हमारे जीवन के लिए बहुत से कारक जिम्मेदार हैं जो जीवन में मधुरस घोल जाते है विविध क्रियाएं, जैव विविधता, जीवन चक्र, समुद्र, पृथ्वी, आकाश सभी अपनी भूमिका का स्वतः स्फूर्त ढंग से निर्वहन करते हैं हमारे भोज्य पदार्थ, फल, मसाले, निर्मल जल, निर्मल वायु सभी की अपनी अपनी भूमिका है लेकिन बहुत कुछ इस उत्पादन में परागण की भूमिका है जो विविध जीवों द्वारा निर्वाहित की जाती है और पुष्पन पल्लवन के क्रम को निरन्तरता मिलती रहती है मोम और शहद देने के साथ इस परागण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करती है – मधुमक्खी
विश्व मधुमक्खी दिवस (World Bee Day) –
परागण में मधु मक्खी की भूमिका और इसके महत्त्व को ध्यान में रखते हुए इनकी रक्षा व तत्सम्बन्धी जागरूकता आवश्यक है। 2017 स्लोवेनिया के प्रस्ताव पर संयुक्त राष्ट्र ने इसे प्रारम्भ किया और पहला विश्व मधुमक्खी दिवस (World Bee Day) 20 मई 2018 को मनाया गया। दुनियाँ भर में इसकी 20,000 से भी अधिक प्रजातियाँ हैं और यह समग्र धरातल पर वितरित हैं इनमें से 4000 प्रजातियाँ तो मूल रूप से अमेरिका की हैं। आज इस दिवस की उपादेयता मानव के लिए इसलिए भी अधिक है क्यों कि मधु मक्खी फसल परागण के एक तिहाई के लिए जिम्मेदार है। इतनी सारी प्रजातियों में सबसे उल्लेखनीय शहद की मक्खी है।
मधुमक्खी का छत्ता / Bee hive –
आपने विविध दरारों में, पेड़ों पर, दीवारों, छतों व बड़ी बड़ी पानी की टंकियों से लटके इनके छत्तों के दर्शन किये होंगे। इनको एक साथ स्थानान्तरित होते हुए भी देखा होगा। मधुमक्खी के छत्ते में मुख्यतः तीन तरह की मक्खियाँ रहती हैं रानी मधु मक्खी, श्रमिक मधु मक्खियाँ और नर मधु मक्खियाँ। रानी मधु मक्खी पूरे छत्ते में एक ही होती है इसी से कालोनी बनती है और यही अण्डे देती है। श्रमिक मधुमक्खियाँ शहद बनाना, लार्वा पालना, छत्ता बनाने का कार्य करती हैं इनमें प्रजनन क्षमता नहीं होती हैं। नर मधुमक्खियाँ रानी मक्खी के साथ वंश वृद्धि के लिए जिम्मेदार हैं। नर मधु मक्खी को बड़ी बड़ी आँखों से और रानी मक्खी को लम्बे उदर की वजह से पहचाना जा सकता है। मधु मक्खी की पॉंच आँखे होती हैं जिनमें से दो बड़ी आँखे सिर के दोनों और होती हैं जिन्हें मिश्रित आँखें और शेष तीन सरल आँखें ओसेली आँखें कहलाती हैं। मिश्रित आँखें दृश्य को व्यापकता प्रदान करती हैं। इनकी आँखों में लगभग 6000 लेंस होते हैं।
मधुमक्खियों की महत्ता / Importance of bees –
इनकी महत्ता इन पर आधारित उत्पादन के माध्यम से देखी जा सकती है और यह उत्पादन मुख्यतः तीन कार्यों पर निर्भर है।
01 – परागण क्रिया
02 – मोम निर्माण प्रक्रिया
03 – शहद निर्माण – शहद का भारतीय परिप्रेक्ष्य में इतना अधिक महत्त्व स्वीकारा गया कि इसे प्रकृति का अमृत या स्वर्ण अमृत नाम से भी पुकारा गया।
