शिक्षा
की त्रिमुखी प्रक्रिया का और अध्यापक व विद्यार्थी के बीच सम्वाद का प्रमुख साधन
पाठ्यक्रम ही है। यह इतना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि इसके बिना शैक्षिक प्रगति और उसकी
क्रमबद्धता की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। सम्यक पाठ्यक्रम मानव जाति की
प्रगतिशीलता का आधार है इसलिए पाठ्यक्रम का कुछ मानदण्डों पर खरा उतरना परमावश्यक
है।
पाठ्यक्रम
मूल्याँकन के मानदण्ड (CRITERIA OF CURRICULUM
EVALUATION) –
चूँकि
पाठ्यक्रम विद्यार्थी के अधिगम का आधार होने के साथ उसके व्यवहार परिवर्तन का भी
प्रमुख आलम्ब है अतः यह परम आवश्यक है की उसे निम्न मानदण्डों को अवश्यमेव अपने
में समाहित करना चाहिए। पाठ्यक्रम मानदंडों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।
1 – विश्वसनीयता (Reliability)
2 – वैधता (Validity)
3 – क्रमबद्ध सम्बद्धता (Serial affiliation)
4 – सामन्जस्यता (Harmony)
5 – व्यावहारिकता (Practicality)
6 – लोचशीलता (Elasticity)
पाठ्यक्रम
मूल्याँकन की प्रक्रिया (PROCESS OF CURRICULUM EVALUATION) –
पाठ्यक्रम
का निर्माण शिक्षा के उद्देश्यों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि इससे अधिगम की
सुगमता व व्यवहार में परिवर्तन के गुण की भी अपेक्षा की जाती है ऐसी स्थिति में
जाहिर सी बात है कि पाठ्यक्रम के मूल्यांकन की प्रक्रिया शिक्षा व मानव व्यवहार के
व्यापक परिदृश्य से सम्बन्ध रखती है। पाठ्यक्रम के मूल्यांकन के माध्यम से ही यह
ज्ञात होता है कि कोई अपने निर्माण का उद्देश्य कहाँ तक पूर्ण करने में सक्षम है।
अतः पाठ्यक्रम मूल्यांकन की प्रक्रिया निम्न सोपानों से होकर गुजरती है।
1 – शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति
2 – शैक्षिक स्तर से समन्वयन
3 – प्राप्त अधिगम अनुभव का विवेचन
4 – व्यावहारिक सक्रियता में परिवर्तन
5 – विद्यार्थियों हेतु सार्थकता
6 – अधिगम स्थानान्तरण से अनुकूलता
7 – व्यावहारिक जीवन में उपादेयता
8 – ज्ञानात्मक व भावात्मक पक्ष की प्रबलता
वस्तुतः पाठ्य क्रम मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया
है जो एक चक्र पाठ्यक्रम नियोजन -पाठ्यक्रम प्रस्तुतीकरण -विकास प्रक्रिया
-मूल्यांकन तक पहुँचती है तत्पश्चात पुनः शुरू हो जाता है पुनः पाठ्यक्रम नियोजन -पुनः पाठ्यक्रम
प्रस्तुतीकरण -पुनः विकास प्रक्रिया -पुनः मूल्यांकन।
क्योंकि
मानव की प्रगति काल के सापेक्ष होती है अतः एक बार का मूल्यांकन हर काल का
प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।
आज जहाँ कुछ बच्चे जान बूझ कर पढ़ने से जी चुराते हैं वहीं कुछ बच्चे
ऐसे भी हैं जो सचमुच पढ़ना चाहते हैं और परिस्थितियाँ विपरीत हैं। कुछ बच्चे
परिवर्तित स्थिति से साम्य बनाकर अपने अभीप्सित प्राप्त करना चाहते हैं।चाहे कारण
कोई रहा हो कुछ बच्चों का समय रेत की तरह
हाथ से फिसल गया है और मात्र एक माह शेष
है और उनकी बलवती इच्छा।
सबसे पहले इन सभी की सकारात्मक ऊर्जाओं का वन्दन ,उक्त सारी परिस्थितियाँ अपने विद्यार्थियों, चाहे वो कहीं भी हैं से मुझे मिली हैं उन सभी
विद्यार्थियों में से चुने हुए 10 प्रश्न
और क्षमता भर उनके उत्तर देने का प्रयास करता हूँ आशा है सभी को जवाब मिल जाएगा।
सामान परिस्थिति वाले देश के अन्य अधिगमार्थियों को भी लाभ मिलेगा। वादे के अनुसार
किसी भी नाम का उच्चारण नहीं करूंगा ?
प्रश्न – मेरे परिवार का गुजारा एक दूकान से चलता है पिताजी की
अस्वस्थता के कारण मैं दूकान पर बैठता हूँ प्रातः 10 बजे सुबह से रात्रि 8
बजे तक का समय दूकान के कार्यों में लग जाता है। परीक्षा की तैयारी कैसे हो ?
उत्तर – ये सही है कि बारह घण्टे कार्य के बाद थकान होती है आप दूकान
से आकर अपने आप को तारो ताजा करें स्नान अनुकूल लगे तो किया जा सकता है खाइये
पीजिए थोड़ा बहुत समय अपने मनोरञ्जन को दीजिये और सो जाइए कम से कम 6 घण्टे की नींद भी लीजिए तनाव रहित रहिए सब आराम
से प्रबंधन हो जाएगा 10 बजे रात्रि से सुबह 4 बजे तक की आराम दायक नींद लीजिये उठिए प्रभु का
कृतज्ञता ज्ञापन कीजिये दैनिक कार्यों यथा शौच, दन्त
धावन, शेविंग,स्नान
आदि से निवृत्त होकर सुबह 5
बजे से 10 बजे
तक में से केवल 3 घण्टे अध्ययन को प्रति दिन दीजिए और इसमें चुने
हुए कम से कम 4 प्रश्न याद कीजिए। विश्वास रखिये इन प्रश्नों की संख्या कब बढ़ गयी
आपको पता ही नहीं चलेगा। 10
दिनों में आपका आत्म विश्वास लौट आएगा।
सप्ताहान्त का समुचित प्रयोग करें। आप निश्चित सफल होंगे।
प्रश्न – मेरे पति सहयोगी प्रवृत्ति के हैं मेरा बच्चा छोटा है मेरे
से चिपका रहता है कब और कैसे पढ़ूँ ?
उत्तर – ऐसी स्थिति में आपको समय प्रबन्धन की आवश्यकता है जल्दी सोना
और जल्दी उठना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है यह
सोचकर आप दोनों समय का ऐसा विभाजन करें कि आप दोनों बच्चे की देखभाल के साथ पूरी
नींद ले सकें। पूरी नींद लेने से अधिगम सशक्त होता है यदि आप रात्रि 8 बजे से दो बजे तक सोने का क्रम रखें ,हॉस्टल वाले बच्चों की तरह तो सुबह 2 बजे से पाँच, छः बजे तक अच्छी पढ़ाई हो सकती है बशर्ते की आप यह दिन में नोट कर लें
कि रात्रि में क्या क्या याद करना है। सुबह उठने पर आप 30 मिनट प्राणायाम हेतु निकाल कर अपनेआप को
रीचार्ज कर सकती हैं। पाँच छः दिन में
स्थिति अनुकूल हो जाएगी स्वास्थय का पूरा ध्यान रखना है।
प्रश्न – मैं एम० एड ० प्रथम वर्ष का छात्र हूँ आठ घण्टे की प्राइवेट फर्म में सेवा व दो घण्टे
आने जाने के व्यय करके जीवनयापन कर रहा हूँ मेरा अवकाश सोमवार को पड़ता है इसलिए
केवल सोमवार को व कभी छुट्टी लेकर महाविद्यालय जा पाता हूँ।कब व कैसे तैयारी करूँ ?
