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काव्य

एकता तोड़ देती हैं।

December 23, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ये दुनियाँ है ये रिश्तों को नया आयाम देती है,

जहाँ हम लड़खड़ाते हैं ये बढ़कर थाम लेती है,

पर भारत में हमारे जन, भरोसा तोड़ देते हैं।

गद्दारों को यदि पकड़ें सियासत साथ देती है।

यही बातें,  यही बातें,  एकता तोड़ देती हैं  ।1।

उर्वर है यही धरती ये शिव को जन्म देती है

ये भी इसकी आदत है भस्मासुर को सेती है

ये भस्मासुर देश का विकासपथ तोड़ देते हैं

इन मौकापरस्तों का कुछ कौमें साथ देती हैं   

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं।2।

इतने घने कुहासे में राष्ट्रवादिता जन्म लेती है

जननी की ही शक्ति है सीमा को लाल देती है

देश रक्षा हितार्थ लाल प्राण भी छोड़ देते हैं

ये अबकी सियासत है जो उलटा बोल देती है      

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।3।

जवानी का लालच ऐसा बचपना छीन लेती है

अमीरी का भरम ऐसा, जवानी लील लेती है

कैसे बन्धन हैं दिल के वो सपने मोल देते हैं

कीमत देने के बाद भी भौतिकता तोड़ देती है     

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।4।

जातीयता, प्रान्तीयता जहर सा घोल देती है

प्रेम के पावन -पथ पर, लावा उड़ेल देती है

लोगों का शगल ये है गलती को हवा देते हैं

हवा बदले है अन्धड़ में,बस्ती उजाड़ देती है       

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।5।

अस्पृश्यता क्षेत्रीयता बातों को झोल देती है

लिपटी हुई ये बातें कलई सब खोल देती हैं

हमारे ही विविध नेता विष बेल रूप देते हैं

बेलें विषवमन करके तमस सा घोल देती हैं

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।6।       

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काव्य

क्या होता है जन्म से पहले, क्या होता मृत्यु के बाद ?

