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Uncategorized•काव्य

होली आई है।

March 3, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

होली आई है, आई है, होली आई है,

मौसमे -फाग में कैसी मस्ती छाई है,

रँगों ने, आज फिर से ली अँगड़ाई है,

बृजवाली राधा, कृष्णा की परछाई है।

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।01।

होली जीवन में नव-जीवन लाई है,

आई है आई है होली फिर आई है,

संग पापड़, गुझिया, मीठा लाई है,

होली के पकवानों ने धूम मचाई है।     

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।02।

नव रँगों ने अद्भुत छटा बिखराई है,

टेसू पलाश फूलों ने कसम निभाई है,

प्रकृति ने पुरातन रीति ही दोहराई है,

कान्हा, देखो जी देखो होली आई है।     

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।03।

जोगीरा, सर रर ने धूम मचाई है,

गीता भौजी ने मन से होली गाई है,

आज मस्ती में लोग और लुगाई हैं,

लेकिन नयनों की झील भर आई है।      

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।04।

जनगणमन मानस खुशी समाई है,

माँ सीता संग होली खेलें रघुराई है,

सारे तीर्थ राजों ने होली मनाई है ,

रंग से सरोबारों ने ली अँगड़ाई है।      

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।05।

अरे पूरब से पुरबा हवा,  आई है,

फाग ने फगुआ छटा दिखलाई है,

पिचकारी ने रंगीन फिज़ा दिखाई है,

नन्ही बिटिया गुलाल संग धाई है।   

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।06।

होली आई है, आई है, होली आई है

आई है,आई है,आई है,होली आई है,

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है।                                                                      

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Uncategorized

2025 से 2026, इस तरह अच्छा बनेगा।

January 4, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

वास्तव में कुछ चीजें होती हैं और कुछ उस आधार पर बनती हैं जैसे नदी होती है और नहरें बनती हैं। इसी तरह हमारे पास हमारा शरीर होता है लेकिन हमारी सोच बनाने से बनती है। हम जो आज हैं यह अपनी पूर्ववर्ती सोच के कारण हैं। जो हम कल होंगे वह आज की सोच का परिणाम होगा। सृजनकर्त्ता के व्यक्तित्त्व को समझना आसान नहीं होता उसके मस्तिष्क में विस्तृत आकाश होता है उसमें छिपे सृजन के बीज दिखाई तो नहीं पड़ते लेकिन परिणाम सामान्यजन को उसका बोध अवश्य करा जाते हैं।

विगत दो सहस्त्राब्दि अर्थात 2000 वर्षों की पूर्णता के पश्चात नई शताब्दी के एक चौथाई वर्ष यानि कि 25 वर्ष बीतते हुए हममें से कई लोगों ने देखे होंगे और कई नवजवानों ने नहीं। विगत वर्ष 2025 अलग अलग लोगों को अलग अनुभूति कराने वाला रहा है और यह नववर्ष 2026 भी विविध परिणाम प्रदाता की भूमिका का निर्वहन करेगा। मानव मात्र का स्वभाव प्रगति उन्मुख रहा है इस लिए वह बेहतर, सुखद सकारात्मक परिणामों की कामना करता है लेकिन केवल कामना या सोचने से कार्य सिद्धि नहीं होगी उसके लिए सकारात्मक प्रयास अवश्यम्भावी होंगे। आपने सुना भी होगा।   

“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।

 न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

2026 को 2025 से इन 10 आधारों पर बेहतर बनाया जा सकता है –

01 – सफलता का समग्र कार्यक्रम / A holistic program for success

02 – उद्देश्य को छोटे छोटे हिस्से में समयबद्ध लक्ष्य पूर्ति / Break down your goals into small, timely goals

03 – स्वानुसाशन / Self-discipline

04 – स्वप्रेरणा /Self-motivation

05 – नियमित स्वस्थ दिनचर्या /Regular, healthy routine

06 – सम्यक कृत्य निरीक्षण व परिमार्जन /Inspection and refinement of proper actions

07 – जोखिम लेने की क्षमता वृद्धि /By Increasing risk-taking ability

08 – तर्क सङ्गत व्यय / Reasonable spending

09 – स्वयं पर विश्वास / Self-confidence

10 – सकारात्मक दृष्टिकोण / Positive attitude     

यह १० तथ्य एक मजबूत आधार बनाने हेतु हैं जब हमारा लक्ष्य हमारे जेहन में स्पष्ट होगा तो हमें अपने आप उस दिशा में प्रगति के विविध आलम्ब दिखाई देंगे। जब आपने ठान लिया तो निश्चित रूप से वर्ष 2026, विगत वर्ष 2025 से अवश्य अच्छा होगा क्योंकि सच्चे कर्मयोगी लक्ष्य प्राप्ति हेतु ही पृथ्वी पर आये हैं। 

  

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Uncategorized•शोध

INTERVIEW

December 27, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

साक्षात्कार

जब आमने सामने बैठकर निरीक्षण और पृच्छा के आधार पर जानकारी प्राप्त की जाती है इस जानकारी के आधार पर मूल्याङ्कन व परिणामों का विश्लेषण किया जाता है इस प्राविधि को साक्षात्कार कहा जाता है।

साक्षात्कार से आशय / Meaning of Interview – साक्षात्कार वह व्यक्तिनिष्ठ व आत्मनिष्ठ विधि है जिससे उद्देश्य केन्द्रित प्रश्नों के आधार पर योग्यताओं, गुणों, समस्याओं आदि के बारे में जानकारी एकत्रित की जाती है। विविध समस्याओं का यथार्थ अधिगम उपयुक्त निर्देशन हेतु साक्षात्कार महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करता है। साक्षात्कार के आशय को स्पष्ट करते हुए गुड व हॉट महोदय ने कहा –

“किसी उद्देश्य हेतु किया गहन वार्तालाप ही साक्षात्कार है।”

अंग्रेजी अनुवाद –

“An interview is an in-depth conversation with a purpose.”