अब तक की सारी विवेचना से यह स्पष्ट है कि मनुष्य व मधु मक्खी परस्पर एक दूसरे के महत्त्वपूर्ण साथी है इनके कीटनाशकों से बचाव की आवश्यकता के साथ मधुमक्खी पालन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इनका संरक्षण परोक्ष रूप में हमारी प्रगति में सहायक होगा। आप सभी को मधुमक्खी दिवस की शुभ कामनाएं। यह मधु मक्खी संरक्षण प्रत्येक स्तर पर पाठ्य क्रम का अभिन्न हिस्सा होना चाहिए।
19 सितम्बर1965 को अमेरिका के ओहियो राज्य के यूक्लिड नगर स्थित क्लीव लैण्ड में एक बालिका का जन्म हुआ जिसे सुनीता लिन पांड्या विलियम्स के नाम से आज जाना जाता है। इन्होने हाई स्कूल मेसाचुसेट्स से किया और 1987 में संयुक्त राष्ट्र की नौसैनिक अकादमी से फिजीकल साइंस में बीएस (स्नातक स्तर ) की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1995 में फ्लोरिडा इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी से एम एस (इन्जीनियरिंग मेनेजमेन्ट में) की उपाधि प्राप्त की।
ख्याति प्राप्त डॉ० दीपक पण्ड्या जो तन्त्रिका विज्ञानी (एम डी) हैं और भारत के गुजराज प्रान्त से हैं सुनीता की माँ बॉनी जालोकर पाण्ड्या स्लोवेनिया की हैं इनका एक बड़ा भाई और एक बड़ी बहिन भी हैं जब सुनीता एक वर्ष की भी नहीं हुयी थीं इनके पिता अहमदाबाद से अमेरिका के बोस्टन में आकर बसे।
व्यावसायिक जीवन वृत्त –
अमेरिकी अन्तरिक्ष एजेन्सी NASA में इनका चयन 1998 में हुआ एवम् प्रशिक्षण कार्य प्रारम्भ हुआ। अमेरिका के अन्तरिक्ष मिशन पर वाली यह दूसरी भारतीय मूल की महिला हैं। प्रथम महिला भारतीय मूल की महिला कल्पना चावला थीं। सुनीता विलियम्स का भारत दौरा सन 2007 के सितम्बर – अक्टूबर माह में हुआ। इन्होने 30 अलग अलग अन्तरिक्ष यानों द्वारा 2770 उड़ानें भरी हैं। सुनीता विलयम्स अमेरिकन हैलीकॉप्टर एसोसिएशन, सोसाइटी ऑफ़ एक्सपेरिमेंटल टेस्ट पाइलेट्स, सोसाइटी ऑफ़ फ्लाइट टेस्ट इन्जीनियर्स आदि संस्थाओं से भी सम्बद्ध हैं।
व्यक्तिगत जीवन परिदृश्य –
कुशल तैराक व पशु प्रेमी सुनीता की अभी अपनी कोई संतान नहीं है ये धर्मार्थ धन संग्रह में योगदान देती हैं। इन्होने गोताखोरी और मैराथन धाविका के रूप में भी पहचान बनाई है। व्यावहारिक क्षेत्र में नौ सेना पोत चालक, हैलीकॉप्टर पाइलट, परीक्षण पाइलट, पेशेवर नौसैनिक व अब अन्तरिक्ष यात्री के रूप में विश्व पटल पर असाधारण कीर्तिमान बनाने वाली विशिष्ट महिला हैं लगन और आत्म विश्वास से भरपूर यह व्यक्तित्व दिशाबोध व जिन्दादिली की अद्भुत मिसाल है। इन्होने अपने सहपाठी माइकल जे विलियम्स से विवाह किया।
सम्मान –
