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मनोविज्ञान

Creativity / सर्जनात्मकता 

June 16, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


सर्जनात्मकता से आशय (Meaning of creativity) :-

इससे आशय आंग्ल भाषा के Creativity से है सर्जनात्मकता शब्द कुछ ऐसे शब्दों द्वारा भी लोगों द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है जो अर्थ में इससे अन्तर रखते हैं जैसे विधायकता, उत्पादकता, खोज आदि जबकि विधायकता से एकत्रीकरण का,उत्पादकता(Productivity) से उत्पादन का और खोज से Search या  Discovery का बोध होता है। सृजनात्मकता को इसका पर्याय या सबसे करीबी माना जा सकता है जब कि सृजन में शून्य का भाव निहित है और सर्जन में वर्तमान या विद्यमान में नवीनता या मौलिकता की सृष्टि करनी पड़ती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सर्जनात्मकता के समानान्तर सृजनात्मकता, रचनात्मक, सर्जक,उत्पन्न करना, बनाना आदि को आवश्यकता नुसार लिया जा सकता है।

सर्जनात्मकता की परिभाषाएं  (Definitions of creativity) :- 

विविध विद्वानों द्वारा इसे विविध रूप से पारिभाषित किया गया है स्टेन महोदय का मानना है –

“When it results in a novel work that is accept as tenable or useful or satisfying by a group at some point in time.” 

“जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो जो किसी समय में समूह द्वारा उपयोगी मान्य हो, वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता है। ”

एक अन्य विद्वान् मेडनिक महोदय का मानना है कि –

“Creative thinking consists of forming new combinations of associative elements. Which combinations either meet specified requirements or are in some way useful.The more mutually remote the elements of new combinations. The more creative is the process of solution.”

“सर्जनात्मक चिन्तन में साहचर्य के तत्वों का मिश्रण रहता है जो विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संयोगशील होते हैं या किसी अन्य रूप में लाभ दायक होते हैं। नवीन संयोग के विचार जितने कम होंगे,सृजनात्मकता की सम्भावना उतनी ही अधिक होगी।”

क्रो एण्ड क्रो महोदय का विचार है :-

“Creativity is a mental process to express the original outcomes.”

“सृजनात्मकता मौलिक  परिणामों को व्यक्त करने की मानसिक प्रक्रिया है।”

एक अन्य महत्त्वपूर्ण विचारक सी० वी ० गुड  महोदय का मानना है :-

“A quality of thought to be composed of broad continue upon which all members of the population may be placed in different degrees, the factors of creativity are tentatively described as associate and ideational fluency, originality adaptive and spontaneously flexibility and ability to make logical evaluation 

“सर्जनात्मकता वह विचार है जो किसी समूह में विस्तृत सातत्य का निर्माण करता है सर्जनात्मकता के कारक हैं -साहचर्य, आदर्शात्मक मौलिकता, अनुकूलता,सातत्यता,लोच एवम तार्किक विकास की योग्यता।”

उक्त विचारों के आलोक में कहा जा सकता है कि सर्जनात्मकता में मौलिकता, नवीनता, उपयोगिता, संयोग से सृजन, आवश्यकतानुसार सृजन के गुण विद्यमान रहते हैं। जिनका आधार चिन्तन होता है।

  विद्यार्थियों में सृजनात्मकता की वृद्धि के उपाय (Ways to increase creativity in students) –

1- विद्यार्थियों की प्रतिक्रियाओं को उचित सम्मान (Due respect to the responses of the students)

2 – कल्पना आधारित प्रस्तुतीकरण (Imagination Based Presentation)

3 – पाठ्यक्रम में क्रिया आधारित अधिगम को बढ़ावा (Promotion of action based learning in the curriculum)

4 – सूचना संग्रहण, आकलन विश्लेषण का उपयोग (Information collection, use of assessment analysis)

5 – पाठ्य सहगामी क्रियाओं से सृजनशीलता का विकास (Development of creativity through co-curricular activities)

6 – उपयुक्त शिक्षण विधियों का प्रयोग (Use of appropriate teaching methods)

7 – तार्किकता का उन्नयन (Upgrading Logic)

8 – अभिव्यक्ति के समुचित अवसर (Reasonable opportunities for expression)

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शिक्षा

पाठ्यक्रम – आशय, परिभाषा, इसकी प्रकृति व घटक

June 4, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पाठ्य क्रम से आशय /Meaning of Curriculum

सर्व प्रथम यहाँ शब्द पाठ्यक्रम की  विवेचना कर आशय समझने का प्रयास करते हैं। शब्द पाठ्यक्रम लैटिन भाषा के शब्द  ‘Currere’  शब्द से निकला है जिसका आशय है दौड़ का मैदान (Race Course ) अर्थात पाठ्यक्रम (Curriculum) से आशय उस साधन से  है जिसके द्वारा शिक्षा के मन्तव्य प्राप्त किये जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है की यह वह साधन है जिसके माध्यम से शिक्षा लक्ष्यों की प्राप्ति एक तर्कपूर्ण क्रम का अनुसरण कर प्राप्त की जा सकती है।

शिक्षा की तरह पाठ्यक्रम के आशय के सम्बन्ध में भी दो धारणाएं प्रचलित हैं जिसे संकुचित अर्थ व व्यापक अर्थ के नाम से जाना जाता है। संकुचित अर्थ में पाठ्यक्रम भी केवल विभिन्न विषयों के पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित है लेकिन व्यापक अर्थ में वे सभी ज्ञान व अनुभव आ जाते हैं जिसे नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से प्राप्त करती है साथ ही विद्यालय में अध्यापकीय संरक्षण में विद्यार्थी द्वारा जो भी क्रियाएं सम्पादित होती हैं सारी की सारी पाठ्यक्रम के तहत स्वीकार की जाती हैं इसके अतिरिक्त पाठ्य सहगामी क्रियाएं भी पाठ्यक्रम का ही भाग होती हैं अर्थात वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पाठ्यक्रम से आशय उसके इसी व्यापक स्वरूप से ही है। 

पाठ्यक्रम की परिभाषाएं / Definition of Curriculum  –

 पाठ्यक्रम की कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं। जॉनसन महोदय के अनुसार –

“A curriculum is a structured series of intended learning outcomes.” 

