हर
समाज के अपने नियम होते हैं मर्यादाएं होती हैं परम्पराएं होती हैं। वर्तमान
परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि प्रत्येक समाज परिवर्तन व विकास को परिलक्षित
कर रहा है। आज सामाजिक परिवर्तन करने वाले बहुत से साधन दीख पड़ते हैं उनमें से
शिक्षा परिवर्तन का सशक्त साधन है। डॉ०राधा कृष्णन महोदय कहते हैं :-
“शिक्षा परिवर्तन का साधन है। जो कार्य
साधारण समाजों में परिवार,धर्म
और सामाजिक एवम् राजनीतिक संस्थाओं द्वारा किया जाता था, वह आज शिक्षा संस्थाओं द्वारा किया जाता है।”
मूलतः
आज शिक्षा का एक महत्वपूर्ण कार्य सामाजिक परिवर्तन हो चला है।
सामाजिक
परिवर्तन [Social
Change] –
परिवर्तन
प्रकृति का नियम है और सभी परिक्षेत्रों में परिवर्तन दिखाई पड़ रहे हैं इस क्रम
में समाज में परिवर्तन भी स्वाभाविक है हाँ परिवर्तन कहीं और किसी समय तीव्र या
मन्द देखे जा सकते हैं। गिलिन एवम् गिलिन महोदय कहते हैं –
“We
may define social change as variation from the accepted modes of life.”
“सामाजिक परिवर्तन को हम जीवन की स्वीकृत
विधियों में होने वाले परिवर्तन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।”
एम
० डी ० जेन्सन (M.D.
Jensan ) महोदय
का कहना है –
“Social
change may be defined as modification in the ways of doing and thinking of
people.”
“सामाजिक परिवर्तन को व्यक्तियों की क्रियाओं और
विचारों में होने वाले परिवर्तनों के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है।”
गिन्सबर्ग
(Ginsberg) महोदय का मानना है कि –
“By
social change, I understand a change in social structure,e.g, the size of
society, the composition or balance of its parts or the types of its
organization.”
“सामाजिक परिवर्तन से हमारा तात्पर्य सामाजिक
ढाँचे में परिवर्तन होना है, अर्थात समाज के आकार इसके विभिन्न अंगों के बीच सन्तुलन अथवा समाज के
संगठन में होने वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन है।”
उक्त
के आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक संरचना,सामाजिक
सम्बन्धों,सामाजिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और विविध समाजों में आने वाले
परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन कहा जाएगा।
सामाजिक
परिवर्तन में शिक्षा की भूमिका
(Role of
education in social change)
शिक्षा
समाज में किस तरह परिवर्तन ला सकती है इसे
हम इन बिंदुओं से अधिगमित कर सकते हैं –
1 – शाश्वत मूल्यों को संरक्षण (Preservation of eternal values)
2 – संस्कृति का हस्तान्तरण (Transmission of Culture)
3 – परिवर्तन ग्राह्यता (Change acceptability)
4 – परिवर्तनों का मूल्याँकन (Evaluation of changes)
5 – सामाजिक बुराइयों के अन्त में सहायक
(Helpful in ending social evils)
6 – ज्ञान के नए परिक्षेत्रों का विकास (Development of new domains of
knowledge)
7 – मानव और समाज के सम्बन्धों को बनाये रखना (Maintaining human and society
relations)
8 – सामाजिक परिवर्तनों का नेतृत्व (Leader ship of social change)
9 – सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा (Education for social change)
10 – सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)
इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षा
सामाजिक परिवर्तन की सशक्त वाहक है तथा मैकाइवर महोदय का यह मानना यथार्थ है कि –
“….our
direct concern as sociologists is with social relationships. It is the change
in these which alone we shall regard as social change.”
“समाजशास्त्री के रूप में हमारा प्रत्यक्ष
सम्बन्ध केवल सामाजिक सम्बन्धों से होता है। इस दृष्टिकोण से केवल सामाजिक
सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तनों को ही हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।”
उक्त
समस्त बिन्दु सामाजिक बदलाव का सशक्त संकेत देते हैं शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में
उचित कहा गया कि –
“Education
can be used as a powerful instrument of social, economic and political
change.”
“शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिवर्तन के शक्तिशाली साधन के रूप में प्रयोग किया जा
सकता है।”
साथियो, हम सब मानव हैं और मानवीय गुणों व मानवीय
कमजोरियों से युक्त रहते हैं हमारा अपना मस्तिष्क हमारी सोच ,हमारे विचारों का उद्गम स्थल है जो बहुत सारी
बाहरी शक्तियों से प्रभावित होता है और इसी क्रम में हमारा परिचय अपनी कमजोरियों
से होता है जो हमारी प्रगति यात्रा का
सबसे बड़ा अवरोधक है आज की प्रस्तुति का मंतव्य ही यह है कि हम अपनी कमजोरियों को
ताक़त में कैसे बदलें ?
कमजोरी है क्या ?-
What is weakness?
