गर्मी
के दिनों में लोग इस बात से परेशान रहते हैं की वे अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं
कर पाते। यदि सम्पूर्ण दिन को गर्मी के लिहाज से तीन भागों में बाँटते हैं प्रातः, दोपहर, शाम
तो इसमें बीच वाला भाग अर्थात दोपहर सबसे तपिश भरी होती है। बहुत सारे शरीर इस मौसम
से इतने अधिक प्रभावित होते हैं कि उन्हें हमेशा गर्मी महसूस होती है जिससे उनके
कार्य में बाधा पड़ती है। यहाँ प्रस्तुत हैं –
गर्मी
में कूल कूल रहने के आठ उपाय
Eight
ways to stay cool in summer
01 – जल का सेवन (Water intake)
02 – तरल खाद्य पदार्थों का उचित सेवन (Suitable intake of liquid foods)
04 – फल, सब्जी और सुपाच्य भोजन (Fruits, vegetables and nutritious food)
05 – मसालेदार, अधिक तले भुने, अधिक नमक व कैफीन युक्त पदार्थों का सेवन नहीं
(Do not consume spicy, excessive fried,
high salt and caffeinated substances)
06 –मौसम के अनुसार वस्त्र (Clothing according to the season)
07 – नींद और स्नान (Sleep and bath)
08 – पैर के तलवे की देखभाल (Foot care)
01 – जल का सेवन (Water intake)-
गर्मी
के दिनों में जल का सेवन सोच समझ कर किया जाना चाहिए पानी घूँट घूँट करके पिया
जाना चाहिए केवल शौच निवृत्ति से पूर्व आप लगातार पानीपी सकते हैं। यदि गुन गुना
जल नहीं ले सकते तो फ्रिज का बहुत ठण्डा पानी भी वर्जित है सादा जल या घड़े
के जल का सेवन किया जा सकता है इसे आप अपने थर्मस में भरकर कार्य स्थल पर भी ले जा
सकते हैं। सुबह सुबह, रात्रि को ताँबे के लोटे में रखे जल का सेवन
किया जा सकता है। यह पूरे दिन में प्यास के अनुसार या तीन से चार लीटर लिया जा
सकता है।गर्मी में बाहर निकलने से पहले पर्याप्त जल का सेवन करना चाहिए। पानी
उंकड़ू बैठ कर पीना मुफीद है खड़े होकर नहीं पीना चाहिए।
02 – तरल खाद्य पदार्थों का उचित सेवन (Suitable intake of liquid foods) –
खाद्य
सामग्री के मामले में भारत सचमुच बहुत भाग्य शाली है इसमें जहां विविधता पूर्ण
व्यञ्जन उपलब्ध हैं वहीं मौसमानुकूल खाद्य सामग्री की बह भरमार है गर्मी में अधिक
जल वाले तत्वों का विकल्प चुना जाना चाहिए जैसे नीबू पानी,नारियल पानी, छाछ, आम का पना, पानी
की सेंधा नमक वाली शिकन्जी,जौ के सत्तू का शरबत,विविध दोष रहित जूस, दही की लस्सी आदि इनमें आवश्यकतानुसार पुदीना,प्याज,धनिया
सौंफ आदि का प्रयोग किया जा सकता है। कृत्रिम शीतल पेय बोतल बन्द या डिब्बे बन्द
बासी तरल पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
घाट की राबड़ी जिसमें जौ का दलिया व छाछ होता है,
लिया जा सकता है।
प्राणायाम, योग और सूक्ष्म व्यायाम किया जाना चाहिए शीतली, शीतकारी प्राणायाम अधिक उपयोगी है educationaacharya.com पर Tip to Top Exercise दो भागों में पहले दी जा चुकी हैं जो उपयोगी रहेंगी। सुविधा की दृष्टि से इसका लिंक यू ट्यूब (Education Aacharya) के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दूँगा।[ https://youtu.be/-Pw39aG5-IQ, https://youtu.be/bl2uqMUk_f8] याद रखें मानसिक शान्ति भी शारीरिक शान्ति में योग देती है।
04 – फल, सब्जी और सुपाच्य भोजन (Fruits, vegetables and nutritious
food) –
शारीरिक
गर्मी पर नियन्त्रण हेतु भोजन सुपाच्य ही किया जाना चाहिए और भूख से कुछ कम लिया
