जीवन परिचय (Life Sketch)

इनका जन्म एक समृद्ध, सुसंस्कृत तथा प्रतिष्ठित परिवार में 6 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ इनके पिताश्री देवेन्द्र नाथ टैगोर विद्वान, धर्मनिष्ठ, कलाप्रेमी, समाज सेवक, राष्ट्रभक्त व सज्जन प्रकृति के थे। सादा जीवन और उच्च विचार परिवार की पहचान थी। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ‘ओरिएन्टल सेमेनरी स्कूल’ में हुई। यहाँ पढ़ाई में मन न लगने के कारण इन्हें हटा लिया गया और नार्मल स्कूल में प्रवेश दिलाया गया जिसमें ये ब्रिटिश कालीन शिक्षा व्यवस्था के सम्पर्क में आये और इन्हें कई कटु अनुभव हुए जिससे शिक्षा में सुधार का भाव इनके मानस में जाग्रत हुआ।

                विद्यालय ये नाम मात्र को गए समृद्ध पिता ने अध्ययन की सम्पूर्ण व्यवस्था घर पर ही कर दी, इन्हें घर पर बंगला, संस्कृत, अंग्रेजी, संगीत व चित्रकला आदि की अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई पृथक विषय के अध्ययनार्थ पृथक अध्यापक की व्यवस्था की गयी। 1878 में उच्च शिक्षार्थ ये इंग्लैण्ड गए रूचि अनुसार व्यवस्था न हो पाने के कारण 1880 में वापस स्वदेश लौट आये। 1881 में कानून की शिक्षा प्राप्त करने हेतु ये पुनः इंग्लैण्ड गए लेकिन विचार परिवर्तन के कारण पुनः भारत लौट आये। सन 1901 में इन्होने शान्ति निकेतन की स्थापना बोलपुर के निकट की, जो आज विश्व भारती विश्वविद्यालय के नाम से विश्व विख्यात है।

                1910 में इनका महत्त्वपूर्ण काव्य ग्रन्थ ‘गीताञ्जलि’ प्रकाशित हुआ जिसके द्वारा किसी भारतीय को प्रथम बार नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसकी सम्पूर्ण राशि इन्होने शान्ति निकेतन को भेंट कर दी। 1915 में इन्हे डी० लिट्०  की मानक उपाधि कलकत्ता विश्व विद्यालय ने प्रदान की। तत्कालीन भारत सरकार ने इन्हे ‘नाइट हुड’ (सर)  की उपाधि सम्मानार्थ दी। इस उपाधि को इन्होने अंग्रेजों की कुटिल नीतियों के विरोध में त्याग दिया और इन्हे गाँधीजी द्वारा ‘गुरुदेव’ की उपाधि से नवाजा गया। गुरुदेव ने देश को गौरवान्वित करते हुए जीवन पर्यन्त कार्य किया। 7 अगस्त 1941 को गुरुदेव ने महाप्रयाण किया और इस प्रकार परम यशस्वी साहित्य कार, संगीतकार,कला और शिक्षा का सूर्य अस्ताचल गामी हो गया।

जीवन दर्शन  (PHILOSOPHY OF LIFE)-

रबीन्द्र नाथ टैगोर के जीवन दर्शन पर इनके सुसंस्कृत परिवार की धार्मिकता का गहन प्रभाव पारिलक्षित होता है सादा जीवन और उच्च विचार की पृष्ठभूमि में गठित इनके जीवन दर्शन को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं। –

1 – ईश्वर की निराकार और साकार दोनों सत्ताओं में विश्वास।

2 – अद्वैत वादी।

3 – सर्वोच्च मानव (Supreme Man ) के रूप में ईश्वर की स्वीकारोक्ति।

4 – सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् जैसे आध्यात्मिक मूल्यों को समर्थन।

5 – ईश्वर की अभिव्यक्ति ही है सृष्टि।

6 – मानव मानव में समानता के पोषक।     

7 – उच्चकोटि के दार्शनिक व समाज सुधारक।

8 – प्रखर राष्ट्रवादी।

9 – आत्मिकबल के उत्कर्ष हेतु सम्मान व स्वतन्त्रता के पोषक।

10 – छुआ छूत व निर्धनता पर कुठाराघात।

11 – प्रकृति और मानव की एकता पर बल।

12 – उच्च कोटि के मानवतावादी।

शिक्षा दर्शन और इसके आधारभूत सिद्धान्त (Educational Philosophy and its Basic Principles)-

