ब्रह्माण्ड के यथार्थ स्वरुप और उसमें मनुष्य के जीवन की तात्त्विक विवेचना तत्त्व मीमांसा के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसी के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य और उनकी प्राप्ति के उपाय विवेचित किये जाते हैं और इस आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि जीवन दर्शन के आधार पर समाज के उद्देश्य निर्धारित होते हैं जिन्हें शिक्षा अपना उद्देश्य बना लेती है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षा के विविध अंग सहयोग करते हैं इसीलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण विधि , शिक्षक, विद्यार्थी, अनुशासन सभी जीवन दर्शन के आलोक में क्रियान्वित होते हैं। अतः यह पूर्णतया स्पष्ट है कि इन सभी शिक्षा के अंगों का विकास तत्त्व मीमांसा के आधार पर होता है।
विविध दर्शन की तात्त्विक विवेचना हमें बताती है कि विविध दर्शन चाहे वह आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, प्रयोजनवाद, अस्तित्ववाद कोई भी हो। तत्त्व मीमांसा में उसकी व्याख्या का प्रभाव इनके शैक्षिक उद्देश्यों व इसके अन्य अंगों पर पड़ता है जिसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।
तत्त्व मीमांसा और शिक्षा के विविध घटक
Metaphysics and various components of education
शिक्षा के विविध घटकों की तत्त्व मीमांसात्मक विवेचना निम्न शिक्षा के उद्देश्य स्व आलोक में प्रस्तुत करती दीख पड़ती है –
A –शिक्षा के उद्देश्य –
01 – शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य / Social objectives of education – सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा इस प्रकार करती है जिससे मानव समाज से सामंजस्य बिठाकर समाज ,राज्य, राष्ट्र सबकी प्रगति में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। बॉसिंग महोदय कहते हैं कि
“The function of education is concerned to be the adjustment of man to environment and that the most enduring satisfaction may accrue (अक्रू= अर्जित) to the individual and to the society.”
“शिक्षा का कार्य मनुष्य को पर्यावरण के अनुरूप ढालना है और यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति और समाज दोनों को ही सबसे स्थायी संतुष्टि प्राप्त हो।”
02 – व्यक्तित्त्व का पूर्ण विकास / Complete development of personality – शिक्षा के द्वारा समग्र क्षमताओं का सम्यक विकास होना चाहिए जैसा कि गांधीजी ने कहा –
“By education I mean an all round drawing out of the best in child and man – body, mind and spirit.”
“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के भीतर की सर्वोत्तम विशेषताओं – शरीर, मन और आत्मा – को समग्र रूप से बाहर निकालना है।”
03 – चारित्र, ज्ञान व स्वस्थ आदतों का विकास /Development of character, knowledge and healthy habits. – इस तरह के विकास से सामान्यतः सभी दार्शनिक सहमति रखतेहैं जैसाकि ड्रेवर महोदय का विचार है –
“Education is a process in which and by which the knowledge, character and behavior of the young are shaped and molded.”
“शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा युवाओं के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को आकार दिया जाता है।”
04 – पूर्ण जीवन की तैयारी का उद्देश्य / The purpose of preparing for a fulfilling life –
हर्बर्ट की तरह कई विद्वान् पूर्ण जीवन की तैयारी पर बल देते हैं जैसाकि डीवी महोदय ने भी कहा –
“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”
“शिक्षा व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने परिवेश को नियंत्रित करने और अपनी संभावनाओं को पूरा करने में सक्षम बनाएंगी।”
05 – समग्र व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य / Aim for holistic personal development – बालक में निहित गुणों के विकास की बात विविध दर्शन करते हैं इन्ही विचारों से सहमति जताते हुए विवेका नन्द जी कहतेहैं –
“Education is the manifestation of perfection already in man”
“शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”
06 – सभी स्थितियों में सामंजस्यपूर्णता का उद्देश्य / Aim for harmony in all situations –
जीविकोपार्जन की क्षमता हासिल करना हो या प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को ढालना, शिक्षा और इससे जुड़े दर्शनों की तात्त्विक विवेचना उसे सामंजस्यपूर्ण बनाने पर जोर देती है। जैसा कि रबीन्द्र नाथ टैगोर के इन शब्दों से दृष्टिगत होता है। –
“The highest education is that which does not merely give us information but makes our life in harmony with all existence.”
“सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंज स्यपूर्णबनाती है।”
B- शिक्षा का पाठ्यक्रम / Curriculum of education –
जहाँ आदर्शवादी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के साथ नैतिकता को पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं वहीं प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में स्वानुभव विविध विज्ञान, गणित आदि के स्थापन के साथ इन्द्रिय प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं। प्रयोजनवादी सामाजिक तात्कालिक समस्याओं से सम्बंधित विषयों का चयन करना चाहते हैं।
आधुनिक युग का वह पुरोधा जिसे हम श्रेष्ठ दार्शनिक, चिन्तक, शिक्षा शास्त्री के रूप में स्वीकारते हैं। इनके क्रान्तिकारी विचारों ने मानवता की दिशा निर्धारण का गम्भीर प्रयास किया मानव को विविध संकीर्णताओं से ऊपर उठा यथार्थ ज्ञान दर्शन का साक्षात्कार कराया और तत्कालीन मानवता को सरल दिशा बोध का सम्यक प्रयास किया।
जीवन की विसंगतियों से जूझते हुए ये थियोसोफिकल
सोसायटी की अध्यक्षा डॉ ० एनी बेसेन्ट के सम्पर्क में आये इनकी प्रतिभा को पहचान
कर उन्होंने इनकी शिक्षा दीक्षा का भार अपने ऊपर ले लिया और उच्च शिक्षा की
प्राप्ति हेतु इंग्लैण्ड भेजा। जब इन्हे 1922 में
अध्यात्म की अनुभूति हुयी तभी से इनके जीवन की दिशा मानव कल्याणार्थ चिन्तन के
धरातल पर उतरी। मानव को दुखों से छुटकारा दिलाने का मार्ग तलाशना ही जीवन का
उद्देश्य हो गया।
इन्होंने
बौद्धिक वर्ग के बीच अपनी बात रखने के लिए अमेरिका, आस्ट्रेलिया,
इंग्लैण्ड, भारत, हालेण्ड में व्याख्यान दिए। इनके विचारों में प्यार (Love)
पर विशेष ध्यान देने की ओर ध्यानाकर्षण किया गया। इन्होने कहा –
“यदि
आपके हृदय में प्यार है तो फिर किसी ईश्वर को तलाश करने की आवश्यकता नहीं, क्योंकि प्यार ही ईश्वर है।”
प्यार हेतु ये
आत्म ज्ञान और आत्म शोध को आवश्यक तत्व स्वीकारते हैं।
शैक्षिक
चिन्तन (Educational thinking)-
इन्होंने
अपने विचारों के प्रसार हेतु व्याख्यान, पुस्तक
लेखन, व्याख्यान संग्रह प्रकाशन आदि को माध्यम बनाया आज इनकी
कैसेट्स भी उपलब्ध है इनका मूल कार्य अंग्रेजी में है लेकिन आज विविध भारतीय भाषाओँ
में इनका अनुवाद हो चुका है। हिन्दी में
अनुवादित कुछ रचनाओं को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं –
संस्कृति का प्रश्न,स्कूलों
के नाम पत्र, हिंसा से परे, ज्ञान से मुक्ति, जीवन
की पुस्तक,प्रथम एवं अंतिम मुक्ति,जो
मनुष्य कुछ नहीं है वह सुखी है,
ध्यान,
आनन्द की खोज,दिमाग ही दुश्मन
है?, ईश्वर क्या है?, प्रेम क्या है?, मन क्या है?, शिक्षा क्या है?, जीवन
और मृत्यु, सत्य और यथार्थ, सोच
क्या है? आदि ।
शिक्षा से आशय /Meaning of education -
इनके द्वारा
स्थापित संस्था ‘कृष्णमूर्ति फाउण्डेशन’ आज
भी इनके विचारों के क्रियान्वयन कर रही है
इनके लेखन व विचारों से शिक्षा की प्रभाव शीलता स्पष्ट होती है इन्होने कहा
–
“शिक्षा द्वारा ही मनुष्य को जीवन का सही अर्थ समझाया जा सकता है और शिक्षा
द्वारा ही उसको गलत रास्ते से सही रास्ते पर लाया जा सकता है।”
इनका मानना हे कि शिक्षा विश्व को वस्तुगत रूप से देखना सिखाती है
इसीलिये जे ० कृष्णमूर्ति महोदय
स्पष्ट रूप से कहते हैं –
“शिक्षा का कार्य तुम्हें एक पूर्णतया मित्र बुद्धिमत्ता पूर्ण तरीके से
संसार का सामना करने में सहायता करना है।”
“The function of education is to help you to face
the world in a totally different intelligent way.”
