जब गम्भीरता पर विचार करते हैं तब कई शब्द मानस से टकराते हैं जिन्हे इसके आशय के आसपास स्वीकारा जाता है। जैसे अचञ्चलता, गम्भीर होने का भाव, गहनता, गाम्भीर्य, उदात्तता, गहराई, चिन्तनशीलता, सोच विचार का भाव, सन्जीदगी, स्थिरचित्त, स्थिर मनस्कता, उद्वेगहीनता, शान्त चित्तता, अचपलता आदि आंग्ल भाषा के भी कुछ शब्द जेहन में आते हैं जैसे Grimness, Sobriety, Solemnity, Seriousness आदि।
लेकिन सारे शब्दों पर उदारता पूर्ण विचार करने
और वाक्यों में प्रयोग करने पर यह स्पष्ट भान होता है कि कोई शब्द दूसरे का
वास्तविक पर्याय नहीं हो सकता।
गम्भीरता से आशय (Seriously intended)
आज
गम्भीरता स्वविवेक बुद्धि के अनुसार विविध तरीके से व्याख्यायित किया
जाता है एक व्यक्ति अपने जीवन काल के अलग अलग खण्डों में इसका अलग अलग अर्थ
व्याख्यायित करता है।
यहां मेरे द्वारा भी अपने बुद्धि विवेक द्वारा इसे जैसा समझा है देने
का प्रयास है आपका मत भिन्न हो सकता है उसे आप कमेण्ट में देकर दिशाबोध करा सकते
हैं। हम मानते हैं कि ज्ञान अनन्तिम होता है।
साधारणतः कम बोलने वाला, शान्त चित्त, उच्च विवेक स्थिति के कारण सुख दुःख में समभाव रखने वाला अन्तर्मुखी
व्यक्ति गम्भीर की श्रेणी में आता है और यही गुण गम्भीरता कहलाता है।
यह स्थिर प्रज्ञता के अधिक निकट है गम्भीरता
में हमारा समर्पण श्रेष्ठ ज्ञान के प्रति है श्रीमद्भगवद्गीता के दूसरे अध्याय के 54 वें
श्लोक में अर्जुन का प्रश्न और 55
वें
में केशव के समाधान से हम अर्थ के नज़दीक पहुँचते हैं। अर्जुन कहते हैं –
स्थितप्रज्ञस्य का
भाषा समाधिस्थस्य केशव |
स्थितधी: किं प्रभाषेत
किमासीत व्रजेत किम् ॥54॥
हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए
स्थिरबुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिरबुद्धि पुरुष
कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
हे अर्जुन, जिस काल में यह पुरुष
मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली भाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में
ही सन्तुष्ट रहता है उस काल में वह स्थिरप्रज्ञ कहा जाता है।
व्यक्ति स्व स्वरुप
में स्थिर रहकर स्वाभाविक गाम्भीर्य प्राप्त करता है। अष्टावक्र गीता के ग्यारहवें
प्रकरण में अष्टावक्र जी कहते हैं –
यदा नाहं तदा मोक्षो
यदाहं बन्धनं तदा।
मत्वेति हेलया
किञ्चित् मा गृहाण विमु़ञ्च मा।।8.4।
जब तुच्छ पदार्थों से
संयुक्त अहंकार नहीं रहता, तभी मुक्ति होती है और
बन्धन तब होता है जब तुच्छ अहंकार मन में विकास करे ऐसा मानकर अपनी इच्छा से न कुछ
ग्रहण करो और न ही कुछ छोड़ो।
अतः यह स्पष्ट भान होता
है कि गम्भीरता श्रेष्ठ ज्ञान लब्धि के बाद का स्वाभाविक स्वभाव है यह कहाँ, कब, किससे कितना विनिमय व
क्या यथोचित करना है का संज्ञान कराता है।
चिन्तनशीलता को समाधान तक पहुँचाता है।
गम्भीरता क्या नहीं है
? (What is not
seriousness?)
वर्तमान में कठिन प्रतिस्पर्धा व अस्तित्व
रक्षा प्रबल आवश्यक कर्मक्षेत्र बनकर उभरे हैं और इस क्रम में मूल्य ह्रास के भी
नए प्रतिमान गढ़े गए हैं और गम्भीरता के सम्बन्ध में कुछ मिथ्या धारणाएं बनी हैं।
असल में निम्न परिक्षेत्र गम्भीरता नहीं स्वीकारे जाएंगे।
1 – अज्ञान के कारण शान्त
स्थिति गम्भीरता नहीं है।
2 – समस्या से भागकर
निष्क्रिय होना गम्भीरता नहीं है।
3 – रूढ़ता गम्भीरता नहीं
है।
4 – मौन को प्रत्येक
प्रश्न का समाधान मानना गम्भीरता नहीं है।
5 – प्रभावी क्रोध व
दुराग्रह गम्भीरता नहीं है।
6 – समभाव से विरक्ति
गम्भीरता नहीं है।
7 – स्वाभाविक उथलापन
गम्भीरता नहीं है।
8 – प्रदर्शनकारी
चिन्तनशीलता गम्भीरता नहीं है।
वस्तुतः बहुत सी भ्रान्तियाँ दिग्भ्रमित कर
हमें गम्भीरता का वाह्य मुखौटा दिखाती हैं। हमें सजगता से सार्थक गाम्भीर्य का
अवलोकन करना होगा।
गम्भीरता के आधारभूत तत्व (fundamentals
of seriousness) –
स्वभाव में गम्भीरता स्वतः आ जाती है किसी
के कहने से नहीं स्व में डूबने से, मैं केवल शरीर नहीं के
भाव से और हमारे चिन्तन की तीव्रता हमें कब गम्भीर कर देती है पता भी नहीं चलता।
हमसे पहले अन्य को इसका अहसास पहले होता है। कुछ कारक भी इसके लिए उत्तरदाई हैं
यथा –
1 – यथार्थ स्थिति
परिस्थिति
2 – क्षमता आधारित
3 – अद्यतन अर्जित
ज्ञान से प्रभावित
4 – विवेक व विश्लेषण
शक्ति आधारित
5 – अनुभव आश्रित
गम्भीरता के लाभ (Benefits
of seriousness) –
व्यवहार के गम्भीर होने पर स्वतः कुछ लाभ
होने लगते हैं यथा
1
– ऊर्जा का समुचित प्रयोग
2
– भटकाव पर नियन्त्रण
3
– दिशाबोध जागृति में अहम्
4
– अनुभूति जागरण
5
– सम्यक ज्ञान प्राप्ति में सहयोगी
यहाँ यह कहना सामयिक
होगा की हमारे पास गाम्म्भीर्य युक्त पूर्वजों की एक लम्बी श्रृंखला है विदेह जनक, याज्ञवल्क्य, प्रसिद्द विद्वान् की
विदुषी धर्मपत्नी भारती, विद्योत्तमा, प्रभु श्री राम, युधिष्ठर, केशव, कर्ण, महर्षि पाणिनि और
वर्तमान उद्यमी,वैज्ञानिक, चिन्तक आदि।
व्यक्तित्व
विकास में मानव का सम्पूर्ण परिकलन छिपा है यह एक दिन में नहीं गढ़ा जा सकता। मानव
व्यक्तित्व परिमार्जन उसकी निरन्तर विकास यात्रा का परिणाम है। स्वभाव की चन्द
विमाएँ न तो इसका प्रतिनिधित्व कर सकती हैं न स्वयं का आकलन सर्वश्रेष्ठ निर्णय हो
सकता है । दुनिया दीर्घकाल में आपको बार बार परख कर आपके व्यक्तित्व पर दृढ
विश्वास जमाती है। व्यक्तित्व को दिशा देने वाली पिताश्री के मुख से सुनीं चन्द
पंक्तियाँ जेहन में आ रही हैं, जो याद आता है आपकी झोली में रखता हूँ –
आदमी वह है जो मुसीबत में
परेशान न हो
कोई मुश्किल नहीं ऐसी है जो आसान न हो
यह है दुनियाँ यहाँ दिन ढलते ही शाम आती है
सुबह हर रोज लेकर नया पैगाम आती है
यह हमेशा से है इस दौर औ दुनियाँ का चलन
चाँद सूरज को भी लग जाता है इक रोज ग्रहण
जानी बूझी हुई बातों से अनजान न हो
आदमी वह है जो मुसीबत में परेशान न हो .
आज जो कहने जा रहा हूँ, वह
बहुत सामान्य है और आपको लगेगा कि आपको पता था यह थोड़ा सा परिवर्तन जीवन का परिवर्तक बिन्दु भी हो
सकता है हम सँवर सकते हैं बात किताबी नहीं है बल्कि अनुभव के खजाने के कुछ विचार
हैं मुझे लगता है ये व्यक्तित्व को सही आयाम देने में अवश्य सक्षम होंगे .
