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विविध•शिक्षा

TEACHING STRATEGY

January 12, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रश्न – शिक्षण व्यूह रचना से  समझते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। शिक्षण व्यूह रचनाओं के प्रकार बताइए।

Question – What do you understand by teaching strategy? Describe its main characteristics. Explain the types of teaching strategies.

शिक्षण व्यूह रचना से आशय / Meaning of teaching strategy-

शिक्षण व्यूह रचना से आशय शिक्षक द्वारा बनाई गई उस योजना से है जो वह अधिगम को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए बनाता है। रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर शिक्षण व्यूह रचना के बारे में कहा –

“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”

आंग्ल अनुवाद

“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”

शिक्षण व्यूह रचना सचमुच अधिगम को प्रभावी बनाने का कारगर उपाय है। इसी लिए ई स्टॉंस व मौरिस (1972) ने अपनी पुस्तक टीचिंग प्रैक्टिस प्रॉब्लम्स एण्ड पर्स्पेक्टिव्स में कहा –

“शिक्षण व्यूह रचना से तात्पर्य किसी पाठ के शिक्षण हेतु अपनाई गई उस सामान्यीकृत योजना से है जिसमें संरचना, अनुदेशनात्मक उद्देश्यों के रूप में वांछित विद्यार्थी व्यवहार तथा व्यूह रचना को प्रयोग में लाने के लिए आवश्यक युक्तियों की रूपरेखा का समावेश हो।”

“Teaching strategy is a generalized plan for a lesson which includes structure, desired learner behaviour in terms of goals of instruction and an outline of planned tactics necessary to implement the strategy.”

शिक्षण व्यूह रचना की प्रमुख विशेषताएं/ Special features of teaching strategy –   

01 – इसके माध्यम से पाठ के निर्धारित उद्देश्य प्राप्ति सुगम हो जाती है।

02 – शिक्षण व्यूह रचना के माध्यम से अधिगम प्रभावी व विशेष उद्देश्यों के प्रति समर्पित किया जा सकता है।

03 – शिक्षण व्यूह रचना द्वारा अधिगम पूर्ण होता है कोइ अंश छूट नहीं पता।

04 – शिक्षण युक्ति के माध्यम से शिक्षण आव्यूह को सशक्त बनाया जाता है।

05 – इसमें प्रमुख ध्यान अधिगम उद्देश्य की प्राप्ति पर रहता है जो अनुशासन की व्यवस्था स्वयमेव कर देता है।

06 – अलग अलग तरह के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर एक ही पाठ के लिए पृथक शिक्षण व्यूह रचना है।

07 – शिक्षार्थियों द्वारा मिलने वाले पृष्ठ पोषण के आधार पर शिक्षण व्यूह रचना में परिवर्तन किया जाता है। 

08 – इसका लचीलापन इसे विविध परिस्थितियों में सफल बनाता है।

09 – इसमें शिक्षार्थी, शिक्षण अधिगम उद्देश्य व शिक्षण व्यूह रचना का व्यावहारिक संतुलन दृष्टव्य होता है।

10 – इसमें आवश्यकता, रुचियाँ, अधिगम परिस्थितियों और सुविधाओं का सम्यक सम्मिश्रण मिलता है।  

शिक्षण व्यूह रचना के प्रकार / Types of teaching strategies –

भारत में अध्यापन एक परम पवित्र कार्य है इसकी व्यूह रचना जिस तरह की जाती है उसमें देखा जा सकता है एक में अध्यापक अधिनायक की तरह से कार्य करता दीखता है और दूसरे में व्यूह रचनाएं जनतांत्रिक रूप से किया जाता है दोनों आधार पर बनने वाली विविध व्यूह रचनाओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

[A ] – अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचनाएं –

01 – व्याख्यान व्यूह रचना / Lecture Strategy

02 – वर्णन व्यूह रचना / Narrative Strategy

03 – विवरण व्यूह रचना / Description Strategy

04 – व्याख्या व्यूह रचना / Explanation Strategy

05 – प्रदर्शन व्यूह रचना / Demonstration Strategy

06 – ट्यूटोरियल व्यूह रचना / Tutorial Strategy

07 – दृष्टांत व्यूह रचना / Illustrations Strategy

08 – अभिक्रमित अनुदेशन व्यूह रचना / Programmed Instruction Strategy

09 – भूमिका व्यूह रचना / Introduction Strategy

10 – पुनः अवलोकन व्यूह रचना / Review Strategy

11 – स्पष्टीकरण व्यूह रचना / Explanation Strategy

[B] – जनतान्त्रिक शिक्षण व्यूह रचनाऐं / Democratic Teaching Strategies –

01 – सामूहिक चर्चा व्यूह रचना / Group discussion strategy

02 – समस्या समाधान व्यूह रचना / Problem solving strategy

03 – प्रश्नोत्तर व्यूह रचना / Question and Answer Layout

04 – स्वाधीन अध्ययन व्यूह रचना / Independent Study Strategy

05 – ह्यूरिस्टिक अथवा अनुसंधान व्यूह रचना / Heuristic or Research Strategy

06 – परियोजना व्यूह रचना /  Project Strategy

07 – भ्रमण व्यूह रचना / Tour Strategy

08 – दत्त कार्य व्यूह रचना / Assignment Strategy

09 – भूमिका निर्वाह व्यूह रचना / Role Play Strategy

10 – अभ्यास कार्य व्यूह रचना / Practice Strategy

11 – दृश्य श्रव्य साधन उपयोग व्यूह रचना / Strategy for using audio-visual aids

12 – संवेदना प्रशिक्षण व्यूह रचना / Sensory Training Strategy

13 – मस्तिष्क उद्वेलन व्यूह रचना / Brain Stimulation Strategy

14 – कम्प्यूटर सह – अनुदेशन व्यूह रचना / Computer Assisted Instruction Strategy

उक्त सम्पूर्ण व्यूह रचनाएं यह उद्घोषणा करती हैं कि शिक्षा को समय के साथ चलने के लिए इन व्यूह रचनाओं का सम्यक प्रयोग आवश्यक है और प्रशिक्षण महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे सूक्ष्म शिक्षण की तरह तैयारी करानी होगी।     

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विविध•शिक्षा

LECTURE STRATEGY

January 10, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

व्याख्यान व्यूह रचना

भारत में व्यूह शब्द आते ही अभिमन्यु का स्वाभाविक ध्यान आता है जो चक्र व्यूह का अन्तिम द्वार तोड़ने में इस लिए असफल रहा क्योंकि उसको भेदन का ज्ञान मिल नहीं पाया था ठीक इसी तरह यदि अध्यापक शिक्षण अधिगम को प्रभावी बनाना चाहता है तो सही व्यूह रचना परम आवश्यक है अपने उद्देश्य के साथ सम्पूर्ण तत्सम्बन्धी ज्ञान उसके पास होता है एक सही व्यूह रचना उसे अवश्य उद्देश्य प्राप्ति में सफल बनाएगी।

रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर बताया –

“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”

आंग्ल अनुवाद

“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”

व्याख्यान व्यूह रचना से आशय / Meaning of lecture strategy –

 आदिकाल से भारत में इस व्यूह रचना का प्रयोग होता रहा है पहले गुरु चबूतरे पर बैठकर और शिष्य भूमि पर बैठ कर इसका लाभ लेते रहे हैं। आज विद्यार्थी बैठ कर और अध्यापक खड़े होकर इस व्यूह रचना का लाभ लेते हैं। यद्यपि इसकी गणना अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचना के तहत आती है लेकिन इसके माध्यम से सम्पूर्ण अधिगम परिक्षेत्र से शिक्षार्थी का परिचयीकरण ही नहीं बल्कि साक्षात्कार हो जाता है और वे अपनी पात्रता के अनुसार उसे अधिगमित करते हैं। व्याख्यान व्यूह रचना एक महत्त्वपूर्ण व्यूह रचना है इस सम्बन्ध में रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकीके 2014 के संस्करण में पृष्ठ 243 पर बताया –

“व्याख्यान व्यूह रचना से अभिप्राय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाये जाने वाले ऐसे प्रारूप या कार्य योजना से है जिसके द्वारा वह किसी विषय विशेष के एक अंश या इकाई को इस प्रकार प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है ताकि विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक एवं भावात्मक व्यवहार से सम्बन्धित विशिष्ट शिक्षण अधिगम उद्देश्यों की उपलब्धि ठीक प्रकार की जा सके।”

“Lecture strategy” means a format or plan of action designed and used by a teacher. By which he tries to present a part or unit of a particular subject in such a way So that specific teaching-learning objectives related to the cognitive and emotional behaviour of students can be achieved properly.”