उत्तर – जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते
हैं। … ये पंक्तियाँ आपको दिशा देंगीं। आप दो दो हफ़्तों में पूरे होने वाले लेक्चर्स
यू ट्यूब – Education
Aacharya पर
देख सुन सकते हैं और वो भी एक घण्टे से भी कम समय में,यानी जब आप बस यात्रा कर रहे होते हैं। यदि
लिखा हुआ मैटर चाहिए तो educationaacharya.com
से ले सकते हैं। शेष आप जो भी समय निकाल सकते
हैं उसे 40 मिनट के कालांश में तोड़ लें व सलेक्टेड स्टडी
करें। कुछ भी असम्भव नहीं है।
प्रश्न – मेरा प्रायोगिक कार्य पूर्ण है लघु शोध भी हो चुका है लेकिन
अब परीक्षा में लगभग एक माह शेष है प्रश्नों की तैयारी एम० एड ० परीक्षा हेतु कैसे
करूँ ?
उत्तर – घबराने की बिल्कुल
आवश्यकता नहीं है इतना प्रायोगिक कार्य पूर्ण होने पर अब समस्त ध्यान पढ़ने पर ही
लगाने की आवश्यकता है ,आप यूनिट के हिसाब से 10 -10 उद्धरण (Quotation) लिख लिखकर याद करें। प्रश्न
के शीर्षक उपशीर्षक बार बार लिखकर याद करें। अलग अलग तरह के प्रश्नों में
अपने याद किये उद्धरण प्रयुक्त करने की कला
सीखें। निश्चित रूप से आप अच्छा कर पाएंगे। स्वयं योजना बनाकर विगत वर्षों के
प्रश्नपत्रों के आधार पर अपने उत्तरों को व्यवस्थित करें।अवश्यमेव कल्याण होगा।
प्रश्न – मैं बी० एड ० द्वित्तीय वर्ष की विद्यार्थी हूँ मेरा लेख
बहुत खराब है ब्लैक बोर्ड स्किल से डर लगता है वैसे मैं याद सब कर लेती हूँ सुना
भी सकती हूँ पर लेख कैसे सुधारूँ ?
उत्तर – महाकवि वृन्द ने कहा –
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान
रसरी आवत जात तें, सिल
पर परत निशान।
इसी में आपके प्रश्नका उत्तर छिपा है आपको निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता है यह ध्यान
रखना है अक्षर सीधे लिखे जाएँ अक्षर और अक्षर के बीच की दूरी व शब्द और शब्द की
दूरी बराबर रखी जाए। पंक्तियाँ एक दूसरे के समानान्तर रहें। शीघ्र ही वाँछित लाभ
मिलेगा। अभ्यास में निरंतरता रखें।
प्रश्न – मैं सॉफ्ट बॉल और मेरी बहिन कबड्डी की खिलाड़ी हैं अभी हम
दोनों अन्तर्विश्वविद्यालयी प्रतियोगिता से लौटे हैं क्रीड़ा की तैयारी में पढ़ाई
कहीं पीछे छूट गई अब 30 –
35 दिनों में
परीक्षा की तैयारी कैसे करें ?
उत्तर – आपसे बस यह कहना है –
करे कोशिश अगर
इंसान तो क्या क्या नहीं मिलता
वो सिर उठा कर तो
देखे, जिसे रास्ता नहीं मिलता,
भले ही धूप हो काँटे
हों राहों में मगर चलना तो पड़ता है,
क्योंकि किसी प्यासे
को घर बैठे कभी दरिया नहीं मिलता।
स्वस्थ शरीर में
स्वस्थ मष्तिष्क निवास करता है उचित रणनीति, सही
समय विभाजन, लिख लिखकर अभ्यास, विगत वर्षों के प्रश्न पत्र सभी आपकी मदद को
तैयार बैठे हैं। विश्वास रखें और एक भी दिन खराब न जाने दें ,गुरुओं से निर्देशन लें। पूर्ण विश्वास है मैदान की तरह परीक्षा में में भी आपका प्रदर्शन
लाजवाब रहेगा।
प्रश्न – मैं MSW का
छात्र हूँ मेरी समस्या यह है कि मैं याद
किया हुआ परीक्षा कक्ष में भूल जाता हूँ, क्या
करूँ ?
उत्तर – कई विद्यार्थी इस
समस्या से ग्रस्त हैं सबसे पहले अपने खान पान की आदत में सुधार करना है अधिक
गरिष्ठ भोजन से बचना है और तजा सुपाच्य भोजन करना है जब कुण्डलिनी की सारी शक्ति
भोजन पचाने में लगी रहती है तब भी ऐसा देखने को मिलता है। दूसरे आत्मविश्वास
विकसित करना है प्रश्नो को निश्चित समय
में खुद लिखकर अभ्यास करना है। पर्याप्त पानी का सेवन करना है। प्राणायाम, व्यायाम, ध्यान
को दिनचर्या का हिस्सा बनाना है। निश्चित रूप से आशातीत सफलता मिलेगी।
प्रश्न – मैंने PCM ग्रुप से B.Sc. की है बी० एड ० के बाद ईश्वर कृपा से नौकरी भी मिल गई है हाई स्कूल
को पढ़ाता हूँ अब की M.A राजनीति शास्त्र का प्राइवेट फार्म भरा है,इसमें तो फार्मूले भी नहीं होते,
इतना
सारा कैसे लिखा जाएगा ?
उत्तर – आप अध्यापक हैं कई विद्यार्थियों के प्रेरणा स्रोत,निश्चित रूप से आपने कहावत सुनी होगी –
जहाँ चाह वहाँ राह
आप यकीन मानिए विचार संसार की सबसे ताकतवर शक्ति है और जब आप दृढ़
इच्छा शक्ति से इस दिशा में कार्य करेंगे तो कई पथ प्रकाशित होते चले जाएंगे रही
बात फार्मूले की तो वो आप यहां भी बना सकते हैं प्रत्येक शीर्षक का पहले अक्षर को
लेकर मिला लीजिये फार्मूला तैयार है। मानलीजिए आपको अपने प्रश्न के उत्तर में 10
उप शीर्षक देने हैं तो आप हेड्स याद करने के साथ 10 अक्षर का फार्मूला बना लीजिये
वह दसों शीर्षक क्रम से याद आते जाएंगे।
यहाँ मैंने अपनी क्षमता भर आपके प्रश्नों का समाधान देने का प्रयास
किया है लेकिन याद रखें एक ही समस्या के कई समाधान होते हैं इसलिए हिम्मत न हारते
हुए हम सबको तब तक प्रयास करना चाहिए जब तक समस्या समाधान न हो जाए अन्त में आपसे
यही कहूँगा –
अस्तित्व वाद एक ऐसा चिन्तन है जिसे दायरे में कैद करना बहुत मुश्किल
है विश्लेषक कई बार इस भ्रम का शिकार हो जाते हैं कि क्या इसे दार्शनिक चिन्तन के
परिक्षेत्र में स्वीकारा जाए। वस्तुतः यह एक सङ्कट का दर्शन है मानव आज स्वयं से
भी अजनबी होता जा रहा है। यह विविध चिन्तनों के विरोध स्वरुप उत्पन्न हुआ है। और
मानव मात्र के अस्तित्व से जुड़ा है, इसीलिए इस वाद के चिन्तन की धुरी मानव व उसका
अस्तित्व ही है। अस्तित्ववाद सङ्कट (Crises) का वह दर्शन है जो बीसवीं शताब्दी की देन है और
व्यक्ति के मौलिक व्यक्तिगत अस्तित्व पर बल देता है।
सोरेन किर्कगार्द, मार्टिन
हीडेगर,जीन पॉल सात्रे वे प्रसिद्ध नाम हैं जो
अस्तित्ववाद के पोषकों में सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।
सोरेन किर्कगार्द(Soren Kierkegaard) चाहते थे कि व्यक्ति को चयन की पूर्ण स्वतन्त्रता मिले और जो वह
बनाना चाहता है उसके लिए वह स्वतंत्र हो।
मार्टिन हीडेगर(Martin Heidegger) मानते थे कि मनुष्य का अस्तित्व नश्वर है सीमित है मृत्यु सभी
सम्भावनाओं का अन्त कर देती है और सभी मनुष्यों की मृत्यु निश्चित है।
जीन पॉल सात्रे Jean Paul Satre (1905 -82) ने अपने दर्शन को अस्तित्ववादी स्वीकारा है वह
इस दर्शन को किसी का पिछलग्गू नहीं मानता। वे स्वीकार करते हैं कि मनुष्य का अस्तित्व किसी पूर्वसत्ता और
सिद्धान्त पर निर्भर नहीं करता बल्कि वे कहते हैं
‘मैं
हूँ इस लिए मेरा अस्तित्व है।’
DEFINITIONS OF
EXISTENTIALISM
अस्तित्व वाद की परिभाषाएं –
अस्तित्ववाद वह दर्शन है जिसमें मानव की स्वतन्त्रता के सच्चे दर्शन
होते हैं इसे हम एक अभिमत के रूप में स्वीकार कर सकते हैं इसे मानव जीवनके प्रति
एक दृष्टिकोण कहना भी तर्क संगत होगा आर०एन० बेक महोदय कहते हैं –
“The term
(Existentialism) refers to a type of thinking that Emphasizes human existence
and the qualities peculiar to it rather than to nature or Physical world.”