व्यक्तित्व विकास के आठ उपाय / Eight tips of personality development –
1 – स्वयम्
से प्यार / Love yourself
2 – परिधान
/Apparel
3 – सद्
सङ्गति / Good fellowship
4 – धैर्य
व जोश का समागम / Patience
and passion
5 – अद्यतन
जानकारी / updated
information
6 – सम्प्रेषण
कौशल / communication
skills
7 – मुस्कराहट
का सम्यक प्रयोग / use of
smile
8 – व्यापक
दृष्टिकोण अभ्युदय / Comprehensive
outlook
1 – स्वयम् से प्यार / Love
yourself –
सृष्टि ने मानव शरीर के रूप में अद्भुत देन
हमें दी है साथ दिया है विचार विश्लेषण में सक्षम मानस। हम विचार सकते हैं कि यह
शरीर वह आलम्ब है जो जीवन पर्यन्त कर्म करेगा। अतः इसको व्यवस्थित रखना हमारा परम
दायित्व है प्राणायाम, व्यायाम, योगासन, मालिश आदि के द्वारा
इसे दीर्घ काल तक सक्षम, सुडौल, सुन्दर, आकर्षक रखा जा सकता है
तो फिर क्यों न हम इश्वर प्रदत्त का सर्वोत्तम उपयोग उक्त रूप में करें। स्वयम् से
प्यार के प्रतिफल में चुस्ती, फुर्ती, सक्षमता, के रूप में आकर्षक
व्यक्तित्व आपको प्राप्त होगा।
2 – परिधान /Apparel –
अपनी विकास यात्रा के प्रारम्भिक काल में
परिधान की आवश्यकता व शक्ति को हमने पहचान लिया था इसीलिये पेड़ की पत्तियाँ, छालें, विभिन्न पशु चर्म के उपयोग से आगे बढ़कर आज
के आकर्षक परिधानों तक की यात्रा हमने पूर्ण की है। आज विभिन्न आकार, प्रकार, का आकर्षक रंगों में परिधान उपलब्ध हैं।
हमें अपनी कद, काठी, मर्यादा, क्षमता, समय
ध्यान में रखकर अपने अनुरूप चरण से शीर्ष तक परिधान चयनित करने चाहिए। सही
चयन आपके व्यक्तित्व को और आकर्षक बना देगा।
3 – सद् सङ्गति / Good
fellowship –
यह बहुत बड़े आयाम को अपने अन्दर समेटे है और
इसीलिये यह हमें अंदर बाहर दोनों
परिक्षेत्रों में सुदर्शनीय स्थिति में लाती है यह सङ्गति अच्छे आवश्यक साहित्य, अच्छे विचार, सार्थक व्यक्तित्वों, दिशा बोधक वर्तमान व
पुरातन प्रेरक प्रसंगों की भी हो सकती है। हमारे यहां के चित्र उपस्थिति सामग्री
सभी हमारे व्यक्तित्व पर प्रभाव डालते हैं इसलिए बहुत सावधानी पूर्वक जिन्दगी
बितानी चाहिए। याद रखें सद् सङ्गति प्रवृत्तियों को संयमित रखती है और हमारे आचरण
व चरित्र का उच्चीकरण करती है और इसी पुनीत भाव से जुडी कुछ पंक्तियाँ आभार सहित
प्रस्तुत करता हूँ किसी विशिष्ट व्यक्तित्व की –
श्वाँस खींचने से पूर्व ठीक से विचार लो, कि;
श्वाँस धारने की कौन नीति होनी चाहिए,
मान या गुमान, अभिमान का विधान हो या;
कर्म में मनुष्यता प्रतीत होनी चाहिए,
काँच के खिलौने सी छुई मुई जिन्दगानी,
बड़ी सावधानी से व्यतीत होनी चाहिए,
और;भूल करना तो स्वभाव है
मनुष्य का
पर मूल में तो भावना पुनीत होनी चाहिए।
उक्त सब कुछ सम्भव होगा यदि हम सद् सङ्गति में होंगे।
4 – धैर्य व जोश का समागम / Patience and passion –
याद रखें हमारे दो प्रमुख शत्रु आलस्य और अधैर्य हमें चतुरता पूर्वक
गिरफ्त में ले लेते हैं और अच्छा खासा व्यक्तित्व बेचारे की श्रेणी में जा कर खड़ा
हो जाता है। होश के साथ जोश हो तो सोने पर सुहागा है। वरना यही कहोगे की वो तो
अभागा है। असल में धैर्य वह आलम्ब है जो हमको यथोचित व्यवहार सिखाता है और हम
सफलता की सीढ़ियां अपने सही निर्णय के आधार पर चढ़ते जाते हैं। याद रखें धैर्य व जोश
का समागम वह कार्य करा जाता है जिसका
अनुकरण करने को दुनिया विवेश होती है।आभार सहित लेता हूँ पँक्तियाँ जिनमें क्या खूब कहा गया है। –
है वही सूरमा इस जग में जो अपनी राह बताता है,
कोई चलता पद-चिन्हों पर, कोई
पद-चिन्ह बनाता है।
मुझे लगता है की यदि
व्यक्तित्व गढ़ना है तो पद चिन्ह बनाने की अपनी सक्षमता सिद्ध करनी ही होगी।
5 – अद्यतन जानकारी / updated information-
समय के साथ चलते हुए यदि उससे आगे निकलना है तो अपनी प्रासंगिकता
बनाए रखनी पड़ेगी। इसलिए यह परम आवश्यक है की हम अपनी जानकारी के स्तर को अद्यतन
रखें। प्रत्येक समस्या समाधान में हमारा
प्रयास समाधान की ओर ले जाने वाला होना चाहिए उलझाने और लटकाने वाला नहीं।
विचार विनिमय, प्रभावशाली विश्लेषण तभी सम्भव होगा जब उसकी
अद्यतन जानकारी हमारे पास होगी और तभी हम अपनी या अपने व्यक्तित्व की कोइ छाप छोड़
सकेंगे। त्वरित
समस्या को यदि त्वरित समाधान मिल जाए तो समस्या विकराल होने से बच जाती है और यह
त्वरित संज्ञान और निदान क्षमता पर निर्भर करती है। अतः अद्यतन जानकारी परम आवश्यक
है।
6 – सम्प्रेषण कौशल / Communication skills –
यहाँ यह समझना नितान्त आवश्यक है कि सम्प्रेषण बोलकर
और लिख कर दोनों तरीके से किया जाता है और यह प्रभावी तब होता है जब यह उस भाषा
में हो, जिस तक पहुँचाना है। जिस तरह संस्कृत निष्ठ
बाल्मीकि रामायण का जब बाबा तुलसी ने सरल भाषा में प्रस्तुतीकरण किया तो यह सहज
सम्प्रेषणीय बन गयी।
जब बुद्ध जी से पुछा गया की ज्ञान किस भाषा में सम्प्रेषित हो तब
उनका जवाब था जिस भाषा में समझ में आये।
सम्प्रेषण की कला जादू सा
प्रभाव रखती है और इसमें निपुण जादुई व्यक्तित्व वाला स्वीकार किया जाता है। इन
शब्दों और कहने के अन्दाज से बहुत बड़ी जान संख्या को प्रभावित किया जा सकता है।
शास्त्री जी, इन्दिरा जी, विनोबाजी, विवेका नन्द जी और वर्तमान में मोदीजी इसी
श्रेणी में हैं। एक ही कथा अलग अलग श्री
अलग अलग प्रभाव छोड़ती है। इसीलिये कहा जाता है सफल वक्ता सफल व्यक्तित्व।
मेरा कहना हे कि –
प्रेम और सद्भाव का झरना, तब
झर-झर बहता जाता,
यदि तथ्य निरूपण में हमको सम्प्रेषण कौशल आता।
7 – मुस्कुराहट का सम्यक प्रयोग / Use of smile –
मुस्कराहट कई प्रश्नों
का जवाब है, इससे कई चिन्ताओं को हवा में उड़ाने की ताक़त
मिलती है यदि आपके पास बच्चों सी निस्वार्थ मुस्कान है तो समझिए आप सौभाग्यशाली
हैं। मुस्कराहट इसलिए नहीं होती कि जिंदगी में खुशियाँ बहुत हैं बल्कि यह इसलिए
होती है कि जिन्दगी में हार न मानने का जज्बा अधिक है।
किसी ने क्या खूब कहा है कि –
बाँटो मुस्कुराहट इतनी कि
किसी आँख में पानी न हो।
जियो जिन्दगी जिन्दादिली से
जीत कभी बेमानी न हो।
विषम स्थिति में आपकी मुस्कुराहट आपके बहुत से गुणों की अभिव्यक्ति
करती हैं याद रखिये रोते हुए उतने समाधान नहीं मिलते जितने सहज मुस्कान के साथ
मिलते हैं। आपकी मुस्कराहट आपके व्यक्तित्व में गजब का इजाफा करती है। आपक
व्यक्तित्व खुशनुमा व्यक्तित्व कहलाता है। दूरदर्शन पर रामायण के राम और महाभारत के कृष्ण
की मुस्कराहट से आप प्रभावित तो हुए ही होंगे जब कि यह अभिनय था।
सत्य कितना प्रभावी होगा।
8 – व्यापक दृष्टिकोण अभ्युदय / Comprehensive outlook-
वह व्यक्तित्व ज्यादा प्रभावी होता है जो जितने बड़े क्षेत्र के उत्थान में
योग देता है और जो केवल अपने लिए नहीं जीता। इस संस्कृत श्लोक में कितने सहजता से
यह बात कही गयी है –
अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्
उदारचरितानां तू वसुधैव कुटुम्बकम।
भारतीय दर्शन, अष्टाङ्ग योग इतनी क्षमता रखते हैं की यदि
इनका अध्ययन किया जाए तो संकीर्ण दृष्टिकोण विकसित हो ही नहीं सकता। गीताएं, वेद, पुराण इसी क्रम में आते हैं। इसीलिए यथा सम्भव
इनका अध्ययन किया जाए। लोग आपके
व्यक्तित्व के कायल हो जाएंगे।
व्यक्तित्व शब्द पुरातन काल खण्ड का एक महत्त्वपूर्ण विषयवस्तु है
अथर्ववेद में सतोगुणी, रजोगुणी,और
तमोगुणी व्यक्तित्वों के बारे में बताया है यह त्रिगुणी अवधारणा मानव चेतना की
यात्रा के अंश हैं सत्व,स्थिरता का रज सक्रियता का तथा तम जड़त्व से
सम्बद्ध है। इन्हें आगे चलकर सांख्य दर्शन ने अपनाया। श्रीमद्भगवद्गीता में
व्यक्तित्व पर सारगर्भित दिशा निर्देश है। सामान्य अर्थों में व्यक्तित्व को बाहरी
सौन्दर्य व सद्गुणों के समाविष्ट स्वरुप के रूप में देखा जाता है।
पाश्चात्य दृष्टिकोण में व्यक्तित्व आंग्ल भाषा
के Personality शब्द का समानार्थी है।यह शब्द लेटिन के परसोना (Persona)
से विकसित हुआ जिससे आशय है नकली चेहरा या
मुखौटा अर्थात उस काल में शरीर रचना, पोशाक, रंगरूप आदि वाह्यगुण व्यक्तित्व में समाहित
स्वीकार किये गए।
विभिन्न दृष्टिकोणों व मतों के कारण अलग अलग
विद्वतजनों ने इसे अलग अलग तरह से पारिभाषित किया उनमें से कुछ यहां द्रष्टव्य हैं
यथा –
Allport / आलपोर्ट महोदय के अनुसार
“Personality is the dynamic
organisation within the individual of those psychophysical systems that
determine his unique adjustment to his environment.”
