स्वप्न दृष्टा बनें और बनाएं। / Be a dreamer and create it.
सपना होता क्या है ? क्यों आता है ? कैसे आता है ?ऐसे बहुत सारे प्रश्न जब मानव मस्तिष्क को झिंझोड़ते हैं तब यह बात साफ़ हो जाती है कि इन्हें दो हिस्से में बाँट सकते हैं
i – बन्द आँखों से देखा जाने वाला सपना।
ii – खुली आँखों से देखा जाने वाला सपना।
यहाँ हम मुख्य रूप से जो विचार करने जा रहे हैं वह आँखों की खुली स्थिति में देखे जाने वाले सपनों से है। हमारे परम प्रिय श्रद्धेय ऋषि व राष्ट्रपति ए ० पी ० जे ० अब्दुल कलाम ने कहा भी था –
“सपना वह नहीं है जो आप सोते समय देखते हैं, बल्कि यह वह है जो आपको सोने नहीं देता।”
आँग्ल अनुवाद
“A dream is not what you see while sleeping, it is what does not let you sleep.”
सपना और हिम्मत / Dream and Courage –
सपना किसी भी प्रकार का हो उनका सम्बन्ध कहीं न कहीं हमारी इच्छाओं से होता है। फ्रायड सपनों को दमित वासनाओं का प्रतिफल मानें तो मानें। भारतीय ऋषिकुल परम्परा हमेशा व्यापक सकारात्मक दृष्टिकोण की हामी रही है। हमारे दृष्टिकोण के अनुसार उनकी व्यापकता बढ़ जाती हैं। बहुत से लोगों के सपने इतने अलग होते हैं हैं या गुप्त होते हैं कि जिन्हें वह अपने करीबी दोस्तों से भी साझा नहीं कर पाते। जाग्रत स्थिति में देखे जाने वाले सपने को लिपिबद्ध कर उसके लिए रणनीति बना कर प्रयास करने वालों के बारे में कहा जा सकता है कि उनके पास सचमुच हिम्मत है।
इसी लिए गूगल हमें लैंग्स्टन ह्यूजेस के शब्द दिखाता है –
सपनों को मजबूती से थामे रहो,
क्योंकि अगर सपने मर जाते हैं तो
जीवन टूटे पंखों वाला पक्षी है
जो उड़ नहीं सकता।
सपनों को मजबूती से थामे रहो,
क्योंकि जब सपने चले जाते हैं तो
जीवन
बर्फ से जमी एक बंजर जमीन बन जाती है।जाग्रत स्वप्नदृष्टा कौन ?/ Who is the waking dreamer? –
वह व्यक्ति जो अपनी काल्पनिक इच्छाशक्ति को यथार्थ का जामा पहनाने की शक्ति रखता है। पलायनवादी सोच के ठीक विपरीत जब कोई यथार्थ के कठोर ठोस धरातल पर खुली आँखों सपना देख उन्हें फलीभूत करने का योजनाबद्ध ढंग से प्रयास करता है तो उसे ही जाग्रत स्वप्नदृष्टा कहा जाता है। मैंने अपनी कविता “बैठ चिता पर हवन न होते हैं में कहा –
“खुली आँखों देखकर सपना लक्ष्य संजोते हैं
लक्ष्य प्राप्त करने की धुन में जुनूनी होते हैं
स्थाई जीवन की चाह में, न रोते – धोते हैं
सफलता हेतु लगन व निष्ठा साथी होते हैं।
कुछ जाग्रत सपने संयुक्त रूप से पूरे होते हैं जैसे घर संजोने का युगल द्वारा या ग्रुप द्वारा ध्येय का, अध्यापक और शिक्षार्थी द्वारा, इसी सम्बन्ध में मैंने अपने गीत -“लक्ष्य पर पूरा समर्पण में लिखा –
आचार्य ये कहता नहीं कि मैं भी रुकना जानता हूँ
क्योंकि अपने शिष्य का हर एक सपना जानता हूँ
उसके सपनों में हैं शामिल उसकी आशाएं सभी,
उसकी आशाओं में गहरा रंग भरना जानता हूँ
ये बता सकता नहीं कि थकना कहते हैं किसे
लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ।
स्वप्न दृष्टा क्यों बनें बनायें ?/Why become a dreamer and create one?-
वाल्ट डिजनी महोदय ने कहा –
“अगर आप सपना देख सकते हैं तो आप उसे पूरा भी कर सकते हैं।”
“If you can dream it, you can achieve it.”
