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विविध

असफलता से सफलता की ओर

April 15, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

असफलता से सफलता की ओर / From failure to success

मानव जीवन का विकास क्रम अपने आप में शैशव अवस्था, बाल्य अवस्था, किशोर अवस्था, युवा अवस्था, प्रौढ़ अवस्था,और वृद्ध अवस्था को समेटे हुए है। इस क्रम में शैशव अवस्था, में हम अपने आप कुछ कर पाने की स्थिति नहीं होते लेकिन इसके उपरान्त हम चलना, बोलना, खेलना, पढ़ना, लिखना सभी प्रारम्भ करते हैं। इस समय का एक विशेष गुण होता है कि हम असफलताओं से घबराते नहीं, हारते नहीं हैं और अनवरत प्रयास कर सफलता की सीढ़ी चढ़ते हैं। ज़रा याद करें , चलना सीखने के क्रम में हम कितनी बार गिरे अन्ततः हमने चलना ही नहीं सीखा बल्कि दौड़ना भी सीख लिया। कई विद्वतजनों की धारणा है कि हमारी असफलता से जूझने की क्षमता में अवस्था के अनुसार क्रमिक ह्रास आता है कई इसे भी नहीं भी मानते। 

दृष्टिकोण परिवर्तन आवश्यक / Attitude change required –

असल में हमने अपने मानदण्ड, अपने दृष्टिकोण जो असफलता के सम्बन्ध में विकसित किये हैं दिशा भ्रम वहीं से शुरू हो जाता है जबकि प्रत्येक असफलता एक प्रकाश स्तम्भ है इससे हमें अपनी कमी का भान होता है। एक नया अनुभव प्राप्त होता है कार्य को अधिक कारगर तरीके से करने का दृष्टिकोण विकसित होता है। हम और अधिक सशक्त बनकर उभरते हैं। मानसिक रूप से सशक्त होकर कार्य को भली भाँति अन्जाम दे सकते हैं। असफलता को अन्तिम पायदान न समझकर मील का पत्थर और प्रेरक के रूप में स्वीकार करना होगा तभी हम असफलता को पीछे छोड़ और उसका आधार ले आगे बढ़ सकेंगे। यथार्थ में असफलता सच्चा अवलम्बन व सच्चा मार्गदर्शक है।

असफ़लता से मिलने वाली सम्यक दिशाएं / The right directions from failure –

असफलता से हमें दृढ़ आधार प्राप्त होता है कुछ ऐसे भी आधार हैं जो मानस में गहरे बैठ जाते हैं असफलता से हारने की जगह हमें उससे सीखना चाहिए। क्या क्या सीखा जा सकता है उनमें से कुछ को इस प्रकार कर्म दे सकते हैं।   

01 – परिपक्वता / Maturity

02 – सम्यक रणनीति / Appropriate Strategy

03 – लचीलापन / Flexibility

04 – सकारात्मकता /Positivity

05 – व्यक्तित्व पुनर्गठन /Personality Restructuring

06 – आत्म शक्ति सञ्चयन व विकास / Self power accumulation and development

राष्ट्र कवी मैथिली शरण गुप्त के भाव देखिये 

”नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो

जग में रह कर कुछ नाम करो

यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो

समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो

कुछ तो उपयुक्त करो तन को

नर हो, न निराश करो मन को”

07 – जोखिम क्षमता वृद्धि / Increased risk appetite

राबर्ट एफ केनेडी ने कहा –

“केवल वे ही जो बड़ी विफलता का जोखिम उठाते हैं वे ही बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं।”

आँग्लअनुवाद

“Only those who risk great failure can achieve great success.”

08 – स्वमूल्याँकन / Self assessment

09 – मानसिक शक्ति का विकास /Development of mental strength

10 – सम्यक धैर्य सम्वर्धन / Proper patience development

हरिवंश राय बच्चन महोदय कहते हैं –

“असफलता एक चुनौती है स्वीकार करो

क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम

संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम

कुछ किये बिना ही जयजयकार नहीं होती

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।“

विविध विद्वानों के असफलता सम्बन्धी उद्धरण / Quotes on failure from various scholars –

हेनरी फोर्ड महोदय कहते हैं –

“असफलता केवल फिर से शुरआत करने का एक अवसर है, इस बार अधिक समझदारी से”

आंग्ल अनुवाद

“Failure is simply an opportunity to begin again, this time more intelligently.”

नेपोलियन हिल

“हर असफलता, हर दिल टूटना, हर हार अपने साथ एक समान या उससे बड़े लाभ का बीज लेकर आती है।”

आंग्ल अनुवाद

“Every failure, every heartbreak, every defeat carries with it the seed of an equal or greater gain.”

जिम रोहन महोदय के अनुसार –

“सफलता कीसबसे बड़ी कुंजी यह है कि आप असफलता से न डरें।”

आंग्ल अनुवाद

“The biggest key to success is not to be afraid of failure.”

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा –

“इन छोटी मोटी असफलताओं की परवाह मत करो; आदर्श को याद रखो, और अगर हज़ार बार भी असफल हो जाओ, तो एक बार फिर कोशिश करो।”

“Don’t worry about these small failures; remember the ideal, and even if you fail a thousand times, try again.” 

असफलता से सफलता की ओर बढाए जाने वाले कदम / Steps from failure to success –

01 – स्वस्थ आदतों का विकास / Developing Healthy Habits

02 – स्पष्ट लक्ष्य चयन / Clear Goal Selection

 03 – उद्देश्य के प्रति पूर्ण समर्पण / Complete Dedication to the Objective

04 – अनवरत परिश्रम / Continuous Hard Work

05 – कठोर स्व अनुशासन / Strict Self-Discipline

06 – सकारात्मक सोच / Positive thinking

07 – अनवरत क्षमता व कौशल विकास / Continuous capacity and skill development

08 – आशावादिता / Optimism

            रामानंद ‘दोषी’ जी के शब्द हमें हमारे स्वर्णिम इतिहास से प्रेरणा देते हुए हमारा आवाहन करते हुए कहते हैं –

