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काव्य

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।

March 11, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आज कुछ फिर यूँ, गुनगुनाने चला हूँ,

प्रभु गीत  बुन कर, मैं सुनाने चला हूँ,

जो कुछ किया है या फिर आगे करेंगे,

प्रभु की इच्छा से होता, बताने चला हूँ।

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।1।

मौन से नाद उपजा हाँ बजाने चला हूँ,

नाद अनहद अलख को जगाने चला हूँ,

काम दुष्कर है प्रभु जी हम कैसे करेंगे,

होगा प्रभु की कृपा से बताने चला हूँ।

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।2।

जो सोए हुए हैं उनको जगाने चला हूँ,

दिल में करुणा आलय बनाने चला हूँ,

शोध के सार को सरलतम कैसे करेंगे,

आह्लाद को प्रहलाद  दिखाने चला हूँ।

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।3।

मिथ्या का अलगाव मिटाने चला हूँ,

चेतना का, प्रतिमान बनाने चला हूँ,

दृढ़ इच्छा लगन का अवलम्ब रखेंगे,

सद् उदगार जग में जगाने चला हूँ।

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।4।

सर्वोत्थान का विश्वास, दिलाने चला हूँ,

आराम  की आदत मैं,  छुटाने चला हूँ,

अखण्ड जीवन – ज्योति जला के रहेंगे,

भारतीयता विशुद्धतम फैलाने चला हूँ।

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।5।

सारी  सङ्कीर्ण  भावना मिटाने चला हूँ,

गङ्गा सद्भावना की मैं, बहाने चला हूँ,

कण्टक पथ पर सुमन हम बिछाके रहेंगे,

पावन दामन के दाग मिटाने चला हूँ।

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।6।

मर्यादाओं को दिल से निभाने चला हूँ,

माँ भवानी को हृदय में जगाने चला हूँ,

जोश में होश मिश्रित हम करके रहेंगे,

माँ भारती को अब मैं रिझाने चला हूँ।          

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।7।

अम्बर को धरती पर,  मैं लाने चला हूँ,

भागीरथ सा प्रयास अब कराने चला हूँ,

हौसला अनवरत विजय का हम रखेंगे,

जागरण के चन्दख्वाब दिखाने चला हूँ।

 आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।8।

सद् इच्छायें मनस  की बताने चला हूँ,

चेतनता को अब प्रश्रय दिलाने चला हूँ,

भाव कृतज्ञता का हम, सदा  ही  रखेंगे,

‘नाथ’ इन्सानियत सबमें जगाने चला हूँ।

आनन्द, परमानन्द से मिलाने चला हूँ।9।

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काव्य

बिछुड़न उनसे फिर क्यूँ कर है ?

March 7, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

अन्दर से टूट गया था मन,

ये टूटन आखिर क्यूँ कर है ?

धुंआ क्यों भरता अन्तर्मन

नयनों में तड़प ये क्यूँ कर है ?

गालों पर ढलकते अश्रु कण,

यह निर्मल जल फिर क्यूँ कर है ?

किन यादों में गुम सा है मन,

ये पीड़ा आखिर क्यूँ कर है ?

लीला अद्भुत,अद्भुत है चलन,

पर लीला आखिर क्यूँ कर है।

क्यों आते जाते रहते हम,

ये दर्दो ग़म फिर क्यूँ कर है ?

उत्तर खोते प्रश्नों को नमन,

बुद्धि की सीमा क्यूँ कर है ?

कैसे ढूंढें वह सत्पथ हम,

पथ गुम आखिर फिर क्यूँ कर है ?

बुद्धि पर भारी पड़ता मन,

इन्द्रिय चक्कर ये क्यूँ कर है,

उत्तर सारे बन जाते प्रश्न,

ये चक्कर आखिर क्यूँ कर है ?

मिलने से बिछुड़ने तक का क्रम,

हे  ‘नाथ’  कहो ये क्यूँ कर है।

जिन सम्बन्धों से बँधते हम,

बिछुड़न उनसे फिर क्यूँ कर है ?       

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वाह जिन्दगी !

