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शिक्षा

INCLUSIVE EDUCATION

May 3, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

समावेशी शिक्षा

समावेशी शिक्षा से विस्तृत परिक्षेत्र सम्बद्ध है यहाँ अधोलिखित तीन बिन्दुओं पर मुख्यतः विचार करेंगे।

1 – समावेशन की अवधारणा और सिद्धान्त /Concept and principles of inclusion

2 – समावेशन के लाभ / Benefits of inclusion

3 – समावेशी शिक्षा की आवश्यकता / Need of inclusive education

समावेशन की अवधारणा और सिद्धान्त /Concept and principles of inclusion –

जब हम समावेशन की बात करते हैं तो यह जानना परमावश्यक है कि यह किनका करना है। समाज में बहुत से लोग हाशिये पर हैं शिक्षण संस्थाओं में अधिगम करने वाले विविध वर्ग हैं कुछ में शारीरिक, कुछ में मानसिक क्षमताएं, अक्षमताएं  विद्यमान हैं। हमारे विद्यालयों में अध्यापन करने वाला व्यक्ति समस्त अधिगमार्थियों से उनकी क्षमतानुसार अधिगम क्षेत्र उन्नयन हेतु पृथक व्यवहार कर सभी का समावेशन करना चाहता है।

समावेशन वह क्रिया है जो विविधता युक्त व्यक्तित्वों में निर्दिष्ट क्षमता समान रूप से स्थापन करने हेतु की जाती है।

गूगल द्वारा समावेशन सिद्धान्त तलाशने पर ज्ञात हुआ –       

“समावेशी शिक्षण और शिक्षण सभी छात्रों के सीखने के अनुभव के अधिकार को पहचानता है, जो विविधता का सम्मान करता है, भागीदारी को सक्षम बनाता है, बाधाओं को दूर करता है और विभिन्न प्रकार की सीखने की आवश्यकताओं और प्राथमिकताओं पर विचार करता है।“

“Inclusive teaching and learning recognizes the right of all students to a learning experience that respects diversity, enables participation, removes barriers and considers a variety of learning needs and preferences.”

समावेशन का यह प्रयास विविध क्षेत्रों में विविध प्रकार से हो सकता है लेकिन यदि हम केवल शिक्षा के दृष्टिकोण से इस पर विचार करें तो प्रसिद्द शिक्षाविद श्री मदन सिंह जी(आर लाल पब्लिकेशन) का यह विचार भी तर्क सङ्गत है –

“शिक्षा के क्षेत्र में समावेशी शिक्षा का अर्थ है – विद्यालय के पुनर्निर्माण की वह प्रक्रिया जिसका लक्ष्य सभी बच्चों को शैक्षणिक और सामाजिक अवसरों की उपलब्धता से है। ” 

“In the field of education, inclusive education means the process of restructuring of schools aimed at providing educational and social opportunities to all children.”

समावेशी शिक्षा की प्रक्रियाओं  में अधिगमार्थी की उपलब्धि, पाठ्य क्रम पर अधिकार, समूह में प्रतिक्रया, शिक्षण, तकनीक, विविध क्रियाकलाप, खेल, नेतृत्व, सृजनात्मकता आदि को शामिल किया जा सकता है।

समावेशन के लाभ / Benefits of inclusion –

चूँकि हम शैक्षिक परिक्षेत्र में सम्पूर्ण विवेचन कर रहे हैं अतः समावेशी शिक्षा के लाभों पर मुख्यतः विचार करेंगे। इस हेतु बिन्दुओं का क्रम इस प्रकार संजोया जा सकता है।

01- स्वस्थ सामाजिक वातावरण व सम्बन्ध / Healthy social environment and relationships

02- समानता (दिव्याङ्ग व सामान्य) / Equality

03- स्तरोन्नयन / Upgradation

04 – मानसिक व सामाजिक समायोजन / Mental and social adjustment

05- व्यक्तिगत अधिकारों का संरक्षण / Protection of individual rights

06- सामूहिक प्रयास समन्वयन / Coordination of collective efforts

07- समान दृष्टिकोण का विकास / Development of common vision

08- विज्ञजनों के प्रगति आख्यान / Progress stories of experts

09- समानता के सिद्धान्त को प्रश्रय / Support the principle of equality

10- विशिष्टीकरण को प्रश्रय / Support for specialization

11- प्रगतिशीलता से समन्वय / Progressive coordination 

12- चयनित स्थानापन्न / Selective  placement

समावेशी शिक्षा की आवश्यकता / Need for inclusive education –

जब समावेशी शिक्षा की आवश्यकता क्यों ? का जवाब तलाशा जाता है तो निम्न महत्त्वपूर्ण बिन्दु दृष्टिगत होते हैं –

01- सौहाद्रपूर्ण वातावरण का सृजन /  Creation of harmonious environment

02- सहायता हेतु तत्परता / Readiness for help

03- परस्पर आश्रयता की समझ का विकास / Development of understanding of mutual support

04- जैण्डर सुग्राह्यता / Gender sensitivity

05- विविधता में एकता / Unity in diversity

06- सम्यक अभिवृत्ति विकास / Proper attitude development

07- अद्यतन ज्ञान से सामञ्जस्य / Alignment with updated knowledge

08- विश्व बन्धुत्व की भावना को प्रश्रय / Fostering the spirit of world brotherhood

09- हीनता से मुक्ति / Freedom from inferiority

10- मानसिक प्रगति सुनिश्चयन  / Ensuring mental progress

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समाज और संस्कृति

माघ

January 8, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

माघ

माघ माह की मघ बदरिया का चिन्तन हमें एक विशिष्ट ज्ञान प्रवाह से जोड़ देता है और एक शरद अहसास कराता है। यह माह हिन्दू राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग और हिन्दू चन्द्र पञ्चाङ्ग का ग्यारहवाँ मास है। इस माह का नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की माघ नक्षत्र के निकटतम स्थिति से उद्भवित हुआ है। माघ माह का अद्भुत आनन्द माँ गङ्गा की निकटतम कुटिया में जाड़े, बूँदाबाँदी, अद्भुत वायु व गङ्गा प्रवाह और मौन चिन्तन के समय अन्तर में महसूस किया जाता है। यथा आनन्द वर्णन दुष्कर है।

माघ मास व माघ मेला –

माघ, मेघ, मेधा का अद्भुत समन्वयन इस माह में दिखता है इस वर्ष 2026 में 3 जनवरी को माघ मेले का शुभारम्भ हुआ है प्रथम पवित्र स्नान पौष पूर्णिमा को होता है। यह मेला 40 दिन से अधिक चलता है और महाशिव रात्रि को इसका समापन होता है अर्थात 15 फरवरी 2026 को प्रयागराज में यह पूरा हो जाएगा। कतिपय विद्वानों के अनुसार इस वर्ष 4 जनवरी से माघ माह का प्रारम्भ हुआ है व इसका समापन 01 फरबरी 2026 को होगा। बहुत सारे लोग कल्पवास प्रयाग तट पर करते हैं। एक मान्यता के अनुसार समग्र नदियों व कूपों का जल इस अवधि में परम पावस हो जाता है। ब्रह्म मुहूर्त इस काल खण्ड का विशेष महत्त्व रखता है।

