बसन्त पञ्चमी के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म ग्रन्थों में कई कथाएं प्रचलित हैं भगवान शिव की सगाई के दिन के रूप में यह वर्णित है। कुछ कथाएं इसे पृथ्वी पर जीवन की शुरआत का दिन मानती हैं लेकिन माघ मास की इस पञ्चमी को अधिकांशतः सरस्वती पूजा अर्थात माँ शारदे की आराधना का दिवस माना जाता है। प्राचीन समय से ही ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के जन्म दिवस या प्रागट्य दिवस के रूप में मनाते हैं।
बसन्त पञ्चमी का समय व शुभ मुहूर्त –
बसन्त पञ्चमी इस बार 23 जनवरी 2026 को मनाई जायेगी क्यों कि बसन्त पञ्चमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी 2026 यानी गुरुवार की रात 1 बजकर 30 मिनट से प्रारम्भ होगी और 23 जनवरी की रात 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगी. इसीलिए उदय तिथि के अनुसार शुक्रवार को ही मां सरस्वती की पूजन करना शुभ माना जाएगा।
विविध क्षेत्रों में बसन्त पञ्चमी –
माँ शारदे की आराधना, पूजा का यह दिवस इस विविधता वाले देश में अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में विवाहोपरान्त पहली बसन्त पञ्चमी के दिन विवाहित जोड़ा पीत वस्त्र धारण कर मन्दिरों में जाते हैं। पंजाब में इस दिन पतङ्ग उड़ाई जाती हैं और पतंग उत्सव मनाते हैं पीले चावल बना कर खाते हैं सिख बन्धु पीले रंग की पगड़ी भी पहनते हैं। बिहार प्रान्त में भगवान मार्तण्ड अर्थात सूर्य देव की मूर्ति की स्थापना की गई, इस दिन सूर्य पूजन दिवस के रूप में पूर्ण साजसज्जा व उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल में विधिवत मूर्ति स्थापित कर पूर्ण श्रद्धा से मनाई जाती है शेष परिक्षेत्र में भी विधिवत मान शारदे की उपासना होती है। कतिपय लोग भगवान शिव की आराधना करने के साथ इस दिन विवाह का विशिष्ट दिन मानते हैं। मुस्लिम समुदाय के सूफी सन्त भी इस दिन को विशेष दिन मानते हैं। चिश्ती वंश के मुस्लिम सूफी सन्त इस दिनदिल्ली की प्रसिद्द निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करते हैं।
बसन्त पञ्चमी मनाने का ढंग –
विद्या, बुद्धि, वाणी की शुद्धता, स्मरण शक्ति और कलाओं में सिद्धि हेतु इस दिन माँ की आराधना करते हैं इस वर्ष अभिजित मुहूर्त: प्रात:काल 11:53 से दोपहर 12:38 बजे तक है। इस दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि के उपरांत स्वच्छ धवल या पीत वस्त्र धारण करे जाते हैं यहाँ तक की आसन भी इसी रंग का लेना विशेष शुभ माना जाता है। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर सङ्कल्प लेते हैं। सामान्यतः इस मन्त्र से मान शारदे का आवाहन होता है –
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
उक्त ध्यान मंत्र के सस्वर वाचन उपरान्त मां शारदे को पुष्प, रोली, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, अर्पित किया जाता है।
तदोपरान्त वाग्देवी के श्री चरणों में पुस्तक, कलम, कला साधन व वाद्य यंत्रों आदि को रखकर वन्दन करते हैं
मां सरस्वती को फल, पुष्प व नैवेद्य अर्पण करने के बाद पुनः ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः‘, अथवा ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः ‘मंत्र का जप करें.
बसन्त पञ्चमी के दिन मां सरस्वती की आरती के बिना उनकी पूजा अधूरी रहती है, इसलिए माँ शारदे की आरती अवश्य की जानी चाहिए।
बसन्त पञ्चमी का दिन गीत, संगीत, नृत्य, लेखन तथा कला साधना के प्रारम्भ हेतु अत्यंत ही शुभ और फलप्रदाता माना जाता है. नवीन कार्यों की शुरुआत व मांगलिक कार्य हेतु भी बसंत पंचमी का दिन शुभ माना जाता है.इस दिन विद्यार्थी अध्ययन हेतु उपयोगी वस्तुओं का दान देते हैं और माँ शारदे का आशीष लेते हैं। पीले वस्त्र धारण करते हैं पीले पुष्प चढ़ाना अच्छा माना जाता है प्रकृति भी अपना पीला श्रृंगार करती है सरसों के पुष्प प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं। बासन्ती मिष्ठान आज का प्रमुख प्रसाद रहता है। केसर हलवा विशेषतः इस दिन प्रमुखता से खाया जाता है।
अन्त यह कहना समीचीन होगा कि यदि कर्मकाण्ड पूर्ण न भी हो पाएं और सच्चे मन से मान शारदे के ध्यान के साथ दृढ़ संकल्पित होकर साधना में पूर्ण मनोयोग से तत्पर होते हैं तो यह दिवस विशेष फल प्रदाता है। बसन्त पञ्चमी पर्व के आगमन के साथ खेतों में सरसों, गेहूं आदि फसलें लहलहाने लगती हैं. प्रकृति में इस कालखण्ड में नवजीवन, उल्लास और सौंदर्य का संचरण होता है. सनातन हिन्दू धर्म में पीला रंग चाहे हल्दी का हो या सरसों का, बसन्त का प्रतीक माना जाता है. यह रंग विद्या की देवी मां शारदे को भी अत्यन्त प्रिय है. इसी कारण बसन्त पञ्चमी महापर्व पर लोग विशेष रूप से पीले परिधान धारण कर पीले ही व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हैं।