व्याख्यान व्यूह रचना से लाभ / Benefits of Lecture Strategy –

वह व्यूह रचना जो तमाम आलोचनाओं से जूझ कर अधिगमार्थियों व शिक्षाविदों को लाभ दे रही है उसके लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

01 – शिक्षण गतिविधियों पर स्वइच्छानुसार अंकुश / Voluntary control of teaching activities

02 – सृजनात्मकता, विश्लेषण व मूल्याङ्कन हेतु सम्यक चिंतन का विकास / Developing critical thinking for creativity, analysis, and evaluation

03 – मितव्ययी व्यूह रचना / Economical strategy

04 – प्रेरणात्मक वातावरण सृजन में सहयोगी / Helps create an inspiring environment

05 – लचीलापन / Flexibility

06 – विचारों, अवधारणाओं की श्रंखलाबद्ध प्रस्तुति सम्भव / Performs a systematic presentation of ideas and concepts

07 – तार्किक नियोजन / Logical planning

08 – व्यक्तित्व के गुणों की छाप छोड़ना सम्भव / It is possible to leave an impression of personality traits

09 – व्यवहार के भावात्मक पक्ष को सकारात्मक दिशा देना सम्भव / It is possible to give positive direction to the emotional aspect of behavior

व्याख्यान व्यूह रचना की सीमाएं  / Limitations of Lecture Strategy –

01 – उद्देश्य प्राप्ति नज़र अन्दाज / Neglecting objective achievement –

02 – रूचि, आवश्यकता व योग्यता स्तर का ध्यान नहीं / Not considering interest, need, and ability levels

03 – एक पक्षीय सम्प्रेषण / One-sided communication

04 – प्रयोगात्मक कौशलों व क्रियात्मक गतिविधियों का अभाव / Lack of practical skills and hands-on activities

05 – केवल शाब्दिक सम्प्रेषण की सफलता सन्दिग्ध / The success of verbal communication alone is questionable.

06 – शिक्षण अधिगम से अर्जित अनुभव के प्रयोगीकरण का अभाव / Lack of application of teaching-learning experience.

07 – अपूर्ण व त्रुटिपूर्ण ज्ञान सम्प्रेषण सम्भव / Incomplete and inaccurate knowledge transmission is possible

08 – पुनरावृत्ति व विषय से भटकाव / Repetition and distraction

09 – आवश्यक तैयारी व कुशल सम्प्रेषण का अभाव / Lack of necessary preparation and effective communication

10 – स्मृति स्तर को चिन्तन स्तर से प्रभावी मानना / Believing the memory level as more effective than the thinking level 

व्याख्यान व्यूह रचना को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सुझाव / Suggestions for making Lecture Strategy more effective –

यदि हम सम्पूर्ण व्याख्यान को उसके अलग अलग हिस्सों में बांटे तो यह स्पष्ट होगा कि व्याख्यान में नियोजन, प्रस्तुतीकरण और मूल्याङ्कन के रूप में तीन महत्त्वपूर्ण चरण समाहित हैं। इसलिए इस प्रत्येक चरण में सुधार अपेक्षित होंगेजिन्हे इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है। –

[A] – नियोजन सम्बन्धी सुझाव / Planning tips

01 – पूर्व ज्ञान व विषय वस्तु का सम्बन्ध विवेचन।/ Analysis of the relationship between prior knowledge and subject matter

02 – स्पष्ट उद्देश्य निर्धारण / Crystal Clear objective setting;                             

03 – अधिगम स्तर आधारित सम्प्रेषण / Learning level based communication

04 – विषय वस्तु पर अधिकार / Mastery of the subject matter

05 – आत्मविश्वास युक्त सम्प्रेषण / Confident communication

06 – विविध विश्वसनीय ज्ञान स्रोतों से विषयवस्तु का चयन / Selecting content from a variety of reliable knowledge sources

07 – अधिगम -शिक्षण प्रभावी वातावरण सृजन / Creating an effective learning – teaching environment

08 – रूचि, ध्यान, उत्साह का सम्यक सृजन / Properly cultivate interest, attention and enthusiasm.

09 – विविध विधियों व सहायक साधनों का सम्यक प्रयोग / Properly utilize various methods and aids.

[B] – प्रस्तुतीकरण सम्बन्धी सुझाव / Presentation tips –

01 – प्रभावी अधिगम हेतु निरन्तर सजगता व क्रियाशीलता / Constant alertness and activity for effective learning

02 – उत्साहयुक्त प्रभावी सम्प्रेषण / Enthusiastic and effective communication

03 – क्रमबद्ध व तार्किक आधार / Systematic and logical approach

04 – अधिगम उद्देश्यों पर विशेष ध्यान / Focus on learning objectives

05 – सार्वजनिक संबोधन प्रणाली का उपयोग /use of public address system

06 – आवश्यकतानुसार विविध विधियों का प्रयोग / Use a variety of methods as needed

07 – नवीनतम श्रव्य दृश्य साधनों का प्रयोग / Use the latest audio-visual aids

08 – आवश्यकतानुसार साझेदारी का प्रयोग / Use partnerships as needed

09 – महत्त्वपूर्ण तथ्य व सूचना सम्प्रेषण का रेखाङ्कन / Outline of important facts and information communication

10 – पुनरावृत्ति व भटकाव से सावधान / Beware of repetition and deviation

[C]– मूल्याङ्कन हेतु सुझाव /Evaluation Tips –

01 – स्व सम्प्रेषण मूल्यांकन / Self-Communication Assessment

02 – अधिगम स्तर उन्नयन मूल्याङ्कन/ Learning Level Improvement Assessment

03 – व्याख्यान आधारित अधिगम मूल्यांकन / Lecture-Based Learning Assessment

04 – पक्षपात रहित सम्यक प्रश्न वितरण / Fair, Unbiased Question Distribution

05 – उद्देश्य आधारित मूल्यांकन / Objective-Based Assessment

06 – पृष्ठ पोषण के निर्देशों पर ध्यान / Follow nutrition guidelines

07 – प्रश्नावली या मौखिक प्रश्नों द्वारा / Through questionnaires or oral questions

08 – सतत स्व आलोचनात्मक मूल्यांकन / Continuous self-critical assessment

प्रस्तुत समस्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी कौशल या व्यूह रचना में निरन्तर परिमार्जन की गुन्जायिश बनी रहती है लेकिन अपनी सजगता से इसे काफी प्रभावी बनाया जा सकता है नए सम्प्रत्ययों, विश्वसनीय सूचनाओं, आगामी जानकारियों और नवीनतम ज्ञान का प्रयोग कर व्याख्यान को निरंतर समृद्ध करने की आवश्यकता हमेशा रहेगी। निरन्तर छोटे तथ्यों नवीनतम ज्ञान व तार्किक क्रमबद्ध सम्प्रेषण द्वारा व्याख्यान और प्रभावी बन पड़ेगा। आवश्यकता है विविध परिस्थितियों में सम्यक समायोजन की। 

  

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शिक्षा•शोध

META PHYSICS AND EDUCATION

December 21, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा

ब्रह्माण्ड के यथार्थ स्वरुप और उसमें मनुष्य के जीवन की तात्त्विक विवेचना तत्त्व मीमांसा के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसी के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य और उनकी प्राप्ति के उपाय विवेचित किये जाते हैं और इस आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि जीवन दर्शन के आधार पर समाज के उद्देश्य निर्धारित होते हैं जिन्हें शिक्षा अपना उद्देश्य बना लेती है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षा के विविध अंग सहयोग करते हैं इसीलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण विधि , शिक्षक, विद्यार्थी, अनुशासन सभी जीवन दर्शन के आलोक में क्रियान्वित होते हैं। अतः यह पूर्णतया स्पष्ट है कि इन सभी शिक्षा के अंगों का विकास तत्त्व मीमांसा के आधार पर होता है।

विविध दर्शन की तात्त्विक विवेचना हमें बताती है कि विविध दर्शन चाहे वह आदर्शवाद, प्रकृतिवाद,  प्रयोजनवाद, अस्तित्ववाद कोई भी हो। तत्त्व मीमांसा में उसकी व्याख्या का प्रभाव इनके शैक्षिक उद्देश्यों व इसके अन्य अंगों पर पड़ता है जिसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा के विविध घटक

Metaphysics and various components of education

शिक्षा के विविध घटकों की तत्त्व मीमांसात्मक विवेचना निम्न शिक्षा के उद्देश्य स्व आलोक में प्रस्तुत करती दीख पड़ती है –

A – शिक्षा के उद्देश्य –

01 – शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य / Social objectives of education – सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा इस प्रकार करती है जिससे मानव समाज से सामंजस्य बिठाकर समाज ,राज्य, राष्ट्र सबकी प्रगति में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। बॉसिंग महोदय कहते हैं कि

“The function of education is concerned to be the adjustment of man to environment and that the most enduring satisfaction may accrue (अक्रू= अर्जित) to the individual and to the society.”

“शिक्षा का कार्य मनुष्य को पर्यावरण के अनुरूप ढालना है और यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति और समाज दोनों को ही सबसे स्थायी संतुष्टि प्राप्त हो।”     

02 – व्यक्तित्त्व का पूर्ण विकास / Complete development of personality – शिक्षा के द्वारा समग्र क्षमताओं का सम्यक विकास होना चाहिए जैसा कि गांधीजी ने कहा –

“By education I mean an all round drawing out of the best in child and man – body, mind and spirit.”