इस सम्बन्ध मेंP.V.Yong ये  के विचार भी मनन करने योग्य हैं –

“साक्षात्कार को एक क्रम बद्ध प्रणाली माना जा सकता है , जिसके द्वारा एक व्यक्ति, दूसरे के आन्तरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप से प्रवेश करता है, जो उसके लिए सामान्यतः तुलनात्मक रूप से अपरिचित है।”

अंग्रेजी अनुवाद –

“Interview may be regarded as a systematic method by which one person enters, more or less imaginatively, into the inner life of another, who is generally comparatively unknown to him.”

एक अन्य प्रसिद्द विद्वान् जॉन डब्लू बेस्ट (John W. Best ने अपने विचार अत्यन्त सरल शब्दों में प्रगटित किये –

“साक्षात्कार एक प्रकार से एक मौखिक प्रश्नावली है। इसके अन्तर्गत उत्तर लिखने के स्थान पर आमने सामने की स्थिति में विषयी मौखिक उत्तर देता है।”

“The interview, is in a sense, an oral type of questionnaire. Instead of writing the response, the subject or interviewee gives the needed information verbally in a face to face relationship.”

उक्त परिभाषाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि शैक्षिक व मनोवैज्ञानिक स्तर संपन्न की गई वह प्रक्रिया साक्षात्कार कहलाती है जो दो व्यक्तियों को निकट लाती है और उनके सम्बन्ध में हमारे ज्ञान में वृद्धि करती है। यह तथ्यों की प्रमाणिकता सिद्ध करने में मदद करती है।

साक्षात्कार के प्रकार / Types of Interview – साक्षात्कार के प्रकार को अच्छी तरह अध्ययन करने हेतु इसे वर्गीकृत कर एक एक का स्पष्टीकरण आवश्यक है इसे मोटे तौर पर इस तरह अभिव्यक्त कियता जा सकता है।

[A] – कार्य के अनुसार [According to functions]

I – निदानात्मक साक्षात्कार (Diagnostic Interview)

II – उपचारात्मक साक्षात्कार (Treatment Based Interview)

III – अनुसन्धान साक्षात्कार (Research Interview)

[B] – भाग लेने वालों के अनुसार (According to Participants) –

I – व्यक्तिगत साक्षात्कार (Individual Interview)

II – सामूहिक साक्षात्कार (Group Interview)

[C] – सम्पर्क अवधि के अनुसार (According to Length of contact) –

I – अल्पकालिक सम्पर्क (Short term contact)

II – दीर्घ कालीन सम्पर्क (Prolong contact)

अध्ययन विधि के आधार पर साक्षात्कार / Interview based on study method –

I – अनिर्देशित साक्षात्कार / Unguided Interview

II – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार /Objective based Interview  

III – पुनरावर्तित साक्षात्कार (Repeated Interview)

साक्षात्कार प्राविधि के गुण / Merits of Interview Technique –

01 – शिक्षित, अशिक्षित व सभी पक्षों का अध्यययन 

02 – समस्या आधारित महत्त्वपूर्ण विश्वसनीय प्राविधि

03 – वैश्विक घटनाओं के प्रभाव का अध्ययन सम्भव

04 – मनोवैज्ञानिक अध्ययन सम्भव

05 – अभिवृत्तियों, भावनाओं, संवेगों का प्रभावी अध्ययन

06 – प्रत्यक्ष निरीक्षण असम्भव होने पर भी अध्ययन सम्भव

07 – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार से तत्सम्बन्धी सङ्कलन सम्भव

08 – प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच सम्भव

09 – तत्सम्बन्धी समस्त तथ्यों का संकलन

10 – वार्तालाप से अप्रत्याशित तथ्य जानकारी सम्भव

साक्षात्कार प्राविधि की सीमाएं  / Limitations of Interview Technique

01 – उपयुक्त मनोवैज्ञानिक तथा योग्य साक्षात्कार कर्त्ता प्राप्ति दुष्कर

02 – हाँ, नहीं में उत्तर प्राप्ति पर विश्लेषण दुष्प्रभावित 

03 – विश्वसनीयता सन्दिग्ध 

04 – आत्मनिष्ठ प्राविधि

05 – वैयक्तिकता का प्रभाव

06 – विविध सामाजिक पृष्ठ भूमि का प्रभाव

07 – अमितव्ययी

08 – साक्षात्कार प्रदाता की गलत सूचना हानिकारक

09 – अतिशयोक्ति सम्भव

10 – पारस्परिक व्यक्तित्व का प्रभाव

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Uncategorized•शोध

QUESTIONNAIRE

December 15, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

QUESTIONNAIRE (प्रश्नावली)