“अस्तित्ववाद एक प्रकार के चिन्तन की और संकेत
करता है जो प्रकृति अथवा भौतिक संसार की अपेक्षा मनुष्य के अस्तित्व और उसके गुणों
पर बल देता है।”
एक अन्य प्रसिद्ध विचारक एच० एच० टाइटस महोदय कहते हैं –
“Existentialism is an attitude and outlook that
Emphasizes human existence that is distinctive qualities of individual persons
rather than man in the abstractor nature and the world in general.”
“अस्तित्ववाद सामान्य रूप में विश्व और प्रकृति
अथवा सामान्य मानव की अपेक्षा ‘व्यक्ति‘ के रूप में मनुष्य के विशिष्ट गुणों पर जोर
देता है।”
अस्तित्ववाद के सम्बन्ध में प्रो ० रमन बिहारी लाल का कहना है
–
“अस्तित्ववाद एक ऐसा बन्धनमुक्त चिन्तन है जो
नियतिवाद एवं पूर्व निश्चित दार्शनिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक सिद्धान्तों एवं नियमों में विश्वास नहीं करता
और यह प्रतिपादन करता है कि मनुष्य का स्वयं में अस्तित्व है और जो वह बनाना चाहता
है उसका चयन करने के लिए स्वतंत्र है। इसके अनुसार मनुष्य वह है जो वह बन सका है
अथवा बन सकता है और उसका यह बनना उसके स्वयं के प्रयासों पर निर्भर करता है। ”
अस्तित्व वाद की विभिन्न मीमांसाएँ –
किसी दर्शन किसी को समझना उसकी मीमांसाओं को जानने से सरल हो जाता है
आइये सबसे पहले जानते हैं –
अस्तित्ववाद की तत्व मीमांसा (Metaphysics of Existentialism) –
सात्रे चेतना और पदार्थ दोनों की सत्ता के स्वतन्त्र अस्तित्व को
स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि वास्तु का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है ,मानव की चेतना में आने से पहले भी वस्तु
अस्तित्व में थी, है और रहेगी। ये मानव के अस्तित्व को व्यक्तिगत मानते थे और विश्वास
करते थे कि यह उसके साथ ही समाप्त हो जाने वाला है इनके अनुसार मनुष्य जन्म के साथ
अस्तित्व में आता है और मृत्यु के साथ अस्तित्व विहीन हो जाता है। हीदेगर के
अनुसार हताशा,चिन्ता तथा इसके द्वारा होने वाला दुःख स्वयं
प्रमाणित है इनका अनुभव प्रत्येक मानव करता है।
अस्तित्ववाद की ज्ञान व तर्क मीमांसा (Epistemology of Existentialism)
–
इन विचारकों का मानना था कि मनुष्य जीवन पर्यन्त जो अनुभव विभिन्न
माध्यमों से करता है और इस माध्यम से अपनी चेतना और भावनाओं को जिस प्रकार युक्त
करता है वही ज्ञान है इस ज्ञान को वह स्वतंत्र तरीकों से विभिन्न विधियों द्वारा
प्राप्त करता है। लेकिन यह सत्य तभी स्वीकारा जाएगा जब सत्यापित हो जाएगा। ये
अनुभव जनित ज्ञान के ठीक विपरीत विचार को लेकर तर्क द्वारा ज्ञान की सत्यता को
प्रमाणित करना आवश्यक मानते हैं।
अस्तित्ववाद की मूल्य व आचार मीमांसा (Values and Ethics of
Existentialism)-
ये मानव हेतु किसी पूर्व स्वीकृत मूल्य या आचार संहिता को स्वीकार
नहीं करते,इनका तो मूल मन्त्र ही यह है की वह अपने अनुसार
चयन के लिए स्वतन्त्र है ये स्वतन्त्रता और उत्तरदायित्व को ही मानव जीवन के आधार
भूत मूल्य मानते हैं। सात्रे कहता है कि संसार बहुत कठोर है
और इस कठोरता व दुरूहता का सामना कोई तभी कर
सकता है यदि वह साहसी हो। अधिकाँश अस्तित्ववादी विचारक मृत्यु को सबसे बड़ा सत्य
मानते हैं और स्वीकारते हैं कि मृत्यु का ज्ञान ही मनुष्य को सही मार्ग पर लाता
है।
अस्तित्व वाद के मूल तत्व और सिद्धान्त
Fundamental Elements and Principles of Existentialism-
01 – केन्द्र
बिन्दु मानव मात्र
02 – केवल
भौतिक जगत सत्य
03 – नियामक
सत्ता के बिना ब्रह्माण्ड का अस्तित्व
04 – निराशा
व दुःख विशद तत्व
05 – जीवन
अन्तिम उद्देश्य विहीन
06 – मानव
की स्वतन्त्र सत्ता
07 – चयन
की स्वतन्त्रता
08 – विकास
की निर्भरता स्वयं पर
अस्तित्ववाद और शिक्षा
Existentialism and Education
अस्तित्ववाद
और शिक्षा
Existentialism
and Education
शिक्षा
एक सामाजिक प्रक्रिया है और इनका समूचा ध्यान वैयक्तिकता पर है यह दर्शन एक
स्वतन्त्र दृष्टिकोण तो रखता है लेकिन कहीं कहीं अन्य दर्शनों को छूटा सा दीखता है
वैयक्तिकता के क्षेत्र में यह आदर्शवादियों की तरह वैयक्तिकता के महत्त्व को
स्वीकारता है आत्मविकास और आत्म अनुभव के विचार भी आदर्शवादियों से साम्य रखते हैं
लेकिन फिर भी यह कई विचारों में इतना अलग है कि पलायन वाद की कोइ गुंजाइश नहीं
छोड़ता ये कहते हैं –
“शिक्षा मनुष्य को उसके अस्तित्व और
उत्तरदायित्व का बोध कराने की प्रक्रिया होनी चाहिए।”
मानव
को अस्तित्वहीनता के दौर से हटाकर उसकी पुनः प्रतिष्ठा के क्रम में शिक्षा को
उपयोगी साधन स्वीकार किया है। अस्तित्ववादी दृष्टिकोण से शिक्षा के उद्देश्यों व
अंगों पर जो प्रभाव परिलक्षित हुए हैं उन्हें इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता
है।
शिक्षा
के उद्देश्य (Aims of Education ) –
1 – उत्तरदायित्व की क्षमता का विकास (To Development of Responsibility)
2 – अपने भाग्य का निर्माता स्वयं (The maker of own destiny)
3 – सृजनात्मकता का विकास (Development of creativity)
4 – शक्तिशाली व साहसी बनाना
(Make strong and courageous)
5 – श्रेष्ठ मानव प्रजाति का विकास
(Evolution of the best human species)
पाठ्य क्रम (Curriculum)
–
इनके अनुसार व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के कारण विविध
विषयों को स्थान मिलना चाहिए। सौन्दर्यात्मकता और भावनाओं का महत्त्व अस्तित्ववादी
महसूस करते हैं यही तो उन्हें अन्य प्राणियों से अलग करते हैं इस लिए कला,साहित्य,संगीत विषयों को स्थान मिलना चाहिए। किर्क
