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शोध

MEASURMENT (मापन)

April 21, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मापन

सम्पूर्ण विश्व और इसके विविध तत्व अपने आपको मापन से पृथक नहीं कर सकते। जहाँ परिमाण है, जहाँ अंक है, जहाँ तुलना है,  MKS, FPS या CGS कोई भी  प्रणाली हो गुण, अवगुण या मानवीय चेतना का कोई भी आयाम हो मापन की परिधि में आ जाता है।

वर्तमान काल जिसे हम विज्ञान का युग कहते हैं इसकी सम्पूर्ण प्रगति का आधार यह मापन ही है।जन्म से मृत्यु तक हर आयु वर्ग में समय, दूरी, गति, धन, नौकरी, व्यवसाय, कालांश,अध्ययन, न्यादर्श हर जगह मापन है। मापन हमारे साथ इस तरह सन्नद्य  है कि हम चाह कर भी इससे अलग नहीं हो सकते। मीठा, नमकीन, ऋतु परिवर्तन, पृथ्वी परिभ्रमण सम्पूर्ण प्रकृति इसके आगोश में अपने को सुगम बनाती है। रॉस महोदय ने तो यहाँ तक कहा –

“यदि मापन के सारे यन्त्र तथा साधन इस संसार से लुप्त कर दिए जाएँ तो आधुनिक सभ्यता बालू की दीवार की तरह ढह जायेगी।“

 “If all the instruments and means of measurement were to disappear from this world, modern civilization would collapse like a wall of sand.”

आज के सभी गैजेट्स और हमारी पूरी दिनचर्या मापन से युक्त हैं।

MEANING AND DEFINITION

आशय व परिभाषा –

यद्यपि मापन को परिभाषा में बाँधना या अभिव्यक्त करना एक दुष्कर कार्य है लेकिन अधिगम योग्य बनाने हेतु कहा जा सकता है कि परिमाणात्मक रूप से अपने अवलोकन को अभिव्यक्त करना ही मापन है। वास्तव में मापन भौतिक पदार्थ की विशेषता या गुण को अंकात्मक मान प्रदान करना है। किसी व्यक्ति के गुण, बुद्धि, मानसिक स्तर या किसी भी तुलना हेतु महत्त्व पूर्ण कारक मापन है।

एस. एस. स्टीवेन्स महोदय के अनुसार –

“मापन किन्ही स्वीकृत नियमों के अनुसार वस्तुओं को अंक प्रदान करने की प्रक्रिया है। “

“Measurement is the process of assigning numbers to objects according to certain agreed rules.”

ब्रेडफील्ड व मोरडॉक के शब्दों में –

 “मापन किसी घटना के विभिन्न आयामों को प्रतीक आबण्टित करने की प्रक्रिया है जिससे उस घटना की स्थिति का यथार्थ निर्धारण किया जा सके।“

“Measurement is the process of assigning symbols to dimensions of a phenomenon in order to characterise the status of the phenomenon as precisely as possible.” – Bradfield and Mordock

हैल्म स्टेडर महोदय ने बताया –

“मापन को किसी व्यक्ति या पदार्थ में निहित विशेषताओं के आंकिक वर्णन की प्रक्रिया के रूप में पारिभाषित किया गया है।“

“Measurement has been defined as the process of obtaining a numerical description of the extent to which a person or thing possesses some characteristics.”

            उक्त परिभाषाओं के आधार पर स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि मापन से वस्तुओं, व्यक्तियों को गुण धर्मों के आधार पर अंक, शब्द, अक्षर  या संकेत प्रदान किये जाते हैं।

Functions of Measurement/ मापन के कार्य –

1 –  शील गुण निर्धारण।/ Determination of Trait

2 –  तुलना / Comparison

3 – भविष्य कथन /Prediction

4 – वर्गीकरण / Classification

5 – निदान / Diagnosis

6 – निर्देशन व परामर्श / Guidance and Counseling

7 – शोध / Research

  उक्त सम्पूर्ण विवेचन यह स्पष्ट करता है कि ज्ञान के परिक्षेत्र में जो भी नए नए आयाम जुड़ते जा रहे हैं मापन भी अपने परिक्षेत्र का तदनुरूप विस्तार व रूप परिवर्तन करता जा रहा है।

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दर्शन

मीमांसा (MEEMANSA)

April 4, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

यहाँ एक बात पूर्ण रूप से स्पष्ट करना परम आवश्यक है कि यहाँ हम उस मीमांसा दर्शन की बात करने नहीं जा रहे हैं जो भारतीय दर्शनों में कर्मकाण्ड द्वारा उद्भवित दर्शनों में गिना जाता है। यहां केवल यह बताने का प्रयास है कि एम एड का विद्यार्थी विभिन्न दर्शनों की तत्त्व मीमांसा(Meta Physics), ज्ञान व तर्क मीमांसा(Epistemology and Logic), मूल्य व आचार मीमांसा (Axiology and Ethics) कैसे करे। परीक्षा में पूछे गए प्रश्न में प्रदत्त दर्शन की उक्त मीमांसाएं कैसे लिखकर आए।

तत्त्व मीमांसा, ज्ञान व तर्क मीमांसा, मूल्य व आचार मीमांसा

(Meta Physics, Epistemology and Logic, Axiology and Ethics)

भारतीय दार्शनिक मुख्यतः उक्त मीमांसाओं के माध्यम से किसी भी दर्शन का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने की आशा उच्च शिक्षा के विद्यार्थी से करते हैं अतः यह जानना तर्क संगत होगा कि उक्त के तहत विविध दर्शनों की व्याख्या करते समय किन बातों का विशेषतः ध्यान रखा जाए। यहां हम एक एक करके इनके बारे में जानने का प्रयास करेंगे।

1  – तत्त्व मीमांसा (Meta Physics) –

जब किसी भी दर्शन की तत्त्व मीमांसा करनी होती है है तो मुख्यतः ब्रह्माण्ड के वास्तविक स्वरुप व मानवीय जीवन की तात्त्विक विवेचना की जाती है मानव जीवन के मूल उद्देश्य व उनकी प्राप्ति के साधनों पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है कोई भी शिक्षा दर्शन इसमें क्या भूमिका निर्वाहित कर सकता है, तय किया जाता है वास्तव में तत्त्व मीमांसा का क्षेत्र अत्याधिक व्यापक है इसमें सृष्टि के सम्बन्ध में तत्त्व ज्ञान अर्थात सृष्टि शास्त्र (Cosmogony),  सृष्टि विज्ञान (Cosmology) और सत्ता विज्ञान (Ontology) का अध्ययन किया जाता है। इसके अन्तर्गत सृष्टि – सृष्टा, आत्मा -परमात्मा और जैविक जगत के साथ मानवीय जीवन की विवेचना की जाती है साथ ही अब तक जो भी सोचा विचारा और शोधा जा चुका है सभी की तात्त्विक विवेचना को शामिल किया जाता है।किसी भी दर्शन की तात्विक विवेचना करते समय निम्न तथ्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए।  –

01 – ब्रह्माण्ड का स्वरुप ?