प्रश्नावली उस क्रमबद्ध तालिका को कहा जाता है जो वांछित विषयवस्तु के सम्बन्ध में विविध सूचनाएं अर्जित करने में योग देती है। इसके माध्यम से उद्देश्य समर्पित  प्रश्नों का एक क्रम बना लिया जाता है जो आवश्यक सूचनाएं एकत्रित करने हेतु आवश्यक होता है। प्रसिद्द विद्वान लुण्डबर्ग महोदय के अनुसार –

“मूल रूप में प्रश्नावली उत्तेजनाओं का समूह है जिनके प्रति शिक्षित व्यक्तियों को दिखाया जाता है। जिससे इन उत्तेजनाओं के प्रति उनके मौखिक व्यवहार का निरीक्षण किया जा सके।”

“Fundamentally, the questionnaire is a set of stimuli of which literate people are exposed in order to observe their verbal behaviour under these stimuli.”

 – G.A.Lundberg, op. cit., p183

एक अन्य विद्वान् गुड व हैट महोदय के अनुसार –

“प्रश्नावली एक प्रकार का उत्तर प्राप्त करने का साधन है, जिसका स्वरुप ऐसा होता है कि उत्तरदाता उसकी पूर्ति स्वयं करता है।”

“In general the word questionnaire refers to a device for securing answers to questions by using a form which the respondent fills in himself.”  – Goode & Hatt.

एक भारतीय चिन्तक आर० ए ० शर्मा महोदय के अनुसार

“प्रश्नावली के अन्तर्गत प्रश्नों की सूची या कथनों की सूची को सम्मिलित किया जाता है। न्यादर्श के सदस्यों को प्रश्नों का उत्तर स्वयं भरना होता है सदस्य अपनी विचारधारा, अभिवृत्ति,तथा परिचित सूचनाओं तथा तथ्यों को स्वयं अंकित करते हैं ।”

“The questionnaire consists of a series of questions or statements of which respondents are asked to respond the questions frequently asked for facts of the opinions or preferences of the respondents.”

उक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रश्नावली प्राविधि अधिक वैध व विश्वसनीय है क्योंकि इसमें प्रश्नों के उत्तर स्वयं उन सदस्यों द्वारा अंकित किये जाते हैं। शोधार्थी प्रदत्तों के सङ्कलन हेतु इस प्राविधि का प्रयोग करते हैं।

अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएं / Characteristics of a good questionnaire –

एक अच्छी प्रश्नावली में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए –

01 – प्रश्नावली के महत्त्व बताने वाला विनम्र मुख पत्र (cover letter)

02 – सम्यक निर्देशन

03 – एक विचार एक प्रश्न

04 – संक्षिप्त व बोधगम्य

05 – सार्थक सूचना संग्रहण में सक्षम

06 – स्वच्छ, सुन्दर त्रुटि रहित छपाई 

07 – वस्तुनिष्ठ व निष्पक्ष

08 – प्रश्न क्रम सरल से कठिन

09 – द्विअर्थी, दुष्कर व अप्रिय कथनों से रहित

10 – उद्देश्य केन्द्रित प्रश्नमाला

प्रश्नावली के प्रकार / Types of Questionnaire –

01 – प्रतिबन्धित प्रश्नावली

02 – अप्रतिबन्धित प्रश्नावली

03 – चित्रमयी प्रश्नावली

04 – मिश्रित प्रश्नावली

प्रश्नावली निर्माण सम्बन्धी विविध प्रमुख तथ्य(Various important facts related to questionnaire preparation) -

01 – उद्देश्य आधारित स्वरुप निर्धारण

02 – सम्यक प्रश्नावली लेखन

03 – विज्ञ जनों व तत्सम्बन्धी सहयोगियों का सहयोग

04 – प्राथमिक परीक्षण

05 – त्रुटिहीन उत्तम छपाई

प्रश्नावली के गुण –

01 -विस्तृत क्षेत्र से सूचना प्राप्ति सम्भव

02 – दुरूह क्षेत्रों के लोगों से भी सम्पर्क सम्भव

03 – मितव्ययी

04 – सोचने विचारने का सम्यक समय

05 – वस्तुनिष्ठता

06 – साक्षात्कार के दोषों से मुक्ति

07 – पूर्ण स्पष्ट निर्देश

08 – सम्यक वर्गीकरण सम्भव

09 – विश्वसनीय व वैध

10 – सांख्यकीय विश्लेषण सुगम

प्रश्नावली के दोष –

01 – विस्तृत प्रश्नावली

02 – भ्रम पूर्ण शब्दावली 

03 – वस्तुनिष्ठता का अभाव

04 – असंगत क्रम

05 – छपाई की कमियाँ

06 – व्यापकता का अभाव

07 – असुविधाजनक क्रम से अंकन मूल्याङ्कन दुष्कर

08 – सम्यक निर्देश अभाव

09 – एक पक्षीय

प्रश्नावली के विविध गुण, दोषों व विविध उपादानों का सम्यक विवेचन से यह पूर्णतया स्पष्ट है कि कतिपय कमियों के साथ यह एक समंक संग्रहण का उत्तम विकल्प है।