“पाठ्यक्रम भावी सीखने के परिणामों की एक संरचित श्रृंखला है।”

एक अन्य विचारक मोनरो महोदय का मानना है –

“Curriculum embodies all the experiences which are utilized by the school to atain the aims of education.”

“पाठ्यचर्या उन सभी अनुभवों को समाहित करती है जो स्कूल द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए उपयोग किए जाते हैं।”

भारतीय शिक्षाविद डॉ ० एन ० एल ० शर्मा जी कहते हैं –

“Curriculum is the statement of cource content to be learnt and tought during the course of a specific study within a stipulated time period.”

“पाठ्यचर्या एक निश्चित समय अवधि के भीतर एक विशिष्ट अध्ययन के दौरान सीखी और पढ़ी जाने वाली पाठ्यक्रम सामग्री का विवरण है।”

एक सुप्रसिद्ध चिन्तक Cunningham ने अपने भावों को इस प्रकार शब्दों में ढाला है –

“The curriculum is a tool in the hands of into artist (teacher) is mauld his material (the pupil) according to his ideals (objectives) in the studio (the school).

“पाठ्यक्रम कलाकार (शिक्षक) के हाथों में एक उपकरण है जो स्टूडियो (स्कूल) में अपने आदर्शों (उद्देश्यों) के अनुसार अपनी सामग्री (छात्र) को ढालता है।”

वेण्ट और क्रोनबर्ग के अनुसार

“Curriculum is the systematic from the subject matter which is prepared to fulfil the needs of pupils.”

“पाठ्यचर्या उस विषय वस्तु से व्यवस्थित है जो बालकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार की जाती है।”

इस प्रकार पाठ्यक्रम वह साधन मात्र है जो समय की मॉंग के आधार पर कालानुरूप विविध आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है।

पाठ्यक्रम की प्रकृति (Nature of Curriculum)  –

पाठ्यक्रम की प्रकृति के सम्बन्ध में यह नहीं कहा जा सकता कि यह स्थाई रहेगी। इसकी प्रकृति में स्थान, काल, दिशा, व्यवस्था,दर्शन  आदि के अनुसार परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं। पाठ्यक्रम हर काल की आवश्यकता के अनुसार स्वयम् को व्यवस्थित कर मानवता का कल्याण करता है।पाठ्यक्रम की मूल प्रकृति मानव कल्याण की है डॉ० सोती शिवेन्द्र सिंह व अन्य द्वारा इसकी विशेषता जिसमें इसकी प्रकृति के दर्शन होते हैं भली भाँति विवेचित किया गया है। जो इसके नाम में ही छिपा है यथा –

C – Central point of Education / शिक्षा का केन्द्रीय बिन्दु

U – Utilization of resources / संसाधनों का उपयोग

R – Reform in Education / शिक्षा में सुधार

R – Remedial actions / उपचारात्मक क्रियाऐं

I – Innovation / Infrastructure management. / नवाचार / बुनियादी ढांचा प्रबन्धन

C – Co-curricular and curricular activities / सह-पाठयक्रम और पाठ्यचर्या संबंधी गतिविधियाँ

U – Understanding of Educational objectives /शैक्षिक उद्देश्यों की समझ

L – List of subjects and activities / विषयों और गतिविधियों की सूची

    (Lectures, Laboratory, Library, Learning Material)

U – Understanding of educational demand./ शैक्षिक माँग की स्थिति की समझ

M – Management of educational process / शैक्षिक प्रक्रिया का प्रबंधन।

पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले घटक  /  Curriculum Affecting Factors –

शिक्षा व्यवस्था का गहन अध्ययन यह स्पष्ट संकेत देता है कि शिक्षा और पाठ्यक्रम का एक दूसरे से गहन सम्बन्ध रहा है इसी आलोक में पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले घटकों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

1 – सामाजिक परिवर्तन

2 – शासन व्यवस्था

3 – अध्ययन समितियाँ 

4 – राष्ट्रीय आयोग व विविध समितियाँ

5 – परीक्षा प्रणाली

6 – उद्देश्यों का प्रभाव 

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शिक्षा

शिक्षार्थी स्वायत्तता / LEARNER AUTONOMY

May 30, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सुविधा की दृष्टि से हमने शिक्षार्थी स्वायत्तता को कुछ भागों में बाँट लिया है।

शिक्षार्थी स्वायत्तता से आशय/ Meaning of learner autonomy

शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य /Objective of learner autonomy

शिक्षार्थी स्वायत्तता व शिक्षा के अंग /Learner autonomy and part of education

1 – पाठ्यक्रम व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Curriculum and learner autonomy

2 – शिक्षक व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Teacher and learner autonomy

3 – शिक्षार्थी व शिक्षार्थी स्वायत्तता /learner and learner autonomy

4 – शिक्षण विधि व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Method of teaching and learner autonomy

5 – विद्यालय व शिक्षार्थी स्वायत्तता /School and learner autonomy

निष्कर्ष /conclusion

शिक्षार्थी स्वायत्तता से आशय/ Meaning of learner autonomy

शिक्षार्थी की स्वायत्तता को अधिगम कर्त्ता के मनन, चिन्तन, निर्णयन, कार्य इच्छा और और स्वशक्ति पर विश्वास के रूप में परिकल्पित किया जा सकता है। इसे अधिगम कर्त्ता की जिम्मेदारी लेने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है। अधिगम करने वाले को अधिगम हेतु स्वायत्त स्थिति प्रदान करना मानवीय दृष्टिकोण से एक वहनीय जिम्मेदारी है।

शिक्षार्थी की स्वायत्तता के बारे में Henri Holec महोदय का विचार है –

“Autonomy is the ability to take charge of one’s own learning.”

“स्वायत्तता अपने स्वयं के सीखने का प्रभार लेने की क्षमता है।”

Leslie Dickinsion महोदय का विचार है कि 

“Autonomy is a situation in which the learner is totally responsible for all the decisions concerned with his learning and the implementation of those decisions.”

