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समाज और संस्कृति

SOCIAL MOBILITY AND SOCIAL CONTROL IN REFERENCE TO EDUCATIONAL DEVELOPMENT

March 29, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शैक्षिक विकास के सन्दर्भ में सामाजिक गतिशीलता और सामाजिक नियन्त्रण

सामाजिक गतिशीलता / SOCIAL MOBILITY –

जब व्यक्ति के जीवन में गम्भीरता आती है  अपनी योग्यता व क्षमता के आधार पर अपनी सामाजिक स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन करने का प्रयास करता है इस क्रम में एक सामाजिक स्थिति से दूसरी सामाजिक स्थिति में जाने को सामाजिक गतिशीलता कहते हैं यह गतिशीलता क्षैतिजय समतल गतिशीलता हो सकती है या उदग्र या शीर्षात्मक हो सकती है उदग्र गतिशीलता में ही आरोही गतिशीलता हो सकती है या अवरोही गतिशीलता हो सकती है। सामाजिक गतिशीलता को स्पष्ट करते हुए  पी सोरोकिन महोदय कहते हैं। –

“सामाजिक गतिशीलता का अर्थ है -सामाजिक समूहों तथा स्तर के पुंज में किसी व्यक्ति का एक सामाजिक स्थिति से दूसरी समाजिक स्थिति में पहुँच जाना।”

आंग्ल अनुवाद

“Social mobility means the movement of an individual from one social position to another within a set of social groups and strata.”

इसी सम्बन्ध में मिलर और वूक महोदय कहते हैं –

“व्यक्तियों अथवा समूह का एक सामाजिक ढाँचे से दूसरे ढाँचे में संचलन होना ही सामाजिक गतिशीलता है।”

आंग्ल अनुवाद

“Social mobility is the movement of individuals or groups from one social structure to another.”

सामाजिक नियन्त्रण / SOCIAL CONTROL –

जब किसी समाज की चाहत इस प्रकार की हो ,कि उसका प्रत्येक सदस्य इस प्रकार व्यवहार करे कि वह उस समय के तात्कालिक मूल्यों, नियमों, मानदण्डों का अनुपालन सुनिश्चित हो जाए। तब इस तरह का व्यवहार समाज शास्त्र की भाषा में सामाजिक नियन्त्रण कहलाता है। वर्तमान कालखण्ड में प्रत्यक्ष सामाजिक नियंत्रण और अप्रत्यक्ष सामाजिक नियन्त्रण के रूप में दो पहलू मुख्यतः दीख पड़ते हैं। सामाजिक नियन्त्रण को पारिभाषित करते हुए बियरली महोदय ने कहा –

“सामाजिक नियन्त्रण आयोजित अथवा अनायोजित उन क्रियाओं और साधनों के लिए एक सामूहिक शब्द है जिनके द्वारा व्यक्तियों को यह सिखाया जाता है, समझाया जाता है, अथवा बाध्य किया जाता है कि वे उस समूह की रीतियों और जीवन मूल्यों का प्रयोग करें जिसके वे सदस्य हैं।”

“Social control is a collective term for those processes and agencies planned or unplanned by which individuals are taught, persuaded or compelled to confirm to the usage and life values of the group to which they belong.” – Brearly

प्रसिद्ध समाजशास्त्री मैकाईबर एण्ड पेज ने बताया –

“सामाजिक नियन्त्रण से तात्पर्य उस विधि से है जिसके द्वारा समस्त सामाजिक व्यवस्था समन्वित रहती है और अपने विचार को बनाये रखती है अथवा जिससे यह सम्पूर्ण व्यवस्था एक परिवर्तनशील सन्तुलन के रूप में क्रियाशील रहती है।”

“By social control is meant by the way in which the entire social order cohers and maintains itself or it operates as a whole as a changing equilibrium.” – Robert Maclver and Charles page

SOCIAL MOBILITY IN REFERENCE TO EDUCATIONAL DEVELOPMENT

शैक्षिक विकास के सन्दर्भ में सामाजिक गतिशीलता   

सामाजिक गतिशीलता और शिक्षा एक दूसरे के साथ इतने अधिक सम्मिश्रित हैं कि इनको अलग अलग देखना भी मुश्किल है इनमें आपस में अनुलोम सम्बन्ध है शैक्षिक विकास, शिक्षा का अवलम्बन ले सामाजिक गतिशीलता को सकारात्मक बनाये रखता है। शिक्षा का विकास सामाजिक मांग के अनुरूप होता है और मानव प्रगति सरलीकृत होती है। शैक्षिक विकास और सामाजिक गतिशीलता कितनी घुलमिली है इसे इन बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है।