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Uncategorized•शिक्षा

Objectives of higher education

July 31, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

[उच्च शिक्षा के उद्देश्य]

अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात अपने सपने, अपने उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हम उच्च शिक्षा से जुड़ते हैं। यह शुद्ध ज्ञानात्मक शिक्षा या कोई प्रशिक्षण या तकनीकी शिक्षा हो सकती है। व्यक्ति की स्वशिक्षा के उद्देश्य उसमें निहित होते हैं और ठीक इसी तरह उच्च शिक्षा के अपने कुछ उद्देश्य हैं इन उद्देश्यों को हम इस प्रकार वर्गीकृत कर सकते हैं।

[A] – व्यक्तिगत बौद्धिक और नैसर्गिक विकास / Personal intellectual and emotional development

(i) –  विश्लेषणात्मक चिन्तन /Analytical thinking

(ii) – ज्ञान अधिगमन / Knowledge acquisition

(iii) – जीवन पर्यन्त अधिगम / Lifelong learning

(iv) – व्यक्तिगत क्षमता वृद्धि / Personal capability enhancement

(v) – चारित्रिक विकास / Character development –

[B] – सामाजिक पेशेवर योगदान / Social professional contribution –

(i) – सामाजिक कौशल विकास / Social skills development

(ii) – क्षेत्रीय आर्थिक विकास / Regional economic development

(iii) – सामाजिक क्षमता अभिवृद्धि / Social capacity enhancement

(iv) – वृहत विकास में योगदान / Contribution to macro development

(v) – सांस्कृतिक जागरूकता / Cultural awareness

[C] –स्व परिक्षेत्र में विशिष्ट उद्देश्य / Specific objective in self domain

(i) – विज्ञान व तकनीकी परिक्षेत्र / Science and Technology Zone

(ii) – मानविकी परिक्षेत्र / Humanities Zone

(iii) – पेशेवर परिक्षेत्र / Professional Zone      

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Uncategorized•शोध

MERITS AND DEMERIS OF SAMPLING

January 13, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

न्यादर्श के गुण और दोष

शोध का परिक्षेत्र अत्यन्त व्यापक है और किसी भी परिणाम तक पहुँचने हेतु पग पग पर तथ्यों के गुण दोष का विवेचन करने पर यथार्थ का बोध होता है शोध कार्य से सामान्यीकरण तक पहुँचने के लिए भी न्यादर्श के गुण दोषों को समझना परम आवश्यक है। यद्यपि न्यादर्श अत्याधिक उपयोगी है लेकिन इसके भी कुछ गुण दोष हैं जिन्हे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

MERITS OF SAMPLING

न्यादर्श के गुण

01 – समय की बचत /Saving of time

02 – श्रम की बचत /Saving of labour

03 – गहन व सूक्ष्म अध्ययन /In-depth and detailed study

04 – प्रशासकीय सुविधा /Administrative convenience

05 – विशिष्ट दशाओं में उपयोगी /Useful in specific conditions

06 – लोच का गुण /Quality of flexibility

07 – मितव्ययता/ Economy

DEMERIS OF SAMPLING

न्यादर्श के दोष अथवा सीमाएं

01 – प्रतिनिधि न्यादर्श चयन दुष्कर / Representative sample selection is difficult

02 – पक्षपात की सम्भावना /Possibility of bias

03 – पर्याप्त ज्ञान का अभाव / Lack of sufficient knowledge

04 – विशिष्ट ज्ञान आवश्यक /Special knowledge required

05 – न्यादर्श पर स्थिर रहना कठिन /Difficult to stick to the sample

06 – न्यादर्श सार्वभौमिक विधि नहीं /Sampling is not a universal method

07 – न्यादर्शन प्रयोज्य की अस्थिरता  / Instability of sampling subject

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Uncategorized

Frequency Distribution and Class Interval

July 27, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आवृत्ति वितरण और वर्ग अन्तराल

आवृत्ति वितरण / Frequency Distribution –

जब समंक एकत्रीकरण में कोई अंक बार बार आता है या वह पुनः पुनः दीख पड़ रहा है इसे ही आवृत्ति नाम से जाना जाता है और जितनी बार वह अंक आता है उसे उसकी आवृत्ति कहा जाएगा। मान लीजिये शिक्षा शास्त्र की परीक्षा में 50 विद्यार्थियों को इस प्रकार प्राप्तांक प्राप्त हुए।

46, 57, 48, 57, 48, 76, 73, 80, 76, 83, 57, 48, 46, 57, 73, 48, 78, 48, 80, 73, 48, 76, 76, 46, 73, 81, 80, 78, 73, 76, 73, 65, 78, 83, 57, 48, 57, 46, 76, 73, 80, 73, 65, 73, 48, 46, 48,  83, 73, 76 .