भगवान कृष्ण और माघ –

यह माह भगवान कृष्ण को समर्पित है यद्यपि भगवान कृष्णका जन्म इस माह नहीं हुआ था भगवान कृष्ण से जुड़ते ही इसमें विशिष्ट आयाम जुड़ जाते हैं। हमारे मन मानस में इनका चिर युवा स्वरुप विद्यमान है इनका बचपन इतना विशिष्ट कि आज भी हर हिन्दुस्तानी मान अपने बच्चे को लाड़ से कान्हा पुकारती है। किशोरावस्था और किशोरीजी की धूम ऐसी कि बालिकाओं में लोकप्रिय होने पर आज भी लोग कह देते हैं कैसा कन्हैया बना घूम रहा है। युद्ध के मैदान से ज्ञान सम्प्रेषण आज भी भगवद्गीता के प्रति हमारे मन मानस में विद्यमान है। गुरुता ऐसी कि सहज स्वीकारा जाता है -कृष्णम वन्दे जगद्गुरु। भारत में आज भी इनके बचपन से युवा स्वरुप का पूजन होता है।

हिन्दी माह के बारह माह चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण (सावन), भाद्रपद (भादो), अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ, व फाल्गुन (फागुन) हैं। इसमें माघ 11 नम्बर पर आता है।

पावन माघ मास का महत्त्व व मान्यताएं –

विविध शास्त्रों के आधार पर कहा जाता है कि इस पावन माघ मास में विविध पावन नदियों का जल अमृत सदृश हो जाता है। इस माह का ब्रह्म मुहूर्त स्नान विगत पाप नाशिनी क्षमता को धारण करने वाला है।

पावन माघ मास में सूर्योदय से पूर्व स्नान की अधिक महत्ता है। यदि पावन नदी के  जल में स्नान का अवसर उपलब्ध नहीं है तो घर पर भी जल में काले तिल व गंगा जल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।

[A] महत्त्व –

1 – इस माह में ब्रह्म मुहूर्त स्नान आरोग्य व सकारात्मक ऊर्जा प्रदाता है। तिल का प्रयोग शनि व सूर्य दोष निवारक की भूमिका का निर्वहन करता है।

2 – इस माह सात्विक भोजन करने से तामस प्रवृत्तियों का निरोध होता है व वाणी प्रभावी व ओजपूर्ण बनती है। चिन्तन में भटकाव नहीं होता।

3 – भगवान विष्णु का मन्त्र ‘ऊँ नमः भगवते वासुदेवाय’ इस माह में विशिष्ट शक्ति प्रदाता है। नियमित सूर्य अर्घ्य व ब्रह्म मुहूर्त जागरण नेत्र सम्बन्धी विकारों को क्षय करने में सक्षम है।

4 – इस माह में गरम कपड़े, कम्बल, गुड़, तिल सेवन, सूर्य उपासना, सूर्य नमस्कार विविध शारीरिक दोष निवारण में सक्षम भूमिका का अधिक तीव्रता से निर्वहन करता है।

[B] – मान्यताएं –

01 – माघ माह को देवताओं के महीने के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस माह में देवता मानव रूप में पृथ्वी पर आकर स्नान दान, ध्यान, सत्संग करते हैं इसीलिये इसे देवताओं का स्नान काल भी कहा जाता है।   

02 – पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक स्नान का यह अवसर देवताओं की सकारात्मक ऊर्जा का सञ्चयन करता है।

03 – इस समय कल्पवास विशिष्ट ऊर्जा से जुड़ आध्यात्मिक चिन्तन पथ प्रशस्त करता है व सकारात्मकता को अक्षुण्ण बनाने का प्रयास करता है।

04 – माघी पूर्णिमा को देवता अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं इस दिन पावन नदियों में स्नान करने वाले इनके विशेष कृपा पात्र बनते हैं।

05 – मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसन्त पञ्चमी, माघी पूर्णिमा, सकारात्मक ऊर्जा का अक्षय प्रसरण में समर्थ हैं लेकिन मौनी अमावस्या को शुभ मांगलिक कार्य जैसे शादी, गृह प्रवेश आदि का निषेध है।

उक्त सम्पूर्ण विवेचन और विज्ञ जनों का सत्संग यह बताता है कि इस अवधि में प्रगति उन्मुख होने हेतु बनाई गयी रणनीतियाँ और उन पर अमल हमें शीघ्रता से लक्ष्योन्मुख करता है।        

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Uncategorized

2025 से 2026, इस तरह अच्छा बनेगा।

January 4, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

वास्तव में कुछ चीजें होती हैं और कुछ उस आधार पर बनती हैं जैसे नदी होती है और नहरें बनती हैं। इसी तरह हमारे पास हमारा शरीर होता है लेकिन हमारी सोच बनाने से बनती है। हम जो आज हैं यह अपनी पूर्ववर्ती सोच के कारण हैं। जो हम कल होंगे वह आज की सोच का परिणाम होगा। सृजनकर्त्ता के व्यक्तित्त्व को समझना आसान नहीं होता उसके मस्तिष्क में विस्तृत आकाश होता है उसमें छिपे सृजन के बीज दिखाई तो नहीं पड़ते लेकिन परिणाम सामान्यजन को उसका बोध अवश्य करा जाते हैं।

विगत दो सहस्त्राब्दि अर्थात 2000 वर्षों की पूर्णता के पश्चात नई शताब्दी के एक चौथाई वर्ष यानि कि 25 वर्ष बीतते हुए हममें से कई लोगों ने देखे होंगे और कई नवजवानों ने नहीं। विगत वर्ष 2025 अलग अलग लोगों को अलग अनुभूति कराने वाला रहा है और यह नववर्ष 2026 भी विविध परिणाम प्रदाता की भूमिका का निर्वहन करेगा। मानव मात्र का स्वभाव प्रगति उन्मुख रहा है इस लिए वह बेहतर, सुखद सकारात्मक परिणामों की कामना करता है लेकिन केवल कामना या सोचने से कार्य सिद्धि नहीं होगी उसके लिए सकारात्मक प्रयास अवश्यम्भावी होंगे। आपने सुना भी होगा।   

“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।

 न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

2026 को 2025 से इन 10 आधारों पर बेहतर बनाया जा सकता है –

01 – सफलता का समग्र कार्यक्रम / A holistic program for success

02 – उद्देश्य को छोटे छोटे हिस्से में समयबद्ध लक्ष्य पूर्ति / Break down your goals into small, timely goals

03 – स्वानुसाशन / Self-discipline

04 – स्वप्रेरणा /Self-motivation

05 – नियमित स्वस्थ दिनचर्या /Regular, healthy routine

06 – सम्यक कृत्य निरीक्षण व परिमार्जन /Inspection and refinement of proper actions

