तपे धरा, अम्बर से ज्वाला

जेठ की यह दोपहरी।

हर दिशा में अग्नि सी है,

प्यास भी सिहरी सिहरी।

डोलती है धुल उड़ उड़

राह सूनी सी पड़ी है।

किन्तु संघर्षों के रथ पर

जिन्दगी फिर भी खड़ी है । 1 । 

अम्बर के अँगारों से फेनिल हाला,

आँधी, ताप से ताल तलैय्या बेहाला।

धूप का घूँघट उठाया जेठ ने,

पसीने से तरबतर है साँस आला।

भोर से धरती धधकती जोर से,

दहकते तेवरों से और लू के शोर से।

गलियों में खामोशियाँ बिखरी पड़ी हैं,

कर्मवीरों के समक्ष अद्भुत घड़ी है ।2

साँस लूँ,साँस लूँ तो आग बरसे,

वो छाँव भी अब तो डरी है।

हारती ये कब प्रकृति है,

कर्म की क्रीड़ा, खरी है।

पुष्प मुरझाते नहीं बस,

धैर्य की पहचान करते।

आँधियों के शोर में भी,

मार्ग का निर्माण करते  । 3 ।          

उत्साह भरती शर्म  कणों की मेखला,

जिससे सुवासित है, ये अविरल धरा।

हौसलों ने बदल दी तसवीर जग की,

और तोड़ा धूल भरे, बदनों ने बन्धा।

तपिश ने पुस्तक में खुश्की बढ़ाई है,

हिम्मत भरे पगों की नव अंगड़ाई है।

मन में धूल से ज्यादा आँखों में गांव हैं,

ख़बरों में जलते ठाँव हैं, उठते पाँव हैं 4

मेहनत से श्रम कण बरसेगा,

सारी तपन वह हर लेगा।

बरसात भी आएगी एक दिन,

पानी मोती में बदलेगा।

बुलाती मन्जिल दूर से,

अमावस की छँटती रात है।

गरमी ये कह कर भागेगी,

बहुत तेज बरसात है 5

फिर शीत ऋतु लौट आएगी,

छंटेगी सघन ताप सारा।

सोने सा तपकर निकलेगा,

मानस का मनमीत प्यारा।

सूर्य की इन रश्मियों में,

है छुपी नव क्रान्ति की छवि।

यह तपस्या ही गढ़ेगी,

आगाज़ कर्म का देगा ये रवि 6

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