टैगोर ने शिक्षा को एक ऐसे साधन के रूप में स्वीकार किया जो मानव मात्र को उत्थित करके उसमें परस्पर प्रेम, मेल, सद्भावना, विश्व बन्धुत्व की भावना का विकास कर सके। वे बालकों को राष्ट्रीयता, अन्तर्राष्ट्रीयता, वास्तविक जीवन से परिचय कराते हुए विस्तृत दृष्टिकोण से युक्त करना चाहते थे। प्रकृति और मानव के अटूट प्रेम पूर्ण रिश्ते बनें व सामाजिक सम्बन्धों का ताना बाना मजबूत हो।

सुनील चन्द सरकार ने ठीक ही लिखा है –

”He discovered for himself all the theories and principles of education which he was later to formulate for himself and use in his Shantiniketan experiment.”

”उन्होंने शिक्षा के उन सभी सिद्धान्तों की खोज स्वयं ही की, जिनका प्रतिपादन उन्हें आगे चलकर अपने लिए ही करना था तथा जिन्हें शांतिनिकेतन व्यावहारिक रूप देना था।”

 इनके दर्शन, शिक्षा सम्बन्धी विचारों, व्यवहारों व पाश्चात्य ज्ञान के घालमेल में इनके शिक्षा दर्शन के निम्न आधारभूत सिद्धान्त सहज दृष्टिगत होते हैं-

01 – भारत की आत्मा को आधुनिक भारत की आत्मा में प्रतिस्थापित करने का हर सम्भव प्रयास होना चाहिए।

02 – सजीव व गतिशील होना शिक्षा की प्रमुख विशेषता होनी चाहिए।

03 – शिक्षा का सामुदायिक जीवन से अटूट सम्बन्ध होना चाहिए उन्होंने लिखा भी है –

      ”Next to nature the child should be brought into touch with the stream of social behaviour.”

     ”प्रकृति के पश्चात बालक को सामाजिक व्यवहार की धारा के सम्पर्क में लाना चाहिए।”

04 – मातृ भाषा ही बालक की शिक्षा का माध्यम होना चाहिए।

05 – रहस्यवाद को यथार्थ पर अवलम्बित होना चाहिए।

06 – प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।

07 – स्वशासन व सामाजिक साहचर्य की भावना विकसित की जानी चाहिए।

08 – सङ्गीत, चित्रकला, अभिनय, स्वाभाविक स्वछन्दता का विकास किया जाना चाहिए।

09 – मानवता वाद का पोषण जीवन के हर स्तर पर होना चाहिए।

10 – भारतीय सांस्कृतिक विरासत आधारित सामाजिक व्यवहार सिखाया जाना चाहिए।

11 – भारत के मौलिक चिन्तन व विशुद्ध भारतीयता से परिचय अवश्य कराया जाना चाहिए।

12 – व्यक्तित्व का सामन्जस्य पूर्ण सर्वांगीण विकास बालक की जन्मजात शक्तियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

13 – सामाजिक मूल्यों व भारतीय दर्शन को शैक्षिक पाठ्य क्रम में लिया जाना चाहिए।

14 – पाठ्यक्रम अवलम्बित ज्ञान हेतु बालक को बाध्य न किया जाए बल्कि प्रत्यक्ष स्रोतों ज्ञान प्राप्ति के अवसर प्रदान किये जाएँ।

15 – सृजनात्मक शक्तियों के विकास हेतु आत्म अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किये जाएँ।

16 – प्राथमिक पाठशालाओं को आवश्यकतानुसार विकसित किया जाए।

17- विश्व नागरिकता के भाव का पोषण किया जाए।

शिक्षा के उद्देश्य (Aim of Education )-

रबीन्द्र नाथ टैगोर शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य समरसता के भाव के उन्नयन को मानते हैं उन्होंने कहा भी है –

”The highest education is that which makes our life in harmony with all existence.”