“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के भीतर की सर्वोत्तम विशेषताओं – शरीर, मन और आत्मा – को समग्र रूप से बाहर निकालना है।”

03 – चारित्र, ज्ञान व स्वस्थ आदतों का विकास /Development of character, knowledge and healthy habits. – इस तरह के विकास से सामान्यतः सभी दार्शनिक सहमति रखतेहैं जैसाकि ड्रेवर महोदय का विचार है –

“Education is a process in which and by which the knowledge, character and behavior of the young are shaped and molded.”

“शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा युवाओं के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को आकार दिया जाता है।”

04 – पूर्ण जीवन की तैयारी का उद्देश्य / The purpose of preparing for a fulfilling life –

हर्बर्ट की तरह कई विद्वान् पूर्ण जीवन की तैयारी पर बल देते हैं जैसाकि डीवी महोदय ने भी कहा –

“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”

“शिक्षा व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने परिवेश को नियंत्रित करने और अपनी संभावनाओं को पूरा करने में सक्षम बनाएंगी।”

05 – समग्र व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य / Aim for holistic personal development – बालक में निहित गुणों के विकास की बात विविध दर्शन करते हैं इन्ही विचारों से सहमति जताते हुए विवेका नन्द जी कहतेहैं –

“Education is the manifestation of perfection already in man”

“शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”

06 – सभी स्थितियों में सामंजस्यपूर्णता का उद्देश्य / Aim for harmony in all situations –

जीविकोपार्जन की क्षमता हासिल करना हो या प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को ढालना, शिक्षा और इससे जुड़े दर्शनों की तात्त्विक विवेचना उसे सामंजस्यपूर्ण बनाने पर जोर देती है। जैसा कि रबीन्द्र नाथ टैगोर के इन शब्दों से दृष्टिगत होता है। –

“The highest education is that which does not merely give us information but makes our life in harmony with all existence.”

“सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंज स्यपूर्णबनाती है।”

B- शिक्षा का पाठ्यक्रम / Curriculum of education –

जहाँ आदर्शवादी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के साथ नैतिकता को पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं वहीं प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में स्वानुभव विविध विज्ञान, गणित आदि के स्थापन के साथ इन्द्रिय प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं। प्रयोजनवादी सामाजिक तात्कालिक समस्याओं से सम्बंधित विषयों का चयन करना चाहते हैं।

C – शिक्षण विधियाँ / Teaching methods —

आदर्शवादी – प्रवचन, कहानी कथन, दृष्टान्त, तर्क विधि  

प्रकृतिवादी – स्वानुभव, इन्द्रिय प्रशिक्षण, खेल विधि, भ्रमण द्वारा  

प्रयोजनवादी – करके सीखना, प्रयोगात्मक विधि, अन्वेषण, संश्लेषण, प्रदर्शन

D –   अध्यापक /Teacher —

आदर्शवादी –  आदर्श, विशिष्ट ज्ञानी  

प्रकृतिवादी –  परदे के पीछे / केवल वातावरण बनाने वाला / अधिगम प्रकृति द्वारा 

प्रयोजनवादी –  मित्र व पथ प्रदर्शक

E – शिक्षार्थी / Student   —

आदर्शवादी –  अनुकरण प्रधान, आज्ञा पालक  

प्रकृतिवादी –  स्वेच्छाचारी, प्रकृति अनुगामी   

प्रयोजनवादी – मित्र

F – अनुशासन / Discipline   —

आदर्शवादी –  कठोर अनुशासन, आज्ञा पालक   

प्रकृतिवादी –  प्राकृतिक अनुशासन    

प्रयोजनवादी – स्व अनुशासन

       

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शिक्षा

HUNTER COMMISSION [1882-83]

September 17, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

हण्टर कमीशन [1882 – 83]

सन् 1854 के घोषणा पत्र के बाद सन् 1857 में प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम हो गया परिणाम स्वरुप जो 20 वर्ष उपरान्त शिक्षा नीति की समीक्षा होती थी वह न  हो सकी और वुड के घोषणा पत्र की अवहेलना कर सरकार मैकाले के निस्यन्दन सिद्धान्त पर चलती रही जन साधारण की शिक्षा का तिरस्कार हुआ। उत्साह पूर्वक चल रहे शिक्षण प्रशिक्षण कार्यक्रम भी इससे दुष्प्रभावित हुए।

सन् 1882 में ब्रिटिश संसद ने नए गवर्नर जनरल लार्ड रिपन (Ripon) की नियुक्ति की तब जनरल काउन्सिल ऑफ़ एजुकेशन इन इंडिया नामक संस्था के सदस्यों के शिष्ट मण्डल ने भारतीय शिक्षा नीति के सम्बन्ध में उनसे वार्ता की तब उन्होंने आश्वासन दिया और कहा –

“1854 के घोषणा पत्र ने वस्तुतः भारतीय शिक्षा नीति को स्पष्ट एवम् जोरदार शब्दों में निर्धारित कर दिया है और मेरी इच्छा भी उसी नीति पर चलने की है।”

आँग्ल अनुवाद

“The Declaration of 1854 has essentially laid down the Indian educational policy in clear and strong terms and it is my desire to follow the same policy.”

भारतीय शिक्षा आयोग की नियुक्ति / Appointment of Indian Education Commission –

लार्ड रिपन महोदय ने 3 फरबरी 1882 को विलियम हण्टर की अध्यक्षता में प्रथम भारतीय शिक्षा आयोग की स्थापना की, सर विलियम हण्टर गवर्नर जनरल की कार्य कारिणी के सदस्य के रूप में कार्यरत थे। आयोग का अध्यक्ष बनने पर आयोग ने अपने 20 सदस्यों के साथ कार्य का शुभारम्भ किया इसमें 7 भारतीय प्रतिनिधि थे। इस आयोग में मैसूर के शिक्षा सञ्चालक बी एल राइस मन्त्री व पादरी प्रतिनिधि Dr.  W Millar थे। भारतीय प्रतिनिधि भूदेव मुकर्जी, सैय्यद महमूद, आनन्द मोहन बोस, के ० टी ० तेलंग, पी रंगानन्द मुदालियर, महाराजा जितेन्द्र टैगोर व हाजी गुलाम थे।

हण्टर कमीशन का उद्देश्य व कार्य क्षेत्र / Objective and scope of work of Hunter Commission –

 आयोग की नियुक्ति के प्रस्ताव में इसके उद्देश्य की झलक मिलती है यथा –

“कमीशन का कर्त्तव्य होगा, विशेष रूप से इस बात की जाँच करना कि 1854 के घोषणा पत्र के सिद्धान्तों को किस प्रकार कार्यान्वित किया गया है और ऐसे उपायों के सुझाव देना जो उस घोषणा पत्र में निर्धारित नीति को उत्तरोत्तर कार्यान्वित करने हेतु कमीशन के मतानुसार वांछनीय प्रतीत होते हैं।”

“It will be the duty of the commission to enquire particularly into the matter in which effect has been given to the principles of the Dispatch of 1854 ; and to the suggest such measures as it may think desirable in order to further carrying out of the policy therein laid down.”

इसके अतिरिक्त इसे प्राथमिक प्राथमिक शिक्षा की सूक्ष्म जाँच का कार्यभार सौंपा गया। सार रूपेण कमीशन को निम्न कार्य करने थे –

01 – क्या उच्च व माध्यमिक शिक्षा के कारण प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित

02 – प्राथमिक शिक्षा की स्थिति व सम्वर्धन उपाय

03 – राजकीय विद्यालयों की स्थिति व उनकी आवश्यकता

04 – शैक्षिक क्षेत्र में वैयक्तिक प्रयास व सरकारी नीति

05 – शिक्षा व्यवस्था और मिशन स्कूल          

हण्टर आयोग की सिफारिशें व सुझाव / Recommendations and suggestions of Hunter Commission –     आयोग ने भारतीय शिक्षा पर व्यापक दृष्टिकोण से दृष्टिपात किया और विहंगम अवलोकन के उपरान्त अपनी सिफारशों और सुझावों को लेखबद्ध किया लेकिन इसने आँशिक परिवर्तन के साथ 1854 के घोषणा पत्र को ही पुनः  कोई नए तथ्यों का प्रस्तुतीकरण नहीं हुआ। मुख्यतः निम्न अंगों पर ध्यान केंद्रित रहा –

प्राथमिक शिक्षा [Primary Education] – – आयोग ने प्राथमिक शिक्षा नीति, संगठन, आर्थिक व्यवस्था व अध्यापक प्रशिक्षण आदि के सम्बन्ध में निम्न सुझाव व सिफारिशों दीं –

प्राथमिक शिक्षा नीति –

1 – उच्च शिक्षा प्राप्ति का साधन बनाने की जगह यह शिक्षा जन साधारण की शिक्षा प्रसार करे।

2 – व्यावहारिक जीवन में लाभप्रद जीवनोपयोगी विषय शामिल किये जाएँ।

3 – देशी भाषाओं के माध्यम से प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की जाए।

4 – इसे पूर्ण सरकारी संरक्षण प्रदान किया जाए।

5 – लिखने पढ़ने का सामान्य ज्ञान रखने वालों को ही निम्न पदों पर नियुक्ति की जाए।

6 – पिछड़ी जाति व आदिवासियों के शैक्षिक उन्नयन के अनवरत प्रयास की आवश्यकता है।

7 – इस भारतीय शिक्षा आयोग ने स्पष्टतः कहा –

“जन–साधारण की प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था उसका प्रसार और सुधार भी शिक्षा का वह अंग घोषित किया जाए जिसकी और राज्य के सतत प्रयास पहले से भी अधिकाधिक मात्रा में अब केन्द्रीभूत किये जाएं।”

“It is desirable, in the present circumstances of the country, to declare the elementary education of the masses, its provision, extension and improvement  to be the part of the educational system to which the strenuous efforts of the state should now be directed in a still large measure than here to fore.”  –Indian Education Commission Report.

