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शिक्षा•शोध

META PHYSICS AND EDUCATION

December 21, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा

ब्रह्माण्ड के यथार्थ स्वरुप और उसमें मनुष्य के जीवन की तात्त्विक विवेचना तत्त्व मीमांसा के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसी के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य और उनकी प्राप्ति के उपाय विवेचित किये जाते हैं और इस आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि जीवन दर्शन के आधार पर समाज के उद्देश्य निर्धारित होते हैं जिन्हें शिक्षा अपना उद्देश्य बना लेती है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षा के विविध अंग सहयोग करते हैं इसीलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण विधि , शिक्षक, विद्यार्थी, अनुशासन सभी जीवन दर्शन के आलोक में क्रियान्वित होते हैं। अतः यह पूर्णतया स्पष्ट है कि इन सभी शिक्षा के अंगों का विकास तत्त्व मीमांसा के आधार पर होता है।

विविध दर्शन की तात्त्विक विवेचना हमें बताती है कि विविध दर्शन चाहे वह आदर्शवाद, प्रकृतिवाद,  प्रयोजनवाद, अस्तित्ववाद कोई भी हो। तत्त्व मीमांसा में उसकी व्याख्या का प्रभाव इनके शैक्षिक उद्देश्यों व इसके अन्य अंगों पर पड़ता है जिसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

तत्त्व मीमांसा और शिक्षा के विविध घटक

Metaphysics and various components of education

शिक्षा के विविध घटकों की तत्त्व मीमांसात्मक विवेचना निम्न शिक्षा के उद्देश्य स्व आलोक में प्रस्तुत करती दीख पड़ती है –

A – शिक्षा के उद्देश्य –

01 – शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य / Social objectives of education – सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा इस प्रकार करती है जिससे मानव समाज से सामंजस्य बिठाकर समाज ,राज्य, राष्ट्र सबकी प्रगति में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। बॉसिंग महोदय कहते हैं कि

“The function of education is concerned to be the adjustment of man to environment and that the most enduring satisfaction may accrue (अक्रू= अर्जित) to the individual and to the society.”

“शिक्षा का कार्य मनुष्य को पर्यावरण के अनुरूप ढालना है और यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति और समाज दोनों को ही सबसे स्थायी संतुष्टि प्राप्त हो।”     

02 – व्यक्तित्त्व का पूर्ण विकास / Complete development of personality – शिक्षा के द्वारा समग्र क्षमताओं का सम्यक विकास होना चाहिए जैसा कि गांधीजी ने कहा –

“By education I mean an all round drawing out of the best in child and man – body, mind and spirit.”

“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के भीतर की सर्वोत्तम विशेषताओं – शरीर, मन और आत्मा – को समग्र रूप से बाहर निकालना है।”

03 – चारित्र, ज्ञान व स्वस्थ आदतों का विकास /Development of character, knowledge and healthy habits. – इस तरह के विकास से सामान्यतः सभी दार्शनिक सहमति रखतेहैं जैसाकि ड्रेवर महोदय का विचार है –

“Education is a process in which and by which the knowledge, character and behavior of the young are shaped and molded.”

“शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा युवाओं के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को आकार दिया जाता है।”

04 – पूर्ण जीवन की तैयारी का उद्देश्य / The purpose of preparing for a fulfilling life –

हर्बर्ट की तरह कई विद्वान् पूर्ण जीवन की तैयारी पर बल देते हैं जैसाकि डीवी महोदय ने भी कहा –

“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”

“शिक्षा व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने परिवेश को नियंत्रित करने और अपनी संभावनाओं को पूरा करने में सक्षम बनाएंगी।”

05 – समग्र व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य / Aim for holistic personal development – बालक में निहित गुणों के विकास की बात विविध दर्शन करते हैं इन्ही विचारों से सहमति जताते हुए विवेका नन्द जी कहतेहैं –

“Education is the manifestation of perfection already in man”

“शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”

06 – सभी स्थितियों में सामंजस्यपूर्णता का उद्देश्य / Aim for harmony in all situations –

जीविकोपार्जन की क्षमता हासिल करना हो या प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को ढालना, शिक्षा और इससे जुड़े दर्शनों की तात्त्विक विवेचना उसे सामंजस्यपूर्ण बनाने पर जोर देती है। जैसा कि रबीन्द्र नाथ टैगोर के इन शब्दों से दृष्टिगत होता है। –

“The highest education is that which does not merely give us information but makes our life in harmony with all existence.”

“सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंज स्यपूर्णबनाती है।”

B- शिक्षा का पाठ्यक्रम / Curriculum of education –

जहाँ आदर्शवादी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के साथ नैतिकता को पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं वहीं प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में स्वानुभव विविध विज्ञान, गणित आदि के स्थापन के साथ इन्द्रिय प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं। प्रयोजनवादी सामाजिक तात्कालिक समस्याओं से सम्बंधित विषयों का चयन करना चाहते हैं।

C – शिक्षण विधियाँ / Teaching methods —

आदर्शवादी – प्रवचन, कहानी कथन, दृष्टान्त, तर्क विधि  

प्रकृतिवादी – स्वानुभव, इन्द्रिय प्रशिक्षण, खेल विधि, भ्रमण द्वारा  

प्रयोजनवादी – करके सीखना, प्रयोगात्मक विधि, अन्वेषण, संश्लेषण, प्रदर्शन

D –   अध्यापक /Teacher —

आदर्शवादी –  आदर्श, विशिष्ट ज्ञानी  

प्रकृतिवादी –  परदे के पीछे / केवल वातावरण बनाने वाला / अधिगम प्रकृति द्वारा 

प्रयोजनवादी –  मित्र व पथ प्रदर्शक

E – शिक्षार्थी / Student   —

आदर्शवादी –  अनुकरण प्रधान, आज्ञा पालक  

प्रकृतिवादी –  स्वेच्छाचारी, प्रकृति अनुगामी   

प्रयोजनवादी – मित्र

F – अनुशासन / Discipline   —

आदर्शवादी –  कठोर अनुशासन, आज्ञा पालक   

प्रकृतिवादी –  प्राकृतिक अनुशासन    

प्रयोजनवादी – स्व अनुशासन

       

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दर्शन

Dr. Radha Krishnan

September 5, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

डॉ ० राधा कृष्णन

(05/ ०9 /1888 – 17 /04/ 1995)

डॉ ० राधा कृष्णन सम्बन्धी सामान्य विविध तथ्य

अध्ययन स्थल -स्कूली शिक्षा बेल्लोर

                    उच्च शिक्षा –मद्रास

विविध कृतियाँ –

1 – The Ethics of Vedant Philosophy- 1908

2 – The Essential of Philosophy -1911

3 – The Philosophy of Rabindr Nath Tagore – 1918

4 – Indian Philosophy (first) -1923

5 – The Hindu view of Life -1926

6 –  Indian Philosophy (Second) -1927

7 – The Religion we need -1928

8 – East and West -1955

9 – Recovery of Ved – 1956

मृत्यु उपरान्त प्रकाशित ग्रन्थ 

1 – Living with Purpose

2 – True Knowledge

कुल 44 ग्रन्थ और 15 व्याख्यान संग्रह प्रकाशित हैं।

कार्य वृत्त –

मद्रास प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्राध्यापक

आन्ध्र विश्व विद्यालय में दर्शन शास्त्र प्रोफेसर

1929 में ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में – ‘तुलनात्मक धर्म ‘ पर व्याख्यान

1931 में आन्ध्र विश्व विद्यालय के उपकुलपति

1931 में ही महामना मदन मोहन मालवीय ने इन्हे बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय के कुलपति के रूप में  नियुक्त किया।