आ गई है होली पूरा गाँव याद आया।

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

होलीगीत सुनकर ये मन कसमसाया,

ये है अजीब बस्ती न गाँव जैसा साया,

नहीं है वो मस्ती न महुआ नजरआया,

बनावटी रूप में धन्यवाद नज़र आया ।

आ गई है होली पूरा गाँव याद आया।।1।

हुड़दंगो की टोली ने मनमेरा लुभाया,

भीड़ है यहाँ पे न अपना नज़र आया,

लोग जा रहे हैं पर ना मेरे रंग लगाया,

रंग भी उदास हैं, न हास नज़र आया।

आ गई है होली पूरा गाँव याद आया  ।2।

देखकर पिचकारी बचपन याद आया,

वो आलू ठप्पे और गुब्बारों की  माया,

रंग गाढ़ा -गाढ़ा कैसे हमने था लगाया,

अबीर और गुलाल जी भर के उड़ाया।

आ गई है होली पूरा गाँव याद आया ।3।

नहीं बचसका चाहे जोभी पास आया,

नहीं था कहीं भी तब, कोरोना  साया,

मस्त थीं बहारें हमने खूब रंग लुटाया,

थकगए जब हमसब तब माँ ने बुलाया।

आ गई है होली पूरा गाँव याद आया ।4।

आज देखता हूँ जब मैं नल पर नहाया,

विगत के पृष्ठों का ट्यूबवैल यादआया,

ढली जब दोपहर तो जुहारी ने लुभाया,

दही बड़े गुझिया पापड़ भर पेट खाया।

आ गई है होली पूरा गाँव याद आया ।5।

हुड़दंग संग गाँव में मर्यादा का साया,

जो था जिसके मन में, वही गीत गया,

आपस में किसी ने कुछभी ना छुपाया,

छोटे बड़े सभी में पर प्रेम नज़र आया।

आ गई है होली पूरा गाँव याद आया ।6।      

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काव्य

कमियों का क्षरण कर दो।

March 6, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

बन जाओ शक्ति मेरी

जीवन को सबल कर दो।

ना कोई क्रन्दन हो

शुभ कर्म का अभिनन्दन।

सद्कर्म करे कोई

तो दिखता अच्छा मन।

नयी लीक पकड़ कर तुम

रूढ़ि का अन्त कर दो।

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

मानव का स्वार्थीपन

ना दीखे इस जग में।

सब कुछ खोकर अपना

बस प्रीत प्रबल कर दो।

बस प्रीत प्रबल कर दो।

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

अवसर छीने हमसे

हमें जो भी लगे अच्छे

सब सफल हुए अबतक

हम हो न सके अच्छे।

प्रभु साथ हमें देकर

जीवन को सफल कर दो।

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

बन जाओ शक्ति मेरी

जीवन को सबल कर दो।

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वाह जिन्दगी !

होली है त्यौहार प्रेम का……….