 प्राप्ताङ्कआवृत्तिसंचयी आवृत्ति
460505
480914
570620
650323
731033
760639
780342
800446
810147
830350

वर्ग अन्तराल (Class Interval) –

आवृत्ति वितरण को जब हम प्रदर्शित करते हैं तो ऊपरी और निचली वर्ग सीमा को तालिका के माध्यम से निरूपित करते हैं अर्थात यह प्रत्येक वर्ग की चौड़ाई ही होती है इस समूहीकृत आवृत्ति वितरण को समावेशी वर्ग अन्तराल के आधार पर क्रमबद्ध किया जा सकता है।

वर्ग अन्तराल सूत्र :-

वर्ग अन्तराल = उच्चतम सीमा – निम्नतम सीमा

अर्थात वर्ग अन्तराल ज्ञात करने के लिए किसी वर्ग की उच्चतम सीमा से उसी वर्ग की निम्नतम सीमा को घटा देते हैं.

वर्ग अन्तराल हेतु उदाहरण  (Example for Class Interval) –

वर्ग अन्तराल को वास्तविक ऊपरी परास तथा निचली वास्तविक परास के मध्य जो जो वास्तविक अन्तर होता है उसे ही वर्ग अंतराल कहा जाता है इसे हम निम्न उदाहरण के माध्यम से अच्छी तरह समझ सकते हैं –

(यहाँ हम ऊपर प्रयुक्त समंकों का ही प्रयोग कर रहे हैं। )

वर्ग अन्तराल (Class Interval) or C Iआवृत्ति (Freequency) or f
40 – 5014
50 – 606
60 – 703
70 – 8023
80 – 904

इस उदाहरण के माध्यम से तथ्य पूर्णतः स्पष्ट हो गए होंगे।

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यह सब रस्ते के पत्थर हैं.

January 29, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

यह सब रस्ते के पत्थर हैं,

अक्सर हट जाया करते हैं। 

ये दिल पर रखा बोझ नहीं,

जिससे मर जाया करते हैं।

जीवन के रास्ते दूभर हैं

समतल हो जाया करते हैं।

चलने की हिम्मत की ही नहीं

यूँ, क्यूँ डर जाया करते हैं।

दिखने को काले बादल हैं,

ये भ्रम फैलाया करते हैं।

गर्जन तर्जन सब किया यहीं

फिर, ये उड़ जाया करते हैं।

इस जग के किस्से नश्वर हैं

किसी समय डराया करते हैं।

मन की हलचल बोझ नहीं

प्रश्न हल हो जाया करते हैं।

जो मार्ग के काँकड़ पाथर हैं,

सब राज बताया करते हैं।

जिनकी किस्मत में गति नहीं,

वो ‘नाथ’ दब जाया करते हैं।

यह सब रस्ते के पत्थर हैं,

अक्सर हट जाया करते हैं ।।


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Uncategorized•वाह जिन्दगी !

संस्थान सही हाथों में है। 

February 17, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

गर संस्था खुद परिवार बने, संस्थान सही हाथों में है।

छल और प्रपञ्च से दूर रहे,  संस्थान सही हाथों में है।

यह सच है, दुनिया वाले, पथ में कण्टक बिछवायेंगे।

गर उन सबसे बच के निकले, संस्थान सही हाथों में है। ।1।

मानवीय मूल्य का ख्याल रखे, संस्थान सही हाथों में है।

यदि भूल के भी भटकाव न हो, संस्थान सही हाथों में है।

जब हम दायित्व निर्वहन कर, संस्था को उन्नत बनाएंगे। 

कर्म को उचित सम्मान मिले, संस्थान सही हाथों में है। ।2।

जब दिन प्रतिदिन परवान चढ़े, संस्थान सही हाथों में है।

जब वह समाज की दिशा गढ़े, संस्थान सही हाथों में है।

हमसब समाज संग मिलकर के यह करतब दिखलाएंगे।

जब सभी कर्त्तव्य निर्वहन करें, संस्थान सही हाथों में है। ।3।

सब भेद – भाव को भूल चलें, संस्थान सही हाथों में है।

ना जातिवाद को प्रश्रय मिले, संस्थान सही हाथों में है।

आवाहन और सौगन्ध यही हिलमिल समरसता लाएँगे।

पावन परिवार का साथ मिले, संस्थान सही हाथों में है। ।4।

चापलूसी को न जगह मिले, संस्थान सही हाथों में है।

मर्यादा रीति और नीति बढे ,संस्थान सही हाथों में है।   

संस्था की मान प्रतिष्ठा हित नित कदम उठाए जाएंगे।

संस्था को नवसम्मान मिले , संस्थान सही हाथों में है। ।5।

हो वादों का अम्बार नहीं, संस्थान सही हाथों में है।

निष्ठा को उसका मूल्य मिले,संस्थान सही हाथों में है।   

निष्ठा, लगन, उत्साह सहित पथ प्रशस्त कर जाएंगे।

स्वप्नों का नाथ किला न ढहे, संस्थान सही हाथों में है।।6।

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Uncategorized•दर्शन

मानवता वाद (HUMANISM)

January 21, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ममानवतावाद का उद्भव एक विशेष प्रकार की मानव स्थिति की अनुभूति पर निर्भर है तथा वह अनुभूति इस मानवीय संवेदना की है जिससे आधुनिक काल का मानव घिरा है, विज्ञान एवम् टैक्नोलॉजी की प्रगति से युक्त मानसिकता, विज्ञान की मानकीकरण की विकृति, विश्व युद्ध की विभीषिकाओं की स्पष्ट अनुभूति, मानव के संत्रास, कुण्ठा, निराशा, चिंता, अकेलापन व नीरसता की स्पष्ट अनुभूति – इसकी पृष्ठभूमि में मानवतावादी दृष्टि सर्जित होती है प्रोटागोरस (Protagoras) ने 480 से 490 ईसा पूर्व कहा-

“मानव सभी बातों का माप दण्ड है जो है वह वास्तविक है और जो नहीं है वह वास्तविक नहीं है।”

“Man is the measure of all things; of what is, that it is, of what is not, that it is not.”