आँधियों ने गोद में हमको खिलाया है न भूलो,

कंटकों ने सिर हमें सादर झुकाया है न भूलो,

सिन्धु का मथकर कलेजा हम सुधा भी शोध लाए,

औ‘ हमारे तेज से सूरज लजाया है न भूलो।

वे हमीं तो हैं कि इक हुंकार से यह भूमि कांपी,

वे हमीं तो हैं जिन्होंने तीन डग में सृष्टि नापी,

और वे भी हम कि जिनकी सभ्यता के विजय रथ की

धूल उड़ कर छोड़ आई छाप अपनी विश्वव्यापी।

वक्र हो आई भृकुटी तो ये अचल नागराज डोले,

दश दिशाओं के सकल दिक्पाल ये गजराज डोले,

डोल उट्ठी है धरा, अम्बर, भुवन, नक्षत्र-मंडल,

ढीठ अत्याचारियों के अहंकारी ताज डोले।

सुयश की प्रस्तर-शिला पर चिह्न गहरे हैं हमारे,

ज्ञान-शिखरों पर धवल ध्वज-चिन्ह हैं लहरे हमारे,

वेग जिनका यों कि जैसे काल की अंगड़ाइयाँ हों,

उन तरंगों में निडर जलयान ठहरे हैं हमारे।

मस्त योगी हैं कि हम सुख देखकर सबका सुखी हैं,

कुछ अजब मन है कि हम दुख देखकर सबका दुखी हैं,

तुम हमारी चोटियों की बर्फ़ को यो मत कुरेदो,

दहकता लावा हृदय में है कि हम ज्वालामुखी हैं।

लास्य भी हमने किए हैं और तांडव भी किए हैं,

वंश मीरा और शिव के, विष पिया है औ‘ जिए हैं,

दूध माँ का, या कि चन्दन, या कि केसर जो समझ लो,

यह हमारे देश की रज है कि हम इसके लिए हैं।

आशा ही नहीं विश्वास है कि असफलता को हम सब एक चुनौती की तरह लेंगे और कभी हार न मानने का खुद में जज्बा पैदा करेंगे और दूसरों में भी उत्साह का संचरण करेंगे। तभी हम बढ़ पाएंगे – ‘असफलता से सफलता की ओर’

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विविध

भद्रा/ Bhadra

March 3, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

भद्रा/ Bhadra

भद्रा काल  वह सामयिक अवधि है जिसे पञ्चाङ्ग में विश्टि करण समयावधि के नाम से जाना जाता है एक तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। 11 करण होते हैं – उनमें से एक है विश्टि करण। विविध करणों में से एक करण को  विष्टि करण के नाम से जाना जाता है इसे अच्छा नहीं माना जाता है. इसी विष्टि करण को भद्रा के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा के समय शुभ कार्य वर्जित रहते हैं।

            कल्याणकारी या  मङ्गलकारी को भद्रा का शाब्दिक अर्थ स्वीकार किया जाता है लेकिन विश्टि करण के कारण इस काल को अशुभ मानते हुए इस काल में  विवाह, गृह प्रवेश, गमन हेतु प्रस्थान को वर्जित किया गया है जबकि यह काल युद्ध या शत्रु विजय हेतु शुभ माना जाता है।

भद्रा परिचय – भारतीय पौराणिक कथाओं भद्रा भगवान् सूर्य और छाया की पुत्री व शनि देव की भगिनी हैं छाया अर्थात संवर्णा की इस पुत्री की आकृति उग्र व स्वभाव तीक्ष्ण था विविध देवताओं के आशीर्वाद के कारण वे मंगलकारी व लोकहित कार्यों में प्रवृत्त हुईं फिर भी समय समय पर इनका उग्र स्वभाव विनाशकारी सिद्ध होता है। भद्रा के सम्बन्ध में यह स्वीकार्य है कि जब भद्रा पृथ्वी लोक पर है तब अशुभ है लेकिन स्वर्ग व पाताल में यह दोष मुक्त हो जाती है।

भद्रा सम्बन्धी वैज्ञानिक दृष्टिकोण – भद्रा काल को कुछ वैज्ञानिक कारणों से भी अशुभ मन जाता है इस समय चन्द्रमा और सूर्य की जो स्थिति होती है वह ऊर्जा का असन्तुलन पैदा करता है इस काल में मानसिक अशान्ति  निर्णयन क्षमता का आकलन करने पर ज्ञात हुआ की इस समय निर्णयन क्षमता निम्न कोटि की होती है।  वैज्ञानिकों ने विविध कालों का तुलनात्मक अध्ययन किया व पाया मौसम व खगोलीय स्थिति के कारण इस समय यात्रा करने पर अधिक बाधाएँ देखने को मिलती हैं।  इस समय प्रकृति व मानव भी उग्रता की शिकार हो जाती है।

भद्रा काल व भारत – भारतीय जातकों में अधिकाँश लोग समय को जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं। हम समय का सम्मान कर सही समय में अपने पञ्चाङ्ग को भी सम्मान देते हुए कार्यों को सम्पन्न करते हैं हमारे शास्त्र उद्घोष करते ही हैं कि – “कालो हि दुरतिक्रमः”

इसका आशय है कि समय को कोई नहीं बदल सकता।

इसी वजह से हिन्दुस्तानी पंचांग देखकर कार्य करने को कल्याणकारी मानते हैं भद्रा काल का हमारे जीवन में महत्त्व पूर्ण स्थान है।

सावधानी सूचक भद्रा – भद्रा हमें सचेत करती है कि हर काल खण्ड हर कार्य के लिए उचित नहीं होता, कार्यों को उस समय संपन्न करना उचित रहता है जब प्रकृति की ऊर्जा सन्तुलन में होती है। यह भौतिक कार्यों के सम्पादन की जगह तपस्या व चिन्तन, मनन का काल है। यह अशुभ की घोषणा करके वास्तव में हमें सचेत ही करता है।

क्या  न करें और क्या करेंभद्रा काल में?  

  • करने योग्य कार्य अर्थात स्वीकार्य कार्य – आवश्यकता के अनुसार निम्न कार्य सम्पादित किए जा सकते हैं। 

01 – आवश्यक होने पर युद्ध किया जा सकता है।

02 – शत्रु विजय की व्यूह बद्ध कोशिश

03 – लक्ष्य समर्पित उपासना

04 – तंत्रो व मन्त्रों की साधना

05 – दुष्कर कठिन तपश्चर्या

  • न करने योग्य अर्थात वर्जित कार्य –

01 – सगाई करके नवजीवन के लिए यह समय उचित नहीं है।

02 – नव निर्मित घर का गृह प्रवेश            

03 – विवाह कार्य सम्पादन

04 – नामकरण सँस्कार

05 – नया सौदा या व्यवसाय या व्यावसायिक प्रतिष्ठान का प्रारम्भ

06 – धार्मिक अनुष्ठान व माङ्गलिक कार्य

भद्रा दोष निवारण –

कभी कभी इस तरह की स्थितियाँ होती हैं कि कार्य सम्पादन परमावश्यक प्रतीत होता है ऐसी स्थिति में इन निवारण उपायों के साथ कार्य सम्पादित किये जा सकते हैं –

01 – श्री हनुमत आराधना

02 – भगवन शनि आराधना  

03 – भद्रा पूजन

04 – काला तिल व काले वस्त्र का दान

05 – “ॐ शनैश्चराय नमः” मंत्र का जप

 

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विविध

DIGITAL ARREST

February 22, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

डिजिटल अरेस्ट  

आज की भागम भाग की जिन्दगी में ढेरों बदलाव देखने को मिल रहे हैं। आदमी मशीन होता जा रहा है। जेब में बिना पैसे रखे भी सीधे अपने खाते से भारी भरकम  रकम खर्च की जा सकती है। जहाँ लम्बी लम्बी लाइनों के जञ्जाल से मुक्ति मिली है लेन देन सरल हुआ है। वही कंगाल होने के भी खतरे बढ़ गए हैं। बिना आपके घर में साक्षात् घुसे भी आपको  लूटा  सकता है उसी का  एक तरीका है – डिजिटल अरेस्ट