“व्यक्तित्व,
व्यक्ति
में उन मनोदैहिक व्यवस्थाओं का संगठन है जो वातावरण के साथ उसका सुसमायोजन स्थापित
करता है। ”
munn,N.L
के अनुसार
“Personality may be defined as
the most characteristic integration of an individual’s structures, modes of
behaviour, interests attitudes, capacities, abilities, and aptitudes.”
“व्यक्तित्व एक व्यक्ति के गठन व्यवहार के
तरीकों, रुचियों,
दृष्टिकोणों,
क्षमताओं
और तरीकों का सबसे विशिष्ट संगठन है।”
May and
Hartshorn महोदय का मानना है कि –
“Personality
is that which makes one effective and gives influence over others.”
“व्यक्तित्व, व्यक्ति का वह स्वरुप है जो उसे प्रभावशाली
बनाता है और दूसरों को प्रभावित करता है। ”
Drever महोदय इस सम्बन्ध में कहते हैं –
“Personality
is a term used for the integrated and dynamic organization of the physical,
mental, moral, and social qualities of the individual, as that manifests itself
to other people, in the give and take social life.”
“व्यक्तित्व शब्द का प्रयोग, व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, और सामाजिक गुणों के सुसंगठित और गत्यात्मक
संगठन के लिए किया जाता है, जिसे वह अन्य व्यक्तियों के साथ अपने सामाजिक जीवन के आदान प्रदान
में व्यक्त करता है।”
व्यक्तित्व
के प्रकार / Types
of Personality –
व्यक्तित्व
के कोई निश्चित प्रकार नहीं बताये जा सकते इसीलिये विविध विद्वानों द्वारा इन्हें
अलग अलग तरह से वर्गीकृत किया गया है।सामान्यतः इन्हें निम्न तीन भागों में बाँटकर
अध्ययन करेंगे –
1 – शरीर बनावट के आधार पर (Based on body composition)
2 – समाजशास्त्रीय प्रकार (Sociological type)
3 – मनोवैज्ञानिक प्रकार (Psychological type)
1 – शरीर बनावट के आधार पर (Based on body composition)–
क्रेचमर
(Kretschmer) महोदय इन्हें चार भागों में बाँटा है जो इस
प्रकार है –
A – मिलनसार (Pyknic) – सामान्य कद काठी के मृदुभाषी व्यक्ति मित्रता, अच्छे स्वभाव और मिलनसारिता के गुण से युक्त
होते हैं ये समाज से मिलकर चलते हैं।
B – एकान्तप्रिय (Leptosome) – ये कमजोर, शर्मीले, चुप
रहने वाले, अन्तर्मुखी प्रवृत्ति के होते हैं।इन्हें
एकान्त पसन्द होता है।
C – चुस्त (Athletic) – इस प्रकार के व्यक्ति का सीना चौड़ा व उभरा, कन्धे चौड़े, मजबूत
माँसपेशियाँ, ताक़तवर भुजाएं, हृस्टपुष्ट स्वस्थ शरीर होता है। इन्हे चुस्त(Athletic) व्यक्तित्व वाला कहते हैं।
D – मिश्रित (Dysplastic) -इस तरह के व्यक्ति लम्बे, चौड़े, मोटे होते हैं और इनमें ऊपर वर्णित प्रकारों का
आंशिक सम्मिश्रण होता है।
2 – समाजशास्त्रीय प्रकार (Sociological type)-
स्प्रेंगर
/ Spranger महोदय ने अपनी पुस्तक “Types of Men” में 6 प्रकार के व्यक्तित्व बताए हैं –
1 – वैचारिक (Theoretical) – दार्शनिक, आविष्कारक, वैज्ञानिक आदि को इसमें स्थान दिया जाता
है।
2 – आर्थिक (Economic) – ऐसे व्यक्ति धन को अधिक महत्ता प्रदान करते
हैं। व्यवसायी, दुकानदार, उद्योगी
आदि इसके अन्तर्गत आते हैं।
3 – सौन्दर्यात्मक (Esthetic) – सौन्दर्य
व कला को महत्ता प्रदान करने वाले इस श्रेणी में आते हैं। यथा चित्रकार, साहित्यकार, कलाकार
आदि।
4 – धार्मिक (Religious) – ईश्वर में आस्था रखने वाले,सशक्त आध्यात्मिक पक्ष वाले लोग इसमें आते हैं
जैसे संत, पुजारी, पादरी, भक्त, मुल्ला
मौलवी इसके तहत आते हैं।
5 – सामाजिक (Social) – सामाजिक हितों व सामाजिक समस्याओं से जूझने
वाले लोग इसमें गिने जाते हैं जैसे विनोबाजी, गाँधीजी, नेल्सन मंडेला,दयानन्द सरस्वती आदि।
6 – राजनैतिक (Political) – सत्ता, नियन्त्रण, प्रभुसत्ता, राज
व्यवस्था के दावपेचों से उलझने वाला इस क्षेत्र में आता है जैसे नेता, मन्त्री, आदि।
3 – मनोवैज्ञानिक प्रकार (Psychological type)-
मनोवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर जिन विद्वानों ने व्यक्तित्व का वर्ग
विभाजन किया है उनमें C.G.JUNG को सर्वाधिक स्वीकार किया जाता है इनका पुस्तक
“Psychological
Types” दिया गया विवरण आज भी महत्ता रखता है इन्होने
व्यक्तित्त्व वर्गीकरण इस प्रकार किया है –
1 – बहिर्मुखी (Extrovert)
– ऐसा
व्यक्तित्व बहुत सामाजिक बाहरी दुनिया से मेलजोल बढ़ाने वाला व्यक्तिगत धन या
स्वास्थ्य की कम परवाह कर नई परिस्थितियों से सुसमायोजन कर लेता है। इनका
आत्मविश्वास बहुत अच्छा होता है, ये विज्ञापन, भाषण कला, प्रकाशन आदि के द्वारा दूसरों को अपने अनुकूल
बना लेते हैं यथा शास्त्रीजी, श्रीमति इन्दिरा गाँधी,
नरेन्द्र मोदी जी,
विवेकानन्द जी आदि को समझा जा सकता है।
2 – अन्तर्मुखी (Introvert)
– ये
बहुधा अपनेआप में खोये रहते हैं किताबें पढ़ना, निर्धनता में खुश रहना,
सामाजिक व्यवहार निर्वाहन में संकोची,
स्वयं के प्रगटन से परे,
शीघ्र दुःखी होने वाला,
कम लोचपूर्ण दृष्टिकोण,
संसार की परवाह न कर स्वपथ पर अग्रसर,
कम बोलने वाला, बहिर्मुखी से अधिक कार्य क्षमता वाला होता
है।
3 – उभयमुखी (Ambivert)
– ऐसे
व्यक्ति किन्ही परिस्थितियों में अन्तर्मुखी व भिन्न परिस्थिति में बहिर्मुखी
व्यक्तित्व वाले होते हैं आपने भी देखा होगा एक अच्छा लिखने वाला और बोलने वाला
एकान्त में कार्य करना पसन्द करता है।
जुंग
महोदय ने इस सिद्धान्त की आगे और व्याख्या की है जिससे यह बहुत बड़ा हो जाता है
उसने अंतर्मुखी व बहिर्मुखी को चार चार भागों में बांटा है –
1 – विचार प्रधान (Ideological)
2 – तर्क बुद्धि प्रधान (Logic minded)
3 – भाव प्रधान (Sentimental)
4 – दिव्य दृष्टि प्रधान (Celestial vision)
इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्तित्व को
कई प्रकार से वर्गीकृत किया जा सकता है। क्रो व क्रो ने विभिन्न दृष्टिकोणों की आलोचना हुए कहा –
“A general criticism of such
classifications is the tendency to place emphasis upon one or another phase of
development and to deal with extremes rather than with the mediocrity of human
nature.”