अर्थोपार्जन को यह मात्र एक पक्ष के रूप में स्वीकारते
हैं और रटना, डिग्री प्राप्त करना, परीक्षा
पास करना आदि को शिक्षा नहीं मानते ये कहते हैं –
“अन्तः मन का ज्ञान ही शिक्षा है।”
शिक्षा के उद्देश्य /Aims of education –
बहुत से विद्वानों से भिन्न मत रखते हुए जे ० कृष्ण मूर्ति महोदय कहते हैं -
"To be really educated means not to confirm, not to imitate, not to do what millions and millions are doing. If you feel like doing that, do it, but be awake to what you are doing.''
"वास्तविक रूप से शिक्षित होने का अर्थ करोड़ों जो कर रहे हैं उससे अनुरूपता, उसका अनुसरण, उसे करना नहीं है। यदि तुम वह करना चाहते हो तो करो? परन्तु जो कुछ तुम कर रहे हो उसके प्रति जागरूक रहो। ''
जे ० कृष्ण मूर्ति एकीकृत मानव, समग्र या सम्पूर्ण मानव के प्रगटन हेतु शिक्षा को एक आवश्यक कारक के रूप में स्वीकार करते हैं और इसकी प्राप्ति हेतु शिक्षा के विभिन्न उद्देश्य इनके विचारों द्वारा स्पष्ट होने लगते हैं जिन्हे हम इस प्रकार क्रम दे सकते हैं -
1 - आत्म ज्ञान का उद्देश्य/Purpose of self-knowledge -
इनका मानना है कि प्रत्येक मानव स्वयं को जानने का प्रयास करे इनका अपने को
जाने से आशय चेतन आत्म तत्व को जानने से नहीं है बल्कि ये चाहते हैं कि शिक्षा यह जानने में मदद करे कि हम क्षण
क्षण क्या हैं अर्थात विभिन्न क्षणों में हम क्या सोचते, विचार
करते, अनुभव करते हैं हमें उसे जानने का प्रयास करना चाहिए। ऐसा
न हो कि जिस धर्म का उद्भव मानव से हुआ है वह उसका गुलाम बनकर न रह जाए।
2 - सृजन शीलता का विकास/Development of creativity -
इससे इनका आशय शरीर, आत्मा, मन
तीनों की सृजनशीलता से है। विद्यार्थियों को स्वतंत्र निर्णयन के अवसर प्रदान किये
जाएँ इनके ऊपर अपने विचार थोपने का प्रयास न किया जाए। यह भयमुक्त वातावरण
सृजनशीलता की वास्तविक पृष्ठ भूमि तैयार करेगा।
3 - वर्तमान महत्त्वपूर्ण/Importance ofPresent time -
ये कहते हैं कि काल की सत्ता नहीं है और शुद्ध चेतना मात्र का अस्तित्व है।
हमारे जीवन का वर्तमान क्षण ही प्रिय अप्रिय भूत या भविष्य से सम्बन्ध रखने वाला
हो सकता है इसीलिये ये जीवन में वर्तमान को महत्त्वपूर्ण मानते हैं। अतः शिक्षा
वर्तमान में जीना सिखाये।
4 - विज्ञान का यथोचित समावेशन /Reasonable inclusion of science-
ये विज्ञान व तकनीकी के विरोधी नहीं थे इनका मानना था की विज्ञान को मानव
के विकास का सहयोगी होना चाहिए। ये विज्ञान के सम्यक प्रयोग द्वारा मानव मात्र का
कल्याण करना चाहते थे।विज्ञान व तकनीकी को कोई ऐसा कार्य सम्पादित नहीं करना चाहिए
जो मानवता विरोधी हो।मानव मात्र के कल्याणार्थ अध्यात्म और विज्ञान का यथायोग्य
सम्मिलन भी होना चाहिए।
5 - संवेदनशीलता में वृद्धि /Increased sensitivity-
इनका मानना था कि बालकों को प्रतिस्पर्धा और भय मुक्त वातावरण मिले अनुशासन
के साथ संवेदनशीलता का गन अपरिहार्य है। बच्चों में प्रेम का ऐसा प्रस्फुटन हो
जिससे वे प्रकृति व मानव मातृ से प्रेम करना सीख सकें। वे इतने संवेदनशील बनें की
क्रोध, घृणा,
हिंसा,
द्वेष को भाव पूर्ण तिरोहित हो जाए।
