर्ण विचार मन्थन हेतु जालियां वाले बाग़ में इकठ्ठा हो चूका तब पंजाब प्रान्त के तत्कालीन गवर्नर सर माइकेल फ्रांसिस ओ डायर के इशारे पर कर्नल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर के आदेश पर इस रूह कँपा देने वाले नरसंहार  को अमल में लाया गया यह दुष्काण्ड हजारों निहत्थों की जीवन लीला समाप्त करने का कारण बना संकरे रास्ते  रोके खड़े ब्रिटिश सैनिक अपने कसाई डायर के आदेश पर बच्चों, बूढ़ों, महिलाओं सहित सम्पूर्ण उपस्थित जनसमूह पर अंधाधुन्ध गोलीबारी कर रहे थी बहुत से लोग वहाँ एक कुएं में छलांग लगाने को विवश हो गए। इन कसाइयों ने ऊपर से भारतीयों के मृत शरीर उस कुएं में डाल दिए जिससे जिससे वह कुआँ उसमें जीवित लोगों का समाधि स्थल बन जाए .

तत्सम्बन्धी दोनों डायर की अन्तिम परिणति –

13 अप्रैल 1919 को शाम 5 बजकर 37 मिनट पर हुई इस भयङ्कर नर सँहार ने अंग्रेज शासन की चूलें हिला दी, भीड़ पर गोली चलाने की भारत और ब्रिटेन दोनों जगह  भारी भर्त्सना हुई। कर्नल रेजिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर जो अमृतसर के कसाई के नाम से भी जाना जाता है। कालान्तर में ब्रिटेन चला गया और ब्रेन हैमरेज से उसकी मृत्यु हो गई। दूसरा डायर जो उस समय पंजाब का गवर्नर था जिसकी सहमति से नरसंहार की पूर्ण पटकथा लिखी गयी। उस माइकल फ्रांसिस ओ डायर को सरदार ऊधम सिंह ने अपनी शूर वीरता का परिचय देते हुए लन्दन में मार डाला। यद्यपि वीर ऊधम सिंह जिसने जेल में अपना नाम भारत की सांस्कृतिक एक जुटता दर्शाता – मोहम्मद सिंह आज़ाद बताया, को फाँसी की सजा दी गई। इस वीर ने जालियां वाले बाग़ हत्याकाण्ड का बदला लिया 19 जुलाई 1974 को क्रांतिकारी ऊधम सिंह की अस्थियां भारत लाई गईं।

जालियाँ वाले बाग़ के इस  भयङ्कर संत्रांश ने हर भारतीय को झकझोर कर रख दिया। जगह जगह विद्रोह कई नए  खड़े हुए बहुत से लोगों ने ब्रिटिश सरकार द्वारा प्राप्त उपाधियों को  दिया। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर के आक्रोश पत्र के शब्द हिन्दी में आपके समक्ष रखता हूँ। –

“इस अवस्था में मैं अपने देश के लिए कम से कम यह कह सकता हूँ कि आतंक से गुंग अपने करोड़ों देश वासियों द्वारा भोगी जा रही मूक पीड़ा एवम् संताप को मुखरित करूँ और उसके सभी परिणाम भुगतने के लिए तत्पर रहूँ। अब समय आ गया है जब कि सम्मान के प्रतीक (उपाधियाँ आदि)  उनसे विसंगत अपमान के सन्दर्भ में हमें अधिक शर्मिंदा करते हैं। और मैं अपने स्थान पर इन विशेष सम्मानों को झटक कर अपने देश वासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूँ। ———–इन्ही कारणों ने मुझे दुखी ह्रदय से मजबूर कर दिया है कि मैं आज महामान्य जी को सत्कार और खेद सहित कहूँ कि मुझे सर की उपाधि से मुक्त किया जाए जो कि सम्राट द्वारा मुझे प्रदान की गयी थी।”-  राष्ट्र धर्म’ जुलाई 2021 से साभार