यह हमारी विचार प्रक्रिया का वह उत्पादन है जो हमारे मस्तिष्क ने
हमें दिया है। मस्तिष्क जब किसी कार्य, विचार
या कटु अनुभव के आधार पर पलायनवादी दृष्टिकोण अपनाने को विवश करता है वही हमारा
कमजोर
बिन्दु है और हमारे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दुश्मन। कोई भी कमजोरी तब
तक कमजोरी है जब तक उसके सशक्तीकरण के प्रयास न किये जाएँ।
एक कमजोर रस्सी कुछ और रेशों के सहयोग से मजबूत हो सकती है इसी तरह
कमजोरी सशक्त विचारों से दृढ़ इच्छा शक्ति का रूप धारणकर सबसे सशक्त पहलू का रूप
धारण कर सकता है आपने देखा होगा भौंरा
विज्ञान के नियमों को धता बता अपने कमजोर पँखों से बखूबी उड़ता है।
कमजोरी को ताक़त में बदलने के आठ उपाय
Eight steps to turn weakness into strength –
इससे पहले की उन आठ अद्भुत उपायों से आपका परिचय कराऊँ। उनके
सुदृढ़ीकरण हेतु मजबूत आधार बनाना आवश्यक होगा। इसीक्रम में आप सभी दिव्य चेतन
आत्माओं से यह कहना प्रासंगिक होगा। कि जो कुछ हमारे अवचेतन मन से जुड़ जाता है वह
फलीभूत होता है इसीलिए यह तथ्य कि ‘मैं अपनी कमजोरी को ताक़त में बदल सकता हूँ’
गहनता से दोहराएं और इसे चेतना की गहराई तक
समाने दें।
यह कमजोरी वास्तव में एक चुनौती पूर्ण अवसर है जिसे पहचानने का अवसर
हमें मिला है और इसी लिए कमजोरी का ताक़त में बदलना निश्चित है इसे अवश्यम्भावी
बनाने वाले आठ कदम इस प्रकार हैं –
1 – कमजोरी
का क्षेत्र पहचानें। (Recognize the region of weakness)
2 – सकारात्मक
सोच। (Positive Approach)-
3 – डर
का मुकाबला करें। (Face your fears)
4 – सभी
विमाओं का गहन चिन्तन (Deep thinking about all dimensions)
5 – सकारात्मक
व्यक्तित्वों का साथ (Associate
with positive personalities)
6 – एक
एक कर कमजोरी का निवारण करें। (Tackle a weakness at a time)
7 – विश्वास
सुदृढ़ीकरण (Strengthening
belief system)-
8 – स्व
व्यक्तित्वानुसार सशक्तीकरण (Empowerment through self personalities)
जिन्हें
शिक्षा के उद्देश्य कहा जाता है वास्तव में वे सम्पूर्ण मानवता के उद्देश्य होते
हैं और शिक्षा वह साधन है जिससे यह उद्देश्य प्राप्त किए जाते हैं।लेकिन बलचाल में
हम शिक्षा के उद्देश्य का प्रयोग करते हैं और ये इतने आवश्यक हैं कि बी ० डी ०
भाटिया जी को कहना पड़ा कि :-
“Without
the knowledge of aims, the educator is like a sailor who does not know the goal
or his determination, and the child is like a rudderless vessel which will be
drifted along somewhere ashore.”
“उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस
नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मन्जिल को नहीं जानता है और बालक उस पतवार
विहीन नौका के सामान है जो लहरों के थपेड़े खाकर किसी भी किनारे जा लगेगी।”’
प्रजातन्त्रीय देश भारत के उत्थान हेतु यह परम आवश्यक होगा कि वह लोकतन्त्र की मर्यादा के अनुरूप सम्पूर्ण देश की शिक्षा हेतु उद्देश्यों का निर्धारण करे और इस उद्देश्य निर्धारण में निम्न बिन्दु महती भूमिका का निर्वहन करेंगे। सुविधा की दृष्टिकोण से इन्हें तीन भागों में विभक्त किया गया है।
[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य
[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य
[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य
[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक
उद्देश्य
एक ऐसा महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्त्व जो राजनैतिक गलियारों की सुर्ख़ियों
में आने और जेल यात्राओं के बाद भी अपने आप को आध्यात्मिक चिन्तन से विलग न कर
सका। एक विशुद्ध दार्शनिक जो महान चिन्तक, विश्लेषक, योगाचार्य सभी की विशिष्ट भूमिका में जीवन
पर्यन्त दिखाई पड़ा। इसीलिए पी ० टी ० राजू कहते हैं –
“Of all Indian Philosophers Shri Aurobindo is the
only who is known both as yogi and philosopher…….. .Hi is much respected in India and regarded
as one of her greatest sons.”
“भारत के सभी दार्शनिकों मेंश्री अरविन्द ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो एक
योगी और एक दार्शनिक दोनों रूपों में प्रसिद्द हैं। वे भारत में बहुत ही सम्मानित
और उसके महानतम पुत्रों में से एक माने जाते हैं।”
श्री अरविन्द का
दार्शनिक चिन्तन
PHILOSOPHICAL
THOUGHT OF SHRI AUROBINDO
श्री अरविन्द आधुनिक युग में ऋषि परम्परा के
वे साधक हैं जो महान चिन्तक, विश्लेषक, क्रान्तिकारी, पत्रकार। शिक्षा
सुधारक सभी के गुणों को वहन करते हुए मूल रूप से गीता का विशेष आलाम्बिक बल रखते
थे ये मानव और दिव्य शक्ति के संयोग को दिव्यानुभूति कराने वाला योग मानते हैं ये
सम्पूर्ण मानव जाति सर्वांगीण सर्वोत्थान की और ले जाने का प्रयास है। इसीलिये
इनकी विचारधारा को सर्वांग योग दर्शन भी कहा जाता है इस दर्शन के अधिगमन हेतु
विभिन्न मीमांसाओं का अध्ययन समीचीन होगा।
तत्त्व मीमांसा –
ये सृष्टि का कर्त्ता ईश्वर को स्वीकार करते
हैं और जगत के निर्माण हेतु विभिन्न विकास सोपानों की बात करते हैं। ये आरोहण और
अवरोहण विकास की दो दिशाएँ बताते हैं।इस प्रक्रम को अधिगमन हेतु इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है –
इनके अनुसार ज्ञान और अज्ञान में परस्पर