07 – जोखिम लेने की क्षमता वृद्धि /By Increasing risk-taking ability

08 – तर्क सङ्गत व्यय / Reasonable spending

09 – स्वयं पर विश्वास / Self-confidence

10 – सकारात्मक दृष्टिकोण / Positive attitude     

यह १० तथ्य एक मजबूत आधार बनाने हेतु हैं जब हमारा लक्ष्य हमारे जेहन में स्पष्ट होगा तो हमें अपने आप उस दिशा में प्रगति के विविध आलम्ब दिखाई देंगे। जब आपने ठान लिया तो निश्चित रूप से वर्ष 2026, विगत वर्ष 2025 से अवश्य अच्छा होगा क्योंकि सच्चे कर्मयोगी लक्ष्य प्राप्ति हेतु ही पृथ्वी पर आये हैं। 

  

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शोध

ज्ञान मीमांसा  [EPISTEMOLOGY]

January 2, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ज्ञान से आशय /Meaning of knowledge-ज्ञान (Knowledge) से आशय है किसी विषय या तथ्य का बोध या सत्य जानकारी होना, जो शिक्षा, अनुभव या सूझ से प्राप्त होता है।

ज्ञान की विविध परिभाषाएँ / Various definitions of knowledge –   ज्ञान शब्द संस्कृत की ‘ज्ञा’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘जानना’ या ‘पहचानना’ है।

प्लेटो महोदय के अनुसार

“विचारों की दिव्य व्यवस्था और आत्मा-परमात्मा के स्वरूप को जानना ज्ञान है।“

“Knowing the divine system of thoughts and the nature of the soul and God is knowledge.”

अल्बर्ट आइंस्टीन महोदय के अनुसार –

 “अनुभव ही ज्ञान है, बाकी सब सिर्फ जानकारी है।”

“Experience is knowledge, everything else is just information.”

मगध विश्व विद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की  विद्वान प्राचार्य के मत में  –

“नॉलेज और ज्ञान के दार्शनिक विवेचन में सर्वाधिक प्रमुख भेद यही है कि नॉलेज सिर्फ सत्य होता है जबकि ज्ञान सत्य और असत्य दोनों ही रूपों में पाया जाना संभव है।”

“The most important difference in the philosophical discussion of knowledge and wisdom is that knowledge is only true whereas wisdom can be found in both true and false forms.”

उक्त सम्पूर्ण परिभाषाओं के अध्ययन से स्पष्ट है कि यदि ज्ञान को सामान्य अर्थों में लिया जाए तो इसे आंग्ल भाषा में सामान्यतः knowledge कहा जाता है जिसका अर्थ जानना, सीखना, अनुभव लेना, कुशल होना या सत्यता के प्रमाणित होने से है।

ज्ञान मीमांसा से आशय / Meaning of Epistemology –

            अंग्रेजी भाषा का शब्द Epistemology ग्रीक भाषा के दो शब्दों ‘Episteme’ और Logos शब्द से मिलकर बना है। जिनका अर्थ क्रमशः ज्ञान और विज्ञान है। दूसरे शब्दों में एपिस्टेमोलोजी से आशय है ज्ञान का सिद्धान्त जिसे दर्शन की भाषा में ज्ञान मीमांसा कहा जाता है। ज्ञान मीमांसा में मुख्यतः तीन प्रश्न शामिल हैं –

01 – ज्ञान – उद्गम (स्रोत ) व वास्तविक ज्ञान

02 – ज्ञान का स्वरुप – आभास बनाम सत्य

03 – ज्ञान – प्रामाणिक विश्वसनीयता  व वैधता

ज्ञान का क्षेत्र व्यापक है इसे असीम कहना भी तार्किक होगा इसमें ज्ञान स्थापन, विश्लेषण, संश्लेषण सभी शामिल है जो आगमन, निगमन, सूक्ष्म तार्किक विवेचन व ज्ञान की सत्यता की कसौटी पर आधारित समस्याएं को शामिल करता है। उक्त समस्त परिक्षेत्रों के प्रश्नों का विवेचन ज्ञान की जिस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है  वह ज्ञान मीमांसा के नाम से जानी जाती है।

ज्ञान मीमांसा के सिद्धान्त / Principles of Epistemology –

किसी भी तथ्य, तर्क, सिद्धान्त को सत्यता की कसौटी पर कसने के क्रम में ज्ञान मीमांसा हेतु बहुत से सिद्धांत प्रचलित हैं उनमें से कतिपय प्रमुख सिद्धांतों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।

01 – संशय वाद / Scepticism –  संशयवाद इस या उस ज्ञान को संशय की दृष्टि से नहीं देखता बल्कि यह किस्से भी प्रकार की ज्ञान प्राप्ति की संभावना के दावे को ही खारिज कर देता है। टी एच हक्सले महोदय का विचार है कि –

“किसी भी व्यक्ति के लिए यह कहना अनुचित है कि वह किसी भी तर्क वाक्य के वस्तुगत सत्य के बारे में निश्चित है। संशयवादी पूर्ण स्वीकार एवं पूर्ण नकार के मध्य स्थित हैं। “

“It is unreasonable for anyone to say that he is certain of the objective truth of any proposition. The skeptic stands between absolute acceptance and absolute denial.”

02 – अनुभव वाद / Empiricism –

 यह वह ज्ञान शास्त्रीय सिद्धांत है जो ज्ञान का एक मात्र साधन इन्द्रियानुभूत ज्ञान को स्वीककार करता है। इसके समर्थन में जॉन लॉक महोदय कहते हैं कि –

“ऐसी कोई भी चीज़ हमारी बुद्धि में नहीं होती, जो पहले अनुभव में नहीं होती।”

“There is nothing in our intellect, which was not previously in our senses.”

03 – बुद्धिवाद / Rationalism – सामान्यतः हम स्वीकार करते हैं कि ज्ञान, बुद्धि व अनुभव दोनों की उपज है लेकिन बुद्धिवाद वह सिद्धांत है जो ज्ञान का साधन, उद्गम, स्रोत केवल बुद्धि को ही स्वीकार करते हैं बुद्धिवादियों के अनुसार –

 “सिर्फ विश्लेषणात्मक (Analytic) तथा प्रागनुभविक (Apriori) ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है और ऐसे ज्ञान का स्रोत है बुद्धि।”

“Only analytical and apriori knowledge is real knowledge and the source of such knowledge is intellect.

04 – प्रत्यय वाद/ Idealism

05 – यथार्थ वाद / Realism

06 – व्यवहार वाद / Pragmatism

ज्ञान मीमांसा की प्रकृति एवं क्षेत्र / Nature and Scope of Epistemology –

जब हम मीमांसात्मक विवेचन ज्ञान के आधार पर अनुभव, प्रमाण, बुद्धि, सत्य, व विश्वास का सम्बल लेकर करते हैं तो यह विवेचन ज्ञान मीमांसात्मक विवेचन कहलाता है। यह दर्शन शास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रही है। ज्ञान विश्वास का आधार लेकर चलता है सत्य की प्राप्ति हेतु प्रमाणों को लेकर सम्यक विवेचन करता है यही ज्ञान मीमांसा की मूल प्रकृति है। ज्ञान मीमांसा का क्षेत्र संकुचित न होकर अत्यन्त व्यापक है। जब तथ्यों, विचारों, सिद्धान्तों को ज्ञान की तार्किक कसौटी पर कसने का प्रयास प्रारम्भ होता है इसके व्यापक परिक्षेत्र के दर्शन प्रारम्भ हो जाते हैं। 