इस घटना ने राष्ट्रवादियों के ह्रदय को विदीर्ण कर दिया। आँखों में रक्त उतरना स्वाभाविक था। बहुत से साहित्यकारों ने अपनी कलम के माध्घ्यम से इसे अभिव्यक्ति दी। कवि कुल शिरोमणियों की श्रृंखला की कवित्री सुभद्रा कुमारी चौहान द्वारा रचित ‘जालियाँ वाले बाग़ में बसन्त‘ के शब्द और भाव आपकी झोली में रखता हूँ –

यहाँ कोकिला नहीं काग हैं शोर मचाते,

काले काले कीट भ्रमर का भ्रम उपजाते।।

कलियाँ भी अधखिली मिली हैं कंटक कुल से

वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे ।।

परिमल -हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,

हा ! यह प्यारा बाग़ खून से सना पड़ा है ।।

ओ, प्रिय ऋतुराज ! किन्तु धीरे से आना,

यह है शोक स्थान यहां मत शोर मचाना ।।

वायु, चले पर मंद चाल से उसे चलाना,

दुःख की आहें संग उड़ाकर मत ले जाना ।।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गावें,

भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनाएँ।।   

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,

तो सुगन्ध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले ।।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,

स्मृति  में  पूजा  हेतु  यहाँ  थोड़े  बिखराना।।

कोमल बालक मरे यहाँ  पर गोली खा कर,

कलियाँ उनके लिए गिराना थोड़ी लाकर ।।

आशाओं से भरे ह्रदय भी छिन्न हुए हैं,

अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं ।।

कुछ कलियाँ अधखिली यहां इसलिए चढ़ाना,

करके उनकी याद अश्रु के ओस बहाना ।।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खाकर

शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जाकर ।।

यह सब करना किन्तु वहाँ मत शोर मचाना,

यह है शोक स्थान, बहुत धीरे से आना ।।

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समाज और संस्कृति

कपाल भाति / KAPAAL BHATI

February 12, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

कपाल भाति / KAPAAL BHATI

कपाल भाति प्राणायाम एक अत्याधिक ऊर्जा युक्त उच्च उदर प्राण आयाम है। कपाल का अर्थ संस्कृत में होता है ललाट या माथा और भाति का आशय है तेज। कपाल भाति को मुख मण्डल पर आभा, ओज या तेज लाने वाले प्राणायाम के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसे योग परिक्षेत्र में षट्कर्म (हठ योग) की एक क्रिया के रूप में मान्यता प्राप्त है। जब हम भाति को स्वच्छता के रूप में स्वीकार करते हैं तो कपाल भाति को मष्तिष्क को स्वच्छ करने या मस्तिष्क की कार्य प्रणाली को दुरुस्त रखने वाले प्राणायाम के रूप में स्वीकार करते हैं।

कपाल भाति के लाभ /Benefits of Kapal Bhati –

कपाल भाति के लाभ /Benefits of Kapal Bhati –

यूँ तो कपाल भाति आन्तरिक शुद्धि का एक महत्त्वपूर्ण साधन है लेकिन यह सम्पूर्ण जीवन और व्यक्तित्व को बदलने की क्षमता रखता है

इससे होने वाले लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

01 – आन्तरिक शोधन में सहायक / Helps in internal purification

02 – अवसाद में कमी / Reduction in depression

03 – शारीरिक भार नियन्त्रण / Body weight control

04 – ओज में वृद्धि / Increase in glow

05 – वजन में कमी / Weight loss

06 – पाचन सहायक / Digestive aid

07 – पेट की चर्बी पर नियन्त्रण / Control belly fat

08 – उच्च रक्त चाप नियन्त्रण / High blood pressure control 

09 –  मानसिक स्वास्थ्य का महत्त्वपूर्ण उपादान /Important Component for Mental Health