“स्वायत्तता एक ऐसी स्थिति है जिसमें शिक्षार्थी अपने सीखने और उन निर्णयों के कार्यान्वयन से संबंधित सभी निर्णयों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है।”

उक्त विवेचना के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिगम कर्त्ता की स्वायत्तता से आशय अधिगम के परिक्षेत्र में उसके सीखने व निर्णयन हेतु स्वयं जिम्मेदारी लेने से है।

शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य /Objective of learner autonomy

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अपनी जवाबदेही हेतु खुद जिम्मेदारी लेने की प्रवृत्ति को बल मिला है और सभी अपने अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं शिक्षार्थी को गुण  सिखाना ही शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य है। आज की पीढ़ी निःसन्देह पूर्व पीढ़ी से अधिक जागरूक है और विभिन्न संसाधनों का प्रयोग कर ज्ञान परिक्षेत्र बढ़ा रही है। शिक्षार्थी स्वायत्तता उसे उसके अधिकारों के प्रति सचेष्ट करना एक उद्देश्य मानती है। Phill Bension महोदय लिखते हैं –

“Autonomy is a recognition of the rights of learner within educational system.” 

“स्वायत्तता शैक्षिक प्रणाली के भीतर शिक्षार्थी के अधिकारों की मान्यता है।”

शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य शिक्षार्थी को प्रभावी निर्णयन क्षमता की दक्षता प्रदान कर उसके परिणामों की जिम्मेदारी स्वीकार करने योग्य बनाती है।

संक्षेप में उद्देश्यों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

1 – स्वायत्त निर्णय लेने की क्षमता का विकास/Develop the ability to make autonomous decisions

 2 – सहयोग की भावना का विकास / Develop a spirit of cooperation

3 – स्वमूल्यांकन व स्वप्रबन्धन /Self-evaluation and self-management

4 – शिक्षार्थी की सम्प्रभुता को महत्त्व /Importance of learner’s sovereignty

5 – व्यक्तिगत भिन्नता की स्वीकारोक्ति /Acknowledgment of individual difference

6 – आत्मविश्वास वृद्धि /Confidence Increase

7 – सृजनात्मकता का विकास /Development of creativity

8 – शैक्षणिक दवाब में कमी / Reduction of academic pressure

शिक्षार्थी स्वायत्तता व शिक्षा के अंग /Learner autonomy and part of education

परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है शिक्षा जगत को क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए स्वयं को तैयार करना होगा और शिक्षा के समस्त अंगों को बदलते परिदृश्य के अनुसार शिक्षार्थी स्वायत्तता के अनुरूप स्वयं  ढालना होगा। David Little महोदय ने कहा –

“Autonomy is essentially a matter of the learner’s psychological relation to the process and content of learning.”

 “स्वायत्तता अनिवार्य रूप से सीखने की प्रक्रिया और सामग्री के लिए शिक्षार्थी के मनोवैज्ञानिक संबंध का मामला है।”

1 – पाठ्यक्रम व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Curriculum and learner autonomy

2 – शिक्षक व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Teacher and learner autonomy

3 – शिक्षार्थी व शिक्षार्थी स्वायत्तता /learner and learner autonomy

4 – शिक्षण विधि व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Method of teaching and learner autonomy

5 – विद्यालय व शिक्षार्थी स्वायत्तता /School and learner autonomy

निष्कर्ष /conclusion

आज के परिप्रेक्ष्य में जब हम शिक्षार्थी स्वायत्तता की बात करते हैं समस्त शिक्षा जगत को शिक्षार्थी स्वायत्तता के हिसाब से स्वयं को परिवर्तित करना होगा। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा –

“The boys were encouraged to manage their own affairs, and to elect their own judge, if any punishment was to be given. I never punished them myself.”

“लड़कों को अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, और यदि कोई सजा दी जानी थी, तो अपने स्वयं के न्यायाधीश का चुनाव करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। मैंने उन्हें स्वयं कभी दंडित नहीं किया।”

निष्कर्षतः कहा  सकता है कि इस अवधारणा द्वारा शिक्षार्थी सशक्तीकरण  का नया अध्याय  हेतु शिक्षा जगत को तैयार रहना होगा। शिक्षार्थी को मानसिक सशक्त बनाने में ही शिक्षक व शिक्षा जगत की खुशी छिपी है।

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शिक्षा

योग अवधारणा व अष्टांग योग 

May 21, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


योग –

योग के सम्बन्ध में महर्षि पतञ्जलि से लेकर आजतक के मनीषियों का क्रमिक योग दान रहा है निश्चित रूप से महर्षि पतञ्जलि के व्यवस्थित क्रम देने से पूर्व यह विद्यमान रहा होगा और बहुत से अनुभवों से व लम्बी साधना से इसका  प्रागट्य सम्भव हुआ होगा। यह मानव मात्र को ऋषि मुनि परम्परा की अद्भुत भेंट है। श्रीमद्भगवद्गीता में ज्ञान योग ,भक्ति योग व कर्म योग के बारे में विस्तार से समझाया गया है योग को स्पष्ट रूप से समझने हेतु इन तीन मार्गों ज्ञान योग ,भक्ति योग व कर्म योग को समझना होगा। मानव मात्र में विविध वृत्तियों के दर्शन होते हैं अपनी वृत्ति प्रधानता के आधार पर हमें योग मार्ग का चयन करना चाहिए। जो लोग ज्ञान की और झुकाव रखते हों उन्हें ज्ञान मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।जिन मानवों का झुकाव कर्म की और हो उन्हें कर्म योग के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और भावना प्रधान लोगों को भक्ति मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।  