गार्द मानव को नैतिक प्राणी मानते हैं इसलिए नीति शास्त्र की उपादेयता है।
अस्तित्व रक्षार्थ व्यावसायिक विषयों को पाठ्य क्रम में स्थान आवश्यक है। धार्मिक
विषयों के स्थान पर ये क्रियात्मक व वैज्ञानिक विषयों को संकट निवारणार्थ रखना
चाहते हैं अर्थात भौतिक विज्ञान,रसायन विज्ञान,जीव विज्ञान ,कृषि विज्ञान,चिकित्सा शास्त्र,व तकनीकी विषयों पर बल देना चाहते हैं।
शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods) –
यह समूह शिक्षण के पक्षधर नहीं हैं इसलिए निर्धारित पूर्व नियोजित
शिक्षण विधियों कीजगह स्वाध्याय, चिन्तन, मनन,व
अनुभव द्वारा सीखने की महत्ता प्रतिपादित करते हैं व तार्किक विधि का समर्थन करते
हैं।ये विविध मंतव्यों हेतु विविध विधियों के समर्थक हैं।
शिक्षक (Teacher) –
इनका विचार है की अध्यापक अपने निर्णय बालकों पर न थोपें बल्कि
उन्हें इस योग्य बनाएं कि वे अपने लिए उचित निर्णय ले सकें, विभिन्न परिस्थितियों से लड़ने हेतु उसे समर्थ
बनाते हुए यह बोध भी कराना है कि वह अकेला है आत्मबोध से युक्त कर कर्मपथ पर बढ़ने
का कौशल विकसित किया जाना है। इस प्रकार अध्यापक की भूमिका दुरूह है।
विद्यार्थी (Student) –
विद्यार्थी चयन हेतु स्वतन्त्र है और इस चयन व स्वतन्त्रता की रक्षा
अध्यापक द्वारा की जानी चाहिए ये बालक की पूर्ण स्वतन्त्रता के समर्थक हैं और उसके सम्मान का कार्य शिक्षा
द्वारा सम्पादित होना चाहिए।
विद्यालय (School) –
जिस तरह ये विद्यार्थी की स्वतन्त्रता के पक्षधर हैं ठीक उसी तरह ये
विद्यालयों को नियन्त्रण मुक्त रखना चाहते हैं
सामूहिक शिक्षा के स्थान पर व्यक्तिगत शिक्षा के पक्षधर हैं। ये मानते हैं
की कुछ सिखाने या बालकों की स्वतन्त्रता छीनने के प्रयास न हों वे अपने आप ही
सीखेंगे। कुछ चुने हुए लोगों का बौद्धिक
विकास कर उन्हें उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए।
अनुशासन (Discipline) –
ये मानते हैं की मनुष्य स्वभाव से ही अनुशासन प्रिय है और यदि उससे
चयन में गलती हो जाती है तो इसका दुःख वह स्वयं भोगेगा सुधार कर लेगा। ये किसी भी आचार संहिता के
विरोधी थे। इस विचार धारा के अनुसार बालकों द्वारा उत्तरदायित्व पूर्ण व्यवहार
सच्चा अनुशासन है।
मूल्याङ्कन (Evaluation)
–
अस्तित्ववाद पूर्व निश्चित ,मान्यताओं,धारणाओं,मूल्यों,धार्मिक नैतिक अवधारणाओं से छिटक खड़ा हो गया है। संकट ग्रस्त हेतु इसने आकर्षक
छवि बनाने का प्रयास अवश्य किया पर कोइ भी भारतीय विचारक इसे न तो शैक्षिक चिंतन
में स्थान दे पायेगा दार्शनिक चिन्तन में।
ये मानव हेतु कोइ ऐसा आलम्ब न दे सका जो उज्जवल भविष्य हेतु बोधक हो। शिक्षा के हर अंग पर इस वाद का प्रभाव
कोई निशाँ न छोड़ सका। इन्हें सब कुछ मानव विरोधी लगता है।यही कह सकते हैं कि इनके
इरादे बुरे नहीं थे बस सही रास्ता नहीं बना सके।
आज जो परिचर्चा आपके समक्ष प्रस्तुत है उसका मूल उद्देश्य
विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में अच्छे अंकों की प्राप्ति से है। ध्यान रहे यह
परिचर्चा स्नातक, परास्नातक और प्रशिक्षण कार्यक्रम को ध्यान में
रखकर की जा रही है। कोरोना काल में प्रश्नों की संख्याऔर समय में जो कमी की गयी थी
वह सामान्य स्थिति में पुनः पहले जैसी रहेगी अर्थात वही तीन घण्टे वाला
प्रश्नपत्र। यहाँ पूछे गए प्रश्नों के आधार पर प्रभावी उत्तर लेखन (प्रस्तुतीकरण)
सम्बन्धी मत दिए जा रहे हैं जिससे निश्चित रूप से अच्छे अंक प्राप्त होंगे।
A -दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [Long Answer Type Question]
B – लघु उत्तरीय प्रश्न [Short Answer Type Question]
C – शब्द संख्या वाले प्रश्न [word count question]
D – अति लघु उत्तरीय प्रश्न [Very Short Answer Type Question]
A –दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [Long Answer Type Question] –
1 – प्रश्न
सावधानी से पढ़ें और केवल पूछी गई बात का ही उत्तर दें अनावश्यक नहीं।
2 – प्रश्न
में ध्यान से देखें क्या अंक विभाजन दिया गया है ?यदि हाँ ,तो उत्तर उसी आधार पर लिखा जाना चाहिए। यदि 16 अंक के प्रश्न में 4 +6 +6 लिखा है तो उत्तर में इस अनुपात का ध्यान रखकर प्रभावोत्पादकता सृजित
करनी है।
3 – बड़ा
बड़ा लिखकर पृष्ठ भरने का अनर्गल प्रयास कदापि न करें। सम्यक लिखें।
4 – परीक्षक
को धोखा देने का कोई प्रयास न करें अपने ऊपर और अपने लेखन कौशल पर नियन्त्रण रखें।
रटे हुए शीर्षक की जगह प्रश्न में पूछे गए तथ्यों को शीर्षक के रूप में प्रयोग
करें।
5 – अपनी
बात के समर्थन में विद्वानों के उद्धरण ( Quotes ) या तथ्यात्मक तर्क(Logic) दें। इन्हें अलग रंग की स्याही से लिख सकते हैं
(वर्जित रंग को छोड़कर), रेखांकित(Under Line ) भी किया जा सकता है।
6 – स्वयम् बनाकर उद्धरण (Quotation)
न लिखें यह विद्वान् परीक्षकों द्वारा सहज ही
पकड़ लिए जाएंगे और आपके सम्पूर्ण मूल्यांकन पर विपरीत प्रभाव डालेंगे।
7 – उद्धरण को इस तरह लिखें कि वह स्पष्ट नज़र आये
यद्यपि आज डॉट पेन या बाल पेन से लिखने का चलन है लेकिन यदि आप इंक पेन या निब
वाले पेन से लिखने के अभ्यस्त हैं तो इससे लिखें यदि प्रतिबन्ध नहीं है।
8 – कोई ऐसा अवसर नहीं छोड़ना है जिससे प्रभाव पैदा
किया जा सके।
9 – वास्तव में आपके नोट्स ही वह अवलम्ब हैं जो
आपको संतुलन या सकारात्मकता प्रदान करते हैं।
10 – योजना, प्रदर्शन, परिमार्जन का चक्र आपके प्रश्नोत्तर लिखने के
कौशल में निरन्तर सुधार करेगा।
B – लघु उत्तरीय प्रश्न [Short
Answer Type Question] –
1 – लघु उत्तरीय प्रश्न हल करने में ध्यान रखना है