23 वें पोप जॉन के ये शब्द भी महत्ता रखते हैं –
“अपने डर के बारे में नहीं, बल्कि अपनी उम्मीदों और सपनों के बारे में सोचें। अपनी निराशाओं के बारे में नहीं, बल्कि अपनी अधूरी संभावनाओं के बारे में सोचें। इस बात पर ध्यान न दें की आपने क्या प्रयास किया और असफल रहे, बल्कि इस बात पर ध्यान दें कि आप के लिए अभी भी क्या संभव है।”
“Think not of your fears, but of your hopes and dreams. Think not of your disappointments, but of your unfulfilled possibilities. Focus not on what you have tried and failed, but on what is still possible for you.”
स्वप्न दृष्टा क्यों बनें बनायें के समर्थन में निम्न वास्तविक तथ्य दिए जा सकते हैं। 1 – सृजनात्मक शक्ति के विकास हेतु/ For the development of creative power
एलेनोर रूजवेल्ट – “भविष्य उन लोगों का है जो अपने सपनों की सुंदरता में विश्वास रखते हैं.”
“The future belongs to those who believe in the beauty of their dreams.”
2 – आत्मबल की वृद्धि हेतु / To increase self-confidence एक विद्वान् के शब्द रास्ता किस जगह नहीं होता सिर्फ हमको पता नहीं होता छोड़ दें डरकर ही हम ये कोइ रास्ता नहीं होता।3 – समस्या समाधान योग्यता अभिवृद्धि / Problem solving ability enhancement
कोबे यामादा – “अपने सपनों का पीछा करो, वे रास्ता जानते हैं। “
“Follow your dreams, they know the way.” 4 – भय मुक्ति व शक्ति विकास / freedom from fear & power development
नॉर्मन वॉन –
“बड़े सपने देखो और असफल होने का साहस रखो।” / “Dream big and have the courage to fail.”
5 – आत्म गौरव व आत्म विश्वास में वृद्धि
मेरी के ० एश –
“जब आप किसी बाधा पर पहुंचते हैं तो उसे अवसर में बदल दें। आपके पास एक विकल्प है। आप उस पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।”
“When you come to an obstacle, turn it into an opportunity. You have a choice. You can overcome it.”
6 – कौशल विकास
7 – तनाव से मुक्ति
8 – अनिद्रा समाधान
अन्त में अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश के राम बृक्ष बहादुर पुरी की बात से अपने विचारों को विराम देता हूँ –
प्रातः काल उठने से प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के दर्शन होते हैं जो लोग प्रकृति की गोद में निवास कर रहे हैं वे प्रकृति की प्रातः कालीन सुषमा की जादुई शक्ति को भलीभाँति अनुभव कर चुके हैं। प्रातः काल में पक्षी कलरव, पुष्प,कली, मञ्जरियाँ, हरीतिमा, प्राची दिशा से मार्तण्ड भगवन का उद्भव,उनकी सुखद रश्मियाँ हमारे शरीर के रोम को पुलकित कर देती हैं। प्रातः कालीन मन्द बयार जीवन का सुखद आधार है। सचमुच प्रातःकालीन प्रदत्त शक्तियों को पैसे द्वारा नहीं खरीदा जा सकता। भोर के अनुपम सौन्दर्य के साथ प्राणवायु की गुणवत्ता का स्तर भी इस समय सर्व श्रेष्ठ होता है। सभी इन लाभों को अर्जित करना भी चाहते हैं लेकिन विविध कारक इसमें बाधा (Barrier) का कार्य करते हैं।
सुबह उठने में बहुत से लोग दिक्कत का अनुभव करते हैं और इन कारणों को अव्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। आइये इन पर क्रमशः विचार करते हैं –
01 – देर रात्रि तक जागरण / Staying awake till late night
02 – रात्रि कालीन सेवाएं / Night Services
03 – घर से कार्य / Work from home
04 – रात्रि जागरण आदत / Night waking habit
05 – घरेलू वातावरण / home environment
06 – आलस्य / Laziness
07 – तथाकथित आधुनिकता / So-called modernity
08 – अनुपयुक्त गरिष्ठ भोजन व पेय / Inappropriate heavy food and drink
09 – स्वास्थय सम्बन्धी परेशानी / Health problems
10 – शिक्षण संस्थानों की संस्कृति पोषण से विरक्ति /
Disinterest in nurturing the culture of educational institutions.