A – संगठन – शिक्षा सम्बन्धी यथा – प्रबन्ध,विकास व्यय, निरीक्षण आदि का दायित्व नगर पालिकाओं व जिला परिषदों को सौंप कर सरकार ने अपना पल्ला झाड़ लिया।

B – पाठ्यक्रम – भौतिक विज्ञान,क्षेत्रमिति,चिकित्सा,बहीखाता व कृषि को शामिल करने के सुझाव के साथ आयोग ने सभी प्रांतों को अपनी परम्परा के अनुसार पाठ्य निर्धारण की छूट प्रदान की।

C – आर्थिक व्यवस्था – इस भारतीय शिक्षा आयोग ने प्राथमिक शिक्षा के सम्यक विकास हेतु व्यावहारिक और उपयोगी सुझाव प्रस्तुत किये आयोग का मानना था कि –

“The Primary Education should be declared to be that part of the whole system of public instruction which possesses an almost exclusive claim on local funds set apart for education and a large claim on provincial revenues.”

हिन्दी अनुवाद –

“प्राथमिक शिक्षा को सार्वजनिक शिक्षा की सम्पूर्ण प्रणाली का वह भाग घोषित किया जाना चाहिए, जिसका शिक्षा के लिए निर्धारित स्थानीय निधियों पर लगभग अनन्य अधिकार है, तथा प्रान्तीय राजस्व पर भी बड़ा अधिकार है।” 

माध्यमिक शिक्षा [Secondary Education] –

माध्यमिक शिक्षा को विस्तार देने के बारे में भी आयोग ने विचार किया और कहा कि –

“उन सभी जिलों में जहाँ जनहित की दृष्टि से आवश्यक हो, तथा जहाँ के निवासी हाई स्कूल खोलने के लायक धनी न हों, ऐसे जिलों में कम से कम एक मॉडल हाई स्कूल सहायता अनुदान प्रणाली के अन्तर्गत स्थापित किया जाना चाहिए।”

“In all districts where it is necessary in the public interest, and where the inhabitants are not wealthy enough to open a high school, at least one model high school should be established under the grant-in-aid system.”

इसके अतिरिक्त आयोग ने हाई स्कूल के दो भाग करने को कहा एक भाग बच्चों को विश्वविद्यालय प्रवेश में मदद दे और दूसरा अधिक व्यावहारिक, व्यापारिक व असाहित्यिक क्षेत्रों हेतु तैयार करे।

उच्च शिक्षा [Higher Education] –                         

 उच्च शिक्षा के सम्बन्ध में हंटर आयोग की प्रमुख सिफारिश यह थी कि –

“प्रत्येक कॉलेज को दिए वाले अनुदान की दर का निर्धारण उसके शिक्षकों की संख्या, रख रखाव पर होने वाला व्यय, संस्था की कार्य कुशलता तथा स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।”

आंग्ल अनुवाद –

“The rate of grant-in-aid given to each college should be determined keeping in mind the number of its teachers, expenditure on maintenance, efficiency of the institution and local needs.”

देशी शिक्षा को प्रोत्साहन/Promotion of native education – प्राचीन भारतीय शिक्षा के बारे में आयोग ने कहा –

 “अति दीर्घकाल से कठिनाइयों का सामना करने पर भी इन विद्यालयों का अस्तित्व इस बात का ज्वलन्त प्रमाण था कि वे सजीव तथा लोकप्रिय थे। कमीशन के मतानुसार सरकार से मान्यता तथा आर्थिक सहायता प्राप्त करके देशी पाठ शालाएं राष्ट्रीय शिक्षा-प्रणाली में महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर सकती थीं।”

“They have survived a severe competition and have thus proved that they posses both vitality and popularity .The indigenous schools, if recognised and assisted, may be expected to improve their method and fill a useful position in the State System of National Education.”

 – Indian Education Report.

अध्यापक प्रशिक्षण/ Teacher Education – प्रशिक्षण विद्यालय 1882 तक भारत में केवल दो स्थानों पर थे एक लाहौर में और दूसरा मद्रास में। इस सम्बन्ध में आयोग ने ये सिफारिशें कीं –

[1] – निम्न योग्यता वाले छात्राध्यापकों से स्नातकों का प्रशिक्षण काल कम होना चाहिए।

[2] – शिक्षा सिद्धान्त और प्रायोगिक शिक्षा को प्रशिक्षण विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

महिला शिक्षा [Women Education] –

 महिला शिक्षा की दयनीय स्थिति को देखकर इसे हर संभव आगे बढ़ाने पर जोर दिया और सुझाव दिया कि बालिका विद्यालयों तथा साथ साथ बालकों के विद्यालयों की सहायता हेतु प्रत्येक प्रकार से समानअनुपात में धन लिया जाना चाहिए। आयोग की रिपोर्ट में लिखा गया कि –

“यह बात स्पष्ट है कि स्त्री शिक्षा अभी तक अत्यन्त पिछड़ी हुई दशा में है। अतः इस बात की आवश्यकता है कि प्रत्येक सम्भव विधि से इसका पोषण किया जाए।”

“It will have been seen that female education is still in an extremely backward condition, and that is needs to be fostered in every legitimate way.”

                                                                                               – Indian Education Commission Report.

धार्मिक शिक्षा [Religious Education] –

धार्मिक शिक्षा के बारे में आयोग का मानना था कि राज्य की घोषित नीति के अनुरूप राज्य के द्वारा सञ्चालित  शिक्षा संस्थानों  में धार्मिक शिक्षा नहीं दी जा सकती।

सरकार व मिशनरियों की भूमिका [ Role of Government and Missonaries] – शैक्षिक प्रगति में सरकार तथा मिशनरी संस्थाओं की भूमका पर विचार कर आयोग ने कहा की कि मिशनरी संस्थाओं को राज्य के सामान्य निरीक्षण के अन्तर्गत अपने स्वतन्त्र पाठ्यक्रम चलाने की अनुमति होनी चाहिए। जहां तक सम्भव हो तथा आवश्यकता हो, ऐसी संस्थाओं को व्यक्तिगत प्रयासों के लिए आवश्यक सभी प्रकार  प्रोत्साहन तथा सहायता दी जानी चाहिए।

शिक्षा विभाग सम्बन्धी सुझाव – यह सर्व विदित है कि 1854 के घोषणा पत्र से जो प्रान्तीय शिक्षा विभाग बने वे कतिपय दोषों से युक्त थे उनमें सुधार हेतु हण्टर कमीशन ने सुझाव दिए –

01 -समस्त विद्यालयों का निरीक्षण सुनिश्चित करने हेतु प्रत्येक प्रान्त के निरीक्षकों की संख्या में वृद्धि की जाए। 

02 – समीपवर्ती विद्यालयों के छात्रों को एक विद्यालय में न बुलाकर प्रत्येक विद्यालय में निरीक्षकों द्वारा परीक्षा लेना सुनिश्चित किया जाए।

03 – शिक्षा कार्य से जुड़े सहायक निरीक्षकों के वेतन में वृद्धि की जाए।

04 – प्रत्येक उस विद्यालय का निरीक्षण अनिवार्य किया जाए जिसे सहायता अनुदान मिलता हो।

05 – जिला निरीक्षक के पदों पर यूरोपियनों की अपेक्षा भारत के नागरिकों को अधिक नियुक्त किया जाए।

हरिजन व पिछड़ी जातियों की शिक्षा – आयोग ने अपने अध्ययन में पाया कि ये जातियाँ दीर्घकाल से सामाजिक संरचना में निम्न स्तर पर रही हैं इन्हें यकायक सामान्य स्तर पर लाना सम्भव नहीं है अतः धीरे धीरे निम्न प्रयास होने चाहिए।

01 – हरिजन व पिछड़ी जातियों हेतु समस्त विद्यालयों के द्वार खोल दिए जाएँ जी स्थानीय संस्थाओं, नगरपालिकाओं या सरकार द्वारा चलाये जा रहे हों।

02 – जिन कतिपय स्थानों पर इनके प्रवेश पर अन्य जातियों द्वारा विरोध प्रकट किया जाए वहां इनके लिए विशेष विद्यालय स्थापित किये जाएँ।

03 – जनता की इच्छा के विरुद्ध शिक्षक तथा शिक्षाधिकारी हरिजनों व पिछड़ी जातियों के छात्रों को विद्यालय में प्रवेश न दें।