”सर्वोच्च शिक्षा वह है जो हमारे जीवन और समस्त सृष्टि के बीच समरसता स्थापित करती है।”

गुरुदेव के मनोभावों को इनके द्वारा प्रदत्त शैक्षिक उद्देश्यों से समझ सकते हैं जिन्हे बिन्दुवार इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।–

[1]- शारीरिक विकास [Physical Development] [2]- आध्यात्मिक एवम् नैतिक विकास [Spiritual and Moral Development]

[3]- बौद्धिक विकास [Intellectual Development] [4]- सामाजिक विकास [Social Development] [5]- व्यावसायिक विकास [Vocational Development] [6]- सांस्कृतिक विकास [Cultural Development] [7]- राष्ट्रीयता का विकास [Development of Nationalism] [8]- अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास [Development of International Attitude]

उक्त उद्देश्यों की प्राप्ति में यह बताना प्रासंगिक होगा कि उक्त का आधार केवल पुस्तकें नहीं हो सकतीं बल्कि जानने की इच्छा अधिक महत्त्व पूर्ण है इसीलिये उन्होंने कहा –

”In comparison with book learning, knowing the real living directly is true education. It not only promotes the acquiring of some knowledge but develops the curiosity and faculty of knowing and learning so powerfully that no class room teaching can match it.”

”पुस्तकों की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से जीवित व्यक्ति को जानने का प्रयास करना ही सच्ची शिक्षा है। इससे कुछ ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता अपितु जानने की शक्ति का इतना विकास हो जाता है। जितना कक्षा में दिए जाने वाले व्याख्यानों द्वारा होना असम्भव है।”

पाठ्यक्रम [Curriculum]-

इन्होने प्राकृतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास को महत्ता प्रदान की है अपनी भाषा के साथ विश्वबन्धुत्व हेतु क्रिया प्रधान पाठ्यचर्या पर जोर दिया पूर्ण मानव बनाने के लिए बालक के विकास हेतु व्यापक पाठ्यक्रम को समर्थन प्रदान किया हालांकि कोई निश्चित योजना प्रदान नहीं की। इनके द्वारा समर्थित विषय व तत्सम्बन्धी क्रियाऐं इस प्रकार हैं –

विषय – मातृ भाषा, इतिहास, भूगोल, संस्कृत, अंग्रेजी, साहित्य, विज्ञान, प्रकृति अध्ययन आदि।

आवश्यक क्रियाएं – कृषि, बागवानी, भ्रमण, नाटक, क्षेत्रीय अध्ययन, प्रायोगिक कार्य, कला, विविध वस्तु संग्रह, मौलिक रचना आदि।

पाठ्य सहगामी क्रियाएं – खेलकूद,समाजसेवा, संगीत,नृत्य, रचना, छात्र स्वशासन आदि।

शिक्षण विधियाँ [Methods of Teaching ]-टैगोर महोदय ने कृत्रिमता के आगोश से उद्भवित नीरस तथा बालकों को निष्क्रिय करने वाली शिक्षण पद्धतियों का विरोध किया एवम् शिक्षण को प्रभावशाली बनाने हेतु निम्न विधियों का समर्थन किया –

[1]-  भ्रमण के समय पढ़ाना। (Teaching while Walking) 

[2]- प्रश्नोत्तर विधि। (Question Answer Method)

[3]- वादविवाद विधि। (Discussion Method)

[4]- मातृ भाषा द्वारा शिक्षण। (Teaching by Mother Tongue)

[5]- क्रिया द्वारा शिक्षण। (Teaching through Activity)

[6]- खेल द्वारा शिक्षण। (Teaching through Play)

[7]- प्रयोग विधि द्वारा शिक्षण। (Teaching through Experiment)

[8]- विश्लेषण व संश्लेषण विधि। (Analytic and Synthesis Method)

[9]- तर्क विधि। (Logical Method)

[10]- स्व अनुभव द्वारा शिक्षण। (Teaching through Experience)

शिक्षक (Teacher)-

टैगोर को परम्परावादी कहा जाता है वे अध्यापक को महत्त्व पूर्ण स्थान प्रदान करते हैं और कहते हैं कि –