“इस
प्रकार के वर्गीकरणों की एक सामान्य आलोचना यह है कि यह विकास के किसी न किसी पहलू
पर बल देते हैं और सामान्य मानव स्वभाव की अपेक्षा उसके उग्र रूपों की व्याख्या
करते हैं।”
व्यक्तित्व
विशेषक / Traits
of Personality –
व्यक्तित्व
का निर्धारण उसकी विशेषता या गुणों के आधार पर होता है। गैरट महोदय कहते
हैं –
“Personality
traits are distinctive ways of behaving more or less permanent for a given
individual. Personality traits are neat short ways of describing the multifold
aspects of behaviour.”
“व्यक्तित्व के गुण व्यवहार करने की निश्चित
विधियाँ हैं जो प्रत्येक व्यक्ति में बहुत कुछ स्थाई होती हैं। व्यक्तित्व के गुण, व्यवहार के बहुसंख्यक स्वरूपों का वर्णन करने की
स्पष्ट और संक्षिप्त विधियां हैं।”
व्यक्तित्व
के अंगों को हम दो भागों में विभक्त कर विशेषता बता सकते हैं –
1 – प्रत्यक्ष – शारीरिक विशेषक
2 – अप्रत्यक्ष (क्रिया आधारित) – बौद्धिक, सामाजिक, संवेगात्मक,चारित्रिक व अन्य विशेषक।
उक्त
विशेषक भी अपने आप में बहुत से गुण रखते हैं जिन्हे इस प्रकार विवेचित कर सकते
हैं।
A – शारीरिक विशेषक (Physical Traits) B – बौद्धिक विशेषक (Intellectual Traits)
सामाजिक विशेषक (Social Traits)
संवेगात्मक विशेषक (Emotional Traits)
चारित्रिक विशेषक (Character Traits)
अन्य
विशेषक (Other
Traits)
व्यक्तित्व
के सिद्धान्त / Theories
of Personality –
मनोवैज्ञानिकों
हेतु यह परमावश्यक हो गया कि व्यक्तित्व का अध्ययन किया जाए लेकिन सच्चाई यह है कि
एक नहीं बहुत से कारक हैं जो व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं विविध वैयक्तिक
धारणाओं के आधार पर विविध सिद्धांतों का उदय हुआ है उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण
सिद्धांत देने का यहां प्रयास है –
मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त – यह मत सिग्मण्ड
फ्रायड की देन है फ्रायड के अनुसार व्यक्तित्व का निर्माण इड (Id),
इगो (Ego),
सुपर इगो (Supar
Ego) से हुआ है।
इड (Id) अचेतन मन है इसमें मूल
प्रवृत्तियों व प्राकृतिक इच्छाओं का निवास है ये शीघ्र संतुष्ट होना चाहती हैं
तृप्ति चाहती हैं।
इगो (Ego) चेतना बुद्धि, तर्क तथा इच्छा शक्ति
है।
सुपर इगो (Supar Ego) इसका निर्माण आदर्शों
से होता है।
Sigmund Freud ने ईगो के बारे में कहा –
“Ego is the part of Id which has been
modified by its proximity to the external world and the influence the later has
on it and which serves the purpose of receiving stimuli and projecting the
organism from them ,like the cortical layer with which a particle of living
subustance surrounds itself.”
“इगो, इड का वह भाग है जो
वाह्य संसार के अनुमान और संभावना से परिष्कृत होता है और उसका कालान्तर में
प्रभाव भी पड़ता है, जो प्राणी को उद्दीपन
करने एवं उसके इर्द गिर्द जमी परत के अंश के रूप में व्याप्त रहता है।”
Sigmund Freud ने सुपर ईगो के बारे में कहा –
“Super Ego that expect of the ego which
makes possible the processes of self observation and what is commonly called
conscience.”
“सुपर ईगो, ईगो का वह पक्ष है जो
आत्म निरीक्षण की प्रक्रिया को सम्भव बनाता है जिसे सामान्य रूप से चेतना कहते
हैं। ”
Sigmund Freud महोदय का मानना है कि
मानव के व्यक्तित्व का निर्माण इन्हीं तत्वों से मिलकर होता है जो विभिन्न रूप में
परिलक्षित होते हैं।
रचना (Constitution) सिद्धान्त –
इस विचार धारा के प्रतिपादक शैलडॉन / SHELDON महोदय हैं इन्होने
व्यक्तित्व के प्राथमिक आधारों की संख्या तीन बताई है –
1 – गोलाकृति (Endomorphy) –
इस तरह के लोगों का
व्यक्तित्व अलग तरह से परिलक्षित होता है इस व्यक्तित्व के मनुष्य गोल गर्दन, माँस पेशियों का पूर्ण
विकसित न होना, चर्बी की वृद्धि आदि गुणों से युक्त होते
हैं।
2 – आयताकृति (Mesomorphy) –
इस तरह के व्यक्तित्व
में मुख्यतः माँस पेशियों व हड्डियों का विकास परिलक्षित होता है।
3 – लम्बाकृति (Ectomorphy) –
इस तरह के
व्यक्तित्वों में केंद्रीय स्नायु संस्थान के माँस पेशी तन्तु विकसित होते हैं।
इस मत के
अनुसार मूलतः यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि इसमें शरीर के विभिन्न अंगों को
व्यक्तित्व निर्माण का आधार माना जाता है।
प्रतिकारक (Factorial) प्रणाली सिद्धान्त –
इस मत का प्रतिपादन आर ० बी ० कैटल (R.
B. Cattell) महोदय द्वारा किया गया। इन्होने बताया मानव
चरित्र अनेक कारकों से युक्त होता है इनके अनुसार निम्न तथ्य प्रतिकारक चरित्र का
निर्माण करते हैं –
चरित्र की सुन्दरता (Fitness of
Character)
सामाजिकता (Sociability)
भावात्मक एकता (Emotional
Integration)
कल्पनाशीलता (Imagination)
अभिप्रेरक (Motivator)
उत्सुकता (curiosity)
लापरवाही (Negligence)
उक्त आधारों पर कैटल महोदय ने कहा –
“Personality is, that permits a prediction
of what a person will do in a given situation.”
“व्यक्तित्व वह है जो
किसी विशेष परिस्थिति में जो कार्य करता है उसका प्रतिरूप ही व्यक्तित्व है। ”
ऑलपोर्ट (Allport) का सिद्धान्त –
व्यक्तित्व के सम्बन्ध में गोर्डन डब्ल्यू
ऑलपोर्ट (Gordon W. Allport) का सिद्धान्त वंशक्रम
वातावरण वैयक्तिक भेद पर अवलम्बित है इन्होने वंशक्रम के द्वारा निर्धारित
व्यक्तित्व के जटिल मिश्रण के प्रति न्याय करने ,सामाजिक,स्वाभाविक तथा
मनोवैज्ञानिक कारणों के प्रति न्याय करने को कहा है। तथा साथ में विभिन्न
सम्प्रदायों तथा व्यक्तित्वों की नवीनता को भी मान्यता देनी चाही है। इन्होने
स्पष्टतः स्वीकार किया की प्रवृत्तियों,विशेषताओं तथा वातावरण
के प्रति समायोजन से व्यक्तित्व का गठन होता है।
उक्त सिद्धांतों के
अतिरिक्त भी विविध सिद्धांत भी अपनी धमक रखते हैं। व्यक्तित्व के सिद्धान्तों में विविध
दृष्टिकोणों का समावेशन करने पर इसका विशेष वृहत प्रखण्ड प्रस्तुत किया जा सकता है
लेकिन इसे यहीं विराम दिया गया है।
Dissertation या लघु शोध लगभग एम ० एड ० स्तर पर सभी जगह
चाहे वहाँ सैमेस्टर प्रणाली लागू हो या वार्षिक परीक्षा हो, पाठ्यक्रम का हिस्सा है। विविध विषयों में परा
स्नातक स्तर पर लघु शोध (Dissertation)
के साथ ही अस्तित्त्व में है। – लघुशोध और
मौखिक परीक्षा (Dissertation
and Viva Voce)
आज मुख्यतः इसके प्रभावी ढंग से निष्पादन के
विषय में कुछ तथ्य प्रस्तुत किये जाएंगे। यह लघु शोध ही अन्ततः हमारे शोध ग्रन्थ
को भी दिशा प्रदान करता है।
लघु शोध आधारित मौखिक परीक्षा को प्रभावी बनाने
वाले कारक
Factors that make
Dissertation Based Viva Effective
सम्पूर्ण रूप में Synopsis(रूप
रेखा ), Dissertation(लघु शोध), Research Summary (शोध सार) मिलकर शोध परिक्षेत्र को जाज्वल्यमान बनाते हैं। यही लघु
शोध आगे शोध ग्रन्थ लिखने में हमारी मदद करता है और इसीलिए इसकी मौखिक परीक्षा एक
वृहद दृष्टिकोण लिए होती है। यही शोध कार्य देश की प्रगति का आधार बनाते हैं।
लघुशोध आधारित मौखिक परीक्षा के प्रश्न लघुशोध पर आधारित होते हैं और इन्हे इन
बिन्दुओं का आधार लेकर सरलता से साधा जा सकता है –