विरोध नहीं है बल्कि अज्ञान का स्वाभाविक गन्तव्य ज्ञान है ये भौतिक और आध्यात्मिक
तत्त्वों में अभेद को जानना ही सच्चे ज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं व इसे
द्रव्य ज्ञान और तत्त्व ज्ञान नामक दो विभागों में बाँटते हैं द्रव्य ज्ञान से आशय
जगत ज्ञान अर्थात साधारण ज्ञान से है जबकि आत्म ज्ञान को ये उच्च ज्ञान के रूप में
स्वीकारते हैं आत्म ज्ञान अन्तःकरण द्वारा होता है इनका तर्क है कि इसकी प्राप्ति
का महत्त्वपूर्ण साधन योग की क्रियाएं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि हैं।
मूल्य एवम् आचार
मीमाँसा –
इनके योग दर्शन की मूल्य व आचार मीमांसा को
समझने के लिए महर्षि अरविन्द के आरोहण क्रम का अध्ययन परम आवश्यक है इनके आरोहण
सोपान हैं – – द्रव्य → प्राण →मानस→ अतिमानस→ आनन्द→ चित्त→ सत। इसमें द्रव्य, प्राण, मानस के स्तर को तो
मानव जन्म के समय पार कर चुका होता है जन्म के पश्चात अति मानस की स्थिति को
प्राप्त कर उसका ध्येय अर्थात अंतिम उद्देश्य आनन्द+ चित्त+ सत की प्राप्ति होता
है। सत चित्त आनन्द की प्राप्ति का साधन गीता का कर्म योग व ध्यान योग है और इसके
लिए यह परम आवश्यक है कि मन विकार रहित हो, शरीर स्वस्थ व जीवन
संयमी हो और इस उद्देश्य की प्राप्ति का साधन योग की क्रियाएं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि हैं।
जीवन दर्शन (Philosophy of
life) –
1 – मानव, सर्वोत्तम योनि
2 – ब्रह्म -सर्वशक्तिमान
और निरपेक्ष
3 – सच्चा ज्ञान भौतिक और
आध्यात्मिक तत्वों के अभेद को जानना।
4 – ज्ञान के दो रूप –
द्रव्य ज्ञान और आत्म ज्ञान
5 – कर्म योग व ध्यान योग
सत चित्त आनन्द की प्राप्ति का साधन
6 – जीवन का अन्तिम
उद्देश्य सत चित्त आनन्द की प्राप्ति।
7 – पुनर्जन्म सम्बन्धी
धारणा
वे लिखते हैं -“यदि किसी सचेतन व्यक्तित्व का विकास होता है तो
पुनर्जन्म होना आवश्यक है। पुनर्जन्म एक युक्ति संगत आवश्यकता है और एक आध्यात्मिक
तथ्य है जिसका हम अनुभव कर सकते हैं।”
शिक्षा दर्शन के
आधारभूत सिद्धान्त (fundamentals of Educational philosophy
) –
श्री अरविन्द का कहना है –
“That
alone would be true and living education which helps to bring out to full
advantage all that is in an individual man.”
“सच्ची और वास्तविक
शिक्षा वही है जो मानव की अन्तर्निहित समस्त शक्तियों को इस प्रकार विकसित करती
हैं कि वह उनसे पूर्ण रूप से लाभान्वित होता है।”
उक्त स्थिति को प्राप्त तभी किया जा सकता है
जब इनके शिक्षा दर्शन को पूर्ण आयाम मिले जिसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं –
01 – बालक शिक्षा का केन्द्र
02 – मातृ भाषा, शिक्षा का माध्यम
03 – ब्रह्मचर्य शिक्षा का आधार
04 – अन्तर्निहित समस्त शक्तियों का व्यावहारिक
विकास
05 – पूर्ण मानव बनाने का साधन शिक्षा
06 – सुरुचि पूर्णता
07 – धर्म को यथोचित स्थान
08 – चेतना का सम्यक विकास
09 – ज्ञानेन्द्रियों का यथाशक्ति प्रशिक्षण
10 – सुषुप्त शक्तियों का विकास
11 – मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों से अनुकूलन
12 – मित्र व पथ प्रदर्शक हो शिक्षा
श्री अरविंद का
शैक्षिक चिन्तन (Educational thought of Shri
Aurobindo) –
ये शिक्षा के द्वारा मानव का सच्चा उत्कर्ष
चाहते थे इन्होने कहा –
“Education
to be true must not be a machine made fabric, but a true building or living
evocation of the powers of the mind and spirit of human being.”
“सच्ची शिक्षा को मशीन
से बना सूत नहीं होना चाहिए, अपितु इसको मानव के
मस्तिष्क तथा आत्मा की शक्तियों का निर्माण अथवा जीवित उत्कर्ष करना चाहिए।”
श्री अरविन्द ने दार्शनिक के रूप में इतना
श्लाघनीय कार्य किया है कि जहाँ इतिहास के पृष्ठ उन्हें समेटने को आकुल दिखे वहीं
आने वाले युग ने उनके विचारों में अपने लिए पथ की तलाश की। ये राष्ट्र के समग्र
उत्थान हेतु नवीन शिक्षा से युक्त करना चाहते थे इसीलिये इन्होंने अपनी दो
पुस्तकों नेशनल सिस्टम ऑफ़ एजुकेशन (National System Of Education)और ऑफ़ एजुकेशन (Of Education)) के माध्यम से एक राष्ट्रीय योजना प्रस्तुत
की। उक्त को आधार बनाकर
उनके शिक्षा सम्बन्धी विचारों को यहाँ दिया गया है :-
शिक्षा का सम्प्रत्यय
[Concept Of Education]-
महर्षि अरविन्द के अनुसार –
“सूचनाओं का संग्रह
मात्र शिक्षा नहीं है। सूचनाएं ज्ञान की नींव नहीं हो सकती। वे अधिक से अधिक वह
सामग्री हो सकती हैं जिसके द्वारा जानने वाला अपने ज्ञान की वृद्धि कर सकता है
अथवा वे वह बिन्दु हैं, जहां से ज्ञान को
आरम्भ किया जाए या नई खोजों को निकालना प्रारम्भ किया जाए। वह शिक्षा जो अपने आप
को ज्ञान देने तक सीमित रखती है शिक्षा नहीं है।”
इनका दृढ़ विश्वास था कि मनुष्य द्रव्य और
प्राण की अवस्था पार कर मानस की स्थिति में होता है जन्म के बाद उसे क्रमशः अति
मानस ,आनन्द ,चित् , सत् की स्थिति को
प्राप्त करना होता है अतः शिक्षा ऐसी हो जो मानव का आध्यात्मिक, भौतिक, प्राणिक, मानसिक विकास करे इस
प्रकार की शिक्षा को सम्पूर्ण शिक्षा (Integral Education ) के रूप में इन्होने
स्वीकार किया। श्री अरविन्द के अनुसार –
“Education
is the building of the power of the human mind and spirit. It is the evoking of
knowledge, character and culture.”