प्रातःजागरणसमस्यासमाधान –
किसी विद्वतजन ने कितना सुन्दर कहा है – ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’। यदि हम अपने मानस को तैयार करें तो अपने शरीर का रिमोट अपने हाथ में आ जाएगा जिसे हम आवश्यकतानुसार निर्देशित कर सकेंगे।स्वामी अमर नाथ जी ने अपने प्रवचन में स्पष्ट रूप से कहा –
कोई मुश्किल नहीं ऐसी है जो आसान न हो।
आदमी वह है जो मुसीबत में परेशान न हो।।
मानस को साध इन व्यवस्थाओं को करने से इस समस्या का भी समाधान सम्भव हो सकेगा।
01 – समय व्यवस्थापन / time management
02 – जल्दी सोयें जल्दी जागें / Early to bed early to rise
03 – अवकाश सदुपयोग / Utilization of leisure time
04 – आलस्य त्याग / Give up laziness
05 – शारीरिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान / Special attention to physical health
06 – रात्रि कालीन सेवा समायोजन / Night service adjustment
07 – जहाँ चाह वहाँ राह / where there is a will there is a way
08 – शिक्षण संस्थानों की जागरूकता / Awareness of educational institutions
09 – माता, पिता, अध्यापकों का सम्यक आदर्श / Proper role model of mother, father, teachers
10 – स्वस्थ आदत निर्माण / Healthy habit formation
प्रातःजागरणकेलाभ /
Benefits of waking up in the morning –
कुछ तथ्य निर्विवाद सत्य है और प्रातः जागरण के लाभों से इन्कार नहीं किया जा सकता। केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में प्रातः भ्रमण, प्रातः प्राणायाम, व्यायाम आदि को स्वास्थय हित में स्वीकार किया गया और इस लिए भोर में जागरण परमावश्यक है। इसके लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
01 – समय नियोजन में सरलता / Ease of time planning
02 – पूर्ण नींद की उचित व्यवस्था / Proper sleep arrangement
03 – व्यायाम, प्राणायाम, भ्रमण की सम्यक व्यवस्था /
Proper arrangements for Exercise, Pranayama, Travel
04 – आँखों की सम्यक देखभाल / Proper eye care
05 – जीवन की औसत आयु में वृद्धि / Increase in average age of life
06 – सम्पूर्ण स्वस्थ जीवन हेतु आवश्यक / Necessary for a completely healthy life
07 – आध्यात्मिक उच्चता सम्भव / Spiritual heights possible
08 – सांस्कृतिक विरासत संरक्षण / Cultural heritage protection
उक्त सम्पूर्ण चिन्तन मन्थन हमें गम्भीरता से सचेत करता है विकल्पों में निर्विकल्प होकर हमें प्रातः उठकर उन्नति की नई पट कथा लिखनी होगी। यह प्रातः जागरण, जीवन जागरण का आधार बन सकेगा। भारतीय चिन्तन, मंथन, विश्लेषण, बलिष्ठ होकर विश्व को सम्यक दिशा दे सकेगा। अवधी भाषा में श्रद्धेय वंशीधर शुक्ल ने बहुत सुन्दर लिखा है –
आँखें शरीर की वह खिड़की हैं जिससे बाहरी परिदृश्य का अवलोकन किया जाता है। मन की आँखों की विविध क्रियाओं का आधार भी यह तन की आँखे ही बनती हैं। तन की इन आँखों पर कवि, लेखक, ग़जलकार, प्रेमियों, ऋषियों, विद्यार्थियों, सभी ने विविध दृष्टिकोण रखे हैं। नयनों के कारण बहुत कुछ नयनाभिराम लगता है। नैसर्गिक सौंदर्य हो या कृत्रिम, देखने का आधार तो ये नेत्र ही हैं। शर्म से झुकी आँखें, क्रोध में घूरती आँखे, सरल स्नेही आँखें, धूर्त आँखें आदि विविध रूप नयनों के ही हैं। नयन कजरारे हों या नीले, भूरे हों या कञ्जे देखभाल तो सभी की परम आवश्यक है और नेत्रों के बारे में जितना जाना जाए उतना कम ही है।
आँखों पर अवलम्बित गीत –
इन गीतों की एक बहुत लम्बी श्रृंखला है। यदि सारे गीतों का सङ्कलन किया जाए तो अत्याधिक श्रम व समय की आवश्यकता होगी। बहुत से विज्ञ जनों ने आंखों पर अवलम्बित गानों की सूची बनाने का प्रयास किया है इन्ही में से एक विशिष्ट व्यक्तित्व हैं डॉ दीपक धीमान जो सम्बद्ध रहे हेमवती नन्दन बहुगुणा विश्व विद्यालय, श्री नगर, गढ़वाल, उत्तराखण्ड से। इनकी संकलित सूची से गीतों के मुखड़े आपके समक्ष क्रमशः रखने का प्रयास है –
01 – तेरी आँखों के सिवा दुनियाँ में रखा क्या है।
02 – आँखों ही आँखों में इशारा हो गया