02 – ब्रह्माण्ड का निर्माण व  निर्माता ?

03 – ब्रह्माण्ड का मूल तत्त्व

04 – ब्रह्माण्ड का अन्तिम सत्य 

05 – ब्रह्माण्ड के अस्तित्व की प्रकृति

06 – सृष्टि स्वरुप ?

07 – सृष्टि का निर्माण व  निर्माता ?

08 – आत्मा – परमात्मा ?

09 – मानव का वास्तविक स्वरुप ?

10 – अन्तिम उद्देश्य व उद्देश्य की प्राप्ति ?

2 – ज्ञान व तर्क मीमांसा (Epistemology and Logic) –

जब किसी भी दर्शन की ज्ञान व तर्क मीमांसा की बात की जाती है तो उससे आशय उसमें निहित ज्ञान के वास्तविक स्वरुप तथा ज्ञान प्रदान करने वाले साधनों व विधियों से है वस्तुतः ज्ञान मीमांसा के परिक्षेत्र में मानवीय बुद्धि, उसके ज्ञान  के स्वरुप ज्ञान की प्रमाणिकता, ज्ञान की सीमाएं, इसे प्राप्त करने की विधियाँ, ज्ञान प्राप्ति के साधन ज्ञाता और ज्ञेय के बीच सम्बन्ध आदि की विवेचना की जाती है जब कि तर्क मीमांसा  के परिक्षेत्र में विविध प्रमाणों, सत्य असत्य प्रमाण,तार्किक विधियों, सत्यता व भ्रम आदि की व्याख्या की जाती है तर्क व आज तक प्राप्त ज्ञान के आधार पर तार्किक विवेचना करते हुए सत्य को शोधा जाता है। सभी की ज्ञान व तर्क मीमांसा सम्बन्धी  विवेचना को शामिल किया जाता है।किसी भी दर्शन की ज्ञान व तर्क मीमांसा करते समय निम्न तथ्यों का ध्यान रखा जाना चाहिए।  –

01 – ज्ञान का स्वरुप ?

02 – ज्ञान प्राप्ति के साधन ?

03 – ज्ञान प्राप्ति के स्रोत ?

04 – ज्ञान प्राप्ति की विधियाँ ?

05 – ज्ञेय और ज्ञाता सम्बन्ध ?

06 – स्मरण ?

07 – विस्मरण ?

08 – सत्य व असत्य ज्ञान का अन्तर ?

09 – ज्ञान की सत्य सिद्धि हेतु तर्क प्रमाणिकता के आधार ?

10 – विविध तर्क विधियाँ ?

3 – मूल्य व आचार मीमांसा (Axiology and Ethics) –

यह कहना अतिशयोक्ति न होगा कि किसी भी दर्शन की मूल्य व आचार मीमांसा उसकी तत्व मीमांसा पर ही आधारित होती है किसी भी समाज के शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्य क्रम, शिक्षण विधियां, अनुशासन, शिक्षक व शिक्षार्थी सम्बन्धी विविध विचार मूल्य व आचार मीमांसा से ही अनुप्रेरित होते हैं कोई भी समाज अपनी नैतिकता की पराकाष्ठा हेतु विविध सामयिक मूल्यों की स्थापना पर पूरा ध्यान केंद्रित करता है और उनको स्थापित करना चाहता है। मूल्य व आचार मीमांसा के अन्तर्गत मानव समाज के जीवन हेतु आदर्श मूल्यों को विवेचित किया जाता है मूल्य विचारों और व्यवहारों को निर्देशित करते हैं नियन्त्रित करते हैं हमारा आचरण इन्ही मूल्यों को परिलक्षित करता है जीवन में कौन से कार्य किये जाने योग्य हैं और कौन से कार्य त्याज्य हैं इनका निर्धारण नीति शाश्त्र के अन्तर्गत आता है।सभी की मूल्य व आचार मीमांसा सम्बन्धी  विवेचना को शामिल किया जाता है।किसी भी दर्शन की मूल्य व आचार मीमांसा करते समय निम्न तथ्यों का चिन्तन किया  जाना चाहिए।  –

01 –  मानवीय जीवन उद्देश्य

02 – मूल उद्देश्य प्राप्ति साधन

03 – साध्य साधन सम्बन्ध

04 – उद्देश्य प्राप्ति उपाय

05 – मूल्य वरण

06 – शाश्वत मूल्य समझ

07 – नैतिकता

08 – उच्च नैतिक मानदण्ड स्थापन हेतु आवश्यक मूल्य

09 –  करने योग्य कर्म

10 –  त्याज्य कर्म  

उक्त तत्त्व मीमांसा, ज्ञान व तर्क मीमांसा, मूल्य व आचार मीमांसा को बार बार पढ़कर हृदयंगम करना है लेकिन यह याद रहे की सम्यक मीमांसा करने हेतु उस दर्शन का गहन अध्ययन परमावश्यक है जब तक दर्शन को भली भाँति अधिगमित नहीं किया जाएगा तब तक सम्यक मीमांसा करना सम्भव नहीं होगा।

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वाह जिन्दगी !

सोलह दूनीआठ ……..