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

हाथ जोड़ वन्दन करके हम गीत फाग का गाएंगे,

अपनी अग्रज पीढ़ी का, आशीष चरण छू पाएंगे,

विषम परिस्थिति कितनी भी प्रेम त्यौहार मनाएंगे,

तरह तरह के फाग सुना कर प्रेम गुलाल उड़ाएंगे।

होली है त्यौहार प्रेम का हमसब ये फर्ज निभाएंगे।1।

गौरव राष्ट्र का ध्यान रखेंगे, मर्यादा से बँध जाएंगे,

पावस बन्धन ध्यान रखेंगे, सुरभि पवित्र फैलाएंगे,

प्रकृति से हम प्यार करेंगे, पावन सा रंग बनाएंगे,

बहु रंगी है वतन हमारा, फाग में सब रंग जाएंगे।

होली है त्यौहार प्रेम का हमसब ये फर्ज निभाएंगे।2।

तरह तरह के पकवानों से, हम सब भोग लगाएंगे,

करेंगे धरती माँ का वन्दन, चन्दन तिलक लगाएंगे,

जागरूक रहें चैतन्य बनें हम शौर्य का रंग बनाएंगे,

केसरिया बाना धारण करके, मर्यादा पाठ पढ़ाएंगे।

होली है त्यौहार प्रेम का हमसब ये फर्ज निभाएंगे।3।

रंगबिरङ्गी संस्कृति अपनी दुनियाँ को रँग लगाएंगे,

दुनियाँ वाले बहुत थक चुके यहाँ आ शान्ति पाएंगे,

अबीर गुलाल के रंगों से, मौसम मदमस्त बनाएंगे,

खा पीकर आनन्द में हम, ॐ नमः शिवाय गाएंगे।      

होली है त्यौहार प्रेम का हमसब ये फर्ज निभाएंगे।4।

इन्हें लगाएं उन्हें लगाएं, अब सबको रंग लगाएंगे,

सारे वैरभाव भूल कर अब प्रेम का रस बरसायेंगे,

पर अपना अबहम ध्यान रखेंगे धोखे में ना आएंगे,

पूरे तरह चौकन्ने हो कर, हम प्रेम प्रसार कराएँगे।

होली है त्यौहार प्रेम का हमसब ये फर्ज निभाएंगे।5।

इसहोली को उसहोली से हम कुछ अलग बनाएंगे,

जितना हम सबसे सम्भव होगा स्नेह मेंह बरसाएंगे,

हर आयु के सब बन्दों में हम सब सौहाद्र लुटाएंगे,

शक्तिसंचरण करके नाथ सन्तुलन का रंग बनाएंगे।

होली है त्यौहार प्रेम का हमसब ये फर्ज निभाएंगे।6।

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वाह जिन्दगी !

सद्कर्म करना चाहिए।

March 5, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जीवन में एैसे कर्म का वरण करना चाहिए,

सर्वजन कल्याण हो, वह कर्म करना चाहिए,

अपने लिए अपनों के हित कर्म करते हैं सभी,

विश्व का कल्याण मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

पुरुष हैं पुरुषत्व का ही वरण करना चाहिए,

लिङ्ग भेद कारण ना बने कर्म करना चाहिए,

स्वजन के उत्थान हित, तो काम करते हैं सभी,

जगत कल्याणार्थ हमको करम करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

रक्त बह चुका बहुत, रस धार बहना चाहिए,

कटुताप्रश्रय है बहुत सदवचन कहना चाहिए,

क्रोध का अवलम्ब ले सर गरम करते हैं सभी,

करुणा रस आधार ले आचरण करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

प्रत्येक रोम महन्त हो वह सन्त बनना चाहिए,

घृणा प्रसरण हो नहीं यह धरम बनना चाहिए,

अपने ज़रा से कार्य पर हम गर्व करते हैं सभी,

कर्मफल जिनका जगत उसे नमन करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

भ ग व अ न के अर्थ का प्रसार करना चाहिए,

भू गगन वायु अगन नीर पावस रहना चाहिए,

अपने अपने ईश को ले, क्यों झगड़ते हैं सभी,

ईश्वर सभी का एक है, यह मान लेना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

त्रितापहारिणी शक्ति शिव मनन करना चाहिए,

दैहिक,दैविक,भौतिक ताप हरण करना चाहिए,

अर्थ शिव कल्याण है क्यों अनजान बनते हैं सभी,

सकल जग कल्याण हित ही करम करना चाहिए।

धर्म अर्थ काम मोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।

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वाह जिन्दगी !