1 – सामान्य प्रश्न (General question)
2 – समस्या कथन आधारित प्रश्न (Problem statement based questions)
3 – शोध के प्रकार (Types of research)
4 – चर, परिकल्पना, उद्देश्य आधारित तथ्य (Variables, Hypotheses, Objective
Based Facts)
5 – शोध उपकरण व परिकलन आधारित प्रश्न (Research Tools & Calculation
Based Questions)
6 – सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन पर प्रश्न (Question on study of related
literature)
7 – शिक्षा परिक्षेत्र में आपके शोध का लाभ (Benefits of your research in the
field of education)
8 – ऐसे शोध के अभाव से देश को नुक्सान (Lack of such research damages the
country)
वर्तमान समय में परास्नातक स्तर पर लघु शोध के
स्तर में गिरावट देखने को मिली है बहुत कम विद्यार्थी सही ढंग से कार्य कर
पा रहे हैं। कारणों का एक मिथ्या पहाड़ है।
सुधार हेतु विद्यार्थी, प्राध्यापक, अभिभावक, उच्च शिक्षा
सभी को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। शोधार्थियों की ओर देश की आशाभरी
नज़रें हैं। ईमानदारी से कार्य करें, मौखिक
परीक्षा स्वतः अच्छी व गरिमामयी होगी।
शिक्षण प्रशिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण अंग है मौखिक परीक्षा अर्थात VIVA .यद्यपि इसके लिए अंक निर्धारित हैं लेकिन यह ही
भविष्य के साक्षात्कार [Interview]
का मुख्य आधार है जिस स्तर का VIVA होता है उस स्तर पर आपका कितना अधिकार है और आप
सर्वहित में इसका भविष्य में कैसे प्रयोग करेंगे, इसकी झलक इस मौखिक परीक्षा अर्थात VIVA से मिल जाती है। आइए B. Ed. स्तर पर अन्ततः होने वाले viva को प्रभावशाली बनाने के लिए हमारे लिए क्या
आवश्यक है इस पर विचार करते हैं।
बी० एड ० वायवा हेतु आवश्यक कारक
Factors Required for B.Ed. Viva
यद्यपि पूर्व निर्धारित प्रश्नों की कोई व्यवस्था नहीं होती है इसलिए
आपके व्यक्तित्व से लेकर अधिगम क्षमता व उनके व्यावहारिक प्रयोग की परीक्षा इसके
माध्यम से हो जाती है। इसे प्रभावशाली बनाने के लिए निम्न तथ्य महत्त्वपूर्ण
भूमिका अभिनीत करते हैं।
1- आधारभूत
ज्ञान [Basic knowledge]
2- तत्सम्बन्धी
फाइलें व आवश्यक सामग्री [Related
files and necessary material]
3- स्वनिर्मित
फाइल सम्बन्धी जानकारी [Self-contained
file information]
4- अप्राप्त
ज्ञान की स्व स्वीकारोक्ति [Self confession of unrealized knowledge]
5- झूठ
से परहेज [Abstaining
from lies]
6- बहानेबाजी
व बहस से दूरी [Distance
from excuses and arguments]
7- धारा
प्रवाहिता [Fluency]
8- आत्म
विश्वास [Self-confidence]
मौखिक परीक्षा के असंरचित (Unstructured) होने की वजह से इसका स्वरुप व्यापक हो जाता है लेकिन यह सत्य का एक
आवश्यक दर्पण भी होता है यदि गैर पक्षपात पूर्ण और योग्य व्यक्तित्व द्वारा इसका
सम्पादन होता है। यह आज की व्यवस्था का अनिवार्य अंग है इसे सहजता से लिया जाना
चाहिए यह आपकी परिपक्वता का द्योतक है।
अभिप्रेरणा
से आशय व परिभाषाएं (Meaning and definitions of motivation)-
अभिप्रेरणा जीव की वह आन्तरिक स्थिति है जो उसमें क्रियाशीलता
उत्पन्न करती है और अपनी उपस्थिति तक चलाती रहती है। यह वह जादू है जो मानव को
उसकी शक्तियों से साक्षात्कार कराता है यदि इसकी दिशा ठीक है तो यह एक ऐसा उपागम
है जो लक्ष्य की प्राप्ति सुगम कर देता है। अर्थात यह सीधे सीधे हमारे व्यवहार को
प्रभावित करता है। वुडवर्थ महोदय कहते हैं –
“A
motive is a state of the individual which disposes him for certain behaviour
and for seeking certain goals.”
“अभिप्रेरणा व्यक्तियों की दशा का वह समूह है जो
किसी निश्चित उद्देश्य की पूर्ती के लिए निश्चित व्यवहार को स्पष्ट करती है।”
जब
कि जॉनसन (Johnson)
महोदय का विचार
है कि –
“Motivation
is the influence of general pattern of activities indicating and directing the
behaviour of the organism.”
“अभिप्रेरण सामान्य क्रियाकलापों का प्रभाव है
जो मानव के व्यवहार को उचित मार्ग पर ले जाती है।”
गुड
महोदय का
अभिप्रेरणा के विषय में मत है –
“Motivation
is the process of arousing, sustaining and regulating an activity.” – Good
“अभिप्रेरणा किसी कार्य को प्रारम्भ करने, जारी रखने तथा सही दिशा में लगाने की प्रक्रिया
है।”
मैग्डूगल
(McDougall) महोदय का विचार है कि –
“Motives
are conditions physiological and psychological within the organism that
disposes it to act in certain ways.”
“अभिप्रेरणा वह शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक दशाएं
हैं जो किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करती हैं।”
एक
अन्य महत्त्व पूर्ण विचारक पी. टी. यंग
महोदय का विचार है –
“Motivation
is the process of arousing action sustaining the activities in progress and
regulating the pattern of activity.”
“प्रेरणा व्यवहार को जागृत करके क्रिया के विकास
का पोषण करने तथा उसकी विधियों को नियमित करने की प्रक्रिया है।”
उक्त
विचारकों के विचारों के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि अभिप्रेरणा या
प्रेरणा आवश्यकता से उत्पन्न मनोव्यावहारिक क्रिया है जो लक्ष्य प्राप्ति की दिशा
में कार्यों का सम्पादन कराती है।
अभिप्रेरणा के सिद्धान्त / Principles of motivation –
अभिप्रेरणा हेतु बहुत से सिद्धान्त व मान्यताएं विविध मनोवैज्ञानिकों
द्वारा बताये गए हैं इन सिद्धान्तों द्वारा विविध प्रकार से अभिप्रेरणा की
व्याख्या की गयी है। जिन्हें अपनी सुविधा के अनुसार इस प्रकार अनुक्रमित किया जा
सकता है –
1 – शारीरिक सिद्धान्त / Physiological Theory
–
शरीर की मनोदशा हमेशा एक जैसी नहीं होती इसमें समय समय पर विविध
परिवर्तन परिलक्षित होते हैं और इसी कारण शरीर में प्रतिक्रियाएं भी होती रहती हैं
और इस प्रतिक्रिया के मूल को यदि हम जानने का प्रयास करें तो वह अभिप्रेरणा ही है।
उद्दीपन अनुक्रिया सिद्धान्त वह सिद्धान्त है जो व्यवहारवादियों
द्वारा प्रति पादित किया गया है यह सीखने के सिद्धांत पर ही आधारित है इनके अनुसार
मनुष्य का सम्पूर्ण व्यवहार शरीर द्वारा उद्दीपन के परिणाम स्वरुप होने वाली
अनुक्रिया है ये मानते हैं की अभिप्रेरणा की इसमें भूमिका नहीं है कोई भी
प्रतिक्रिया विशुद्ध रूप से विशिष्ट अनुक्रिया ही है।
इस मान्यता में विविध तथ्यों व अनुभव की अवहेलना की गयी है यद्यपि
उद्दीपकों द्वारा विविध अनुक्रियाएं होती हैं लेकिन किसी प्रतिक्रिया के होने में
मूलतः अभिप्रेरणा का हाथ होता है।
3 – मूल प्रवृत्यात्मक सिद्धान्त / Instinct Theory –
इस सिद्धान्त के अनुसार किसी
भी मानव का व्यवहार जन्मजात मूल प्रवृत्तियों द्वारा निर्धारित व संचालित होता है
इस सिद्धान्त का प्रतिपादन मैक्डूगल महोदय द्वारा किया गया लेकिन यह सिद्धान्त
अभिप्रेरणा की पूर्ण व्याख्या करने में
सक्षम नहीं है ।
4 – मनो – विश्लेष्णात्मक सिद्धान्त / Psycho-analysis Theory –
यह सिद्धान्त मनोवैज्ञानिक फ्रायड की देन
स्वीकारा जाता है यह सिद्धान्त बताता है कि मनुष्य का अभिप्रेरणात्मक व्यवहार दो
कारकों द्वारा संचालित होता है . जिनमें से एक तो मूल प्रवृत्तियाँ ही हैं और
