दर्शन और शिक्षा (Philosophy and Education )  जीवन के पवित्र आवश्यकताओं की ओर निर्दिष्ट करने वाला प्रमुख कारक दर्शन है यह सिद्धान्त है तो शिक्षा इसका व्याहारिक पक्ष। दोनों में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध है। जेण्टाइल महोदय ने कहा –

“The belief that men may continue to educate without concerning themselves with philosophy means a failure to understand the precise nature of education. The process of education cannot go on right lines without the help of philosophy.”

“जो व्यक्ति इस बात में विश्वास रखते हैं की दर्शन से सम्बन्ध बनाये बगैर कोई प्रक्रिया आम रीति से चल सकती है, शिक्षा के विशुद्ध स्वरुप को समझने में असमर्थता प्रकट करते हैं। शिक्षा प्रक्रिया दर्शन की सहायता के अभाव में उचित मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकती।”

Butler (बटलर ) महोदय ने कहा –

“Philosophy is a guide to educational practice, education as a field of investigation yields certain data for philosophical judgement.”

“दर्शन शिक्षा के प्रयोगों के लिए पथ प्रदर्शक है। शिक्षा, अनुसन्धान के क्षेत्र के रूप में दार्शनिक निर्णय के लिए निश्चित सामग्री को आधार के रूप में प्रदान करती है। ”

वस्तुतः दर्शन व शिक्षा एक विशिष्ट सम्मिश्रण है इसीलिए  जितने दार्शनिक हुए सभी शिक्षा शास्त्री भी रहे। बुद्ध, अरस्तु, शंकराचार्य, गाँधी, विवेकानन्द सभी दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री भी रहे। 

Impact of philosophy on Education (दर्शन का शिक्षा पर प्रभाव )

दर्शन और शिक्षा के उद्देश्य(Philosophy and Aims of education)

दर्शन का तत्वमीमांसीय आधार मानव जीवन के उद्देश्य अर्थात शैक्षिक उद्देश्य निर्धारित करता है दर्शन के पथ प्रदर्शन के आलोक में इन्हें प्राप्त किया जाता है जॉन डीवी कहते हैं –

“Philosophy is concerned with determining the ends of education.”

“दर्शन का सम्बन्ध शिक्षा के लक्ष्यों को निर्धारित करने से है।”

दर्शन और शिक्षा की पाठ्यचर्या(Philosophy and Curriculum)

दर्शन के आधार पर ही यह निर्धारित होता है की किस काल में क्या विषय वस्तु पढ़ानी आवश्यक है और क्या त्याज्य है पाठ्यक्रम स्थाई नहीं है यह काल ,दशा ,आवश्यकता के अनुसार दर्शन निर्धारित करता है इसीलिए रस्क महोदय ने कहा –

“Nowhere  there  is dependence of education on philosophy more marked than in the question of curriculum.”

“शिक्षा, दर्शन पर पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में जितनी निर्भर है, उतनी अन्य किसी शैक्षिक समस्या के सम्बन्ध में नहीं।”

दर्शन व शिक्षण विधियाँ  (Philosophy and Methods of teaching)

ये किसी एक शिक्षण विधि के भक्त नहीं थे बल्कि दार्शनिक की अंतर्दृष्टि द्वारा स्वीकारा साधन मात्र था इसी लिए R. W. Sellers ने कहा –

“Philosophy is a persistent attempt to gain insight into the nature of the world and of ourselves by means of systematic reflection.”

“दर्शन एक ऐसा अनवरत प्रयत्न है जिसके द्वारा हम संसार और अपनी प्रकृति के विषय में क्रमबद्ध अनुभवों द्वारा अन्तर्दृष्टि प्राप्त करते हैं।”

इसी लिए विभिन्न दार्शनिकों ने  अलग शिक्षण विधियों का समर्थन किया। 

सुकरात – वार्तालाप व प्रश्नोत्तर विधि।

रूसो – स्वानुभव व स्वक्रिया द्वारा सीखना।

बेकन  – प्रयोग व निरीक्षण विधि।

हर्बर्ट  – पञ्चपदी।

मॉन्टेसरी – इन्द्रिय प्रशिक्षण।

फ्रोबेल – किण्डर गार्टन पद्धति।

दूसरे शब्दों में कह सकते हैं की आदर्शवादियों ने प्रश्नोत्तर व वाद विवाद पद्धति ,प्रकृतिवादियों ने इंद्रियों द्वारा सीखने, प्रयोजनवादियों ने इकाई व प्रोजेक्ट विधि तथा यथार्थ वादियों ने निरीक्षण व स्वानुभव पद्धति को समर्थन दिया। 

दर्शन व अनुशासन (Philosophy and Discipline)

अनुशासन प्रत्यक्षतः दर्शन से प्रभावित होता है जैसे प्रकृतिवादी प्राकृतिक परिणामों द्वारा स्वतन्त्रता को स्वीकारते हैं आदर्शवादी अध्यापक के व्यक्तित्व की प्रभावशीलता से अनुशासन स्थापन चाहते हैं प्रयोजनवादी सामजिक और सहयोगी क्रिया द्वारा अनुशासन स्थापित करना चाहते हैं Rusk (रस्क ) महोदय ने कहा –

“Discipline reflects the philosophical prepossessions of an individual or an age more directly than any other aspect of school work.”

