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काव्य

काशीअविनाशी की नाभि ज्ञानवापी है।

February 16, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मन्दिर का भव्य होना, स्वस्थ परिपाटी है

मिटाने में दुष्टों ने, न रखी कसर बाकी है

पौराणिक ग्रंथों ने ज्ञान को जो प्रश्रय दिया

उसी का परिणाम है निशाँ अभी बाकी है।

काशी अविनाशी की नाभि ज्ञानवापी है।1।

बर्बर विध्वंश हुआ, पर पुरातन झाँकी है

खगोलीय, गणितीय, मापन  से आँकी है

काशी में विज्ञों ने, ज्ञान को संरक्षण दिया  

ज्ञानवापी केन्द्र है विस्तार सारी काशी है।

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।2।

लांघता मर्यादा को समझ लो वो पापी है

सत्य जानो, मानो ना, कैसी आपाधापी है

न्याय के मन्दिर ने सत्य को संरक्षण दिया

आ गई अयोध्या पर मथुरा,काशी बाकी है

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।3।   

राम ने मर्यादा गढ़ी, कृष्ण नीति साँची है

प्रलयंकारी शङ्कर ने गढ़ी नगरी काशी है

प्राची के ग्रंथों ने काशी का बखान किया

काशी में ईश विश्वनाथ और ज्ञानवापी है।

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।4।

सत्य सनातन आस्था चेतन जग व्यापी है

स्कन्द पुराण ने, महा महिमा ये बाँची है

भूगोल, अध्यात्म महिमा ने ये सिद्ध किया

अवमुक्तेश्वर ज्ञानप्राप्ति धाम ये काशी है।

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।5।

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काव्य

मेरी माटी मेरा देश।

August 9, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।

क्रान्ति का अनुपम सन्देशा, आकर हमें सुना जा।

है आज जरूरी हम को, तूँ सुन्दर स्वप्न दिखा जा।

सपने अपने करने की,  तूँ कला कोई समझा जा।

पावन भारत, सुन्दर भारत, बस ये तूँ गढ़ता जा।

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 1 ।।

भारत के हर एक युवक में इच्छा शक्ति जगा जा।

कर्मठता का बीज मन्त्र भी आकर हमें सिखा जा।

तनमन सुन्दर करने का एक सुन्दर भाव जगा जा।

बहुत सोलिया अब तूँ, कुछ उथल पुथल करता जा।

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 2 ।।

हो बलशाली युवा यहाँ,  सिद्धि मन्त्र सिखला जा।

अन्त निशा का हो जाए, ऐेसा दिन-मान जगा जा।

पूरब सी लाली छा  जाए, ऐसा मार्तण्ड उगा जा।

हो सदा ओज का संरक्षण दिव्य कान्ति को पा जा।   

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 3 ।।

जो सोता है वो खोता है, मन में सोच जगा जा।

पूर्वज श्रद्धा केन्द्र बनें, वो उन्नत भाव जगा जा।

रख सीने में आग ज्ञान का वो शोला भड़का जा।

शोलों से प्रतिमान नए हर पथ में तूँ गढ़ता जा।  

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 4 ।।

चलना उठना, उठना गिरना चलन हमें समझा जा।

उठा भाल, संग क्रान्ति ज्वाल, ये सन्देशा फैला जा।

भारत उठता, बढ़ता चढ़ता, युवा शक्ति का राजा।

बनके ज्वार इसी शक्ति का शिखरों तक चढ़ता जा।    

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 5 ।।

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काव्य

लक्ष्य पर पूरा समर्पण …

July 21, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आचार्य कहता नहीं कि मैं भी रुकना जानता हूँ,

क्योंकि अपने शिष्य का, हर एक  सपना जानता हूँ। 

उसके सपनों में है शामिल हैं उसकी आशाएं सभी,

उसकी आशाओं  में गहरा, रंग  भरना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।1।

हर चमक से दूर रहकर, मैं सिमटना जानता हूँ,

एक कछुए की तरह मैं खुद को ढकना जानता हूँ।

मेरे बच्चों को  लगे ना  इस  जमाने की हवा,

विष भरी हर एक हवा को मैं कुचलना जानता हूँ।  

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।2।

इस जहाँ की गन्दगी से और फिसलन से बचा

लेके जाना है जहाँ पर, मैं वह रस्ता जानता हूँ।

पाश्चात्य की कोशिश है ये, अपनी लय में ले बहा 

कच्चे मन पे शिष्य के सद्कर्म लिखना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।3।