November 20, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

कैसी दुनियाँ जन्म से पहले, कैसी होगी मृत्यु के बाद

प्रश्न आदि से अनसुलझा है उत्तर नहीं सही से याद

ज्ञानधारणा मिल अज्ञान से नित्य खड़ा करती प्रतिवाद

चर्चा होती रहती प्रतिदिन फिर लगते मिथ्या सम्वाद।

                क्या होता है जन्म से पहले, क्या होता मृत्यु के बाद।

 जिज्ञासा मानस की कहती बाधाएं करती बरबाद

बाधाएं माया का जाल हैं ना दिखता जीवन के बाद

जीवन मृत्यु के दो कूलों में फँस जाता है प्रकृतिवाद 

झंझावातों से टकराकर नित्य खड़ा होता अवसाद।

                क्या होता है जन्म से पहले, क्या होता मृत्यु के बाद।

बाधा बनती कभी मृत्यु, कभी जन्म और भाषावाद

इन सारे चक्कर में उलझा प्रश्न बना रहता आबाद

गुत्थमगुत्था होते विचार उलझन को मिलता पानी खाद

यह रहस्य की वह दुनियाँ  है जहाँ दफन होते सम्वाद।

                क्या होता है जन्म से पहले, क्या होता मृत्यु के बाद।

क्या अज्ञेय रहेंगे सदा मिथ्या विज्ञान व अध्यात्मवाद

नहीं बता सकते हमको तर्कों को गढ़ तज मिथ्यावाद

क्या हो सकती पूर्ण साधना या प्रश्न रहेगा चिर आबाद

मध्य मार्ग चुनने की कह, सिद्ध कर रहे पलायन वाद।

क्या होता है जन्म से पहले, क्या होता मृत्यु के बाद।

कर्म प्रधान विश्व रचि राखा क्या कर्मों का नहीं हिसाब

जो जस करहिं सो तस फल चाखा,नहीं दिखाता प्रत्यक्षवाद

प्रश्न वहीं का वहीं खड़ा है अनर्गल होते रहे विवाद ।

क्यों विज्ञों की टोली चुप है नहीं सूझता सही जवाब।

                क्या होता है जन्म से पहले, क्या होता मृत्यु के बाद।

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काव्य

वृद्ध अवस्था / Old Age

November 29, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

वयौवन में खिलता जो तन मन

जिस दम कुम्हलाने लगता है

तन के कस बल ढीले पड़ते

तन, मन अलसाने लगता है।

यह संकेत हैं वृद्ध अवस्था के

बस चौथापन आने लगता है।1।

आँखों से दीखता है कम कम

कुछ तम सा छाने लगता है,

कानों में सरगम ढीले पड़ते

केशक्षय तड़पाने लगता है।  

यह संकेत हैं वृद्ध अवस्था के

बस चौथापन आने लगता है।2।

दाँतों में हो जाती अनबन

जबड़ा हिल जाने लगता है,

दुनियावी रंग फीके पड़ते

बस प्रभु याद आने लगता है। 

यह संकेत हैं वृद्ध अवस्था के

बस चौथापन आने लगता है।3।

सम्बन्ध दीखते कुछ बेदम

तब मन अकुलाने लगता है,

धन बल से ना तेवर मिलते

तन यह बतलाने लगता है।  

यह संकेत हैं वृद्ध अवस्था के

बस चौथापन आने लगता है।4।

जीवन का अनुभव नव रंग बन

तन और मन पर छाने लगता है

दर्द निवारक घर में बढ़ जाते

औषधि क्रम बढ़ने लगता है।    

यह संकेत हैं वृद्ध अवस्था के

बस चौथापन आने लगता है ।5। 

शैशव बचपन कैशौर्य बुढ़ापा

क्रम समझ में आने लगता है,

हम कितने किरदार बदलते

निज तन बतलाने लगता है।      

यह संकेत हैं वृद्ध अवस्था के

बस चौथापन आने लगता है ।6।

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काव्य

बस यह हमको गम है।

September 27, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आह,पानी बरस रहा है

आँखें भी आज नम हैं

हमने है, तुम्हें पुकारा ,

बोलो, ये कैसा गम है ।

हवाएं भी पुरसर्द सी हैं,

यादों में भी खूब दम है,

क्यों कर लिया किनारा,

दुःख मेरा तुमसे कम है।

यादों का है बवण्डर

हर सिम्त तम ही तम है,

टूटा है तारा सुन्दर

हम पर तो बस सितम है।

वो चेहरा घूमता है

यादें हुई न कम है

कैसे करूँ किनारा

इतनी न मुझमें दम है।

सोने की कोशिशें हैं 

आँखों से नींद गुम है

तुमने नहीं पुकारा

खाता हमें ये गम है।

दुनियाँ बदल रहा है

या सिर्फ मेरा भ्रम है

ना मिल सका किनारा

बस यह हमको गम है ।

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काव्य

पितृ पक्ष (Pitra Paksha)

September 15, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पितृ पक्ष, सद्भाव ठहरे हैं,