अष्टाँग योग –

अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का संयोग है।   

यम –

इससे आशय संयम से है हमें कायिक,वाचिक व मानसिक संयम का परिचय देना होगा। यम को पाँच भागों में विभक्त किया गया है।

a – अहिंसा – विचार को इस कोटि का बनाना है कि हमारे चिन्तन व व्यवहार से प्राणिमात्र के प्रति किसी प्रकार का हिंसात्मक आचरण न हो।

b – सत्य – व्यवहार व सिद्धान्त में समान होना अर्थात मन व वचन द्वारा समान व्यवहार, अनुगमन या अनुसरण किया जाना।  

c – अस्तेय – किसी दूसरे के द्रव्य के प्रति अनासक्त भाव।

d – अपरिग्रह – विषयों के विभिन्न दोषों से विमुख रहना यानी विषयों के अर्जन, रक्षण से विमुक्त भाव रहना।  

e – ब्रह्मचर्य – संयम का परिचय अर्थात गुप्तेन्द्रिय उपस्थ का संयम में रहना।

नियम –

 नियम प्रवृत्तिमूलक होते हैं और शुभ या मंगल कार्यों केप्रति हमारी प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं।ये ही शुभ कार्यो हेतु हमें प्रवृत्त कराते हैं  इन्हें पाँच भागों में विभक्त किया गया है –

a – शौच – शौच से आशय आंतरिक व वाह्य शुद्धि से है आन्तरिक से आशय मानस के मलों से निवृत्ति व वाह्य से आशय बाहरी शुद्धि जिसके लिए पहले मिट्टी व जल का प्रयोग होता था और आज साबुन व विविध उपादानों का प्रयोग किया जाता है।

b – सन्तोष – यह शान्ति प्राप्ति का सर्वथा सशक्त उपागम है। जो है जैसा है उसी में सन्तुष्ट रहना। यह गुण ही सन्तोष है। 

c – तप – इससे आशय है सुख दुःख को समान समझने की शक्ति का जागरण जो शरीर को तपाने, दुःख सहने योग्य बनाने, और इस हेतु गर्मी ,सर्दी,बरसात की त्रासदई स्थिति में रहने व कठिन व्रतों के अनुपालन के अभ्यास से है।   

d – स्वाध्याय – नियम, विधि विधान को ध्यान में रखकर धर्म ग्रंथों की स्वयम द्वारा की गई अनवरत साधना। 

e – ईश्वर प्राणिधान – भक्तिपूर्वक ईष्ट के प्रति सम्पूर्ण समर्पण।

आसन –

हमें साधना हेतु शरीर को एक ऐसी स्थिति में रखना होता है जिसमें दीर्घ अवधि तक सुख पूर्वक रहा जा सके.इसी स्थिति को आसन नाम से जाना जाता है। जगत में विविध प्रकार की जीव जातियां हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं सिद्धासन,गरुण आसन,भुजङ्गासन, शीर्षासन आदि विविध प्रकार के आसान हैं हाथ प्रदीपिका में इसका सुन्दर वर्णन द्रष्टव्य है आजकल बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्ण की तत्सम्बन्धी पुस्तक में इसे देखा जा सकता है।

प्राणायाम –

प्राण शक्ति अर्थात श्वांस प्रश्वांस के विविध आयामों को ही प्राणायाम कहा जाता है। प्राणायाम वस्तुतः श्वांस प्रश्वांस का गति विच्छेद ही है। इसमें मुख्यतः पूरक, कुम्भक व रेचक का आधार रहता है पूरक अर्थात श्वांस को पूरा अन्दर की ओर खींचना, कुम्भक से आशय इसके रोके जाने से एवं रेचक से आशय इसके छोड़े जाने से है। इनसे शारीरिक,मानसिक दृढ़ता व चित्त की एकाग्रता में अद्भुत प्रगति देखी जाती है।

प्रत्याहार –

मानव में विविध इन्द्रियों का समागम रहता है जो विविध क्रियाओं का आधार है जब इन्द्रियाँ वाह्य प्रपंचों से मुक्त होकर अर्थात वाह्य विषयों से हटकर चित्त के समान निरुद्ध हो जाती हैं तो यह स्थिति प्रत्याहार है। जब वाह्य जगत में मन विचरण की यात्रा अन्तर्मुखी  अन्दर की यात्रा सुनिश्चित करती है तब प्रत्याहार निष्पन्न होता है इस स्थिति में संसार में रहते हुए सांसारिक वस्तुएं साधक को बाँध नहीं पातीं।

धारणा –

चित्त को किसी एक स्थान पर स्थिर कर देना धारणा कहलाता है जैसे हृदय कमल में ,नाभि चक्र में या किसी भी बाहर की वस्तु में  स्थिर कर देना धारणा कहलायेगा।

ध्यान –

ध्यान की अवस्था में ध्येय का निरन्तर मनन किया जाता है और विषय का ज्ञान स्पष्ट रूप से प्राप्त हो जाता है एवम् इस तरह से योगी के मन में ध्येय वस्तु का यथार्थ स्वरुप प्रगट हो जाता है। अतः जब ध्येय वस्तु का ज्ञान एकाकार रूप लेनेलगता है तो उसे ध्यान कहते हैं।

समाधि –

योग का अन्तिम लक्ष्य व्यक्ति को पूरी तरह से अन्तर्मुखी बनाना है समाधि, चित्त की वह अवस्था है जिसमें प्रतीति केवल ध्येय की ही होती है और चित्त का अपना स्वरुप शून्य सा हो जाता है।

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शिक्षा

शिक्षक की जवाबदेही/TEACHER’S ACCOUNTABILITY

May 19, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक अपने दायित्वबोध को समझ कर कई कार्यों को अंजाम देता है वे कार्य व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जन आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बनते हैं। एक शिक्षक की जवाब देही को भौतिक जगत बांधने की कोशिश कर सकता है लेकिन वह प्रकृति, पशु पक्षियों और सम्पूर्ण मानवता के प्रति जवाब देह है।आज बदलती हुई परिस्थितियों में शिक्षक के प्रति समय की अवधारणाओं ने करवट ली है जिससे जनमानस की सोच और आज के शिक्षक के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है।

बदलते हुए काल ने बाजारवाद का प्रभाव हर परिक्षेत्र पर छोड़ा है और अध्यापकीय परिवेश भी इससे अछूता नहीं है।श्रीवास्तव एवं पण्डा ने अपने 2006 के शोध में दर्शाया –