संस्कृति के पतन से,  मूल्य इन्सानी बचा

योग है परिवार का जो, मैं बताना जानता हूँ।

देखकर सारी विकृतियाँ मैं भी घायल हो गया

 की कहाँ गलती जहाँ ने, ये दिखाना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।4।

छा रहा परिवार – वादी, भाव अब नेतृत्व में

मैं जहाँ की स्वार्थपरता लूट फितरत जानता हूँ।

बच्चों के अरमान पर जो छा रहीं हैं अब घटा

उस घटा को मैं हटाकर साफ़ करना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।5।

क्यों बनी जालिम परिस्थिति क्या है उलझन आपकी

कौन है निर्दोष कितना, मैं यह सब कुछ जानता हूँ।

मोड़ कर गर्दन कलम की, दिग्भ्रमित जिसने किया

काली स्याही फेंकने का, सारा चक्कर जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।6।

स्वार्थ परता का दहन हो, हो सृजित निष्ठा का मन

श्रम का प्रतिफल मैं युवा को यूँ  दिलाना जानता हूँ।

स्वार्थ की भट्टी बुझाकर सम्मान श्रम को मिल सके

श्रम कणों का मूल्य हो क्या ‘नाथ’ हूँ यह जानता हूँ।  

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।7।

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काव्य

शिक्षा को नव क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए ।

June 7, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शुद्ध नीयत से नीति का निर्माण होना चाहिए

अनुपालन हेतु सम्यक व्यवहार होना चाहिए।

परम्परागत मर्म का अनुकरण हुआ है अब तक

नव आवश्यकतानुसार व्यवहार होना चाहिए।

शिक्षा को नव क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए

नवयुग में नई सोच का प्रभाव  होना चाहिए।1।

शिष्टाचार स्वविवेक के अनुसार होना चाहिए,

विवेक जागरण प्रयास बारम्बार होना चाहिए।

प्राप्त अनुशासन का पालन हुआ है अब तक,

अनुशासन में नव सूत्र का प्रवाह होना चाहिए।

शिक्षा को नव क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए

नवयुग में नई सोच का प्रभाव  होना चाहिए।।2।

उपभोग – वृत्ति पर पुनः विचार होना चाहिए,

बाजारवादी संस्कृति का संहार होना चाहिए।

मर्यादा और मूल्यों को हमने बेचा है अबतक,

इनके संरक्षण का अब व्यवहार होना चाहिए  

शिक्षा को नव क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए

नवयुग में नई सोच का प्रभाव  होना चाहिए।3।

गहनतम अन्धकार का न प्रसार  होना चाहिए,

अधोगामी सिद्धान्त, पुनः विचार होना चाहिए।

जो सैद्धान्तिक तथ्य फलित न हुए हैं अब तक,

उनमें परिवर्तन हेतु, सद् विचार होना चाहिए।  

शिक्षा को नव क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए

नवयुग में नई सोच का प्रभाव  होना चाहिए ।4।

रूढ़ियुक्त रिवाजों का तिरस्कार होना चाहिए,

सड़े गले विचारों को दर किनार होना चाहिए।

विविध गलत तथ्यों का बोझ ढोया है अब तक,

अब उनसे दूर हटकर सद् प्रचार होना चाहिए।     

शिक्षा को नव – क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए

नव – युग में नई सोच का प्रभाव  होना चाहिए । 5।

वह इतिहास कत्तई, न अंगीकार होना चाहिए,

जो राष्ट्र हित में हो वही स्वीकार होना चाहिए।

गलत इतिहास से परिचित कराया है अबतक,

सत्य सम्वर्धन विकास का आधार होना चाहिए।     

शिक्षा को नव – क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए

नव – युग में नई सोच का प्रभाव  होना चाहिए ।6।

मिथ्या मानदण्डों में परिष्कार होना चाहिए,

कर्मकाण्ड सुधार का आचार  होना चाहिए।

आदमी ने आदमी को बहुत छला है अब तक

बदले युग में मानवता का प्रचार होना चाहिए।

शिक्षा को नव – क्रान्ति का पर्याय होना चाहिए

नव – युग में नई सोच का प्रभाव  होना चाहिए ।7।

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काव्य

सेंगोल धारण किया है तुमने …

May 27, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सेंगोल धारण किया है तुमने,