डिजिटल अरेस्ट क्या है ?-

यह एक साइबर क्राइम है दूसरे शब्दों में यह एक अत्यन्त घातक धोखा धड़ी है जिसे ऑन लाइन अंजाम दिया जाता है, डिजिटल अरेस्ट स्कैम आपके डर जाने को कैश करके लूटने का आधुनिकतम तरीका है। कई अर्थों में यह हमारी नासमझी का परिणाम है जिन कार्यों को बैंक, शासन  बार बार मैसेज भेजकर हमें करने से मना करता है वही जब हम किसी भी कारणवश कर बैठते हैं तब हम डिजिटल अरेस्ट स्कैम का शिकार बनते हैं। जब केवल डराकर आपको मनी लॉन्ड्रिंग, ड्रग की तस्करी, अन्तर्राष्ट्रीय अपराध, किसी परिवारीजन, मित्र, सम्बन्धी झूठी बात का आपको विश्वास दिलाकर अपने इशारों पर दूर से नचाया जाता है तो इस सायबर क्राइम की भूमिका गढ़ी जाती है। वीडियो कॉल पर अनजाना चेहरा आपके बारे में कुछ तथ्य बताकर अपने को किसी तरह का अफसर बताकर डर का माहौल बनाकर आपको बाध्य करता है तब जो आप वीडियो कॉल पर बन्धक हो जाते हो इसे ही डिजिटल अरेस्ट होना कहा जाता है।

डिजिटल अरेस्ट के कतिपय उदाहरण –

            आजकल लगभग रोज ही इस तरह की खबर सुननने को मिल जाती है कि आज डिजिटल अरेस्ट कर इसे लूट लिया उसे लूट लिया और यह  ठगी भी करोड़ों में होती है कुछ उदाहरण जो मष्तिष्क में हैं उनमें से कुछ आपके साथ बांटने का प्रयास करता हूँ। वर्धमान ग्रुप के CMD श्री एस पी ओसवाल जी को डिजिटल अरेस्ट करके लगभग 7 करोड़ की ठगी हुई। मेरी एम  एड में गुरु रहीं श्रद्धेय डॉ वीना शाह जी इसका शिकार बनी. एक महिला शिक्षक को जब उसकी बेटी के सेक्स स्कैंडल में फंसने का झूठा कॉल आया तो डर के कारण उसकी मौत हो गयी। इतनी बड़ी आबादी वाले देश में साइबर क्राइम करने वालों को शिकार खोजने में अधिक दिक्कत नहीं होती।

डिजिटल अरेस्ट होने के कारण –

01 – कानून और व्यवस्था का सम्मान

02 –  नियम कायदे, सरकारी दस्तावेज व विविध शासकीय संस्थाओं पर अगाध विश्वास

03 – निजी डाटा सुरक्षा सम्बन्धी सरल क़ानून 

04 – डिजिटल अरेस्ट, ट्रेडिंग घोटाला, निवेश में घोटाला वाली मानसिकता

05 –  रोमांस, डेटिंग व स्वाभाविक ओछापन 

06 – प्रबल विवेक शक्ति का अभाव

07 – अवैध सामान, नकली पासपोर्ट, ड्रग्स या नियम विरुद्ध कार्य सम्बन्धी सूचना पर विश्वास  

08 – भय

09 – स्वयं को कमजोर मानने की प्रवृत्ति

10 – साइबर सुरक्षा की खराब व्यवस्था  

11 – निजता संरक्षण सम्बन्धी जागरूकता का अभाव

डिजिटल अरेस्ट से बचाव के उपाय –

01 – आरोपों की सम्यक पड़ताल।

02 – तथ्यों, सबूतों की सम्यक समझ। 

03 – डिजिटल अरेस्ट या वर्चुअल हिरासत शब्द पर तुरन्त जागरूक।

04 – लगातार कॉल पर रहने की बात आते ही विशेष जागरूक ;

05 – अनजाने लोगों से वीडिओ कॉल पर बात नहीं।

06 – अकाउंट फ्रीज की सूचना पर सचेत

07 – बिना मँगाया पार्सल वापस करें तुरन्त।

08 – आपसे सौदेबाजी की बात आने पर सचेत

09 – जागरुक रहें। जागरुक करें।

10 – वित्तीय लेन देन पर राज़ी न हों।

11 – अपराधों के आरोप पर सचेत   

12 – तुरन्त पेमेन्ट मतलब ख़तरा

13 – कॉल काटने से न डरें। 

14 – तथ्य वेरिफाई अवश्य करें।

15 – तत्सम्बन्धी सुरक्षा एजेंसी से तुरन्त सम्पर्क।

16 – बैंक डिटेल्स, जन्म तिथि, आधार व पैन नंबर, OTP शेयर न करें।

अगर कभी फँस भी जाएँ तो तुरन्त स्थानीय पुलिस, साइबरक्राइम पोर्टल (जैसे, भारत में cybercrime.gov.in) या 1930 जैसी राष्ट्रीय हेल्पलाइन पर रिपोर्ट करें.

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विविध

PUBLISHED BOOK, UNPUBLISHED BOOK

February 5, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पब्लिश्ड बुक और अनपब्लिश्ड बुक

आजकल आप एक शोर लगातार पब्लिश्ड बुक और अनपब्लिश्ड बुक के बारे में सुन रहे होंगे। राहुल गांधी के साथ अनपब्लिशड बुक (अप्रकाशित पुस्तक ) व निशिकान्त दुबे की पब्लिश्ड बुक  (प्रकाशित पुस्तक ) के चक्कर में जो भी हंगामा हुआ। वह हर समाचार सुनने वाले के कान में गूँजता ही होगा। आज हम इस विषय वस्तु पर ही अपने को केन्द्रित करते हैं। आज का विषय पब्लिश्ड बुक और अनपब्लिश्ड बुक के बारे में विवेचन करना है ।

अन पब्लिश्ड बुक (अप्रकाशित पुस्तक) की विशेषताएं

01 – मूल पाण्डुलिपि स्तर / Original Manuscript Levels

02 – विश्वसनीयता सन्दिग्ध / Questionable Authenticity

03 – प्रक्रियाधीन व आंशिक पूर्णता / In Process and Partially Completed

04 – गोपनीय / Confidential

05 – स्वीकृत व अस्वीकृत स्तर प्रकाशक पर निर्भर / Accepted or Rejected (Dependent on Publisher)

06 – सीमित दायरा /limited scope

07 – शब्दों की कच्ची मूर्ति / Raw sculpture of words

08 – परिवर्तन की बहुत सम्भावना / Great possibility of change

09 – कल्पना प्राबल्य / Imagination prevails

10 – प्रकाशन की चाहत / Desire to publish

पब्लिश्ड बुक (प्रकाशित पुस्तक) की विशेषताएं –

01 – अन्तर्राष्ट्र्रीय मानक पुस्तक संख्या / ISBN (INTERNATIONAL STANDERD BOOK NUMBER)

02 – बौद्धिक सम्पदा व कॉपी राइट / Intellectual Property and Copyright

03 – विशेषज्ञों द्वारा प्रूफ रीडिंग / Proofreading by Experts

04 – भाषा शैली का गहन निरीक्षण / In-depth Inspection of Language Style

05 – व्यवस्थित व्यस्थापन / Systematic Arrangement

06 – सम्यक मिश्रण (मार्जिन, फुटर, हैडर, सम्यक फॉण्ट) / Proper mix (margins, footers, headers, appropriate fonts)

