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काव्य

मैं हूँ एक आचार्य देश का ……..

May 13, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मैं हूँ एक आचार्य देश का

सीधे मन से बोल रहा हूँ।।

आचार्यों की स्थिति क्या है

राज सिरे से खोल रहा हूँ

बात पुरातन की अब क्या है

नए सिरे से सोच रहा हूँ ।1 ।

आज़ादी के काल से सोचो

मैं बिन भाव बिन मोल रहा हूँ

नेताओं इस देश के सोचो

आश्वासन कबसे तौल रहा हूँ ।2 ।

तुमने पाली सारी समस्या

मैं समाधान का घोल रहा हूँ

तुमने भ्रम में डाली तपस्या

मैं बस मारग खोज रहा हूँ ।3।

तुम सारे झगड़े की जड़ हो

मैं बस मट्ठा घोल रहा हूँ

तुम साधन के भारी गढ़ हो

मैं टकरा सर फोड़ रहा हूँ ।4।

तुमने केवल अपनी सोची

मैं दुनियाँ की सोच रहा हूँ

तुमने चमकाई निज कोठी

मैं झोंपड़ सिर मौर रहा हूँ ।5।

शिक्षा मद में खर्च न करते

मैं जन आशा ढोल रहा हूँ

तुम भौतिकता में रत रहते

मैं आदर्शवादी खोल रहा हूँ ।6।

अस्तित्व हमारा सङ्कट में है

सिंहासन कहता सोच रहा हूँ

जीवन रथ अब कण्टक में है

वे कहें सोच के बोल रहा हूँ ।7।  

तुम लक्ष्मी पूजा में रत हो

मैं चिथड़ों को ओढ़ रहा हूँ

न शिक्षा पर शासन कवच है

मैं असहाय सा डोल रहा हूँ ।8।

शिक्षा को बौना कर दोगे

मन की गाँठे खोल रहा हूँ

ना सोचोगे मिट जाओगे

चाणक्य चोटी खोल रहा हूँ ।9।

खुद को नीति नियन्ता कहते

आशय इसका खोज रहा हूँ

तुम अनीति में डूबे रहते

‘नाथ’ मूल्य मैं खोज रहा हूँ ।10।

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काव्य

मनन है अब भी अधूरा/Manan H Ab Bhi Adhoora.

May 11, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

हड़बड़ा कर उठ गया था स्वप्न ने क्या रंग दिखाए

जो भी मानस पटल पर थे दृश्य सुन्दर मन रिझाए

कल्पना संजोए उड़ रहा था चित्र बन पाया न पूरा

मनन  है अब भी  अधूरा, मनन  है अब भी अधूरा ।1।

योग की शाला लगी थी शृद्धा तन – मन में भरी थी

पूर्ण सारी हो रही थी, मन में  मधुर आशा लगी थी

आशा नहीं वो लालसा थी ज्यों बेल पत्री संग धतूरा 

मनन  है अब भी  अधूरा, मनन  है अब भी अधूरा ।2।

यज्ञपूजन चल रहा था यजमान भी सब हवन में थे

मन्त्रोच्चारण हो रहा था पर भाव यूँ  ही अनमने थे

मानव सबसे श्रेष्ठ रचना पर ध्यान हो पाया न पूरा  

मनन  है अब भी  अधूरा, मनन  है अब भी अधूरा ।3।

यम नियम का भान भी था, ज्ञान का संज्ञान भी था

आसन व प्राणायाम भी था समाधि इन्तजाम भी था

लेकिन फिरभी दिख रहा था धारणा कारज अधूरा   

मनन  है अब भी  अधूरा, मनन  है अब भी अधूरा ।4।

ज्वार जैसा उठ रहा था सद् भावनाएं भी प्रबल थीं

समन्दर पूरे उरोज पर था घनघटाएं उमड़ रहीं थीं

चला पूरे जोश में था पर आत्म विश्वास संग फितूरा   

मनन  है अब भी  अधूरा, मनन  है अब भी अधूरा ।5।

तन प्रयाण कर रहा था तब साथी सम्बन्धी भी आये

लोक कार्य सब कर चला था मोक्ष के सपने न आए

मृदङ्ग, ढोलक बज रहा था ‘ नाथ ‘ संग था तानपूरा      

मनन  है अब भी  अधूरा, मनन  है अब भी अधूरा ।6।   

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काव्य

यादों के बादल हैं अब।/ Yaadon Ke Baadal Hain Ab.