04 – बुद्धिमानी व चातुर्य कौशल के माध्यम से जातीय भेदभाव को समाप्त करने का प्रयास किया जाए।

पहाड़ी जातियों व आदिवासियों की शिक्षा – अपने अध्ययन के आधार पर आयोग यह समझ गया कि अब तक की व्यवस्थाएं पहाड़ी जातियों व आदिवासियों की शिक्षा में असफल रही हैं अतः आयोग ने अधोलिखित सुझाव दिए –

01 – यह शिक्षा व्यक्तिगत प्रयासों पर नहीं छोड़ी जा सकती अतः यह आवश्यक है की सरकार उनके लिए विशेष प्रकार के विद्यालयों का निर्माण करे।

02 – इन जातियों की शिक्षा व्यवस्था कर रही गैर सरकारी संस्थाओं को प्रोत्साहित किया जाए।

03 – इन जातियों के छात्रों की शिक्क्षा व्यवस्था निः शुल्क राखी जाए।

04 – आदिवासी क्षेत्रों के समीप ही उन्हें पढ़ने हेतु आकर्षित करने का प्रयास हो

05 – इन जातियों के शिक्षार्थियों को इसी जाति के शिक्षकों द्वारा पढ़ाने की व्यवस्था की जाए।

06 – यदि कोई आदिवासी भाषा माध्यम के रूप में प्रयोग की जा सकती हो तो उस भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाया जाए।

07 – इन्हें ऐसी शिक्षा प्रदान की जाए जिससे ये पास की सभ्य जातियों से सम्बन्ध कायम करने के लायक हो जाएँ।

08 – इन जातियों के अध्यापकों को नार्मल स्कूलों में सामान्य शिक्षा के साथ कम समय में तैयार करने का प्रयास किया जाए।

सहायता अनुदान प्रणाली हेतु सिफारिशें – इस क्षेत्र में आयोग ने विशद विश्लेषण के आधार पर जो सुझाव दिए उनमें कुछ विशेष को यहां देने का प्रयास है –

01 – यदि व्यक्तिगत संस्थाओं को शिक्षा की सामान्य प्रणाली का आवश्यक अंग स्वीकार नहीं किया गया तो व्यक्तिगत प्रबंधकों की संस्थाए सफल नहीं हो सकतीं। गैर सरकारी संस्थाओं के प्रबंधकों के परामर्श पर उनके छात्रों को प्रमाण पत्रों, छात्र वृत्तियों व अन्य जन विभूषणों की प्रतियोगिता में समान आधार पर प्रवेश सुनिश्चित होना चाहिये। 

02 – गैर सरकारी विद्यालय के प्रबन्धकों, अध्यापकों, विभाग के अधिकारियों को सभी विभागीय परीक्षाओं के संचालन में यथा सम्भव जोड़ा जाना चाहिए। 

03 – किसी गैर सरकारी विद्यालय को केवल इस आधार पर अनुदान से वंचित न किया जाए की वह सरकारी विद्यालय के समीप है।

04 – विद्यालय की स्थिति, योगदान, कार्य क्षमता, प्रान्तीय आवश्यकता, स्थानीय योगदान के आधार पर अनुदान राशि देने हेतु नियमों में संशोधन किया जाए। इमारत,उपकरण,फर्नीचर, आदि पर मिलने वाले अनुदान की राशि,अवधि व विविध दशाओं का स्पष्ट वर्णन किया जाना चाहिए।    

05 – सहायता अनुदान के प्रार्थना पत्र का कार्यालयी उत्तर दिया जाना चाहिए व अस्वीकृत होने की दशा में स्पष्ट कारण बताये जाने चाहिए।

06 – बिना विलम्ब के अनुदान नियत समय पर दिया जाना चाहिए।

07 – अनुदान स्थानीयता व संस्था के वर्ग पर निर्भर हो, पिछड़े जिले, कन्या विद्यालय, निम्न जाति विद्यालय, पिछड़े समुदाय के विद्यालय को अधिक सहायता मिलनी चाहिए।

08 – जो विषय अधिक महत्त्व के समझे जाएँ उन्हें तथा सहायता प्राप्त संस्था के विस्तार हेतु हर बजट में अधिक राशि स्वीकृत की जाए।

09 – समान पाठ्य पुस्तक,समान पाठ्यक्रम व व्यावहारिकता का सम्यक सम्मिश्रण किया जाए। 

10 –  आवश्यक योग्यता से युक्त भारतीयों को विद्यालय निरीक्षक बनाना चाहिए।     

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Uncategorized•शिक्षा

Objectives of higher education

July 31, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

[उच्च शिक्षा के उद्देश्य]

अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के पश्चात अपने सपने, अपने उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हम उच्च शिक्षा से जुड़ते हैं। यह शुद्ध ज्ञानात्मक शिक्षा या कोई प्रशिक्षण या तकनीकी शिक्षा हो सकती है। व्यक्ति की स्वशिक्षा के उद्देश्य उसमें निहित होते हैं और ठीक इसी तरह उच्च शिक्षा के अपने कुछ उद्देश्य हैं इन उद्देश्यों को हम इस प्रकार वर्गीकृत कर सकते हैं।

[A] – व्यक्तिगत बौद्धिक और नैसर्गिक विकास / Personal intellectual and emotional development

(i) –  विश्लेषणात्मक चिन्तन /Analytical thinking

(ii) – ज्ञान अधिगमन / Knowledge acquisition

(iii) – जीवन पर्यन्त अधिगम / Lifelong learning

(iv) – व्यक्तिगत क्षमता वृद्धि / Personal capability enhancement

(v) – चारित्रिक विकास / Character development –

[B] – सामाजिक पेशेवर योगदान / Social professional contribution –

(i) – सामाजिक कौशल विकास / Social skills development

(ii) – क्षेत्रीय आर्थिक विकास / Regional economic development

(iii) – सामाजिक क्षमता अभिवृद्धि / Social capacity enhancement

(iv) – वृहत विकास में योगदान / Contribution to macro development

(v) – सांस्कृतिक जागरूकता / Cultural awareness

[C] –स्व परिक्षेत्र में विशिष्ट उद्देश्य / Specific objective in self domain

(i) – विज्ञान व तकनीकी परिक्षेत्र / Science and Technology Zone

(ii) – मानविकी परिक्षेत्र / Humanities Zone

(iii) – पेशेवर परिक्षेत्र / Professional Zone      

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शिक्षा

मैकाले शिक्षा का अग्रदूत नहीं।

July 18, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

Macaulay is not a pioneer of education.

1813 के आज्ञापत्र और प्राच्य पाश्चात्य विवाद के समय एक नाम बहुत प्रसिद्द हुआ लेकिन मैकाले को शिक्षा का अग्रदूत कहना उचित नहीं है। जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली कहावत चरितार्थ हुई। प्राच्य दल के नेता लार्ड प्रिन्सेप इतिहास की काल कोठरी में गुम हो गया। जो तथ्य मैकाले महोदय को शिक्षा के अग्रदूत के रूप में मानने को तैयार नहीं उसे इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।

[01] – राजाराम मोहन राय व उनके सहयोगियों के प्रयास से भारत में अंग्रेजी शिक्षा के पहले माहौल बन चूका था। इसमें ईसाई मिशनरियों व कम्पनी के कर्मचारियों तथा प्रगतिशील भारतीयों का भी योगदान रहा। इसलिए मैकाले को आधुनिक शिक्षा का अग्रदूत मानना उचित नहीं है।

[02] – वेद, पुराण, उपनिषद, अरबी, फारसी साहित्य व संस्कृत साहित्य को मैकाले महत्त्वहीन मानता था उसने बिना इनका अध्ययन किये ही इनकी कटु आलोचना की और यूरोप के अच्छे पुस्तकालय की एक आलमारी से तुलना कर अपनी अज्ञानता ही सिद्ध की।

[03] – मैकाले की अज्ञानता, संकीर्णता व अशिष्टता ने उसे भारतीय दर्शन, इतिहास, ज्योतिष व चिकत्सा शास्त्र का उपहास करने को बाध्य किया लॉर्ड एक्टन  ने इस सम्बन्ध में कहा –

“Hi knew nothing respectable before the seventeenth century, nothing of foreign History, Religion, Philosophy, Science, and Art.

 – Lord  Action. Quoted by Mayhew . The Education of India.

“वह सत्रहवीं शताब्दी के पूर्व के विषय में वस्तुतः कुछ नहीं जानता था और न ही विदेशी इतिहास, धर्म, दर्शन, विज्ञान और कला के विषय में कुछ जानता था।”

[04] – वह भारत में एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना चाहता था जो रूचि, विद्वता व विचार में अंग्रेज हो एवम् रक्त व वर्ण में भारतीय। वह पाश्चात्य सभ्यता व संस्कृति को हिन्दुस्तान पर लादकर यहां की सभ्यता व संस्कृति को नष्ट करना चाहता था।   

[05] – ये महोदय भारत की धार्मिक एकता को विखण्डित करना चाहता था और धर्म निरपेक्षता की आड़ में ईसाई मिशनरियों को बढ़ावा देना चाहता था जैसा की 1936 में उसके द्वारा अपने पिता को लिखे पात्र की इन पँक्तियों से स्पष्ट है। –

“No Hindu who has received English education never remains attached to his religion. It is my firm belief that if our plans of education are followed up there will not be a single idolater among the respectable classes in Bengal thirty year hence.”