07 – व्यापक परिक्षेत्र / Broad Scope

08 –  क्रमबद्धता / Serialization

09 – कवर डिजाइनिंग / Cover Designing

10 – बिकाऊ उत्पाद / Merchandise

उक्त सम्पूर्ण विवेचन यह स्पष्ट करता है कि अप्रकाशन से प्रकाशन का सफर एक लेखक की जिन्दगी में बहुत ऊहापोह से भरा होता है। ऐसा लगता है जैसी कल्पना यथार्थ के धरातल पर उतर आई हो। यथार्थ अवलम्बित रचनाएं कुछ मसाला लपेटकर पाठकों को अलग आनन्द प्रदान करती हैं। कुछ रचनाएं बाजार को ध्यान में रखकर लिखी जाती हैं और कुछ लेखक के मन की झांकी हुआ करती हैं।

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विविध

What to do?, what not to do?

February 3, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

क्या करें ?, क्या न करें ? What to do?, what not to do?

आज का भारतीय युवा उस दोराहे पर खड़ा है जहाँ उसका चिन्तन दिग्भ्रमित हो गया है। जहाँ हमारे कुछ बच्चे क्रिस्टल क्लियर सोच रखते हैं तो कई तरह तरह के विकल्प का अध्ययन कर्व ऊहापोह की स्थिति में हैं। इस स्थिति में यह जानना भी परम आवश्यक है के वे क्या करें और क्या न करें ?

क्या करें ? / What to do ?

01 – डिजिटल ज्ञान के साथ शिक्षा / Education with Digital Knowledge

02 – स्वयं में कौशल विकास / Self-Skill Development

03 – बाजार की मांग अनुरूप तकनीकी ज्ञान -रोबोटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलीजेन्स, मशीन लर्निंग  

Technical knowledge relevant to market demand – Robotics, Artificial Intelligence, Machine Learning

04 – स्वास्थ्य विकास /Health Development

05 – सामाजिक दायित्व निर्वहन / Social Responsibility

06 – मौलिक शोध कार्य / Original Research Work

07 – रचनात्मक कार्य / Creative Work

08 – उद्द्यम शीलता विकास Entrepreneurship Development

09 – नवाचार / Innovation

10 – राष्ट्रहित के सृजनात्मक कार्य / Creative work for the national benefit

क्या न करें ? / What not to do?

01 – गलत सङ्गत / wrong association

02 – नशा / Addiction

03 – अपर्याप्त निद्रा /Insufficient sleep

04 – तात्कालिक लाभ प्रयास /Immediate Profit Effort

05 – अधैर्य / Impatience

06 – समय की बरबादी / Wasting time

07 – लक्ष्य हीनता / Aimlessness

08 – गलत आहार /Bad diet

09 – अन्धानुकरण / Blind imitation

10 – आत्महीनता /Self-deprecation

                आशा ही नहीं विश्वास है कि उक्त तथ्य दिशा निर्धारण में सहायक सिद्ध होंगे। 

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विविध•समाज और संस्कृति

बसन्त पञ्चमी

January 22, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बसन्त पञ्चमी के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म ग्रन्थों में कई कथाएं प्रचलित हैं भगवान शिव की सगाई के दिन के रूप में यह वर्णित है। कुछ कथाएं इसे पृथ्वी पर जीवन की शुरआत का दिन मानती हैं लेकिन माघ मास की इस पञ्चमी को अधिकांशतः सरस्वती पूजा अर्थात माँ शारदे की आराधना का दिवस माना जाता है। प्राचीन समय से ही ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के जन्म दिवस या प्रागट्य दिवस के रूप में मनाते हैं।

बसन्त पञ्चमी का समय व शुभ मुहूर्त –

बसन्त पञ्चमी इस बार 23 जनवरी 2026 को मनाई जायेगी क्यों कि बसन्त पञ्चमी  तिथि की शुरुआत 22 जनवरी 2026 यानी गुरुवार की रात 1 बजकर 30 मिनट से प्रारम्भ होगी और 23 जनवरी की रात 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगी. इसीलिए उदय तिथि के अनुसार शुक्रवार को ही मां सरस्वती की पूजन करना शुभ माना जाएगा।

विविध क्षेत्रों में बसन्त पञ्चमी –

माँ शारदे की आराधना, पूजा का यह दिवस इस विविधता वाले देश में अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में विवाहोपरान्त पहली बसन्त पञ्चमी के दिन विवाहित जोड़ा पीत वस्त्र धारण कर मन्दिरों में जाते हैं। पंजाब में इस दिन पतङ्ग उड़ाई जाती हैं और पतंग उत्सव मनाते हैं पीले चावल बना कर खाते हैं सिख बन्धु पीले रंग की पगड़ी भी पहनते हैं। बिहार प्रान्त में भगवान मार्तण्ड अर्थात सूर्य देव की मूर्ति की स्थापना की गई, इस दिन सूर्य पूजन दिवस के रूप में पूर्ण साजसज्जा व उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल में विधिवत मूर्ति स्थापित कर पूर्ण श्रद्धा से मनाई जाती है शेष परिक्षेत्र में भी विधिवत मान शारदे की उपासना होती है। कतिपय लोग भगवान शिव की आराधना करने के साथ इस दिन विवाह का विशिष्ट दिन मानते हैं। मुस्लिम समुदाय के सूफी सन्त भी इस दिन को विशेष दिन मानते हैं। चिश्ती वंश के मुस्लिम सूफी सन्त इस दिनदिल्ली की प्रसिद्द निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करते हैं।

बसन्त पञ्चमी मनाने का ढंग –

विद्या, बुद्धि, वाणी की शुद्धता, स्मरण शक्ति और कलाओं में सिद्धि हेतु इस दिन माँ की आराधना करते हैं इस वर्ष अभिजित मुहूर्त: प्रात:काल 11:53 से दोपहर 12:38 बजे तक है। इस दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि के उपरांत स्वच्छ धवल या पीत वस्त्र धारण करे जाते हैं यहाँ तक की आसन भी इसी रंग का लेना विशेष शुभ माना जाता है। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर सङ्कल्प लेते हैं। सामान्यतः इस मन्त्र से मान शारदे का आवाहन होता है –

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।

उक्त ध्यान मंत्र के सस्वर वाचन उपरान्त मां शारदे को पुष्प, रोली, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, अर्पित किया जाता है।

तदोपरान्त वाग्देवी के श्री चरणों में पुस्तक, कलम, कला साधन व वाद्य यंत्रों आदि को रखकर वन्दन करते हैं 

मां सरस्वती को फल, पुष्प व नैवेद्य अर्पण करने के बाद पुनः  ​‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः‘, अथवा ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः ‘मंत्र का जप करें.

