आज की दुनियाँ में यह देखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति अपने सामंजस्य पूर्ण व्यवहार से अधिकाँश लोगों के साथ तालमेल बैठा लेता है और कोई नहीं। जब कोई भी व्यक्ति समाज की अपेक्षाओं, विविध परिस्थितियोँ और वातावरण के साथ ताल मेल नहीं बैठा पाता तो उसे कुसमायोजित व्यक्ति कहा जाता है और इस व्यवहार को कुसमायोजन कहा जाता है। कुसमायोजन की स्थिति में सन्तुलन बिगड़ जाता है आवश्यकतानुसार व्यवहार दिखाई नहीं पड़ता।
कुसमायोजन (Maladjustment) से आशय –
कुसमायोजन (Maladjustment) एक तरह की व्यवहारिक व मानसिक स्थिति है, जिसमें प्रभावित मानव अपने वातावरण, परिस्थितियों व स्वयं के साथ प्रभावी ढंग से सामन्जस्य बैठाने में असफल रहता है। इसके सामान्यतः तनाव, अवसाद, चिन्ता, अत्याधिक क्रोध, सामाजिक अलगाव, अल्प आत्मविश्वास व हीन भावना का मानव व्यक्तित्व में प्रभाव बढ़ जाता है।
कुसमायोजन की परिभाषायें–
क्रो एवं क्रो महोदय ने इस सम्बन्ध में कहा –
“कुसमायोजन (Maladjustment) तब होता है जब व्यक्ति की आवश्यकताओं और उसकी संतुष्टि से संबंधित परिस्थितियों के बीच कोई संबंध नहीं रह जाता है।”
आंग्ल अनुवाद
“Maladjustment occurs when there is a disconnect between the individual’s needs and the circumstances that satisfy them.” -Crow and Crow
Dictionary.com के अनुसार –
“कुसमायोजन अपने परिवेश की मांगों पर सफलतापूर्वक और संतोषजनक ढंग से प्रतिक्रिया करने में असमर्थता है”।
आंग्ल अनुवाद –“Maladjustment is the inability to respond successfully and satisfactorily to the demands of one’s environment”.
मनोवैज्ञानिक शब्दकोश (Psychological Dictionary) के अनुसार:
“कुसमायोजन एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति वातावरण या जीवन की माँगों के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहता है।”
“Maladjustment is a condition in which a person fails to cope with the demands of the environment or life.”
विविध मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि –
कुसमायोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने व्यवहार को सामाजिक या व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार समायोजित नहीं कर पाता है।
उक्त विवेचन के आधार पर इस व्यावहारिक परिभाषा को स्वीकार किया जा सकता है –
यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति की आवश्यकताओं और वातावरण के बीच सामंजस्य नहीं बन पाता, और वह अजीब या संघर्षपूर्ण व्यवहार करने लगता है।
कुसमायोजन के कारण/Causes of maladjustment–
मानव के कुसमायोजित होने के पीछे बहुत से कारण हैं उनमें से प्रमुख कारणों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
01 – पारिवारिक वातावरण।Family environment.
02 – शारीरिक कारण।/Physical reasons.
03 – मानसिक कारण। /Mental reasons.
04 – सामाजिक कारण।/ Social reasons
05 – आर्थिक कारण ।/ .Economic reasons
06 – निराशाजन्य अनुभव।/Depressing experiences.
07 – व्यक्तिगत कारण/ Personal reasons.