भारत सरकार ने सन 2008 में इन्हें विज्ञान एवम् अभियान्त्रिकी के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया। इसके अतिरिक्त इन्हे नेवी कमेंडेशन मैडल, नेवी एण्ड मैरीन कॉर्प अचीवमेण्ट मैडल तथा ह्यूमेटेरियन सर्विस मैडल आदि से भी सम्मानित किया जा चुका है।
तत्सम्बन्धी वर्तमान परिदृश्य –
साहस की विशेष प्रतिमान बनीं सुनीता विलयम्स नौ माह से अन्तरिक्ष में फँसी है बहुत से महत्त्वपूर्ण कार्यों को अंजाम तक पहुंचाने वाली यह विशिष्ट दिव्यात्मा व साथी वुच विल्मोर सचमुच अभिनन्दनीय हैं। स्पेस एक्स का क्रू – 10 मिशन , रविवार (1 6 /03 /2025) को सफलता पूर्वक अन्तर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुँच गया। टेक्सास से शुक्रवार को, ड्रेगन केप्सूल लांच किया गया। दैनिक जागरण ने बताया कि इस उड़ान में नासा के एनी मैकक्लेन, निकोल एयर्स जापान के जेएक्सए से ताकुआ ओनिशी और रूस के किरिल पेस्कोव शामिल थे नासा के अन्तरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स, बुच विल्मोर और रूसी अन्तरिक्ष यात्री अलेक्सांद्र गोर्बुनोव स्पेस एक्स के ड्रेगन अन्तरिक्ष पृथ्वी पर लौटने वाले हैं। लौटने के बाद भी लंबा समय यहां के वातावरण से अनुकूलन में लगता है, क्रू के सदस्यों से मिलन की खुशी की हम केवल कल्पना कर सकते हैं इसकी असली खुशी तो सुनीता ने जो महसूस की उसकी अभिव्यक्ति दुष्कर है।
आज 18 /03 /2025 के दैनिक जागरण से ज्ञात हुआ कि आज मंगलवार की शाम को सुनीता विलयम्स व बुच विल्मोर की नौ माह बाद वापसी होगी। नासा क्रू -9 मिशन के अन्तर्राष्ट्रीय अन्तरिक्ष स्टेशन से पृथ्वी पर लौटने का लाइव कवरेज प्रदान करेगा। मिशन प्रबन्धक 18 मार्च की शाम हेतु अनुकूल परिस्थतियों के आधार पर नज़र बनाये हैं। यद्यपि ड्रेगो केप्सूल की अनडाकिंग ढेर सारे कारकों पर निर्भर करती है और आने के बाद भी बहुत सी समस्याओं से जूझना होता है जैसे दृष्टि पर कुप्रभाव, चलने में मुश्किल, चक्कर आना, बेबी फीट यानी तलवे का बच्चे जैसा मुलायम हो जानाआदि आदि।
लेकिन क्रू मेम्बर्स के साथ गले मिलना, गर्मजोशी से स्वागत करना, डान्स करना, साथ साथ फोटो खिंचवाना खुश दिखना सभी उनकी जिंदादिली की जीवंत मिसाल हैं ऐसे अद्भुत व्यक्तित्वों पर पृथ्वीवासियों को नाज है।
यह संसार सचमुच अद्भुत है जो कहीं न कहीं
विचारों से उद्भूत है इसी की अधिक सम्भावनाएं भारतीय दृष्टिकोण से भी परिलक्षित
होती हैं। यहाँ तककि हमारी आज की सोच हमारे कल का निर्माण करती है हम भारतीय कुछ
विचारों में एक दूसरे से अद्भुत साम्य रखते हैं कुछ आदतें व दृष्टिकोण जिन
परिणामों तक ले जाते हैं यह भी सामान्य शोध बताने में सक्षम हैं हमारी अपनी ही सोच
और उनका व्यवहार कैसे हमारी ही दुश्मन साबित होती है उनमें से पाँच का अध्ययन आप
प्रबुद्ध जनों के समक्ष प्रस्तुत है –