6 -व्यावसायिक योग्यता का विकास/Development of professional competence-
यह नितान्त पलायनवादिता की जगह व्यावहारिकता से बालक को जोड़ना चाहते थे इसी
लिए बालक को व्यावसायिक निपुणता सिखाना चाहते थे क्योंकि जीवन यापन हेतु कोइ न कोइ
व्यवसाय प्रत्येक को करना ही होता है।शिक्षा को इंगित करते हुए मानव को एक विशेष
सन्देश देते हुए इन्होने कहा –
“Education must help in facing the world in a totally different,
intelligent way, knowing you have to earn a livelihood, knowing all the
responsibilities the miseries of it all.” Begning of Learning, p 171
“यह जानते हुए की तुमने जीविकोपार्जन करना है, सम्पूर्ण
जिम्मेदारियों को निभाना है उस सबका दुःख उठाना है। शिक्षा को तुम्हें एक पूर्णतया
मित्र, बुद्धिमत्ता पूर्ण तरीके से संसार का सामना करने में
सहायता करनी चाहिए। ”
7 - नवीन मूल्यों की वाहक संस्कृति का निर्माण/Creating a culture of new values-
इनका स्पष्ट रूप से मानना था कि विविध संस्कृतियों का प्रभाव हमारे
दृष्टिकोण को संकीर्ण कर देता है जबकि आवश्यकता है पूर्व धारणाओं व पूर्वाग्रहों
से मुक्त होने की। शिक्षा का उद्देश्य ऐसी अन्तः चेतना व आत्मिक उत्थान की पृष्ठ
भूमि बनाना है जो दृढ़तापूर्वक हमें पूर्वाग्रहों के खिलाफ खड़ा कर सके। तभी नवीन
मूल्यों व नव संस्कृति का उद्भवन सम्भव हो सकेगा।
पाठ्यक्रम Syllabus
जे ० कृष्णमूर्ति जी का मानना था कि पाठ्यक्रम ऐसा हो जो सम्पूर्ण मानव
बनाने में सहयोग प्रदान कर सके। इन्होने आर्थिक पक्ष की सबलता हेतु व्यावसायिक शिक्षा, भौतिक
विज्ञान, मानवोपयोगी विज्ञान तकनीकी के प्रयोग पर बल दिया। तथा
भावात्मक पक्ष के प्रबलन हेतु सृजनात्मकता, सौन्दर्य
बोध, कविता कला, सङ्गीत को
पाठ्यक्रम में स्थान देने की बात कही है।
शिक्षण विधियाँTeaching methods
इन्होंने अधिगम की प्रभावशीलता की वृद्धि हेतु निम्न विधियों का समर्थन
किया।
1 – निरीक्षण
विधि
2 – अनुभव
आधरित विधि
3 – स्वाध्याय
4 – परीक्षण
विधि
5 – श्रवण
6 – शान्ति
व मनन
7 – ध्यान
इन्होने ध्यान की महत्ता की गहन
अनुभूति की। जिससे उसके गूढ़ अर्थ निकलते हैं ये मानते हैं कि ध्यान इच्छा शक्ति, निष्प्रयोजन, और
चेष्टा विहीन होता है। जिससे एकाग्रता उद्भूत होकर आत्म ज्ञान के प्रति सचेष्ट
रखती है।
अध्यापक/Teacher
इन्होने बहुत स्पष्ट रूप से यह स्वीकार किया की गुरु एक एकीकृत मानव होना
चाहिए वह धैर्य की प्रतिमूर्ति हो और बच्चों के साथ उसका व्यवहार प्रेम पूर्ण हो।
अपनी इच्छा थोपने की जगह वह विद्यार्थियों की सीखने में मदद करने वाला हो। इस
प्रकार अच्छा अध्यापक वह होगा जो प्रेम के आधार पर बच्चों में लोकप्रिय होगा।
विद्यार्थी/Student
ये विद्यार्थियों को ऐसी चेतना से युक्त करना चाहते हैं जो उनमें वह शक्ति पैदा कर सके जिससे वे स्वयम्
मूल्य सिद्धान्त व नियमों का चयन कर सकें। वे यह बिलकुल नहीं चाहते की उनपर किसी
तरह के सामाजिक, राजनैतिक,
आर्थिक,
सांस्कृतिक,धार्मिक
पूर्वाग्रह थोपे जाएँ। इन्होने
विद्यार्थियों से स्पष्ट रूप से कहा –
“Education implies to live a life of