बसन्त पञ्चमी के  दिन मां सरस्वती की आरती के बिना  उनकी पूजा अधूरी रहती है, इसलिए माँ शारदे की आरती अवश्य की जानी चाहिए।

बसन्त पञ्चमी का दिन गीत, संगीत, नृत्य, लेखन तथा कला साधना के प्रारम्भ हेतु अत्यंत ही शुभ और फलप्रदाता माना जाता  है. नवीन कार्यों की शुरुआत व मांगलिक कार्य हेतु  भी बसंत पंचमी का दिन शुभ माना जाता है.इस दिन विद्यार्थी अध्ययन हेतु उपयोगी वस्तुओं का दान देते हैं और माँ शारदे का आशीष लेते हैं। पीले वस्त्र धारण करते हैं पीले पुष्प चढ़ाना अच्छा माना जाता है प्रकृति भी अपना पीला श्रृंगार करती है सरसों के पुष्प प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं। बासन्ती मिष्ठान आज का प्रमुख प्रसाद रहता है। केसर हलवा विशेषतः इस दिन प्रमुखता से खाया जाता है।

अन्त यह कहना समीचीन होगा कि यदि कर्मकाण्ड पूर्ण न भी हो पाएं और सच्चे मन से मान शारदे के ध्यान के साथ दृढ़ संकल्पित होकर साधना में पूर्ण मनोयोग से तत्पर होते हैं तो यह दिवस विशेष फल प्रदाता है। बसन्त पञ्चमी  पर्व के आगमन के साथ खेतों में सरसों, गेहूं आदि फसलें लहलहाने लगती हैं. प्रकृति में इस कालखण्ड में नवजीवन, उल्लास और सौंदर्य का संचरण होता है. सनातन हिन्दू धर्म में पीला रंग चाहे हल्दी का हो या सरसों का, बसन्त का प्रतीक माना जाता है. यह रंग विद्या की देवी मां शारदे को भी अत्यन्त प्रिय है. इसी  कारण बसन्त पञ्चमी महापर्व पर लोग विशेष रूप से पीले परिधान धारण कर पीले ही व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हैं।

    

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विविध•शिक्षा

TEACHING STRATEGY

January 12, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रश्न – शिक्षण व्यूह रचना से  समझते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। शिक्षण व्यूह रचनाओं के प्रकार बताइए।

Question – What do you understand by teaching strategy? Describe its main characteristics. Explain the types of teaching strategies.

शिक्षण व्यूह रचना से आशय / Meaning of teaching strategy-

शिक्षण व्यूह रचना से आशय शिक्षक द्वारा बनाई गई उस योजना से है जो वह अधिगम को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए बनाता है। रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर शिक्षण व्यूह रचना के बारे में कहा –

“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”

आंग्ल अनुवाद

“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”

शिक्षण व्यूह रचना सचमुच अधिगम को प्रभावी बनाने का कारगर उपाय है। इसी लिए ई स्टॉंस व मौरिस (1972) ने अपनी पुस्तक टीचिंग प्रैक्टिस प्रॉब्लम्स एण्ड पर्स्पेक्टिव्स में कहा –

“शिक्षण व्यूह रचना से तात्पर्य किसी पाठ के शिक्षण हेतु अपनाई गई उस सामान्यीकृत योजना से है जिसमें संरचना, अनुदेशनात्मक उद्देश्यों के रूप में वांछित विद्यार्थी व्यवहार तथा व्यूह रचना को प्रयोग में लाने के लिए आवश्यक युक्तियों की रूपरेखा का समावेश हो।”

“Teaching strategy is a generalized plan for a lesson which includes structure, desired learner behaviour in terms of goals of instruction and an outline of planned tactics necessary to implement the strategy.”

शिक्षण व्यूह रचना की प्रमुख विशेषताएं/ Special features of teaching strategy –   

01 – इसके माध्यम से पाठ के निर्धारित उद्देश्य प्राप्ति सुगम हो जाती है।

02 – शिक्षण व्यूह रचना के माध्यम से अधिगम प्रभावी व विशेष उद्देश्यों के प्रति समर्पित किया जा सकता है।

03 – शिक्षण व्यूह रचना द्वारा अधिगम पूर्ण होता है कोइ अंश छूट नहीं पता।

04 – शिक्षण युक्ति के माध्यम से शिक्षण आव्यूह को सशक्त बनाया जाता है।

05 – इसमें प्रमुख ध्यान अधिगम उद्देश्य की प्राप्ति पर रहता है जो अनुशासन की व्यवस्था स्वयमेव कर देता है।

06 – अलग अलग तरह के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर एक ही पाठ के लिए पृथक शिक्षण व्यूह रचना है।

07 – शिक्षार्थियों द्वारा मिलने वाले पृष्ठ पोषण के आधार पर शिक्षण व्यूह रचना में परिवर्तन किया जाता है। 

08 – इसका लचीलापन इसे विविध परिस्थितियों में सफल बनाता है।

09 – इसमें शिक्षार्थी, शिक्षण अधिगम उद्देश्य व शिक्षण व्यूह रचना का व्यावहारिक संतुलन दृष्टव्य होता है।

10 – इसमें आवश्यकता, रुचियाँ, अधिगम परिस्थितियों और सुविधाओं का सम्यक सम्मिश्रण मिलता है।  

शिक्षण व्यूह रचना के प्रकार / Types of teaching strategies –

भारत में अध्यापन एक परम पवित्र कार्य है इसकी व्यूह रचना जिस तरह की जाती है उसमें देखा जा सकता है एक में अध्यापक अधिनायक की तरह से कार्य करता दीखता है और दूसरे में व्यूह रचनाएं जनतांत्रिक रूप से किया जाता है दोनों आधार पर बनने वाली विविध व्यूह रचनाओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

[A ] – अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचनाएं –

01 – व्याख्यान व्यूह रचना / Lecture Strategy

02 – वर्णन व्यूह रचना / Narrative Strategy

03 – विवरण व्यूह रचना / Description Strategy

04 – व्याख्या व्यूह रचना / Explanation Strategy

05 – प्रदर्शन व्यूह रचना / Demonstration Strategy

06 – ट्यूटोरियल व्यूह रचना / Tutorial Strategy

07 – दृष्टांत व्यूह रचना / Illustrations Strategy

08 – अभिक्रमित अनुदेशन व्यूह रचना / Programmed Instruction Strategy

09 – भूमिका व्यूह रचना / Introduction Strategy

10 – पुनः अवलोकन व्यूह रचना / Review Strategy

11 – स्पष्टीकरण व्यूह रचना / Explanation Strategy

[B] – जनतान्त्रिक शिक्षण व्यूह रचनाऐं / Democratic Teaching Strategies –

01 – सामूहिक चर्चा व्यूह रचना / Group discussion strategy

02 – समस्या समाधान व्यूह रचना / Problem solving strategy

03 – प्रश्नोत्तर व्यूह रचना / Question and Answer Layout

04 – स्वाधीन अध्ययन व्यूह रचना / Independent Study Strategy

05 – ह्यूरिस्टिक अथवा अनुसंधान व्यूह रचना / Heuristic or Research Strategy

06 – परियोजना व्यूह रचना /  Project Strategy

07 – भ्रमण व्यूह रचना / Tour Strategy

08 – दत्त कार्य व्यूह रचना / Assignment Strategy

09 – भूमिका निर्वाह व्यूह रचना / Role Play Strategy

10 – अभ्यास कार्य व्यूह रचना / Practice Strategy

11 – दृश्य श्रव्य साधन उपयोग व्यूह रचना / Strategy for using audio-visual aids

12 – संवेदना प्रशिक्षण व्यूह रचना / Sensory Training Strategy

13 – मस्तिष्क उद्वेलन व्यूह रचना / Brain Stimulation Strategy

14 – कम्प्यूटर सह – अनुदेशन व्यूह रचना / Computer Assisted Instruction Strategy

उक्त सम्पूर्ण व्यूह रचनाएं यह उद्घोषणा करती हैं कि शिक्षा को समय के साथ चलने के लिए इन व्यूह रचनाओं का सम्यक प्रयोग आवश्यक है और प्रशिक्षण महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे सूक्ष्म शिक्षण की तरह तैयारी करानी होगी।     