ज्ञान के स्रोत (Sources of Knowledge) –

ज्ञान मीमांसात्मक विवेचन में ज्ञान के प्रमुख स्रोत मुख्यतः निम्न हैं –

01 – इन्द्रियानुभव [Sense experience]

02 – तर्क बुद्धि [Reason]

03 – आप्त वचन [Authority]

04 – अन्तः प्रज्ञा [Intuition]

ज्ञान मीमांसा की प्रमुख अवधारणाएं / Key concepts of epistemology –

01 – प्रागनुभाविक तथा अनुभवाश्रित [A Priory and a Posteriori]

02 – विश्लेषणात्मक तथा संश्लेषणात्मक [Analytic and Synthetic]

03 – साक्षात ज्ञान तथा विवरण ज्ञान [Knowledge by Acquaintance and knowledge by Description]

        (i) ज्ञाता / Knower

        (ii) ज्ञेय / knowable

        (iii) ज्ञान / knowledge

ज्ञान मीमांसा एवं शिक्षा / Epistemology and Education

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Uncategorized•शोध

INTERVIEW

December 27, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

साक्षात्कार

जब आमने सामने बैठकर निरीक्षण और पृच्छा के आधार पर जानकारी प्राप्त की जाती है इस जानकारी के आधार पर मूल्याङ्कन व परिणामों का विश्लेषण किया जाता है इस प्राविधि को साक्षात्कार कहा जाता है।

साक्षात्कार से आशय / Meaning of Interview – साक्षात्कार वह व्यक्तिनिष्ठ व आत्मनिष्ठ विधि है जिससे उद्देश्य केन्द्रित प्रश्नों के आधार पर योग्यताओं, गुणों, समस्याओं आदि के बारे में जानकारी एकत्रित की जाती है। विविध समस्याओं का यथार्थ अधिगम उपयुक्त निर्देशन हेतु साक्षात्कार महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करता है। साक्षात्कार के आशय को स्पष्ट करते हुए गुड व हॉट महोदय ने कहा –

“किसी उद्देश्य हेतु किया गहन वार्तालाप ही साक्षात्कार है।”

अंग्रेजी अनुवाद –

“An interview is an in-depth conversation with a purpose.”

इस सम्बन्ध मेंP.V.Yong ये  के विचार भी मनन करने योग्य हैं –

“साक्षात्कार को एक क्रम बद्ध प्रणाली माना जा सकता है , जिसके द्वारा एक व्यक्ति, दूसरे के आन्तरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप से प्रवेश करता है, जो उसके लिए सामान्यतः तुलनात्मक रूप से अपरिचित है।”

अंग्रेजी अनुवाद –

“Interview may be regarded as a systematic method by which one person enters, more or less imaginatively, into the inner life of another, who is generally comparatively unknown to him.”

एक अन्य प्रसिद्द विद्वान् जॉन डब्लू बेस्ट (John W. Best ने अपने विचार अत्यन्त सरल शब्दों में प्रगटित किये –

“साक्षात्कार एक प्रकार से एक मौखिक प्रश्नावली है। इसके अन्तर्गत उत्तर लिखने के स्थान पर आमने सामने की स्थिति में विषयी मौखिक उत्तर देता है।”

“The interview, is in a sense, an oral type of questionnaire. Instead of writing the response, the subject or interviewee gives the needed information verbally in a face to face relationship.”

उक्त परिभाषाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि शैक्षिक व मनोवैज्ञानिक स्तर संपन्न की गई वह प्रक्रिया साक्षात्कार कहलाती है जो दो व्यक्तियों को निकट लाती है और उनके सम्बन्ध में हमारे ज्ञान में वृद्धि करती है। यह तथ्यों की प्रमाणिकता सिद्ध करने में मदद करती है।

साक्षात्कार के प्रकार / Types of Interview – साक्षात्कार के प्रकार को अच्छी तरह अध्ययन करने हेतु इसे वर्गीकृत कर एक एक का स्पष्टीकरण आवश्यक है इसे मोटे तौर पर इस तरह अभिव्यक्त कियता जा सकता है।

[A] – कार्य के अनुसार [According to functions]

I – निदानात्मक साक्षात्कार (Diagnostic Interview)

II – उपचारात्मक साक्षात्कार (Treatment Based Interview)

III – अनुसन्धान साक्षात्कार (Research Interview)

[B] – भाग लेने वालों के अनुसार (According to Participants) –

I – व्यक्तिगत साक्षात्कार (Individual Interview)

II – सामूहिक साक्षात्कार (Group Interview)

[C] – सम्पर्क अवधि के अनुसार (According to Length of contact) –

I – अल्पकालिक सम्पर्क (Short term contact)

II – दीर्घ कालीन सम्पर्क (Prolong contact)

अध्ययन विधि के आधार पर साक्षात्कार / Interview based on study method –

I – अनिर्देशित साक्षात्कार / Unguided Interview

II – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार /Objective based Interview  

III – पुनरावर्तित साक्षात्कार (Repeated Interview)

साक्षात्कार प्राविधि के गुण / Merits of Interview Technique –

01 – शिक्षित, अशिक्षित व सभी पक्षों का अध्यययन 

02 – समस्या आधारित महत्त्वपूर्ण विश्वसनीय प्राविधि

03 – वैश्विक घटनाओं के प्रभाव का अध्ययन सम्भव

04 – मनोवैज्ञानिक अध्ययन सम्भव

05 – अभिवृत्तियों, भावनाओं, संवेगों का प्रभावी अध्ययन

06 – प्रत्यक्ष निरीक्षण असम्भव होने पर भी अध्ययन सम्भव

07 – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार से तत्सम्बन्धी सङ्कलन सम्भव

08 – प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच सम्भव

09 – तत्सम्बन्धी समस्त तथ्यों का संकलन

10 – वार्तालाप से अप्रत्याशित तथ्य जानकारी सम्भव

साक्षात्कार प्राविधि की सीमाएं  / Limitations of Interview Technique

01 – उपयुक्त मनोवैज्ञानिक तथा योग्य साक्षात्कार कर्त्ता प्राप्ति दुष्कर

02 – हाँ, नहीं में उत्तर प्राप्ति पर विश्लेषण दुष्प्रभावित 

03 – विश्वसनीयता सन्दिग्ध 

04 – आत्मनिष्ठ प्राविधि

05 – वैयक्तिकता का प्रभाव

06 – विविध सामाजिक पृष्ठ भूमि का प्रभाव

07 – अमितव्ययी

08 – साक्षात्कार प्रदाता की गलत सूचना हानिकारक

09 – अतिशयोक्ति सम्भव

10 – पारस्परिक व्यक्तित्व का प्रभाव

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शिक्षा•शोध

META PHYSICS AND EDUCATION

December 21, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा

ब्रह्माण्ड के यथार्थ स्वरुप और उसमें मनुष्य के जीवन की तात्त्विक विवेचना तत्त्व मीमांसा के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसी के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य और उनकी प्राप्ति के उपाय विवेचित किये जाते हैं और इस आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि जीवन दर्शन के आधार पर समाज के उद्देश्य निर्धारित होते हैं जिन्हें शिक्षा अपना उद्देश्य बना लेती है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षा के विविध अंग सहयोग करते हैं इसीलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण विधि , शिक्षक, विद्यार्थी, अनुशासन सभी जीवन दर्शन के आलोक में क्रियान्वित होते हैं। अतः यह पूर्णतया स्पष्ट है कि इन सभी शिक्षा के अंगों का विकास तत्त्व मीमांसा के आधार पर होता है।