1 – सुनकर अनसुनी करना
(Ignore after
listening)
2 – देखकर अनदेखा करना (Ignore
after seeing)
3 – बहाने बाजी (Betting on excuses)
4 – असत्य सम्भाषण (False speech)
5 – नकारात्मक चिन्तन (Negative thinking)
आगे वर्णित तथ्य अनुभव व विविध जनों के
दृष्टांतों पर आधारित हैं स्पष्ट रूप से इन्हे दुर्गुणों की श्रेणी में रखा जा
सकता है।
1 – सुनकर अनसुनी करना(Ignore
after listening)–
एक बहुत ही सामान्य सी बात लगती है बचपन में इस
लत का शिकार बालक कालान्तर में अपने मस्तिष्क को यह सन्देश भेजने में सफल हो जाता
है कि उसने सचमुच कुछ सुना ही नहीं और यह बात उसको बहरेपन की और बढ़ा देती है फिर
वह सुनना चाहते हुए भी सुन नहीं पाता।
वह सेवक जोअपने से ऊपर के अधिकारियों की बात को
अनसुना करता है वह आलस्य,
कामचोरी, संशय, बहरेपन, कान
का अनायास बजना, कार्य क्षमता का ह्रास, शारीरिक कम्पन आदि विविध व्याधियों का शिकार
देर सबेर होता ही है। कुछ ऐसे लोगों के अध्ययन व लोगों के अनुभवों से आप यह सहज
बोध कर सकते हैं।
यदि यह आदत स्वयम् हमको लगती है तो हम स्वयम्
अपनी भी नहीं सुन पाते, सोचते रह जाना, कल्पना लोक में विचरण, समय
की बर्बादी हम सहज स्वभाव के वशीभूत हो करने लगते हैं। किसी का आर्त्तनाद हमें
सुनाई नहीं पड़ता या हम इतने कायर हो चुके होते हैं कि किसी की मदद को तत्पर ही नहीं
हो पाते परिणाम स्वरुप एकाकी पन और मानसिक अवसाद हमें घेरने लगता है। तनाव, अकारण भय, चिन्ता
हमारा मुकद्दर बनने लगता है। लक्ष्य हमसे दूर भागने लगते हैं। परिश्रम व लगन दूर
की कौड़ी लगने लगते हैं।
2 – देखकर अनदेखा करना (Ignore
after seeing)-
आँग्ल भाषा में में पहले और दूसरे उप शीर्षक
हेतु सामान्यतः एक शब्द Avoid
ही अधिकाँश प्रयोग में लाया जाता है लेकिन
हिन्दी में इसके अलग और गूढ़ अर्थ हैं
जिसे शब्द उच्चारण से ही समझा जा सकते है देखने और सुनने के लिए क्रमशः अलग
अलग इन्द्रियों चक्षु व कर्ण का प्रयोग होता है।
आजकल लोग अधिक व्यस्त हैं व बाजार वाद के
प्रभाव से ग्रस्त हैं कि बहुधा अनदेखा करते हुए स्वयम् सहित अन्य जन दिखाई पड़ते
हैं लेकिन जब समय, धर्म, विवेक, ज्ञान और अन्तरात्मा भी हमारी देख कर अनदेखा
करने की आदत का शिकार हो जाती है और चल चित्र की भाँति बहुत कुछ हमारे सामने से
गुजर जाता है और हम किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं हमारी शक्तियों का क्षय होने
लगता है। हमारी सोच दुष्प्रभावित हो जाती है।
‘जैसी करनी वैसी भरनी’ के आधार पर ही हमें प्रतिफल मिलने लगता है। यह
स्थिति मानवता के लिए अत्यन्त घातक है हमें एक दूसरे की मदद मानस का विस्तार कर
करनी ही चाहिए। चाहे सामने दुश्मन ही क्यों न हो।
3 – बहाने बाजी (Betting on excuses) –