मानवतावाद का आशय उस वाद से है जिसमें मनुष्य के अस्तित्व को स्वीकार किया गया है इसमें मानव ही सबकुछ है वह किसी का प्रतीक मात्र नहीं है उसकी वैयक्तिकता पहचानी जा सकती है।

डॉ 0 राधाकृष्णन ने ऑक्सफ़ोर्ड में अपने एक भाषण में कहा था –

“Man has become the philosopher of man. A new humanism is on the horizon. But this time it embraces the whole of mankind.”

– Dr. Radha Krishanan

“मनुष्य मनुष्य का दार्शनिक हो गया है। एक नया मानवतावाद क्षितिज पर उदीयमान है किन्तु इस बार वह सम्पूर्ण मानवता को अपने में समेटे हुए है।”

मानवतावाद सम्बन्धी विचारधारा अनेक पाश्चात्य व भारतीय दार्शनिकों के चिन्तन का विषय रही है डॉ राधा कृष्णन, जाकिर हुसैन, जवाहर लाल नेहरू, विवेकानन्द, रबीन्द्र नाथ टैगोर सभी इसका समर्थन करते दीखते हैं यह दर्शन मानवता को दर्शाता है।     

मानवतावादी दर्शन वह दर्शन है जो मनुष्य को सर्वोपरि मानता है उनके अनुसार मनुष्य ही इस संसार का केन्द्र बिंदु है वह अपने भाग्य का निर्माण खुद करता है।

ब्रह्मवादियों तथा निरपेक्ष वादियों के अनुसार –

“ब्रह्म कोई अतिरिक्त या पारलौकिक सत्ता नहीं है यह मनुष्य के स्वरुप का ही एक आयाम है।”

वर्तमान में मानव पहचान की जो बेचैनी है उसके बीज इतिहास के अकुलाहट युक्त पृष्ठों के बीच छिपे हैं इतिहास भी समस्त सृजन में मानव की भूमिका को नज़र अन्दाज करने के पक्ष में नहीं है मैस्लो(Maslow) महोदय कहते हैं –

“Humanism is a word which is used by writers in many different senses, One of these implies that man makes up the entire framework of human thought, that there is no God, no super human reality to which he can be related or can relate himself.”

“मानवतावाद एक ऐसा शब्द है जो विभिन्न लेखकों द्वारा विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त किया गया है इनमें से एक में यह अर्थ निहित है कि मनुष्य मानव विचार की समस्त पृष्ठ भूमि है, ईश्वर नहीं है, कोई अति मानवीय वास्तविकता नहीं है जिससे मनुष्य को जोड़ा जा सके।”

वैज्ञानिक मानवतावाद (Scientific Humanism )-

वैज्ञानिक मानवता वाद जीवन के प्रति मानव केन्द्रित दृष्टिकोण है, वैज्ञानिक मानवतावाद सृष्टि के प्रति उसके दृष्टिकोण एवम् जीवन के लक्षण तथा मान्यताओं, सत्य के स्वरुप आदि के सम्बन्ध में विशिष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है नेहरू जी ने मानवतावाद एवम् वैज्ञानिक प्रवृत्ति के बीच के संश्लेषण को वैज्ञानिक मानवतावाद का दर्जा दिया था।

वैज्ञानिक मानवतावादी सृष्टि को भ्रम न मानकर सत्य व विभिन्न सम्भावनाओं से युक्त मानते हैं वैज्ञानिक मानवतावाद एक ऐसा दृष्टिकोण है जो केवल वैज्ञानिक या केवल मानवीय नहीं है वैज्ञानिक मानवतावाद जीवन के प्रति मानव केन्द्रित दृष्टिकोण है इस सम्बन्ध में साबिरा जैदी कहती हैं-

“It affirms in a resounding voice the dignity and value of man and asserts unequivocaly that human happiness is the highest goal of all social reforms.”

“यह मनुष्य की गरिमा व मूल्य की ध्वनि को पुनः गुंजरित करता है और मानता है कि सभी समाज सुधारकों के लिए मनुष्य का सुख ही सर्वोच्च भद्र या शिव है।”

वैज्ञानिक मानवतावाद की शैक्षिक मान्यताएं (Educational premises of Scientific Humanism)-

1 – शिक्षा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण

2 – सर्जनात्मकता

3 – उत्तर दायित्व निर्वहन व स्वतन्त्रता के उचित प्रयोग हेतु शिक्षा महत्त्वपूर्ण

4 – व्यावहारिकता व व्यवसाय प्रयोजन आवश्यक

मीमांसा आधारित संक्षिप्त विवेचन-

किसी भी दर्शन को अधिगमित करने हेतु मीमांसाओं की महती भूमिका है मानवतावाद के वास्तविक अर्थ को समझने हेतु उसकी तत्त्व मीमांसा (Metaphysics), ज्ञान व तर्क मीमांसा (Epistemology and Logic),एवं आचार व मूल्य मीमांसा (Ethics and Axiology)  संक्षेप में प्रस्तुत हैं –