March 15, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

झूठ बोलना पाप लिखा है, बाबूजी

सब कुछ अपने -आप लिखा है बाबूजी

देख के बदमाशी, इस सभ्य समाज की

अपने भाग्य में जाप लिखा है, बाबूजी

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।1।

दुष्टों का सत्यानाश लिखा है, बाबूजी

पैसे में छिपा वो पाप लिखा है बाबूजी। 

देख समझ मक्कारी उच्च समाज की,

जीवन को अभिशाप लिखा है बाबूजी।

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।2।

ईमानदारी में दाग लिखा है बाबूजी,

जाल जाल में जाल लिखा है बाबूजी।

देख घटिया निर्माण चाल सरकार की,

नेता को माई बाप लिखा है बाबूजी। 

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।3।

नदी किनारे साँप लिखा है बाबूजी,

रेता रात में साफ़ लिखा है बाबूजी।

देख समझ ताक़त इन ठेकेदारों की,

उनका कर्जा माफ़ लिखा है बाबूजी।  

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।4।

उनका पुण्य प्रताप लिखा है बाबूजी,

श्रम और मजदूरी ख़ाक लिखा है बाबूजी।

श्रम कणो में हिस्सेदारी नाथ बेईमान की,

पूँजी पति का प्रबल प्रताप लिखा है बाबूजी।   

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।

सोलह दूनी आठ लिखा है बाबूजी।5।

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शिक्षा

नींद / SLEEP

March 12, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

कभी कभी हम किसी को देखकर अनायास ही कह उठते आज आप बहुत तरोताज़ा दिख रहे हैं जवाब मिलता है आज वास्तव में पूरी गहरी नींद लेने को मिली है। सचमुच नींद किसी वरदान से कम नहीं कही जा सकती। एक अच्छी नींद शरीर के सभी अंगों हेतु टॉनिक का काम करती है जब हम सोते हैं तो हमारे शरीर के कई अंग विषाक्त पदार्थों को साफ़ करते हैं नींद शरीर के अन्दर के भागों के साथ त्वचा हेतु भी बहुत आवश्यक है। हमारे आँख बन्द करने से शरीर के दूसरे अंग आम करना बन्द नहीं करते। नाइट शिफ्ट में काम करने वाले मेहनतकश विविध स्वास्थ्य समस्याओं से जूझते रहते हैं।

नींद से आशय / Meaning of sleep –

विकिपीडिया के अनुसार –

“निद्रा एक उन्नत निर्माण क्रिया विषयक (एनाबोलिक) स्थिति है, जो विकास पर जोर देती है और रोगक्षम तन्त्र (इम्यून), तंत्रिका तंत्र, कंकालीय और मांसपेशी प्रणाली में नई जान दाल देती है सभी स्तनपायियों में, सभी पक्षियों और अनेक सरीसृपों, उभयचरों और मछलियों में इसका अनुपालन होता है।”

एक अन्य परिभाषा के अनुसार –

“निद्रा अपेक्षाकृत निलंबित संवेदी और संचालक गतिविधि की चेतना की एक प्राकृतिक बार बार आने वाली रूपांतरित स्थिति है जो लगभग सभी स्वैछिक मांसपेशियों की निष्क्रियता की विशेषता लिए होता है।“

इतिहास वेत्ता डॉ ० निर्मल कुमार के अनुसार –

“निद्रा प्राकृतिक रूप से शरीर को तरोताज़ा रखने का उपाय है।”

जबकि डॉ ० कविता का मानना है -“निद्रा एक ऊर्जावान शक्ति के रूप में नई सुबह का आभास कराती है व अपने लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु दृढ़ बनाती है।”

इसी क्रम में डॉ०  शालिनी ने बताया -“शारीरिक व मानसिक टूटफूट को व्यवस्थित कर निद्रा अग्रिम कार्यों हेतु स्वस्थ उपादान है।”

उक्त परिभाषाओं के विश्लेषण से यह तो स्पष्ट है कि पूरी नींद शरीर हेतु आवश्यक है।

अनिद्रा के कारण –

अनिद्रा के बहुत से कारण हैं उनमें से कुछ यहाँ प्रस्तुत हैं –

01 – भूख से अधिक भोजन

02 – मानसिक तनाव

03 – परिश्रम की कमी

04 – प्रमाद

05 – गृह क्लेश

06 – अनियमित श्रम

07 – अंग्रेजी औषधि व कैफीन युक्त पदार्थों का अधिक सेवन

08 – चिन्ता

09 – उच्च आकांक्षा स्तर

10 –  डर

11 – सन्तोष का अभाव

इस सम्बन्ध में एक कवि ने तो यहां तक कहा कि –

सरस्वती भूखी कविता है, लक्ष्मी को सन्तोष नहीं है।

और और की चाह और है मरघट आया होश नहीं है।

नींद पूरी न होने के नुकसान –

01 – व्यवहार दुष्प्रभावित

02 – शारीरिक स्वास्थ्य ह्रास

03 – मानसिक स्वास्थय दुष्प्रभावित

गम्भीर चिन्तक डॉ ० जे ० पी ० गौतम का विचार है –

निद्रा वह दशा है जो व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक थकान को दूर कर नवऊर्जा के संचरण का कारण बनती है। “

04 – कार्य क्षमता ह्रास

05 – क्रोध वृद्धि

06 – अवसाद

07 – मानसिक तनाव

08 – निर्णयन दुष्प्रभावित

09 – स्मृति ह्रास

10 – दुर्घटना वृद्धि

11 – मोटापा

12 – व्याधि निमन्त्रण

13 – रोग प्रतिरोधी क्षमता में ह्रास

14 – सृजनात्मक चिन्तन ह्रास

भूगोल वेत्ता डॉ ० टी ० पी ० सिंह का विचार है –

“निद्रा मानव जीवन हेतु ऊर्जा का वह प्राकृतिक स्रोत है जो किसी भी जीव या मानव में पुनः ऊर्जा व्यवस्थापन करता है। “

15 –  जैविक घड़ी दुष्प्रभावित

16 – थकान व निराशा

अच्छी नींद हेतु उपाय  –

01 – शारीरिक श्रम

एक प्रमुख शिक्षाविद डॉ ० राज कुमार गोयल ने कहा –

“चेतन मन की क्रियाओं को निरन्तर सुव्यवस्थित रूप से करने हेतु महत्त्वपूर्ण साधन है निद्रा।”

02 – नियमित व्यायाम व भ्रमण

आँग्ल भाषा के विद्वान् डॉ ० एस ० डी ० शर्मा  का विचार है –

“नींद शरीर की ऊर्जा को पुनर्जीवित करने का प्रमुख नैसर्गिक साधन है।”