“शिक्षकों की जवाबदेही से तात्पर्य है कि शिक्षक दिए गए उत्तरदायित्वों को किस मात्रा व् किस सीमा तक निभाता है। ऐसा न करने पर वह कारण बताने पर बाध्य होता है। जवाबदेही अथवा प्रतिबद्धता किसी अधिकारी द्वारा सॉंप गए कार्य को गुणात्मक एवं सर्वोत्तम रूप से अधिकारी के निर्देशन अनुरूप करने का बंधन एवं कार्य है।” 

हुमायूं कबीर के वे शब्द याद आते हैं –

“शिक्षक ही राष्ट्र के भविष्य निर्माता हैं।”

इस तरह के विचार जवाबदेही हेतु और विवश करते हैं। जिसे हम इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

शिक्षक की जवाबदेही का वर्गीकरण  [Classification of teacher accountability]-

A – व्यक्तिगत जवाब देही (Personal accountability)

(1) – स्वयं के प्रति

                        (2) – स्वयं के छात्र के प्रति

B – सामाजिक जवाब देही (Social accountability)

1 – सामाजिक आदर्श स्थापन हेतु

2 – भविष्य की दिशा निर्धारण हेतु

3 – सामाजिक कुरीति उन्मूलन हेतु

4 – सामाजिक सुदृढ़ीकरण हेतु जवाब देही

 C - राष्ट्र के प्रति जवाबदेही (Accountability to the nation)

                        (1) – एकता हेतु 

                        (2) – अधिकारियों के प्रति जवाबदेही

(3) – राष्ट्रोत्थान हेतु जवाबदेही

(4) – विश्वबन्धुत्व हेतु जवाबदेही

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शिक्षा

TEACHER AUTONOMY/शिक्षक स्वायत्तता

May 18, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक स्वायत्तता से आशय उस शक्ति से है जिससे एक अध्यापक को अपना स्वयं पर फैसला करने का अधिकार मिलता है यहाँ स्वयं पर फैसला से तात्पर्य स्वयं के दायित्वबोध के निर्वहन हेतु उपयुक्त विधि के प्रयोग से लिया जा सकता है वह अपने कार्यों के सम्पादन हेतु सम्प्रभु है। वास्तव में स्वायत्तता एक प्रकार की सम्प्रभुता ही है जिससे निर्णय लेने में उत्तमता आती है।

उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि स्वायत्तता से आशय है किसी अन्य के हस्तक्षेप के बिना व्यक्ति विशेष , राज्य, संस्था,का देश के अधिकार क्षेत्र में विषयों और मामलों में स्वतन्त्र निर्णय लेना।

कॉलिन्स (Collins) महोदय कहते हैं कि   –

“स्वायत्तता का अर्थ उस योग्यता से लगाया जा सकता है जो व्यक्ति को दूसरों के कथनों या विचारों से प्रभावित होने के बजाय स्वयं निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।”

शिक्षक स्वायत्तता का कार्य क्षेत्र (Scope of teacher autonomy)

[A] – विद्यालय परिक्षेत्र में (In school premises)

[B] – विद्यालय परिक्षेत्र के बाहर (Outside school premises)

[A] – विद्यालय परिक्षेत्र में (In school premises)

        1 – पाठ्य क्रम सम्प्रेषण

        2 – शिक्षण विधियों के प्रयोग में

        3 – विद्यालय का वातावरण

        4 – पाठ्य सहगामी क्रियाओं में

        5 – समाज उत्पादक कार्यों से सम्बद्धता

        6 – अनुशासन

        7 – शिक्षक छात्र सम्बन्ध

[B] – विद्यालय परिक्षेत्र के बाहर (Outside school premises)

         1 – पाठ्य क्रम निर्माण में सहभागिता

         2 – शिक्षा सम्बन्धी नीति निर्णयन

         3 – प्रश्न पत्र निर्माण।

         4 – मूल्याङ्कन व सुधार

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शिक्षा

वैदिक कालीन शिक्षा[2500 ई ०पू ०-500 ई ०पू ०]

May 12, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

वैदिक कालीन शिक्षा एवम् सामाजिक व्यवस्था पर ब्राह्मणों का एक मात्र अधिकार था इसलिए वैदिक शिक्षा को ब्राह्मणीय शिक्षा के नाम से भी जानते हैं कुछ इतिहासकार इसे वैदिक काल,उत्तर वैदिक काल,ब्राह्मण काल,उपनिषद काल,सूत्र काल और स्मृतिकाल में विभक्त कर वर्णित करते हैं परन्तु इन सभी कालों में वेदों की प्रधानता रही अतः इस सम्पूर्ण काल को वैदिक काल कहते हैं।

वैदिक शिक्षा का अर्थ – वैदिक साहित्य में ‘शिक्षा’ शब्द विद्या,ज्ञान, प्रबोध एवम् विनय आदि अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। वैदिक शिक्षा का तात्पर्य शिक्षा के उस प्रकार से था जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके और वह धर्म के आधार पर वर्णित मार्ग पर चलकर मानव जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सके जैसा  अल्तेकर महोदय ने लिखा –

“शिक्षा को ज्ञान, प्रकाश और शक्ति का ऐसा स्रोत माना जाता था जो हमारीशारीरिक,मानसिक,भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों तथा क्षमताओं का उत्तरोत्तर और सामन्जस्य पूर्ण विकास करके हमारे स्वभाव को परिवर्तित करती है और उत्कृष्ट बनाती है।”

“Education was regarded as a source of illumination and power which transforms and ennobles our nature by the progressive and harmonious development of our physical, mental, intellectual and spiritual powers and faculties.