08 – क्षेत्र विशेष के कारण / Reasons specific to the area
09 – शैक्षणिक कारण / Educational reasons
कुसमायोजन का निदान व उपचार (Diagnosis & Remedies of Maladjustment) / Diagnosis and treatment of maladjustment –
कुसमायोजित व्यक्ति को स्वस्थ जीवन में वापस लाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:
01 – सम्यक प्रेरणा व निर्देशन /Proper motivation and guidance
02 – प्रेमपूर्ण और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार / Loving and compassionate behavior
03 – सकारात्मक वातावरण / Positive environment
04 – परामर्श (Counseling)
05 – स्वस्थ वातावरण / Healthy environment
06 – रुचि के अनुसार कार्य / Work according to interests
07 – मानसिक चिकित्सा / Psychiatric therapy
08 – शारीरिक चिकित्सा / Physical therapy
09 – सामंजस्य शक्ति विकास कार्यक्रम / Cohesion development program
10 – सामाजिक कौशल विकास / Social skills development
आज की भागम भाग की जिन्दगी में ढेरों बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आदमी मशीन होता जा रहा है। जेब में बिना पैसे रखे भी सीधे अपने खाते से भारी भरकम रकम खर्च की जा सकती है। जहाँ लम्बी लम्बी लाइनों के जञ्जाल से मुक्ति मिली है लेन देन सरल हुआ है। वही कंगाल होने के भी खतरे बढ़ गए हैं। बिना आपके घर में साक्षात् घुसे भी आपको लूटा सकता है उसी का एक तरीका है – डिजिटल अरेस्ट
डिजिटल अरेस्ट क्या है ?-
यह एक साइबर क्राइम है दूसरे शब्दों में यह एक अत्यन्त घातक धोखा धड़ी है जिसे ऑन लाइन अंजाम दिया जाता है, डिजिटल अरेस्ट स्कैम आपके डर जाने को कैश करके लूटने का आधुनिकतम तरीका है। कई अर्थों में यह हमारी नासमझी का परिणाम है जिन कार्यों को बैंक, शासन बार बार मैसेज भेजकर हमें करने से मना करता है वही जब हम किसी भी कारणवश कर बैठते हैं तब हम डिजिटल अरेस्ट स्कैम का शिकार बनते हैं। जब केवल डराकर आपको मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग की तस्करी, अन्तर्राष्ट्रीय अपराध, किसी परिवारीजन, मित्र, सम्बन्धी झूठी बात का आपको विश्वास दिलाकर अपने इशारों पर दूर से नचाया जाता है तो इस सायबर क्राइम की भूमिका गढ़ी जाती है। वीडियो कॉल पर अनजाना चेहरा आपके बारे में कुछ तथ्य बताकर अपने को किसी तरह का अफसर बताकर डर का माहौल बनाकर आपको बाध्य करता है तब जो आप वीडियो कॉल पर बन्धक हो जाते हो इसे ही डिजिटल अरेस्ट होना कहा जाता है।
डिजिटल अरेस्ट के कतिपय उदाहरण –
आजकल लगभग रोज ही इस तरह की खबर सुननने को मिल जाती है कि आज डिजिटल अरेस्ट कर इसे लूट लिया उसे लूट लिया और यह ठगी भी करोड़ों में होती है कुछ उदाहरण जो मष्तिष्क में हैं उनमें से कुछ आपके साथ बांटने का प्रयास करता हूँ। वर्धमान ग्रुप के CMD श्री एस पी ओसवाल जी को डिजिटल अरेस्ट करके लगभग 7 करोड़ की ठगी हुई। मेरी एम एड में गुरु रहीं श्रद्धेय डॉ वीना शाह जी इसका शिकार बनी. एक महिला शिक्षक को जब उसकी बेटी के सेक्स स्कैंडल में फंसने का झूठा कॉल आया तो डर के कारण उसकी मौत हो गयी। इतनी बड़ी आबादी वाले देश में साइबर क्राइम करने वालों को शिकार खोजने में अधिक दिक्कत नहीं होती।