“शिक्षा मानव के
मष्तिस्क और आत्मा की शक्तियों का निर्माण करती है और उसमें ज्ञान, चरित्र और संस्कृति को
जागृत करती है। ”
शिक्षा के उद्देश्य (Aim
of Education) –
1 – भौतिक या व्यावसायिक
विकास
2 – प्राणिक उत्थान
3 – मानसिक उत्कृष्टता
4 – अन्तः करण का विकास
5 – सत् चित्त आनन्द की
प्राप्ति
पाठ्यक्रम (Syllabus)–
यदि ध्यान से देखा जाए तो पाठ्यक्रम शिक्षा
के उद्देश्यों पर आलम्बित होता है यहां भी शिक्षा उन उद्देश्यों की प्राप्ति का
साधन भर है और इसी वजह से इनके पाठ्यक्रम को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है।
भौतिक उत्थान हेतु
विषय – मातृ भाषा, राष्ट्र भाषा व उत्थान
हेतु आवश्यक अन्य अन्तर्राष्ट्रीय भाषाएँ। भूगोल,इतिहास,अर्थशास्त्र,समाज शास्त्र विज्ञान, गणित,स्वास्थय विज्ञान,भूगर्भ विज्ञान,कृषि,वाणिज्य,कला और मनोविज्ञान
आदि।
शारीरिक क्रियाएं – व्यायाम, खेलकूद, योगासन, शिल्प व अन्य
श्रमसाध्य कार्य।
आध्यात्मिक विषय – वेद, उपनिषद,नीति शास्त्र, गीता, धर्म शास्त्र ,विभिन्न देशों का धर्म
व दर्शन।
आध्यात्मिक क्रियाएं – भजन, कीर्तन, प्राणायाम आदि।
शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods)–
ये प्राचीन विधियों को नवीन रूप देना चाहते
थे और चाहते थे कि रटाने की प्रवृत्ति से बचा जाए। इनकी क्रियाओं व शिक्षण विधियों
को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।
1 – रूचि आधारित
2 – प्रेम, सहानुभूति आधारित
3 – स्वातंत्रय अनुभूति
आधारित
4 – स्वप्रयत्न विधि,स्व अनुभव विधि
5 – स्वनिरीक्षण विधि
6 – क्रिया आधारित शिक्षण
विधि
7 – मौखिक विधि
इसके अतिरिक्त ये उपदेश,प्रवचन,तर्क ,तुलना,अभिव्यक्ति,विवेचना,व्याख्यान,व स्वाध्याय विधियों
को भी उचित सम्मान देते हैं।
शिक्षक (Teacher) –
ये शिक्षक को रटाने वाली मशीन नहीं बनाना चाहते बल्कि
उसे निर्देशक,पथ प्रदर्शक,सहायक,के रूप में देखना
चाहते हैं और चाहते हैं कि वह अभिरुचि आधारित संकलन के प्रस्तुतीकरण कर्ता के रूप
में कार्य सम्पादित करे। वह प्रकृति के अनुरूप चलाने हेतु अभिप्रेरक की भूमिका का
निर्वहन करे। उन्होंने कहाकि –
“The
teacher is not an instructor or task master, he is helper and guide this
business is to suggest and not to impose. He does not actually train the pupils
mind, he only shows him how to perfect his instruments of knowledge and helps
him and encourages him in the process.”
“अध्यापक निर्देशक या
स्वामी नहीं है। वह सहायक और पथ प्रदर्शक है। उसका कार्य सुझाव देना है, न कि ज्ञान को लादना।
वह वास्तव में छात्र के मष्तिस्क को प्रशिक्षित नहीं करता है। वह छात्र को केवल यह
बताता है कि वह अपने ज्ञान के साधनों को किस प्रकार समृद्ध बनाए। वह छात्र को सीखने
की प्रक्रिया में सहायता और प्रेरणा देता है।”
विद्यार्थी (Student)
–
इनकी शिक्षा बाल केन्द्रित शिक्षा है और
इसीलिये ये चाहते हैं की बालक की विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर उसके विकास के
सोपान बहुत सोच समझ कर विकसित किये जाने चाहिए। इन्होने कहा :-
“The
idea of hammering the child into shape desired by the parent or teacher is a
barbarous and ignorant supersituation, there can be no great error than for the
parent to arrenge before hand that his son shall develop particular qualities
and capacities.”