जाना चाहिए रात्रि के भोजन पर सर्वाधिक नियंत्रण की आवश्यकता है और यह सोने से कम से कम दो घण्टे
पहले किया जाना चाहिए। भोजन से पहले आप पानी पी सकते हैं लेकिन भोजन के उपरान्त कम
से कम आधा घण्टे जल न पीएं।
05 – मसालेदार, अधिक तले भुने,अधिक नमक व कैफीन युक्त पदार्थों का सेवन नहीं
(Do not consume spicy, excessive fried,
high salt and caffeinated substances) –
इस प्रकार के पदार्थ शरीर में अनावश्यक
गर्मी का कारण बनाते हैं शरीर में पित्त ,एसिड
आदि की वृद्धि के साथ वात,
पित्त, कफ
में असंतुलन पैदा कर विकार का कारण बनते हैं।
06 –मौसम के अनुसार वस्त्र (Clothing according to the season) –
गर्मियों में हल्के, ढीले वाले सूती वस्त्रों का प्रयोग किया जाना
चाहिए।टाइट ,शरीर से चिपके वस्त्र नहीं पहनने से बचना
चाहिए। रंगों के चयन में सावधानी रखें हुए हलके रंग प्रयोग में लाएं जाएँ। वस्त्र
ऐसे हों जिससे शरीर को आराम मिले पूरी बाँह के वस्त्र पहनें।आवश्यकतानुसार अँगोछा
लिया जा सकता है।
07 – नींद और स्नान (Sleep
and bath) –
जहाँ
सुबह उठकर दैनिक क्रियाओं में स्नान को स्थान मिला हुआ है वहीं निद्रा पूर्व स्नान
अच्छी आरामदायक नीं दिलाता और शरीर की
गर्मी पर नियन्त्रण रखता है यदि उस समय स्नान कर सकते तो पैरों को अच्छी तरह धोना
अति आवश्यक है।
08 – पैर के तलवे की देखभाल (Foot
care) –
रात्रि
में सोने से पहले पैर धोने की बात ऊपर आ चुकी है यह क्रिया शीतल नैसर्गिक जल से हो
बर्फ के पानी या फ्रिज के पानी से नहीं। इसके पश्चात अच्छी तरह गोले के असली तेल
से तलवों की मसाज अवश्य करें और तलवे के प्रत्येक भाग को अंगुलियों के दवाब का
अहसास कराएं आनन्द आएगा। इतनी मसाज करें की तेल सूख जाए।
यद्यपि गर्मी के प्रकोप के निदान में
चिकित्सकीय परामर्श सर्वाधिक आवश्यक है लेकिन इलाज से पहले सावधानी के महत्त्व को
नकारा नहीं जा सकता।
वैदिक
कालीन शिक्षा एवम् सामाजिक व्यवस्था पर ब्राह्मणों का एक मात्र अधिकार था इसलिए
वैदिक शिक्षा को ब्राह्मणीय शिक्षा के नाम से भी जानते हैं कुछ इतिहासकार इसे
वैदिक काल,उत्तर वैदिक काल,ब्राह्मण काल,उपनिषद काल,सूत्र
काल और स्मृतिकाल में विभक्त कर वर्णित करते हैं परन्तु इन सभी कालों में वेदों की
प्रधानता रही अतः इस सम्पूर्ण काल को वैदिक काल कहते हैं।
वैदिक
शिक्षा का अर्थ – वैदिक साहित्य में ‘शिक्षा’ शब्द विद्या,ज्ञान, प्रबोध एवम् विनय आदि अर्थों में प्रयुक्त हुआ
है। वैदिक शिक्षा का तात्पर्य शिक्षा के उस प्रकार से था जिससे व्यक्ति का
सर्वांगीण विकास हो सके और वह धर्म के आधार पर वर्णित मार्ग पर चलकर मानव जीवन के
चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सके जैसा
अल्तेकर महोदय ने लिखा –
“शिक्षा को ज्ञान, प्रकाश और शक्ति का ऐसा
स्रोत माना जाता था जो हमारीशारीरिक,मानसिक,भौतिक और आध्यात्मिक
शक्तियों तथा क्षमताओं का उत्तरोत्तर और सामन्जस्य पूर्ण विकास करके हमारे स्वभाव
को परिवर्तित करती है और उत्कृष्ट बनाती है।”
“Education was regarded as a source of
illumination and power which transforms and ennobles our nature by the
progressive and harmonious development of our physical, mental, intellectual
and spiritual powers and faculties.