डिजिटल अरेस्ट होने के कारण –
01 – कानून और व्यवस्था का सम्मान
02 – नियम कायदे, सरकारी दस्तावेज व विविध शासकीय संस्थाओं पर अगाध विश्वास
03 – निजी डाटा सुरक्षा सम्बन्धी सरल क़ानून
04 – डिजिटल अरेस्ट, ट्रेडिंग घोटाला, निवेश में घोटाला वाली मानसिकता
05 – रोमांस, डेटिंग व स्वाभाविक ओछापन
06 – प्रबल विवेक शक्ति का अभाव
07 – अवैध सामान, नकली पासपोर्ट, ड्रग्स या नियम विरुद्ध कार्य सम्बन्धी सूचना पर विश्वास
08 – भय
09 – स्वयं को कमजोर मानने की प्रवृत्ति
10 – साइबर सुरक्षा की खराब व्यवस्था
11 – निजता संरक्षण सम्बन्धी जागरूकता का अभाव
डिजिटल अरेस्ट से बचाव के उपाय –
01 – आरोपों की सम्यक पड़ताल।
02 – तथ्यों, सबूतों की सम्यक समझ।
03 – डिजिटल अरेस्ट या वर्चुअल हिरासत शब्द पर तुरन्त जागरूक।
04 – लगातार कॉल पर रहने की बात आते ही विशेष जागरूक ;
05 – अनजाने लोगों से वीडिओ कॉल पर बात नहीं।
06 – अकाउंट फ्रीज की सूचना पर सचेत
07 – बिना मँगाया पार्सल वापस करें तुरन्त।
08 – आपसे सौदेबाजी की बात आने पर सचेत
09 – जागरुक रहें। जागरुक करें।
10 – वित्तीय लेन देन पर राज़ी न हों।
11 – अपराधों के आरोप पर सचेत
12 – तुरन्त पेमेन्ट मतलब ख़तरा
13 – कॉल काटने से न डरें।
14 – तथ्य वेरिफाई अवश्य करें।
15 – तत्सम्बन्धी सुरक्षा एजेंसी से तुरन्त सम्पर्क।
16 – बैंक डिटेल्स, जन्म तिथि, आधार व पैन नंबर, OTP शेयर न करें।
अगर कभी फँस भी जाएँ तो तुरन्त स्थानीय पुलिस, साइबरक्राइम पोर्टल (जैसे, भारत में cybercrime.gov.in) या 1930 जैसी राष्ट्रीय हेल्पलाइन पर रिपोर्ट करें.
आज की दुनियाँ हर क्षण बदल रही है और इसमें मेहनतकश को छलने के तमाम नए अवसर सृजित किये जा रहे हैं। इसमें एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है जो मध्यम वर्गको लड़ाने के नित नए पैंतरे खोजता रहता है। मध्यम वर्ग बिना किसी चिन्तन के नए भ्रम का शिकार होता रहता है क्योंकि शिकारी रोज नए जाल का प्रयोग कर रहा है। रोज नए कांटे लगाकर मध्यम वर्ग को रिझाने की साजिशें रची जा रही हैं। चूँकि मध्यम वर्ग संगठित वर्ग नहीं है इस लिए उस मकड़ जाल में फंसता चला जाता है। कहीं कोई तथा कथित चिकित्सक के रूप में अनावश्यक सलाह से जबरदस्ती के ऑपरेशन करके लूटने की साजिश करता है कहीं कोर्ट कचहरी के चक्कर में वह अनायास फंस जाता है। लोग दूर से उसे लड़ाकर अपना उल्लू साधते हैं। एक बहुत बड़ा चक्कर उसे जाति के खानों में डालकर लड़वाने का है। बहुत पुरानी पुस्तक के बारे में भ्रम फैलाकर लड़वाने की साजिश होती है और कहीं भाषा के नाम पर। हर हालत में मरना या शिकार आम आदमी को ही होना है।