 A.S.Altekar; Education in Ancient India    

1973, p. 8

शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श –

चूंकि जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना था इसलिए इसके अनुसार ही शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श निर्धारित किये गए जैसा कि अल्तेकर महोदय ने लिखा –

 “प्राचीन भारतीय उद्देश्यों एवम् आदर्शों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है – ईश्वर भक्ति की भावना एवम् धार्मिकता का समावेश, चरित्र का निर्माण,व्यक्तित्व का विकास, सामाजिक कर्तव्यों को समझाना,सामाजिक कुशलता की उन्नति तथा संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार।”

“Infusion of a spirit of piety and religiousness, formation of character, development of personality, inculcation of civic and social duties, promotion of social efficiency and preservation and spread of national culture may be described as the chief aims and ideals of ancient Indian Education.” – A. S. Altekar,pp8-9

1 – धर्म परायणता की भावना एवम् धार्मिकता का समावेश

      (Infusion of a spirit of piety and religiousness)

2 – सामाजिक कुशलता की उन्नति (Promotion of Social Efficiency)

3 – चरित्र निर्माण (Formation of character)

4 – व्यक्तित्व का विकास (Development of personality)

5 – नागरिक एवम् सामाजिक कर्त्तव्यों की समझ (Inculcation of civic and social duties)

6 – राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण व प्रसार (Preservation and spread of National culture)

शिक्षा व्यवस्था (Organization of Education) –

01 – गुरुकुल प्रवेश

02 – उपनयन संस्कार

03 – पाठ्य क्रम

04 – शिक्षण विधि

05 – शिक्षा की अवधि

06 – शिक्षण सत्र

07 – अवकाश

08 – शिक्षण संस्थाओं का समय

09 – शिक्षण शुल्क व अर्थ व्यवस्था

10 – शिक्षा वाह्य नियन्त्रण से मुक्त

11 – परीक्षाएं व उपाधियाँ

12 – समावर्तन संस्कार

विशिष्ट शिक्षाएं –

1 – स्त्री शिक्षा

2 – व्यावसायिक शिक्षा

3 – पुरोहितीय शिक्षा

4 – सैनिक शिक्षा

5 – वाणिज्य शिक्षा

6 – कला कौशल की शिक्षा

7 – आयुर्वेद शास्त्र 

8 – पशु चिकित्सा

वैदिक शिक्षा का मूल्याँकन –

गुण :-

1 – धार्मिक भावना का विकास

2 – चरित्र निर्माण

3 – व्यक्तित्व का विकास

4 – नागरिक व सामाजिक उत्तरदायित्व भावना का विकास

5 – सामाजिक सुख समृद्धि की वृद्धि

6 – राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण व विकास

7 – गुरु छात्र सम्बन्ध

8 – पवित्र प्राकृतिक वातावरण

दोष :-

1 – धार्मिकता पर अधिक बल

2 – भौतिक विज्ञानों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान

3 – लोक भाषाओँ की उपेक्षा

4 – विषयों में समन्वय का अभाव

5 – हस्त कार्य के प्रति हे भावना

6 – स्त्री शिक्षा की उपेक्षा

7 – शूद्रों के साथ न्याय नहीं

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शिक्षा

प्रजातन्त्रीय भारत में शिक्षा के उद्देश्य [Aims of Education in Democratic India ]

May 3, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जिन्हें शिक्षा के उद्देश्य कहा जाता है वास्तव में वे सम्पूर्ण मानवता के उद्देश्य होते हैं और शिक्षा वह साधन है जिससे यह उद्देश्य प्राप्त किए जाते हैं।लेकिन बलचाल में हम शिक्षा के उद्देश्य का प्रयोग करते हैं और ये इतने आवश्यक हैं कि बी ० डी ० भाटिया जी को कहना पड़ा कि :-

“Without the knowledge of aims, the educator is like a sailor who does not know the goal or his determination, and the child is like a rudderless vessel which will be drifted along somewhere ashore.”

“उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मन्जिल को नहीं जानता है और बालक उस पतवार विहीन नौका के सामान है जो लहरों के थपेड़े खाकर किसी भी किनारे जा लगेगी।”’

प्रजातन्त्रीय देश भारत के उत्थान हेतु यह परम आवश्यक होगा कि वह लोकतन्त्र की मर्यादा के अनुरूप सम्पूर्ण देश की शिक्षा हेतु उद्देश्यों का निर्धारण करे और इस उद्देश्य निर्धारण में निम्न बिन्दु महती भूमिका का निर्वहन करेंगे। सुविधा की दृष्टिकोण से इन्हें तीन भागों में विभक्त किया गया है।

[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य

[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य

[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य

[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य

01 – शारीरिक विकास

02 – चारित्रिक विकास

03 – आध्यात्मिक विकास

04 – मानसिक विकास

05 – सांस्कृतिक विकास

06 – वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास

07 – सकारात्मक रूचि का विकास

08 – चिन्तन शक्ति का विकास

09 – आर्थिक सक्षमता का विकास

10 – प्रजातान्त्रिक नागरिकता का विकास

[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य

01 – कल्याणकारी राज्य की स्थापना

02 – सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास

03 – सामाजिक बुराइयों का अन्त

04 – जन शिक्षा का प्रसार

05 – वातावरण से सामन्जस्य शक्ति का विकास

[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य

01 – राष्ट्रीय एकता

02 – भावनात्मक एकता

03 – अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का विकास

04 – बेरोजगारी निवारण, व्यावसायिक विकास

05 – उत्पादन क्षमता में वृद्धि

06 – आधुनिकीकरण शक्ति का विकास

07 – मूल्य संरक्षण

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शिक्षा

शिक्षक स्वायत्तता और जवाबदेही (Teacher autonomy and accountability)

April 24, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक स्वायत्तता से आशय –

शिक्षक स्वायत्तता का सीधा सादा अर्थ है शिक्षक को उसके निमित्त कार्यों में स्वतन्त्रता। शिक्षक के दायित्व बदलते समय के साथ सामाजिक मांगों के अनुरूप परिवर्तित होते रहते हैं और सारी समस्याओं के निदानीकरण हेतु शिक्षा की और देखा जाता है जिसका निर्वहन शिक्षक को करना होता है शिक्षक को स्वतंत्र चिंतन के साथ स्वायत्त रूप से कार्य करने की आवश्यकता यहीं से पारिलक्षित होने लगती है। शिक्षक स्वायत्तता वस्तुतः अधिगम को प्रभावी व व्यावहारिक बनाने के  लिए  विषयवस्तु की आवश्यकतानुरूप शिक्षक द्वारा बिना किसी बाहरी दवाब से प्रभावित हुए कार्य को परिणति तक पहुँचाने से है।