10 – कोलस्ट्रोल नियन्त्रण /Cholesterol control

11 – हार्मोन असन्तुलन में सुधार / Improves hormone imbalance

12 – नींद हेतु गुणवत्ता सुधार / Improve sleep quality 

13 – आँख के नीचे के काले घेरे दूर करना / Removing dark circles under the eyes

14 – विषाक्त पदार्थों का निस्तारण /Disposal of toxic substances

15 – अस्थमा नियन्त्रण / Asthma control

16 – गैस व एसिडिटी दूर करने में सहायक/ Helpful in removing gas and acidityसावधानियाँ /Precautions –01 – यह प्राणायाम खाली पेट ही करना है। यदि कुछ खाया है तो उसके 4-5 घण्टे बाद इसे करें। 02 – उच्च रक्तचाप और गैस से पीड़ित होने पर धीमी गति से इस प्राणायाम को करना है। 03 – गर्भावस्था व मासिक चक्र के समय इससे बचें। 04 – पेट घटाने के चक्कर में इसे पूरे दिन बार बार न करें। 05 – कब्ज की स्थिति में इसे न करें जब तक कब्ज से निजात न पा लें। 06 – ज्वर, दस्त या गम्भीर रोग की स्थिति में इसे न करें।  07 – धूल, धूएं, गर्द-गुबार, आँधी आदि में इसे न करें।    08 – गर्म वातावरण में भी इसे न कर सामान्य तापमान पर करना अधिक उत्तम है। 09 – कोई परेशानी या दिक्कत होने पर योग्य योगाचार्य या चिकित्सक देख रेख में इसे करें। 10 – अस्थमा के रोगी धीमी व नियन्त्रित गति से इसे करें ।प्राणायाम हेतु विधि –01 – आरामदायक कुचालक आसान का प्रयोग करें। 02 – सिद्धासन, पद्मासन, आलती पालती मारकर बैठ जाएँ।    03 – सर व रीढ़ की हड्डी को सीधा रखें। 04 – शरीर को ढीला छोड़कर आँख बंद कर सकते हैं। 05 – इस प्राणायाम में केवल श्वांस को बारम्बार बाहर छोड़ना है 06 – पूर्ण विश्वास से प्राणायाम की पूर्णता पर शान्ति अनुभव कर ईष्ट शक्ति के प्रति कृतज्ञता भाव रखें। 07 – धीरे धीरे प्राणायाम की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि करते जाएँ। 08 – श्वांस छोड़ने के क्रम में बार बार तेज स्ट्रोक न लगाएं।

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समाज और संस्कृति

बसन्तपञ्चमी / BASANT PANCHAMI

February 1, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बसंत पंचमी ऊर्जा युक्त दिवस है ,भारतीय इसे पूर्ण उल्लास के साथ मनाते हैं इस बार यह 02/02/2025 दिन रविवार को 11. बजकर 53 मिनट से लग रही है जो 03/02/2025 दिन सोमवार को प्रातः 9 बजकर 36 मिनट तक रहेगी। बसन्त पञ्चमी पूर्वान्ह कालिक व्यापिनी तिथि को मनाई जाती है। काशी के विद्वान् उदयातिथि व पूर्वान्ह कालिक व्यापिनी तिथि के हिसाब से इसे 03/02/2025 दिन सोमवार शास्त्र सम्मत स्वीकार कर रहे हैं। वरिष्ठ ज्योतिषाचार्य प्रो ० चन्द्र मौलि उपाध्याय ने बताया कि ऋषिकेश पञ्चाङ्ग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का विश्व पञ्चाङ्ग या अन्य पारम्परिक पञ्चाङ्ग सबने बसन्त पञ्चमी का पर्व 03/02/2025 दिन सोमवारको ही स्वीकार किया है।

सरस्वती पूजा का प्रारम्भ –

माँ शारदे का बसन्त पञ्चमी के पूजन से सम्बन्धित बहुत सी कहानियाँ वर्णित की जाती हैं। कहा जाता है कि माँ शारदे का कृपा पात्र होने पर जिह्वा पर सरस्वती विराजमान हो जाती है और व्यक्ति नाम, यश, मान, सम्मान , विशिष्ट कीर्ति का अधिकारी हो जाता है। सर्व प्रथम माँ शारदे के पूजन के सन्दर्भ में ब्रह्म वैवर्त पुराण के प्रकृति खण्ड में सोलह कला सम्पूर्ण भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी द्वारा पूजित होने का विवरण मिलता है। बसन्त पञ्चमीको इस पूजा के विधान के बारे में यह सर्व स्वीकृत है कि माँ को बसन्ती रंग अत्यन्त प्रिय हैं। इसीलिए योगेश्वर कृष्ण की वैजयन्ती माला, मुकुट, और पीताम्बरी इससे प्रभावित है। श्री कृष्ण भगवान द्वारा सरस्वती को यह वरदान प्रदत्त किया गया कि प्रत्येक माघ शुक्ल की पञ्चमी के दिन ब्रह्माण्ड में तुम्हारा पूजन होगा। विद्यारम्भ के समय प्रेम, श्रद्धा गौरव के साथ पूर्ण आस्था से तुम्हारी पूजा होगी। उन्होंने इस तिथि हेतु कहा। –