“विद्यालय कार्य के अन्य किसी पक्ष की अपेक्षा अनुशासन किसी व्यक्ति या युग की पूर्वधारणाओं को अधिक प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिम्बित करता है।” 

दर्शन और पाठ्य पुस्तकें (Philosophy and Textbooks)-

पाठ्यपुस्तकें दर्शन से प्रभावित होकर मानदण्डों के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करती हैं वे बताती हैं की शिक्षक क्या जाने और विद्यार्थी क्या सीखे।

वेस्ले महोदय के शब्दों में -“पाठ्य पुस्तक, मानदण्डों को प्रतिबिम्बित एवं स्थापित करती हैं यह अधिकतर इस बात का संकेत देती हैं की शिक्षक को क्या जानना चाहिए और बालकों को क्या सीखना चाहिए। यह शिक्षण विधियों को प्रभावित करती हैं। तथा विद्वता के बढ़ते हुए मानदण्डों को प्रकट करती हैं।”`

दर्शन और शिक्षक (Philosophy and Teacher )-

क्षेत्र ,समाज,राष्ट्र के अनुरूप शिक्षक का जीवन दर्शन उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है और विद्यार्थियों को दिशा देता है डॉ के 0 एल 0 श्रीमाली के शब्दों में –

“Thus, not merely must the teacher have a philosophy of education. He must come prepared to develop among his students a philosophy of life.”

“इस प्रकार शिक्षक का कोई शिक्षा दर्शन अवश्यमेव होना चाहिए केवल यही नहीं, शिक्षक को छात्रों में जीवन दर्शन का विकास करने के लिए तैयार होकर इस व्यवसाय में प्रवेश करना चाहिए।”

Influence of Education on Philosophy (शिक्षा का दर्शन पर प्रभाव) –

शिक्षा, दर्शन के निर्माण का आधार – 

शिक्षा के आधार पर ही हमारी भाषा पर पकड़ होती है इसी के द्वारा हम विचार, मन्थन, अवलोकन, मनन सीखते हैं इसी से अन्तर्दृष्टि विकसित होती है अतः शिक्षा को दर्शन के निर्माण का आधार कहना युक्ति संगत है इसीलिए G. E. Patrtidge (जी 0 ई 0 पैट्रिज ) ने कहा –

“In a very deep sense, it is quite as reasonable to say that philosophy is based upon education as education is based upon philosophy.”

“अत्यंत गंभीर अर्थ में यह कहना बिल्कुल उचित है की जिस प्रकार शिक्षा दर्शन पर आधारित है उसी प्रकार दर्शन शिक्षा पर आधारित है।”

शिक्षा, दर्शन को प्राणवायु देने वाला कारक –

बिना शिक्षा के दार्शनिक सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता, शिक्षा सृष्टि -सृष्टा, जड़- चेतन, जन्म -मरण   की दार्शनिक  व्याख्या के अधिगम का आधार बनती है इसीलिए जॉन डीवी ने कहा –

“It is ultimately the most significant phase of philosophy, for it is through the process of education that knowledge is obtained.”

“यह दर्शन का महत्त्वपूर्ण पक्ष है, क्योंकि शिक्षा प्रक्रिया द्वारा ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।”

शिक्षा द्वारा दर्शन के निर्धारित मार्ग अनुसरण –

शिक्षा ही वह कारक है जो दर्शन कोप्रवाह में बनाये रखता है शिक्षा प्रक्रिया द्वारा दार्शनिक उद्देश्यों की प्राप्ति होती है यही गतिशील पक्ष है इसी लिए डीवी कहते हैं -“Education is the dynamic side of philosophy. It is the active aspect of philosophical belief, the practical means of realising the ideals of life.”

“शिक्षा दर्शन का गतिशील पहलू है यह दार्शनिक विकास का सक्रिय पक्ष है और जीवन के आदर्शों को प्राप्त करने का वास्तविक साधन है।”

नवीन समस्याओं का परिचायक शिक्षा –

समस्या मानव की विकास यात्रा का महत्त्वपूर्ण पहलू है और शिक्षा ही दर्शन को इसका साक्षात्कार कराती है इसीलिए के 0 एल 0 श्रीमाली ने कहा –

“The task of educationist is to reconstruct the country’s philosophy and redefine values so that they may interpret our changing life and thought.”

 “शिक्षाशास्त्री का कार्य देश के दर्शन की पुनः रचना करना और मूल्यों को पुनः परिभाषित करना है जिससे कि वे मूल्य हमारे परिवर्तनशील जीवन एवम् विचार का स्पष्टीकरण कर सकें।”

उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है की शिक्षा और दर्शन में घनिष्ठ सम्बन्ध है इसीलिये उच्चकोटि के शिक्षाशास्त्री चाहे भारतीय हों या पाश्चात्य, शिक्षा दर्शन की समस्याओं पर मन्थन करते दृष्टिगोचर होते हैं इसीलिए डीवी ने कहा –

“Philosophy is the theory of education in its most general phases.”

“दर्शन शिक्षा का अत्यन्त सामान्य सिद्धान्त ही है। ”

कोई किसी को काम ज्यादा नहीं आंक सकता इसी लिए जॉन डीवी ने स्पष्टतः कहा –

“The philosophy of education is not a poor relation of general philosophy though it is so treated even by philosophers. It is ultimately the most significant phase of philosophy, for it is through the process of education that knowledge is obtained.”

“शिक्षा-दर्शन सामान्य दर्शन का दीन सम्बन्धी नहीं है यद्यपि दार्शनिकों ने भी अभी तक यही माना है। अन्ततः यह दर्शन का महत्त्वपूर्ण पक्ष है, क्योंकि शिक्षा प्रक्रिया द्वारा ही ज्ञान प्राप्त होता है।”

जे 0 एस 0 रॉस महोदय ने अपने तत्सम्बन्धी विचार का प्रगटन सुन्दर ढंग से इस प्रकार किया –

“Philosophy and  education like the two sides of the same coin, present different views of same thing.”

-J.S.Ross

“दर्शन और शिक्षा एक सिक्के के दो पहलुओं के समान एक वस्तु के भिन्न पक्षों का बोध कराते हैं। ”

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