तत्त्व मीमांसा – ये प्रकृति को मूल तत्त्व मानते हैं और किसी अलौकिक सत्ता पर विश्वास नहीं करते। भौतिक जगत को सत्य मानते हुए मनुष्य को प्रकृति की श्रेष्ठतम रचना स्वीकार करते हैं।

ज्ञान व तर्क मीमांसा – इनके अनुसार सच्चे ज्ञान  श्रेणी में पदार्थजन्य जगत व उसकी समस्त क्रियाएं आती हैं विवेक आधारित ज्ञान   व तर्क की कसौटी पर खरा सत्य ही ज्ञान की श्रेणी में आएगा। 

 आचार व मूल्य मीमांसा – मानवतावादियों की बड़ी संख्या प्रेम, सहयोग, सहानुभूति, सुन्दरता,सामाजिक समानता, न्याय आदि को आचरण में उतारने व मूल्य के  रूप में स्वीकारने की बात करते हैं इनके अनुसार सम्पूर्ण मानवता की भलाई सबसे बड़ा मूल्य है।

मानवतावाद की प्रमुख विशेषताएं (Chief Characteristics Of Humanism)-

1 – यह संसार सत्य है भ्रम नहीं। यह निरन्तर विकास की असीम सम्भावनाओं से युक्त है। 

2 – मानव सेवा हेतु मानवता वाद का अभ्युदय हुआ है।

3 – मानव शक्तिशाली है व अपनी समस्याओं को सुलझाने में सक्षम है।

4 – मानव एक सृजनात्मक जीव है।

5 – मानव असीम प्रगति उन्मुख सम्भावनाओं से युक्त है और अपने भाग्य का निर्माता है।

6 – मानवतावाद का मानव शिवम् व सुन्दरम की धारणा से युक्त है।

7 – मानवतावाद मानव को सबसे गुणयुक्त स्वीकार करता है।

8 – यह संस्कृति का पुनः जागरण करना चाहता है तथा यह मानवीय संस्कृति के पुनरुद्धार हेतु विश्व रंगमञ्च पर अवतरित हुआ है।

9 – यह वाद विकासोन्मुखता पर विश्वास करता है और मानव को इस हेतु विवेकयुक्त प्राणी स्वीकार करता है।

10 – मानवतावाद मानवीय प्रकृति को लचीला, परिवर्तनशील व सहयोगी मानता है।

मानवतावादी शिक्षा का उद्देश्य (Aims of Humanistic Education)-

1 – आत्म विश्वास जाग्रत करना

2 – समस्त अन्तर्निहित शक्तियों का विकास

3 – मानवता का अधिकतम कल्याण

4 – मानव को सुखी बनाना

5 – समालोचनात्मक रचनात्मकता का विकास

“The cultivation of constructive criticism and a critical constructiveness should be one of the foremost aims of education, according to scientific humanism.”  – Sabira K Zaidi : Education and Humanism  (Indian Institute of Advanced Studies, Shimla 1971 p.110) 

6 – सशक्त चेतना का विकास

7 – समाज का विशिष्ट अंग बनाने हेतु आत्मबोध जाग्रत करना

8 – मानसिक स्वास्थ्य

9 – मानवीय मूल्य व सद् विवेक जागरण

10 – आत्म अनुशासन की भावना का विकास

“Education to be complete must be human, it must include not only the training of intellect but the refinement of the heart and discipline of the spirit.” – Dr. Radha Krishanan

“शिक्षा पूर्ण होने के लिए मानवीय होना चाहिए, इसमें न केवल बुद्धि का प्रशिक्षण शामिल करना चाहिए वरन ह्रदय का परिष्करण तथा आत्मा का अनुशासन भी।”

मानवतावाद व पाठ्यक्रम (Humanism and Curriculum)-

मानवतावादी पाठ्यक्रम में हृदय, आत्मिक विकास और मानवता पर विशेष ध्यान देना चाहते हैं इस सम्बन्ध में डॉ 0 राधा कृष्णन के शब्द भी यही इशारा करते हैं। – “No education can be regarded as complete if it neglects the heart and the spirit.”

“कोई भी शिक्षा पूर्ण नहीं समझी जा सकती यदि वह हृदय तथा आत्मा की उपेक्षा करती है।”

मानवतावादी भाषा के विकास के साथ मानवोपयोगी विषयों से मानव को जोड़ना चाहते हैं इसीलिये मानवतावादी उद्देश्यानुरूप निम्न विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करना चाहते हैं –

शिक्षा के उद्देश्य              —————————-     विषय

मानसिक विकास             —————————-   कला, तर्क शास्त्र, विज्ञान, गणित

शारीरिक विकास              —————————- व्यायाम, योग, शिल्प, क्रियात्मक शिक्षा

आध्यात्मिक विकास     —————————-  दर्शन, मूल्य शिक्षा, नीतिशास्त्र, धर्म शास्त्र

सामाजिक विकास       ————————–  इतिहास, साहित्य, संस्कृति, समाज विज्ञान, दार्शनिक व शिक्षा शास्त्रियों की जीवनी