“बालक को मातापिता अथवा
शिक्षक की इच्छानुकूल ढालना अंधविश्वास और जंगलीपन है। मातापिता इससे बड़ी भूल और कोइ नहीं कर सकते कि
वे पहले से ही इस बात की व्यवस्था करें कि उनके पुत्र में विशिष्ट गुणों, क्षमताओं तथा विचारों
का विकास होगा।”
विद्यालय (The
School) –
ये प्राचीन ऋषियों द्वारा संचालित आश्रम
पद्धतियों के साथ आधुनिक परिस्थतियों का भी पूर्ण ध्यान रखना चाहते हैं और
विद्यालयों में मनसा,वाचा,कर्मणा,पर अधिक ध्यान देना
चाहते हैं और नहीं चाहते कि रंग, रूप, देश, जाति, धर्म के आधार पर कोइ
भेद भाव हो। ये विश्व बन्धुत्व के
विकास का वातावरण विद्यालयों में चाहते हैं।
अनुशासन (Discipline
) –
इनके अनुसार शिक्षा और अनुशासन में अनुलोम
सम्बन्ध है ये चाहते हैं की विद्यालय ब्रह्मचर्य का अनुपालन सुनिश्चित करने साथ
मुक्तिवादी अनुपालन सिद्धान्त का अनुकरण करें और बच्चों में स्वतंत्र रूप सर आदर्श
स्वीकारोक्ति का गुण विकसित करेंऔर स्व अनुशासन की भावना बलवती करें।
शिक्षा के अन्य पक्षों
के सम्बद्ध में विचार (Views of other Aspects of Education)-
1 – राष्ट्रीय शिक्षा
सम्बन्धी विचार (Views about National Education)
2 – धार्मिक व नैतिक
शिक्षा (Religious and Moral Education)
3 – अन्तर्राष्ट्रीयता की
शिक्षा (Education of internationalism)
4 – नारी शिक्षा (Women
Education)
5 – धर्म सम्बन्धी विचार (Views
about religion)-
श्री अरविन्द के अनुसार :-
“हम भारतवासी आर्य जाति
के वंशधर हैं, आर्य शिक्षा और आर्य
नीति के अधिकारी हैं। यह आर्य भाव ही हमारा कुलधर्म और ज्योति धर्म है। ज्ञान, भक्तिऔर निष्काम कर्म आर्य
शिक्षा के मूल तत्व हैं तथा ज्ञान, उदारता, प्रेम, साहस, शक्ति, विनय आर्य चरित्र के
लक्षण हैं।”
शिक्षा दर्शन का मूल्याङ्कन
(Evaluation of Philosophy of Education) –
इनकी विदेशी शिक्षा पद्धति से मुक्ति की
छटपटाहट और भारतीय समाज के कल्याण की भावना स्पष्ट परिलक्षित होती है। ऐसा लगता है
गुरु शिष्य परम्परा से कालान्तर में इस पर प्रभावी कार्य नहीं हो सका और शिक्षा पर
जो इनका प्रभाव परिलक्षित होना चाहिए था नहीं हो सका जबकि इन्होने शिक्षा के विविध
पहलुओं को समयानुकूल बनाने का प्रयास किया।
श्री कंगाली चरणपति के भाव द्रष्टव्य हैं :-
“श्री अरविन्द का
शिक्षा दर्शन मूलतः उनके आध्यात्मिक योग दर्शन पर आधारित है। श्री अरविन्द ने अपनी
दिव्य दृष्टि की शक्ति से मानव जीवन के जिन गंभीर तत्वों का उदघाटन किया है, वे ही उनके शिक्षा
दर्शन की आधारशिला हैं। इसमें हमें समग्र मानव जीवन व समग्र संसारके सर्वांगीण रूप
का आभास मिल जाता है। श्री अरविन्द ने जीवन और संसार के किसी पहलू को त्यागा नहीं
है।”
शिक्षक स्वायत्तता का सीधा सादा अर्थ है शिक्षक को उसके निमित्त
कार्यों में स्वतन्त्रता। शिक्षक के दायित्व बदलते समय के साथ सामाजिक मांगों के
अनुरूप परिवर्तित होते रहते हैं और सारी समस्याओं के निदानीकरण हेतु शिक्षा की और
देखा जाता है जिसका निर्वहन शिक्षक को करना होता है शिक्षक को स्वतंत्र चिंतन के
साथ स्वायत्त रूप से कार्य करने की आवश्यकता यहीं से पारिलक्षित होने लगती है।
शिक्षक स्वायत्तता वस्तुतः अधिगम को प्रभावी व व्यावहारिक बनाने के लिए
विषयवस्तु की आवश्यकतानुरूप शिक्षक द्वारा बिना किसी बाहरी दवाब से प्रभावित
हुए कार्य को परिणति तक पहुँचाने से है।
यह कोई ऐसी निश्चित सत्ता नहीं है जो कुछ लोगों
के पास होती है और कुछ के पास नहीं यह संस्थान,पाठ्यक्रम
,राज्य तन्त्र से सीधे प्रभावित होती है वैतनिक
अध्यापक निर्धारित पाठ्यवस्तु को अपनी क्षमता के अनुसार अधिगम कराने हेतु शिक्षण
विधियों व सम्प्रेषण के लिए स्वायत्त है। . संजीव बिजल्वाण महोदय ने प्रवाह मई
-अगस्त 2015 में ‘अध्यापक
स्वायत्तता ‘ नमक लेख में लिखा –
“बदलते सन्दर्भों, मायनों,व भूमिकाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण बात हे
शिक्षक और शिक्षार्थी की स्वायत्तता। सीखने और सिखाने की प्रक्रिया तभी लचीली और
सन्दर्भ व परिवेश आधारित होगी जब शिक्षक इसके लिए स्वायत्त होगा। ”
अध्यापक स्वायत्तता से आशय विविध परिसीमाओं के अन्तर्गत शैक्षिक
उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षक द्वारा स्वायत्त रूप से कार्य करने से है।
शिक्षक स्वायत्तता और विविध काल –
a – वैदिक
काल
b – बौद्ध
काल
c – मुस्लिम
काल
d – ब्रिटिश
शासन काल
e – आजाद
भारतीय कालावधि
आज का अध्यापक एक व्यवस्था (System ) का एक हिस्सा है जो राज्य द्वारा संचालित होता है और यह राजनीति से
इतना अधिक प्रभावित है की गलत तथ्यों ,गलत