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विविध•शिक्षा

LECTURE STRATEGY

January 10, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

व्याख्यान व्यूह रचना

भारत में व्यूह शब्द आते ही अभिमन्यु का स्वाभाविक ध्यान आता है जो चक्र व्यूह का अन्तिम द्वार तोड़ने में इस लिए असफल रहा क्योंकि उसको भेदन का ज्ञान मिल नहीं पाया था ठीक इसी तरह यदि अध्यापक शिक्षण अधिगम को प्रभावी बनाना चाहता है तो सही व्यूह रचना परम आवश्यक है अपने उद्देश्य के साथ सम्पूर्ण तत्सम्बन्धी ज्ञान उसके पास होता है एक सही व्यूह रचना उसे अवश्य उद्देश्य प्राप्ति में सफल बनाएगी।

रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर बताया –

“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”

आंग्ल अनुवाद

“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”

व्याख्यान व्यूह रचना से आशय / Meaning of lecture strategy –

 आदिकाल से भारत में इस व्यूह रचना का प्रयोग होता रहा है पहले गुरु चबूतरे पर बैठकर और शिष्य भूमि पर बैठ कर इसका लाभ लेते रहे हैं। आज विद्यार्थी बैठ कर और अध्यापक खड़े होकर इस व्यूह रचना का लाभ लेते हैं। यद्यपि इसकी गणना अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचना के तहत आती है लेकिन इसके माध्यम से सम्पूर्ण अधिगम परिक्षेत्र से शिक्षार्थी का परिचयीकरण ही नहीं बल्कि साक्षात्कार हो जाता है और वे अपनी पात्रता के अनुसार उसे अधिगमित करते हैं। व्याख्यान व्यूह रचना एक महत्त्वपूर्ण व्यूह रचना है इस सम्बन्ध में रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकीके 2014 के संस्करण में पृष्ठ 243 पर बताया –

“व्याख्यान व्यूह रचना से अभिप्राय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाये जाने वाले ऐसे प्रारूप या कार्य योजना से है जिसके द्वारा वह किसी विषय विशेष के एक अंश या इकाई को इस प्रकार प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है ताकि विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक एवं भावात्मक व्यवहार से सम्बन्धित विशिष्ट शिक्षण अधिगम उद्देश्यों की उपलब्धि ठीक प्रकार की जा सके।”

“Lecture strategy” means a format or plan of action designed and used by a teacher. By which he tries to present a part or unit of a particular subject in such a way So that specific teaching-learning objectives related to the cognitive and emotional behaviour of students can be achieved properly.”

व्याख्यान व्यूह रचना से लाभ / Benefits of Lecture Strategy –

वह व्यूह रचना जो तमाम आलोचनाओं से जूझ कर अधिगमार्थियों व शिक्षाविदों को लाभ दे रही है उसके लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

01 – शिक्षण गतिविधियों पर स्वइच्छानुसार अंकुश / Voluntary control of teaching activities

02 – सृजनात्मकता, विश्लेषण व मूल्याङ्कन हेतु सम्यक चिंतन का विकास / Developing critical thinking for creativity, analysis, and evaluation

03 – मितव्ययी व्यूह रचना / Economical strategy

04 – प्रेरणात्मक वातावरण सृजन में सहयोगी / Helps create an inspiring environment

05 – लचीलापन / Flexibility

06 – विचारों, अवधारणाओं की श्रंखलाबद्ध प्रस्तुति सम्भव / Performs a systematic presentation of ideas and concepts

07 – तार्किक नियोजन / Logical planning

08 – व्यक्तित्व के गुणों की छाप छोड़ना सम्भव / It is possible to leave an impression of personality traits

09 – व्यवहार के भावात्मक पक्ष को सकारात्मक दिशा देना सम्भव / It is possible to give positive direction to the emotional aspect of behavior

व्याख्यान व्यूह रचना की सीमाएं  / Limitations of Lecture Strategy –

01 – उद्देश्य प्राप्ति नज़र अन्दाज / Neglecting objective achievement –

02 – रूचि, आवश्यकता व योग्यता स्तर का ध्यान नहीं / Not considering interest, need, and ability levels

03 – एक पक्षीय सम्प्रेषण / One-sided communication

04 – प्रयोगात्मक कौशलों व क्रियात्मक गतिविधियों का अभाव / Lack of practical skills and hands-on activities

05 – केवल शाब्दिक सम्प्रेषण की सफलता सन्दिग्ध / The success of verbal communication alone is questionable.

06 – शिक्षण अधिगम से अर्जित अनुभव के प्रयोगीकरण का अभाव / Lack of application of teaching-learning experience.

07 – अपूर्ण व त्रुटिपूर्ण ज्ञान सम्प्रेषण सम्भव / Incomplete and inaccurate knowledge transmission is possible

08 – पुनरावृत्ति व विषय से भटकाव / Repetition and distraction

09 – आवश्यक तैयारी व कुशल सम्प्रेषण का अभाव / Lack of necessary preparation and effective communication

10 – स्मृति स्तर को चिन्तन स्तर से प्रभावी मानना / Believing the memory level as more effective than the thinking level 

व्याख्यान व्यूह रचना को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सुझाव / Suggestions for making Lecture Strategy more effective –

यदि हम सम्पूर्ण व्याख्यान को उसके अलग अलग हिस्सों में बांटे तो यह स्पष्ट होगा कि व्याख्यान में नियोजन, प्रस्तुतीकरण और मूल्याङ्कन के रूप में तीन महत्त्वपूर्ण चरण समाहित हैं। इसलिए इस प्रत्येक चरण में सुधार अपेक्षित होंगेजिन्हे इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है। –

[A] – नियोजन सम्बन्धी सुझाव / Planning tips

01 – पूर्व ज्ञान व विषय वस्तु का सम्बन्ध विवेचन।/ Analysis of the relationship between prior knowledge and subject matter

02 – स्पष्ट उद्देश्य निर्धारण / Crystal Clear objective setting;                             

03 – अधिगम स्तर आधारित सम्प्रेषण / Learning level based communication

04 – विषय वस्तु पर अधिकार / Mastery of the subject matter

05 – आत्मविश्वास युक्त सम्प्रेषण / Confident communication

06 – विविध विश्वसनीय ज्ञान स्रोतों से विषयवस्तु का चयन / Selecting content from a variety of reliable knowledge sources

07 – अधिगम -शिक्षण प्रभावी वातावरण सृजन / Creating an effective learning – teaching environment

08 – रूचि, ध्यान, उत्साह का सम्यक सृजन / Properly cultivate interest, attention and enthusiasm.