“मेरे वर के प्रभाव से आज से लेकर प्रलय तक प्रत्येक कल्प में मनुष्य, देवता, मुनिगण, योगी, नाग, गन्धर्व और राक्षस सभी बड़ी भक्ति के साथ सोलह उपचारों द्वारा तुम्हारी पूजा करेंगे।”

कहा जाता है कि तभी से माघ शुक्ल पञ्चमी के दिन बसन्त पञ्चमी  मनाते हैं और सरस्वती पूजन किया जाता है।

धर्म आधारित मान्यता –

यह दिन हाथों में पुस्तक, वीणा, माला, के साथ श्वेत कमल पर विराजित होकर वीणा वादिनी के प्रागट्य का है बसन्त पञ्चमी के इस विशिष्ट दिन से ही बसन्त ऋतु की प्रभावोत्पादकता देखने को मिलती है शास्त्रों में इनके प्रसन्न होने पर देवी काली और माँ लक्ष्मी की प्रसन्नता का भी विवरण मिलता है विधि विधान के साथ भी शारदे की उपासना बसन्त पञ्चमी को होती है और इसके 40 दिनों के बाद होली पर्व प्रारम्भ होता है।बसन्त को ऋतुराज अर्थात ऋतुओं का राजा भी कहा जाता है।

            धार्मिक मान्यता यह भी है कि ये सङ्गीत, कला और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी है। इसी कारण इस शुभ दिन सरस्वती पूजा विशेष रूप से की जाती है।

संस्थानों में सरस्वती पूजा –

इस विशिष्ट दिन को घरों में प्रतिष्ठानों में, मंदिरों में, शिक्षा के मन्दिर अर्थात विद्यालयों में माँ सरस्वती का पूजा अनुष्ठान होता है। ज्ञान, कला और सङ्गीत की देवी की आराधना विधि विधान से इन संस्थाओं में करने के पीछे कृपा पात्र बनने की कामना भी है। बसन्त पञ्चमी का यह पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी तिथि को मनाकर जीवन में ऐश्वर्य, ज्ञान, समृद्धि और सकारात्मकता से जुड़ने का संस्थान को विशेष अवसर मिलता है। भौतिकता की अन्धी दौड़ में यह दिन आध्यात्मिक चिन्तन को आधार प्रदान करता है।

सरस्वती पूजन की वैयक्तिक विधि –

यथा योग्य पूजन सामग्री एकत्रित करने के पश्चात इस भाँति पूजन करना है –

01 – उदया तिथि में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें।

02 – पीत वस्त्र धारण करें इसे शुभ माना गया है

03 – भगवान गणेश व माँ शारदे वीणा वादिनी का चित्र या मूर्ति स्थापित करें।

04 – पद्मासन में बैठकर माँ का ध्यान करें। मानसिक रूप से मौन के साथ माँ का ध्यान किया जा सकता है तथा इन शब्दों से माँ के विशद रूप का ध्यान किया जा सकता है।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1

इसका आशय है कि जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं और जो श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली मां सरस्वती हमारी रक्षा करें।

05 – हल्दी, पीले मीठे चावल, पीले फूल,फल लड्डू आदि का भोग लगाएं।

06 – अन्त में गणेशजी व वीणा वादिनी की आरती कर प्रसाद वितरण करें। 

 पूजा, उपासना की उक्त विधि अधिक लोगों द्वारा इस तरीके को अपनाने के कारण बताई है वैसे आप अपने मानस के आधार पर किसी भी ढंग से माँ शारदे विद्या की देवी की उपासना कर सकते हैं।