मर्यादा का पथ,  वर लेना।

धर्मदण्ड जो चुना है तुमने,

दायित्व का बीड़ा धर लेना ।1।

कठिन डगर है कण्टक पथ है,

दावानल प्रबल है, जल लेना।

तप निकलोगे स्वर्णिम पथ है,

स्वर्णिम पथ पर चल लेना । 2।

यह पथ ही वह कर्त्तव्य पथ है,

इस पथ को तुम वर लेना।

यह संसद वह भव्य मन्दिर है,

सद् प्राण प्रतिष्ठा कर लेना ।3।

भटकाव बहुत भटकन का डर है,

डर से, हिम्मत से, लड़ लेना।

चलना, उठना, बढ़ना, गिरना,

संस्कृति से अपनी तर लेना।4।

आँधी, पानी, बिजली, तूफाँ,

इस सीढ़ी पर तुम चढ़ लेना।

ले विजय पताका बढ़ना है,

सङ्कट इस जग के हर लेना।5।

 इस राष्ट्र का गुरु सङ्कट में है,

मुक्ति का साधन कर लेना।

स्वतन्त्र चिन्तन शक्ति बढ़े,

उस पथ के कण्टक हर लेना।6।

वर्षों का विष वमन गरल है,

बस इसको अमृत कर देना।

गर्दन भी बहुत हैं सिर भी बहुत,

राष्ट्रवादी चेतना भर देना।7।

भूमि खण्ड नहीं चेतन है भारत

चेतनता का स्वर भर देना।

राष्ट्र भक्ति ही सर्वोपरि है,

बस यही भाव हर घर देना ।8। 

जीवन का क्रम तो अविरल है,

कर्मों को सुगन्धित कर देना,

नाथ ‘नाथ’ है सक्षम है,

धर्मपथ प्रशस्त कर चल लेना ।9।

———————————————————

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काव्य

अजी चोट देकर कहाँ जाइएगा ?

April 29, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सितम अपने अन्धड़ का अजमाइएगा,

वादा  खिलाफी  सिल-सिला  पाइएगा।

वो अरमाँ, वो वादे, रुठाए जो तुमने,

हर जगह बस वही सिसकियाँ पाइयेगा।

अजी चोट देकर कहाँ जाइएगा,

जख्म जो दिए हैं हरे पाइएगा ।1।

अब खुशियों के वन में धुआँ पाइएगा,

निशाँ जिन्दा होने का,  ना  पाइएगा।

समय के वो हिस्से जिए थे जो हमने,

चन्द वादों में गुम हिचकियाँ पाइयेगा।

अजी चोट देकर कहाँ जाइएगा,

जख्म जो दिए हैं हरे पाइएगा ।2।

बहारों  का जंगल न हरा पाइएगा,

वहाँ केवल बस वीरानियाँ पाइएगा।

जहाँ चन्द खुशियाँ टहलती थीं उनमें,

निशाँ अपने कदमों के देख आइएगा,

 अजी चोट देकर कहाँ जाइएगा,

जख्म जो दिए हैं हरे पाइएगा ।3।

इक – दूजे के दाने तो मत खाइएगा,

रौंद कर सब तमन्ना न मुस्काइएगा।

रुदन सिसकियाँ जो प्रगट की हैं तुमने,

उनमें न कभी कोई कमी पाइयेगा।

अजी चोट देकर कहाँ जाइएगा,

जख्म जो दिए हैं हरे पाइएगा ।4।

कसम है तुम्हें न कफ़न लाइएगा,

करनी का फल बस देख आइएगा।

फसल स्वार्थ की जो उपजाई मन में,

उपजे तीक्ष्ण कण्टक सहम जाइएगा।   

अजी चोट देकर कहाँ जाइएगा,

जख्म जो दिए हैं हरे पाइएगा ।5।

चन्द हसरत जरूरत कुचल जाइएगा,

दुआ है हमारी, बस दुआ पाइएगा।

थोड़ी श्वासें औ सपने चुराए जो तुमने,

सजा उनकी तुम न कभी पाइयेगा।    

अजी चोट देकर कहाँ जाइएगा,

जख्म जो दिए हैं हरे पाइएगा ।6।

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काव्य

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ?

April 4, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ?