A.S.Altekar;
Education in Ancient India
1973, p. 8
शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श –
चूंकि जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना था इसलिए
इसके अनुसार ही शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श निर्धारित किये गए जैसा कि अल्तेकर
महोदय ने लिखा –
“प्राचीन
भारतीय उद्देश्यों एवम् आदर्शों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है – ईश्वर भक्ति
की भावना एवम् धार्मिकता का समावेश, चरित्र का निर्माण,व्यक्तित्व का विकास, सामाजिक कर्तव्यों को
समझाना,सामाजिक कुशलता की उन्नति तथा संस्कृति का
संरक्षण तथा प्रसार।”
“Infusion of a spirit of piety and religiousness,
formation of character, development of personality, inculcation of civic and
social duties, promotion of social efficiency and preservation and spread of
national culture may be described as the chief aims and ideals of ancient
Indian Education.” – A. S. Altekar,pp8-9
1 – धर्म परायणता की भावना एवम् धार्मिकता का
समावेश
(Infusion
of a spirit of piety and religiousness)
2 – सामाजिक कुशलता की उन्नति (Promotion
of Social Efficiency)
3 – चरित्र निर्माण (Formation of
character)
4 – व्यक्तित्व का विकास (Development
of personality)
5 – नागरिक एवम् सामाजिक कर्त्तव्यों की समझ (Inculcation
of civic and social duties)
6 – राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण व प्रसार (Preservation
and spread of National culture)
हर
समाज के अपने नियम होते हैं मर्यादाएं होती हैं परम्पराएं होती हैं। वर्तमान
परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि प्रत्येक समाज परिवर्तन व विकास को परिलक्षित
कर रहा है। आज सामाजिक परिवर्तन करने वाले बहुत से साधन दीख पड़ते हैं उनमें से
शिक्षा परिवर्तन का सशक्त साधन है। डॉ०राधा कृष्णन महोदय कहते हैं :-
“शिक्षा परिवर्तन का साधन है। जो कार्य
साधारण समाजों में परिवार,धर्म
और सामाजिक एवम् राजनीतिक संस्थाओं द्वारा किया जाता था, वह आज शिक्षा संस्थाओं द्वारा किया जाता है।”
मूलतः
आज शिक्षा का एक महत्वपूर्ण कार्य सामाजिक परिवर्तन हो चला है।
सामाजिक
परिवर्तन [Social
Change] –
परिवर्तन
प्रकृति का नियम है और सभी परिक्षेत्रों में परिवर्तन दिखाई पड़ रहे हैं इस क्रम
में समाज में परिवर्तन भी स्वाभाविक है हाँ परिवर्तन कहीं और किसी समय तीव्र या
मन्द देखे जा सकते हैं। गिलिन एवम् गिलिन महोदय कहते हैं –
“We
may define social change as variation from the accepted modes of life.”
“सामाजिक परिवर्तन को हम जीवन की स्वीकृत
विधियों में होने वाले परिवर्तन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।”
एम
० डी ० जेन्सन (M.D.
Jensan ) महोदय
का कहना है –
“Social
change may be defined as modification in the ways of doing and thinking of
people.”
“सामाजिक परिवर्तन को व्यक्तियों की क्रियाओं और
विचारों में होने वाले परिवर्तनों के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है।”
गिन्सबर्ग
(Ginsberg) महोदय का मानना है कि –
“By
social change, I understand a change in social structure,e.g, the size of
society, the composition or balance of its parts or the types of its
organization.”
“सामाजिक परिवर्तन से हमारा तात्पर्य सामाजिक
ढाँचे में परिवर्तन होना है, अर्थात समाज के आकार इसके विभिन्न अंगों के बीच सन्तुलन अथवा समाज के
संगठन में होने वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन है।”
उक्त
के आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक संरचना,सामाजिक
सम्बन्धों,सामाजिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और विविध समाजों में आने वाले
परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन कहा जाएगा।
सामाजिक
परिवर्तन में शिक्षा की भूमिका
(Role of
education in social change)
शिक्षा
समाज में किस तरह परिवर्तन ला सकती है इसे
हम इन बिंदुओं से अधिगमित कर सकते हैं –
1 – शाश्वत मूल्यों को संरक्षण (Preservation of eternal values)
2 – संस्कृति का हस्तान्तरण (Transmission of Culture)
3 – परिवर्तन ग्राह्यता (Change acceptability)
4 – परिवर्तनों का मूल्याँकन (Evaluation of changes)
5 – सामाजिक बुराइयों के अन्त में सहायक
(Helpful in ending social evils)
6 – ज्ञान के नए परिक्षेत्रों का विकास (Development of new domains of
knowledge)
7 – मानव और समाज के सम्बन्धों को बनाये रखना (Maintaining human and society
relations)
8 – सामाजिक परिवर्तनों का नेतृत्व (Leader ship of social change)
9 – सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा (Education for social change)
10 – सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)
इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षा
सामाजिक परिवर्तन की सशक्त वाहक है तथा मैकाइवर महोदय का यह मानना यथार्थ है कि –
“….our
direct concern as sociologists is with social relationships. It is the change
in these which alone we shall regard as social change.”