01 – सर्वजन हेतु अनिवार्य व निः शुल्क शिक्षा

02 – विविधता पूर्ण पाठ्यक्रम

03 – व्यावसायिक शिक्षा व्यवस्था

04 – विविध विकास मार्ग खोलती उच्च शिक्षा

05 – देश की वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति से तालमेल

06 – सामाजिक अपेक्षा से सम्यक सन्तुलन

07 – शैक्षिक अवसरों से साम्य

08 – अन्तर्राष्ट्रीयता से समन्वय

SOCIAL CONTROL IN REFERENCE TO EDUCATIONAL DEVELOPMENT

शैक्षिक विकास के सन्दर्भ में सामाजिक नियन्त्रण

आज सामाजिक नियन्त्रण के बदलाव  भूमिका को समझने हेतु सामाजिक बेचैनी को समझने की आवश्यकता है प्राचीन भारतीय सामाजिक मूल्यों के घूंघट में छपा समाज किसी परिवर्तन को सहजता से स्वीकार नहीं करता इसी व्यवस्था का सामाजिकनियन्त्रण का चोला पहनाने का कार्य रूढ़िवादी समाज करना चाहता है जबकि आज बदलते समय में सामाजिक नियन्त्रण के परिवर्तित स्वरुप की आकांक्षा को नकारा नहीं जा सकता।शैक्षिक विकास के नए आयामों को छूने हेतु सामाजिक नियन्त्रण की बदलती समय सापेक्ष  आवश्यकता है। शैक्षिक विकास के सन्दर्भ में सामाजिक नियन्त्रण को वर्तमान आलोक में इस प्रकार समझा जा सकता है –

01 – संस्कृति का व्यापक दृष्टिकोण

02 – धर्म के ठेकेदारों का सम्यक दृष्टिकोण

03 – स्वार्थ रहित चिन्तन

04 – राजनीति

05 – वैश्विक नीति से सामन्जस्य

06 – राजधर्म की सम्यक समझ

07 – मानवता पोषण व सामाजिक नियन्त्रण

08 – वास्तविक, व्यावहारिक वैचारिक आधार

उक्त सम्पूर्ण विवेचन यह कहने में पूर्ण समर्थ है कि विश्व में व्यापक परिवर्तन हो रहे हैं और भारत इससे अछूता नहीं रह सकता लेकिन व्यवस्थित विकास की ओर अग्रसर होने हेतु विवेक युक्त ज्ञान के साथ सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक नियन्त्रण को शिक्षा द्वारा नए रूप में गढ़कर प्रस्तुत करना ही होगा। नियम, मर्यादा, परम्परा, नीतियाँ जब काल के अनुरूप होते हैं तब शिक्षा द्वारा स्वीकार्य मूल्य गढ़े जाते है और और सामाजिक गतिशीलता व सामाजिक नियन्त्रण को सकारात्मक वैश्विक हित के अनुकूल बनाया जा सकता है।

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शिक्षा

SCHOOL AND OUT OF SCHOOL

March 28, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

SCHOOL AND OUT OF SCHOOL/स्कूल और स्कूल के बाहर

(Knowledge generation and child centered education / ज्ञान सृजन और बाल केंद्रित शिक्षा)

स्कूल और स्कूल के बाहर, ज्ञान सृजन और बाल केंद्रित शिक्षा से आप क्या समझते हैं। What do you understand by knowledge generation and child-centered education, in and out of school ?

बाल केन्द्रित ज्ञान Child Centered Knowledge  –

जब ज्ञान को इस प्रकार अधिगमित कराने का प्रयास होता है कि उसके केन्द्र में बालक होता है तब इसे बाल केन्द्रित ज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें अधिगम विषयवस्तु बालक की रूचि, आवश्यकता व क्षमता पर आधारित होती है। इस प्रक्रिया में बालक की रचनात्मक क्षमता को क्रियाशील इस प्रकार किया जाता है जिससे वह प्राकृतिक तरीके से जिज्ञासु बने और अपने आप करके सीखने की ओर प्रवृत्त हो।

स्कूल में बाल केन्द्रित ज्ञान / Child Centered Knowledge in School –

स्कूल में बाल केन्द्रित ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए सामान्यतः निम्न कारकों के सकारात्मक प्रयोग करने का प्रयास रहता है।

01 – नैतिक शिक्षा आधारित कहानियों द्वारा / Moral lessons based stories

02 – खेल द्वारा शिक्षण /Learning through play

03 – विज्ञान प्रयोगशाला का व्यवस्थित प्रयोग /Systematic use of the science laboratory