निरन्तर उम्र बढ़ते जाना

नवअनुभव से मिलवाता है।

और नए क्रन्दन का आना

शिशु जन्म बोध कराता है।

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 1

मदमस्त हो खेलते जाना

जीवन आनन्द दिलाता है।

समस्या का ना पता ठिकाना

नव रस सा बढ़ता जाता है

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 2 

पूर्व बाल्यावस्था का आना

नवसंस्था से जुड़वाता है।

नए परिवेश से यूँ जुड़जाना

सखाओं संग मिलवाता है।

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 3 

हर वस्तु खिलौना बन जाना

इस उम्र का दौर सिखाता है।

इस वय में सम्बन्ध बनजाना

कोई जीवन भर निभाता है।  

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 4

उत्तर बाल्यावस्था का आना

नव ऊर्जा का बोध कराता है।

सम्बन्धों का यह तानाबाना

संसार में उलझा जाता है। 

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 5 

नाना विधि ज्ञान  जुड़ जाना

नव चमत्कार दिखलाता है।

प्रश्नों का उत्तर बन जाना

फिर से नव प्रश्न जगाता है।  

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 6

कैशौर्य में मस्ती का आना

पुर जोश से होश हटाता है।

जोश में होश का यूँ खो जाना

किशोरवय का बोध करता है  

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 7  

संघर्ष सहित तूफ़ान का आना

इस जटिल उम्र में भाता है।                    

 गिरते पड़ते रस्ते कटजाना

नवपथ का दर्श कराता है। 

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 8

प्रौढ़ा वस्था की वय पाना

समस्या का बोध कराता है।

जीवन यथार्थ से जुड़जाना

कण्टक पथ मर्म सिखाता है।

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 9   

जीवन में भूल भुलैया आना

इस उम्र से जुड़ता जाता है।

बचपन का वह बोध भुलाना

मजबूरी सा बनता जाता है।   

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 10

धीरे से जीवन सन्ध्या आना

वृद्धा वस्था ही कहलाता है।

ऊर्जा ह्रास का हो जाना

मानव तन को नहीं भाता है। 

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 11    

सर्वाधिक यादों का आना

इस उम्र को ख़ास बनाता है

बचपन के साथी याद आना

जड़ से जुड़ जाना कहता है।    

जन्म स्थली वाला ठिकाना

अक्सर क्यों हमें बुलाता है ? 12

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काव्य

आधुनिकता की कमाई है ।

March 22, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

अरे ये क्या है ?