स्मृति मनस भाव गहरे हैं।

श्रद्धा के  कितने चेहरे हैं,

उनमें से कुछ हमें घेरे हैं,

पितृ पक्ष श्रद्धा का घर है,

बाकी सब इनके फेरे हैं।

पितृ पक्ष, सद्भाव ठहरे हैं,

स्मृति मनस भाव गहरे हैं।।  

लोक में पहरे पर पहरे हैं,

श्रद्धा भाव शान्त ठहरे हैं,

भारत को श्रद्धा का वर है,

दिव्य पुरुष हमको घेरे हैं।

पितृ पक्ष, सद्भाव ठहरे हैं,

स्मृति मनस भाव गहरे हैं।।  

 तर्पित जल, पितृ ठहरे हैं,

आस्था के मनस पहरे हैं,

श्रद्धा से मानस पूर्णतर है,

संरक्षाहित प्रबुध्द ठहरे हैं।

पितृ पक्ष, सद्भाव ठहरे हैं,

स्मृति मनस भाव गहरे हैं।।  

आनन्द मय मन लहरें हैं,

कर्म काण्डों हेतु पहरे हैं,

मानसपूजा सर्व श्रेष्टतर है,

सामाजिक संघात गहरे हैं।

पितृ पक्ष, सद्भाव ठहरे हैं,

स्मृति मनस भाव गहरे हैं ।।  

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काव्य

अब यमराज विविध रूप में आते हैं।

September 8, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

अब यमराज विविध रूप में आते हैं,

नएनए रूप रंग महफ़िल में भाते हैं,

वैधानिक चेतावनी हँसी में उड़ाते हैं,

सामान वे मौत का किश्तों में लाते हैं।1

कभी जड़ कभी चेतन रूप में आते हैं,

ये दोनों ही, सक्रिय भूमिका निभाते हैं,

इन्हें लेने में प्रबुद्धजन भी न लजाते हैं,

गलत के समर्थन में नए बहाने लाते हैं।2

खाद्य व अखाद्य के, भ्रमजाल में आते हैं,

घातक खा अन्ततः अस्पताल में जाते हैं,

ये विविध – रोग नई पीढ़ी में लगाते हैं,

ये समस्त अन्ततः रागिनी रोग गाते हैं ।3

विरुद आहार भी ना समझ में आते हैं,

बिना सोचे समझे ये सब पेट में जाते हैं,

अतिथि को भी यही भोग हम लगाते हैं,

साथ साथ अतिथि देवो भव भी गाते हैं ।4

कथनी – करनी अन्तर नजर में आते हैं,

फलतः नज़रें अपनी रसातल में पाते हैं,

एवम भारतीय मूल्यों को हम गिराते हैं,

धूम्रपान जनहित में हम समझ न पाते हैं।5

सुरा को निगल हम मति भ्रम में आते हैं,

मति भ्रम से विविध पाप कर्म में जाते हैं,

विविध त्रास ,रोगों को हम गले लगाते हैं,

कौन, किसको पी गया समझ न पाते हैं ।6

अब यमराज विविध रूपों में आते हैं

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काव्य

गरीबी एक घुन ही है।Garibi Ek Ghun Hi Hai.

July 19, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

गरीबी एक घुन ही है

विरहा राग सुनाती है

सब टूटे हैं इसमें सपने

सोच में आग लगाती है ।

मेहनत मूल्य खुशहाली है

बात समझ नहीं आती है ।1।

ये सामजिक घुन ही है

इससे बदहाली आती है

शोषक को खून दिया तुमने

जीवित चिता जलाती है।

मेहनत मूल्य खुशहाली है

बात समझ नहीं आती है ।2।

बेहोशी का चिन्ह ही है

दरिद्री भाव  जगाती है

निज शक्ति न पहचाने

ये तुम्हें बाँटती जाती है ।

मेहनत मूल्य खुशहाली है

बात समझ नहीं आती है ।3।

श्रम का भाग्य ऋण ही है

हर पीढ़ी को खा जाती है

नवपीढ़ी कैसे समृद्ध बने

यह नीति ऋणी बनाती है ।

मेहनत मूल्य खुशहाली है

बात समझ नहीं आती है ।4।

कर्मवीरों का खून ही है

डकार नहीं आ पाती है

भाग्य छीन खाया किसने

ये पोल नहीं खुल पाती है।

मेहनत मूल्य खुशहाली है

बात समझ नहीं आती है ।5।

देश को अभिशाप ही है

नैतिकता भुलाई जाती है

सबके सपने छीने जिसने

लक्ष्मी उसके घर आती है।

मेहनत मूल्य खुशहाली है

बात समझ नहीं आती है ।6।

गरीबी एक घुन ही है……

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काव्य

अब नागपञ्चमी आई है …..