कभी कभी एक अद्भुत तथ्य सामने आता है कि हम
किसी कार्य को करने में या किसी वस्तु से किसी की मदद करने में या किसी सलाह
द्वारा मार्गदर्शन करने में हम पूर्ण सक्षम होते हैं फिर भी हम किसी बहाने का
सहारा ले उस विशिष्ट कर्त्तव्य से मुँह मोड़ लेते हैं और यह पारिलक्षित होता है की
अधिकाँश जनसंख्या इस दुर्गुण से ग्रसित है और हम अपने बच्चों को भी जाने अनजाने
में इस दुर्गुण से ग्रसित कर देते हैं। धीरे धीरे यह हमारी आदत और व्यवहार का
विशेष भाग हो जाता है।
गिने चुने लोग ही ऐसे होते हैं जो निस्वार्थ
सेवा भावी रहकर बहानेबाज़ी की छतरी नहीं लगाते। यह मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ
लोग होते हैं।इन विशिष्ट व्यक्तित्वों से ही मानवता को सद् पथ मिलता है। इस स्वभाव
से भागने पर हम सहज ही अनुशासन प्रियता से भी दूर हो जाते हैं। हम सहज ही अधर्म
मार्ग पर बढ़ चलते हैं राम चरित मानस में कहा भी है। –
परहित सरिस धर्म नहीं भाई।
पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।।
यह बहाने बाजी हमें हमारी ही निगाह में गिरा
देती है और जब हम इस पर विचार करते हैं तो हमें ग्लानि की अनुभूति होती है। अपना
ही स्वार्थी चरित्र हमें मुँह चिढ़ाता हुआ लगता है। हम अपना प्रगति पथ स्वयं
अवरुद्ध कर लेते हैं।
4 – असत्य सम्भाषण (False
speech) –
यह अत्याधिक खतरनाक
दुर्गुण है और हममें से अधिकाँश से बुरी तरह चिपका है साथ ही यह नई पीढ़ी को तेजी
से अपनी गिरफ्त में ले रहा है। हम जब मोबाइल पर होने वाली बातचीत में अपने और
दूसरों द्वारा इसका अनायास और बेधड़क प्रयोग देखते हैं केवल परिवार से बाहर के
लोगों के साथ ही नहीं यह दुर्गुण आत्मीय सम्बन्धों यथा पिता-पुत्र, पिता – पुत्री, शिष्य -गुरु, माता -पिता, माता-पुत्र, माता -पुत्री, बहन -बहन, भाई-भाई और मित्रों पड़ोसियों जैसे सम्बन्धों में वजह बेवजह
घुसपैठ बना रहा है।
नैतिक दृष्टि से
अत्यन्त धक्का तब लगता है जब झूठ बेवजह, नकली शान दिखाने के
लिए, रॉब ग़ालिब करने के लिए, पुराने झूठ को समर्थन
देने के लिए आदतवश बोला जाता है। हद तो तब हो जाती है जब हम अपने झूठ में मासूम नव
पीढ़ी को भी शामिल कर लेते हैं। शैतान नवपीढ़ी तो बड़ों के सामने इस तरह झूठ बोलती है
जैसे नासमझों से बात कर रही है।
जिस देश में सत्यवादी
राजा हरिश्चन्द्र ने जन्म लिया।जिस देश के विशेष चिन्तक महात्मा गाँधी ने ‘सत्य ही ईश्वर है।’ का उद्घोष किया उस देश
में अकारण असत्य सम्भाषण अत्याधिक अटपटा लगता है। यह दुर्गुण सारे पवित्र
सम्बन्धों की नींव हिलाने में सक्षम है। किसी ने सच ही कहा हे कि –
हमीं गर्क करते हैं जब
अपना बेड़ा
तो बतलाओ फिर नाखुदा
क्या करेंगे।
जिन्हें दर्दे दिल से
ही फुर्सत नहीं है
वो दर्दे वतन की दवा
क्या करेंगे ?