tremendous order in which obedience is under stood, in which it is seen
where conformity in necessary and where it is totally unnecessary, as to see
when you are imitating.” Ibid p.187
“वास्तविक शिक्षा एक जबरदस्त व्यवस्था का जीवन जीना
है जिसमें आज्ञापालन को समझ लिया जाता है, जिसमें
यह जान लिया जाता है कि कहाँ अनुरूपता आवश्यक है और कहाँ वह पूर्णतया अनावश्यक है, यह
देख लिया जाता है कि कब आप अनुकरण कर रहे हैं।”
अनुशासन/Discipline
ये विद्यार्थियों को आतंरिक व वाह्य दोनों प्रकार की स्वतन्त्रता देना
चाहते हैं। और आत्म अनुशासन के प्रचलित सिद्धान्तों को भी नहीं मानते। लेकिन साथ
हे यह भी कहते हैं की स्वतन्त्रता का अर्थ स्वछंदता नहीं है दूसरों का ध्यान रखा
जाए उनके प्रति विवेकशील,
नम्र व यथोचित व्यवहार किया जाए।
विद्यालय /School
यह प्रभावी अधिगम,
अध्यापन,
व्यवस्थापन हेतु विद्यालय की भूमिका को स्वीकार करते थे।
इन्होने विद्यालय सुसंचालन हेतु प्रशासन में अध्यापक व विद्यार्थियों की भागीदारी
की बात कही। ये चाहते थे कि विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या को सीमित रखा
जाए। विद्यालय की समस्याओं के निराकरण हेतु शिक्षक परिषद व छात्र परिषद का निर्माण
किया जाए। छात्र परिषद में भी शिक्षकों का प्रतिनिधित्व हो ,विद्यालय
की साफसफाई ,अनुशासन,
भोजन आदि की जिम्मेदारी विद्यार्थियों को दी जाए। ऐसे
पर्यावरण का निर्माण किया जाए जिससे विद्यार्थी अपनी शक्तियों को पहचान सकें और
स्वयम् समस्या निराकरण में सक्षम बन सकें।
अन्य आवश्यक पक्ष/Other necessary dimensions
1 – नैतिक व
धार्मिक शिक्षा
2 – जन शिक्षा
3 – स्त्री
शिक्षा
4 – व्यावसायिक
शिक्षा
शैक्षिक चिन्तन का मूल्याङ्कन/Assessment of academic thinking
जे ० कृष्णमूर्ति महोदय शिक्षा को साधारणतया जिन अर्थों में स्वीकार किया जाता
है उसके अनुसार ये पुनः विचार की विषय वस्तु है इन्होने कहा –
“Education generally used to mean learning out of
books, storing up information and using it either selfishly or a particular
cause or a particular sect, and marketing oneself important in that sect of
organisation.”
“साधारणतया शिक्षा का अर्थ पुस्तकों को पढ़ना, जानकारी
का संग्रह करना और उसे या तो स्वार्थ के लिए या किसी विशिष्ट कारण के लिए, किसी
विशेष सम्प्रदाय के लिए स्वयं को उस सम्प्रदाय में अथवा संगठन में महत्त्वपूर्ण
बनाने के लिए प्रयोग किया जाता है। ”
ये अन्तः चेतना के विकास की बात करते हैं जबकि सर्वांगीण विकास में प्रगति
के अधिक बीज संग्रहीत हैं।
उद्देश्यों के क्रम जो पूर्ण मानव के विकास की बात इनके द्वारा रखी गयी
उसके निर्माण हेतु सुझाये गए साधन और बताया गया पाठ्यक्रम अपर्याप्त है। यहां तक
स्पष्ट परिलक्षित होता है कि अन्तः चेतना विकास की यात्रा इस पाठ्य क्रम से होना
संभव नहीं है। शिक्षण विधियों में मनोवैज्ञानिकता अच्छी विचारधारा है पर कोई नई
विधि सुझाई नहीं गयी है। गुरु शिष्य सम्बन्धों को ये आवश्यक नहीं मानते और कहते
हैं –
“Disciple means one who learns but the generally