03 – प्राणायाम व ध्यान

04 – तेल मालिश

05 – अँगुलियों के अग्र भाग पर दवाब

06 – गर्दन के पीछे अँगूठे से दबाना

07 – आराम दायक बिस्तर

08 – सोने जागने का समय निर्धारण

मेरे अनुसार –

जल्दी सोऊँगा जल्दी उठ जाऊँगा,

तेल मालिश करूँ, जोर अजमाऊँगा

है अखाड़े की मिट्टी बुलाती मुझे,

मैं वहाँ जाऊँगा हाँ वहाँ जाऊँगा।

09 – नशे से परहेज

10 – अंग्रेजी दवा व कैफीन का न्यूनतम प्रयोग

बचपन की याद मेरे शब्दों में –

बिन कहानी के दादी सुलाती न थीं

बिना पौ फटे वो जगाती न थीं

रात भर नींद तुमको क्यों आती नहीं

नींद की गोलियाँ तो जरूरी न थीं।  

11 – स्वस्थ व सकारात्मक चिन्तन

12 – गरिष्ठ भोजन से बचाव

13 – सन्तुलित आहार

14 – स्वस्थ आदत निर्माण

मेरे विचार में –

रात भर जागने से क्या फ़ायदा, भोर का वक़्त निद्रा में खो जाएगा,

रात में नींद लेने का है क़ायदा, गर भूलोगे  इसे भाग्य  सो जाएगा।

15 – स्वास्थ्य मूल्य निर्धारण

कुछ आदतें ऐसी होती हैं जो जीवन बदलने की क्षमता रखती हैं और यदि आप इसे सम्पूर्ण देखते व पढ़ते हैं तो निश्चित रूप से आपके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन होगा। पूर्ण नींद न लेने के क्या नुकसान हैं। नींद न आने के क्या कारण हैं ?अच्छी नींद लाने के क्या उपाय हैं यह सब जानकर अपने जीवन में सार्थक परिवर्तन किया जा सकता है।

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शिक्षा

ELECTIC TENDENCIES IN EDUCATION / शिक्षा में उदार प्रवृत्तियाँ

March 10, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

याद रहे यहाँ उदारवाद (Liberalism) और उपयोगितावाद(Utilitarianism) की बात करने नहीं जा रहे हैं उदारवाद व  उपयोगितावाद आपके शिक्षा शास्त्र के इस पाठ्यक्रम का हिस्सा न होकर यहाँ केवल उदार प्रवृत्तियों की बात है।

शिक्षा में उदार प्रवृत्तियों से आशय  (Meaning of liberal tendencies in education) –

प्रवृति का अर्थ आदत और स्वभाव होता है। शिक्षा के परिक्षेत्र में क्या उदार दृष्टिकोण उद्भवित हुआ है ? इसी का अध्ययन यहाँ किया जाना है। ज्ञान की विकास यात्रा में शिक्षा विविध काल में विविध विचारों से प्रभावित होती रही है यदि हम यूरोप के प्राचीन काल  वर्णन करें तो हमें देखने को मिलता है कि उस समय स्वामी और सेवक की शिक्षा में अन्तर दृष्टिगत होता है। राजा, स्वामी, जमींदार आदि को उदार शिक्षा प्रदान की जाती थी जबकि जनसाधारण को शिल्प या व्यवसाय सिखाया जाता था। उदार शिक्षा में धर्म शास्त्र, नीति शास्त्र, राजनीति, साहित्य, कला, इतिहास, संगीत आदि प्रधान रूप से सिखाया जाता था। शिक्षा में उदार दृष्टिकोण का सम्यक विकास हेतु हर सम्भव प्रयास होते थे। जो शिक्षा स्वभाव और आदतों में उदार भाव को प्रश्रय प्रदान करे वही उदार शिक्षा की श्रेणी में आती थी।

               उदार प्रवृत्ति की शिक्षा सामान्य शिक्षा है जिसमें साहित्य, कला, संगीत, इतिहास, नीति शास्त्र, राजनीति शास्त्र आदि की शिक्षा की प्रधानता होती है। जिनका सम्बन्ध उदार मन, विशाल मनस से होता है। उपयोगिता वादी शिक्षा में आर्थिक प्रश्न जुड़े रहते हैं यह व्यावहारिक, व्यावसायिक, कार्योन्मुख, क्रिया केन्द्रित, अर्थोपार्जन व जीविकोपार्जन मात्र के उद्देश्यों को लेकर चलती है।

उदार प्रवृत्ति शिक्षा के उद्देश्य / Objectives of Liberal Education –

उदार प्रवृत्ति शिक्षा सम्पूर्ण व्योम के उत्थान जैसे महती उद्देश्य को लेकर चलती है और भारत के इस उद्देश्य का ही उद्घोष करती है –

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

उदार प्रवृत्ति के आलोक में शिक्षा के उद्देश्य इस प्रकार निर्धारित किये जा सकते हैं।

1 – उदार मूल्य स्थापन

2 – चारित्रिक विकास

3 – उत्तम स्वास्थय 

4 – शिवम्  प्रवृत्ति

5 – सत्य आलम्बन

6 – सुन्दरम् स्थापन 

7 – आध्यात्मिक उत्थान

8 – आत्मोत्सर्ग की भावना

शिक्षा के विविध अंगों पर उदार प्रवृत्तियों का प्रभाव / Impact of liberal tendencies on various parts of education –

समस्त ज्ञानालोक ही उदार प्रवृत्ति शिक्षा के परिक्षेत्र में आता है लेकिन यहॉं हम प्रमुख अंगों पर उदार प्रवृत्ति शिक्षा के प्रभावों का अध्ययन करेंगे।

1 – शिक्षक (Teacher) –

शिक्षा में उदार प्रवृत्ति के अवतरण का प्रभाव आचार्य पर साफ़ परिलक्षित हो रहा है वह वर्तमान की शिक्षण सहायक सामग्री को अधिगम प्रभावी बनाने हेतु सम्यक प्रयोग कर रहा है। आज के अध्यापक ने विविध पुरानी सड़ी गली मान्यताओं का परित्याग कर उदारता को स्वयं में प्रश्रय दिया है और समस्त विद्यार्थियों के उत्थान हेतु यथा सम्भव प्रयासरत है यद्यपि शासन अध्यापकों के साथ न्याय में असफल रहा है लेकिन अध्यापक ने कर्त्तव्य की बलिवेदी पर यथा सम्भव स्वयं की आहुति दी है घर और समाज का कलुषित वातावरण, प्रतिकूल वातावरण उदात्त भावना का बाधक नहीं बन सका है। बालक का उदार दृष्टिकोण युक्त सर्वाङ्गीण विकास विद्यालय और सच्चे अध्यापक का ध्येय है। प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री डॉ राम शकल पाण्डेय ने लिखा। –

“आओ हम अपने समस्त विवादों एवं आपसी कलह को समाप्त कर स्नेह की इस भव्य धारा को सर्वत्र प्रवाहित कर दें।”

“Let us end all our disputes and mutual discord and let this grand stream of love flow everywhere.”