5 – नकारात्मक चिन्तन (Negative
thinking) –
बाहर की दुनियाँ हमारे चिन्तन, मानसिक शान्ति, प्राकृतिक स्वभाव पर
हावी होती जा रही है। सुबह के अखबार से लेकर तमाम नोटिफिकेशन, टेलीविज़न के कार्य
क्रम, हिंसा, मारधाड़, चोरी, डकैती, बलात्कार, गबन, भ्रष्टाचार की बातें
शुद्ध सात्विक मन को नकारात्मकता में डुबो देती हैं। मानव अपने मूल स्वरुप को भूल
नकरात्मकता से जुड़ बुराई के आचरण को अंगीकार करने लगता है। यह नकारात्मकता
व्यक्तित्व को दुष्प्रभावित कर हमें सामान्य मानवीय गुणों की ग्राह्यता में भी
बाधक बन जाती है न शान्ति से सोने देती है न विकास के नए आयामों से जुड़ने देती है।
भय, चिन्ता,आक्रात्मकता, चिड़चिड़ापन, असहिष्णुता को सोते
जगते हमारे चिन्तन से जोड़ देती है। मानव का सहज,, शान्त, तेजस्वी ,दिव्य स्वरुप खोने
लगता है। जो बहुत बड़ी चिन्ता व मूल्य अवनमन का कारण है।
मैं यह कहना चाहूँगा
कि सुबह व रात्रि में सोने से पहले कम से कम
दो घण्टे मोबाइल, अखबार, टेलीविज़न, लेपटॉप स्क्रीन से दूर
रहें। आवश्यक पढ़ें अनावश्यक त्यागें। नकारात्मकता से दूर रहकर सकारात्मक विचारों, व्यक्तित्वों, चिन्तन से खुद को
जोड़ें।
आज यहाँ जिन पाँच
बिन्दुओं पर चर्चा हुई ये हमारे विनाश का कारण हैं यद्यपि इनमें सूक्ष्म अंतर है
लेकिन ये आन्तरिक रूप से मिलकर सम्पूर्ण मानवता का बेडा गर्क कर देते हैं। प्रत्येक
बुद्धिजीवी, राष्ट्रवादी, देश प्रेमी का
कर्त्तव्य है कि इस दुष्चक्र से खुद निकले और सामान्य जन मानस व नव पीढ़ी हेतु
प्रगति पथ तैयार करे। यदि हम सही दिशा दे
पाए तो नई पीढ़ी इसका आलम्बन ले अनन्त ऊँचाइयाँ तय करेगी। सभी अपनी क्षमता भर
प्रयास करें। हम निश्चित ही सफल होंगे। पूर्ण विश्वास है।
बहुधा यह दृष्टिगत होता है कि किन्हीं दिनों अधिक समय तक पढ़ने,कार्य करने वाले लोग भी यह शिकायत करते हैं कि अब उतना कार्य या उतनी पढ़ाई नहीं हो पा रही है ऐसी स्थिति में क्या करें। पढ़ाई में मन कैसे लगाएं।
अक्सर यह देखने को मिलता है की अधिकाँश लोग इस स्थिति से गुजरते हैं
लेकिन इस स्थिति से बचाव किया जा सकता है आवश्यकता है निर्विकल्प होकर दिए गए
बिन्दुओं पर विचार कर अमल में लाने की।
पढ़ाई
में मन लगाने के उपाय (Ways to focus on studies) :-
पढ़ाई
या निर्धारित कार्य में मन लगाने हेतु आवश्यक तत्व इस पकार क्रमित किये जा सकते
हैं –
1- मानसिक साम्य (Mental equilibrium)
2 – लक्ष्य निर्धारण (Goal setting)
3 – अधिगम स्थल चयन (Learning site selection)
4 – डर हटाएँ आत्मविश्वास बढ़ाएं (Eliminate Fear Increase Confidence)
5 – दृढ़ निश्चय (Firm determination)
6 – बाधा निवारण (Obstacle avoidance)
7 – विषयवस्तु आधारित समय सारिणी (Theme Based Time Table)
8 – आरम्भ व निरन्तरता (Beginning and continuation)
आशा ही नहीं विश्वास है कि उक्त आधार पर आपके सपने अपने हो जाएंगे और
आप तन्मयता से अध्ययन या स्वकार्य कर पाएंगे।
गर्मी
के दिनों में लोग इस बात से परेशान रहते हैं की वे अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं
कर पाते। यदि सम्पूर्ण दिन को गर्मी के लिहाज से तीन भागों में बाँटते हैं प्रातः, दोपहर, शाम
तो इसमें बीच वाला भाग अर्थात दोपहर सबसे तपिश भरी होती है। बहुत सारे शरीर इस मौसम