इतिहास व अनावश्यक परोसने से भी नहीं चूकता। व्यवस्था है किसी हाथ में और दिखती
दूसरे हाथों में है।
शिक्षक स्वायत्तता का यथार्थ –
जब समाज व राष्ट्र के उत्थान हेतु पाठ्यक्रम निर्माण से लेकर अधिगम
तक के सम्पूर्ण कालन्तराल पर विविध विज्ञ अध्यापकों के स्वतन्त्र मौलिक विचारों की
छाप दिखाई देने लगेगी कुछ लोगों के निहित स्वार्थों से ऊपर उठ शिक्षा की सम्पूर्ण
व्यवस्था एक स्वायत्त पक्षपात पूर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठ राष्ट्रवाद के आलोक में
निर्णय लेने में सक्षम होगी। जब वास्तविक अध्यापक शिक्षा की विविध नीतियों के
निर्माण से लेकर परिणाम की प्राप्ति तक प्रभावी भूमिका बिना किसी बाहरी दवाब के
निभाएगा। वास्तविक अर्थों में शिक्षक स्वायत्तता होगी।
शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही –
आजाद भारत की सारी व्यवस्थाएं न तो शिक्षा के साथ न्याय कर पाईं और न
सम्पूर्ण अध्यापकों के साथ,
सभी राजनैतिक पार्टियां शिक्षा के दायित्व से
अपना हाथ खींचने में लगीं रहीं। परिणाम यह हुआ कि लगभग 80 %शिक्षा व्यवस्था व्यक्तिगत हाथों में पहुँचकर
व्यक्तिगत लाभ का साधन मात्र बनकर रह गयीं। अध्यापक बेचारा बन गया उसके अस्तित्व
पर संकट के बादल मंडराने लगे और सारी स्वायत्तता अपने सच्चे अर्थ खो बैठी। वर्तमान
भारत में सम्पूर्ण शिक्षा की व्यवस्था की जिम्मेदारी का निर्वहन निम्न माध्यम से
सम्पन्न होता है और इनमें स्वायत्तता व जवाबदेही की स्थिति में अन्तर स्पष्ट
द्रष्टव्य है –
1 – सरकारी
संस्थाएं
2 – गैर
सरकारी संस्थाएं
1 – सरकारी संस्थाएं –
इसमें सरकारी व अर्धसरकारी संस्थान आते हैं। माध्यमिक स्तर तक अलग
अलग राज्यों के बोर्ड व्यवस्थाओं को संभालते हैं सीधे शासन की नीतियों के अनुरूप
कार्य सम्पादित होते हैं बहुत बड़े तंत्र के रूप में इनका विकास हुआ है केन्द्रीय व
राज्य स्तर पर विभिन्न नियमों विनियमों के आधार पर कार्य सम्पादित होता है।
और अध्यापक स्वायत्तता अलग अलग नियामक सत्ताओं द्वारा कार्य करने के
कारण बाधित होती है चूंकि स्वायत्तता व सामञ्जस्य का स्तर निम्न है अतः जवाबदेही
का स्तर भी बहुत प्रभावी नहीं बन पड़ा है। इन शिक्षण संस्थाओं में बहुत अधिक
परिवर्तन की आवश्यकता है मर्यादित स्वायत्तता व प्रभावी जवाबदेही की उचित व्यवस्था
न होने के कारण ,मोटा वेतन देने के बाद भी इनके विश्व स्तरीय
बनाने में संदेह है।
उच्च शिक्षा के स्तर पर
स्थिति अत्यन्त दयनीय है इसमें प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर उनके मूल्याँकन तक में
अध्यापक भागीदारी दिखाई देती है जितने भी अतिरिक्त लाभ के कार्य हैं बखूबी निभाए
जाते हैं सिर्फ कक्षा शिक्षण के, अधिकाँश विद्यार्थी अधिकाँश जगह अनुपस्थित रहते
हैं नाम मात्र की कक्षागत क्रियाएं होती हैं। शासन के साधनों का उपयोग कम दुरूपयोग
अधिक देखने को मिलता है महाविद्यालय से लेकर विश्विविद्यालय तक आमूलचूल परिवर्तन
की दरकार है कोई ऐसा विश्वविद्यालय खोजना मुश्किल होगा जहाँ दलाल न हों। अध्यापक
स्वायत्तता, शिक्षण
वातावरण के अभाव में कुप्रभावित है जवाबदेही के अभाव का प्रभाव कार्यों पर देखा जा
सकता है नाम मात्र के लोग जिम्मेदारी से कार्य निर्वहन करते हैं व्यवस्था भ्रष्ट
आचरण से प्रभावित दिखती है।
2 – गैर सरकारी संस्थाएं –
शासन की नीतियों के कारण ये संस्थाएं सरकारी संस्थाओं की तुलना में
तीन से चार गुने विद्यार्थियों के अधिगम की व्यवस्था कर रही हैं कुछ समितियों
द्वारा भी इनका संचालन किया जा रहा है लेकिन इन पर शासन द्वारा निर्धारित संस्थाओं
का अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहता है ये स्ववित्त पोषित संस्थान,
विविध कार्यों हेतु शासन के संस्थानों के
अनुरूप कार्य करने को बाध्य होते है जिनके प्रतिनिधि हर कार्य के बदले भौतिक लाभ
लेते हैं प्रायोगिक परीक्षाओं में
शतप्रतिशत प्रथम श्रेणी इन्हीं की कृपा दृष्टि का परिणाम है।
अध्यापकों के साथ भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण के कारण न तो इन संस्थाओं
को शासन से उचित लाभ मिल पाता है और न इनके अध्यापकों को। समान कार्य के लिए असमान
वेतन प्राप्त करने के साथ अल्प वेतन भोगी अध्यापक आयाराम गयाराम की भूमिका में
अधिक देखा जाता है। इनकी पूर्ण स्वायत्तता की तो कल्पना ही व्यर्थ है हाँ अधिगम को प्रभावी बनाने के लिए ये स्वायत्त
रूप निर्णय लेते हैं और यह तुलनात्मक रूप से अधिक जवाब देह होते हैं। प्रबन्धन के
सीधे सम्पर्क में रहने के कारण ये कार्य दायित्व निर्वहन के प्रति अधिक सजग रहते
हैं।
यदि समग्र रूप से विवेचना की जाए तो यह मानना