मध्यम वर्ग को दिखावे के जञ्जाल में फँसाने के लिए कतिपयएक्टर, कतिपय खिलाड़ी, कतिपय यू ट्यूबर, नेतृत्वकारी शक्ति, तथाकथित अभिजात्य वर्ग, नवोदित रईस सभी लगे हैं। बाज़ारवाद हावी हो चला है छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक को फँसाने की भयङ्कर साजिश है और अधिकाँश मध्यम वर्ग बेखबर है। यहाँ कुछ दिखावे की ओर ध्यान आकृष्ट कर सचाई परोसने का प्रयास कुछ बिन्दुओं के आधार पर करने जा रहा हूँ। बाकी आप जानते हैं समझदारी हटी, दुर्घटना घटी।
दिखावे के कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दु / Some important points of appearance –
01- जन्म, जन्मदिन और केक / Births, Birthdays, and Cakes
02 – दुष्प्रचार और यथार्थ / Misinformation and Reality
03 – पाँच सितारा विद्यालय / Five-Star Schools
04 – पहनावा / Clothing
05 – अनावश्यक गैजेट्स / Unnecessary Gadgets
06 – बाजार वादी संस्कृति / Market-driven culture
07 – अध्यात्म से दूरी / Disconnection from spirituality
08 – अनावश्यक डर / Unnecessary fear
09 – स्वास्थ्य उपेक्षा /Neglect of health
10 – शीतल पेय, डब्बा बन्द अखाद्य पदार्थ / Soft drinks, canned and inedible items
11 – वैचारिक भटकाव / Ideological distraction
12 – पारवारिक विघटन / Family disintegration
13 – समाज और सामाजिक रिश्ते / Society and social relationships
आजकल आप एक शोर लगातार पब्लिश्ड बुक और अनपब्लिश्ड बुक के बारे में सुन रहे होंगे। राहुल गांधी के साथ अनपब्लिशड बुक (अप्रकाशित पुस्तक ) व निशिकान्त दुबे की पब्लिश्ड बुक (प्रकाशित पुस्तक ) के चक्कर में जो भी हंगामा हुआ। वह हर समाचार सुनने वाले के कान में गूँजता ही होगा। आज हम इस विषय वस्तु पर ही अपने को केन्द्रित करते हैं। आज का विषय पब्लिश्ड बुक और अनपब्लिश्ड बुक के बारे में विवेचन करना है।
अन पब्लिश्ड बुक (अप्रकाशित पुस्तक)की विशेषताएं
01 – मूल पाण्डुलिपि स्तर / Original Manuscript Levels
उक्त सम्पूर्ण विवेचन यह स्पष्ट करता है कि अप्रकाशन से प्रकाशन का सफर एक लेखक की जिन्दगी में बहुत ऊहापोह से भरा होता है। ऐसा लगता है जैसी कल्पना यथार्थ के धरातल पर उतर आई हो। यथार्थ अवलम्बित रचनाएं कुछ मसाला लपेटकर पाठकों को अलग आनन्द प्रदान करती हैं। कुछ रचनाएं बाजार को ध्यान में रखकर लिखी जाती हैं और कुछ लेखक के मन की झांकी हुआ करती हैं।
क्या करें ?, क्या न करें ? What to do?, what not to do?
आज का भारतीय युवा उस दोराहे पर खड़ा है जहाँ उसका चिन्तन दिग्भ्रमित हो गया है। जहाँ हमारे कुछ बच्चे क्रिस्टल क्लियर सोच रखते हैं तो कई तरह तरह के विकल्प का अध्ययन कर्व ऊहापोह की स्थिति में हैं। इस स्थिति में यह जानना भी परम आवश्यक है के वे क्या करें और क्या न करें ?
क्या करें ? / What to do ?