“समाजशास्त्री के रूप में हमारा प्रत्यक्ष
सम्बन्ध केवल सामाजिक सम्बन्धों से होता है। इस दृष्टिकोण से केवल सामाजिक
सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तनों को ही हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।”
उक्त
समस्त बिन्दु सामाजिक बदलाव का सशक्त संकेत देते हैं शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में
उचित कहा गया कि –
“Education
can be used as a powerful instrument of social, economic and political
change.”
“शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिवर्तन के शक्तिशाली साधन के रूप में प्रयोग किया जा
सकता है।”
साथियो, हम सब मानव हैं और मानवीय गुणों व मानवीय
कमजोरियों से युक्त रहते हैं हमारा अपना मस्तिष्क हमारी सोच ,हमारे विचारों का उद्गम स्थल है जो बहुत सारी
बाहरी शक्तियों से प्रभावित होता है और इसी क्रम में हमारा परिचय अपनी कमजोरियों
से होता है जो हमारी प्रगति यात्रा का
सबसे बड़ा अवरोधक है आज की प्रस्तुति का मंतव्य ही यह है कि हम अपनी कमजोरियों को
ताक़त में कैसे बदलें ?
कमजोरी है क्या ?-
What is weakness?
यह हमारी विचार प्रक्रिया का वह उत्पादन है जो हमारे मस्तिष्क ने
हमें दिया है। मस्तिष्क जब किसी कार्य, विचार
या कटु अनुभव के आधार पर पलायनवादी दृष्टिकोण अपनाने को विवश करता है वही हमारा
कमजोर
बिन्दु है और हमारे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दुश्मन। कोई भी कमजोरी तब
तक कमजोरी है जब तक उसके सशक्तीकरण के प्रयास न किये जाएँ।
एक कमजोर रस्सी कुछ और रेशों के सहयोग से मजबूत हो सकती है इसी तरह
कमजोरी सशक्त विचारों से दृढ़ इच्छा शक्ति का रूप धारणकर सबसे सशक्त पहलू का रूप
धारण कर सकता है आपने देखा होगा भौंरा
विज्ञान के नियमों को धता बता अपने कमजोर पँखों से बखूबी उड़ता है।
कमजोरी को ताक़त में बदलने के आठ उपाय
Eight steps to turn weakness into strength –
इससे पहले की उन आठ अद्भुत उपायों से आपका परिचय कराऊँ। उनके
सुदृढ़ीकरण हेतु मजबूत आधार बनाना आवश्यक होगा। इसीक्रम में आप सभी दिव्य चेतन
आत्माओं से यह कहना प्रासंगिक होगा। कि जो कुछ हमारे अवचेतन मन से जुड़ जाता है वह
फलीभूत होता है इसीलिए यह तथ्य कि ‘मैं अपनी कमजोरी को ताक़त में बदल सकता हूँ’
गहनता से दोहराएं और इसे चेतना की गहराई तक
समाने दें।
यह कमजोरी वास्तव में एक चुनौती पूर्ण अवसर है जिसे पहचानने का अवसर
हमें मिला है और इसी लिए कमजोरी का ताक़त में बदलना निश्चित है इसे अवश्यम्भावी
बनाने वाले आठ कदम इस प्रकार हैं –
1 – कमजोरी
का क्षेत्र पहचानें। (Recognize the region of weakness)
2 – सकारात्मक
सोच। (Positive Approach)-
3 – डर
का मुकाबला करें। (Face your fears)
4 – सभी
विमाओं का गहन चिन्तन (Deep thinking about all dimensions)
5 – सकारात्मक
व्यक्तित्वों का साथ (Associate
with positive personalities)
6 – एक
एक कर कमजोरी का निवारण करें। (Tackle a weakness at a time)
7 – विश्वास
सुदृढ़ीकरण (Strengthening
belief system)-
8 – स्व
व्यक्तित्वानुसार सशक्तीकरण (Empowerment through self personalities)
जिन्हें
शिक्षा के उद्देश्य कहा जाता है वास्तव में वे सम्पूर्ण मानवता के उद्देश्य होते
हैं और शिक्षा वह साधन है जिससे यह उद्देश्य प्राप्त किए जाते हैं।लेकिन बलचाल में
हम शिक्षा के उद्देश्य का प्रयोग करते हैं और ये इतने आवश्यक हैं कि बी ० डी ०
भाटिया जी को कहना पड़ा कि :-
“Without
the knowledge of aims, the educator is like a sailor who does not know the goal
or his determination, and the child is like a rudderless vessel which will be
drifted along somewhere ashore.”
“उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस
नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मन्जिल को नहीं जानता है और बालक उस पतवार
विहीन नौका के सामान है जो लहरों के थपेड़े खाकर किसी भी किनारे जा लगेगी।”’
प्रजातन्त्रीय देश भारत के उत्थान हेतु यह परम आवश्यक होगा कि वह लोकतन्त्र की मर्यादा के अनुरूप सम्पूर्ण देश की शिक्षा हेतु उद्देश्यों का निर्धारण करे और इस उद्देश्य निर्धारण में निम्न बिन्दु महती भूमिका का निर्वहन करेंगे। सुविधा की दृष्टिकोण से इन्हें तीन भागों में विभक्त किया गया है।
[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य
[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य
[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य
[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक
उद्देश्य
एक ऐसा महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्त्व जो राजनैतिक गलियारों की सुर्ख़ियों
में आने और जेल यात्राओं के बाद भी अपने आप को आध्यात्मिक चिन्तन से विलग न कर
सका। एक विशुद्ध दार्शनिक जो महान चिन्तक, विश्लेषक, योगाचार्य सभी की विशिष्ट भूमिका में जीवन
पर्यन्त दिखाई पड़ा। इसीलिए पी ० टी ० राजू कहते हैं –
“Of all Indian Philosophers Shri Aurobindo is the
only who is known both as yogi and philosopher…….. .Hi is much respected in India and regarded
as one of her greatest sons.”
“भारत के सभी दार्शनिकों मेंश्री अरविन्द ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो एक
योगी और एक दार्शनिक दोनों रूपों में प्रसिद्द हैं। वे भारत में बहुत ही सम्मानित
और उसके महानतम पुत्रों में से एक माने जाते हैं।”
श्री अरविन्द का
दार्शनिक चिन्तन
PHILOSOPHICAL
THOUGHT OF SHRI AUROBINDO
श्री अरविन्द आधुनिक युग में ऋषि परम्परा के
वे साधक हैं जो महान चिन्तक, विश्लेषक, क्रान्तिकारी, पत्रकार। शिक्षा
सुधारक सभी के गुणों को वहन करते हुए मूल रूप से गीता का विशेष आलाम्बिक बल रखते
थे ये मानव और दिव्य शक्ति के संयोग को दिव्यानुभूति कराने वाला योग मानते हैं ये
सम्पूर्ण मानव जाति सर्वांगीण सर्वोत्थान की और ले जाने का प्रयास है। इसीलिये
इनकी विचारधारा को सर्वांग योग दर्शन भी कहा जाता है इस दर्शन के अधिगमन हेतु
विभिन्न मीमांसाओं का अध्ययन समीचीन होगा।
तत्त्व मीमांसा –
ये सृष्टि का कर्त्ता ईश्वर को स्वीकार करते
हैं और जगत के निर्माण हेतु विभिन्न विकास सोपानों की बात करते हैं। ये आरोहण और
अवरोहण विकास की दो दिशाएँ बताते हैं।इस प्रक्रम को अधिगमन हेतु इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है –
इनके अनुसार ज्ञान और अज्ञान में परस्पर
विरोध नहीं है बल्कि अज्ञान का स्वाभाविक गन्तव्य ज्ञान है ये भौतिक और आध्यात्मिक
तत्त्वों में अभेद को जानना ही सच्चे ज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं व इसे
द्रव्य ज्ञान और तत्त्व ज्ञान नामक दो विभागों में बाँटते हैं द्रव्य ज्ञान से आशय
जगत ज्ञान अर्थात साधारण ज्ञान से है जबकि आत्म ज्ञान को ये उच्च ज्ञान के रूप में
स्वीकारते हैं आत्म ज्ञान अन्तःकरण द्वारा होता है इनका तर्क है कि इसकी प्राप्ति
का महत्त्वपूर्ण साधन योग की क्रियाएं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि हैं।
मूल्य एवम् आचार
मीमाँसा –
इनके योग दर्शन की मूल्य व आचार मीमांसा को
समझने के लिए महर्षि अरविन्द के आरोहण क्रम का अध्ययन परम आवश्यक है इनके आरोहण
सोपान हैं – – द्रव्य → प्राण →मानस→ अतिमानस→ आनन्द→ चित्त→ सत। इसमें द्रव्य, प्राण, मानस के स्तर को तो
मानव जन्म के समय पार कर चुका होता है जन्म के पश्चात अति मानस की स्थिति को
प्राप्त कर उसका ध्येय अर्थात अंतिम उद्देश्य आनन्द+ चित्त+ सत की प्राप्ति होता
है। सत चित्त आनन्द की प्राप्ति का साधन गीता का कर्म योग व ध्यान योग है और इसके
लिए यह परम आवश्यक है कि मन विकार रहित हो, शरीर स्वस्थ व जीवन