2 – विद्यार्थी (Student) –

शिक्षा के उदार दृष्टिकोण से प्रभावित शिक्षा में विद्यार्थी मानवीय उदार दृष्टिकोण से युक्त होना चाहिए। हर तरह के कट्टर दृष्टिकोण से विरत होकर मानवता का उत्थान और सम्यक दृष्टिकोण का विकास उदार शिक्षा का ध्येय है। शिक्षा की उदार प्रवृत्ति विद्यार्थी में विश्वबन्धुत्व और आवश्यक गुण  ग्राह्यता पर जोर देती है इसी लिए कहा गया कि –

अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्!!

उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् !!

3 – पाठ्यक्रम (Syllabus) –

समय के साथ कदमताल करते हुए शिक्षा ने अपने स्वरुप में विविध परिवर्तन किये हैं पहले इसमें साहित्य, कला, सङ्गीत, इतिहास, नीति शास्त्र, राजनीति विज्ञान आदि को ही प्रश्रय मिला था लेकिन आज की आवश्यकता के अनुरूप विविध विज्ञानों व व्यावहारिक तकनीकी ज्ञान को भी अब इसमें समाहित किया गया है।

विकिपीडिया का दृष्टिकोण है –

उदार शिक्षा (Liberal education) मध्ययुग के ‘उदार कलाओं’ की संकल्पना (कांसेप्ट) पर आधारित शिक्षा को कहते है। वर्तमान समय में ‘ज्ञान युग’ (Age of Enlightenment) के उदारतावाद पर आधारित शिक्षा को उदार शिक्षा कहते हैं। वस्तुतः उदार शिक्षा’ शिक्षा का दर्शन है जो व्यक्ति को विस्तृत ज्ञान, प्रदान करती है तथा इसके साथ मूल्य, आचरण, नागरिक दायित्वों का निर्वहन आदि सिखाती है। उदार शिक्षा प्रायः वैश्विक एवं बहुलतावादी दृष्टिकोण देती है।

अतः उक्त से सम्बन्धित सभी विषय पाठ्यक्रम में समाहित होंगे।

4 – शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods) –

अधिगम को प्रभावी बनाने हेतु पारम्परिक शिक्षण विधियों के साथ नवाचार से जन्मी शिक्षण विधियों का इस परिक्षेत्र में स्वागत है सामान्यतः प्रवचन विधि, व्याख्या विधि, प्रदर्शन विधि, तार्किक विधि, उदाहरण विधि, व्याख्यान विधि, शास्त्रार्थ, सेमीनार और विविध नव सञ्चार विधियों को इसमें सम्यक स्थान प्राप्त है। मनोवैज्ञानिक विधियों के साथ जो भी नवीन शिक्षण विधियाँ उदार शैक्षिक दृष्टिकोण विकास में सहयोग प्रदान कर सकती हैं उपयोग में लाई जा सकती हैं।

5 – अनुशासन (Discipline) –

उदार दृष्टि कोण ध्येय समर्पित है अतः इसमें ऐसी उच्छृंखलता को कोई स्थान नहीं है जो ध्येय प्राप्ति में बाधा बने। स्वतः अनुशासन ही इसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। विविध स्वतन्त्रता यथा समय, स्थान, दृष्टिकोण, विषय चयन के साथ यह अनुशासन दिखावा नहीं चाहता। बिना स्वयं को अनुशासित किये और बिना गम्भीर प्रयासों के उदात्त दृष्टिकोण के विकास की सोच भी भ्रामक रहेगी। इसीलिये पूर्ण मनोयोग से स्वानुशासन पर विवेक सम्मत जोर देना होगा।

नई शिक्षा नीति 2020 और उदार शिक्षा प्रवृत्ति  (New education policy 2020 and liberal education trend) –

NEP 2020 ने भी प्रत्येक शैक्षिक स्तर पर उदार शिक्षा प्रवृत्ति को पारिलक्षित किया है।  स्नातक स्तर पर एक वर्ष पढ़ने पर सर्टिफिकेट ,दो वर्ष अध्ययन पर डिप्लोमा, तीन वर्ष अध्ययन पर डिग्री प्राप्त होना उदार शिक्षा का ही लक्षण है इसके अलावा विविध विषयों के चयन की स्वतन्त्रता, व्यावहारिक विषय से जुड़ने के अवसर प्रदान कर नई शिक्षा नीति 2020 ने  उदार शिक्षा प्रवृत्ति का ही परिचय दिया है।

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शिक्षा

बाधा ( Barrier )

February 21, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है

मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं।

साथियों जीवन में उतार – चढ़ाव, ऊँच – नीच, उठना – गिरना, खुशी – ग़म, विश्वास – धोखा, दिन -रात, उजाला – अँधेरा आता ही रहता है इन समस्त सामयिक प्रक्रियाओं में परेशानियाँ, बाधाएँ हमें विचलित कर सकती हैं हमारा जीवट, हमारा आत्म बल ही हमें निजात दिला सकता है। हमें समय रहते बाधा निवारण के उपाय करने होते हैं अन्यथा हाथ मलने के सिवा कुछ नहीं बचता।

यहाँ बाधा से मेरा अभिप्राय किसी भूत बाधा, प्रेत बाधा,तन्त्र बाधा आदि से नहीं है। मेरा बाधा से आशय कार्य की सफलता में बाधक व्यावहारिक तत्वों और मनोभावों से है।

हमें अपने आप में जूझने का माद्दा पैदा करना है किसी विद्वान् ने बहुत सही कहा कि –

हारा वही जो लड़ा नहीं।

ये परेशानियाँ, ये बाधाएं हमें सशक्त बनाती हैं जीवन के कैनवास में रंग भरती हैं रास भरती हैं  श्री राम नरेश त्रिपाठी जी ने तो मृत्यु का भी स्वागत करने की प्रेरणा दी है उन्होंने कहा –