Quoted by C.E.Trevelyn ‘Life and letters of lord Macaulay 1. 455

हिन्दी अनुवाद

“कोई भी हिन्दू ऐसा नहीं है जो अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त करके अपने धर्म के प्रति ईमानदारी से लगाव रखता हो। मेरा दृढ़ विश्वास है कि यदि हमारी शिक्षा योजना को व्यावहारिक रूप प्रदान कर दिया गया तो 30 वर्ष पश्चात बंगाल के उच्च वर्ग में कोई भी मूर्ति पूजक शेष नहीं रह जाएगा।”

[06] – भारतीय प्राच्य भाषाओँ की पूर्ण उपेक्षा कर केवल अँग्रेजी भाषा को शिक्षा माध्यम बनाना किसी दृष्टिकोण से उचित नहीं था जैसा कि एस ० एन ० मुकर्जी ने लिखा –

“His recommendation about the use of English as the only medium of instruction can not be justified.”

– S.N.Mukerji op.cit.p.81

“शिक्षा के माध्यम के रूप में केवल अँग्रेजी भाषा के उपयोग की उसकी संस्तुति औचित्यपूर्ण नहीं हो सकती है।”

[07] – पाश्चात्य ज्ञान विज्ञान के प्रचार प्रसार ने भारतीय जनता को इतना प्रभावित किया कि उन्हें अपना व देश का ध्यान ही न रहा। जिससे भारत अधिक समय तक गुलाम बना रहा।

[08] – भारतीय भाषा व साहित्य की उपेक्षा कर भारतीय ज्ञान और विज्ञान पर उसने एक छद्म आवरण डाल दिया जब कि भारत के श्री मद्भागवद्गीता जैसे ग्रन्थ का बाद में विश्व की अनेक भाषाओँ में अनुवाद हुआ। 1904 में लार्ड कर्जन ने कहा। –

“Ever since the cold breath of Macaulay’s rhetoric passed over the field of Indian language and the Indian text books the elementary

education of the pupils in their own tongue shrivelled and pinned.” Lord Curzon in India.p.316

“जब मैकाले की अलंकृत भाषा (अंग्रेजी) की शीत लहर भारतीय भाषाओँ और पाठ्य पुस्तकों के क्षेत्र से होकर गुज़री, तबसे अपनी स्वयं की भाषा में छात्रों की प्रारम्भिक शिक्षा की बेलें कुम्हला गईं और कराहने लगीं।”

[09] – मैकाले, कम्पनी के शासन हेतु सुयोग्य व बफादार कर्मचारी तैयार करना चाहता था उसका उद्देश्य भारत में श्क़्श का प्रसार नहीं था उसने स्वयं लिखा –

“We must at present do our best to form a class, who may be interpreters between us and the millions whom we govern.”

-Macaulays Minute

”हमें इस समय एक ऐसे वर्ग का निर्माण करना चाहिए जो हमारे और उन लाखों व्यक्तियों के मध्य द्विभाषिया बन सकें जिन पर हम शासन करते हैं।”

वस्तुतः मैकाले भारतीय भाषाओँ, संस्कृति व जनसाधारण की शिक्षा के प्रसार में बाधक बना उसे भारत में आधुनिक शिक्षा की प्रगति का पथ प्रदर्शक अथवा पाश्चात्य शिक्षा का अग्रदूत कहना उचित नहीं। इस सम्बन्ध मेंJames महोदय ने ठीक ही कहा है –

“His pronouncements are too glib, too confident too unqualified and some times error against good taste.”

-H.R.James ; Education and Statmanship in India.

“उसकी घोषणाएं व्यर्थ बकी बकवासों अपने आप पर अपार विश्वास तथा अहम् मान्यताओं से परिपूर्ण थीं कभी कभी उनमें सुरुचि का अभाव प्रस्फुटित होता है।” 

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शिक्षा

Personal and social development

July 17, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

व्यक्तिगत व सामाजिक विकास

व्यक्तिगत विकास से आशय –

व्यक्तिगत विकास में अपनी स्वयं की क्षमता पहचानना, उन्हें विकसित करना व खुद को समाज के उपयोगी सदस्य के रूप में स्थापित करना समाहित है।

हुमायूँ कबीर महोदय कहते हैं –

“यदि व्यक्ति को समाज का सृजनशील सदस्य बनना है तो उसे न केवल स्वयं का विकास करना चाहिए वरन समाज के प्रति भी कुछ योग दान करना चाहिए।”

“If one is to be creative member of society, one must not only sustain one’s own growth but contribute something to the growth of society.”

टी पी नन (T.P.Nunn ) महोदय का मानना है –

“वैयक्तिकता केवल ऐसे वातावरण में विकसित होती है, जहाँ सांझी रुचियों और साँझी क्रियाओं से अपना पोषण कर सकती है। “

“Individuality develops only in a social atmosphere where it can feed on common interests and common activities.”

अतः कहा जा सकता है कि व्यक्तिगत विकास में सामाजिक विकास के बीज भी संरक्षित रहते हैं।

सामाजिक विकास से आशय / Meaning of social development –

व्यक्ति समाज की इकाई है और व्यक्तियों का समूह समाज है हर समाज के अपने नियम, मर्यादाएं,परम्पराएं ,संस्कृति,आदर्श मूल्य और प्रतिमान होते हैं जिनमें शिक्षा के द्वारा सकारात्मक परिवर्तन आता है इससे समाज का व्यवहार निर्देशित होता है। यह सकारात्मक परिवर्तन विकास को परिलक्षित करता है।

मैकाइवर और पेज महोदय कहते हैं। –

“समाज रीतियों तथा कार्य प्रणालियों की अधिकार तथा पारस्परिक सहयोग की, अनेक समूहों और विभागों की, मानव व्यवहार के नियंत्रणो और स्वतंत्रताओं की एक व्यवस्था है। इस सतत परिवर्तनशील व्यवस्था को हम समाज कहते हैं।”

“Society is a system of uses and procedures of authority and mutual and of many groupings and subdivisions of control of human behavior and of liberties. This ever changing complex system, we call society.”

Unacademy के अनुसार

“सामाजिक विकास का सीधा तात्पर्य गुणात्मक परिवर्तनों से है जीएसके माध्यम से समाज अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सके और अपने कार्यों को स्वयं आकार दे सके।”

“Social development directly means qualitative changes through which society can discharge its responsibilities and shape its own actions.”

BY JU’S के अनुसार –

“सामाजिक विकास का तात्पर्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति की भलाई में समग्र सुधार से है ताकि वे अपनी पूरी क्षमता तक पहुँच सकें।”

“Social development refers to the overall improvement in the well-being of every individual in a society so that they can reach their full potential.”

व्यक्तिगत विकास / Personal development –

01 – व्यक्तिगत कौशल विकास /personal skill development

02 – ज्ञान व क्षमता विकास / knowledge and capacity development

03 – आत्म सुधार / Self Improvement

04 – आत्म जागरूकता / self awareness

05 – जीवन पर्यन्त विकास / Lifelong development

06 – अधिकतम क्षमता प्रयोग / Maximum Potential Utilization

07 – सकारात्मक आत्म परिवर्तन / Positive Self Change

08 – आत्म सम्मान / Self esteem

 09 – प्रगतिशीलता / Progressive

10 – मानसिक स्वास्थय परिमार्जन / Mental health improvement

सामाजिक विकास / Social development –

01 – शिक्षा व्यवस्था / Education system

02 – सामाजिक स्वास्थय /Social health

03 – पर्यावरण / Environment

04 – सामाजिक सुरक्षा / Social security

05 – आर्थिक प्रगति / Economic progress

06 – सांस्कृतिक संरक्षण व परिमार्जन / Cultural preservation and refinement

07 – सामाजिक सहभागिता विकास / Social participation development

08 -रोजगार अवसर उपलब्धि / Employment opportunities availability

09 – समस्त सामाजिक वर्ग सशक्तिकरण / Empowerment of all social classes

10 – निरन्तर प्रगतिशीलता / Continuous progressiveness

11 – तकनीक सुग्राह्यता / Technology sensitivity

12 – प्रगतिशील दृष्टिकोण विकास / Progressive approach development

उक्त सम्पूर्ण विवेचन यह सिद्ध करता है की व्यक्तिगत व सामाजिक विकास एक दूसरे के पूरक हैं दोनों में एक दूसरे के पल्लवन के बीज संरक्षित हैं। जैसा की रायबर्न महोदय कहते हैं। –

“समाज की उन्नति प्रत्येक व्यक्ति की होती है। समाज को चाहिए कि वह व्यक्ति के विकास के लिए ऐसे अवसर प्रदान करे जिससे वह समाज को अपना विशेष योगदान दे सके।”

आँग्ल अनुवाद

“The progress of society is dependent on every individual. Society should provide such opportunities for the development of the individual so that he can make his special contribution to the society.