May 10, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मेरी उम्र के साथी सब

वर्षा आँधी अन्धड़ तब

छिप कर बैठे हैं घर में

करते थे मनमानी सब।

राजा, मन्त्री, रानी सब

डिब्बे के अन्दर हैं सब

रस बचा नहीं  खेलों में

लगता बुड्ढे हो गए सब।

खेल खिलाड़ी लाठी सब

कहाँ गए वो साथी सब

बस बैठे हैं कई शहरों में

अपने सपने किस्से अब।

वो दंगल पुट्ठे माटी सब

गेंदें, कन्चे, गिल्ली सब

सब चित्र बसे हैं नेत्रों में

कहाँ गई कहानी सब।

सुबह शाम सुहानी तब

यादों में आती जब तब

नहीं मिले नाथ वर्षों में

यादों के बादल हैं अब।

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वाह जिन्दगी !

कालचक्र कर देता है।/Kalchakr Kar Deta h. 

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आने वाला हर नव दिन ये गात पुराना कर देता है

बदले है भूगोल शरीरी गुम इतिहास में कर देता है

तन तो नहीं रहेगा प्यारे इससे कुछ ऐसा काम करें

जो ये भी कर न सके गुमनाम उसे जग कर देता है ।

बीतने वाला हर वह दिन कुछ प्रश्न खड़े कर देता है

बहका सा चिन्तन अपना फिर घाव हरे कर देता है

हम तो नहीं रहेंगे प्यारे इतिहास में सत्य सुबोध भरें

इतिहास को छलने वालों का वक़्त गर्क कर देता है ।

सत्य  को सौ परदों में रखो, वह तो अंगड़ाई लेता है

कितने झूठे रंग भरो सच स्वयं को सिद्ध कर देता है

तम तो नहीं रहेगा प्यारे आओ अब तीव्र प्रकाश करें

जो सच सोया है पर्तों में वक़्त उनमें तेज़ भर देता है।

जो इतिहास की गलती से, सुनो सबक नहीं लेता है

फिर वक़्त भी साथ नहीं देता सारी बुद्धि हर लेता है

हर दम सब नहीं रहेंगे प्यारे सो प्रेम भाव प्रसार करें

सद् रंग स्नेह का बढ़ता जाना साधु भाव भर देता है।

विगत का बीजारोपण वर्तमान में यौवन भर देता है

कारण बनता वर्तमान भविष्य दिशा तय कर देता है

हम तो वही कहेंगे प्यारे सब कुछ तज सद्कर्म करें

कर्मफल ही आगे बढ़कर भाग्य स्वरूप धर लेता है।

राष्ट्र प्रेम घन घोर से तम में, चैतन्य भाव कर देता है

नव सूर्य चैतन्य भाव संग मिल वीर भाव भर देता है

हम सब यही कहेंगे प्यारे निज मन वीरता भाव भरें

वीरभाव का पथ प्रशस्त ‘नाथ’ कालचक्र कर देता है।

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वाह जिन्दगी !