विविध दर्शन की तात्त्विक विवेचना हमें बताती है कि विविध दर्शन चाहे वह आदर्शवाद, प्रकृतिवाद,  प्रयोजनवाद, अस्तित्ववाद कोई भी हो। तत्त्व मीमांसा में उसकी व्याख्या का प्रभाव इनके शैक्षिक उद्देश्यों व इसके अन्य अंगों पर पड़ता है जिसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा के विविध घटक

Metaphysics and various components of education

शिक्षा के विविध घटकों की तत्त्व मीमांसात्मक विवेचना निम्न शिक्षा के उद्देश्य स्व आलोक में प्रस्तुत करती दीख पड़ती है –

A – शिक्षा के उद्देश्य –

01 – शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य / Social objectives of education – सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा इस प्रकार करती है जिससे मानव समाज से सामंजस्य बिठाकर समाज ,राज्य, राष्ट्र सबकी प्रगति में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। बॉसिंग महोदय कहते हैं कि

“The function of education is concerned to be the adjustment of man to environment and that the most enduring satisfaction may accrue (अक्रू= अर्जित) to the individual and to the society.”

“शिक्षा का कार्य मनुष्य को पर्यावरण के अनुरूप ढालना है और यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति और समाज दोनों को ही सबसे स्थायी संतुष्टि प्राप्त हो।”     

02 – व्यक्तित्त्व का पूर्ण विकास / Complete development of personality – शिक्षा के द्वारा समग्र क्षमताओं का सम्यक विकास होना चाहिए जैसा कि गांधीजी ने कहा –

“By education I mean an all round drawing out of the best in child and man – body, mind and spirit.”

“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के भीतर की सर्वोत्तम विशेषताओं – शरीर, मन और आत्मा – को समग्र रूप से बाहर निकालना है।”

03 – चारित्र, ज्ञान व स्वस्थ आदतों का विकास /Development of character, knowledge and healthy habits. – इस तरह के विकास से सामान्यतः सभी दार्शनिक सहमति रखतेहैं जैसाकि ड्रेवर महोदय का विचार है –

“Education is a process in which and by which the knowledge, character and behavior of the young are shaped and molded.”

“शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा युवाओं के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को आकार दिया जाता है।”

04 – पूर्ण जीवन की तैयारी का उद्देश्य / The purpose of preparing for a fulfilling life –

हर्बर्ट की तरह कई विद्वान् पूर्ण जीवन की तैयारी पर बल देते हैं जैसाकि डीवी महोदय ने भी कहा –

“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”

“शिक्षा व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने परिवेश को नियंत्रित करने और अपनी संभावनाओं को पूरा करने में सक्षम बनाएंगी।”

05 – समग्र व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य / Aim for holistic personal development – बालक में निहित गुणों के विकास की बात विविध दर्शन करते हैं इन्ही विचारों से सहमति जताते हुए विवेका नन्द जी कहतेहैं –

“Education is the manifestation of perfection already in man”

“शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”

06 – सभी स्थितियों में सामंजस्यपूर्णता का उद्देश्य / Aim for harmony in all situations –

जीविकोपार्जन की क्षमता हासिल करना हो या प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को ढालना, शिक्षा और इससे जुड़े दर्शनों की तात्त्विक विवेचना उसे सामंजस्यपूर्ण बनाने पर जोर देती है। जैसा कि रबीन्द्र नाथ टैगोर के इन शब्दों से दृष्टिगत होता है। –

“The highest education is that which does not merely give us information but makes our life in harmony with all existence.”

“सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंज स्यपूर्णबनाती है।”

B- शिक्षा का पाठ्यक्रम / Curriculum of education –

जहाँ आदर्शवादी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के साथ नैतिकता को पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं वहीं प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में स्वानुभव विविध विज्ञान, गणित आदि के स्थापन के साथ इन्द्रिय प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं। प्रयोजनवादी सामाजिक तात्कालिक समस्याओं से सम्बंधित विषयों का चयन करना चाहते हैं।

C – शिक्षण विधियाँ / Teaching methods —

आदर्शवादी – प्रवचन, कहानी कथन, दृष्टान्त, तर्क विधि  

प्रकृतिवादी – स्वानुभव, इन्द्रिय प्रशिक्षण, खेल विधि, भ्रमण द्वारा  

प्रयोजनवादी – करके सीखना, प्रयोगात्मक विधि, अन्वेषण, संश्लेषण, प्रदर्शन

D –   अध्यापक /Teacher —

आदर्शवादी –  आदर्श, विशिष्ट ज्ञानी  

प्रकृतिवादी –  परदे के पीछे / केवल वातावरण बनाने वाला / अधिगम प्रकृति द्वारा 

प्रयोजनवादी –  मित्र व पथ प्रदर्शक

E – शिक्षार्थी / Student   —

आदर्शवादी –  अनुकरण प्रधान, आज्ञा पालक  

प्रकृतिवादी –  स्वेच्छाचारी, प्रकृति अनुगामी   

प्रयोजनवादी – मित्र

F – अनुशासन / Discipline   —

आदर्शवादी –  कठोर अनुशासन, आज्ञा पालक   

प्रकृतिवादी –  प्राकृतिक अनुशासन    

प्रयोजनवादी – स्व अनुशासन

       

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दर्शन

METAPHYSICS / तत्त्व मीमांसा

December 19, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

Philosophy and Its Branches / दर्शन व इसकी शाखाएं –

दर्शन के लिए अंग्रेजी में जो शब्द आता है वह है Philosophy और इस शब्द का आशय है ज्ञान के प्रति गहन अनुराग (Love of Wisdom) अर्थात दर्शन का जन्म जिज्ञासा से होता है लेकिन भारत के बारे में माना जाता है कि यह जीवन व जगत के असीम दुःख जैसी व्यावहारिक समस्या से छुटकारा दिलाने का साधन है। प्रोफ़ेसर रमन बिहारी लाल के शब्दों में –

“दर्शन शास्त्र ज्ञान की वह शाखा है जिसमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के अन्तिम सत्य एवं मानव के वास्तविक स्वरुप, सृष्टि -सृष्टा, आत्मा -परमात्मा, ज्ञान -अज्ञान, ज्ञान प्राप्त करने की विधियों और मानव जीवन के अन्तिम उद्देश्य तथा उसे प्राप्त करने के साधनों की तार्किक विवेचना की जाती है।”

“Philosophy is that branch of knowledge. In which the ultimate truth of the entire universe and the true nature of man, the creation-creator, soul-God, knowledge-ignorance, methods of acquiring knowledge and the ultimate aim of human life and the means to achieve it are logically discussed.”