01 – डिजिटल ज्ञान के साथ शिक्षा / Education with Digital Knowledge
02 – स्वयं में कौशल विकास / Self-Skill Development
03 – बाजार की मांग अनुरूप तकनीकी ज्ञान -रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स, मशीन लर्निंग
बसन्त पञ्चमी के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म ग्रन्थों में कई कथाएं प्रचलित हैं भगवान शिव की सगाई के दिन के रूप में यह वर्णित है। कुछ कथाएं इसे पृथ्वी पर जीवन की शुरआत का दिन मानती हैं लेकिन माघ मास की इस पञ्चमी को अधिकांशतः सरस्वती पूजा अर्थात माँ शारदे की आराधना का दिवस माना जाता है। प्राचीन समय से ही ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के जन्म दिवस या प्रागट्य दिवस के रूप में मनाते हैं।
बसन्त पञ्चमी का समय व शुभ मुहूर्त –
बसन्त पञ्चमी इस बार 23 जनवरी 2026 को मनाई जायेगी क्यों कि बसन्त पञ्चमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी 2026 यानी गुरुवार की रात 1 बजकर 30 मिनट से प्रारम्भ होगी और 23 जनवरी की रात 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगी. इसीलिए उदय तिथि के अनुसार शुक्रवार को ही मां सरस्वती की पूजन करना शुभ माना जाएगा।
विविध क्षेत्रों में बसन्त पञ्चमी –
माँ शारदे की आराधना, पूजा का यह दिवस इस विविधता वाले देश में अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में विवाहोपरान्त पहली बसन्त पञ्चमी के दिन विवाहित जोड़ा पीत वस्त्र धारण कर मन्दिरों में जाते हैं। पंजाब में इस दिन पतङ्ग उड़ाई जाती हैं और पतंग उत्सव मनाते हैं पीले चावल बना कर खाते हैं सिख बन्धु पीले रंग की पगड़ी भी पहनते हैं। बिहार प्रान्त में भगवान मार्तण्ड अर्थात सूर्य देव की मूर्ति की स्थापना की गई, इस दिन सूर्य पूजन दिवस के रूप में पूर्ण साजसज्जा व उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल में विधिवत मूर्ति स्थापित कर पूर्ण श्रद्धा से मनाई जाती है शेष परिक्षेत्र में भी विधिवत मान शारदे की उपासना होती है। कतिपय लोग भगवान शिव की आराधना करने के साथ इस दिन विवाह का विशिष्ट दिन मानते हैं। मुस्लिम समुदाय के सूफी सन्त भी इस दिन को विशेष दिन मानते हैं। चिश्ती वंश के मुस्लिम सूफी सन्त इस दिनदिल्ली की प्रसिद्द निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करते हैं।
बसन्त पञ्चमी मनाने का ढंग –
विद्या, बुद्धि, वाणी की शुद्धता, स्मरण शक्ति और कलाओं में सिद्धि हेतु इस दिन माँ की आराधना करते हैं इस वर्ष अभिजित मुहूर्त: प्रात:काल 11:53 से दोपहर 12:38 बजे तक है। इस दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि के उपरांत स्वच्छ धवल या पीत वस्त्र धारण करे जाते हैं यहाँ तक की आसन भी इसी रंग का लेना विशेष शुभ माना जाता है। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर सङ्कल्प लेते हैं। सामान्यतः इस मन्त्र से मान शारदे का आवाहन होता है –
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
उक्त ध्यान मंत्र के सस्वर वाचन उपरान्त मां शारदे को पुष्प, रोली, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, अर्पित किया जाता है।
तदोपरान्त वाग्देवी के श्री चरणों में पुस्तक, कलम, कला साधन व वाद्य यंत्रों आदि को रखकर वन्दन करते हैं
मां सरस्वती को फल, पुष्प व नैवेद्य अर्पण करने के बाद पुनः ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः‘, अथवा ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः‘मंत्र का जप करें.