से इतने अधिक प्रभावित होते हैं कि उन्हें हमेशा गर्मी महसूस होती है जिससे उनके
कार्य में बाधा पड़ती है। यहाँ प्रस्तुत हैं –
गर्मी
में कूल कूल रहने के आठ उपाय
Eight
ways to stay cool in summer
01 – जल का सेवन (Water intake)
02 – तरल खाद्य पदार्थों का उचित सेवन (Suitable intake of liquid foods)
04 – फल, सब्जी और सुपाच्य भोजन (Fruits, vegetables and nutritious food)
05 – मसालेदार, अधिक तले भुने, अधिक नमक व कैफीन युक्त पदार्थों का सेवन नहीं
(Do not consume spicy, excessive fried,
high salt and caffeinated substances)
06 –मौसम के अनुसार वस्त्र (Clothing according to the season)
07 – नींद और स्नान (Sleep and bath)
08 – पैर के तलवे की देखभाल (Foot care)
01 – जल का सेवन (Water intake)-
गर्मी
के दिनों में जल का सेवन सोच समझ कर किया जाना चाहिए पानी घूँट घूँट करके पिया
जाना चाहिए केवल शौच निवृत्ति से पूर्व आप लगातार पानीपी सकते हैं। यदि गुन गुना
जल नहीं ले सकते तो फ्रिज का बहुत ठण्डा पानी भी वर्जित है सादा जल या घड़े
के जल का सेवन किया जा सकता है इसे आप अपने थर्मस में भरकर कार्य स्थल पर भी ले जा
सकते हैं। सुबह सुबह, रात्रि को ताँबे के लोटे में रखे जल का सेवन
किया जा सकता है। यह पूरे दिन में प्यास के अनुसार या तीन से चार लीटर लिया जा
सकता है।गर्मी में बाहर निकलने से पहले पर्याप्त जल का सेवन करना चाहिए। पानी
उंकड़ू बैठ कर पीना मुफीद है खड़े होकर नहीं पीना चाहिए।
02 – तरल खाद्य पदार्थों का उचित सेवन (Suitable intake of liquid foods) –
खाद्य
सामग्री के मामले में भारत सचमुच बहुत भाग्य शाली है इसमें जहां विविधता पूर्ण
व्यञ्जन उपलब्ध हैं वहीं मौसमानुकूल खाद्य सामग्री की बह भरमार है गर्मी में अधिक
जल वाले तत्वों का विकल्प चुना जाना चाहिए जैसे नीबू पानी,नारियल पानी, छाछ, आम का पना, पानी
की सेंधा नमक वाली शिकन्जी,जौ के सत्तू का शरबत,विविध दोष रहित जूस, दही की लस्सी आदि इनमें आवश्यकतानुसार पुदीना,प्याज,धनिया
सौंफ आदि का प्रयोग किया जा सकता है। कृत्रिम शीतल पेय बोतल बन्द या डिब्बे बन्द
बासी तरल पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
घाट की राबड़ी जिसमें जौ का दलिया व छाछ होता है,
लिया जा सकता है।
प्राणायाम, योग और सूक्ष्म व्यायाम किया जाना चाहिए शीतली, शीतकारी प्राणायाम अधिक उपयोगी है educationaacharya.com पर Tip to Top Exercise दो भागों में पहले दी जा चुकी हैं जो उपयोगी रहेंगी। सुविधा की दृष्टि से इसका लिंक यू ट्यूब (Education Aacharya) के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दूँगा।[ https://youtu.be/-Pw39aG5-IQ, https://youtu.be/bl2uqMUk_f8] याद रखें मानसिक शान्ति भी शारीरिक शान्ति में योग देती है।
04 – फल, सब्जी और सुपाच्य भोजन (Fruits, vegetables and nutritious
food) –
शारीरिक
गर्मी पर नियन्त्रण हेतु भोजन सुपाच्य ही किया जाना चाहिए और भूख से कुछ कम लिया
जाना चाहिए रात्रि के भोजन पर सर्वाधिक नियंत्रण की आवश्यकता है और यह सोने से कम से कम दो घण्टे
पहले किया जाना चाहिए। भोजन से पहले आप पानी पी सकते हैं लेकिन भोजन के उपरान्त कम