दूसरा है अवचेतन मन। वह यह भी मानता है कि
दो ही मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं जीवन मूल प्रवृत्ति और दूसरी मृत्यु मूल
प्रवृत्ति जो उसे क्रमशः सृजनात्मक व
विध्वंशात्मक व्यवहार हेतु प्रेरित करते हैं। मूल प्रवृत्ति सम्बन्धी यह विचार
मनोवैज्ञानिकों को मान्य ही नहीं और दूसरे अवचेतन मन के अलावा चेतन मन और
अर्ध चेतन मन के द्वारा भी व्यवहार संचालित होता है अतः फ्रायड महोदय भी पूर्ण
स्वीकार्य नहीं।
5-
अन्तर्नोद
सिद्धान्त / Drive
Theory –
यह सिद्धान्त प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक हल महोदय
की देन है इन्होने यह बताया कि मनुष्य की आवश्यकताओं के कारण उसमें तनाव पैदा होता
हे जिसे मनोविज्ञान की भाषा में अन्तर्नोद उच्चारित करते हैं ये अन्तर्नोद ही उसके
विशिष्ट व्यवहार का कारण है कुछ समय पश्चात मनोवैज्ञानिकों ने शारीरिक आवशयकताओं
के साथ मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को भी जोड़ लिया लेकिन फिर भी यह सिद्धान्त अपूर्ण
ही रहा क्योंकि यह मानव के उच्च ज्ञानात्मक व्यवहार की व्याख्या में सक्षम नहीं बन
सका।
6
– इच्छा
आधारित सिद्धान्त / Desire based theory –
इस मत के अनुसार मानव का व्यवहार इच्छा will
द्वारा निर्धारित होता है बौद्धिक मूल्यांकन
द्वारा सृजित इच्छा द्वारा अभिप्रेरणा को दिशा मिलाती है और संकल्प को बल मिलता है
लेकिन संवेग/Emotions व प्रतिवर्त/Reflexis तो इच्छा से अभिप्रेरित नहीं होते।
7 – कुर्ट लेविन सिद्धान्त / Kurt
Levin Theory –
यह सिद्धान्त एक महत्त्वपूर्ण अधिगम सिद्धान्त है जो यह मानता है कि
सीखने में अभिप्रेरणा महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है यह सिद्धान्त संयोग,
स्मृति, गतिशील प्रक्रिया,
व्याख्या, भग्नाशा, आकांक्षा स्तर सभी को समाहित करता है जो मूलतः
साक्षी पृष्ठभूमि पर आधारित है।
उक्त
विवेचन यह स्पष्ट करता है कि अभिप्रेरणा किसी एक कारक से निर्धारित नहीं होती
इसीलिये बॉल्स / Bolles
तथा फौफ्मैन
/ Pfaffman का पर्यावरण आधारित प्रोत्साहन सिद्धान्त व मैसलो/ Maslow का मांग सिद्धान्त भी अभिप्रेरणा के अपूर्ण
सिद्धान्त की श्रेणी में ही आते हैं।
अभिप्रेरणा के प्रकार / Types of motivation –
वास्तव में अभिप्रेरणा दो प्रकार की होती है
जिन्हे हम आन्तरिक अभिप्रेरणा व वाह्य अभिप्रेरणा में वर्गीकृत कर सकते हैं।
[A] – आन्तरिक अभिप्रेरणा / Internal Motivation –
इस प्रेरणा को धनात्मक, सकारात्मक, जन्मजात
प्राकृतिक, प्राथमिक अभिप्रेरणा के नाम से भी जाना जाता
है। आन्तरिक अभिप्रेरणा उसे कहा जाता है जो आन्तरिक अभिप्रेरकों / Internal Motives अर्थात भूख, प्यास, आत्म रक्षा, काम, आदि के कारण उत्पन्न होते हैं।इसमें मानव स्वयं
प्रेरित होकर अपनी इच्छा से कार्य करता है।
[B] – वाह्य अभिप्रेरणा / External Motivation –
इसे ऋणात्मक, कृत्रिम, सामाजिक, द्वित्तीयक
अर्जित, अभिप्रेरणा के नाम से भी जाना जाता है। वाह्य
अभिप्रेरणा उसे कहा जाता है जो वाह्य अभिप्रेरकों / External Motives अर्थात बाहरी स्थितियों आत्म सम्मान, उच्च सामाजिक स्थान, डॉक्टर, नेता, न्यायाधीश आदि बनने की इच्छा के कारण उत्पन्न
होते हैं। निन्दा, प्रशंसा, आलोचना, प्रतियोगिता, पुरस्कार आदि वाह्य अभिप्रेरक हैं।
अभिप्रेरणा के प्रकारों को बताने के लिए तरह तरह के वर्गीकरण प्रस्तुत किये जाते हैं
लेकिन यदि हम उनका निष्पक्ष विश्लेषण करें तो उक्त दो ही प्रकार के तहत ही उन्हें
रखा जा सकता है। एक और तथ्य विश्लेषण
योग्य है की अभिप्रेरणा हेतु प्रेरक आंतरिक हो या वाह्य उसका वास्तविक स्वरुप तो
आन्तरिक ही होता है उसे ऊर्जा तो आन्तरिक
शक्ति से अभिप्रेरण के रूप में मिलती है जो लक्ष्य प्राप्ति तक उसको उत्साहित रखती
है।
अधिगम में प्रेरणा की भूमिका / Role
of motivation in learning –
अधिगम में अभिप्रेरणा की भूमिका निर्विवाद है
यह वह शक्ति है जो सीखने की गति को तीव्र कर देती है प्रसिद्द मनोवैज्ञानिक वुड
वर्थ महोदय ने कहा –
उक्त समीकरण चीख चीख कर कह रहा है कि योग्यता
के साथ प्रेरणा होने पर ‘सोने पर सुहागा’ वाली कहावत चरितार्थ होती है।
वास्तव में प्रेरणा अध्यापक के हाथ में ऐसा
महत्त्वपूर्ण उपागम है जिससे देश का भविष्य, हमारे विद्यार्थियों का कल सँवारा जा सकता है
उनकी अन्तर्निहित क्षमता को उत्कृष्ट रूप से उभारा जा सकता है। राष्ट्र को समर्पित
सेवा भावी युवा तैयार किये जा सकते हैं। शैक्षिक उत्कृष्टता के प्रदत्त सोपान तय
किये जा सकते हैं अधिगम क्षेत्र में नए प्रतिमान गढ़े जा सकते हैं। तत्सम्बन्धी कुछ
बिन्दु इस प्रकार दिए जा सकते हैं –
01- उत्सुकता जागृति
02- ऊर्जा व्यवस्थापन
03- ध्यान संकेन्द्रण
04- अनवरतता
05- रूचि परिमार्जन
06- स्वस्थ आदतें
07- निर्णयन क्षमता
08- अधिगम इच्छा
09- आवश्यकता पूर्ति
सक्षमता
10- सम्यक मार्ग दर्शन
11 – सम्यक साधन चयन
12 – आशावादी भविष्य
विकास यात्रा में
अभिप्रेरणा ऐसा शक्तिशाली साधन है जो हमारे सपने, हमारे अभीप्सित, हमारे लक्ष्य हमें
दिला सकता है। एण्डरसन/Anderson महोदय ने उचित ही कहा है। –
“Learning
will proceed best if motivated.”
“सीखने की प्रक्रिया
सर्वोत्तम रूप से आगे बढ़ेगी यदि वह अभिप्रेरित होगी।”
अभिप्रेरणा कुशल अध्यापक के हाथ में शिक्षा
जगत का अमूल्य वरदान है स्किनर/Skinner महोदय तो अभिप्रेरणा को
सीखने का राज मार्ग बताते हैंउन्होंने कहा –
भारतीय सन्दर्भ में आधुनिकीकरण के एक उपकरण के रूप में शिक्षा
भारत में शिक्षा का प्रादुर्भाव वैदिक काल से अब तक एक बहुत बड़ा सफर तय कर चुका है। बदलते परिवेश के साथ और तत्कालीन परिस्थितियों के साथ जन सामान्य पर पड़ने वाले प्रभाव का इतिहास गवाह रहा है इसने बोलने, आचार, व्यवहार, संस्कृति,
वेश भूषा, रहन सहन में होने वाले परिवर्तनों को बहुत अच्छी तरह से निरीक्षित किया है। इन तमाम परिवर्तनों के आधार पर यह पूर्वक कहा जा सकता है कि शिक्षा ही वह महत्त्वपूर्ण साधन है जो हमारे पूरे परिवेश, सम्पूर्ण समाज को वक्त के साथ चलना सिखा सकता है।शिक्षा ही वह महत्त्वपूर्ण उपकरण है जो हमें आधुनिकता से जोड़ सकता है।
आधुनिकी
करण क्या है?
What
is modernization?
आधुनिकीकरण वह
प्रत्यय है जो हमें समय के साथ कदमताल करना सिखाता है हर काल की अपनी
परम्पराएं, मर्यादाएं, मूल्य
होते हैं जो भारत में निरन्तर परिवर्द्धित
व परिवर्तित होते रहे हैं और भारतीयों ने इन्हे आवश्यकतानुसार अङ्गीकार किया है।
डॉ ० सत्यदेव सिंह ने आधुनिकीकरण के सन्दर्भ में कहा –
“आधुनिकीकरण एक ऐसी गत्यात्मक प्रक्रिया है
जिसमें कोई समाज नवीनतम वैज्ञानिक तकनीकियों का लाभ लेते हुए परम्परागत अथवा अर्ध
परम्परागत स्थिति से हटकर अपने संगठन संरचना, मूल्य,
अभिप्रेरणा, उद्देश्य तथा आकांक्षाओं में आवश्यक परिवर्तन
कर लेता है।”
“Modernization
is such a dynamic process in which a society moves from a traditional or
semi-traditional position, taking advantage of the latest scientific
techniques, to make necessary changes in its organizational structure, values,
motivation, objectives and aspirations.”