कि अति अल्प में प्रभाव पैदा करना है।
2 – केवल उतना ही लिखें जो प्रश्न की मांग हो।
3 – उत्तर बिन्दुवार लिखने का प्रयास करें।
4 – यदि प्रश्न में चार कारण या पाँच उपाय जो व
जितना पुछा है उतना ही लिखें।
5 – समय के साथ यथायोग्य साम्य रखें।
6 – गागर में सागर भरने का प्रयास करें लेकिन जितने
अंक का प्रश्न है उसी के अनुसार लिखना है।
C – शब्द संख्या वाले प्रश्न [word
count question]-
कभी कभी प्रश्न अपने उत्तर हेतु शब्द संख्या का निर्देश साथ लेकर आता
है और इसी से उसके आकार का पता चलता है पुछा जा सकता है कि 2000 शब्दों में उत्तर दें या 100 शब्दों में लिखें।
उक्त स्थिति में आपके द्वारा लिखे एक पंक्ति के शब्दों को गईं लीजिये
और उसके आधार पर तय कीजिये की उत्तर कितने स्थान में देना है।
उदाहरण स्वरुप यदि मैं एक पंक्ति में औसतन 10 शब्द लिखता हूँ तो 100 शब्दों हेतु 10 पंक्तियाँ पर्याप्त हैं इससे थोड़ा बहुत ज्यादा
हो सकता है पर कई पृष्ठ लिखना असंगत होगा।
पूरे उत्तर के शब्द गिनने
में समय बरबाद न करें पहले ही अन्दाज विकसित करें घर पर लिखकर भी ठीक विचार कर
सकते हैं। प्रश्न पात्र बांटने से पहले पृष्ठ की पंक्तियाँ गिन सकते हैं।
शब्द सीमा देने का सीधा आशय यह होता है कि प्रश्न के अनुसार उत्तर की
चाह स्पष्ट की गयी है।
D – अति लघु उत्तरीय प्रश्न [Very
Short Answer Type Question]-
कतिपय विश्व विद्यालय सभी तरह के प्रश्न ,प्रश्नपत्र में शामिल करते हैं जिससे अधिक से
अधिक पाठ्य क्रम का प्रतिनिधित्व प्रश्न पात्र कर सके। इसमें अति लघु उत्तरीय
प्रश्न विशिष्ट भूमिका का निर्वहन करते हैं। यह संक्षेप में उत्तर की माँग,
एक शब्द में उत्तर की माँग या बहु विकल्पीय
प्रकार के हो सकते हैं।
इनका उत्तर लिखने में स्पष्टता एक विशेष गुण है जिस खण्ड या भाग का
यह प्रतिनिधित्व करते हैं वह लिखें ,और प्रश्नपत्र में इनके लिए निर्धारित प्रश्न
नम्बर का उल्लेख करें व प्रश्न की प्रकृति के अनुसार उत्तर लिखें।
अन्त में यह अवश्य कहूँगा की प्रश्न पात्र प्रारम्भ होने से ठीक पहले
ित्तरों को लेकर कोइ बहस न करें शांत चित्त से आत्म विश्वास से युक्त होकर परीक्षा
कक्ष में जाए प्रसन्न रहें और प्रसन्न रहने दें अनायास किसी से न उलझें क्षमा करें, क्योंकि समय केवल आपका जाया होगा।
परीक्षा हेतु समस्त राष्ट्रीय ऊर्जाओं को हार्दिक शुभ कामना।
मूल्य शब्द अंग्रेजी के value शब्द का समानार्थी है
यह लैटिन भाषा के Valare शब्द से बना है और इसका अर्थ है योग्यता या
महत्त्व। इसे संस्कृत में इष्ट कहा जाता है इष्ट का अर्थ है “वह जो इच्छित
है।” वास्तव में मूल्य वह
मानदण्ड हैं जिसके द्वारा लक्ष्यों का चुनाव किया जाता है मूल्य एक व्यवस्था है
मूल्य यथार्थ तथा आदर्श के विभेद के मध्य संयोजक की भूमिका का निर्वहन करते हैं
मूल्यों का बोध विवेक शक्ति उत्पन्न होने पर ही सम्भव होता है। मूल्य चाहे
व्यावहारिक हों या आदर्शवादी, पारमार्थिक हों या
नैतिक। यह सभी मानव को नैतिक जीवन जीने में सहायक होते हैं।
मूल्य सम्बन्धी भारतीय
दृष्टिकोण –
भारतीय मनीषियों ने मानवीय मूल्यों की विवेचना के कल्याण की कामना करते हुए की है हमारा आदर्श
है गरुण पुराण के यह शब्द –
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥
भारतीय मनीषियों ने मूल्य के लिए पुरुषार्थ शब्द का
प्रयोग किया है इनके आधार पर मूल्य इस प्रकार हैं –
अर्थात्:— धर्म के ये दस लक्षण होते हैं:- धृति
(धैर्य), क्षमा, दम (मन को अधर्म से
हटा कर धर्म में लगाना) अस्तेय (चोरी न करना), शौच (सफाई), इन्द्रियनिग्रह, धी (बुद्धि), विद्या, सत्य, अक्रोध (क्रोध न
करना)।
इन दस गुणों से युक्त व्यक्ति धार्मिक है शिक्षोपरान्त
आचार्य शिष्य को उपदेश देता था –
सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः
अर्थात सामाजिक गृहस्थ जीवन में सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में आलस्य
मत करो।और इस प्रकार मूल्यों को दिशा दी गयी है।
यद्यपि चार्वाक दर्शन सुखवादी है। वह साधन और साध्य में
अन्तर नहीं मानता। वह साध्य को सदैव सुख मानता है चार्वाक अर्थ और काम दो ही मूल्य
मानता है। खाओ पीओ और मौज करो यही उसके मूल्य हैं जब कि अन्य दार्शनिक काम को
निम्न कोटि का मूल्य मानते हैं।
पाश्चात्य दृष्टिकोण –
प्लेटो के अनुसार
1 – मूल्य बुद्धि ग्राह्य है न कि इन्द्रिय
ग्राह्य पदार्थ
2 – मूल्य और सात का मौलिक अभेद है
3 – मूल्य निरपेक्ष, नित्य स्वरुप सत विषय
है
4 – ज्ञान का परायण क्षेय और क्षय में श्रेष्ठता
का सम्पर्क अथवा प्रमाण
5 – भौतिक और सामाजिक स्तर पर वस्तु का द्योतक
वस्तु की नियत रूपता एवम् उसके घटकों का परस्पर अवरोध मूल्य है।
ह्यूम और सिजविक ने “मनुष्य के नैतिक जीवन को
द्वन्दात्मक प्रवृत्तियों का विकास निरूपित कर स्वार्थ और परमार्थ के सहज बोध को
मूल्य की संज्ञा दी है।”
अर्बन के अनुसार – “मूल्य वह है जो मानव इच्छाओं की
तुष्टि करे। ”
जेम्सवार्ड ने मूल्य को इच्छाओं की सन्तुष्टि करने वाली
वस्तु बताया है इच्छा की पूर्ति से सुख का अनुभव होता है इस प्रकार सुखानुभूति में
मूल्य की अनुभूति होती है।
हॉफ डिंग के अनुसार -“मूल्य वस्तु या विचार में
निहित वह गुण है जिससे हमें तात्कालिक सन्तुष्टि मिलती है या उस संतुष्टि के लिए
साधन मिलता है। ”
मूल्यों का सङ्कट (VALUE CRISIS
)
आज मूल्य परक अवधारणा में बदलाव आ रहा है पुराने भारतीय
मूल्य लुप्त हो रहे हैं हमारी मान्यताएं परम्पराएं और प्राथमिकताएं बदल रही हैं हम
आध्यात्मिकता को नकार कर पाश्चात्य जगत के जीवन मूल्यों और उनकी भौतिकवादी सभ्यता