संयमी हो और इस उद्देश्य की प्राप्ति का साधन योग की क्रियाएं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि हैं।
जीवन दर्शन (Philosophy of
life) –
1 – मानव, सर्वोत्तम योनि
2 – ब्रह्म -सर्वशक्तिमान
और निरपेक्ष
3 – सच्चा ज्ञान भौतिक और
आध्यात्मिक तत्वों के अभेद को जानना।
4 – ज्ञान के दो रूप –
द्रव्य ज्ञान और आत्म ज्ञान
5 – कर्म योग व ध्यान योग
सत चित्त आनन्द की प्राप्ति का साधन
6 – जीवन का अन्तिम
उद्देश्य सत चित्त आनन्द की प्राप्ति।
7 – पुनर्जन्म सम्बन्धी
धारणा
वे लिखते हैं -“यदि किसी सचेतन व्यक्तित्व का विकास होता है तो
पुनर्जन्म होना आवश्यक है। पुनर्जन्म एक युक्ति संगत आवश्यकता है और एक आध्यात्मिक
तथ्य है जिसका हम अनुभव कर सकते हैं।”
शिक्षा दर्शन के
आधारभूत सिद्धान्त (fundamentals of Educational philosophy
) –
श्री अरविन्द का कहना है –
“That
alone would be true and living education which helps to bring out to full
advantage all that is in an individual man.”
“सच्ची और वास्तविक
शिक्षा वही है जो मानव की अन्तर्निहित समस्त शक्तियों को इस प्रकार विकसित करती
हैं कि वह उनसे पूर्ण रूप से लाभान्वित होता है।”
उक्त स्थिति को प्राप्त तभी किया जा सकता है
जब इनके शिक्षा दर्शन को पूर्ण आयाम मिले जिसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं –
01 – बालक शिक्षा का केन्द्र
02 – मातृ भाषा, शिक्षा का माध्यम
03 – ब्रह्मचर्य शिक्षा का आधार
04 – अन्तर्निहित समस्त शक्तियों का व्यावहारिक
विकास
05 – पूर्ण मानव बनाने का साधन शिक्षा
06 – सुरुचि पूर्णता
07 – धर्म को यथोचित स्थान
08 – चेतना का सम्यक विकास
09 – ज्ञानेन्द्रियों का यथाशक्ति प्रशिक्षण
10 – सुषुप्त शक्तियों का विकास
11 – मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों से अनुकूलन
12 – मित्र व पथ प्रदर्शक हो शिक्षा
श्री अरविंद का
शैक्षिक चिन्तन (Educational thought of Shri
Aurobindo) –
ये शिक्षा के द्वारा मानव का सच्चा उत्कर्ष
चाहते थे इन्होने कहा –
“Education
to be true must not be a machine made fabric, but a true building or living
evocation of the powers of the mind and spirit of human being.”
“सच्ची शिक्षा को मशीन
से बना सूत नहीं होना चाहिए, अपितु इसको मानव के
मस्तिष्क तथा आत्मा की शक्तियों का निर्माण अथवा जीवित उत्कर्ष करना चाहिए।”
श्री अरविन्द ने दार्शनिक के रूप में इतना
श्लाघनीय कार्य किया है कि जहाँ इतिहास के पृष्ठ उन्हें समेटने को आकुल दिखे वहीं
आने वाले युग ने उनके विचारों में अपने लिए पथ की तलाश की। ये राष्ट्र के समग्र
उत्थान हेतु नवीन शिक्षा से युक्त करना चाहते थे इसीलिये इन्होंने अपनी दो
पुस्तकों नेशनल सिस्टम ऑफ़ एजुकेशन (National System Of Education)और ऑफ़ एजुकेशन (Of Education)) के माध्यम से एक राष्ट्रीय योजना प्रस्तुत
की। उक्त को आधार बनाकर
उनके शिक्षा सम्बन्धी विचारों को यहाँ दिया गया है :-
शिक्षा का सम्प्रत्यय
[Concept Of Education]-
महर्षि अरविन्द के अनुसार –
“सूचनाओं का संग्रह
मात्र शिक्षा नहीं है। सूचनाएं ज्ञान की नींव नहीं हो सकती। वे अधिक से अधिक वह
सामग्री हो सकती हैं जिसके द्वारा जानने वाला अपने ज्ञान की वृद्धि कर सकता है
अथवा वे वह बिन्दु हैं, जहां से ज्ञान को
आरम्भ किया जाए या नई खोजों को निकालना प्रारम्भ किया जाए। वह शिक्षा जो अपने आप
को ज्ञान देने तक सीमित रखती है शिक्षा नहीं है।”
इनका दृढ़ विश्वास था कि मनुष्य द्रव्य और
प्राण की अवस्था पार कर मानस की स्थिति में होता है जन्म के बाद उसे क्रमशः अति
मानस ,आनन्द ,चित् , सत् की स्थिति को
प्राप्त करना होता है अतः शिक्षा ऐसी हो जो मानव का आध्यात्मिक, भौतिक, प्राणिक, मानसिक विकास करे इस
प्रकार की शिक्षा को सम्पूर्ण शिक्षा (Integral Education ) के रूप में इन्होने
स्वीकार किया। श्री अरविन्द के अनुसार –
“Education
is the building of the power of the human mind and spirit. It is the evoking of
knowledge, character and culture.”