आधुनिकीकरण
की परिभाषा में व्यक्ति व उसकी ज्ञानात्मक स्थिति के अनुसार यद्यपि परिवर्तन
परिलक्षित होते हैं लेकिन कोठारी कमीशन ने भारतीय समाज के आधुनिकता से जुड़ने के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट रूप
से कहा –
“The
most distinct feature of modern society, in contrast with a traditional one, is
its adoption of a science-based technology.”
“आधुनिक समाज की सबसे विशिष्ट विशेषता, पारंपरिक समाज के विपरीत, विज्ञान आधारित प्रौद्योगिकी को अपनाना है।”
अर्थात
भारतीय परिप्रेक्ष्य में आधुनिकी करण से आशय बदलते समय के साथ बदलते प्रतिमानों, संसाधनों, वैज्ञानिक प्रगति और आवश्यक प्रगतिशील बदलाव के साथ अनुकूलन करने से
है।
Education as a tool of Modernization
आधुनिकीकरण
के एक उपकरण के रूप में शिक्षा-
वर्तमान
परिप्रेक्ष्य में जब हम भारत का आकलन करते हैं तो यह प्रत्यक्षतः अनुभूति होती है
कि शिक्षा केवल समस्या समाधान का ही उपकरण नहीं है बल्कि यह वह विशिष्ट उपागम है
जो हमें समय के साथ चलना सिखाता है वास्तविक आधुनिकता का सच्चा उपकरण शिक्षा है
इसे नकारा नहीं जा सकता। निम्न आधारों पर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है –
1 – सामाजिक सकारात्मक परिवर्तन/ Positive Social
Change
2 – सांस्कृतिक परिवर्तन / Cultural change
3 – आर्थिक परिवर्तन / Economic change
4 – बौद्धिक परिवर्तन / Intellectual change
5 – मूल्यों व उद्देश्यों में परिवर्तन / Change in
values and objectives
6 – विज्ञान व तकनीकी की सहज स्वीकृति / Easy
acceptance of science and technology
7 – समन्वय व सामञ्जस्य की बदलती अवधारणा /
Concept of coordination and harmony
8 – कुरीति निवारण में सञ्चारी साधनों का प्रयोग / Use
of communicative means in the prevention of evil.
उक्त
आधार पर कहा जा सकता है कि शिक्षा वह साधन है जो हमें आधुनिकता से जोड़ता है व
अन्धानुकरण से बचाता है जो परम आवश्यक है। डॉ सत्य देव सिंह का विचार दृष्टव्य है
–
“यदि कोई समाज अन्य समाजों का अन्धानुकरण करता
है तो कालान्तर में अन्धानुकरण करने वाला समाज अपना आस्तित्व समाप्त कर सकता है।”
“If a society blindly imitates other societies,
then over a period of time the society which blindly imitates its
existence.”.
कॉमर्स वर्तमान समय का एक बहुत व्याहारिक विषय है। बहुधा इन विद्यार्थियों में अधिक व्याहारिक गुण होने की वजह से परिणाम पाने की शीघ्र इच्छा होती है।बाजार वाद व उत्तरोत्तर बढ़ती उपभोक्ता संस्कृति ने इसे आज के परिप्रेक्ष्य में गढ़ने हेतु नए आयाम उपलब्ध कराये हैं। इनमें से कुछ बच्चों के पुश्तैनी प्रतिष्ठान होते हैं तो कई विद्यार्थी अपने आप को स्थापित करना चाहते हैं। इण्टरमीडिएट परीक्षा परिणाम प्राप्त करने के बाद इनको भी यही समस्या घेरती है की अब क्या करें ?
कालान्तर
में व्यवस्थाएं परिवर्तित होती रहती हैं शीघ्र ही वह समय आएगा जब विभिन्न धाराओं
कला,
वाणिज्य, विज्ञान की जगह विद्यार्थी पसन्दीदा
विषय किसी भी ले सकेंगे। लेकिन आज के
परिप्रेक्ष्य में वाणिज्य के कुछ विद्यार्थी गणित विषय बारहवीं में रखते हैं और
कुछ नहीं। इससे भी अवसरों में कुछ अन्तर दिखाई देता है।
बारहवीं
में गणित के साथ कॉमर्स रखने वाले विद्यार्थी हेतु कोर्स–
Course for students having commerce with mathematics in class XII-
1 – C.A. (Charted Accountancy)
2 – B.C.A. (Bachelor of
Computer Applications) or IT and Software
3 – B.F.A. (Bachelor of
Finance and Accounting)
4 – B.Com. Honours
5 – B.E. (Bachelor of
Economics)
6 – B.I.B.S. (Bachelor
of International Business and Finance)
7 – B.J.M.S. (Bachelor
of Journalism and mass Communication)
8 – B.Sc. Hons
(Mathematics)
9 – B.Sc. Hons (Applied
Mathematics)
10- B.Sc. (Statistics)
बारहवीं
में गणित के बिना कॉमर्स रखने वाले विद्यार्थी हेतु कोर्स–
Course for students having
commerce without mathematics in class XII-
1 – B.Com (Bachelor of
Commerce)
2 – C.S. (Company
Secretary)
3 – B.B.A. (Bachelor of
Business Administration)
4 – Bachelors in
Hospitality
5 – Bachelors in Event
Management
6 – Bachelors of Management
Studies
7 – Bachelors in Travel
and Tourism
8 – Bachelors in Hotel
Management
9 – Bachelor of
Vocational Studies
10 – Bachelor of
Journalism
11 – Bachelor of
Foreign Trade
12 – Bachelor of Business
Studies
13 – Bachelor of Social
Work
14 – Bachelor of
Vocational Studies
15 – Bachelor of Interior
Designing
16 – BA LL.B
17 – BBA LL.B
18 – B.A
19 – B.A (Hons)
20 – B.Sc. Animation
and media
बारहवीं
कॉमर्स के पश्चात डिप्लोमा कोर्स
Diploma course after
12th commerce –
1 – Diploma in
Education
2 – Import Export
Diploma
3 – Digital Marketing Diploma
4 – Diploma in
Industrial Safety
5 – Diploma In Advance
Accounting
6 – Diploma in Computer
Application
7 – Diploma in
Financial Accounting
8 – Diploma in Business
Management
9 – Hospitality Diploma
10 – Diploma in Banking
and Finance
11 – Diploma in Retail
Management
12 – Diploma in Hotel
Management
13 – Diploma in Fashion
Designing
बारहवीं
कॉमर्स के पश्चात प्रोफेशनल कोर्स
Professional course
after 12th commerce –
यदि हम आज के
हिसाब से कुछ महत्त्वपूर्ण कोर्स देखना चाहें तो इन्हें इस प्रकार भी क्रमित किया
जा सकता है –
1 – GST Course
2 – Income Tax Course
3 – Content Marketing
4 – Digital Marketing
5 – Accounting and
Taxation
6 – Air Hostess
Training
7 – B.A., B. Com., BBA.