इस सम्बन्ध में सिसरो महोदय का विचार है कि –

“Philosophy, thou director of our lives, Thou friend of virtue and enemy to vice,

 What were we, what were the life of man at all but for thee! “

“दर्शनशास्त्र, हे हमारे जीवन के निर्देशक, हे सद्गुणों के मित्र और दुर्गुणों के शत्रु,

 तेरे बिना हम क्या होते, मनुष्य का जीवन क्या होता!”

असल में दर्शन का क्षेत्र इतना व्यापक है कि बिना इसकी शाखाओं को समझे इसे समझना दुष्कर है। इसकी शाखाएं हैं –

01 – तत्त्व मीमांसा (Metaphysics)

02 – ज्ञान मीमांसा (Epistemology)

03 – मूल्य मीमांसा (Axiology)

                                                                    तत्त्व मीमांसा (Metaphysics)

                              दर्शनशास्त्र की वह  शाखा जो वास्तविकता, अस्तित्व और ब्रह्मांड की मौलिक प्रकृति का अन्वेषण करती है। तत्त्व मीमांसा कहलाती है यह भौतिक विज्ञानों से परे, समय, स्थान, कारणता, संभावना व अस्तित्व जैसे विषयों से जुड़े प्रश्नों के उत्तर खोजने का प्रयास करती है। यह ‘क्या ?’ और ‘क्यों ?’ जैसे प्रश्नों का उत्तर तलाश करती है, इसमें भौतिक दुनिया से परे जाकर परम सत्य और अस्तित्व के सिद्धांतों को समझने का प्रयास किया जाता है ।

                       तत्त्वमीमांसा को Metaphysics कहते हैं  इसमें मेटा से आशय है ‘परे’ व फिजिक्स से आशय है ‘भौतिक दुनिया’ । इस प्रकार Metaphysics से आशय हुआ भौतिक विज्ञान से परे जाकर विविध सिद्धांतों को समझने का प्रयास।

                  तत्त्व मीमांसा में सृष्टि शास्त्र (Cosmogony), सृष्टि विज्ञान (Cosmology) व सत्ताविज्ञान (Ontology) आते हैं इसमें आत्मा सम्बन्धी तत्त्व ज्ञान (Metaphysics of the Soul) व ईश्वर सम्बन्धी तत्त्व ज्ञान (Theology) भी समाहित है।

तत्त्व मीमांसा की समस्याएं (Problems of Metaphysics) –

01 – ब्रह्माण्ड का निर्माण

02 – ब्रह्माण्ड का स्वरुप

03 – ब्रह्माण्ड का मूल तत्त्व

04 – ब्रह्माण्ड का अन्तिम सत्य

05 – सृष्टि क्या और इसका निर्माण कैसे?

06 – अस्तित्व की प्रकृति

07 – सृष्टि का प्रयोजन

08 – आत्मा परमात्मा सम्बन्धी तत्त्व

09 – मानव जीवन का अन्तिम उद्देश्य

10 – अन्तिम उद्देश्य की प्राप्ति कैसे?

तत्त्व मीमांसा के प्रकार –

इस मीमांसा में तत्त्व से जुड़े मूलभूत प्रश्नों के उत्तर तलाशते हुए बढ़ने पर इसके निम्न रूपों का अध्ययन आवश्यक जान पड़ता है।

01 – तत्त्व विज्ञान (Ontology)

02 – विश्व विज्ञान (Cosmology)

03 – ईश्वर विज्ञान (Theology)

                                               तत्त्व विज्ञान (Ontology)

                                  इसमें द्रव्य को सत्य स्वीकार किया जाता है और यह माना जाता है कि विश्व द्रव्य से बना है द्रव्य को सत्य मानने वाली इस व्यवस्था की तत्त्व मीमांसा की विशेषता को इस प्रकार क्रमित कर सकते हैं।

01 – मूल तत्व द्रव्य

02 – ब्रह्माण्ड प्राकृतिक

03 – द्रव्य में परिवर्तन का कारण वाह्य ऊर्जा

04 – भौतिक संसार सत्य

05 – तत्त्व विज्ञान ही प्रकृति विज्ञान 

06 – अध्यात्म और ईश्वर पर अविश्वास

07 – मानव जीवन उद्देश्य सुख प्राप्ति             

08 – ज्ञानेन्द्रिय व यथार्थ महत्त्व पूर्ण

09 – नैतिक मूल्यों की जगह परिस्थिति नियन्त्रण आवश्यक

                      तत्व विज्ञान के प्रमुख सिद्धान्त (Main Principles of Ontology) –

इसके प्रमुख या आधारभूत सिद्धान्तों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

01 – भौतिक वाद

02 – अध्यात्मवाद

      (i) आत्मनिष्ठ अध्यात्म वाद

      (ii) वस्तुनिष्ठ प्रत्ययवाद

      (iii) निरपेक्ष अध्यात्मवाद

03 – द्वैतवाद (Dualism)

04 – तटस्थ वाद (Neutralism)

05 – निरपेक्ष वाद (Absolutism)

06 – अनेकत्व वाद (Pluralism)

07 – एकत्व वाद (Monism)

विश्व विज्ञान (Cosmology) –

आज सारा विश्व विकास की ओर उन्मुख है ऐसे में इससे सम्बन्धित समस्याएं को यथार्थ मानना सत्य या सम्यक जान पड़ता है, इसका अध्ययन क्षेत्र संसार की उत्पत्ति से सम्बन्धित है, विकासवाद में वैश्विक समस्याएं को यथार्थ मानने वाले विश्व विज्ञान की विशेषता को इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है।

01 – प्रकृति ने विश्व बनाया

02 – सृष्टि का निर्माता ईश्वर

03 – ईश्वर अनन्त व सर्व व्यापी

04 – वैश्विक जीवों में विविधता व विषमता

05 – लिंग भेद की सर्वव्यापकता

06 – मूल रूप में विश्व अपरिवर्तनशील

07 – ईश्वर कृत गुण क्रमिक नहीं

विश्व विज्ञान के प्रमुख सिद्धान्त (Main Principles of Cosmology) –

(01) – सृष्टिवाद व विकास वाद (Creationism and Evolutionism)

(02) – डार्विन का विकास सिद्धान्त (Darwin’s theory of evolution)

        विकास क्रम नियम

        (i) – जीवन संघर्ष / Struggle for existence

        (ii) – आकस्मिक परिवर्तन / Chance Variation

        (iii) – योग्यतम की रक्षा / Survival of the fittest

        (iv) – आनुवांशिकता / Heredity

ईश्वर विज्ञान /THEOLOGY

यह विज्ञान ईश्वर को अन्तिम सत्य मानता है यह विज्ञान ईश्वर सम्बन्धी अवधारणाओं, प्रश्नों, समस्याओं से सम्बन्धित है।