निर्भय स्वागत करो मृत्यु का

मृत्यु एक है, विश्राम स्थल।

जीव जहाँ से फिर चलता है

धारण कर नव जीवन सम्बल।

हमारी परम्पराएँ, हमारी मान्यताएं, हमारे सशक्त पूर्वज सभी हमें बाधाओं से टकराने का निर्देश देते हैं। किसी से धोखा मिलने पर, किसी के छल से, कोई आपत्ति आने पर, अचानक विषम स्थिति पैदा होने पर, हमें अपना मानसिक संतुलन नहीं खोना चाहिए बल्कि और दृढ़ता युक्त होकर अन्य के लिए भी प्रेरणावाहक की भूमिका का निर्वहन करना चाहिए। याद रखें पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की उन पंक्तियों को जिसमें उन्होंने हुंकार भरी –

बाधाएं आती हैं आएं,

घिरें प्रलय की घोर घटाएं,

पावों के नीचे अँगारे,

सिर पर बरसें यदि ज्वालायें,

निज हाथों से हँसते हँसते,        

आग लगा कर जलना होगा।

कदम मिलाकर चलना होगा।

वक्त साथ कदमताल करते हुए आइए चलते हैं उस पक्ष की ओर जहाँ लोग आपके हतोत्साह का कारण बनेंगे। वे आपको डराते हुए कहेंगे – कहना सरल है करना कठिन। वास्तव में ये वही लोग हैं जो न कुछ खुद कुछ कर सकते हैं और न ही किसी की प्रगति में मील का पत्थर बन सकते हैं इन गति अवरोधकों से बहुत सचेत रहने की जरूरत है। ये किसी भी कार्य के प्रति आपके मन में भय जगा सकते हैं और किसी भी रूप में आ सकते हैं यथा साथी, रिश्तेदार, सम्बन्धी, चिकित्सक, माता, पिता, गुरु या तथाकथित शुभ चिन्तक। कोई भी इस भूमिका को निर्वाहित कर सकता है। आपको अपने आपको आत्मविश्वास से युक्त कर यथार्थ के धरातल पर खड़ा करना है और व्यावहारिक विश्लेषण, संश्लेषण के आधार पर यथोचित निर्णय लेना है याद रखें –

रास्ता किस जगह नहीं होता

सिर्फ हमको पता नहीं होता

छोड़ दें डर कर रास्ता ही हम

ये कोई रास्ता नहीं होता।

इसीलिये शान्त चित्त रहकर हमें स्वयम मार्ग तलाश करना चाहिए। लोग क्या कहेंगे इसकी कत्तई चिन्ता नहीं करनी चाहिए और उन लोगों की बात पर भरोसा नहीं करना चाहिए  कोरे भाग्यवादी होते हैं और कहते फिरते हैं जो भाग्य में लिखा है वही होगा। हमें अपना भाग्य खुद ही गढ़ना है। हम आज जो हैं अपने पूर्व विचार और कर्मों की वजह से हैं। भाग्य पर भरोसे की जगह सम्यक रणनीति बनाकर क्रियान्वयन करें। अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘ जी ने कितना सुन्दर भाव अभिव्यक्त किये हैं –

देख कर बाधा विविध, बहुविघ्न घबराते नहीं।

रह भरोसे भाग्य के, दुःख भोग पछताते नहीं।

काम कितना भी कठिन हो किन्तु उकताते नहीं।

भीड़ में चञ्चल बने, जो वीर दिखलाते नहीं।

हो गए एक आन में, उनके बुरे दिन भी भले।

सब जगह सब काल में, वे ही मिले फूले फले।

एक बार हाँ सिर्फ एक बार दृढ़ सङ्कल्प लें, निर्विकल्प होकर सङ्कल्प लें। दृढ़ होकर अपने सपने पूरे करने के लिए चलें। सफलता आपके कदम चूमेगी। अरे हमारा सौभाग्य है हम उस देश में जन्मे हैं जिसमें शरीर के मरने की बात होती है आत्मा की नहीं। भगवान् कृष्ण ने स्वयम् अपने मुख़ार बिन्दु से कहा।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः

न चैनं क्लेदयन्त्यपो न शोषयति मारुतः ॥ 2.23॥

आइए अब आपको उस ओर ले चलता हूँ जहाँ आपके बहुत सारे प्रश्न, उत्तर पा सकते हैं समाधान प्राप्त कर सकते हैं। आखिर आज का सामान्य मानव चाहता क्या है ? धन, पद, प्रतिष्ठा, भौतिक उन्नति, अच्छे पैसे वाली नौकरी, आजीवन आर्थिक सुरक्षा।  कुछ मानव आध्यात्मिक प्रगति, शोध, अच्छा स्वास्थ्य आदि की भी कामना करते होंगे।

उक्त की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा क्या है ? अगर हम आत्म मंथन करेंगे तो पाएंगे कि सबसे बड़ी बाधा हम स्वयं हैं हम आलस्य, प्रमाद से युक्त हैं हमारे कार्यों में निरन्तरता नहीं है  अपने उद्देश्य की प्राप्ति का जुनून हम अपने आप में जगा नहीं पाए हैं। आधे अधूरे मन से किये गए प्रयास मंजिल तक नहीं पहुँचते यह हम सब जानते हैं फिर भी अपनी असफलता का ठीकरा दूसरे के पर फोड़ने की  आदत बन गयी है। कभी कभी अपनी मेहनत के फल की सहज चोरी देखते हुए भी हम जाग्रत नहीं होते। जिस दिन इन विकारों को हम अपने से दूर कर पाएंगे इस दुनियाँ के विविध आकांक्षित फल हमारे पहलू में होंगे। सफलता, अच्छा स्वास्थ्य, ऊँची प्रतिष्ठा, अच्छा पद, मान सम्मान  इन सबके पीछे  कड़ी मेहनत छिपी है याद रखें सफलता का कोई शॉर्ट कट नहीं होता।

यदि आप सचमुच सफल होना चाहते हैं तो अपने आप से उक्त प्रश्न करें, समाधान आपके संयत मन में छिपा है। सही दिशा में अनवरत प्रयास  सफलता की कुञ्जी है। बाधा निवारण का उपाय है।