बसन्त पञ्चमी के दिन मां सरस्वती की आरती के बिना उनकी पूजा अधूरी रहती है, इसलिए माँ शारदे की आरती अवश्य की जानी चाहिए।
बसन्त पञ्चमी का दिन गीत, संगीत, नृत्य, लेखन तथा कला साधना के प्रारम्भ हेतु अत्यंत ही शुभ और फलप्रदाता माना जाता है. नवीन कार्यों की शुरुआत व मांगलिक कार्य हेतु भी बसंत पंचमी का दिन शुभ माना जाता है.इस दिन विद्यार्थी अध्ययन हेतु उपयोगी वस्तुओं का दान देते हैं और माँ शारदे का आशीष लेते हैं। पीले वस्त्र धारण करते हैं पीले पुष्प चढ़ाना अच्छा माना जाता है प्रकृति भी अपना पीला श्रृंगार करती है सरसों के पुष्प प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं। बासन्ती मिष्ठान आज का प्रमुख प्रसाद रहता है। केसर हलवा विशेषतः इस दिन प्रमुखता से खाया जाता है।
अन्त यह कहना समीचीन होगा कि यदि कर्मकाण्ड पूर्ण न भी हो पाएं और सच्चे मन से मान शारदे के ध्यान के साथ दृढ़ संकल्पित होकर साधना में पूर्ण मनोयोग से तत्पर होते हैं तो यह दिवस विशेष फल प्रदाता है। बसन्त पञ्चमी पर्व के आगमन के साथ खेतों में सरसों, गेहूं आदि फसलें लहलहाने लगती हैं. प्रकृति में इस कालखण्ड में नवजीवन, उल्लास और सौंदर्य का संचरण होता है. सनातन हिन्दू धर्म में पीला रंग चाहे हल्दी का हो या सरसों का, बसन्त का प्रतीक माना जाता है. यह रंग विद्या की देवी मां शारदे को भी अत्यन्त प्रिय है. इसी कारण बसन्त पञ्चमी महापर्व पर लोग विशेष रूप से पीले परिधान धारण कर पीले ही व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हैं।
सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि भावात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक पक्ष का विकास शिक्षा शिक्षण के माध्यम से किया जाता है। इसमें से क्रियात्मक पक्ष के मूल्यांकन हेतु प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। पहले भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि, सङ्गीत, व्यावसायिक विषय, कौशल, प्रशिक्षण कार्य क्रम, भूगोल आदि में प्रयोगात्मक परीक्षा का चलन था पर वर्तमान में हिन्दी, अंग्रेजी, विविध मानविकी विषय में भी प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। कुछ विषयों की उपलब्धियों का मूल्याङ्कन प्रयोगात्मक परीक्षा के बिना संभव ही नहीं है। विद्यार्थियों के विकास के दृष्टिकोण से इन परीक्षाओं का विशेष महत्त्व है।
प्रयोगात्मक परीक्षा के उद्देश्य / Objectives of Practical Examination :-
01 – लिखित परीक्षा के पूरक के रूप में / To supplement the written examination
02 – उपलब्धियों के व्यावहारिक मापन व मूल्यांकन हेतु / For practical measurement and evaluation of achievements
03 – शिक्षार्थियों के सम्यक विकास हेतु / For the holistic development of learners
04 – यथार्थ वाद के उद्देश्यों की पूर्ति / To fulfill the objectives of realism
05 – कौशल विकास का मूल्यांकन / Assessment of skill development
06 – क्रियात्मक विकास का मूल्यांकन / Assessment of functional development
07 – विद्यार्थियों के व्यक्तित्व गठन हेतु / For personality development of students
08 – जीवन के यथार्थ अवलम्बन हेतु / For real life support
प्रयोगात्मक परीक्षा की प्रविधियाँ / Techniques of Practical Examination
01- प्रदत्त कार्य मूल्याङ्कन / Assigned Task Evaluation
02 – व्यावहारिक कार्य मूल्यांकन / Practical Task Evaluation
03 – निरीक्षण व मौखिक का सम्यक सम्मिश्रण / A Proper Combination of Observation and Oral Testing