04 – परियोजना पद्धति या करके सीखने जैसी शिक्षण विधियों का उपयोग।/ Use of teaching methods such      as project method or learning by doing

05 – व्यावहारिकता का सम्मिश्रण / A blend of practicality

06 – पलायनवादिता का पूर्ण परित्याग / Complete abandonment of escapism 

07 – नीर क्षीर विवेक जागरण / Awakening the discernment between right and wrong

08 – पाठ्यक्रम में सकारात्मक परिवर्तन /Positive changes in the curriculum

स्कूल के बाहर बाल केन्द्रित ज्ञान / Child-centered learning outside of school –

01 – अनुभव आधारित अधिगम व्यवस्था / Experiential Learning System

02 – सामाजिक पुस्तकालय / Community Library

03 – संग्रहालय / Museum

04 – स्वनिर्देशित अन्वेषण / Self-Directed Exploration

05 – रूचि आधारित सञ्चार सामिग्री का विकास / Development of interest-based communication materials

06 – शैक्षिक वृत्त चित्र / Educational Documentary

07 – सामाजिक कौशल / Social Skills

08 – विविध टोलियों का सकारात्मक कार्य / Positive Work of Various Groups

09 – आत्म निर्भरता विधियों का सम्यक विकास / Proper Development of Self-Reliance Methods

स्कूल के बाहर बाल केन्द्रित शिक्षा की बात हो या स्कूल के अन्दर बाल केन्द्रित शिक्षा की बात, एक तरह से यह देश की आधार शिला को सशक्त बनाने का महत्त्वपूर्ण उपागम है। अतः सरकारी और गैर सरकारी मष्तिष्कों को इस दिशा में गम्भीर प्रयास करने होंगे। व्यक्तिगत स्तर पर भी उन्नयन को अंगीकार करने के साथ इसे जन आन्दोलन का रूप दिए जाने की आवश्यकता है। शैक्षिक उन्नयन के साथ सङ्कीर्ण मानसिकता के तिरस्कार की आवश्यकता है।

    

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विविध

भद्रा/ Bhadra

March 3, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

भद्रा/ Bhadra

भद्रा काल  वह सामयिक अवधि है जिसे पञ्चाङ्ग में विश्टि करण समयावधि के नाम से जाना जाता है एक तिथि के आधे भाग को करण कहते हैं। 11 करण होते हैं – उनमें से एक है विश्टि करण। विविध करणों में से एक करण को  विष्टि करण के नाम से जाना जाता है इसे अच्छा नहीं माना जाता है. इसी विष्टि करण को भद्रा के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू धर्म किसी भी कार्य को सम्पन्न करने के लिए शुभ मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। भद्रा के समय शुभ कार्य वर्जित रहते हैं।

            कल्याणकारी या  मङ्गलकारी को भद्रा का शाब्दिक अर्थ स्वीकार किया जाता है लेकिन विश्टि करण के कारण इस काल को अशुभ मानते हुए इस काल में  विवाह, गृह प्रवेश, गमन हेतु प्रस्थान को वर्जित किया गया है जबकि यह काल युद्ध या शत्रु विजय हेतु शुभ माना जाता है।

भद्रा परिचय – भारतीय पौराणिक कथाओं भद्रा भगवान् सूर्य और छाया की पुत्री व शनि देव की भगिनी हैं छाया अर्थात संवर्णा की इस पुत्री की आकृति उग्र व स्वभाव तीक्ष्ण था विविध देवताओं के आशीर्वाद के कारण वे मंगलकारी व लोकहित कार्यों में प्रवृत्त हुईं फिर भी समय समय पर इनका उग्र स्वभाव विनाशकारी सिद्ध होता है। भद्रा के सम्बन्ध में यह स्वीकार्य है कि जब भद्रा पृथ्वी लोक पर है तब अशुभ है लेकिन स्वर्ग व पाताल में यह दोष मुक्त हो जाती है।

भद्रा सम्बन्धी वैज्ञानिक दृष्टिकोण – भद्रा काल को कुछ वैज्ञानिक कारणों से भी अशुभ मन जाता है इस समय चन्द्रमा और सूर्य की जो स्थिति होती है वह ऊर्जा का असन्तुलन पैदा करता है इस काल में मानसिक अशान्ति  निर्णयन क्षमता का आकलन करने पर ज्ञात हुआ की इस समय निर्णयन क्षमता निम्न कोटि की होती है।  वैज्ञानिकों ने विविध कालों का तुलनात्मक अध्ययन किया व पाया मौसम व खगोलीय स्थिति के कारण इस समय यात्रा करने पर अधिक बाधाएँ देखने को मिलती हैं।  इस समय प्रकृति व मानव भी उग्रता की शिकार हो जाती है।