03 – अँखियों को रहने दे अँखियों के आस पास
04 – अँखियों के झरोखों से मैंने देखा जो सांवरे
05 – हमने देखी है उन आँखों की महकती खुशबू
06 – गोर गोर चाँद से मुख पर, काली काली आँखें हैं
07 – आपकी आँखों में कुछ, महके हुए से राज हैं
08 – कजरा मुहब्बत वाला, अँखियों में ऐसा डाला
09 – इन आँखों की मस्ती के मस्ताने हज़ारों हैं
10 – आँखों में क्या जी, सुनहरे सपने
11 – मैं डूब डूब जाता हूँ शरबती तेरी आँखों की झील सी गहराई में
12 – आँख से छलका आँसू और जा टपका शराब में
13 – हुई आँख नम और ये दिल मुस्कुराया
14 – अँखियाँ मिलाये कभी अँखियाँ चुराए
15 – आँखें भी होती हैं दिल की जुबाँ
16 – आँख है भरी भरी और तुम
17 – आँखें ही न रोई हैं, दिल भी तेरे प्यार में रोया है
18 – ये काली काली आँखें तुरूरू हा हा हा
19 – आँखों में बेस हो तुम,तुम्हें दिल में बसा लूँगा
20 – कत्थई आँखों वाली एक लड़की
21 – आँख उठी मुहब्बत ने अंगड़ाई ली
22 – अँखियाँ नू चैन ना आवे, सजना घर आजा
23 – अँखियाँ उडीक दियां दिल वजा मारदा
24 – बहुत खूबसूरत हैं आँखें तुम्हारी
25 – शाम से आँख में नमी सी है
26 – आँख की गुस्ताखियाँ माफ़ हों
27 – आँखों में तेरी अजब सी, अजब सी अदाएं हैं
28 – सुरीली अँखियों वाले, सूना है तेरी अँखियों से
29 – तेरी काली अँखियों से जिंद मेरी जागे
30 – तेरी आँखों में मुझे प्यार नज़र आता है
31 – आँखों से तूने यह क्या कह दिया
32 – आँखों में नींद न दिल में करार
33 – सांवली सलोनी तेरी झील सी आँखें
34 – चेहरा है या चाँद खिला है , जुल्फ घनेरी शाम है क्या
सागर जैसी आँखों वाली ये तो बता तेरा नाम है क्या
35 – अपनी आँखों के समन्दर में उतर जाने दे
तेरा मुजरिम हूँ मुझे डूब क्र मर जाने दे
36 – रात कली एक ख्वाब में आई और गले का हार हुई
सुबह को जब हम नींद से जागे उन्हीं से आँखें चार हुईं
37 – कितना हसीन चेहरा कितनी प्यारी आँखें
38 – आँख मारे ओ लड़की आँख मारे
39 – तेरी आँखों का ये काजल
40 – नैन लड़ जइहैं ता मनवा मा खटक होएबे करी
41 – ज़रा नज़रों से कह दो जी, निशाना चूक न जाए
42 – तुम्हारी नज़रों में हमने देखा
43 – तेरे नैना बड़े दगाबाज रे
44 – तेरे मस्त मस्त दो नैन, मेरे दिल का ले गए चैन
45 – तेरे नैना बड़े कातिल मार ही डालेंगे
46 – तेरे नैना ,तेरे नैना, तेरे नैना रे
47 – तोसे नैना लागे, मिली जिन्दगी
48 – नैना, जो साँझ ख्वाब देखते थे नैना
49 – नैनों की जो बात नैना जाने है
50 – नज़र नज़र ढूंढें, तुझे मेरी नज़र
51 – कजरारे कजरारे तेरे नैना कारे कारे
ज्ञान परिमार्जन ,उन्नयन से जुड़े आलेख, कविता, कवित्त, दोहा, चौकड़िया, सवैय्या, फाग, पद, अनुवाद गीत, उद्धरण, कड़वक, नवगीत, खण्ड काव्य, सोरठा, सबद, बिरहा, पहेलियाँ, निबन्ध और ग़जलें सभी नयनों से सम्बद्ध रहे हैं।नयनों की दुनियाँ में टहलते हुए जब यथार्त के ठोस धरातल पर कदम रखते हैं तो विशेषज्ञों की चेतावनी याद आती हैं कि आँख के संरक्षण हेतु क्या क्या ध्यान अवश्य रखा जाए।
आँखों के दीर्घ कालिक बचाव हेतु उपाय –
जब इस विचार का मंथन करते हैं तब सार रूप में ज्ञात होता है कि इस हेतु कुछ कार्य करने चाहिए और कुछ नहीं। आइये इन बिंदुओं पर अमल कर आँखों का संरक्षण करें।
01- सुबह आँख धोएं।
02 – आँख मलने से बचें।
03 – प्रातः ओस वाली घास पर चलें।
04 – हाथ बार बार धोएं।
05 – तीव्र धुप से आँख बचाएं।
06 – तेज प्रकाश, वेल्डिंग आदि पर दृष्टिपात न करें।
07 – पर्याप्त जल पियें।
08 – संतुलित आहार लें।
09 – धूम्रपान न करें।
10 – किसी भी नशे से बचें।
11 -स्क्रीन देर तक न देखें।
12 – पर्याप्त निद्रा आवश्यक।
13 -बी० पी ०, शुगर की नियमित जाँच।
14 – बार बार पलक झपकाएं।
15 – नेत्र के व्यायाम करें।
आँखें प्रकृति की अनमोल देन हैं जो हमारे जीवन को आनन्द युक्त बनाने में सहयोग करती हैं थोड़ा सा भी विकार होने पर नेत्र विशषज्ञों की राय अवश्य ली जानी चाहिए। अन्त में यही कहना चाहूँगा –
स्वस्थ नेत्र हर कार्य की क्षमता बढ़ा देते हैं
गर ये परेशान हुए, तो फिर ये रुला देते हैं। .