‘नाथ’ सभी संघर्ष करें ।

May 9, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

कैसा है ये काल चक्र ये कैसा खेल दिखाता है

कितनी भी करें व्यवस्था चक्रव्यूह बन जाता है

शिक्षार्थी को शिक्षा दें ,वह सब ऐसा संघर्ष करें

चक्रव्यूह का भेदन हो अंतिम द्वार पर नहीं मरें।1।

स्वदेश उन्नति की खातिर सैनिक जान गंवाता है

वो शहीद हो जाता है क्या हमसे कुछ हो पाता है

खुद को यूँ तैयार करें कि हम नहीं शर्म से मरें

आन हित सब जूझें  सैनिक सा कर्त्तव्य करें ।2।

ज़रा हम अपने से पूछें क्या हमसे निभ पाता है।

देश प्रेम के जज्बे संग व्यवस्थापन बन पाता है।

इस देश प्रेम के हित में उन सब में जज्बात भरें।

देश से हम सब प्यार करें और दायित्व निर्वाह करें ।3।

आचार्य अस्तित्व रक्षण शासन समझ ना पाता है।

मूल्य सम्वर्धन का दायित्व आचार्यों पर आता है।

देश निज दायित्व मान शिक्षक को मज़बूत करे।

गुरु भी अस्तित्व की न सोचे नीति में सहयोग करे ।4।  

हम सब की रक्षा में रक्षक क्यों कर मर जाता है।

क्या हमको जन की खातिर मरना नहीं आता है।

आओ आचार्यों राष्ट्र में तैयार अनोखी नस्ल करें।

कोई करे बलिदान तो प्रथम वरण हम मृत्यु करें ।5।

मृत्युवरण गर नहीं करे तो इतना कर सकता है।

आचार्य देशप्रेमियों की पौध खड़ी कर सकता है

चाणक्य को हम याद करें भारत का उत्कर्ष करें।

इस उत्कर्ष की खातिर, ‘नाथ’  सभी संघर्ष करें ।6। 

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काव्य

विश्वस्वास्थ्य संगठन का स्वास्थ्य बचाइए 

May 7, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

महा मारी फैल रही, बस अब मान जाइये

फालतू का घर में बैठे, हल्ला मत मचाइए

मृत्यु पूर्व इस संगठन का बीमा तो कराइये

सुधार वैश्विकस्तर पर हो आवाहन कराइये

विश्वस्वास्थ्य संगठन का …………..

सारी दुनिया मिल ड्रैगन पर दबाब बनाइये

खूँख्वार ड्रैगन का काला मुख तो दिखाइए

इस संगठन को चीन की कठपुतली न बनाइये

टेड्रोस घेव्रेयसस हैं समस्या अब तुरन्त हटाइये

विश्वस्वास्थ्य संगठन का ……………………..

दसलाख संग भारत का अभिमत भी जुड़वाइये

इस पद से नॉनफिजीशियन को मुक्ति दिलाइये

विषम कुचक्र से जन जीवन को मुक्ति दिलाइये

पक्षपात व हीला हवाली का जंजाल ये कटाइये

विश्वस्वास्थ्य संगठन का ……………………..

 देरी के कारण को गलती का अहसास कराइये

गैर जिम्मेदारी व गफलत की सजा तो दिलाइये

मानव संक्रमण वाले झूठ का मजा तो चखाइये

अनावश्यक संगठन धरती बोझ ख़तम कराइये

विश्वस्वास्थ्य संगठन का ……………………..

जिनपिंगजी बहानों की बीजिंग ढाल न लगाइये

मानव जीवन रक्षण हेतु अब पारदर्शिता लाइए

चीन से आर्थिक दूरी की, सबल नीति बनाइये  

औद्योगिक फर्म वहाँ से, अब यहाँ लेते आइये

विश्वस्वास्थ्य संगठन का ……………………..

तीन करोङ डॉलर के झाँसे से हवा निकालिये

मुँह बन्द करने के नाटक से ये संगठन बचाइए

चाइना की विश्वसनीयता में  अगन लगाइये

दुर्नीति को मिलजुल नीति से सबक सिखाइए  

विश्वस्वास्थ्य संगठन का ……………………..

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वाह जिन्दगी !

अमावस में चमक सकते हो।

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

विश्वास करके खुद पर

मुश्किल को पटक सकते हो

सिरे से अवसाद कुचल

परिस्थिति पलट सकते हो ।1।

आत्मबल को कर प्रबल

हलाहल को खटक सकते हो

अवचेतन को बना सम्बल

समस्या को झटक सकते हो ।2।

बुद्धिबल को कर वन्दन

विद्वत्व को लपक सकते हो

मेधा को कर अभिनन्दन

साहस को झपट सकते हो ।3।

सृजन को कर सभी अर्पण

बाधा को डपट सकते हो

असत्य को दिखा कर दर्पण

उत्कर्ष को गटक सकते हो ।4। 

कण्टकाकीर्ण पथ पर चल

विजय को गपक सकते हो

आत्मशक्ति पर दृढ़ रहकर

लक्ष्य को सटक सकते हो ।5।

जहरीले रुख को मोड़कर

सुधा को गटक सकते हो

बुराइयाँ नाथ सब छोड़कर

अमावस में चमक सकते हो ।6।

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दर्शन

काम अब भी शेष है हाँ …….