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काव्य

काशीअविनाशी की नाभि ज्ञानवापी है।

February 16, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मन्दिर का भव्य होना, स्वस्थ परिपाटी है

मिटाने में दुष्टों ने, न रखी कसर बाकी है

पौराणिक ग्रंथों ने ज्ञान को जो प्रश्रय दिया

उसी का परिणाम है निशाँ अभी बाकी है।

काशी अविनाशी की नाभि ज्ञानवापी है।1।

बर्बर विध्वंश हुआ, पर पुरातन झाँकी है

खगोलीय, गणितीय, मापन  से आँकी है

काशी में विज्ञों ने, ज्ञान को संरक्षण दिया  

ज्ञानवापी केन्द्र है विस्तार सारी काशी है।

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।2।

लांघता मर्यादा को समझ लो वो पापी है

सत्य जानो, मानो ना, कैसी आपाधापी है

न्याय के मन्दिर ने सत्य को संरक्षण दिया

आ गई अयोध्या पर मथुरा,काशी बाकी है

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।3।   

राम ने मर्यादा गढ़ी, कृष्ण नीति साँची है

प्रलयंकारी शङ्कर ने गढ़ी नगरी काशी है

प्राची के ग्रंथों ने काशी का बखान किया

काशी में ईश विश्वनाथ और ज्ञानवापी है।

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।4।

सत्य सनातन आस्था चेतन जग व्यापी है

स्कन्द पुराण ने, महा महिमा ये बाँची है

भूगोल, अध्यात्म महिमा ने ये सिद्ध किया

अवमुक्तेश्वर ज्ञानप्राप्ति धाम ये काशी है।

काशी अविनाशी की, नाभि ज्ञानवापी है।5।

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वाह जिन्दगी !

हर सङ्कट का हल पाता है।

September 29, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जो कर्म को धर्म बनाता है,

हर कार्य सुगम हो जाता है।

रुकना थकना थम जाता है,

तनाव, क्षरण मिट जाता है।

जो काम में ध्यान लगाता है,

हर सङ्कट का हल पाता है।1।

तन, मन का कार्य कराता है,

शक्ति सञ्चय बढ़ जाता है।

श्रमकार्य सही गति पाता है,

मन रुचे,  कार्य हो जाता है।

जो काम में ध्यान लगाता है,

हर सङ्कट का हल पाता है।2।

मन तन एक स्थल पाता है,

अनुभव में ताजगी लाता है।

डर सारा दूर हो जाता है,

भ्रम – तम छँटता जाता है।   

जो काम में ध्यान लगाता है,

हर सङ्कट का हल पाता है।3।

तन काम को खेल बनाता है,

ऊर्जा क्षय रुकता जाता है।

ध्यान मानस शक्ति बढ़ाता है,

और कामचोरी से बचाता है।

जो काम में ध्यान लगाता है,

हर सङ्कट का हल पाता है ।4।

इक नव बन्धन बन जाता है,

कर्म – मर्म समझ में आता है।

चिन्ता का बोझ हट जाता है,

जोश सङ्ग होश मिल जाता है।   

जो काम में ध्यान लगाता है,

हर सङ्कट का हल पाता है ।5।

सब बिगड़े काम बनाता है,

जब चित्त सुदृढ़ हो जाता है।

सङ्कल्प प्रबल हो जाता है,

और मञ्जिल तकपहुँचाता है।

जो काम में ध्यान लगाता है,

हर सङ्कट का हल पाता है।6।

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काव्य

मेरी माटी मेरा देश।

August 9, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।

क्रान्ति का अनुपम सन्देशा, आकर हमें सुना जा।

है आज जरूरी हम को, तूँ सुन्दर स्वप्न दिखा जा।

सपने अपने करने की,  तूँ कला कोई समझा जा।

पावन भारत, सुन्दर भारत, बस ये तूँ गढ़ता जा।

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 1 ।।

भारत के हर एक युवक में इच्छा शक्ति जगा जा।

कर्मठता का बीज मन्त्र भी आकर हमें सिखा जा।

तनमन सुन्दर करने का एक सुन्दर भाव जगा जा।

बहुत सोलिया अब तूँ, कुछ उथल पुथल करता जा।

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 2 ।।

हो बलशाली युवा यहाँ,  सिद्धि मन्त्र सिखला जा।

अन्त निशा का हो जाए, ऐेसा दिन-मान जगा जा।

पूरब सी लाली छा  जाए, ऐसा मार्तण्ड उगा जा।

हो सदा ओज का संरक्षण दिव्य कान्ति को पा जा।   

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 3 ।।

जो सोता है वो खोता है, मन में सोच जगा जा।

पूर्वज श्रद्धा केन्द्र बनें, वो उन्नत भाव जगा जा।

रख सीने में आग ज्ञान का वो शोला भड़का जा।

शोलों से प्रतिमान नए हर पथ में तूँ गढ़ता जा।  

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 4 ।।

चलना उठना, उठना गिरना चलन हमें समझा जा।

उठा भाल, संग क्रान्ति ज्वाल, ये सन्देशा फैला जा।

भारत उठता, बढ़ता चढ़ता, युवा शक्ति का राजा।

बनके ज्वार इसी शक्ति का शिखरों तक चढ़ता जा।    

‘मेरी माटी मेरा देश’ ये तुझे पुकारे आजा।। 5 ।।

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दर्शन

अनुमान/INFERENCE

August 6, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रमाण : अनुमान

न्याय दर्शन के अनुसार प्रमाणों की दुनियाँ में एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण है  ‘अनुमान’ . यह शब्द दो शब्दों का योग है  अनु +मान =अनुमान ।

अनु शब्द से आशय पश्चात से है मान का अर्थ होता है ज्ञान। अर्थात अनुमान का तात्पर्य पूर्व ज्ञान के पश्चात होने वाले ज्ञान से है।

उदाहरण के लिए यदि हम कहते हैं कि पर्वत पर धुआँ है इसलिए वहाँ आग है क्योंकि हमें यह पहले से ही पता है कि धुएं और आग में व्याप्ति सम्बन्ध है। अर्थात जहाँ पर धुआँ होता है उस जगह पर आग अवश्य होती है।

अतः अनुमान को सरलतम रूप में इस तरह पारिभाषित किया जा सकता है जब दो वस्तुओं की व्याप्ति के पूर्व ज्ञान के आधार पर उनमें से किसी एक को देखकर दूसरी का ज्ञान प्राप्त करते हैं। अनुमान प्रमाण कहलाता है।