माङ्गलिक कार्यों हेतु विशेष शुभ दिन –

समस्त माङ्गलिक कार्यों हेतु इसे विशेष दिन के रूप में मान्यता प्राप्त है यह दिन इतना शुभ मन जाता है कि गृह प्रवेश, मुण्डन, विवाह,नव प्रतिष्ठान प्रारम्भ व किसी भी नवीन कार्य के सम्पादन हेतु इस दिवस की प्रतीक्षा की जाती है।

ऐसा भी विदित है कि सूफी सन्तों ने इसकी शुभता को स्वीकार किया व चिश्ती सम्प्रदाय ने भी इसे मनाने का निर्णय किया। प्रसिद्द विचारक लोचन सिंह बख्शी के अनुसार –

“बसन्त पंचमी एक हिन्दू त्यौहार है जिसे १२वीं शताब्दी में कुछ भारतीय सूफियों द्वारा दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर स्थित मुस्लिम सूफी सन्त की कब्र पर मनाने के लिए अपनाया गया और तबसे यह चिश्ती सम्प्रदाय द्वारा मनाया जाता है।“

उक्त आलोक में कहा जा सकता है कि इस शुभ दिन को सामाजिक, धार्मिक,  सांस्कृतिक मान्यता प्राप्त है। यह प्रकृति की कायाकल्प के कारण भी शुभता का प्रभावी सन्देश देने में समर्थ है इस दिन पञ्चाङ्ग देखने,दिखाने की आवश्यकता नहीं होती पूर्ण समयावधि ही शुभ है।

दान सम्बन्धी धारणा –

इस दिन की दान सम्बन्धी धारणा भी बहुत व्यावहारिक है। लेखक, कवि, दार्शनिक, कहानीकार, साहित्यकार, शिक्षार्थी, शब्द शिल्पी और विविध सृजन से जुड़े लोगों का यह विशिष्ट दिन है। इसीलिये इनसे जुड़ी वस्तुओं यथा पुस्तक, कलम, पेन्सिल, स्याही,कागज़, चश्मा, आसन आदि का दान पात्रता देखकर सही व्यक्ति को दिया जाना चाहिए जरूरतमन्दों  नोटबुक, विद्यादान में सहयोग की व्यवस्था बनाई जा सकती है।

बसन्त पंचमी व भोजन –

पीले मीठे पदार्थ और सात्विक भोजन गृहण करने का विधान है सात्विक भोजन करते समय गरिष्ठ भोजन गृहण करने से भी बचना चाहिए तामसिक भोज्य पदार्थों का भूलकर भी सेवन नहीं करना चाहिए यहाँ तककि लहसुन,प्याज का भी प्रयोग इस दिन वर्जित है। केवल उन पदार्थों का सेवन करें जिससे अधिगम में व्यवधान न हो। केसर गुड़ पीले चावल का इस दिन विशेष महत्त्व है। वास्तव में बसन्ती रंग सुख, समृद्धि, और ऊर्जा का प्रतीक मन जाता है  रंग का पुष्प अर्पित करने के पीछे भी यही मान्यता कार्य करती है। फसल पकने ,हलके जायकेदार भोजन और खुशी का प्रगटन लोग पतङ्ग उड़ाकर करते हैं। 

बसन्त पंचमी व इसका महात्मय – 

इसके महात्मय इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि विद्यारम्भ बिना सरस्वती पूजा के संपन्न नहीं होता। कहा जाता है कि जब व्यास जी ने बाल्मीकि जी से पुराण सूत्र के बारे में पूछा तो वे बताने में असमर्थ रहे इस स्थिति में व्यासजी ने जगदम्बा सरस्वती की स्तुति की और इनकी विशेष कृपा से बाल्मीकि जी को ज्ञान हुआ तत्पश्चात इन्होने  सिद्धान्त को प्रतिपादित किया। माँ शारदे के वर से व्यासजी कवीश्वर बने व उन्होंने पुराणों की रचना की। माँ शारदे की उपासना से ही इन्द्र शब्द शास्त्र व उसका अर्थ समझने में समर्थ हो सके। ज्ञान से शब्द बोध होता है और अनुभव से उसका आशय स्पष्ट होता है। विद्या मनुष्य के व्यक्तित्व के विकास हेतु है शारीरिक विकास हेतु भोजन व मानसिक उत्थान हेतु विद्या आवश्यक है। इस ज्ञान की प्राप्ति हेतु ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की उपासना श्रेयस्कर है और बसंत पंचमी इस हेतु श्रेष्ठ दिन।                           