मृत्यु आनन्द दिलाएगी।

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

तन गाड़ी चलती जानी है, ये परम धाम तक जाएगी,

नहीं चलेगा साथ कोई निज करनी टिकट दिलाएगी,

मोक्ष धाम की टिकट प्राप्ति, सद्कर्मों से हो पाएगी ,

यदि स्तर कुछ निम्न रहा इस जग में पुनः ले आएगी।

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।

अटूट श्रद्धायुक्त विश्वास रखो मृत्यु आनन्द दिलाएगी,

मृत्यु शरीर की होती है, आत्मा तो अजर कहलाएगी,

नूतन शरीर धारण होगा या हमें मुक्ति मिल जायेगी ,

तय अमरता आत्मा की सद्कर्म से गति मिल पाएगी।

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।

आसक्ति रहेगी यदि बाकी, मृत्यु कठिन हो जाएगी,

अपूर्ण कार्य पूर्ण करने,नवशरीर धर आत्मा आएगी,

जग से सम्बन्ध बिसारोगे तब ही मुक्ति मिल पाएगी,

आनन्द की यात्रा ही इकदिन वांछितलक्ष्य दिलाएगी।

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।

कार्यकारण का पावन निर्धारण ईश सत्ता करवाएगी,

मिथ्या आसक्ति मोक्ष तज, जन्म कारण बन जाएगी,

तनविकार व मनविकार फिर दुनियाँ में भटकाएगी,

बार बार मनन चिन्तन करने में हमें देर लग जायेगी।

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।।

आसक्ति तजोगे यदि तुमसब बुद्धि निर्मल हो जाएगी,

निर्मल चिन्तन से प्राप्त शक्ति, सद्चिन्तन करवाएगी,

सुप्रारब्ध गठन की शक्तिशुभ अच्छे दर्शन से आएगी,

चिन्तन सशक्त हो जाएगा निश्चित मुक्ति मिल जाएगी।

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।।

सब आवागमन क्रमशः टूटेगा, मृत्यु निद्रा सम आएगी,

परमेश्वर में हम लयहोंगे यह सोच आनन्द दिलाएगी,

परमात्मा का परमेश्वर का आलम्ब सृष्टि रख पाएगी,

सारी यात्रा सुगम सुखद होगी मृत्यु थकान मिटाएगी।

आ जाएगा आनन्द हमें,  तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।।

व्यवस्थित होगा ये जीवन व्यवहार में भी लयआएगी,

दुर्भावना समूल भग जाएगी छलछद्म नष्ट हो जाएगी,

जाने की जग से वजह मिले, यात्रा मङ्गल हो जाएगी,

पावन होगा सफर सारा, शवयात्रा पावन हो जाएगी। 

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।।

पावन पावन कारण सुनकर मन में सिहरन आएगी,

मोक्ष हुआ निश्चित या फिर, आत्मा सम्बन्ध बनाएगी,

दोनों ही स्थिति मन सुन लो, जिज्ञासा बढ़ती जाएगी,

सद्कर्म प्रवृत्ति बढ़ेगी तब मन में शान्ति छा जाएगी।

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।। 

दुनियाँ तो आनी जानी है यह भावना मन में आएगी,

इस जग में कर्म पूरे कर के, जाने की बारी आएगी,

यात्रा के आनन्द की सुन, मन में सुगन्ध छा जाएगी,

पुलकित होगा निर्भयमन अंतिम क्षण स्मृति आएगी।         

आ जाएगा आनन्द हमें, तन मृत्यु आनन्द दिलाएगी।।

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वाह जिन्दगी !

हमें क्रोध क्यों आ जाता है।(Hamen krodh kyon aa jata h.

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मानव है सामाजिक प्राणी,

बोध तिरोहित हो जाता है।

बुद्धि ही काम नहीं करती,

सौन्दर्यबोध भी खो जाता है।

हमें क्रोध क्यों आ जाता है।।

दुर्गुणता प्रश्रय को पाती,

सौम्यव्यवहार न रहपाता है।

सद्भाव भावना भी न रहती,

प्रेम भाव सब खो जाता है।

हमें क्रोध क्यों आ जाता है।

उच्च रक्त चाप की प्राप्ती,

नेत्र  लाल  भी हो जाता है।

संयम की क्षमता नहीं रहती,

दिशा बोध भी खो जाता है।

हमें क्रोध क्यों आ जाता है। 

दुर्भावना स्वर ऊँचा करती,

स्नेह पगा स्वर खो जाता है,

बुद्धि हरण सीमा न रहती,

और विवेक मारा जाता है।

 हमें क्रोध क्यों आ जाता है।।

सुरसा फिर शालीनता खाती,

क्या से क्या होता जाता है,

मर्यादा अतिक्रमणता बसती,

आत्म नियन्त्रण खो जाता है।     

हमें क्रोध क्यों आ जाता है।।

ज्वाला तेज धधकती जाती,

कालिमा भाव बस छाजाता है।

उद्वेगों की सरिता बहती,

रक्त अकारण बह जाता है।

हमें क्रोध क्यों आ जाता है।।  

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दर्शन

तार्किक प्रत्यक्षवाद (Logical Positivism) PART-2

March 3, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षा पर तार्किक प्रत्यक्षवाद का प्रभाव (Impact Of Logical Positivism On Education)-

तार्किक प्रत्यक्षवाद ने शिक्षा के उद्देश्यों, पाठ्य क्रम, शिक्षक एवम शिक्षार्थी, शिक्षण विधियों व अनुशासन को स्वानुसार विवेचित किया जिसे इस प्रकार अभिव्यक्त कर सकते हैं।