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

अब नागपञ्चमी आई है

नागों को दूध पिलाते हैं

शब्दों पर ही मत जाओ

भावों का राग सुनाते हैं ।।

ये सावन की अंगड़ाई है

शिव का साज सजाते हैं

बेबात मत बाहर जाओ

मानस के भाव जगाते हैं ।।    

बारिश की बूँदें आईं हैं

घनी घटा को बुलाते हैं 

इन बूँदों पर मत जाओ

घनघोर बारिश लाते हैं ।। 

बहना की राखी आई है

भावों में भीग के गाते हैं

कीमत पर यूँ मत जाओ

ये पावन भाव जगाते हैं।।

पावस पर्व ऋतु आई है

सब ही तो इन्हें मनाते हैं

अरे कहीं पर मत जाओ

हर वर्ष तो आते जाते हैं।।

ये साल कोरोना लाई है

आऐं इसको निपटाते हैं

चीनी शै पर मत जाओ

ये त्रासद गीत सुनाते हैं।।    

अब नागपञ्चमी आई है

नागों को दूध पिलाते हैं….

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काव्य

मैं अज्ञ हूँ ……. / Main Agy Hoon.

July 7, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मैं अज्ञ हूँ, तुम विज्ञ हो,

अल्पज्ञ मैं,  सर्वज्ञ तुम। 

मैं अंश हूँ, तुम पूर्ण हो,

मैं बूँद हूँ सागर हो तुम ।1।

मैं अनाथ हूँ तुम नाथ हो

मैं दीन, दीना नाथ तुम।

मैं कृति,  तुम उद्गार हो,

मैं आत्म हूँ परमात्म तुम ।2।

मैं क्षेत्र, तुम क्षेत्रज्ञ हो,

मैं गीत हूँ गायक हो तुम,

मैं पथिक तुम प्रकाश हो,

मैं शिल्प हूँ शिल्पी हो तुम ।3।

मैं गात हूँ, तुम चेतना,

मैं दीप हूँ ज्वाला हो तुम।

मैं रुण्ड हूँ तुम मुण्ड हो,

मैं अर्थी हूँ सारथी हो तुम।4।

मैं अज्ञ हूँ तुम विज्ञ हो,

अल्पज्ञ मैं, सर्वज्ञ तुम।।…….   

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काव्य

पितृ प्रेम का सारा परिचय……………

June 21, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पितृ प्रेम का सारा परिचय एक दिवस से जुड़ आया।

उसी दिवस के कुछ लम्हों  में, पिता उन्हें याद आया ।

वही पिता जिसने सर्वस्व जीवन का हरपल बिखराया।

वक़्त ने निज चाल बदल ली बदला बदला क्षण आया ।।

पितृ और मातृशक्ति ने मिलजुल करके नीड़ बनाया।

उसी नीड़ की छाया में तन मन टुकड़ों को सरसाया।

इक दूजे का हाथ थाम दृढ़ता व प्रेम का पाठ पढ़ाया।

नईनवेली शिक्षा ने दोनों हित अलग से दिवस बनाया।।

ऐसा लगता रात्रि बिन दिन का अस्तित्व उभर आया।

धूप का शुभअस्तित्व बना तभी तो प्रिय लगती छाया।

बच्चों ने अपने हृदयों  में, जिनको न कभी अलग पाया।

उन्हें अलगथलग करने का कुचक्र नया चलता पाया ।।

ये सब खेल बाज़ारों का है बहुत देर में समझ आया।

कार्ड,उपहार,कृत्रिम साधन हैं हमने तोअमूल्य पाया।

एक दिवस में ना सिमटेगा भारतीय मन ने समझाया।

मातृ पितृ ऋण चुक जाए जीवन इस हित छोटा पाया।। 

जीवन में जो पढ़े आज तक उससे यही समझ आया।

कृतज्ञता भाव महिमा अपार, हमसे कुछ ना हो पाया।

ईश्वर ने मातृ पितृ रूप में दे दी ‘ नाथ ‘ अद्भुत छाया।

यह जीवन है उन्हें निछावर जिसने ये अस्तित्व दिलाया।।

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