04 – क्रिया सम्पन्नता मूल्यांकन / Activity Completion Evaluation
05 – यथार्थ गणना के आधार पर / Based on accurate calculations
06 – Proper use of equipment
06 – उपकरणों का यथोचित प्रयोग / Proper use of equipment
07 – परिणाम मूल्यांकन /Result evaluation
08 – कार्य व पृच्छा के आधार पर / Based on tasks and questions
प्रयोगात्मक परीक्षा की विशेषताएं / Features of the practical exam
01 – ज्ञानात्मक व्यावहारिकता व उपयोगिता का मूल्याङ्कन / Evaluation of cognitive practicality and utility
02 – क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों का मूल्यांकन / Evaluation of practical objectives
03 – ज्ञान व कौशल मूल्यांकन / Assessment of knowledge and skills
04 – रुचियों का मूल्यांकन / Assessment of interests
05 – व्यक्तिगत क्षमता का मूल्यांकन / Assessment of individual abilities
06 – नकल पर पूर्ण प्रतिबन्ध / Complete prohibition of cheating
07 – व्यावहारिक स्थितियों में मूल्यांकन / Assessment in practical situations
08 – विश्वसनीयता व वैधता में सकारात्मक वृद्धि / Positive increase in reliability and validity
प्रयोगात्मक परीक्षा के दोष / Limitations of Experimental Examination –
व्यावहारिक रूप से यह समस्त तत्सम्बन्धी शोध विषय को ज्ञानात्मक धरातल उपलब्ध कराता है मानव के पास विश्लेषणात्मक बुद्धि है जहाँ वह अपने चिन्तन मन्थन को तर्क सङ्गत समझता है वहीं दूसरे विद्वान जो उस विषय पर पहले कार्य कर चुके होते हैं उसके लिए प्रकाश स्तम्भ का कार्य करते हैं। तत्सम्बन्धी ज्ञान सङ्कलन, हस्तान्तरण और सम्वर्धन में शोध की महती भूमिका होती है।
* *सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय व परिभाषा / Meaning and definition of the study of related literature –
शोधार्थी को वैचारिक आधार पूर्व के शोध अध्ययन व तत्सम्बन्धी साहित्य से मिलता है असल में हर बार कार्य प्रारम्भ से शुरू अधिक समय लेगा इसलिए पूर्व शोध जो नींव तैयार करते हैं नई इमारत उस पर मजबूती से खड़ी होती है पूर्व शोध कार्यों का लाभ उठाते हुए उनके निष्कर्ष, उनके अनुभव, उनका विश्लेषण नए शोधार्थियों को काफी कुछ सचेत कर देता है। सम्बंधित साहित्य का अध्ययन एक आवश्यक व वैज्ञानिक चिन्तन का परिणामी चरण है।
सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय उस साहित्य से है जो विषयानुकूल है और जिसके प्रदत्त प्रस्तुत शोध में सहायक हो सकते हैं यह कलेवर नवीन शोध हेतु दिशा बोधक का कार्य करता है और पलायनवादी सोच विकसित होने से पूर्व व्यावहारिक धरातल प्रदान करता है। इस समस्त ज्ञान को शोधार्थी अपने प्राप्त कलेवर में जोड़ता है और विकास के नए अग्रिम सोपान तय करता है।इस सम्बन्ध में जॉन डब्लू बेस्ट का मानना है कि –
“व्यावहारिक रूप में सम्पूर्ण ज्ञान पुस्तकों और पुस्तकालयों में मिल सकता है। अन्य प्राणियों से भिन्न मानव को अतीत से प्राप्त ज्ञान को प्रत्येक पीढ़ी के साथ नए ज्ञान के विस्तृत भण्डार के रूप में प्रारम्भ करना चाहिए।ज्ञान के विस्तृत भण्डार के रूप में उसका निरन्तर योगदान प्रत्येक क्षेत्र में मानव द्वारा किये गए प्रयासों की सफलता को सम्भव बनाता है।”
आँग्ल अनुवाद
“Practically all knowledge can be found in books and libraries. Humans, unlike other creatures, must build on past knowledge to create a new storehouse of knowledge with each generation. Its continuous contribution as a vast repository of knowledge makes possible the success of human endeavors in every field.”