को अपनाते जा रहे हैं हमारे जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है प्रसिद्द
अर्थशास्त्री ग्रेशम का नियम है कि
“खोटा
सिक्का अच्छे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है। ”
हमारे मूल्यों पर ग्रेशम का नियम पूरी तरह
लागू हो रहा है इन मूल्यों के क्षरण के पीछे निम्न कारण उत्तरदाई हैं। –
1 – आधुनिकता का प्रभाव
2 – पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण
3 – भौतिकता वादी सभ्यता के प्रति अप्रत्याशित मोह
4 – अनीश्वरवादी प्रवृत्ति
5 – तर्क प्रधान चिन्तन
6 – वैज्ञानिक प्रवृत्ति का अधकचरा विकास
क्षरण की इस प्रवृत्ति के बावजूद मानवीय मूल्यों का
ह्रास हुआ है नाश नहीं। अवश्य ही वे दब गए हैं परन्तु नष्ट नहीं हुए। भारतीय
संस्कृति आज भी जीवित है जबकि यूनान मिश्र और रोम की संस्कृतियां विलुप्त हो गईं।
भारतीय संस्कृति अपनी प्राचीन धरोहर के रूप में मूल्यों को आज भी संचित किये हुए
है।
उभरते सामाजिक सन्दर्भ में मूल्य (Values
in Emerging Social Context) –
आज देश को अपने सामाजिक ढाँचे को मजबूत करने की सर्वाधिक
आवश्यकता महसूस हो रही है देश द्रोही शक्तियां येन केन प्रकारेण इसमें सेंध लगाकर
मूल्यों को छिन्न भिन्न करने का हर सम्भव प्रयास कर रही हैं। उभरते सामाजिक
सन्दर्भ में निम्न आधारित मूल्यों का सृजन व संरक्षण करना होगा।
जब मेरा जन्म हुआ तब तक मेरा परिवार निर्धनता की श्रेणी में आ चुका
था पिताजी उस समय एक शुगर फैक्ट्री में फिटर की हैसियत से कार्य रहे थे मेरे पढ़ने के लिए वहाँ 12वीं तक विद्यालय था जिसे पूरा कर आगे पढ़ाना
हालाँकि चार बच्चों वाले परिवार में विलासिता जैसा था लेकिन मेरे माता पिता ने
जीवटता का परिचय दे आगे पढ़ाने का निश्चय किया। अपने स्नातक अध्ययन के दौरान कुछ
धनार्जन कर परिवार का सहयोग करने की इच्छा बलवती हुई। तमाम प्रयास के बाद कोई आय
का निश्चित साधन नहीं बन पा रहा था।
एक दिन मैं अत्याधिक चिन्ता से व्यथित फैक्ट्री
कालोनी में अपने दरवाजे पर मूढ़ा डाले बैठा था अचानक मुझे अपने एक परिचित का ध्यान
आया जो गलत तरीके से चोरी, डकैती व ठगी के माध्यम से पैसे कमा रहा था और
हमेशा उसकी जेब रुपयों से भरी रहती थी मैं उसके साथ काम करने के लिए उससे बात करने
की सोचने लगा तभी मेरे से एक घर पहले रहने वाले मेरे इण्टर मीडिएट वाले
प्रधानाचार्य जी आ गए उन्होंने मुझे चिन्तामग्न देखकर अपने पास बुलाया और परेशानी
का कारण जानना चाहा मैंने सच सच जो मेरे मन में आ रहा था सब बता दिया। उन्होंने
मुझे अपनी बैठक में बैठने का आदेश दिया।
मैं स्वचलित यन्त्र सा उनके समक्ष बैठा था
उन्होंने धीमी प्रभावशाली आवाज में मुझसे कहा कि तुम्हारे भविष्य की बहुत
सकारात्मक सम्भावनाएं मुझे दीख पड़ती हैं मैंने तुममें एक अच्छे वक्ता और कवि के
लक्षण देखे हैं मेर विद्यालय में तुम 7 वर्ष पढ़े हो,जहां तक मैं समझता हूँ तुम एक मेधावी छात्र हो
और जिन लोगों के बच्चों को तुम आजकल पढ़ा रहे हो वो सब तुम्हारी तारीफ़ करते हैं
क्या तुम किसी दूसरे का धन छीन सकोगे किसी अन्य को दुखी करके खुद सुख प्राप्त कर सकोगे किसी अन्य की मेहनत
की रोटी छीनकर स्वयम् खा सकोगे।
मैं अवाक रह गया किंकर्त्तवय विमूढ़ता की स्थिति
में मैंने सुना वे मुझसे पूछ रहे थे यदि तुम्हें कहीं जाने के लिए टिकट खरीदना हो
और दो जगह से टिकट मिल रहे हों एक जगह
लगभग तीन सौ लोग लाइन में हों और
दूसरी जगह तीन तो किससे टिकट लेना पसन्द करोगे। मैंने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया
जहाँ तीन लोग खड़े हैं उन्होंने तुरन्त पुछा, क्यों ? मैंने कहा वहाँ जल्दी नम्बर आएगा और दूसरी जगह
से तो टिकट मिलते मिलते ट्रेन छूट भी सकती है।
प्रधानाचार्य जी मुस्कुराए और बोले यहाँ चोरों, डकैतों, ठगों, भ्रष्टाचारियों, बेईमानों और दुष्टों की बहुत लम्बी लम्बी पंक्तियाँ लगी हैं यदि उस लाइन
में लग गए तो इस जन्म में तुम्हारा नंबर आ पाएगा इसमें संशय है दूसरी ओर सत्यनिष्ठ, ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ लोगों की लाइन बहुत
छोटी है जहां तुम सच्चाई और लगन से अपनी पहचान बना सकते हो।
उन्होंने बताया एक बार इन्दिरा गाँधी ने भी कहा
था -“मेरे दादाजी ने एक बार मुझसे कहा था कि दुनियाँ में दो तरह के लोग होते
हैं वो जो काम करते हैं और जो श्रेय लेते हैं,उन्होंने
मुझसे कहा कि पहले समूह में रहने की कोशिश करो वहाँ बहुत कम प्रतिस्पर्धा है।”
प्रधानाचार्य जी की बातों ने मेरी तन्द्रा तोड़
दी थी मुझे लग रहा था की किसी ने झकझोर कर मुझे जगा दिया था उसी दिन से मैंने
सच्चाई और कर्त्तव्य परायणता का जो पाठ सीखा उसी की बदौलत आज कई विषय में
स्नातकोत्तर, एम० एड० ,नेट
पीएच डी आदि करके एक प्रतिष्ठित पी ० जी ० महाविद्यालय में प्राचार्य पद पर हूँ और
मेरी कवितायें व वादविवाद परिक्षेत्र में जीता गया स्वर्णपदक मुझे अपने
प्रधानाचार्यजी द्वारा बताई सच्चाई की राह पर चलने की अनवरत प्रेरणा देता है।
परिवारों,व्यक्तियों,और अन्य स्तर के लोग जब समाज के एक वर्ग से दूसरे वर्ग में गति करते हैं तो इसे सामाजिक गतिशीलता कहते हैं इससे उसकी सामाजिक स्थिति में बदलाव हो जाता है। अर्थात एक सामाजिक स्थिति से दूसरी सामाजिक स्थिति को प्राप्त करना सामाजिक गतिशीलता कही जाती है।
मिलर और वूक के शब्दों में –
“व्यक्तियों अथवा समूह का एक सामाजिक दूसरे
संचलन होना ही सामाजिक गतिशीलता है।”
“Social mobility is a movement of individuals or
group from one social class stratum to another.”