स्वस्थ रहें काया के साथ नेत्र निरोग रखने का हर प्रयास करें क्योंकि मरणोपरान्त भी ये आँखें किसी के जीवन को रोशन कर सकती हैं याद रखें 10 जून विश्व नेत्र दान दिवस होने के साथ हमें याद दिलाता है कि नेत्रदान महादान है अर्थात जीवन के साथ भी और जीवन के बाद भी।
संसार के जड़ जङ्गम हमें प्रभावित करते हैं उनके बारे में सोचने पर जिज्ञासा का प्रबल भाव उत्पन्न होता है और यह कुहासा चिन्तन स्तर उच्च होने के साथ और घनीभूत होता जाता है जब इसका प्रवाह स्वयम् की ओर होता है तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि आखिर हम हैं कौन, क्या आदि आदि, लेकिन अपने स्वरुप का बोध सरल नहीं है।
अपने अस्तित्व को गुम करके स्वयम् के विराट से साक्षात्कार हो सकता है जिस प्रकार हवा में तैरता कोई जलकण तब तक लघु है जब तक वह विशाल समुद्र से एकाकार करती है तब स्वयम् को खो देती है। लेकिन खोने के तुरन्त बाद वह समुद्र है उस जैसी बिन्दुओं के समूह से ही विशाल समुद्र बना है जिसकी शक्ति अपरम्पार है, जिसमें बहुमूल्य निधियाँ आज भी विराजमान हैं लेकिन हाय रे मानव तुझे आज भी स्वयम् की तलाश है।और यह तलाश भी बाहर की ओर है जो बढ़कर कर्म न करने आसक्ति की ओर बढ़ रही है हम वह भूल रहे हैं जो भगवान् श्री कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता के द्वित्तीय अध्याय के ४७ वें श्लोक में कहा है –
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि।।2.47।।
अर्थात
तेरा कर्म करने में ही अधिकार है,उसके फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मों के फल का हेतु मत बन और तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो।
वस्तुतः बाहर की तलाश में कुछ भी मिलने वाला नहीं है जो भी है अन्तर में है। लघु और विराट के भेद को समझने के बाद स्वयम् की दृष्टि समदृष्टा होकर तमाम भित्तियों का अस्तित्व परिवर्तन कर देती हैं। हमारा अस्तित्व जड़ होने से पूर्व चैतन्य का है, निज स्वरुप का बोध होने के साथ सम्बन्धों की तमाम दीवारें धराशाई हो जाती हैं।कोई भी सम्बन्ध अक्षुण्ण नहीं है यह सारे सम्बन्ध काया के हैं कायिक हैं इन सम्बन्धों के साथ दम्भ ही माया की गिरफ्त में आ जाने का द्योतक है।हम देह नहीं हैं बल्कि शुद्ध चैतन्य आत्म तत्व हैं जो कभी नष्ट नहीं होता। श्रीमद्भगवद्गीता के द्वित्तीय अध्याय के २३वें श्लोक में बोध जागरण प्रयास में कहा भी है-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥2.23॥
अर्थात
इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग जला नहीं सकती। जल इसको गला नहीं सकता, और वायु सुखा नहीं सकती।
जिस तरह जल की बूँद सागर में या फुटबाल या अन्य स्थल में घनीभूत वायु बाहर आकर सम्पूर्ण व्योम हो जाती है ठीक इसी तरह हम सब आत्म तत्त्व जो कि शुद्ध चैतन्य स्वरुप हैं अन्ततः परमात्म में, उस विराट में लय होकर उससे एकाकार कर लेते हैं और जो किसी भी कारणवश इस स्थिति को प्राप्त नहीं कर पाते हैं, वे बारम्बार आवागमन के चक्र में रहते हैं और प्रारब्ध व उसके परिणाम से ग्रसित हो अपने शुद्ध चैतन्य स्वरुप को जानने की दिशा में अग्रसर रहते हैं।ऐसे ही योगी मानस हेतु श्रीमद्भागवद्गीता के द्वित्तीय अध्याय के ६९वें श्लोक में कहा है –