accepted meaning is that a disciple is one who follows someone, some guru, some
silly person. But both the follower and the one who follows are not learning,”
“शिष्य का अर्थ है जो सीखता है परन्तु शिष्य का साधारण स्वीकृत अर्थ वह है
जो किसी का, किसी गुरु का, किसी
बुद्धिहीन व्यक्ति का अनुसरण करता है,ऐसी
स्थिति में गुरु और शिष्य दोनों नहीं सीख रहे हैं।”
यदि निष्पक्षता के चश्मे से देखा जाए तो इसमें सत्य का अंश परिलक्षित होता
है। शिक्षण को प्रभावी बनाने हेतु जो कम संख्या विद्यालय से संयुक्त करने की बात
इन्होने की वह सैद्धांतिक दृष्टिकोण से अच्छी लगती है पर भारत जैसे अधिक जनसंख्या
वाले देश में व्यावहारिक नहीं है।
कुल मिलाकर इनके विचार नवपरिवर्तन की इच्छा से युक्त लगते हैं पर स्पष्ट
रूप रेखा के अभाव में मजबूत सम्बल नहीं मिल सका है। ध्यान, आत्म
ज्ञान ,आत्म शोध हेतु स्तर का अभाव दिखता है। परन्तु इनके
द्वारा स्थापित विद्यालय प्रेम,
सौंदर्य बोध, सहयोग की अपनी
विचार श्रृंखला के कारण ये हमेशा याद किये
जाएंगे।
भारतीय षड दर्शन में सांख्य सर्वाधिक प्राचीन
है सांख्य सिद्धान्त के संकेत छान्दोग्य, प्रश्न, कठ और विशेषतया श्वेताश्वर उपनिषद से प्राप्त
होते हैं याकोबी के अनुसार इसका प्रगटन उपनिषदों के रचनाकाल के बीच हुआ। प्राचीन
काल से ‘नहि
सांख्य सम ज्ञानम्’
कहकर इसकी प्रशंसा की जाती रही है इसी आधार पर
मैक्समूलर जैसे पाश्चात्य विद्वान ने इसे
अद्वैत वेदान्त के बाद हिन्दुओं का प्रिय और प्रमुख दर्शन कहा है। आचार्य शंकर ने
इसे वेदान्त का प्रमुख मल्ल कहा है। सांख्य दर्शन को ‘षष्टि तन्त्र ‘ के नाम से भी जाना जाता है आचार्य कपिल सांख्य के प्रतिस्थापक आचार्य
माने जाते हैं।
इस दर्शन ने सर्वप्रथम तत्वों की गिनती की
जिसका ज्ञान हमें मोक्ष की ओर ले जाता है गिनती को संख्या कहते हैं संख्या की
प्रधानता के कारण इस दर्शन का नाम सांख्य पड़ा।
दूसरी व्याख्या के अनुसार सांख्य का अर्थ विवेक
ज्ञान है प्रकृति तथा पुरुष के विषय में अज्ञान होने से यह संसार है और जब हम इन
दोनों के ‘विवेक’ को
जान लेते हैं कि पुरुष प्रकृति से भिन्न तथा स्वतन्त्र है तब हमें मोक्ष की
प्राप्ति होती है। इसी विवेक ज्ञान की
प्रधानता होने के कारण इस दर्शन का नाम सांख्य पड़ा।
आचार्य कपिल की दो रचनाएँ उपलब्ध हैं एक तत्व
समास और दूसरी सांख्य सूत्र। तत्व समास सांख्य दर्शन की प्राचीनतम रचना है इसमें
केवल 22 सूत्र हैं सांख्य सूत्र में केवल 537 सूत्र हैं इसकी व्याख्या में निम्न सांख्य
ग्रन्थ उपलब्ध हैं।
1 – सांख्य कारिका (ईश्वर कृष्ण)
2 – जय मङ्गला
3 – युक्ति दीपिका
4 – हिरण्य सप्तति (परमार्थ भिक्षु)
5 – सांख्य तत्व कौमुदी (वाचस्पति मिश्र)
6 – चन्द्रिका (नारायण तीर्थ)
7 – सरल सांख्य योग (हरि हराण्यक
8 – सांख्य प्रवचन (विज्ञान भिक्षु)
9 – सांख्य तत्व विवेचन
(सोमा नन्द)
10 – सांख्य तत्व यथार्थ दीपन (भाव गणेश)
सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा :-
सांख्य दर्शन में प्रकृति तथा पुरुष दोनों को
मूल तत्व माना गया है और इन दोनों में मूल भूत अन्तर किया गया है इस प्रकार शिक्षा