उद्देश्य ( Aims ) –

चूंकि ये ज्ञान का आधार अनुभव जन्य ज्ञान को मानते हैं इस लिए सार्थक निरर्थक, ज्ञान अज्ञान एवम नीर क्षीर विवेक में समर्थ ज्ञान को शिक्षा के उद्देश्यों में शामिल करना चाहते हैं और भाषा व स्वशक्ति परिमार्जन पर जोर देते हुए इस प्रकार उद्देश्य निर्धारण करते हैं –

[A ]- सृजनात्मक शक्ति का विकास [Development Of Creativity  ]

[B ]- भाषा पर अधिकार [Command on Language] [C ]- शारीरिक विकास व इन्द्रिय प्रशिक्षण [Physical Development and Sensuous Training ] [D ]- विवेक जागरण [ Intellectual Awakening ] [E ]- विश्वसनीयता एवम वैद्यता [Reliability and Validity] [F ]- व्यावसायिक दक्षता [Vocational Efficiency]

पाठ्य क्रम [Syllabus ]- 

इन्होने विचार, अध्यात्म, पूर्व निश्चित नैतिकता का खण्डन कर प्राकृतिक विज्ञानों की सत्यता को सिद्ध कर पाठ्यक्रम हेतु उपयोगी माना। प्रत्यक्ष अनुभव पर अधिक जोर देने के कारण भाषा, व्याकरण, तार्किकता के महत्त्व को स्वीकार किया। 

शिक्षक और शिक्षार्थी [Teacher And Learner]-

ये वैज्ञानिक सोच वाले यथार्थ के धरातल पर खड़े अध्यापकों को शिक्षा प्रसार हेतु आवश्यक मानते हैं शिक्षा को बालकेन्द्रित करते हुए विद्यार्थियों को उनकी रूचि मानसिक योग्यता क्षमता  को ध्यान में रखते हुए शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

अनुशासन [Discipline ] –

ये  प्रमाणिकता, वस्तुनिष्ठता, यथार्थता, अनुभववादिता, कट्टरता विरोध धार्मिकनैतिकता विरोध का समर्थन कर अनुशासन स्थापित करना चाहते हैं।

शिक्षण विधि [Teaching Methodology ]-

इस दर्शन के आधार पर कहा जा सकता है कि ये इन प्रमुख शिक्षण विधियों के समर्थक हैं। –

(1)-  करके सीखना (Learning By Doing)

(2)-  भाषा विश्लेषण विधि (Language Analytical Method)

(3)-  तार्किक विश्लेषण विधि (Logical Analytical Method)

(4)- विज्ञान प्रयोगात्मक विधि (Scientific Experimental Method)

(5)- प्रत्यक्षीकरण विधि (Observation Method )

(6)- आगमन विधि (Inductive Method )

विद्यालय (SCHOOL)-

ये विद्यालयों में प्रबन्धकों के साथ विद्यार्थियों एवम अध्यापकों को शामिल करना चाहते हैं। ये अधिगम के अनुकूल माहौल बनाने व अनुभव के आधार पर उत्तरोत्तर प्रगति के पक्षधर हैं।

शिक्षा सम्बन्धी  अन्य विचार

(a )-  व्यावसायिक शिक्षा

(b )- महिला शिक्षा

(c )- सर्व जनशिक्षा

(d )- नैतिक शिक्षा

(e )- धार्मिक विचार

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दर्शन

तार्किक प्रत्यक्षवाद (Logical Positivism) Part 1

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ज्ञान, अनुभव का अनुगमन करता है अनुभव तर्क विश्लेषण और क्रिया का परिणाम होता है अन्तिम निष्कर्ष के रूप में प्राप्त अनुभव का विश्लेषण भी तर्क के आधार पर किया जाता है इसलिए तार्किक विश्लेषण वाद (Logical Analytic-ism ),तार्किकअनुभववाद Logical Empiricism ),भाषा विश्लेषण वाद(Language Analytic-ism) की जगह तार्किक प्रत्यक्षवाद (Logical Positivism) कहना अधिक युक्ति संगत होगा।