अनुमान के भेद (Types of inference )  –

चूँकि अनुमान एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण है अर्थात विविध आधारों पर इसके भेदों का अधिगमन आवश्यक है यहाँ प्रयोजन, व्याप्ति, और व्याप्ति स्थापना के आधार पर विविध भेदों को सरलतम रूप में देने का प्रयास है।

प्रयोजन भेद के आधार पर –

1 –  स्वार्थानुमान

2 – परार्थानुमान 

1 –  स्वार्थानुमान – जिस अनुमान को अपने लिए किया जाता है उसे स्वार्थानुमान कहते हैं जैसे कोई व्यक्ति पर्वत पर धुआँ देखता है और व्याप्ति सम्बन्ध के आधार पर यह निष्कर्ष निकालता है कि उक्त नियमानुसार पर्वत पर अग्नि है और यह वह खुद के लिए निकालता है तो इसे स्वार्थानुमान कहेंगे।

2 – परार्थानुमान – जो अनुमान अन्य लोगों ज्ञान कराने हेतु पंचावयवों का प्रयोग कराते हुए किया जाता है उसे परार्थानुमान कहते हैं। ये पॉंच अवयव इस प्रकार हैं –

i – प्रतिज्ञा

ii – हेतु

iii – दृष्टान्त 

iv  – उपनय

v  – निगमन  

i – प्रतिज्ञा – साध्य के पक्ष में होने का ज्ञान प्रतिज्ञा द्वारा कराया जाता है। जैसे -पर्वत पर अग्नि है।                      

ii – हेतु – जिस साधन के द्वारा साध्य का अनुमान होता है उसे हेतु कहते हैं। जैसे – क्यों कि पर्वत पर धुआँ है।

iii – दृष्टान्त – व्याप्ति की व्याख्या और प्रमाणिकता हेतु दिए गए दृष्टान्त का वर्णन किया जाता है। यथा जहाँ -जहाँ धुआँ होता है वहाँ वहाँ अग्नि होती है जैसे रसोई घर में।

iv – उपनय – जिस व्याप्ति का होना तृतीय अवयव के रूप में दिया जाता है और उसे विशिष्ट हेतु का पक्ष होना दिखाया जाता है उपनय कहलाता है। जैसे – अमुक पर्वत पर धुआँ है। 

v – निगमन – जिससे साध्य के सिद्ध होने का प्रतिपादन करते हैं निगमन कहलाता है। जैसे -अतः पर्वत पर अग्नि है । 

व्याप्ति के भेद – अनुमान के अनुसार व्याप्ति के तीन भेद इस प्रकार हैं –

पूर्ववत – जब भविष्य के कार्य का अनुमान वर्तमान के कारण से होता है अर्थात किसी कारण से कार्य के अनुमान को पूर्ववत कहते हैं। जैसे बादलोँ की उमड़ घुमड़ को देखकर यह अनुमान लगाना कि आज बारिश होगी।

शेषवत – शेषवत कार्य से कारण के अनुमान को कहते हैं व्याप्ति में साधन व साध्य के बीच कार्य कारण सम्बन्ध होता है। इसमें इस समय यानी कि वर्तमान काल में जो कार्य सम्पन्न हो रहा होता है उसके पिछले कार्य का अनुमान लगाया जाता है। जैसे अचानक नदी में पानी के बढ़ने और उसके तीव्र वेग से यह अनुमान लगाना कि कहीं बारिश हुई होगी।

सामान्यतोदृष्ट – सामान्यतोदृष्टउस प्रमाण का नाम है जिसमें अप्रत्यक्ष के आधार पर भी सम्बन्ध का अनुमान लगाया जाता है जैसे दो अलग अलग दूरस्थ स्थानों से चन्द्रमा को देखकर उसकी गतिशीलता  का अनुमान लगाना। यह अनुमान कार्य कारण सम्बन्ध पर नहीं बल्कि इस आधार पर होता है साधन और साध्य एक दूसरे के बराबर निकट पाए जाते हैं।

व्याप्ति स्थापना प्रणाली –

अनुमान के तीन भेद व्याप्ति स्थापना प्रणाली के आधार पर किये जाते हैं

केवलान्वयी –

जब साधन और साध्य में नियत साहचर्य पाया जाता है तो यह केवल अन्वयी कहलाता है।  इस प्रकार की व्याप्ति केवल अन्वय द्वारा स्थापित होती है इसमें व्यतिरेक का एकदम अभाव रहता है उदाहरणार्थ सभी ज्ञेय, अभिज्ञेय हैं।

केवल अन्वय व्याप्ति के बल पर खड़ा किया हुआ हेतु केवलान्वयी कहलाता है। इसमें उपस्थित शब्द ‘केवल’ उसकी व्यतिरेक व्याप्ति की सम्भावना को दूर कर देता है।

केवल व्यतिरेकी –

जब हम जीवित शरीर को सिद्ध करने हेतु यह कहते हैं उसमें आत्मा है क्योंकि उसमें प्राणदिमत्त्व (प्राण,इन्द्रियाँ,ह्रदय आदि )हेतु उपस्थित है अर्थात जब साधन तथा साध्य की अन्वयमूलक व्याप्ति से नहीं बल्कि साध्य के अभाव के साथ साधन के प्रभाव की व्याप्ति के ज्ञान से अनुमान होता है तो इसे केवल व्यतिरेकी अनुमान कहते हैं।

अन्वय व्यतिरेकी –

जब साधन के उपस्थित रहने पर साध्य भी उपस्थित रहता है एवम् साध्य के अनुपस्थित होने पर साधन भी अनुपस्थित हो जाता है अर्थात व्याप्ति का ज्ञान अन्वय  एवम् व्यतिरेक की सम्मलित उपस्थिति पर ही निर्भर करता है। अतः अन्वय व्यतिरेकी अनुमान उसको कहा जा सकता है जिसमें साधन और साध्य का सम्बन्ध अन्वय और व्यतिरेक दोनों के साथ स्थापित होता है।उदाहरण के लिए जहाँ आग नहीं वहाँ धुआँ नहीं।

उक्त विवेचन से स्पष्ट है कि अनुमान प्रमाण एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण है जिसे इससे सम्बद्ध कुछ शब्दों को जानकर आसानी से समझा जा सकता है।

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