“शिक्षा मानव के
मष्तिस्क और आत्मा की शक्तियों का निर्माण करती है और उसमें ज्ञान, चरित्र और संस्कृति को
जागृत करती है। ”
शिक्षा के उद्देश्य (Aim
of Education) –
1 – भौतिक या व्यावसायिक
विकास
2 – प्राणिक उत्थान
3 – मानसिक उत्कृष्टता
4 – अन्तः करण का विकास
5 – सत् चित्त आनन्द की
प्राप्ति
पाठ्यक्रम (Syllabus)–
यदि ध्यान से देखा जाए तो पाठ्यक्रम शिक्षा
के उद्देश्यों पर आलम्बित होता है यहां भी शिक्षा उन उद्देश्यों की प्राप्ति का
साधन भर है और इसी वजह से इनके पाठ्यक्रम को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है।
भौतिक उत्थान हेतु
विषय – मातृ भाषा, राष्ट्र भाषा व उत्थान
हेतु आवश्यक अन्य अन्तर्राष्ट्रीय भाषाएँ। भूगोल,इतिहास,अर्थशास्त्र,समाज शास्त्र विज्ञान, गणित,स्वास्थय विज्ञान,भूगर्भ विज्ञान,कृषि,वाणिज्य,कला और मनोविज्ञान
आदि।
शारीरिक क्रियाएं – व्यायाम, खेलकूद, योगासन, शिल्प व अन्य
श्रमसाध्य कार्य।
आध्यात्मिक विषय – वेद, उपनिषद,नीति शास्त्र, गीता, धर्म शास्त्र ,विभिन्न देशों का धर्म
व दर्शन।
आध्यात्मिक क्रियाएं – भजन, कीर्तन, प्राणायाम आदि।
शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods)–
ये प्राचीन विधियों को नवीन रूप देना चाहते
थे और चाहते थे कि रटाने की प्रवृत्ति से बचा जाए। इनकी क्रियाओं व शिक्षण विधियों
को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।
1 – रूचि आधारित
2 – प्रेम, सहानुभूति आधारित
3 – स्वातंत्रय अनुभूति
आधारित
4 – स्वप्रयत्न विधि,स्व अनुभव विधि
5 – स्वनिरीक्षण विधि
6 – क्रिया आधारित शिक्षण
विधि
7 – मौखिक विधि
इसके अतिरिक्त ये उपदेश,प्रवचन,तर्क ,तुलना,अभिव्यक्ति,विवेचना,व्याख्यान,व स्वाध्याय विधियों
को भी उचित सम्मान देते हैं।
शिक्षक (Teacher) –
ये शिक्षक को रटाने वाली मशीन नहीं बनाना चाहते बल्कि
उसे निर्देशक,पथ प्रदर्शक,सहायक,के रूप में देखना
चाहते हैं और चाहते हैं कि वह अभिरुचि आधारित संकलन के प्रस्तुतीकरण कर्ता के रूप
में कार्य सम्पादित करे। वह प्रकृति के अनुरूप चलाने हेतु अभिप्रेरक की भूमिका का
निर्वहन करे। उन्होंने कहाकि –
“The
teacher is not an instructor or task master, he is helper and guide this
business is to suggest and not to impose. He does not actually train the pupils
mind, he only shows him how to perfect his instruments of knowledge and helps
him and encourages him in the process.”