की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो प्रकृति और पुरुष
भेद का ज्ञान प्रदान कर सके। यह शिक्षा प्रक्रिया को बालकेन्द्रित बताते
हुए प्रतिपादित करती है कि मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य मुक्ति है। जो विवेक ज्ञान एवम् योग साधना द्वारा प्राप्त
किया जा सकता है। हम
सृष्टि प्रक्रिया को इस प्रकार समझ सकते हैं –
त्रिगुणात्मक
पुरुष —-प्रकाश ——— ↓
महत
(बुद्धि)
↓
अहंकार
↓
पञ्च महाभूत
आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी
सांख्य
दर्शन के मूल सिद्धान्त :-
1 – प्रकृति व पुरुष के योग से सृष्टि निर्मित
2 – प्रकृति व पुरुष दोनों मूल तत्व – पूरक
3 – पुरुष की स्वतन्त्र सत्ता – वह अनेक –
अनेकात्मवादी दर्शन
4 – मनुष्य (प्रकृति व पुरुष का योग) – सप्रयोजन
5 – मनुष्य का विकास उसके जड़ व चेतन तत्वों पर
निर्भर -तीन दशाएं -1 -शारीरिक, 2 – मानसिक, 3 –
आध्यात्मिक
6 – मानव जीवन का अन्तिम उद्देश्य मुक्ति (दुःख
त्रय से मुक्ति) – शरीर का नाश
7 – मुक्ति के लिए विवेक ज्ञान आवश्यक
8 – विवेक ज्ञान के लिए अष्टांग मार्ग (योग साधन
आवश्यक)
9 – योग मार्ग की प्रमाणिकता हेतु नैतिक आचरण
आवश्यक (यम, नियम अनुपालन)
सांख्य
दर्शन के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य :-
1 – शारीरिक विकास
2 – मानसिक विकास
3 – भावनात्मक विकास
4 – बौद्धिक विकास
5 – नैतिक विकास
6 – मोक्ष प्राप्ति
7 – सद् तथा असद् को समझना (उचित आचरण विकास)
8 – सर्वाङ्गीण विकास
शिक्षा
का पाठ्यक्रम :-
इन्होने
अपने पाठ्यक्रम को भौतिक व आध्यात्मिक आधार प्रदान किया।
भौतिक
विकास के अन्तर्गत ये कर्मेन्द्रिय का विकास लक्ष्य मानते हैं और इसके लिए विविध
पाठ्य सहगामी क्रियाओं व खेल कूद को प्रश्रय देना चाहते हैं।
आध्यात्मिक
विकास हेतु ये ज्ञानेन्द्रियों का विकास करना चाहते हैं और इस हेतु योग,दर्शन,मनोविज्ञान
को प्रश्रय देना चाहते हैं।
शिक्षण
विधि :-
सांख्य
दर्शन मुख्यतः तीन विधियों प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द को प्रयोग करने पर जोर देता है।
प्रत्यक्ष
विधि – इसमें ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों को क्रिया शील बनाया जाता है
जिससे अनुभव व प्रत्यक्षीकरण का अवसर मिलता है।
अनुमान
विधि – इसमें इन्द्रियों से परे चेतना को जिसमें अनुभूति हेतु अवसर प्रदान किया
जाता है इसमें भाव पक्ष प्रधान होता है।
शब्द
विधि – इसके अन्तर्गत दृष्टान्तों,उदाहरणों का उपयोग किया जाता है जिसमें ज्ञान
की प्रमाणिकता सिद्ध होती है।
इनके
अतिरिक्त यह कुछ अन्य विधियों के प्रयोग को भी उचित समझते हैं यथा – सूत्र विधि, कहानी विधि, व्याख्यान
विधि,तर्क विधि, क्रिया
एवम् अभ्यास विधि।
शिक्षक
शिष्य सम्बन्ध –
सांख्य
गहन मीमाँसा का दर्शन है अतः शिक्षक का विषय पर स्वामित्व परमावश्यक है। अध्यापक
में यह योग्यता होनी चाहिए कि वह प्रकृति, पुरुष, जगत सम्बन्धी ज्ञान रखने के साथ विविध सूक्ष्म
अन्तरों को व्यवस्थित तरीके से अधिगम कराने में समर्थ हो।
शिष्य
–
इस
दर्शन के अनुसार विद्यार्थी का व्यवहार नैतिकता पर अवलम्बित हो वह ज्ञान लब्धि