पी ०सोरोकिन महोदय के अनुसार –
“समाजिक गतिशीलता का अर्थ समाजिक समूहों
एवं सामाजिक स्तरों में किसी व्यक्ति का एक सामाजिक स्थिति से दूसरी सामाजिक
स्थिति में पहुँच जाना है। ”
By social mobility is meant any transition of an
individual from one social position to another in constellation of social group
and strata.”
कार्टर वी गुड के अनुसार –
“सामाजिक गतिशीलता का अर्थ है -व्यक्ति या मूल्य
का एक समाजीक स्थिति से दूसरी समाजिक स्थिति में परिवर्तन।”
“Social mobility is the change of person or value from
one social position to another.”
समाजिक गतिशीलता, शैक्षिक विकास के सम्बन्ध में Social mobility in reference to educational development-
सामाजिक गतिशीलता और शैक्षिक विकास आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए
पहलू हैं जहां शिक्षा सामाजिक गतिशीलता में प्रभावी वृद्धि करती है वहीं सामाजिक
गतिशीलता के फलस्वरूप यह ज्ञात होता है की शिक्षा में इस हेतु कौन से सुधार आवश्यक
हैं यह अन्योनाश्रित गुण इनकी वर्तमान में उपादेयता परिलक्षित करता है। शैक्षिक
विकास द्वारा सामाजिक गतिशीलता की वृद्धि इन बिंदुओं द्वारा दर्शाई जा सकती है। –
1 – विद्यालय की प्रभावी भूमिका –
वस्तुतः जिस शिक्षा के आधार पर सामाजिक स्थिति में परिवर्तन होता है
वह विद्यालयों की देन है कार्ल वीनवर्ग के शब्दों में –
“विद्यालय का प्रमुख कार्य, नवीन मार्ग प्रशस्त करना तथा इनमें सभी को स्थान देना है जिससे वह
सामाजिक गतिशीलता के बदलते हुए ढाँचे के साथ कदम मिला सके। विद्यालय इस कार्य को
तभी पूरा कर सकता है जब वह सभी प्रकार के आर्थिक स्तरों के बालकों को अपनी उन्नति
के लिए व्यापक अवसर प्रदान करेगा।”
“The function of the school in keeping pace with the
changing structure of social mobility has been to open channels and keep them
open. This is accomplished by providing widespread opportunities to children of
all economic statutes to advance their position.”
2 – औपचारिक शिक्षा, सामाजिक गतिशीलता का अधिक प्रभावी साधन –
यह निर्विवाद सत्य है की बहुत से शैक्षिक संवर्धन के साधन अस्तित्व
में हैं लेकिन औपचारिक शिक्षा इस गतिशीलता का सशक्त साधन है मिलर और वूक लिखते हैं –
“औपचारिक शिक्षा, सामाजिक गतिशीलता से प्रत्यक्ष रूप में तथा कारणतः सम्बन्धित है। इस
सम्बन्ध को सामान्यतः इस रूप में समझा जाता है की शिक्षा स्वयं शीर्षात्मक सामाजिक
गतिशीलता का एक प्रमुख कारण है। ”
“Formal education is directly and causally related to
social mobility. Than relationship is generally understood to be one in which
formal education itself is a cause or one of the causes of vertical social
mobility.”
3 – सार्वभौम अनिवार्य शिक्षा दृष्टिकोण –
शासन का यह दृष्टिकोण भी गतिशीलता की वृद्धि में सहायक है क्योंकि एक
स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिक्षा के सम्बन्ध में परिपक़्व दृष्टिकोण
विकसित हो जाता है। भारत जैसे देश में जहां बेटे और बेटियों के प्रति दृष्टिकोण
में भिन्नता देखने को मिल जाती है वहां इस व्यवस्था से बेटे और बेटियां दोनों
लाभान्वित हो रहे हैं और पारिवारिक प्रगति का आधार बन रहे हैं।
4 – विविध पाठ्यक्रम
5 – प्रशिक्षण व व्यावसायिक पाठ्यक्रम
6 – वैज्ञानिक,
तकनीकी
व शोधपरक शिक्षा
7 – शैक्षिक अवसरों की यथार्थ समानता
8 – शिक्षक और सामाजिक गतिशीलता
अन्ततः यह कहा जा सकता है कि किसी भी देश की
प्रगति उसके यहाँ होने वाले सामाजिक उन्नयन या सामाजिक गतिशीलता पर निर्भर है और
निः सन्देह शिक्षा का इस क्षेत्र में महत्त्व पूर्ण योगदान है और रहेगा लेकिन इसका
अभाव पतन की कहानी लिखेगा नयी शिक्षा नीति भी अध्यापकों के साथ यदि न्याय हेतु
अपने को तैयार नहीं कर पाई तो वांछित परिणाम नहीं मिलेंगे।
क्रोध एक मानसिक भाव है शरीर का सॉफ्टवेयर बिगड़ने का संकेत है इसमें आवाज ऊँची होने लगती है मुखाकृति बिगड़ने लगती है बुराइयों का ज्वार उठने लगता है एक एक पुरानी भटकी हुई बातें याद आने लगती हैं एक दूसरे में कमी के सिवाय कुछ नहीं दीखता, मति भ्रम कब पैदा हुआ, कब नासूर बना। सम्बन्ध कब तिरोहित हुए। सब कुछ अनहोनी शीघ्रता से घाटित हो जाती है थोड़े से सजग रहकर इस अनहोने घटना क्रम से बचा जा सकता है। सम्बन्धों के रिक्ताकाश को लबालब प्रेम से भरा जा सकता है। क्रोध से निपटना दुष्कर अवश्य लगता है पर यह असम्भव कदापि नहीं है।
आइए जानने का प्रयास करते हैं कि समस्त विवाद
का मूल क्रोध का कैसे नाश किया जा सकता है ?