ही होगा कि कुछ अच्छे लोगों ने ही सम्पूर्ण व्यवस्था को सही दिशा दे रखी है और ये
सब जगह हैं इनकी संख्या सीमित है और ये अपने कार्य के प्रति उत्तरदायित्व पूर्ण
दृष्टिकोण रखते हैं और जवाबदेही स्वीकार करते हैं। राष्ट्रोत्थान हेतु सीमित
शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित करना परम
आवश्यक है।
आज का मानव जानता बहुत कुछ है पर मानता बहुत कम है। सफलता हर कोइ चाहता है पर प्रयास ओछे रह जाते हैं कभी आत्म विश्वास नहीं जग पाता और कभी अति आत्मविश्वास असफलता का पर्याय बन जाता है। आखिर मानव अपने सपने, अपने मन्तव्य, अपने गन्तव्य तक क्यों नहीं पाते। कभी सारा जीवन किस एक तत्व की कमी के कारण अभिशप्त सा दीख पड़ता है। भाग्य का ताला आखिर खुलता किस चाभी से है जब आप अपने कर्म बोध को जगाकर विश्लेषण करते हैं तब पाएंगे की सफलता की कुञ्जी है आत्मविश्वास । आइए जानते हैं कि किन आठ तत्वों से आत्मविश्वास का शीर्ष स्तर छूकर जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
सक्रियजीवन
चर्या (Active Life Style) –
मानव का शरीर गुब्बारे की तरह फूलने के लिए नहीं बना है वह पसीना
बहाकर शुचिता कर्मठता का अनुगमन कर लक्ष्य प्राप्ति का साधन है हमेशा ऋगवेद पर
आधारित ऐतरेय ब्राह्मण के शब्द ‘चरैवेति
चरैवेति’ चलते रहो चलते रहो का उद्घोष कर हमेशा हमें
प्रेरणा देते हैं की तन को ,मन
को,मस्तिष्क को हमेशा सक्रिय रखना है। हमारे और
लक्ष्य के बीच का अन्तराल कम होता चला जाएगा वह महिला पुरुष का अन्तर नहीं देखता
पुरुषार्थ की सक्रियता देखता है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कठोपनिषद से
दिशाबोधक उद्घोष किया –
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” अर्थात् उठो, जागो, और
ध्येय की प्राप्ति तक मत रूको।
अतः अवश्य मानें – जीवन है, चलने
का नाम …
सद सङ्गति (Good Fellowship) -आत्म विश्वास का सूर्य तब जाग्रत स्थिति में
होता है जब उच्च ऊर्जाओं का समन्वयन होता है इसीलिये उन लोगों का साथ करें,उन लोगों को मॉडल या आदर्श के रूप में
स्वीकारें जिनके विचार आपके आत्मिक उत्थान में योग दे सकें यह मुहावरा तो आपने
अवश्य सुना होगा कि -खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। आप जैसा बनना चाहते हैं
वैसे लोगों का साथ करें।
संयमित जिद –
जी हाँ जिद जरूरी है, उत्थान के लिए, उत्कर्ष के लिए, प्रगति
के लिए इतना जिद्दी तो अपने आप को बनाना होगा कि जो ठान लिया, जो उद्देश्य बना लिया, जो लक्ष्य तय कर लिया उस उद्देश्य को उचित
साध्यों से प्राप्त करके रहूँगा और अपने कम्फर्ट जॉन का परित्याग तत्परता से
करूंगा।
याद रखें सफलता का पथ
दुरूह होता है कण्टकाकीर्ण होता है ,भयावह
दीख पड़ता है पर आत्म विश्वासी उसी पथ का पथिक होता है और अन्ततः विजिट होता है।
हमें अपनी जिद की पूर्णता हेतु सैद्धान्तिक
धरातल की जगह यथार्थ के कठोर धरातल पर संयमित होकर चलना पड़ेगा। किताबी सैद्धान्तिक
धरातल पर तैरना सीखें, सुन्दर नृत्य करें,
व्यापार में शिखर छुएं आदि सम्भव नहीं है अतः
व्यावहारिक कठोर धरातल पर पूर्ण अनुशासन से अपनी मर्यादित जिद पूर्ण करने हेतु
उतरना ही होगा। फल के परिपक्व होने में उसमें तीन परिवर्तन परिलक्षित होते हैं वह
नम्र हो जाता है , उसमें मिठास आ जाती है,
तीसरे उसका रंग बदल जाता है। आत्म विश्वास की
परिपक्वता में मानव में इसी परिवर्तन के लक्षण दीखते हैं।
आस्था –
विश्वास रखें आप सफल होंगे,जीवन की छोटी छोटी सफलताओं,
उपलब्धियों, प्रशंसा की स्मृतियों को कुरेदकर स्वस्थ धरातल
तैयार करें। यदि बचपन के डगमगाने वाले कदम दौड़ने में समर्थ हो सकते हैं तो हमारा
आस्था का अवलम्ब, विजय पथ का निर्माण अवश्यम्भावी कर सकता है
शङ्कर के उपासक हर हर महादेव, देवी के उपासक जय भवानी के उद्घोष से अन्य
मतावलम्बी अपने अपने इष्टों को याद कर जाग्रत स्थिति में आ जाते हैं। सीधे चेतना
के अनंत सागर से अविरल परवाह को निरंतरता मिलाती है ऊर्जा के अजस्र स्रोत से आस्था
हमको जोड़ती है।
संघर्षशील प्रवृत्ति –
विश्वास रखें। आप ईश्वर की अमूल्य कृति हैं। हम सभी का अस्तित्व किसी
न किसी उद्देश्य से जुड़ा है सपनों को साकार करने के लिए मानस में विचारों के अन्धड़ चलते हैं संघर्ष के विभिन्न
उपादान तय करते समय याद रखें समुद्र मन्थन से विभिन्न रत्नों की प्राप्ति हो सकती
है तो हमारा चिन्तन, मंथन,द्वन्द
संघर्षशील जुझारू प्रवृत्ति अन्ततः हमें सफल बना आत्म विश्वास में वृद्धि
सुनिश्चित करेगी। इसी दिशा में मेरी कुछ पंक्तियाँ आपको समर्पित हैं –
जीवन की धूप छाँह, नया
मार्ग देती है,
पत्थर, कण्टक,अग्नि