            यह कोई ऐसी निश्चित सत्ता नहीं है जो कुछ लोगों के पास होती है और कुछ के पास नहीं यह संस्थान,पाठ्यक्रम ,राज्य तन्त्र से सीधे प्रभावित होती है वैतनिक अध्यापक निर्धारित पाठ्यवस्तु को अपनी क्षमता के अनुसार अधिगम कराने हेतु शिक्षण विधियों व सम्प्रेषण के लिए स्वायत्त है। . संजीव बिजल्वाण महोदय ने प्रवाह मई -अगस्त 2015 में ‘अध्यापक स्वायत्तता ‘ नमक लेख में लिखा –

“बदलते सन्दर्भों, मायनों,व भूमिकाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण बात हे शिक्षक और शिक्षार्थी की स्वायत्तता। सीखने और सिखाने की प्रक्रिया तभी लचीली और सन्दर्भ व परिवेश आधारित होगी जब शिक्षक इसके लिए स्वायत्त होगा। ” 

अध्यापक स्वायत्तता से आशय विविध परिसीमाओं के अन्तर्गत शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षक द्वारा स्वायत्त रूप से कार्य करने से है।

शिक्षक स्वायत्तता और विविध काल –

a – वैदिक काल

b – बौद्ध काल

c – मुस्लिम काल

d – ब्रिटिश शासन काल

e – आजाद भारतीय कालावधि

आज का अध्यापक एक व्यवस्था (System ) का एक हिस्सा है जो राज्य द्वारा संचालित होता है और यह राजनीति से इतना अधिक प्रभावित है की गलत तथ्यों ,गलत इतिहास व अनावश्यक परोसने से भी नहीं चूकता। व्यवस्था है किसी हाथ में और दिखती दूसरे हाथों में है।

शिक्षक स्वायत्तता का यथार्थ –

जब समाज व राष्ट्र के उत्थान हेतु पाठ्यक्रम निर्माण से लेकर अधिगम तक के सम्पूर्ण कालन्तराल पर विविध विज्ञ अध्यापकों के स्वतन्त्र मौलिक विचारों की छाप दिखाई देने लगेगी कुछ लोगों के निहित स्वार्थों से ऊपर उठ शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था एक स्वायत्त पक्षपात पूर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठ राष्ट्रवाद के आलोक में निर्णय लेने में सक्षम होगी। जब वास्तविक अध्यापक शिक्षा की विविध नीतियों के निर्माण से लेकर परिणाम की प्राप्ति तक प्रभावी भूमिका बिना किसी बाहरी दवाब के निभाएगा। वास्तविक अर्थों में शिक्षक स्वायत्तता होगी।

शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही –

आजाद भारत की सारी व्यवस्थाएं न तो शिक्षा के साथ न्याय कर पाईं और न सम्पूर्ण अध्यापकों के साथ, सभी राजनैतिक पार्टियां शिक्षा के दायित्व से अपना हाथ खींचने में लगीं रहीं। परिणाम यह हुआ कि लगभग 80 %शिक्षा व्यवस्था व्यक्तिगत हाथों में पहुँचकर व्यक्तिगत लाभ का साधन मात्र बनकर रह गयीं। अध्यापक बेचारा बन गया उसके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे और सारी स्वायत्तता अपने सच्चे अर्थ खो बैठी। वर्तमान भारत में सम्पूर्ण शिक्षा की व्यवस्था की जिम्मेदारी का निर्वहन निम्न माध्यम से सम्पन्न होता है और इनमें स्वायत्तता व जवाबदेही की स्थिति में अन्तर स्पष्ट द्रष्टव्य है –

1 – सरकारी संस्थाएं

2 – गैर सरकारी संस्थाएं

1 – सरकारी संस्थाएं –

इसमें सरकारी व अर्धसरकारी संस्थान आते हैं। माध्यमिक स्तर तक अलग अलग राज्यों के बोर्ड व्यवस्थाओं को संभालते हैं सीधे शासन की नीतियों के अनुरूप कार्य सम्पादित होते हैं बहुत बड़े तंत्र के रूप में इनका विकास हुआ है केन्द्रीय व राज्य स्तर पर विभिन्न नियमों विनियमों के आधार पर कार्य सम्पादित होता है।

और अध्यापक स्वायत्तता अलग अलग नियामक सत्ताओं द्वारा कार्य करने के कारण बाधित होती है चूंकि स्वायत्तता व सामञ्जस्य का स्तर निम्न है अतः जवाबदेही का स्तर भी बहुत प्रभावी नहीं बन पड़ा है। इन शिक्षण संस्थाओं में बहुत अधिक परिवर्तन की आवश्यकता है मर्यादित स्वायत्तता व प्रभावी जवाबदेही की उचित व्यवस्था न होने के कारण ,मोटा वेतन देने के बाद भी इनके विश्व स्तरीय बनाने में संदेह है।

 उच्च शिक्षा के स्तर पर स्थिति अत्यन्त दयनीय है इसमें प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर उनके मूल्याँकन तक में अध्यापक भागीदारी दिखाई देती है जितने भी अतिरिक्त लाभ के कार्य हैं बखूबी निभाए जाते हैं सिर्फ कक्षा शिक्षण के, अधिकाँश विद्यार्थी अधिकाँश जगह अनुपस्थित रहते हैं नाम मात्र की कक्षागत क्रियाएं होती हैं। शासन के साधनों का उपयोग कम दुरूपयोग अधिक देखने को मिलता है महाविद्यालय से लेकर विश्विविद्यालय तक आमूलचूल परिवर्तन की दरकार है कोई ऐसा विश्वविद्यालय खोजना मुश्किल होगा जहाँ दलाल न हों। अध्यापक स्वायत्तता, शिक्षण वातावरण के अभाव में कुप्रभावित है जवाबदेही के अभाव का प्रभाव कार्यों पर देखा जा सकता है नाम मात्र के लोग जिम्मेदारी से कार्य निर्वहन करते हैं व्यवस्था भ्रष्ट आचरण से प्रभावित दिखती है।