हेतु जिज्ञासु हो व अपने गुरुओं के प्रति आदरभाव रखने वाला हो। सांख्य दर्शन अनुशासन को सर्व प्रथम वरीयता देता
हैं वस्तुतः सांख्य और योग दर्शन एक दूसरे के पूरक हैं और इसीलिये ये यम (अहिंसा,सत्य,अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य)
व नियम (शौच, सन्तोष, तप,स्वाध्याय,ईश्वर
प्राणिधान) का अनुपालन सुनिश्चित करना चाहते हैं।
विद्यालय
–
योग
और सांख्य समकालीन दर्शन हैंइस समय गुरुकुल प्रणाली प्रचलित थी तथा शिक्षा गुरु
आश्रम में प्रदान की जाती थी।
सांख्य दर्शन का प्रभाव शिक्षा के विभिन्न अंगों पर आज भी परिलक्षित
होता है और इसे किसी प्रकार कमतर नहीं आँका जा सकता।
शिक्षा
पर तार्किक प्रत्यक्षवाद का प्रभाव (Impact Of Logical
Positivism On Education)-
तार्किक
प्रत्यक्षवाद ने शिक्षा के उद्देश्यों, पाठ्य क्रम, शिक्षक एवम शिक्षार्थी,
शिक्षण विधियों व अनुशासन को स्वानुसार विवेचित
किया जिसे इस प्रकार अभिव्यक्त कर सकते हैं।
उद्देश्य
( Aims ) –
चूंकि
ये ज्ञान का आधार अनुभव जन्य ज्ञान को मानते हैं इस लिए सार्थक निरर्थक, ज्ञान अज्ञान एवम नीर क्षीर विवेक में समर्थ
ज्ञान को शिक्षा के उद्देश्यों में शामिल करना चाहते हैं और भाषा व स्वशक्ति
परिमार्जन पर जोर देते हुए इस प्रकार उद्देश्य निर्धारण करते हैं –
[A ]- सृजनात्मक शक्ति का विकास [Development Of Creativity
]
[B ]- भाषा पर अधिकार [Command on Language]
[C ]- शारीरिक विकास व इन्द्रिय प्रशिक्षण [Physical
Development and Sensuous Training ]
[D ]- विवेक जागरण [ Intellectual Awakening ]
[E ]- विश्वसनीयता एवम वैद्यता [Reliability and
Validity]
[F ]- व्यावसायिक दक्षता [Vocational Efficiency]
पाठ्य
क्रम [Syllabus ]-
इन्होने
विचार, अध्यात्म, पूर्व
निश्चित नैतिकता का खण्डन कर प्राकृतिक विज्ञानों की सत्यता को सिद्ध कर पाठ्यक्रम
हेतु उपयोगी माना। प्रत्यक्ष अनुभव पर अधिक जोर देने के कारण भाषा,
व्याकरण, तार्किकता के महत्त्व को स्वीकार किया।
शिक्षक
और शिक्षार्थी [Teacher
And Learner]-
ये
वैज्ञानिक सोच वाले यथार्थ के धरातल पर खड़े अध्यापकों को शिक्षा प्रसार हेतु
आवश्यक मानते हैं शिक्षा को बालकेन्द्रित करते हुए विद्यार्थियों को उनकी रूचि मानसिक
योग्यता क्षमता को ध्यान में रखते हुए
शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।
अनुशासन
[Discipline ] –
ये प्रमाणिकता, वस्तुनिष्ठता, यथार्थता, अनुभववादिता, कट्टरता विरोध धार्मिकनैतिकता विरोध का समर्थन
कर अनुशासन स्थापित करना चाहते हैं।
शिक्षण
विधि [Teaching
Methodology ]-
इस
दर्शन के आधार पर कहा जा सकता है कि ये इन प्रमुख शिक्षण विधियों के समर्थक हैं। –
(1)- करके सीखना (Learning
By Doing)
(2)- भाषा विश्लेषण विधि (Language Analytical Method)
(4)- विज्ञान प्रयोगात्मक विधि (Scientific Experimental Method)
(5)- प्रत्यक्षीकरण विधि (Observation Method )
(6)- आगमन विधि (Inductive Method )
विद्यालय
(SCHOOL)-
ये विद्यालयों
में प्रबन्धकों के साथ विद्यार्थियों एवम अध्यापकों को शामिल करना चाहते हैं। ये
अधिगम के अनुकूल माहौल बनाने व अनुभव के आधार पर उत्तरोत्तर प्रगति के पक्षधर हैं।