संताप हरलेती है,
मार्ग खोज देते हैं, उन्नति, उत्कर्ष का
संघर्षशील प्रवृत्ति अन्ततः तार देती है।
उत्तम स्वास्थय –
स्वस्थ शरीर स्वस्थ मस्तिष्क का आधार है और आत्म विश्वास का वृक्ष
उत्तम स्वास्थय रूपी जड़ों पर विकास के सोपान तय करता है जितने भी प्रभावशाली
व्यक्तित्व हैं सभी ने तमाम व्यस्तताओं के बीच स्वास्थय को संभाले रखने के क्षमता
भर प्रयास अवश्य किये हैं। भारतेन्दु हरिश चन्द्र, स्वामी विवेका नन्द,
राहुल सांकृत्यायन अपने अल्प स्वस्थ जीवन में
जो ज्योति बिखेर गए हैं वह युगों तक हमारा मार्ग दर्शन करेगी।
व्यक्तित्व सुधार –
आज गुणवत्ता प्रबन्धन के युग में व्यक्ति का व्यक्तित्व कार्य की
सफलता सशक्त पृष्ठभूमि तैयार करता है कार्य की निरन्तर सफलताएं जो तेज जो ओज पैदा
करती हैं वह सञ्चित कर्मों का योग होता है। रामधारी सिंह दिनकर जी ने कहा है –
तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाके
पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के
हीन मूल की ओर देख जग गलत करे या ठीक
वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।
खुश रहें खुश रहने दें –
यह सर्व विदित है कि जो जैसा करता है उसे वैसा फल मिलता है तो हम
सबके लिए खुशियों का आधार बनाएं इससे हम पर भी खुशियां बरसेंगी और उससे आलोकित पथ
ही तो आत्मविश्वास हेतु सर्वोत्कृष्ट पथ होगा। चेहरे पर हमेशा विजेता वाली मुस्कान
रखें आनन्द में मगन हो सकारात्मक निर्णय लें क्रोध को तिरोहित करें।हमारी खुश रहो
और रहने दो की मूल भावना आत्मविश्वास का ऐसा प्रासाद खड़ा करेगी जो चिर स्थाई
होगा।
आत्म
अभिव्यक्ति से आशय (MEANING OF SELF EXPRESSION )-
आत्म
अभिव्यक्ति एक महत्त्वपूर्ण व कम व्याख्यायित शब्द है हिन्दी भाषा में आत्म शब्द
स्व का परिचायक है और अभिव्यक्ति का आशय सरल शब्दों में प्रगटन से है। विकीपीडिया
के अनुसार : –
“अभिव्यक्ति का अर्थ विचारों के प्रकाशन से है व्यक्तित्व के समायोजन
के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अभिव्यक्ति को मुख्य साधन माना है
। इसके द्वारा मनुष्य अपने मनोभावों को प्रकाशित
करता तथा अपनी भावनाओं को रूप देता है।”
साधारण
शब्दों में कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति से आशय प्रगटन से है और स्वयम का प्रगटन
चाहे वह किसी भी माध्यम से हो,आत्म
अभिव्यक्ति कहलाता है।
आत्म
अभिव्यक्ति के प्रकार (TYPES OF SELF EXPRESSION)-
विविध
विद्वानों ने इसे विविध प्रकार से विवेचित किया है जिससे इसका स्वरुप जटिल हो गया
है लेकिन मुख्य रूप से इसके प्रकारों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है। –
1 –
शाब्दिक
(a )- लिखित
(b) – मौखिक
2 –
अशाब्दिक -समस्त कलाएं
3 –
चेतन शारीरिक भाषा
आत्म
अभिव्यक्ति को सुधारने के उपाय (Ways to improve self expression) –
आत्म
अभिव्यक्ति को सुधारने के उपायों को समझने हेतु यह आवश्यक है कि आत्म अभिव्यक्ति
को प्रभावित करने वाले कारक (TYPES OF SELF EXPRESSION) की समझ विकसित करने के साथ निम्न बिंदुओं पर
गहनता से सम्पूर्ण क्षमता भर ध्यान दिया जाए।
शारीरिक
भाषा (Body Language) में सुधार हेतु वे सभी प्रयास सम्मिलित किये
जाने चाहिए जो कौशल विकास से सम्बंधित हैं।
अशाब्दिक
अभिव्यक्ति हेतु निरन्तरता ,जिज्ञासा, धैर्य, क्षमता
सम्वर्धन की अनवरत साधना परमावश्यक है।
आत्म अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाने हेतु डॉ ०
सतीश बत्रा जी का मानना है कि सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति में निम्न का विशेष संज्ञान
लिया जाए –
1 – अधिक
2 – अनावश्यक
3 – अप्रिय
4 – अप्रासंगिक
5 – असमय
6 – असम्बन्धित
7 – अपात्र
साथ
ही बत्राजी प्रभावी अभिव्यक्ति हेतु KISSSSS पर विशेष जोर देते हैं जिसका आशय है –
K – keep
I – it
S – Simple
S – Short
S – Straight
S – Sense
full
S – Strength
of evidence
यानि
कि तथ्यों को सम्प्रेषित करने में बात को सरल संक्षिप्त सीधा सार्थक व प्रभावी
तरीके से रखा जाए।
अन्त
में अध्यापकों से मैं विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि वे यदि निम्न पर ध्यान देंगे
तो अच्छी आत्म अभिव्यक्ति कर पाएंगे –
T – Talent
E –
Evaluation before communication
A –
Apologize for mistakes
C –
Confusion Removal
H – Harmony
E –
Effectiveness
R – Realistic
Approach
वस्तुतः यह तथ्य सर्व विदित है कि जहां चाह वहाँ
राह ,यदि आप पूरे आत्म विश्वास से आत्म अभिव्यक्ति
प्रभावी बनाने का प्रयास करेंगे तो लक्ष्य की निकटता महसूस करेंगे और जल्दी आपका
सपना साकार होगा।