                           

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समाज और संस्कृति

SUBHASH CHANDR BOSE

January 22, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सुभाष चन्द्र बोस

23/01/1897-18/08/1945

तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।

दिल्ली चलो।

यह ऐसे नारे हैं जो बिना नाम बताये भारतीय आज़ादी के विशिष्ट पुरोधा का नाम मनोमष्तिष्क में झंकृत कर देते हैं। आज जब आज़ादी की लड़ाई का वास्तविक चित्र एक खुले दिमाग का विचारक अपने जेहन में लाता है तो अनायास ही मानस पटल पर आ जाते हैं अमर सेनानी, आजाद हिन्द फ़ौज की पुरुष विंग के कमाण्डर सुभाष चन्द्र बोस।

आज पराक्रम दिवस के अवसर हेतु जिस क्रान्तिकारी बलिदानी भारत के अमूल्य रत्न सुभाष चन्द्र बोस की बात करने जा रहे हैं वह भारत के उड़ीसा प्रान्त के कटक परिक्षेत्र में 23 जनवरी,1897 को जन्मे और कहा जाता है कि हवाई दुर्घटना में 18 अगस्त,1945,ताइवान के एक चिकित्सालय में आग से बहुत अधिक घायल होने के कारण शहीद हो गए। इनका सम्पूर्ण जीवन भारतीयों हेतु अदम्य साहस और पराक्रम की प्रेरणादाई मिसाल है। इनके सम्पूर्ण जीवन और कार्यवृत्त का चित्रण, विवेचन, प्रस्तुति दुष्कर है अपनी क्षमता भर बात इस अल्पावधि में आपके साथ करने का प्रयास कर रहा हूँ और आज भी उनकी तथाकथित मृत्यु के लगभग 80 वर्षोपरान्त उस वीर की बात करते हुए मैं रोमाञ्चित हूँ।

पिता जानकी नाथ और माता प्रभावती जी का यह सुपुत्र अपनी कर्मसाधना के बल पर भारतीय स्वर्णिम इतिहास के आकाश में महान स्वतन्त्रता सेनानी के रूप में एक जाज्वल्यमान नक्षत्र बन गया। भारतीय कोटि कोटि हृदयों का यह लाडला बचपन से देशप्रेम, स्वाभिमान और अदम्य  साहस की जीवंत मिसाल था। अंग्रेज शासन के विरुद्ध सहपाठियों का मनोबल बढ़ाने वाला यह बाँका वीर आज़ाद हिन्द फ़ौज जापानी सहयोग से गठित करने में सफल हुआ। बचपन से जवानी की यात्रा में कलकत्ता विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाला इस युवक 1920 में प्रशासनिक सेवा परीक्षा में भी चतुर्थ स्थान पर स्थान बनाकर 1921 अंग्रेज विरोध और आजादी प्राप्ति के लक्ष्य के कारण त्यागपत्र दे दिया।

प्रथम बार गांधी को राष्ट्र पिता कहने वाला यह पुरोधा क्रांतिकारी भगत सिंह की फांसी के बाद गाँधी की विचारधारा से पूर्णतः असहमत  हो गया। 1943 में 40,000    भारतीयों के साथ आजाद हिन्द फ़ौज का गठन करने वाला यह मसीहा कालान्तर में अण्डमान निकोबार द्वीप पर प्रथम बार स्वतन्त्र भारत का झण्डा फहराने में समर्थ हुआ। भावातिरेक में उनकी जिन्दगी की किताब का कहीं से कोई भी पृष्ठ जेहन में खुल रहा है। क्रमबद्धता बनाने का प्रयास करता हूँ।