भद्रा काल व भारत – भारतीय जातकों में अधिकाँश लोग समय को जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं। हम समय का सम्मान कर सही समय में अपने पञ्चाङ्ग को भी सम्मान देते हुए कार्यों को सम्पन्न करते हैं हमारे शास्त्र उद्घोष करते ही हैं कि – “कालो हि दुरतिक्रमः”

इसका आशय है कि समय को कोई नहीं बदल सकता।

इसी वजह से हिन्दुस्तानी पंचांग देखकर कार्य करने को कल्याणकारी मानते हैं भद्रा काल का हमारे जीवन में महत्त्व पूर्ण स्थान है।

सावधानी सूचक भद्रा – भद्रा हमें सचेत करती है कि हर काल खण्ड हर कार्य के लिए उचित नहीं होता, कार्यों को उस समय संपन्न करना उचित रहता है जब प्रकृति की ऊर्जा सन्तुलन में होती है। यह भौतिक कार्यों के सम्पादन की जगह तपस्या व चिन्तन, मनन का काल है। यह अशुभ की घोषणा करके वास्तव में हमें सचेत ही करता है।

क्या  न करें और क्या करेंभद्रा काल में?  

  • करने योग्य कार्य अर्थात स्वीकार्य कार्य – आवश्यकता के अनुसार निम्न कार्य सम्पादित किए जा सकते हैं। 

01 – आवश्यक होने पर युद्ध किया जा सकता है।

02 – शत्रु विजय की व्यूह बद्ध कोशिश

03 – लक्ष्य समर्पित उपासना

04 – तंत्रो व मन्त्रों की साधना

05 – दुष्कर कठिन तपश्चर्या

  • न करने योग्य अर्थात वर्जित कार्य –

01 – सगाई करके नवजीवन के लिए यह समय उचित नहीं है।

02 – नव निर्मित घर का गृह प्रवेश            

03 – विवाह कार्य सम्पादन

04 – नामकरण सँस्कार

05 – नया सौदा या व्यवसाय या व्यावसायिक प्रतिष्ठान का प्रारम्भ

06 – धार्मिक अनुष्ठान व माङ्गलिक कार्य

भद्रा दोष निवारण –

कभी कभी इस तरह की स्थितियाँ होती हैं कि कार्य सम्पादन परमावश्यक प्रतीत होता है ऐसी स्थिति में इन निवारण उपायों के साथ कार्य सम्पादित किये जा सकते हैं –

01 – श्री हनुमत आराधना

02 – भगवन शनि आराधना  

03 – भद्रा पूजन

04 – काला तिल व काले वस्त्र का दान

05 – “ॐ शनैश्चराय नमः” मंत्र का जप

 

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Uncategorized•काव्य

होली आई है।

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

होली आई है, आई है, होली आई है,

मौसमे -फाग में कैसी मस्ती छाई है,

रँगों ने, आज फिर से ली अँगड़ाई है,

बृजवाली राधा, कृष्णा की परछाई है।

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।01।

होली जीवन में नव-जीवन लाई है,

आई है आई है होली फिर आई है,

संग पापड़, गुझिया, मीठा लाई है,

होली के पकवानों ने धूम मचाई है।     

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।02।

नव रँगों ने अद्भुत छटा बिखराई है,

टेसू पलाश फूलों ने कसम निभाई है,

प्रकृति ने पुरातन रीति ही दोहराई है,

कान्हा, देखो जी देखो होली आई है।     

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।03।

जोगीरा, सर रर ने धूम मचाई है,

गीता भौजी ने मन से होली गाई है,

आज मस्ती में लोग और लुगाई हैं,

लेकिन नयनों की झील भर आई है।      

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।04।

जनगणमन मानस खुशी समाई है,

माँ सीता संग होली खेलें रघुराई है,

सारे तीर्थ राजों ने होली मनाई है ,

रंग से सरोबारों ने ली अँगड़ाई है।      

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।05।

अरे पूरब से पुरबा हवा,  आई है,

फाग ने फगुआ छटा दिखलाई है,

पिचकारी ने रंगीन फिज़ा दिखाई है,

नन्ही बिटिया गुलाल संग धाई है।   

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है ।06।

होली आई है, आई है, होली आई है

आई है,आई है,आई है,होली आई है,

आज जीवन में फिर मस्ती छाई है,

बिछुड़ों की याद फिर से आई है।                                                                      

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