इसी सम्बन्ध में बोर्ग महोदय का मानना है कि
“किसी भी क्षेत्र का साहित्य उसकी नींव को बनाता है, जिसके ऊपर भविष्य का कार्य किया जाता है। यदि हम साहित्य का पुनर्निरीक्षण द्वारा प्रदान किये गए ज्ञान की नींव बनाने में असमर्थ होते हैं तो हमारा कार्य सम्भवतः तुच्छ और प्रायः उस कार्य की नक़ल मात्र ही होती है जोकि पहले ही किसी के द्वारा किया जा चुका है।”
आँग्ल अनुवाद
“The literature of any field forms the foundation upon which future work is built. If we fail to build on the foundation of knowledge provided by reviewing the literature, our work is likely to be trivial and often merely a copy of what has already been done by someone else.”
* *सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन की आवश्यकता क्यों ? / Why is there a need to review the related literature?
01 – अग्रिम योजना निर्धारण
02 – मात्रात्मक व गुणात्मक विश्लेषण
03 – तत्सम्बन्धी ज्ञान के विविध ज्ञान से जुड़ने हेतु
04 – पूर्वाग्रहों से मुक्ति हेतु
05 – परिकल्पना बनाने हेतु
06 – उद्देश्य निर्धारण हेतु
07 – परिणामों व निष्कर्षों के सम्यक विवेचन हेतु
* * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का महत्त्व –
वास्तव में शोध कार्य समाज के उत्थान में व्यक्ति या शोधार्थी का सहयोग है। उसे जब यह पता होता है कि इस क्षेत्र में इतना कार्य हो चुका है तब वह उसका आधार से आगे अपने कार्य को अंजाम देगा अन्यथा पुनरावृत्ति की संभावना रहेगी।इसके महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है।–
01 – अनुसन्धान सम्बन्धी ज्ञान सम्वर्धन
02 – दिशात्मक बोध हेतु
03 – परिकल्पना निर्माण हेतु
04 – उद्देश्य निर्धारण व स्पष्टीकरण
05 – दोहराव से बचाव
06 – उपकरण चयन
07 – शोध सामग्री एकत्रीकरण हेतु
08 – विधि निर्धारण में
09 – आत्म निरीक्षण व परिमार्जन
10 – शोध परिणाम विश्लेषण
11 – सुझावों के समृद्धीकरण में
* * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का उद्देश्य /The purpose of re-observation in research work –
शोध कार्य में गम्भीरता व दिशात्मक बोध जागरण और अधिक प्रभावी हो जाता है जब शोधार्थी उद्देश्य के सम्बन्ध में क्रिस्टल क्लियर होता है। किसी भी अनुसंधान के पुनः अवलोकन के पीछे निम्न उद्देश्य कहे जा सकते हैं। –
01 – व्याख्या, सिद्धान्त, परिकल्पना प्रदत्तीकरण
02 – यथार्थ अवलम्बन
03 – परिकल्पना निर्धारण
04 – सम्यक विधियों व तथ्य सङ्कलन में सहायक
05 – सांख्यिकीय विश्लेषण निर्धारण
06 – तुलनात्मक विवेचन
07 – निष्कर्ष विवेचन
08 – सकारात्मक चिन्तन व धैर्य सम्वर्धन
09 – सीमाएं, सुधार व अंर्तदृष्टि विकास
10 – समस्या का समुचित समाधान
* * सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन स्रोत / Review sources of related literature –
01 – पत्र पत्रिकाएं
02 – तत्सम्बन्धी पुस्तकें
03 – पाठ्य सामग्री
04 – मासिक, त्रैमासिक, अर्ध वार्षिक, वार्षिक शोध समीक्षाएं