1948 – 49 में विश्व विद्यालय आयोग के अध्यक्ष

1949 में सोवियत रूस में भारत के राजदूत

1952 – भारत के उप राष्ट्रपति

1962 – 67  भारत के राष्ट्रपति

1967 में भारत रत्न की उपाधि

भाषा, धर्म, दर्शन, साहित्य, समाज राष्ट्र की सेवा में रत सरस्वती पुत्र शिक्षक का देहावसान -17अप्रैल  1995 

शैक्षिक चिन्तन (Educational Thought)

प्रथम पुस्तक शिक्षा से सम्बन्धित – EDUCATION, POLITICS AND WALR -1944

शिक्षा के उद्देश्य –

1 – शारीरिक विकास

2 – मानसिक तथा बौद्धिक विकास

3 – चारित्रिक व नैतिक विकास

4 – यथोचित व्यक्तित्व निर्माण

5 – राष्ट्रवाद पोषण – गोखले, तिलक, गाँधी, विवेकानन्द

6 – विश्व कल्याण

7 – आध्यात्मिक उत्कर्ष

शिक्षा के अंगों पर आपका दृष्टिकोण 

1 – पाठ्यचर्या

2 – शिक्षण विधि

3 – अध्यापक

4 – शिक्षार्थी

5 – अनुशासन

विविध

1 -स्त्री शिक्षा

2 – व्यावसायिक शिक्षा

3 – जन शिक्षा

विद्यालय – नीर क्षीर विवेक जाग्रति स्थल

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काव्य

लक्ष्य पर पूरा समर्पण …

July 21, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आचार्य कहता नहीं कि मैं भी रुकना जानता हूँ,

क्योंकि अपने शिष्य का, हर एक  सपना जानता हूँ। 

उसके सपनों में है शामिल हैं उसकी आशाएं सभी,

उसकी आशाओं  में गहरा, रंग  भरना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।1।

हर चमक से दूर रहकर, मैं सिमटना जानता हूँ,

एक कछुए की तरह मैं खुद को ढकना जानता हूँ।

मेरे बच्चों को  लगे ना  इस  जमाने की हवा,

विष भरी हर एक हवा को मैं कुचलना जानता हूँ।  

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।2।

इस जहाँ की गन्दगी से और फिसलन से बचा

लेके जाना है जहाँ पर, मैं वह रस्ता जानता हूँ।

पाश्चात्य की कोशिश है ये, अपनी लय में ले बहा 

कच्चे मन पे शिष्य के सद्कर्म लिखना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।3।

संस्कृति के पतन से,  मूल्य इन्सानी बचा

योग है परिवार का जो, मैं बताना जानता हूँ।

देखकर सारी विकृतियाँ मैं भी घायल हो गया

 की कहाँ गलती जहाँ ने, ये दिखाना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।4।

छा रहा परिवार – वादी, भाव अब नेतृत्व में

मैं जहाँ की स्वार्थपरता लूट फितरत जानता हूँ।

बच्चों के अरमान पर जो छा रहीं हैं अब घटा

उस घटा को मैं हटाकर साफ़ करना जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।5।

क्यों बनी जालिम परिस्थिति क्या है उलझन आपकी

कौन है निर्दोष कितना, मैं यह सब कुछ जानता हूँ।

मोड़ कर गर्दन कलम की, दिग्भ्रमित जिसने किया

काली स्याही फेंकने का, सारा चक्कर जानता हूँ।

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।6।

स्वार्थ परता का दहन हो, हो सृजित निष्ठा का मन

श्रम का प्रतिफल मैं युवा को यूँ  दिलाना जानता हूँ।

स्वार्थ की भट्टी बुझाकर सम्मान श्रम को मिल सके

श्रम कणों का मूल्य हो क्या ‘नाथ’ हूँ यह जानता हूँ।  

ये बता सकता नहीं,  कि थकना कहते है किसे

लक्ष्य पर पूरा समर्पण और मिटना जानता हूँ ।7।

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दर्शन

तार्किक प्रत्यक्षवाद (Logical Positivism) PART-2

March 3, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षा पर तार्किक प्रत्यक्षवाद का प्रभाव (Impact Of Logical Positivism On Education)-