उक्त के अतिरिक्त मानवतावादी हर उस विषयवस्तु का समर्थन करते हैं जो मानवतावादी विचार के प्रसार में आवश्यक हो।

शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods) –

ये जीवन से सम्बन्धित व्यक्तिगत विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करते हुए अधिगम कराना चाहते हैं इसीलिये तर्क विधि, प्रश्नोत्तर विधि, समस्या समाधान विधि, वाद विवाद विधि पर विशेष जोर देते हैं ये उच्च मानवीय संवेदना को समेटे हुए इन्द्रिय अनुभूत ज्ञान को भी विवेक और तर्क की कसौटी पर परखने के बाद आत्मसाती करण की प्रेरणा देते हैं।

मानवतावाद व शिक्षक (Humanism and Teacher)-

मानवतावादी चाहते हैं की शिक्षण कार्य उन लोगों को मिले जो मानवीय दृष्टिकोण पर बल देने वाले हों जैसा कि ब्रुबेकर (Brubacher) महोदय कहते हैं –

“Humanism emphasises human nature and the human point of view.”

“मानवतावाद मानव स्वभाव एवम् मानवीय दृष्टिकोण पर बल देता है।”

मानवतावादी शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु अध्यापक क्रान्तिकारी मानवतावादी हो एवम् निम्न गुणों से युक्त हो –

1 – शिक्षक, शिक्षण जैसे महान दायित्व बोध में सक्षम हो। 

2 – अपने क्षेत्र का विद्वान् हो।

3 – मानसिक, आध्यात्मिक, शारीरिक, आन्तरिक आदि विविध शक्तियों के सम्यक विकास हेतु महत्त्वपूर्ण भूमिका निर्वहन के योग्य हो। 

4 – मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को समझ कर विकास का पथ प्रशस्त करने वाला हो।

5 – सकारात्मक विकास व प्रेरणा देने में सक्षम हो।

मानवतावाद व शिक्षार्थी (Humanism and Student)-

ये शिक्षार्थियों की स्वतन्त्रता व व्यक्तित्व का आदर करते हैं  तथा शिक्षक व शिक्षार्थी के बीच शासक व शासित जैसे सम्बन्धों के घोर विरोधी हैं। मानवतावादी प्रेम व सहयोग आधारित सम्बन्धों की उम्मीद रखकर अध्यापकों से मानवतावादी दृष्टिकोण की अपेक्षा करते हैं और चाहते हैं कि वे अपने बालकों को भय द्वन्द व तनाव से दूर रखें। इससे विद्यार्थियों में मानवीय गुणों का विकास किया जा सकेगा।

शिक्षा के अन्य विविध पक्ष –

1 – जन शिक्षा

2 – स्त्री शिक्षा

3 – व्यावसायिक शिक्षा

4 – धार्मिक शिक्षा

5 – यथार्थ शिक्षा

मूल्यांकन (Evaluation)-

मानवतावाद शिक्षा द्वारा मानव को मानवता का पाठ पढ़ाकर श्रेष्ठ नागरिक बनाना चाहता है यह सम्पूर्ण मानवता को एक मानकर मनुष्य को विश्व का मूलभूत बिन्दु व  केन्द्र मानता है यह धर्म, जाति, राज्य, समाज किसी का भी विरोधी नहीं है यह मात्र मानव मानव को अलग करने वाली संकीर्णताओं का विरोध करता है यह विध्वंसक आयुधों को उचित नहीं समझता जिसने मानव मात्र के समक्ष अस्तित्व का खतरा पैदा कर दिया है।

ये तर्क को ज्ञान का आधार मानते हैं इनके पाठ्यक्रम,शिक्षक, शिक्षार्थी,शिक्षण विधि विद्यालय आदि के विचारों का मूल मन्तव्य मूल्य आधारित मानवीय गन्तव्य निर्धारित करना है। व्यक्तिगत भिन्नता, जन शिक्षा, सामान शिक्षा,मूल्य आधारित शिक्षा,तर्क शक्ति उन्नयन,सृजनात्मकता उन्नयन सम्बन्धी विचार स्वागत योग्य हैं लेकिन धर्म की जगह धार्मिक संकीर्णताओं से दूर रहने की प्रेरणा दी जानी चाहिए।

Encyclopidia Britannica में मानवतावाद को सही पारिभाषित किया गया –

“Humanism is the attitude of mind which attaches primary importance to mean and to his faculties, affairs, temporal aspirations and well being,

“मानवता वाद मनुष्य के मस्तिष्क की वह अभिवृत्ति है जो मनुष्य को और उसके विभिन्न पक्षों, कार्यों, इच्छाओ और उसके हित को सर्वाधिक महत्त्व देती है।”

इन्होने स्वार्थी और संकीर्ण मानसिकता को दिशा देने का भरपूर प्रयास किया लेकिन सार्थक परिणाम आज भी दूर की कौड़ी जान पड़ते हैं मानवीय विकास के विभिन्न आयामों को समेटने के बावजूद इनकी शिक्षा दर्शन को देन अप्रभावी है इसे सच्चे धार्मिक दर्शन के आधारिक अवलम्ब की आवश्यकता है।

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