ये कैसी रुलाई है।

ये कैसी है मार

पकी फसलों ने खाई है।

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।1।

प्रकृति की सहज तन्द्रा

मानव ने भगाई है।

छीना है जो प्रकृति का

विपदा उससे ही आई है। 

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।2।

जब भी चाहा विस्फोट किया

जब चाहा खाई बनाई है।

पृथ्वी के अन्तस्तल में

खलबली सी मचाई है।

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।3।

बेहिसाब जल स्रोतों का

दोहन कर करी कमाई है।

असंख्य घाव करे छाती पर

पर दी न कोई दवाई है।

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।4।

लगता है प्रकृति निधि पर

विपदा ये नई सी आई है।

बरसात से प्राप्त जलनिधि भी

ना वापस लौटाई है।

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।5।

जल निधि में जहर की

अजब मात्रा बढ़ाई है।

कहते हो अम्लीय वर्षा

ये हमने ही कराई है।

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।6।

मौसम में परिवर्तन की

भारी कीमत चुकाई है।

लगता है इन्ही वजहों से

बे मौसम बारिश आई है।

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है।7।

ग्लोबल वार्मिंग ने

दी हमको यही दुहाई है।

जो बोओगे सो काटोगे

यह नीति सदा चल आई है।  

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।8।

पूर्व योजना की शक्ति

क्यूँ कर हमने गँवाई है।

जड़ प्राकृतिक विपदा की

क्यूँ समझ हमें न आई है।

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है ।9।

आवश्यक है आधुनिकता भी

पर लगाम क्यों गँवाई है।

कहीं कौमा, कहीं अल्प विराम

की रीति क्यों भुलाई है। 

लगता है यही सच है।

आधुनिकता की कमाई है।10।

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काव्य

परीक्षा रूपी उत्सव को………………

July 24, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

खिलखिलाकर, मुस्कुराकर, हँस दिखाना चाहिए,

सारा परि आवरण ही, खुशग़वार बनाना चाहिए,

परीक्षा बोझ नहीं है, व्यवहार से दिखाना चाहिए,

धैर्य युक्त, दृढ़ लगन से व्यवहार निभाना चाहिए।

परीक्षा रूपी उत्सव को महोत्सव बनाना चाहिए ।1।

पाठ्यक्रम को समयबद्ध सहज निपटाना चाहिए,

आज का कार्य, कल ऊपर नहीं टिकाना चाहिए,

समय कम है, पढ़ना अधिक न घबराना चाहिए,   

यथा सम्भव अधिगम कर विश्वास जगाना चाहिए।

परीक्षा रूपी उत्सव को महोत्सव बनाना चाहिए ।2।

विगत वर्षों के प्रश्नपत्रों को पुनः दोहराना चाहिए,

रटना पर्याप्त नहीं अतः चिन्तन में लाना चाहिए,

गर सम्भव है तो अन्य को वह समझाना चाहिए,  

जो ज्ञाननिधि है पास, सब ही बाँट आना  चाहिए।

परीक्षा रूपी उत्सव को महोत्सव बनाना चाहिए ।3।

स्वच्छ, निर्मल मन से परीक्षा कक्ष जाना चाहिए,

पावन आचरण, शुचिता से कर्म निभाना चाहिए,

कर्म को युग-धर्म बना व्यवहार में लाना चाहिए,

स्व आदर्श, स्थापन कर जग को दिखाना चाहिए।

परीक्षा रूपी उत्सव को महोत्सव बनाना चाहिए ।4।

अस्तित्व रक्षा, ज्ञान इच्छा सामञ्जस्य बैठाना चाहिए,

अवसाद सी नकारात्मकता जड़ से मिटाना चाहिए,

महाराणा, लक्ष्मीबाई, शिवाजी मन में छाना चाहिए,

कण्टकाकीर्ण पथ से दिव्य ज्ञानमार्ग बनाना चाहिए।

परीक्षा रूपी उत्सव को महोत्सव बनाना चाहिए ।5।

अभाव में प्रभाव का प्रत्यक्षीकरण कराना चाहिए,

पूर्ण मनोयोग व जीवट से तन-मन लगाना चाहिए,

स्मरण कर स्व ईष्ट का लक्ष्यहित लगजाना चाहिए,

आत्म विश्वास से परीक्षा में ‘नाथ’ पार पाना चाहिए।

परीक्षा रूपी उत्सव को महोत्सव बनाना चाहिए ।6।

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काव्य

कृष्णा तेरी गीता लानी पड़ेगी ।

June 21, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जन जन की वाणी बनानी पड़ेगी

उपद्रवियों कीमत चुकानी पड़ेगी

योगधर्म बताने से कुछ भी न होगा

लौ योग की फिर जलानी पड़ेगी।

कृष्णा  तेरी गीता  लानी पड़ेगी

घर घर तक जाकर सुनानी पड़ेगी ।1।

उन्हें उनकी क्षमता बतानी पड़ेगी

स्वयं, शौर्य  क्षमता बढ़ानी पड़ेगी

मात्र सिद्धान्तों से कुछ भी न होगा

असल क्षमता अपनी दिखानी पड़ेगी।

कृष्णा  तेरी गीता  लानी पड़ेगी

घर घर तक जाकर सुनानी पड़ेगी ।2।

राष्ट्रद्रोही को गलती बतानी पड़ेगी

कीमत संसाधनों की चुकानी पड़ेगी,

प्रेमसद्भाव मार्ग से कुछ भी न होगा

माँ भवानी, बलि अब चढ़ानी पड़ेगी

कृष्णा  तेरी गीता  लानी पड़ेगी

घर घर तक जाकर सुनानी पड़ेगी ।3।

प्रेममुरली कलयुग में छिपानी पड़ेगी

शास्त्र संग शस्त्रभाषा सिखानी पड़ेगी,

प्रेम – पेंगें बढ़ाने से कुछ भी न होगा

निज क्षमता सुदर्शन बढ़ानी पड़ेगी

कृष्णा  तेरी गीता  लानी पड़ेगी

घर घर तक जाकर सुनानी पड़ेगी ।4।

जो बोलें कृष्ण गीता जलानी पड़ेगी

निश्चित उन्हें, मुँह की खानी पड़ेगी,

चेहरे बदलने  से कुछ भी न होगा

धुल भारत भूमि की चटानी पड़ेगी।

कृष्णा  तेरी गीता  लानी पड़ेगी

घर घर तक जाकर सुनानी पड़ेगी ।5।

सच सच है, सच्चाई बतानी  पड़ेगी

सूरत इतिहास की धीरे धीरे दिखेगी,

गलती, छिपाने से कुछ भी न होगा

राष्ट्रवादी भूमिका निभानी पड़ेगी।

कृष्णा  तेरी गीता  लानी पड़ेगी

घर घर तक जाकर सुनानी पड़ेगी ।6।

भारत को गरिमा वह पानी पड़ेगी

अमृत है पयनिधि, पिलानी पड़ेगी

बचने छिपने से अब कुछ न होगा

सार्थकता ‘नाथ’ गीता बतानी पड़ेगी। 

कृष्णा  तेरी गीता  लानी पड़ेगी

घर घर तक जाकर सुनानी पड़ेगी ।7।

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