“अध्यापक निर्देशक या
स्वामी नहीं है। वह सहायक और पथ प्रदर्शक है। उसका कार्य सुझाव देना है, न कि ज्ञान को लादना।
वह वास्तव में छात्र के मष्तिस्क को प्रशिक्षित नहीं करता है। वह छात्र को केवल यह
बताता है कि वह अपने ज्ञान के साधनों को किस प्रकार समृद्ध बनाए। वह छात्र को सीखने
की प्रक्रिया में सहायता और प्रेरणा देता है।”
विद्यार्थी (Student)
–
इनकी शिक्षा बाल केन्द्रित शिक्षा है और
इसीलिये ये चाहते हैं की बालक की विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर उसके विकास के
सोपान बहुत सोच समझ कर विकसित किये जाने चाहिए। इन्होने कहा :-
“The
idea of hammering the child into shape desired by the parent or teacher is a
barbarous and ignorant supersituation, there can be no great error than for the
parent to arrenge before hand that his son shall develop particular qualities
and capacities.”
“बालक को मातापिता अथवा
शिक्षक की इच्छानुकूल ढालना अंधविश्वास और जंगलीपन है। मातापिता इससे बड़ी भूल और कोइ नहीं कर सकते कि
वे पहले से ही इस बात की व्यवस्था करें कि उनके पुत्र में विशिष्ट गुणों, क्षमताओं तथा विचारों
का विकास होगा।”
विद्यालय (The
School) –
ये प्राचीन ऋषियों द्वारा संचालित आश्रम
पद्धतियों के साथ आधुनिक परिस्थतियों का भी पूर्ण ध्यान रखना चाहते हैं और
विद्यालयों में मनसा,वाचा,कर्मणा,पर अधिक ध्यान देना
चाहते हैं और नहीं चाहते कि रंग, रूप, देश, जाति, धर्म के आधार पर कोइ
भेद भाव हो। ये विश्व बन्धुत्व के
विकास का वातावरण विद्यालयों में चाहते हैं।
अनुशासन (Discipline
) –
इनके अनुसार शिक्षा और अनुशासन में अनुलोम
सम्बन्ध है ये चाहते हैं की विद्यालय ब्रह्मचर्य का अनुपालन सुनिश्चित करने साथ
मुक्तिवादी अनुपालन सिद्धान्त का अनुकरण करें और बच्चों में स्वतंत्र रूप सर आदर्श
स्वीकारोक्ति का गुण विकसित करेंऔर स्व अनुशासन की भावना बलवती करें।
शिक्षा के अन्य पक्षों
के सम्बद्ध में विचार (Views of other Aspects of Education)-
1 – राष्ट्रीय शिक्षा
सम्बन्धी विचार (Views about National Education)
2 – धार्मिक व नैतिक
शिक्षा (Religious and Moral Education)
3 – अन्तर्राष्ट्रीयता की
शिक्षा (Education of internationalism)
4 – नारी शिक्षा (Women
Education)
5 – धर्म सम्बन्धी विचार (Views
about religion)-
श्री अरविन्द के अनुसार :-
“हम भारतवासी आर्य जाति
के वंशधर हैं, आर्य शिक्षा और आर्य
नीति के अधिकारी हैं। यह आर्य भाव ही हमारा कुलधर्म और ज्योति धर्म है। ज्ञान, भक्तिऔर निष्काम कर्म आर्य
शिक्षा के मूल तत्व हैं तथा ज्ञान, उदारता, प्रेम, साहस, शक्ति, विनय आर्य चरित्र के
लक्षण हैं।”
शिक्षा दर्शन का मूल्याङ्कन
(Evaluation of Philosophy of Education) –
इनकी विदेशी शिक्षा पद्धति से मुक्ति की
छटपटाहट और भारतीय समाज के कल्याण की भावना स्पष्ट परिलक्षित होती है। ऐसा लगता है
गुरु शिष्य परम्परा से कालान्तर में इस पर प्रभावी कार्य नहीं हो सका और शिक्षा पर
जो इनका प्रभाव परिलक्षित होना चाहिए था नहीं हो सका जबकि इन्होने शिक्षा के विविध
पहलुओं को समयानुकूल बनाने का प्रयास किया।
श्री कंगाली चरणपति के भाव द्रष्टव्य हैं :-
“श्री अरविन्द का
शिक्षा दर्शन मूलतः उनके आध्यात्मिक योग दर्शन पर आधारित है। श्री अरविन्द ने अपनी
दिव्य दृष्टि की शक्ति से मानव जीवन के जिन गंभीर तत्वों का उदघाटन किया है, वे ही उनके शिक्षा
दर्शन की आधारशिला हैं। इसमें हमें समग्र मानव जीवन व समग्र संसारके सर्वांगीण रूप
का आभास मिल जाता है। श्री अरविन्द ने जीवन और संसार के किसी पहलू को त्यागा नहीं
है।”