09 – विविध विधियों व सहायक साधनों का सम्यक प्रयोग / Properly utilize various methods and aids.

[B] – प्रस्तुतीकरण सम्बन्धी सुझाव / Presentation tips –

01 – प्रभावी अधिगम हेतु निरन्तर सजगता व क्रियाशीलता / Constant alertness and activity for effective learning

02 – उत्साहयुक्त प्रभावी सम्प्रेषण / Enthusiastic and effective communication

03 – क्रमबद्ध व तार्किक आधार / Systematic and logical approach

04 – अधिगम उद्देश्यों पर विशेष ध्यान / Focus on learning objectives

05 – सार्वजनिक संबोधन प्रणाली का उपयोग /use of public address system

06 – आवश्यकतानुसार विविध विधियों का प्रयोग / Use a variety of methods as needed

07 – नवीनतम श्रव्य दृश्य साधनों का प्रयोग / Use the latest audio-visual aids

08 – आवश्यकतानुसार साझेदारी का प्रयोग / Use partnerships as needed

09 – महत्त्वपूर्ण तथ्य व सूचना सम्प्रेषण का रेखाङ्कन / Outline of important facts and information communication

10 – पुनरावृत्ति व भटकाव से सावधान / Beware of repetition and deviation

[C]– मूल्याङ्कन हेतु सुझाव /Evaluation Tips –

01 – स्व सम्प्रेषण मूल्यांकन / Self-Communication Assessment

02 – अधिगम स्तर उन्नयन मूल्याङ्कन/ Learning Level Improvement Assessment

03 – व्याख्यान आधारित अधिगम मूल्यांकन / Lecture-Based Learning Assessment

04 – पक्षपात रहित सम्यक प्रश्न वितरण / Fair, Unbiased Question Distribution

05 – उद्देश्य आधारित मूल्यांकन / Objective-Based Assessment

06 – पृष्ठ पोषण के निर्देशों पर ध्यान / Follow nutrition guidelines

07 – प्रश्नावली या मौखिक प्रश्नों द्वारा / Through questionnaires or oral questions

08 – सतत स्व आलोचनात्मक मूल्यांकन / Continuous self-critical assessment

प्रस्तुत समस्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी कौशल या व्यूह रचना में निरन्तर परिमार्जन की गुन्जायिश बनी रहती है लेकिन अपनी सजगता से इसे काफी प्रभावी बनाया जा सकता है नए सम्प्रत्ययों, विश्वसनीय सूचनाओं, आगामी जानकारियों और नवीनतम ज्ञान का प्रयोग कर व्याख्यान को निरंतर समृद्ध करने की आवश्यकता हमेशा रहेगी। निरन्तर छोटे तथ्यों नवीनतम ज्ञान व तार्किक क्रमबद्ध सम्प्रेषण द्वारा व्याख्यान और प्रभावी बन पड़ेगा। आवश्यकता है विविध परिस्थितियों में सम्यक समायोजन की। 

  

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विविध

चित्रगुप्त पूजा / CHITR GUPT POOJA

October 27, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

(वर्तमान परिप्रेक्ष्य में समय से कदम ताल करता धार्मिक अनुष्ठान)

चित्रगुप्त पूजा हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। यह पर्व मुख्य रूप से कायस्थ समाज द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। वर्ष 2025 में चित्रगुप्त पूजा 23 अक्टूबर 2025 (गुरुवार) को मनाई जाएगी। यह तिथि कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की द्वित्तीया तिथि के दिन आती है। इस वर्ष दोपहर 1 बजकर 13 मिनट से दोपहर 3 बजकर 28 मिनट तक है सामान्यतः समय के स्थान पर दिन में सूर्योदय के बाद सभी समय शुभ माना  जाता है। इस दिन लोग भगवान चित्रगुप्त जी की पूजा कर अपने कर्मों के प्रति सजग रहने और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लेते हैं।

चित्रगुप्त पूजा क्यों ?

पौराणिक धार्मिक मान्यता के अनुसार, चित्रगुप्त को यमराज के सचिव के रूप में जाना जाता है। वे प्रत्येक मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के सभी कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। मृत्यु के बाद इसी आधार पर व्यक्ति को स्वर्ग या नरक प्राप्त होता है। माना जाता है कि चित्रगुप्त जी कलम और दवात के प्रतीक हैं, इसलिए इस दिन लेखनी की पूजा भी की जाती है। छात्र, व्यापारी और नौकरीपेशा लोग नए खाते-बही की शुरुआत करते हैं। आजकल विविध विद्वत समाज इस दिन अपने कम्प्यूटर, लैपटॉप, कार्य में प्रयुक्त अन्य संसाधन यथा मोबाइल या अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामान, डायरी, समय सारिणी और इस वर्ष निर्धारित ध्येय को लिखकर पूर्ण करने हेतु चित्रगुप्तजी के समक्ष रखकर पूर्ण श्रद्धा से पूर्ण करने की शपथ लेते हैं और अपने को कार्य सिद्धि के अनुरूप बनाने का प्रयास करते हैं। आज आत्मबल को अध्यात्म का विशिष्ट सम्बल प्राप्त होता है। आगामी क्रियान्वयन की सम्पूर्ण रूप रेखा के साक्षी भगवान् चित्र गुप्त व साधक स्वयं होता है। इसे अद्यतन पूजन में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। इसी कारण समय से कदमताल करते हुए अभीष्ट लक्ष्य प्राप्ति सुगम हो जाती है आडम्बर से मुक्त यह संकल्प को दृढ करने का बविषिष्ट अवसर है।  

पूजा का महत्व और विधि

इस दिन परिवारजन मिलकर घर में चित्रगुप्त जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करते हैं। कलम, दवात, कागज तथा लेखा-बही को साफ करके पूजा की जाती है। फिर प्रसाद चढ़ाया जाता है और सब लोग धर्म परायणता और ईमानदारी से कर्म करने की प्रतिज्ञा लेते हैं। प्रसाद का सेवन करते हुए भी अपने संकल्प को अधिक दृढ़ बनाने हेतु तत्परता व यथार्थ आधारित निर्णय को मनो मष्तिष्क में स्थापित करते हैं। ज्ञान के महत्त्व को सभी के द्वारा पूर्ण मनोयोग से स्वीकारा जाता है। यथार्थ आधारित कार्य योजना का निर्माण, अवलम्बन व व्यावहारिक उपयोग आज से ही शुरू किया जाता है जीवन के विविध क्षेत्रों में प्रगति हेतु अपने मंतव्यों और गंतव्यों को क्रिस्टल क्लियर मानस में स्थापित किया जाता है।

अधो वर्णित क्रियाओं व संकल्पों की वजह से इस पूजन का महत्त्व आधुनिक काल में सर्व स्वीकार्य बन जाता है –