2 – गैर सरकारी संस्थाएं –

शासन की नीतियों के कारण ये संस्थाएं सरकारी संस्थाओं की तुलना में तीन से चार गुने विद्यार्थियों के अधिगम की व्यवस्था कर रही हैं कुछ समितियों द्वारा भी इनका संचालन किया जा रहा है लेकिन इन पर शासन द्वारा निर्धारित संस्थाओं का अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहता है ये स्ववित्त पोषित संस्थान, विविध कार्यों हेतु शासन के संस्थानों के अनुरूप कार्य करने को बाध्य होते है जिनके प्रतिनिधि हर कार्य के बदले भौतिक लाभ लेते हैं  प्रायोगिक परीक्षाओं में शतप्रतिशत प्रथम श्रेणी इन्हीं की कृपा दृष्टि का परिणाम है।

अध्यापकों के साथ भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण के कारण न तो इन संस्थाओं को शासन से उचित लाभ मिल पाता है और न इनके अध्यापकों को। समान कार्य के लिए असमान वेतन प्राप्त करने के साथ अल्प वेतन भोगी अध्यापक आयाराम गयाराम की भूमिका में अधिक देखा जाता है। इनकी पूर्ण स्वायत्तता की तो कल्पना ही व्यर्थ है  हाँ अधिगम को प्रभावी बनाने के लिए ये स्वायत्त रूप निर्णय लेते हैं और यह तुलनात्मक रूप से अधिक जवाब देह होते हैं। प्रबन्धन के सीधे सम्पर्क में रहने के कारण ये कार्य दायित्व निर्वहन के प्रति अधिक सजग रहते हैं।

            यदि समग्र रूप से विवेचना की जाए तो यह मानना ही होगा कि कुछ अच्छे लोगों ने ही सम्पूर्ण व्यवस्था को सही दिशा दे रखी है और ये सब जगह हैं इनकी संख्या सीमित है और ये अपने कार्य के प्रति उत्तरदायित्व पूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं और जवाबदेही स्वीकार करते हैं। राष्ट्रोत्थान हेतु सीमित शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित करना परम आवश्यक है।

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शिक्षा

आत्मअभिव्यक्ति/Self Expression

April 18, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आत्म अभिव्यक्ति से आशय (MEANING OF SELF EXPRESSION )-

आत्म अभिव्यक्ति एक महत्त्वपूर्ण व कम व्याख्यायित शब्द है हिन्दी भाषा में आत्म शब्द स्व का परिचायक है और अभिव्यक्ति का आशय सरल शब्दों में प्रगटन से है। विकीपीडिया के अनुसार : –

 “अभिव्यक्ति का अर्थ विचारों के प्रकाशन से है व्यक्तित्व के समायोजन के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अभिव्यक्ति को मुख्य साधन माना है । इसके द्वारा मनुष्य अपने मनोभावों को प्रकाशित करता तथा अपनी भावनाओं को रूप देता है।”

साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति से आशय प्रगटन से है और स्वयम का प्रगटन चाहे वह किसी भी माध्यम से हो,आत्म अभिव्यक्ति कहलाता है।

आत्म अभिव्यक्ति के प्रकार (TYPES OF SELF EXPRESSION)-

विविध विद्वानों ने इसे विविध प्रकार से विवेचित किया है जिससे इसका स्वरुप जटिल हो गया है लेकिन मुख्य रूप से इसके प्रकारों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है। –

1 – शाब्दिक

 (a )- लिखित

 (b) – मौखिक

2 – अशाब्दिक -समस्त कलाएं

3 – चेतन शारीरिक भाषा  

आत्म अभिव्यक्ति को सुधारने के उपाय   (Ways to improve self expression) –

आत्म अभिव्यक्ति को सुधारने के उपायों को समझने हेतु यह आवश्यक है कि आत्म अभिव्यक्ति को प्रभावित करने वाले कारक  (TYPES OF SELF EXPRESSION) की समझ विकसित करने के साथ निम्न बिंदुओं पर गहनता से सम्पूर्ण क्षमता भर ध्यान दिया जाए। 

शारीरिक भाषा (Body Language) में सुधार हेतु वे सभी प्रयास सम्मिलित किये जाने चाहिए जो कौशल विकास से सम्बंधित हैं।

अशाब्दिक अभिव्यक्ति हेतु निरन्तरता ,जिज्ञासा, धैर्य, क्षमता सम्वर्धन की अनवरत साधना परमावश्यक है।

  आत्म अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाने हेतु डॉ ० सतीश बत्रा जी का मानना है कि सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति में निम्न का विशेष संज्ञान लिया जाए –

1 – अधिक

2 – अनावश्यक

3 – अप्रिय

4 – अप्रासंगिक

5 – असमय

6 – असम्बन्धित

7 – अपात्र

साथ ही बत्राजी प्रभावी अभिव्यक्ति हेतु KISSSSS पर विशेष जोर देते हैं जिसका आशय है –

K – keep

I – it

S – Simple

S – Short

S – Straight

S – Sense full 

S – Strength of evidence

यानि कि तथ्यों को सम्प्रेषित करने में बात को सरल संक्षिप्त सीधा सार्थक व प्रभावी तरीके से रखा जाए।

अन्त में अध्यापकों से मैं विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि वे यदि निम्न पर ध्यान देंगे तो अच्छी आत्म अभिव्यक्ति कर पाएंगे –

T – Talent

E – Evaluation before communication

A – Apologize for mistakes

C – Confusion Removal

H – Harmony

E – Effectiveness

R – Realistic Approach

 वस्तुतः यह तथ्य सर्व विदित है कि जहां चाह वहाँ राह ,यदि आप पूरे आत्म विश्वास से आत्म अभिव्यक्ति प्रभावी बनाने का प्रयास करेंगे तो लक्ष्य की निकटता महसूस करेंगे और जल्दी आपका सपना साकार होगा।

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