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शिक्षा

Qualities of an Inclusive Teacher

May 17, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

समावेशी शिक्षक के गुण

असल में कोई  भी शिक्षक उन्हीं गुणों को प्रतिबिम्बित कर सकता है जो उसमें स्वयम् हों। इसी तरह एक समावेशी शिक्षक वही हो सकता है जो समावेशन के गुणों को धारण करे। आखिर होता क्या है समावेशन ? इसे समझने हेतु हम यहाँ सहारा ले रहे हैं सोसाइटी ऑफ़ ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट (SHRM )द्वारा प्रदत्त परिभाषा का –

“ऐसे कार्य वातावरण की उपलब्धि हैं जिसमें सभी व्यक्तियों के साथ उचित और सम्मान जनक व्यवहार किया जाता है, उन्हें अवसरों और संसाधनों तक समान पहुँच होती है और वे संगठन की सफलता में पूरी तरह से योगदान दे सकते हैं।”

आंग्ल अनुवाद

“The achievement of a work environment in which all individuals are treated fairly and with respect, have equal access to opportunities and resources, and can fully contribute to the success of the organization.”

अर्थात इन कार्यों को सम्पादित कराने वाला समावेशी शिक्षक की श्रेणी में आएगा। समावेशी शिक्षक से सामाजिक और व्यावहारिक अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं अतः समावेशी अध्यापक निम्न गुण धारण करने वाला ही होगा।–

01 – श्रेष्ठ समायोजक / Best adjuster

02 – सत्य समर्थक व पक्षपात रहित / Truthful and unbiased

03 – सकारात्मक चिन्तक /Positive thinker

04 – अनुशासन प्रिय / Discipline-loving

05 – संवेदन शील व सहानुभूति युक्त / Sensitive and sympathetic

06 – सदा सक्रिय / Always active

07 – आशावादी / Optimistic

08 – सञ्चार कौशल युक्त / Having communication skills

09 – स्वमूल्याँकन के प्रति सचेत/ Conscious of self-evaluation

10 – सम्यक शैक्षिक योग्यता / Appropriate educational qualification

11 – उत्साह और उत्सुकता युक्त / Enthusiastic and curious

12 – पूर्वाग्रह मुक्त / Unprejudiced

13 – सृजनात्मक / Creative

14 – आजीवन सीखने वाला / Lifelong learner 

15 – धैर्ययुक्त व सहयोगी / Patient and cooperative

16 – अच्छा श्रोता / Good listener

            वास्तव में आज का समाज और कार्य प्रदाता को समावेशी शिक्षक से बहुत सी आशाएं हैं और वे चाहते भी हैं की नित्य बदलती परिस्थितियों से समावेशी अध्यापक साम्य बनाये लेकिन उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी से समाज, कार्य प्रदाता और शासन व्यवस्था सभी भागते नज़र आते हैं जबकि दोनों का संयुक्त प्रयास यथोचित परिणाम देने में समर्थ होगा।

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शिक्षा

Examination Reform

May 14, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

परीक्षा सुधार

भारत में जब हम किसी समस्या के निदान की बात करते हैं तो हमारा ध्यान शिक्षा की ओर आकर्षित होता है और जब हम शिक्षा समस्या की और दृष्टि पात करते हैं तो हमारा सम्पूर्ण ध्यान, शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा सुधार की ओर जाता है और विविध शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा व्यवस्था में कतिपय सुधार अपेक्षित हैं जो समय की मांग है। वर्तमान समय में प्रगति के साथ तालमेल की आवश्यकता पूर्ति हेतु विविध आयोगों ने भी परीक्षा सुधार को आवश्यक माना और अपनी संस्तुतियां दीं।

विविध आयोगों के सुझाव / Recommendations of various commissions –

यद्यपि परीक्षा सुधार पर अलग अलग शिक्षाविदों की राय भिन्न है और क्षेत्रीयता का प्रभाव भी दृष्टिगत होता है लेकिन हम यहाँ केवल आज़ादी के बाद के कुछ आयोगों और 2020 की शिक्षा नीति के परिदृश्य में इसका अध्ययन करेंगे।

राधाकृष्णन कमीशन के सुझाव / Recommendations of Radhakrishnan Commission –

 राधाकृष्णन कमीशन ने परीक्षा प्रणाली में सुधार हेतु निम्न सुझावों की ओर ध्यानाकर्षित किया – 1 – रटने की योग्यता की परीक्षा समाप्त हो।/The test of rote learning ability should be abolished.

                           – रटने की जगह विश्लेषण,संश्लेषण,व ज्ञान को महत्ता  2 – आवश्यकतानुसार पृथक मूल्यांकन विधियों का प्रयोग/Use of different evaluation methods as per the need           – वाद विवाद, कार्य कलाप,परियोजना कार्य आदि

3 – मूल्याङ्कन प्रक्रिया वार्षिक न होकर वर्ष पर्यन्त हो /The evaluation process should be year-round instead of annual

4 – परीक्षा के महत्त्व में कमी/Reduction in the importance of exams

5 – परीक्षा पैटर्न में परिवर्तन / Change in exam pattern

6 – तनाव में कमी के प्रयास / Efforts to reduce stress

मुदालियर कमीशन के सुझाव / Recommendations of Mudaliar Commission –

मुदालियर कमीशन ने परीक्षा प्रणाली में सुधार हेतु निम्न सुझावों की संस्तुति की –

1 – वाह्य परीक्षा की संख्याओं में कमी / Reduction in the number of external exams

2 – वस्तुनिष्ठता का सम्यक प्रयोग / Proper use of objectivity

3 – व्यक्तिपरकता के प्रभाव में कमी / Reduction in the influence of subjectivity

4 – रटने की शक्ति को हतोत्साहित करना / Discouraging rote learning

5 – तर्क सांगत समझ को बढ़ावा / Promoting rational understanding

6 – पाठ्यचर्या विविधता / Curriculum diversity

7 – व्यावसायिक शिक्षा / Vocational education

8 – शिक्षक प्रशिक्षण में सुधार / Improvement in teacher training

कोठरी आयोग के परीक्षा सुधार सम्बन्धी सुझाव / Kothari Commission’s suggestions regarding examination reform –

कोठरी आयोग ने परीक्षा सुधार हेतु निम्न सुझावों को अधिमान प्रदान किया –

01 – सतत और व्यापक मूल्यांकन /Continuous and Comprehensive Evaluation

02 – कौशल का व्यापक आकलन /Comprehensive Assessment of Skills

03 – परीक्षा बोर्डों का गठन/Formation of Examination Boards

04 – पेशेवर प्रबन्धन /Professional Management

05 – वेतनमानों का मानकीकरण/Standardization of Pay Scales 

06 – शैक्षिक व्यय में वृद्धि /Increase in educational expenditure

07 – शैक्षिक मानकों को कानूनी संरक्षण /Legal protection of educational standards

08 – शिक्षा नीति का निर्माण/Formulation of education policy

1986 की शिक्षा नीति –

NEP 1986 ने परीक्षा प्रणाली को बहुमुखी व लचीला बनाने हेतु जो सुधार बताए उन्हें इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

01 – रटने की जगह समग्र विकास / Holistic development instead of rote learning

02 – सीखने हेतु प्रेरण / Motivation to learn

03 – तनाव मुक्त परीक्षा / Stress free exam

04 – बेहतर मूल्याङ्कन / Better evaluation                               

05 – बहुमुखी व लचीली शिक्षण प्रणाली / Versatile and flexible learning system

06 – गुणवत्ता युक्त शिक्षण सामग्री / Quality learning materials

07 – त्रिभाषा फार्मूला का आधार / The basis of the three-language formula

नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 –

नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 ने परीक्षा सुधार हेतु निम्न कदम उठाने पर जोर दिया। –

01 – समग्र विकास और योग्यता आधारित शिक्षण को बढ़ावा / Promote holistic development and competency based learning

02 – रटने की जगह समझने पर जोर / Emphasis on understanding instead of rote learning

03 – ‘परख’ नामक राष्ट्रीय मूल्याङ्कन प्रणाली का प्रस्ताव / Proposal for a national evaluation system called ‘Parakh’

04 – छात्र केन्द्रित शिक्षण व्यवस्था / Student centered learning system

05 – परीक्षा प्रणाली को व्यापकता प्रदान करना / To broaden the examination system

06 – विश्वसनीयता में वृद्धि / Increase reliability

परीक्षा प्रणाली में सुधार की समस्या उत्पत्ति के कारण / Reasons behind the problem of reform in the examination system –

01 – रूढ़िवादिता / Stereotypes

02 – परम्परागत सोच / Traditional thinking

03 – निम्न आय / Low income

04 – परिवर्तन से डर / Fear of change

05 – अभिभावकों की अशिक्षा / Illiteracy of parents

06 – जाति व्यवस्था / Caste system

07 – महिला शिक्षा का अभाव / Lack of women education

08 – कौशल कार्यक्रमों की न्यूनता / Lack of skill programmes

09 – अविकसित सञ्चार साधन / Under developed means of communication

10 – संस्कृति के प्रति अज्ञानता / Ignorance of culture

परीक्षा प्रणाली में सुधार हेतु उपाय / Measures to improve the examination system-