तार्किक प्रत्यक्षवाद से आशय (Meaning Of Logical Positivism) –

जो दर्शन आलोचनात्मक तथा विश्लेषणात्मक चिन्तन पर मुख्य बल देता है कार्यों का तार्किक विश्लेषण कर कार्य कारक सम्बन्धों को तार्किक आधार देता है,तार्किक प्रत्यक्षवाद कहलाता है। 

तार्किक प्रत्यक्षवाद के विभिन्न अवयवों के विश्लेषणोपरान्त कहा  सकता है –

‘तार्किक प्रत्यक्षवाद कोई सामान्य अमूर्त सिद्धान्त नहीं है यह व्यावहारिकता व तार्किकसकारात्मकता का वह मिश्रण है जो सत्यापनशीलता का विशेष गुण तार्किक आधार पर रखता है।’

सोलह कला सम्पूर्ण श्री कृष्णजी ने अपने मुखारबिन्दु से श्रीमद्भगवद गीता के दूसरे अध्याय के ग्यारहवें श्लोक में तार्किक प्रत्यक्षवाद का उदाहरण प्रस्तुत किया है –

अशोच्यानन्व शोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।

गतासूनगतासूंश्चम नानुशोचन्ति पण्डिताः।। 

अर्थात श्री केशव ने कहा – तुम पाण्डित्यपूर्ण वचन कहते हुए उनके लिए शोक कर रहे हो जो शोक करने योग्य नहीं हैं जो विद्वान होते हैं वे न तो जीवित के लिए न ही मृत के लिए शोक करते हैं।

उक्त कथन तर्क आधारित है और अन्ततः इसकी सत्यापनशीलता सिद्ध होती है।

तार्किक प्रत्यक्षवाद को समझने के लिए इसकी मीमांसाओं का विवेचन आवश्यक है।

तार्किक प्रत्यक्षवाद और इसकी मीमांसाऐं ( Logical Positivism and Its Meemansa)-

ज्ञान के आत्मसातीकरण हेतु उसके दर्शन को जानना और दर्शन के अधिगमन हेतु उसकी तत्व मीमांसा (Meta Physics), ज्ञान व तर्क मीमांसा(Epistemology and Logic) एवं आचार व मूल्य मीमांसा (Ethics and Axiology ) को जानना आवश्यक है।

तत्व मीमांसा (Meta Physics)-

यह मानवीय इन्द्रियों को इतना महत्तव प्रदान करते हैं कि जिसका प्रत्यक्षीकरण इन इन्द्रियों द्वारा सम्भव है उसको सत्य स्वीकारते हैं आध्यात्मिक जगत, ईश्वर आदि को स्पष्ट रूप से नकारते हैं। इनके अनुसार मानव अर्जित ज्ञान व कौशल के आधार पर विकास करता हैऔर भौतिक जगत सत्य है क्योंकि इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। आध्यात्मिक जगत ,आत्मा परमात्मा को प्रत्यक्ष अनुभव से परे मान अस्वीकारते हैं।

ज्ञान व तर्क मीमांसा (Epistemology and Logic) –

ये किसी भी पूर्व ज्ञान को तब तक ज्ञान नहीं मानते जब तक अनुभव व तर्क द्वारा वह सत्य स्थापित न हो जाए। तार्किक प्रत्यक्ष वादी प्रत्येक ज्ञान को तार्किक रूप से तभी अधिगमन योग्य स्वीकारते हैं जब यह व्यावहारिकता सत्यापनीयता, इन्द्रियों द्वारा अनुभूति सत्यापनीयता व प्रत्यक्ष सत्यापनीयता की कसौटी पर खरा उतर सके।

आचार व मूल्य मीमांसा (Ethics and Axiology) –

ये आचरण हेतु सहयोग, सहिष्णुता, शान्ति, स्वतन्त्रता, सृजनात्मकता व शोषण हीनता को स्वीकार करते हैं। इनके अनुसार कोई भी मूल्य तब तक सारहीन हैं जब तक वह मानव मात्र का कल्याण नहीं करता। उपयोगी मूल्य ही मानव के आचरण में ग्रहणीय होना चाहिए। बर्ट्रेण्ड रसेल, ए ० जे ० मेयर और कार्नप के विचार इस सन्दर्भ में महत्त्व पूर्ण है।

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