क्रोध शान्त करने के उपाय (Ways to calm anger) –
मानव की मूल प्रकृति शान्ति है लेकिन यह भी अटल सत्य है कि कुछ
परिस्थितियां मानव को क्रोध दिलाने में सक्षम हैं हालाँकि कोई क्रोध को जानबूझ कर
अपना स्वभाव बनाना नहीं चाहेगा। अपनी मूल प्रकृति शान्ति की और लौटने तथा वाणी के
घाव से खुद और दूसरे को बचाने के लिए कुछ उपाय प्रयोग में लाए जा सकते हैं आइए
ध्यानपूर्वक संज्ञान में लेने का प्रयास करते हैं। –
स्वभाव में परिवर्तन –
परदोष देखने
के मानवीय स्वभाव ने समाज में क्रोध के स्तर का उन्नयन किया है अपनी आदतों की और
ध्यान देना चाहिए स्वयम् का विश्लेषण करने का प्रयास होना चाहिए। कुछ भी अनायास
नहीं होता और प्रयास अन्ततः सफल होता है मिलनसार स्वभाव बनाना है यह हमेशा ध्यान
रखना चाहिए। व्यवहार परिवर्तन की शुरुआत स्वभाव परिवर्तन की अनुगामी होती है। हमें
गिले शिकवे की आदत नहीं बनानी है। अपने व्यवहार का रिमोट अपने पास ही रखना है भूल
कर भी नियन्त्रण नहीं खोना है। याद रखें हम स्वयम् में परिवर्तन शीघ्र ला सकते हैं
दूसरे में नहीं। इसीलिए कहना चाहूँगा –
स्वभाव
में सु परिवर्तन का आगाज़ हो जाए,
स्वयम्
की गलतियों का हमें दीदार हो जाए,
फिर
क्रोध को न मिल पाएगा कोई ठिकाना,
यदि
स्वभूलों के सुधार का व्यवहार हो जाए।
वाणी सदुपयोग –
कबीर दास जी ने कहा –
“ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये।
औरन
को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।
इन
शब्दों में क्रोध विनाश का मूल मन्त्र छिपा हुआ है याद रखें सम्राट के क्रोध भरे
वचनों से भिखारी के मधुर शब्द ज्यादा अच्छे लगते हैं। वाणी से लगे घावों का आज तक
कोई मरहम नहीं बना इसीलिये मधुर गरिमामयी वाणी का सोच समझ कर प्रयोग करना चाहिए। अयोध्या
सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘ ने कितने सरल शब्दों समझाया –
लड़कों
जब अपना मुँह खोलो
तुम
भी मीठी बोली बोलो
इससे
कितना सुख पाओगे
सबके
प्यारे बन जाओगे ।
क्षमा –
जब हमसे गलती हो तो क्षमा मांग लेना चाहिए और यदि गलती
अन्य की हो तो उदारता से क्षमा कर देना चाहिए ध्यान रखना है कि क्षमा माँगने का
अधिकार क्षमा देने की बुनियाद पर खड़ा है क्षमा से आनन्द का वह प्रवाह जीवन से
जुड़ता है जो क्रोध तिरोहित कर जीवन को आनन्दमयी बना देता है रहीम दास जी ने कितना
सुन्दर कहा –
क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात,
का रहीम हरी को घट्यो, जो भृगु मारी लात।
याद रखें क्षमा के प्रभाव से जवानी में गुस्सा मन्द और
बुढ़ापे में बन्द हो जाता है।
सत्संग –
सत्संग का मानव पर व्यापक प्रभाव पड़ता है सकारात्मक
परिवर्तन की चाह का प्रादुर्भाव सत्संग के प्रभाव से आता है और मानव मन पर फिर ऐसी
अमिट छाप पड़ती है कि बुरी मनोवृत्ति की छाया सत्संगी पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाती
रहीम जी ने कितना अच्छा समझाया है –
जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग,
चंदन विष व्यापत
नहीं लिपटे रहत भुजंग
गहरी श्वाँस –
गहरी गहरी श्वाँस और इनकी निरन्तरता किसी भी
क्रोध आवेग का क्षरण करने का अचूक उपाय है इससे जहाँ ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा
का हम सेवन करते हैं वहीं समस्या पर विचार मन्थन का पर्याप्त समय मिल जाता है।
स्थान परिवर्तन व पूर्ण श्वाँस प्रश्वाँस क्रोध शमन में वह कार्य कर जाता है जो कई
बार वह पूर्वाग्रह युक्त मष्तिष्क नहीं कर पाता। इसी लिए कहता हूँ –
पूर्ण श्वांस प्रश्वांस का क्रम
वह जादू सा कर जाता है।
क्रोध आवेग और मतिभ्रम
सब का हरण कर जाता है।
06- कामना नियन्त्रण –
कामना
नियन्त्रण एक दुष्कर कार्य है असम्भव नहीं। कामना में बाधा पड़ने पर क्रोध उत्पन्न
हो जाता है इसीलिये यह जानना परमावश्यक है की आखिर कामना का जन्म कैसे हो जाता है
यह जन्म पाती है रूप, रस, गन्ध
आदि प्रधान कारणों से, इसका आधार होती हैं इन्द्रियाँ। इन्द्रियों पर
नियन्त्रण का सबल आधार है सच्चा अध्यात्म, कामना
अर्थात इच्छा भोग प्रवृत्ति से जन्म लेती है और योग इस पर अंकुश में सहायक है।
07- क्षमता सदुपयोग –
ज्यों
ज्यों हमारी क्षमता में वृद्धि होती है सामान्यजन विवेक खोने लगता है और क्रोध मद
में वृद्धि होने लगती है,
जोकि क्षमता का दुरूपयोग कराती है इसके उदाहरण
हमें यत्र तत्र सर्वत्र दीख पड़ते हैं। इसे साधने की क्षमता विवेक युक्त ज्ञान के
पास है। हमारी आत्मिक शक्ति ही दिशा बोध पैदा कर
सकती है। क्षमता के साथ विवेक जन्य संयम आवश्यक है। educationaacharya.com पर ‘हमें
क्रोध क्यों आ जाता है’ रचना में यह प्रश्न उठा है जिसका लिंक मैं
डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दूँगा।
08- सम्यकविवेचन –
आज
होने वाले विवादों से उत्पन्न क्रोध सम्यक विवेचन के अभाव के कारण होता है जब दिशा
देने वाली शक्तियाँ और धर्म के तथा कथित मसीहा दिशाबोध स्वयं के स्वार्थ से युक्त
होकर देने लगते हैं तो सामान्य भोलाभाला जनमानस किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाता है और
क्रोध प्रादुर्भावित हो जाता है। इसीलिये कहा है –
क्रोध
को सिरे से दरकिनार करना चाहिए।
जीवन
छोटा है, बहुत
प्यार करना चाहिए।
किसी
विवाद से पूर्व विचार करना चाहिए।
प्रेम
व सम रसता का प्रसार करना चाहिए।।
09-क्रोध उपवास–
जिस प्रकार अन्न उपवास शरीर में भू तत्व नहीं
बढ़ने देता। अलग अलग उपवास अलग तरह के फल प्रदान करते हैं। ठीक उसी तरह क्रोध उपवास
आपको आनन्द से भर देगा पहले कोई एक दिन चुनें और अपने सेदृ दृढ़ प्रतिज्ञा करें आज
क्रोध उपवास करूंगा कुछ भी हो जाए आज विवाद नहीं करूंगा। हर हाल में उसे टालने का
मन बनाना है। आप देखेंगे वह दिन खुशनुमा होगा। धीरे धीरे इन उपवासों की संख्या बढ़ा
सकते हैं।
10 – एकान्त वास –
यदि
सम्भव हो तो पूर्व निर्धारित समय पर मौन का सहारा ले मोबाइल और तमाम संचार साधनों
से दूर रहकर देखें। अंग प्रत्यंग का चेतना स्तर उच्च हो जाएगा एक विलक्षण शक्ति की
अनुभूति करेंगे लोक कल्याण की भावना आपको और सबल करेगी व्यक्तित्व प्रखर होगा
प्रतिक्रियाओं में जान आएगी। क्रोध पर प्रभावी अंकुश लगेगा। याद रखें, करेंगे तो इसका महत्त्व समझ पाएंगे।
वस्तुतः आत्म साक्षात्कार हेतु साधक को इस गुण का अभ्यास करना ही चाहिए। मन प्रसन्न रहेगा और क्रोध छु मंतर
हो जाएगा।
11 – शान्ति की साधना-
श्री
मद्भगवद्गीता में सोलह कला सम्पूर्ण भगवान् श्री कृष्ण स्वयम् कहते हैं –
नास्ति
बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न
चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।
जिसके
मनइन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं ऐसे मनुष्यकी व्यवसाय आत्मिका बुद्धि नहीं होती।
व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी
भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल
सकता है।
वस्तुतः
जहां शान्ति नहीं है वहाँ अशान्ति है ,क्रोध
है, असन्तुलन है, तम है इसीलिए क्रोध मुक्ति हेतु शान्ति परमावश्यक है। इसीलिये शान्ति
के साधक ध्यान, धारणा, समाधि
आदि अन्तरङ्ग साधनों से इसे वरण करने में निरन्तर लगे रहते हैं।
ॐ
शान्ति शान्ति शान्ति।
परमपिता
परमेश्वर से यही प्रार्थना कि हम सब क्रोध पर नियन्त्रण रखना सीख सकें। उक्त
बिन्दु सभी के लिए मददगार साबित होंगे ऐसा विश्वास है। धन्यवाद