01 – आन्तरिक मूल्याङ्कन व मौखिक परीक्षा को महत्त्व / Importance of internal assessment and oral      examination

02 – नई अधिगम तकनीकों का प्रयोग / Use of new learning techniques

03 – मूल्याङ्कन की समय सापेक्ष विधियों का चलन / Use of time-related methods of evaluation

04 – सतत मूल्याङ्कन पर जोर / Emphasis on continuous evaluation

05 – नवीनतम शिक्षा तकनीकी व परीक्षा में समन्वय / Coordination of latest education technology and examination

06 – लचीलापन / Flexibility

07 – वैश्विक मानदण्डों का अध्ययन / Study of global standards 

08 – व्यक्तित्व विकास व परीक्षा में समन्वय / Coordination between personality development and examination

09 – विविध शैक्षिक योजनाओं की आर्थिक उपादेयता में वृद्धि / Increase in economic utility of various educational schemes 

10 – विकसित समन्वयवादी दृष्टिकोण / Developed coordination approach

11 – समुचित शिक्षक प्रशिक्षण / Proper teacher training

12 – विश्लेषणवादी चिन्तन का विकास / Development of analytical thinking

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मनोविज्ञान

EDUCATIONAL PSYCHOLOGY

April 26, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षा मनोविज्ञान

भारत ऋषियों मुनियों की ज्ञान परम्परा से जुड़ा है। हमारे पूर्वज, ऋषि, मुनि ने आदि काल से आत्म को समझने की कोशिश की, इस नश्वर संसार से उसका क्या सम्बन्ध रहा। इस शोध में बहुत से पड़ाव और तत्व शामिल होते चले गए। क्रमशः अन्तिम सत्य और मानव व्यक्तित्व का अध्ययन करने की विशद आवश्यकता महसूस की गयी। सत्य और अंतिम सत्य की तलाश का कार्य शिक्षा के माध्यम से बखूबी अंजाम दिया गया और मानव व्यक्तित्व का ज्ञान मनोविज्ञान की श्रेणी में आया। भारत में शिक्षा मनोविज्ञान परम सत्य के दार्शनिक सत्य पर अवलम्बित रहा।

मनोविज्ञान को मन का विज्ञान, व्यवहार के विज्ञान आदि नामों से भी जाना गया। व्यावहारिक पक्ष जुड़ने की कारण इसकी आवश्यकता ने नित्य नए आकाश छुए और आज इसका परिक्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। सम्पूर्ण की बात न कर आज हम केवल शिक्षा मनोविज्ञान के सम्बन्ध में विचार करेंगे। प्रसिद्द भारतीय विचारक एस ० के ० मंगल अपनी पुस्तक शिक्षा मनोविज्ञान के पृष्ठ 21 पर लिखते हैं –

“शिक्षा मनोविज्ञान व्यावहारिक मनोविज्ञान की वह शाखा है जिसमें मनोविज्ञान विषय के नियम, सिद्धान्त एवं क्रिया विधि आदि को शिक्षा के क्षेत्र में काम में लाने का प्रयत्न किया जाता है।”

आंग्ल अनुवाद

“Educational psychology is that branch of practical psychology in which an attempt is made to use the rules, principles and methods of psychology in the field of education.” 

EDUCATIONAL PSYCHOLOGY: Concept & definitions

शैक्षिक मनोविज्ञान: अवधारणा और परिभाषाएँ –

हमारे यहाँ सब कुछ पाश्चात्य ज्ञान से तलाशने की आदत पड़ी और आजादी के बाद भी शासन उसी से प्रभावित रहा इसीलिये भी हम परमुखापेक्षी होते हुए बात की शुरुआत अरस्तु से करते हैं मनोविज्ञान विकास अवधारणा को स्पष्ट करते हुए स्किनर महोदय का मानना है कि –

“शिक्षा मनोविज्ञान का आरम्भ अरस्तु के समय से माना जा सकता है। पर शिक्षा मनोविज्ञान के विज्ञान की उत्पत्ति यूरोप में पेस्टोलॉजी, हर्बर्ट, और फ्रोबेल के कार्यों से हुई, जिन्होंने शिक्षा को मनोवैज्ञानिक बनाने का प्रयास किया।” 

“Educational psychology can be traced back to the time of Aristotle. But the science of educational psychology originated in Europe with the work of Pestalozzi, Herbart, and Froebel, Who tried to make education psychological.”

शिक्षा के द्वारा सत्य विवेचित, शोधित, स्थापित होता है और मानव मन उसे निर्दिष्ट करता है विविध अवधारणायें शिक्षा मनोविज्ञान की महती आवश्यकता अनुभूत करते हैं और विविध विज्ञ जन उसे इस तरह पारिभाषित करते हैं।

सीखने सिखाने को बुनियादी आवश्यकता मानते हुए स्किनर महोदय कहते हैं –

“शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जो शिक्षण एवम् सीखने से सम्बन्धित है।”

“Educational Psychology is that branch of psychology which deals with teaching and learning.” Skinner, 1958, p.1

कुछ इसी तरह की भावों की अभिव्यक्ति देखी जा सकती है क्रो व क्रो के इन विचारों में –

“शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के जन्म से लेकर वृद्धावस्था तक के सीखने सम्बन्धी अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”

“Educational Psychology describes and explains the learning experiences of an individual from birth through old age.” – Crow & Crow, 1973, p.7

समाज और शिक्षा को अभिन्न मानते हुए नौल व अन्य कहते हैं –

” शिक्षा मनोविज्ञान मुख्य रूप से शिक्षा की सामाजिक प्रक्रिया से परिवर्तित या निर्देशित होने वाले मानव व्यवहार के अध्ययन से सम्बन्धित है।”

“Educational Psychology is concerned primarily with the study of human behaviour as it is changed or directed under the social process of education”

 – Noll & others: Journal of Educational Psychology, 1948, p.361

प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक पील महोदय ने संक्षिप्त व सार गर्भित परिभाषा दी है –

“शिक्षा मनोविज्ञान शिक्षा का विज्ञान है। “

“Educational Psychology is the science of Education.” – Peel,1956, p.8

शिक्षा मनोविज्ञान का क्षेत्र

Scope of Educational Psychology-

सम्पूर्ण परिवेश नित्यप्रति बदल रहा है यह परिवर्तन प्रकृति का नियम है बदलती हुई इस दुनिया की समस्याएं भी नित्य नया नया आकार ले रही हैं ऐसी स्थिति में इसका निश्चित क्षेत्र परिसीमन सम्भव नहीं है और इसे अपरिमित स्वीकार करना पड़ेगा चूँकि यहाँ हम शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र की बात कर रहे हैं इसलिए कुछ बिन्दु स्पष्टीकरण हेतु अधिगमकर्ता के दृष्टिकोण से रखने का प्रयास है। –

01 – विशेष योग्यता अध्ययन /Special ability study

02 – वंशानुक्रम वातावरण अध्ययन / Heredity, environment study

03 – सीखने सम्बन्धी अनुभव अध्ययन / Learning experience study

04 – मूल प्रवृत्तियों का अध्ययन / Basic instinct study

05 – परिस्थितिगत व्यवहार का अध्ययन / Study of situational behaviour

06 – प्रेरणाओं के प्रभाव का अध्ययन / Study of the effect of motivations

07 – मानसिक, शारीरिक, संवेगात्मक प्रतिक्रियायों का अध्ययन / Study of mental, physical and emotional reactions

08 – तत्सम्बन्धी समस्याओं का अध्ययन / Study of related problems

09 – शिक्षा के अंगो सम्बन्धी अध्ययन / Study related to parts of education

10 – विविध गुण अवगुण अध्ययन / Study of various merits and demerits

उक्त कुछ बिंदु देने का प्रयास अवश्य किया गया है लेकिन इसके अतिरिक्त इससे अधिक बिन्दु इसमें शामिल किये जा सकते हैं जैसा कि डगलस व हॉलेंड के इन विचारों से स्पष्ट है –

“शिक्षा मनोविज्ञान की विषय सामग्री शिक्षा की प्रक्रियाओं में भाग लेने वाले व्यक्ति की प्रकृति, मानसिक जीवन और व्यवहार है।”

“The subject matter of Educational Psychology is the nature, mental life and behaviour of the individual undergoing the process of education.” – Douglas & Holland, pp 29-30

इसकी व्यापकता को समझने हेतु स्किनर के ये शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं –

“शिक्षा मनोविज्ञान के क्षेत्र में वह सब ज्ञान और विधियां सम्मिलित हैं, जो सीखने की प्रक्रिया से अधिक अच्छी प्रकार समझने और अधिक कुशलता से निर्देशित करने के लिए आवश्यक है। ”

“Educational psychology takes for its province all information and techniques pertinent to a better understanding and a more efficient direction of the learning process.” – Skinner

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