“या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी ।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥2.69॥
अर्थात
सम्पूर्ण प्राणियों के लिए जो रात्रि के समान है, उस नित्य ज्ञानस्वरूप परमानन्द की प्राप्ति में स्थितप्रज्ञ योगी जागता है और जिस नाशवान सांसारिक सुख की प्राप्ति में सब प्राणी जागते हैं, परमात्मा के तत्व को जानने वाले मुनि के लिए वह रात्रि के समान है।
जब तक स्वयं में शुद्ध चैतन्य आत्म स्वरुप के दर्शन नहीं होते और परमसत्य मानस से उद्भूत नहीं होता तब तक समदृष्टि विकसित नहीं होती इसी कारण हम सभी में उस विशुद्ध चैतन्य आत्म तत्व का दर्शन नहीं कर पाते और इस स्वरुप की काया परिवर्तन की स्थिति बनी रहती है।
आइए इस तरह से समझने का प्रयास करते हैं यदि कोई विशालकाय दीपक ज्योति दैदीप्यमान है और छोटा दीपक उस प्रज्ज्वलित दीपशिखा में अपना अस्तित्व खोकर मिल जाता है, जिसमें तृष्णा, अहंकार और अज्ञान का दीपक, बाती, तेल शेष है वह अपने चैतन्य शुद्ध स्वरुप से आत्म साक्षात्कार नहीं कर सकता।
बचपन, जवानी, बुढ़ापे का एक क्रम है और ये इस क्रम में ही आता है लेकिन हमारी जीवन शैली बुढ़ापे को शीघ्र निमंत्रण दे हमें निष्क्रिय कर रही है जबकि थोड़ा सा सचेत रहकर न हम बुढ़ापे को पीछे धकेल सकते हैं बल्कि बुढ़ापे में भी जवानों जैसे सक्रिय रह सकते हैं। आइये इसके कारण,निवारण पर विचार करते हैं।
1 – जल का सेवन –
जल
का यथोचित सेवन होना चाहिए कुछ लोग कम सेवन करते हैं और इसके नुकसान शीघ्र
परिलक्षित होने लगते हैं जो कब्ज,किडनी
समस्या,ऊर्जा स्तर में कमी ,त्वचा का रुखापन,सिर दर्द आदि के रूप में सामने आता है। जब की अधिक जल का सेवन किडनी
का कार्य भार बढ़ा देता है वात, पित्त, कफ के असन्तुलन का भी यह प्रमुख कारण है अधिक
पानी के नुकसान बुढ़ापे को करीब लाने में मदद करते हैं।
अतः
‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ को ध्यान में रखकर शरीर की मांग के अनुरूप पानी
पीना चाहिए। जल घूँट घूँट कर बैठकर ही पीना चाहिए उकड़ूँ बैठकर पीएं तो सबसे अच्छा।
फ्रिज के अधिक ठन्डे पानी से बचें। सदा सामान्य ताप युक्त जल का सेवन करें। पानी
की स्वच्छता का ध्यान रखा जाए। कहीं का भी पानी न पीने लगें अच्छा होगा अपने साथ
स्वच्छ जल रखें। दिन के पूर्वार्ध में अधिक और उत्तरार्ध में अपेक्षाकृत कम जल का
सेवन करें।
2 –
निद्रा –
संयमित
निद्रा शरीर को व्यवस्थित रखने का एक उपक्रम है। आज लोगों को सोने का कार्यक्रम
दुष्प्रभावित हुआ है कुछ लोग रात्रि में जागरण करते हैं और दिन में सोते हैं या
देर तक सोते रहते हैं। कुछ दिन और रात दोनों में सोने की आदत विकसित कर लेते हैं
रात्रि जागरण सम्पूर्ण दिनचर्या बिगाड़ बुढ़ापे को जल्दी बुलाने में मदद करता है,शरीर हर समय थका थका महसूस करता है।
हमारा
शरीर रात्रि विश्राम व सूर्योदय के साथ जागृत रहकर कार्य करने में सुगमता महसूस
करता है,जल्दी
सोना और जल्दी जागना कई रोगों का उपचार है। इसीलिये सुबह को अमृत बेला गया है।
त्वचा की चमक या आज वृद्धि का इससे सीधा सम्बन्ध है।
3 – गरिष्ठ भोजन व अधिक नमक –
गरिष्ठ व अधिक नमक वाला भोजन सीधा झुर्रियों को
निमन्त्रण पत्र है,नमक की अधिक मात्रा कोशिकाओं को शीघ्र बूढ़ा