”मनुष्य केवल मनुष्य से ही सीख सकता है।“

                इससे यह तथ्य स्पष्ट है कि अधिगम के स्थान्तरण में अध्यापक की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। वे अध्यापक के कार्य निर्धारण इस प्रकार करते हैं।

1 – बालक को स्वानुभव से सीखने हेतु उचित वातावरण का निर्माण करना।

2 – सृजनात्मक शक्ति का विकास करना।

3 – राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय अवबोध विकसित करना।

4 – शिक्षक प्रशिक्षण की महत्ता समझ मानस में गरिमा पूर्ण स्थान देना।

5 – व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर शिक्षण।

6 – स्वयं के आचरण व नैतिक बोध द्वारा आदर्श स्थापित करना।

7 – सहानुभूति व प्रेम पूर्ण व्यवहार।

8 – प्रकृति और मानव के सह अस्तित्व का प्रकाशन।

अधिगमार्थी (Learner)

  गुरुवर बालक के व्यक्तित्व का आदर करते थे और उनसे ब्रह्मचर्य के नियमों का अनुपालन करने की आशा करते थे ब्रह्मचर्य हेतु मन, वचन, कर्म शुद्धि व इन्द्रिय निग्रह पर विशेष बल देते थे। बालक को शुचिता, आज्ञा पालक, प्रकृति प्रेमी, सांसारिक व आध्यात्मिक ज्ञान पिपासु तथा जिज्ञासु होना चाहिए। श्रद्धालुता , विनम्रता, दयालुता व्यवहार में पारिलक्षित होनी चाहिए।

अनुशासन (Discipline)

                प्रकृति प्रेमी होने के साथ ये बालक की मूल प्रकृति से विशेष प्रेम करते थे और किसी भी प्रकार की दण्ड व्यवस्था के विरोधी थे ये चाहते थे कि बालक पर अनुशासन थोपा न जाए बल्कि स्वानुशासन की भावना का विकास किया जाए। अनुशासन व्यवस्थापन हेतु साहित्यिक,सांस्कृतिक व सामूहिक खेलों को प्रोत्हासित किया जाए।

टैगोर के शिक्षा सम्बन्धी अन्य विचार (Other Educational Views of Tagore)

  • 1 – जन शिक्षा। (Mass Education)
  • 2 – स्त्री शिक्षा। (women Education)
  • 3 – धार्मिक शिक्षा। (Religious Education)
  • 4 – व्यावसायिक शिक्षा। (Vocational Education)
  • 5 – राष्ट्रीयता व अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास हेतु शिक्षा। (Education for National and International Development)
  • 6 – शिक्षा में स्वतन्त्रता।  (Freedom in Education)
  • उक्त आधार पर निर्विवाद रूप से यह माना जा सकता है कि शिक्षा शास्त्री के रूप में शिक्षा को यथोचित स्थान तक पहुँचने का मार्ग गुरुवर ने प्रशस्त किया।
  • शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षणविधि, शिक्षक, शिक्षार्थी, अनुशासन के सम्बन्ध में अमूल्य विचार देने के साथ व्यावसायिक शिक्षा, स्त्री शिक्षा,जन शिक्षा व विश्व बन्धुत्व हेतु जो निर्देश दिए वे उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाते हैं.
  •          इसीलिये एच० बी० मुखर्जी (H. B. Mukherjee) ने कहा –
  •       ”Tagore was the greatest prophet of educational renaissance in modern India. He waged a ceaseless battle to uphold the highest educational idea before the country, and conducted educational experiments at his own institutions, which made them living symbols of what an ideal should be.“
  • ”टैगोर वर्तमान भारत के शैक्षिक पुनुरुत्थान के सबसे बड़े पैगम्बर थे। उन्होंने देश के सम्मुख शिक्षा के सर्वोच्च आदर्शों को स्थापित करने के लिए आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने अपनी शैक्षिक संस्थाओं में ऐसे शैक्षिक प्रयोग किए जिन्होंने उन्हें आदर्श का सजीव प्रतीक बना दिया।” 

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