इनके युवाकाल में भारत आन्दोलनजीवी हो चुका था महात्मा गाँधी नेतृत्वकारी शक्ति के रूप में स्थापित थे सुभाषजी भी इनका बहुत आदर करते थे 1921 के असहयोग आन्दोलन में भाग लेने के कारण इन्हे 6 माह की सजा मिली। बाद में इनका नेहरू व गाँधी से मतैक्य हो गया। नेहरू रिपोर्ट के विरोध में उन्होंने इन्डिपेंडेंट लीग की स्थापना की।  2जुलाई 1940 को भारत रक्षा कानून के तहत इन्हें कलकत्ता में गिरफ्तार कर लिया गया।

यद्यपि दो बार सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में निर्वाचन हुआ लेकिन आगे चलकर नेहरूजी, गांधीजी व कांग्रेस कार्यकारिणी समिति के साथ मतभेद के कारण इन्होने फॉरवर्ड ब्लॉक की स्थापना की। इनकी देश के समर्थन की बहुत सारी गतिविधियाँ अंग्रेज सरकार की आँखों में खटक रही थी। फलस्वरूप इन्हें 12 बार जेल की यात्रा करनी पड़ी। विषम स्थिति ने इन्हें तपेदिक का शिकार बना दिया। ये वेश बदलने में बहुत कुशल थे। इन्हें कलकत्ता की प्रेसीडेन्सी जेल में रखा गया और घर में भी नज़रबन्द रखा गया। 17 नवम्बर 1940 को यह आश्चर्यजनक रूप से गायब हो गए। 28 मार्च 1941 को बर्लिन पहुँच गए, जब ये वेश बदलकर छिपकर यहाँ से भाग गए जिस कार से धनबाद के गोमोह रेलवे स्टेशन  की यात्रा इन्होने पूर्ण की वह अब भी है और वर्तमान प्रधानमन्त्री श्रद्धेय नरेन्द्र मोदीजी को इसके दर्शन का सौभाग्य मिला जिसका जिक्र 19 /01 /2025 को उन्होंने अपने मन की बात कार्यक्रम में भी किया।

आजाद हिन्द रेडियो का गठन , रंगून और सिंगापुर में इनके मुख्यालय का बनना, जर्मनी से भारतीय युद्ध बन्दियों का सुरक्षित निकलना,प्रवासी भारतीयों का समर्थन लेने के साथ  सुभाष चन्द्र बोस ने सक्रिय रूप से बाहरी बड़ी शक्तियों से गठबन्धन की तलाश की और ब्रिटिश सेना के विरोध हेतु आजाद हिन्द फ़ौज नाम से भारतीय राष्ट्रीय सेना बनाई। रास बिहारी, कैप्टन मोहन सिंह,सुभाष चन्द्र बोस ने क्रान्तिकारी आज़ादी का भारतीय जनमानस में प्रत्यारोपण किया ,नेहरू ब्रिगेड , गाँधी ब्रिगेड, आज़ाद ब्रिगेड, सुभाष ब्रिगेड के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लक्ष्मी सहगल की रानी लक्ष्मी बाई ब्रिगेड भी कार्य कर रही थी।

अमेरिका द्वारा हीरोशिमा, नागासाकी पर एटम बम  के हमले ने जापानी सहयोग को बाधित किया एक रास्ता बन्द होने पर दूसरे को तलाशने के क्रम में हमारे नेताजी के शहीद होने की खबर ने भारतीय जनमानस को झकझोर दिया, जो आग इनके द्वारा बोई गयी थी वह ज्वालामुखी बन चुकी थी जगह विरोध के स्वर गूँज रहे थे। विविध सेनाओं के भारतीय वीर बगावत पर उतर आये। अंग्रेजों का यहाँ रुकना अत्याधिक जटिल होता जा रहा था अन्ततः अंग्रेज भारत को आजाद करने के लिए विवश हुए। तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमन्त्री एटली महोदय से पुछा गया कि गाँधीजी का भारत छोड़ो आन्दोलन  सफलता पूर्वक कुचला जा चुका था तो भारत को आजादी क्यों दी गयी ,उनका जवाब था सुभाष चंद्र बोस के कारण ,गांधी नेहरू प्रयास को उन्होंने बहुत मामूली बताया।

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