ईश्वर विज्ञान की विशेषताएं / Features of theology –

 इसकी विशेषताओं को इस प्रकार क्रम बद्ध किया जा सकता है –

01 – ईश्वर अमूर्त

02 – ईश्वर अनन्त व पूर्ण

03 – ईश्वर – विश्व का आदि अन्त

04 – ईश्वरीय सत्ता द्वारा विश्व सञ्चालन

05 – ईश्वर सर्वत्र व्याप्त

06 – केवल ईश्वर सत्य

07 – समस्त वैश्विक प्रक्रियाओं में ईश्वरीय हस्तक्षेप

08 – ईश्वर समय स्थान से परे

09 – विश्व का सृजक व पालन कर्त्ता ईश्वर

ईश्वर विज्ञान के प्रमुख सिद्धान्त (Main Principles of Theology) –

ईश्वर से सम्बन्धित प्रश्नों की मीमांसा निम्न सिद्धांतों पर अवलम्बित है।

01 – एकेश्वर वाद (Monotheism)

      (i) तटस्थ ईश्वर वाद (Deism)

      (ii) सर्वेश्वर वाद (Pantheism)

      (iii) ईश्वर वाद (Theism)

      (iv) अन्तरातीत ईश्वर वाद (Panentheism)

02 – द्वैतेश्वर वाद (Ditheism)

03 – अनेकेश्वर वाद (Polytheism)

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Uncategorized•शोध

QUESTIONNAIRE

December 15, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

QUESTIONNAIRE (प्रश्नावली)

प्रश्नावली उस क्रमबद्ध तालिका को कहा जाता है जो वांछित विषयवस्तु के सम्बन्ध में विविध सूचनाएं अर्जित करने में योग देती है। इसके माध्यम से उद्देश्य समर्पित  प्रश्नों का एक क्रम बना लिया जाता है जो आवश्यक सूचनाएं एकत्रित करने हेतु आवश्यक होता है। प्रसिद्द विद्वान लुण्डबर्ग महोदय के अनुसार –

“मूल रूप में प्रश्नावली उत्तेजनाओं का समूह है जिनके प्रति शिक्षित व्यक्तियों को दिखाया जाता है। जिससे इन उत्तेजनाओं के प्रति उनके मौखिक व्यवहार का निरीक्षण किया जा सके।”

“Fundamentally, the questionnaire is a set of stimuli of which literate people are exposed in order to observe their verbal behaviour under these stimuli.”

 – G.A.Lundberg, op. cit., p183

एक अन्य विद्वान् गुड व हैट महोदय के अनुसार –

“प्रश्नावली एक प्रकार का उत्तर प्राप्त करने का साधन है, जिसका स्वरुप ऐसा होता है कि उत्तरदाता उसकी पूर्ति स्वयं करता है।”

“In general the word questionnaire refers to a device for securing answers to questions by using a form which the respondent fills in himself.”  – Goode & Hatt.

एक भारतीय चिन्तक आर० ए ० शर्मा महोदय के अनुसार

“प्रश्नावली के अन्तर्गत प्रश्नों की सूची या कथनों की सूची को सम्मिलित किया जाता है। न्यादर्श के सदस्यों को प्रश्नों का उत्तर स्वयं भरना होता है सदस्य अपनी विचारधारा, अभिवृत्ति,तथा परिचित सूचनाओं तथा तथ्यों को स्वयं अंकित करते हैं ।”

“The questionnaire consists of a series of questions or statements of which respondents are asked to respond the questions frequently asked for facts of the opinions or preferences of the respondents.”

उक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि प्रश्नावली प्राविधि अधिक वैध व विश्वसनीय है क्योंकि इसमें प्रश्नों के उत्तर स्वयं उन सदस्यों द्वारा अंकित किये जाते हैं। शोधार्थी प्रदत्तों के सङ्कलन हेतु इस प्राविधि का प्रयोग करते हैं।

अच्छी प्रश्नावली की विशेषताएं / Characteristics of a good questionnaire –

एक अच्छी प्रश्नावली में निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए –

01 – प्रश्नावली के महत्त्व बताने वाला विनम्र मुख पत्र (cover letter)

02 – सम्यक निर्देशन

03 – एक विचार एक प्रश्न

04 – संक्षिप्त व बोधगम्य

05 – सार्थक सूचना संग्रहण में सक्षम

06 – स्वच्छ, सुन्दर त्रुटि रहित छपाई 

07 – वस्तुनिष्ठ व निष्पक्ष

08 – प्रश्न क्रम सरल से कठिन

09 – द्विअर्थी, दुष्कर व अप्रिय कथनों से रहित

10 – उद्देश्य केन्द्रित प्रश्नमाला

प्रश्नावली के प्रकार / Types of Questionnaire –

01 – प्रतिबन्धित प्रश्नावली

02 – अप्रतिबन्धित प्रश्नावली

03 – चित्रमयी प्रश्नावली

04 – मिश्रित प्रश्नावली

प्रश्नावली निर्माण सम्बन्धी विविध प्रमुख तथ्य(Various important facts related to questionnaire preparation) -

01 – उद्देश्य आधारित स्वरुप निर्धारण

02 – सम्यक प्रश्नावली लेखन

03 – विज्ञ जनों व तत्सम्बन्धी सहयोगियों का सहयोग

04 – प्राथमिक परीक्षण

05 – त्रुटिहीन उत्तम छपाई

प्रश्नावली के गुण –

01 -विस्तृत क्षेत्र से सूचना प्राप्ति सम्भव

02 – दुरूह क्षेत्रों के लोगों से भी सम्पर्क सम्भव

03 – मितव्ययी

04 – सोचने विचारने का सम्यक समय

05 – वस्तुनिष्ठता

06 – साक्षात्कार के दोषों से मुक्ति

07 – पूर्ण स्पष्ट निर्देश

08 – सम्यक वर्गीकरण सम्भव

09 – विश्वसनीय व वैध

10 – सांख्यकीय विश्लेषण सुगम

प्रश्नावली के दोष –

01 – विस्तृत प्रश्नावली

02 – भ्रम पूर्ण शब्दावली 

03 – वस्तुनिष्ठता का अभाव

04 – असंगत क्रम

05 – छपाई की कमियाँ

06 – व्यापकता का अभाव

07 – असुविधाजनक क्रम से अंकन मूल्याङ्कन दुष्कर

08 – सम्यक निर्देश अभाव

09 – एक पक्षीय

प्रश्नावली के विविध गुण, दोषों व विविध उपादानों का सम्यक विवेचन से यह पूर्णतया स्पष्ट है कि कतिपय कमियों के साथ यह एक समंक संग्रहण का उत्तम विकल्प है।

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शोध

Item analysis

December 10, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पद विश्लेषण (Item analysis)

पद विश्लेषण उद्देश्य समर्पित पदों के सङ्कलन की एक व्यावहारिक व्यवस्था है। इसके अनुसार सम्यक पदों का संग्रहण किया जाता है और कमजोर पदों को व अनावश्यक पदों को हटा दिया जाता है पद विश्लेषण के माध्यम से उद्देश्य समर्पित पदों को एकत्रित कर लिया जाता है। इस प्रकार की विशेषता वाले पदों का एकत्रीकरण करते हैं जिससे परीक्षण के उद्देश्यों की प्राप्ति सम्भव हो सके। परीक्षण के उद्देश्य इन तथ्यों पर अवलम्बित होते हैं।

1 – अभ्यर्थी चयन

2 – वर्गीकरण

3 – अनुस्थिति प्रदान करना

4 – व्यक्तिगत भिन्नता

5 – पूर्व कथन

6 – प्रगति सुनिश्चयन

पद विश्लेषण के कार्य (Functions of Item Analysis) – पद विश्लेषण के द्वारा जिन कार्यों को सम्पादित किया जाता है उन्हें इस प्रकार क्रम प्रदान किया जा सकता है।

1 – अपेक्षित पदों का चयन

2 – अनुपयुक्त पद निरस्तीकरण

3 – पद परिमार्जन

पद विश्लेषण की आवश्यकता क्यों ? - Why is there a need for phrase analysis?