करती है जबकि नमक का कम सेवन कोशिकाओं की आयु में वृद्धि करता है। गरिष्ठ भोजन
स्वाद में आपको अच्छा लग सकता है पर है वो धीमा जहर ही।एक तो गरिष्ठ और दूसरे काम
चबाने से दाँतों का काम भी आँतों को करना पड़ता है जो कब्ज, अम्लता,उदर
रोग, मोटापा, अजीर्ण
को खुला आमन्त्रण देता है। आजकल जंकफूड और फास्ट फ़ूड ने सेहत का बेड़ा गर्क कर रखा
है।शरीर को युवा और दीर्घकालिक क्रियाशील रखने के लिए सहज सुपाच्य व ताजा भोजन खूब
चबा चबाकर करना चाहिए।
4 – व्यायाम –
व्यायाम,
प्राणायाम, योगासन, खेलकूद, दंगल, दौड़
आदि वह साधन हैं जिससे शरीर मानसिक रूप से अधिक युवा रहने हेतु तैयार होता है।
ब्रह्म मुहूर्त की जादुई हवा तनमन को स्फूर्तिवान रखती है। और इनका अभाव हमें
बुढ़ापे की और तेजी से बढ़ाता है।
5 – प्रवाह अवरुद्धन –
हमें
मल, मूत्र के आवेग को बल पूर्वक नहीं रोकना चाहिए।
शरीर पर अनावश्यक दवाब रखना उचित नहीं। छींक आदि के समय सामान्य ही रहना
चाहिए।प्राकृतिक आवेग को रोकने से किडनी व आँतों पर अनावश्यक दवाब पड़ता है। और
सम्पूर्ण शरीर इस व्याधि के नुक्सान झेलता है।
6 – नशा –
सबको पता है होश में रहना परमावश्यक है लेकिन
होश खोने वालों की कतार भी छोटी नहीं है। पता नहीं क्यों लोग नशा करते हैं व अपनी जिन्दगी को छोटा और रोग ग्रस्त कर लेते
हैं और जवानी में बुढ़ापे का शिकार हो जाते हैं। हमारा सारा चयापचय बिगड़ जाता है।
प्रतिरक्षा तन्त्र ध्वस्त हो जाता है अपने साथ परिवार को गर्त में जाता देख नशेड़ी
अवसादग्रस्त हो जाता है मस्तिष्क सोचने समझने की शक्ति खो तेजी से बुढ़ापे की और
अग्रसर होता है।
प्रारम्भ
से ही सचेत रहें, किसी के नशा करने के आमन्त्रण को सिरे से ठुकरा
दें नहीं तो वही बात हो जाएगी मौत आई तो नहीं पर घर तो देख गयी। चिन्ता,परेशानी, समस्या प्रत्येक के जीवन में आती है सम्यक
विमर्श करें स्वास्थ्य वर्धक चीजों का सेवन करें। सत्सङ्ग करें कुसंग से बचें। नशा
किसी भी रूप में शरीर में प्रवेश न करे हमारा शरीर खुद इसको व्यवस्थित रखने का
प्रयास करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में कितना सुन्दर मार्ग सुझाया है
–
युक्ताहार-विहारस्य
युक्त-चेष्टस्य कर्मसु
युक्त-स्वप्नावबोधस्य
योगो भवति दुःख-हा ॥ १७ ॥
7 – प्रदूषण –
जल,
वायु, ध्वनि के अलावा तमाम अन्य प्रदूषण मानव के जीवन
को शीघ्र बुढ़ापे की और खींच कर ख़तम कर रहे हैं जबकि इन पर अंकुश लगाना,परिशोधन करना हमें आता है। मास्क का प्रयोग
कोरोना ने हमें सीखा दिया जो दोपहिया वाहन चलाते हुए हेलमेट जितना ही आवश्यक है।
प्रदूषण से बचने के यथा शक्ति प्रयास हमें दीर्घकालिक युवा रख सकता है निर्मल जल,
वायु, आकाश अपरिहार्य है किसी ने सचेत किया
–
हमीं
गर्क करते हैं जब अपना बेडा तो बतलाओ फिर नाखुदा क्या करेंगे
जिन्हें
दर्दे दिल से ही फुर्सत नहीं है फिर वो दर्दे वतन की दवा के करेंगे।
सचेत
रहें,हर
संभव बचाव का प्रयास करें।
08 – बुढ़ापा दिमाग की खिड़की से आता है।–
मानव मन अद्भुत है और सर्वाधिक सशक्त हैं विचार ,पहले हमारे मन में किसी भी वस्तु,क्रिया,सिद्धान्त
को वरण करने का विचार आता है तत्पश्चात हमारी चेष्ठा उसे हमसे सम्बद्ध कर देती है
यहाँ तककि हमारे शरीर पर हमारी सोच का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है यदि हम सकारात्मक