etc
8 – BA LL.B
9 – Bachlor of Business
Management
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि रास्ते
बहुत सारे हैं बस हमें बहुत सोच समझ कर फैसला करना है। फैसला हो जाने के बाद दृढ़ता
से अपनी मंजिल को हासिल करना है। भारत के उत्पादन क्षेत्र को बहुत विस्तृत करने की
आवश्यकता है। बाजारवाद का परिदृश्य बदलने हेतु व अपनी मौलिकता को बनाये रखने हेतु
वाणिज्य के विद्यार्थियों से देश को बहुत आशा है।
जब हम हाई स्कूल उत्तीर्ण कर इण्टरमीडिएट विज्ञान वर्ग में प्रवेश लेते हैं तो तरह तरह के सपने हमारे मनोमष्तिष्क में पल रहे होते हैं यह उम्र ही ऐसी है जो तनाव ,तूफ़ान, सांवेगिक संघर्ष और कल्पना लोकसे हमारा प्रत्यक्षीकरण कराती है लेकिन इण्टर मीडिएट करते करते जागरूक विद्यार्थी के चरण यथार्थ के धरातल को स्पर्श करने लगते हैं। यह काफी कुछ हमारे घर की आर्थिक स्थिति और हमारे मानसिक स्तर से निर्धारित होता है।विविध निरीक्षण बताते हैं कि विज्ञान वर्ग के विद्यार्थियों के साथ उनके मातापिता अन्य वर्ग के विद्यार्थियों की तुलना में अधिक चिन्तित रहते हैं कि अब क्या करें क्या न करें। बच्चे के भविष्य का सवाल है।
आप सभी की समस्या समाधान की ओर यह एक प्रयास है विश्वास है कि यह दिशा बोधक सिद्ध होगा। इण्टर मीडिएट विज्ञान अपने में जीवविज्ञान और गणित के दो दिशामूलक तत्त्व साथ लेकर चलता है। विज्ञान वर्ग से इण्टरमीडिएट करने के बाद डिप्लोमा कोर्स, कम्प्यूटर कोर्स,फार्मेसी, इन्जीनियरिंग, व चिकित्सा परिक्षेत्र के कई मार्ग खुलते हैं साथ ही मिलते हैं विविध सेवाओं में अवसर। जिन्हे इस प्रकार समझा जा सकता है। –
इण्टर मीडिएट विज्ञान के बाद डिग्री कोर्स (Degree Course after Intermediate
Science)-
विज्ञान वर्ग से इण्टर मीडिएट करने के बाद एक
वृहद पटल खुलता है जिन्हे यहाँ पर एक एक करके बताने का प्रयास करेंगे निम्नवत
डिग्री कोर्स अपनी रूचि, क्षमता, स्थिति
के अनुसार किये जा सकते हैं –
बैचलर ऑफ़ साइंस (B. Sc)
बैचलर ऑफ़ एग्रीकल्चर
बैचलर ऑफ़ फार्मेसी
बैचलर ऑफ़ टेक्नोलॉजी (B. Tech), बैचलर ऑफ़ इन्जीनियरिंग (B.E)
बैचलर ऑफ़ मेडिसिन एन्ड बैचलर ऑफ़ सर्जरी (MBBS)
बैचलर ऑफ़ डेण्टल सर्जरी (BDS)
बैचलर ऑफ़ फीज़ीओथेरेपी (BPT)
बैचलर ऑफ़ होम्योपैथिक मेडिसिन एन्ड सर्जरी (BHMS)
बैचलर ऑफ़ आयुर्वैदिक मेडिसिन एन्ड सर्जरी (BAMS)
बैचलर ऑफ़ यूनानी मेडिसिन एन्ड सर्जरी (BUMS)
माइक्रो बायोलोजी
बायो टेक्नोलॉजी
बायोइन्फॉर्मेटिक्स / Bioinformatics
जैनेटिक्स
सामान्यतः लम्बे अन्तराल तक यह माना जाता रहा
की इण्टर PCM के बाद बालक इन्जीनियरिंग के क्षेत्र में जायेगा उसे JEE Main की तैयारी करनी चाहिए और IIT की चाह रखने वालों को JEE Main के साथ JEE एडवान्स
भी निकालना का प्रयास करने का प्रयास करना होगा।
डिप्लोमा कोर्स से जुड़ने हेतु इलेक्ट्रिकल,
सिविल, मेकेनिकल, केमिकल इंजीनियरिंग आदि क्षेत्रों से जुड़ा
डिप्लोमा कोर्स किया जा सकता है।
दूसरी और चिकित्सा के क्षेत्र में स्थान बनाने
हेतु NEET परीक्षा पास करनी होगी और इसके स्कोर के आधार
पर MBBS, BDS, BHMS, या BUMS आदि
का स्थान मिलेगा।
लेकिन आज पैरा मेडिकल का एक आकाश भी शीघ्र
अर्थोपार्जन का जरिया बन सकता है।
12th PCB के बाद पैरामैडिकल कोर्स –
पैरामेडिकल
का एक बहुत बड़ा क्षेत्र है जो कक्षा 12 वीं के छात्रों के लिए सर्टिफिकेट, डिप्लोमा और डिग्री कोर्स प्रदान करता है।
पैरामेडिकल का यह क्षेत्र पैरामेडिकल
डिग्री वालों हेतु करियर का बहुत बड़ा आयाम प्रदान करता है है। इस कोर्स के लिए न्यूनतम योग्यता 50% अंकों के साथ PCB में 12 वीं पास है। 12th PCB के बाद प्रमुख पैरामैडिकल कोर्स बताने हेतु इस प्रकार
क्रमित किये जा सकते हैं यथा –
बी एस सी
इन मेडिकल इमेजिंग टेक्नोलॉजी
बी एस सी
इन एक्स-रे टेक्नोलॉजी
बी एस सी
इनडायलिसिस टेक्नोलॉजी
बी एस सी
इन मैडिकल रिकॉर्ड
बी एस सी
इन रेडिओग्राफी
बी एस सी
इन मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी
बी एस सी
इन एनेस्थिया टेक्नोलॉजी
बी एस सी
इन ऑप्टोमेट्री
बी एस सी
इन ऑडियोलॉजी एण्ड स्पीच
बी एस सी
इन थिएटर टेक्नोलॉजी
इसके अलावा बहुत से परिक्षेत्र अपनी जगह बनाते
जा रहे हैं।
कम्प्यूटर कोर्स की
अपनी एक बहुत बड़ी श्रृंखला है जिन्हे
इण्टर मीडिएट के बाद किया जा सकता है ।
सर्व प्रथम आपको बधाई की आपने जीवन का महत्त्वपूर्ण पड़ाव पार किया है विश्व का बहुत बड़ा पटल आपका स्वागत करने को उत्सुक है। बहुत खुशी होती है की भटकाव की उम्र को धता बता आप जब म्हणत और लगन से इस पड़ाव को पार करते हैं और ऐसे ऐसे प्रश्न पूछते हैं की तबियत खुश हो जाती है लेकिन एक प्रश्न आप सबको चिन्तन के लिए विवश करता है कि अब क्या करें ?
इस
प्रश्न का उत्तर सबके लिए अलग अलग होता है क्योंकि सबकी आर्थिक स्थिति, परिस्थितियां, अधिगम स्तर,
ऊर्जा स्तर और सपने अलग अलग होते हैं।
इस
प्रश्न को सही व सार्थक उत्तर तक ले जाने के प्रयास में ही हुआ है आज का यह सृजन।
आपके लिए बहुत से मार्ग खुलते हैं जो आपको आपकी परिस्थिति के अनुसार आगे की पढ़ाई, प्रशिक्षण पाठ्यक्रम या सेवाकार्य से जोड़ते
हैं। विविध कार्यक्रम इस प्रकार हैं –
इण्टर आर्ट्स के बाद डिप्लोमा(Diploma after Inter Arts)-
अध्यापन
में डिप्लोमा,विदेशी भाषा में डिप्लोमा,चिकित्स्कीय परिक्षेत्र में डिप्लोमा
डिज़ाइनिंग के परिक्षेत्र में डिप्लोमा जैसे फैशन, ज्वैलरी, इंटीरियर, वेब
या ग्राफिक्स इनके अलावा भी आज बहुत से नए डिप्लोमा परिक्षेत्र विकसित हो रहे हैं
जो आपको शीघ्र कमाने योग्य बना सकते हैं। यथा डिप्लोमा इन 3D एनिमेशन,डिप्लोमा इन मल्टीमीडिया, डिप्लोमा इन एडवरटाइजिंग एंड मार्केटिंग, डिप्लोमा इन ट्रैवल एंड टूरिज्म,
डिप्लोमा इन इवेंट मैनेजमेंट, डिप्लोमा इन साउंड रिकार्डिंग आदि ।
इण्टर आर्ट्स के बाद डिग्री कोर्स (Degree course after inter arts)-
1- बैचलर ऑफ आर्ट्स(बीए)
2-बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स (बीएफए)
3-बैचेलर इन सोशल साइंस
4-बैचेलर इन ह्यूमेनिटी
5-बैचलर इन जर्नलिज्म
6-बैचलर ऑफ साइंस (होस्पिटेलिटी एंड ट्रैवल)
7-बीए एलएलबी
8-बैचलर ऑफ एलीमेन्ट्री एजूकेशन
9-बैचलर ऑफ डिजाइन (एनीमेशन)
10- विविध कला परिक्षेत्र के ऑनर्स डिग्री कोर्स आदि ।
इण्टर आर्ट्स के बाद सेवाएं (Services after Inter Arts)
शिक्षक /Teacher
वकील /Advocate
फैशन या टेक्सटाइल डिजाइनर/Fashion या textile designer
होटल मैनेजमेंट / Hotel Management
पत्रकार / Reporter
सरकारी नौकरी /Government job यथा एसएससी मल्टी टास्किंग स्टाफ, एसएससी ग्रेड C और ग्रेड D आशुलिपिक, रेलवे ग्रुप डी (आरआरबी / आरआरसी ग्रुप डी),एसएससी जनरल ड्यूटी कांस्टेबल, आरआरबी सहायक लोको पायलट, इंडियन आर्मी एग्जाम फॉर द पोस्ट ऑफ टेक्निकल एंट्री स्कीम, महिला कांस्टेबलों, सोल्जर्स, कैटरिंग के लिए जूनियर कमीशन अधिकारी।
स्वरोजगार के विविध अवसर (Various self employment opportunities) -
यदि आप नौकर बनने की जगह मालिक बनाना चाहते हैं तो अपने घर के पुश्तैनी कार्य या आपके लिए सम्भव किसी भी स्वरोजगार से स्वयं को जोड़ सकते हैं कोइ कार्य छोटा बड़ा नहीं होता हमारी सोच उसे छोटा बड़ा बनाती है। आप शीघ्र ही कई अन्य को रोजगार देने की स्थिति में आ जाएंगे।
आज सूचनाएं बिजली की गति से उड़ रही हैं जिन्हे कोई होम सिकनेस नहीं है वे इन अवसरों का लाभ उठा सकते हैं याद रखें एक चूका हुआ अवसर खोई हुई उपलब्धि है कभी हताश निराश नहीं होना है नित्य बदलता बहुत बड़ा आकाश हमारे सामने है। परम श्रद्धेय मैथिली शरण जी की पंक्तियों में सन्देश छिपा है आपके लिए -
संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।