परीक्षण जितना सशक्त और व्यवस्थित होगा उतना ही वह अच्छे परिणाम देने में समर्थ होगा। इसीलिए परीक्षण तैयार करते समय प्रत्येक पद को पद विश्लेषण के माध्यम से उद्देश्य समर्पित करने की आवश्यकता महसूस होती है। उद्देश्य पूर्ति हेतु वैध व विश्वसनीय पदों की आवश्यकता महसूस की जाती है अतः पूरा परीक्षण व्यवस्थित व उत्तम बनाने हेतु निम्न वजह से पद विश्लेषण की आवश्यकता की गहनतम अनुभूति होती है –

1 – सम्पूर्ण परीक्षण को प्रतिनिधि कारी बनाने हेतु

2 – द्विअर्थी व कमजोर पद हटाने हेतु

3 – निर्धारित पद संख्या हेतु आवश्यक चयन

4 – समस्या निदानीकरण हेतु स्पष्ट संकेत देने हेतु

5 – कठिनाई स्तर बोध

6 – विभेदकारी क्षमता निर्धारण

7 – समानान्तर प्रारूप तैयार करने हेतु

8 – शक्ति परीक्षण हेतु पद विश्लेषण आवश्यक, गति परीक्षणों हेतु नहीं

9 – सांख्यिकीय विशेषता का आधार ले तर्क संगत परीक्षण निर्माण हेतु 

पद विश्लेषण की विशेषताएं (Characteristics of Item Analysis) –

01 – उद्देश्यानुसार पद चयन

02 – प्रत्येक पद की वास्तविक स्थिति की जानकारी

03 – निर्देशों की अस्पष्टता का निदान

04 – परीक्षार्थियों की क्षमता का पूर्ण ज्ञान

05 – उपयुक्त शिक्षण विधि चयन में सहायक

06 – लम्बी परीक्षाओं को सारगर्भित संक्षिप्त रूप देना

07 – मापन हेतु उपयुक्त परीक्षण की प्राप्ति सम्भव

08 – चक्रीय प्राविधि

09 – सांख्यिकीय विश्लेषण सुगम

10 – ध्येय परक परीक्षण निर्माण सम्भव





 
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काव्य

महाकाल तुम मत आना…

November 18, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे।

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे।

पथ में कांटे बहुत वो तुमको चुभ जाएंगे,

धुल धूसरित घर है मेरा, हम शरमायेंगे।

घर पर आसान नहीं, कहाँ हम बैठाएंगे,

जो भी कमी रहेगी, फिर हम पछताएंगे।

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे।

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे ।1।

जाड़े में कभी ना आना, नाथ हम घबराएँगे,

बहुत गहन अन्धकार, न रौशन कर पाएंगे।

अति तीव्र है शीत बयार न रक्षा कर पाएंगे,

छप्पर में पड़ी दरार न उसको भर पाएंगे।    

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे।

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे ।2।

ठिठुरेंगे हम साथ, तुम्हें भी ठिठुराएँगे,

बारिश करती लाचार तुझे कैसे ढक पाएंगे।

गर तुम पर पानी पड़ा जीते जी मर जाएंगे,

प्रभु रहना निज धाम, तुझे हम लख पाएंगे।                               

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे।

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे ।3।

गरमी में मत आना, पाँव सब जल जाएँगे,

पथ है इतना दुष्कर, छाले पड़ जाएंगे।

हे नाथों के नाथ, क्या हम मुख दिखलाएंगे,

है केवल तेरा नाम, उसी से तर जाएँगे।                                       

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे।

महाकाल तुम मत आना, हम ही आएंगे ।4।

              

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काव्य

दुश्मन से रण होगा। 

November 16, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बोलो भाई अब क्या होगा, क्या होगा हाँ क्या होगा ?

अब दुश्मन से रण होगा, औ सुनो महा भीषण होगा ।

कब तक भारत माता का, यूँ लहू बहाया जाएगा । 

निर्दोष मासूम नागरिक को, आखिर कब तक वो खायेगा।

कब तक जन गण के मन को, गुमराह कराया जाएगा।

जो लहू गिरा इस धरती पर, उसका हिसाब कब आएगा।

मारने वालों का क्या होगा, क्या न्यायिक पक्ष सबल होगा।     

देखें खल-बल कितना होगा। घात,  प्रतिघात प्रबल होगा ।

बोलो भाई अब क्या होगा, क्या होगा हाँ क्या होगा ?

अब दुश्मन से रण होगा, औ सुनो महा भीषण होगा ।01।

कब तक बुद्ध के भारत को,छद्म रण से लड़ दहलायेगा।

कब तक जाँबाज़ के सीने पर, छल ज़ख्म लगाया जाएगा।

कब तक भारतीय जनमानस को यूँ ही फुसलाया जाएगा।

मेरे भारत के दुश्मन को, कब धरती से मिटाया जाएगा 

ज़ख्मों में ध्यान से  देखोगे, कितना लावा उबला होगा।

जब पिघला ये लावा बरसेगा, खल सोचे तब क्या होगा।

बोलो भाई अब क्या होगा, क्या होगा हाँ क्या होगा ?

अब दुश्मन से रण होगा, औ सुनो महा भीषण होगा ।02।

कायरता उसने समझा है, बार बार समझाने को,

श्वान दुम है जग – जाहिर, हरगिज न सीधा होगा।

जब दुनियाँ के नक़्शे से, बदनुमां दाग मिट जाएगा,

दुनियाँ देखेगी उसको, वो दिन कितना सुन्दर होगा।

जब वतन के इन गद्दारों का, टुकड़ा टुकड़ा मिट जाएगा।

भारत का मुकद्दर चमकेगा और यहां अमन आ जाएगा।  

बोलो भाई अब क्या होगा, क्या होगा हाँ क्या होगा ?

अब दुश्मन से रण होगा, औ सुनो महा भीषण होगा ।03।

दिल्ली में धमाका कर उसने शायद ये सोचा होगा,

पुनः डोज़ियर आएगा, दुनियाँ को फिर धोखा होगा।     

अब की रण में सारे छल का, हिसाब चुकता हो जाएगा।       

छल के बल पर मानवता को, कब तक वो मिटाता जाएगा।

धर्म की आड़ में अधर्म का, नाटक यह महँगा होगा।

दामन पे दाग जो लगा दिए ,सारा हिसाब देना होगा।

बोलो भाई अब क्या होगा, क्या होगा हाँ क्या होगा ?

अब दुश्मन से रण होगा, औ सुनो महा भीषण होगा ।04।

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