सोच के हामी हैं तो व्यक्तित्व पर उसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। हम अलग
लोगों को अलग अलग मिजाज का देखते हैं यह स्वभाव मानव मन की तरंग दिशा से ही
निर्धारित होता है कुछ लोगों को युवावस्था में बुढ़ापे का और कुछ वयो वृद्धों को
वृद्ध होने पर भी युवावस्था का आनन्द लेते देखा जा सकता है।
गलत चिन्तन, कामुक चिन्तन, नकारात्मक चिन्तन वह कारक है जो हमें अन्दर से
खोखला कर कहीं का नहीं छोड़ता। हम वीर्य,ओज, तेज, स्फूर्ति खो बुढ़ापे के दुष्चक्र में फँस जाते
हैं। सकारात्मक सोचें जिन्दादिली को व्यक्तित्व का हिस्सा बनाएं। याद रखें –
‘जिन्दगी
जिन्दादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं।’
साथियो, हम सब मानव हैं और मानवीय गुणों व मानवीय
कमजोरियों से युक्त रहते हैं हमारा अपना मस्तिष्क हमारी सोच ,हमारे विचारों का उद्गम स्थल है जो बहुत सारी
बाहरी शक्तियों से प्रभावित होता है और इसी क्रम में हमारा परिचय अपनी कमजोरियों
से होता है जो हमारी प्रगति यात्रा का
सबसे बड़ा अवरोधक है आज की प्रस्तुति का मंतव्य ही यह है कि हम अपनी कमजोरियों को
ताक़त में कैसे बदलें ?
कमजोरी है क्या ?-
What is weakness?
यह हमारी विचार प्रक्रिया का वह उत्पादन है जो हमारे मस्तिष्क ने
हमें दिया है। मस्तिष्क जब किसी कार्य, विचार
या कटु अनुभव के आधार पर पलायनवादी दृष्टिकोण अपनाने को विवश करता है वही हमारा
कमजोर
बिन्दु है और हमारे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दुश्मन। कोई भी कमजोरी तब
तक कमजोरी है जब तक उसके सशक्तीकरण के प्रयास न किये जाएँ।
एक कमजोर रस्सी कुछ और रेशों के सहयोग से मजबूत हो सकती है इसी तरह
कमजोरी सशक्त विचारों से दृढ़ इच्छा शक्ति का रूप धारणकर सबसे सशक्त पहलू का रूप
धारण कर सकता है आपने देखा होगा भौंरा
विज्ञान के नियमों को धता बता अपने कमजोर पँखों से बखूबी उड़ता है।
कमजोरी को ताक़त में बदलने के आठ उपाय
Eight steps to turn weakness into strength –
इससे पहले की उन आठ अद्भुत उपायों से आपका परिचय कराऊँ। उनके
सुदृढ़ीकरण हेतु मजबूत आधार बनाना आवश्यक होगा। इसीक्रम में आप सभी दिव्य चेतन
आत्माओं से यह कहना प्रासंगिक होगा। कि जो कुछ हमारे अवचेतन मन से जुड़ जाता है वह
फलीभूत होता है इसीलिए यह तथ्य कि ‘मैं अपनी कमजोरी को ताक़त में बदल सकता हूँ’
गहनता से दोहराएं और इसे चेतना की गहराई तक
समाने दें।
यह कमजोरी वास्तव में एक चुनौती पूर्ण अवसर है जिसे पहचानने का अवसर
हमें मिला है और इसी लिए कमजोरी का ताक़त में बदलना निश्चित है इसे अवश्यम्भावी
बनाने वाले आठ कदम इस प्रकार हैं –
1 – कमजोरी
का क्षेत्र पहचानें। (Recognize the region of weakness)
2 – सकारात्मक
सोच। (Positive Approach)-
3 – डर
का मुकाबला करें। (Face your fears)
4 – सभी
विमाओं का गहन चिन्तन (Deep thinking about all dimensions)
5 – सकारात्मक
व्यक्तित्वों का साथ (Associate
with positive personalities)
6 – एक
एक कर कमजोरी का निवारण करें। (Tackle a weakness at a time)
7 – विश्वास
सुदृढ़ीकरण (Strengthening
belief system)-
8 – स्व
व्यक्तित्वानुसार सशक्तीकरण (Empowerment through self personalities)