01- कलम, दवात, कागज़ जैसे परम्परागत साधन के साथ प्रगति सहयोगी लैपटॉप अद्यतन लेखन साधन, इलेक्ट्रॉनिक संसाधन बोर्ड आदि को श्रद्धा के दायरे में लाना।   

02 – अपने साथ, अपने परिवार व समाज को इस आध्यात्मिक धार्मिक अनुष्ठान में शामिल करना। 

03 – पूजन में सभी वैचारिक साम्य वाले लोगों का यथा योग्य आगमन स्वीकार्य।

04 – निकृष्टतम विचार व लोगों से दूरी व ध्येय के प्रति पूर्ण समर्पण भाव।

05 – विगत अनुभवों के आधार पर भविष्य में प्रगति के विविध सोपानों पर विश्लेषणात्मक अध्ययन व निष्कर्ष।

06 – यथार्थ अवलम्बित कार्य योजना

07 – अध्ययन, अधिगम व नवीन कौशल के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण व स्वयं के साथ समायोजन। 

08 – अध्यात्म व धार्मिक इस अनूठे आयोजन के समय विगत हारों को मानते हुए प्रगति का दृढ सुनिष्चयीकरण।

09 – सकारात्मकता को स्व व्यक्तित्व का अनिवार्य आवश्यक अंग बनाना।

10 – व्यसनों से दूरी व लक्ष्य के प्रति पूर्ण समर्पण। 

चित्रगुप्त पूजा न केवल आध्यात्मिक, धार्मिक उत्सव है, बल्कि यह सत्य, न्याय और जिम्मेदारी का प्रतीक भी है। इस दिन लोग अपने पिछले कर्मों पर विचार करते हैं और बेहतर भविष्य के लिए संकल्प लेते हैं।

ऊँ श्री चित्र गुप्ताय नमः।

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद दुःख भाग्भवेत।

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विविध

रक्षा बन्धन

August 8, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

रक्षा बन्धन

सन् 2025 में वैदिक पञ्चाङ्ग के अनुसार 09 अगस्त को रक्षा बन्धन पर्व मनाया जाएगा। श्रावण माह की पूर्णिमा 08 अगस्त को दोपहर 12 बजे से शुरू होगी और 09 अगस्त को अपरान्ह एक बजकर चौबीस मिनट पर समाप्त होगी।

रक्षा बन्धन पर्व का प्रारम्भ –

प्राचीन लोकप्रिय कथाओं में वर्णन मिलता है कि द्रोपदी ने भगवान् कृष्ण की घायल हो चुकी अँगुली पर अपनी साड़ी की एक चीयर बाँध दी। मातृ शक्ति द्रौपदी के इस भाव व्यवहार से प्रभावित होकर सोलह कला सम्पूर्ण भगवान् श्री कृष्ण ने उनकी रक्षा का वचन दिया और निर्वहन किया। इसी समय से इस परम्परा का प्रारम्भ हुआ।

दुर्लभ महा संयोग –

इस बार रक्षा बन्धन पर भद्रा का साया नहीं है। और 95 वर्ष के उपरान्त सौभाग्य योग के साथ अन्य कई मङ्गलमई योग बन रहे हैं। इसलिए इसे विशेष शुभ मन जा रहा है। इस बार रक्षा बन्धन को उत्तम मानने का एक कारण यह भी है कि इस दिन श्रवण नक्षत्र होगा चन्द्रमा मकर राशि में होंगे जिसके स्वामी भी शनि हैं अतः त्रियोग (श्रवण + शनिवार + शनि ) अत्यन्त लाभकारी व शुभ बन पड़ेगा। सर्वार्थ सिद्धि योग व द्वि पुष्कर योग का भी निर्माण हो रहा है। धनिष्ठा नक्षत्र के साथ सौभाग्य योग व शोभन योग का शुभ संयोग भी देखने को मिलेगा। निश्चित समयावधि में राखी बाँधने व लक्ष्मी नारायण की उपासना करने से साधक को विशिष्ट अक्षय फल की प्राप्ति होगी तथा घर में खुशहाली, समृद्धि और सुख की वृद्धि होगी।

राखी बाँधने के परम्परागत नियम –

हर साल श्रावण माह की पूर्णिमा को यह भाई बहन का पावस पर्व रक्षा बंधन मनाया जाता है तिथि का प्रारम्भ होने पर जिस दिन सूर्योदय होता है उस दिन उड़ाया तिथि के अनुसार यह पर्व भी मनायेंगे। सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान ध्यान व भगवान् को राखी अर्पित करने के बाद इसे परम्परागत रूप से मनाने के लिए कुछ नियमों का परिपालन करना शुभ स्वीकार किया जाता है।

01 – बहिन भाई की दाहिनी कलाई पर पावस कच्चे धागे को बाँधती है और सामान्यतः इसमें तीन गाँठें लगाना शुभ माना जाता है प्रथम गाँठ लगाते समय भाई की लम्बी उम्र ,द्वित्तीय गाँठ लगाते समय स्वयं अपनी लम्बी उम्र व तृतीय गाँठ लगाते समय रिश्तों में दीर्घकालिक मिठास की कामना की जाती है।

02 – तिलक लगाने  के सम्बन्ध में नियम यह है कि अनामिका अँगुली से ललाट पर शुभ तिलक लगाने के उपरान्त उसे अंगूठे से ऊँचा किया जाता है तत्पश्चात अक्षत लगाकर भाई की दीर्घायु की कामना बहिन करती है जीवन में मिठास घुली रहे यह मानकर मिष्ठान्न से भाई का मुँह मीठा कराती है इसके बाद भाई अपनी क्षमतानुसार बहिन को उपहार प्रदान करते हैं। 

03 – दिशा के सम्बन्ध में कहा जाता है कि रक्षा सूत्र बांधते समय बहिन का मुख पश्चिम की और होना शुभ स्वीकार किया जाता है जबकि भाई का मुख यदि उत्तरपूर्व की और रहे तो यह सम्यक व शुभ स्वीकार किया जाता है। बहुत से घरों में दिशा सम्बन्धी नियमों को दृढ़ता से परिपालन सुनिश्चित किया जाता है।

04 – देशी घी के दीपक से भ्राता की आरती का भी विधान है अन्त में छोटी बहने बड़े भाई से आशीष की कामना करती हैं और छोटे भाइयों को बड़ी बहनों से आशीष लेना चाहिए।

(कुछ स्थानों पर क्रिया विधि व विश्वासों में अंतर भी होता है )

ब्राह्मण देवता द्वारा अपने यजमानों को रक्षा सूत्र बांधते समय इस मन्त्र का उच्चारण सामान्यतः किया जाता है –

ऊँ  “येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:। तेन त्वाम् प्रतिबद्धनामि रक्षे माचल माचल।।”

 इसका आशय है कि जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवों के राजा बलि को बांधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुम्हें बांधता हूं, हे रक्षे! तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो।

आप सभी को रक्षा बंधन का पावन पर्व शुभ हो जीवन में मङ्गल ही मङ्गल हो। यही पावस शुभेक्षा है।

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