तार्किक प्रत्यक्षवाद ने शिक्षा के उद्देश्यों, पाठ्य क्रम, शिक्षक एवम शिक्षार्थी, शिक्षण विधियों व अनुशासन को स्वानुसार विवेचित किया जिसे इस प्रकार अभिव्यक्त कर सकते हैं।

उद्देश्य ( Aims ) –

चूंकि ये ज्ञान का आधार अनुभव जन्य ज्ञान को मानते हैं इस लिए सार्थक निरर्थक, ज्ञान अज्ञान एवम नीर क्षीर विवेक में समर्थ ज्ञान को शिक्षा के उद्देश्यों में शामिल करना चाहते हैं और भाषा व स्वशक्ति परिमार्जन पर जोर देते हुए इस प्रकार उद्देश्य निर्धारण करते हैं –

[A ]- सृजनात्मक शक्ति का विकास [Development Of Creativity  ]

[B ]- भाषा पर अधिकार [Command on Language] [C ]- शारीरिक विकास व इन्द्रिय प्रशिक्षण [Physical Development and Sensuous Training ] [D ]- विवेक जागरण [ Intellectual Awakening ] [E ]- विश्वसनीयता एवम वैद्यता [Reliability and Validity] [F ]- व्यावसायिक दक्षता [Vocational Efficiency]

पाठ्य क्रम [Syllabus ]- 

इन्होने विचार, अध्यात्म, पूर्व निश्चित नैतिकता का खण्डन कर प्राकृतिक विज्ञानों की सत्यता को सिद्ध कर पाठ्यक्रम हेतु उपयोगी माना। प्रत्यक्ष अनुभव पर अधिक जोर देने के कारण भाषा, व्याकरण, तार्किकता के महत्त्व को स्वीकार किया। 

शिक्षक और शिक्षार्थी [Teacher And Learner]-

ये वैज्ञानिक सोच वाले यथार्थ के धरातल पर खड़े अध्यापकों को शिक्षा प्रसार हेतु आवश्यक मानते हैं शिक्षा को बालकेन्द्रित करते हुए विद्यार्थियों को उनकी रूचि मानसिक योग्यता क्षमता  को ध्यान में रखते हुए शिक्षा प्रदान की जानी चाहिए।

अनुशासन [Discipline ] –

ये  प्रमाणिकता, वस्तुनिष्ठता, यथार्थता, अनुभववादिता, कट्टरता विरोध धार्मिकनैतिकता विरोध का समर्थन कर अनुशासन स्थापित करना चाहते हैं।

शिक्षण विधि [Teaching Methodology ]-

इस दर्शन के आधार पर कहा जा सकता है कि ये इन प्रमुख शिक्षण विधियों के समर्थक हैं। –

(1)-  करके सीखना (Learning By Doing)

(2)-  भाषा विश्लेषण विधि (Language Analytical Method)

(3)-  तार्किक विश्लेषण विधि (Logical Analytical Method)

(4)- विज्ञान प्रयोगात्मक विधि (Scientific Experimental Method)

(5)- प्रत्यक्षीकरण विधि (Observation Method )

(6)- आगमन विधि (Inductive Method )

विद्यालय (SCHOOL)-

ये विद्यालयों में प्रबन्धकों के साथ विद्यार्थियों एवम अध्यापकों को शामिल करना चाहते हैं। ये अधिगम के अनुकूल माहौल बनाने व अनुभव के आधार पर उत्तरोत्तर प्रगति के पक्षधर हैं।

शिक्षा सम्बन्धी  अन्य विचार

(a )-  व्यावसायिक शिक्षा

(b )- महिला शिक्षा

(c )- सर्व जनशिक्षा

(d )- नैतिक शिक्षा

(e )- धार्मिक विचार

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