May 5, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सोना मैं भी चाहता था नींद भी भारी बहुत थी

पर प्रगति चाह थी जो नींद पर भारी बहुत थी

यह हमारा देश है, बहु भाँति विविध विशेष है ।

काम अब भी शेष है, हाँ काम अब भी शेष है।।

मुझे झपकी सी लगी थी भगवद्गीता गा रही थी

सिखा सांख्ययोग दर्शन कर्मयोग बता रही थी

यह कर्म का सन्देश है, अनवरत भाव अशेष है ।

काम अब भी शेष है, हाँ काम अब भी शेष है।।

अनासक्ति भाव के संग ज्ञानयोग बता रही थी

रागद्वेष को धताबता कर्म योग समझा रही थी

ज्ञान का पुरा अवशेष है व निग्रह मन विशेष हैं ।

 काम अब भी शेष है हाँ काम अब भी शेष है।।

मथ ज्ञान विज्ञान को अक्षर ब्रह्म सिखा रही थी

भक्ति प्रभुता संग आध्यात्मिकता बढ़ा रही थी

ज्ञान प्रभाव विशेष है निष्काम भाव परिवेश है ।

काम अब भी शेष है, हाँ काम अब भी शेष है।।

राजविद्या पढ़ा रही योगविभूति मिला रही थी

दर्शन विश्व रूप दिखा, भक्ति पथ बना रही थी

विभाग योग क्षेत्रज्ञ है, सत, रज, तम विशेष है । 

काम अब भी शेष है, हाँ काम अब भी शेष है।।  

योग पुरुषोत्तम व शास्त्र सम्मति सिखा रही थी

श्रद्धात्रय जोड़ नाथ ॐ तत्सत् तक आ रही थी

संयास मोक्ष सन्देश है गीता महात्म्य भी शेष है ।

काम अब भी शेष है, हाँ काम अब भी शेष है।।

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वाह जिन्दगी !

सद्मार्ग मिलना चाहिए।/Sadmaarg Milana Chaahiye.

May 3, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जैसा भी हम सोचते हैं

वैसा लिखना चाहिए

जैसे भी हम सचमुच हैं

वैसा दिखना चाहिए।

नकली कपट कारवां से

हमको बचना चाहिए

जो मूल्य अपने हैं नहीं

उनमें न खपना चाहिए।

सदा जीवन उच्च विचार

सबमें में दिखना चाहिए

आगत बुराई के खिलाफ

समर में टिकना चाहिए

जो भाषा हम बोलते हैं

गर्व से लिखना चाहिए

भाषा तो मात्र माध्यम है

सद्ज्ञान टिकना चाहिए

है पावन संस्कृति हमारी

गौमुख तो दिखना चाहिए

सभ्यता का उत्कर्ष भी

सानन्द रखना चाहिए।

गौरवशाली है परिपाटी

स्वाद तो चखना चाहिए

आने वाली नव नस्लों को

सद्मार्ग  मिलना चाहिए।

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काव्य

वक़्त तो चलता रहता है।

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

गुनना चाहो या ना चाहो

मन की व्यथा बताता हूँ

मैं  शिक्षक हूँ  भारत का

भारत की कथा सुनाता हूँ।।

हम  चाहें या ना  चाहें

घटनाएं  तो  घटती  हैं

कुछ घटना स्वाभाविक हैं

कुछ तो साजिशन होती हैं।।

तुम  चाहो या ना  चाहो

बस मुहरा बनना पड़ता है

जिनका नेता होना था तुम्हें

पिछलग्गू होना होता है।।  

फिर सब चाहें या ना चाहें

सबको भुगतना पड़ता है

कितने भी धीर गम्भीर रहो

कश्मीर सा कटना पड़ता है।।

सुनना चाहो या ना चाहो

फिर झूठ भी सुनना पड़ता है

है सच सारा मालूम तुम्हें

पर मुँह को सिलना पड़ता है।

उठना  चाहो या  ना  चाहो

ये तुम पर निर्भर करता है

किसी  के रोके  रुका नहीं

वक़्त तो चलता रहता है।  

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