से कम आधा घण्टे जल न पीएं।
05 – मसालेदार, अधिक तले भुने,अधिक नमक व कैफीन युक्त पदार्थों का सेवन नहीं
(Do not consume spicy, excessive fried,
high salt and caffeinated substances) –
इस प्रकार के पदार्थ शरीर में अनावश्यक
गर्मी का कारण बनाते हैं शरीर में पित्त ,एसिड
आदि की वृद्धि के साथ वात,
पित्त, कफ
में असंतुलन पैदा कर विकार का कारण बनते हैं।
06 –मौसम के अनुसार वस्त्र (Clothing according to the season) –
गर्मियों में हल्के, ढीले वाले सूती वस्त्रों का प्रयोग किया जाना
चाहिए।टाइट ,शरीर से चिपके वस्त्र नहीं पहनने से बचना
चाहिए। रंगों के चयन में सावधानी रखें हुए हलके रंग प्रयोग में लाएं जाएँ। वस्त्र
ऐसे हों जिससे शरीर को आराम मिले पूरी बाँह के वस्त्र पहनें।आवश्यकतानुसार अँगोछा
लिया जा सकता है।
07 – नींद और स्नान (Sleep
and bath) –
जहाँ
सुबह उठकर दैनिक क्रियाओं में स्नान को स्थान मिला हुआ है वहीं निद्रा पूर्व स्नान
अच्छी आरामदायक नीं दिलाता और शरीर की
गर्मी पर नियन्त्रण रखता है यदि उस समय स्नान कर सकते तो पैरों को अच्छी तरह धोना
अति आवश्यक है।
08 – पैर के तलवे की देखभाल (Foot
care) –
रात्रि
में सोने से पहले पैर धोने की बात ऊपर आ चुकी है यह क्रिया शीतल नैसर्गिक जल से हो
बर्फ के पानी या फ्रिज के पानी से नहीं। इसके पश्चात अच्छी तरह गोले के असली तेल
से तलवों की मसाज अवश्य करें और तलवे के प्रत्येक भाग को अंगुलियों के दवाब का
अहसास कराएं आनन्द आएगा। इतनी मसाज करें की तेल सूख जाए।
यद्यपि गर्मी के प्रकोप के निदान में
चिकित्सकीय परामर्श सर्वाधिक आवश्यक है लेकिन इलाज से पहले सावधानी के महत्त्व को
नकारा नहीं जा सकता।
आज का मानव जानता बहुत कुछ है पर मानता बहुत कम है। सफलता हर कोइ चाहता है पर प्रयास ओछे रह जाते हैं कभी आत्म विश्वास नहीं जग पाता और कभी अति आत्मविश्वास असफलता का पर्याय बन जाता है। आखिर मानव अपने सपने, अपने मन्तव्य, अपने गन्तव्य तक क्यों नहीं पाते। कभी सारा जीवन किस एक तत्व की कमी के कारण अभिशप्त सा दीख पड़ता है। भाग्य का ताला आखिर खुलता किस चाभी से है जब आप अपने कर्म बोध को जगाकर विश्लेषण करते हैं तब पाएंगे की सफलता की कुञ्जी है आत्मविश्वास । आइए जानते हैं कि किन आठ तत्वों से आत्मविश्वास का शीर्ष स्तर छूकर जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
सक्रियजीवन
चर्या (Active Life Style) –
मानव का शरीर गुब्बारे की तरह फूलने के लिए नहीं बना है वह पसीना
बहाकर शुचिता कर्मठता का अनुगमन कर लक्ष्य प्राप्ति का साधन है हमेशा ऋगवेद पर
आधारित ऐतरेय ब्राह्मण के शब्द ‘चरैवेति
चरैवेति’ चलते रहो चलते रहो का उद्घोष कर हमेशा हमें
प्रेरणा देते हैं की तन को ,मन
को,मस्तिष्क को हमेशा सक्रिय रखना है। हमारे और
लक्ष्य के बीच का अन्तराल कम होता चला जाएगा वह महिला पुरुष का अन्तर नहीं देखता
पुरुषार्थ की सक्रियता देखता है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कठोपनिषद से
दिशाबोधक उद्घोष किया –
“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” अर्थात् उठो, जागो, और
ध्येय की प्राप्ति तक मत रूको।
अतः अवश्य मानें – जीवन है, चलने
का नाम …
सद सङ्गति (Good Fellowship) -आत्म विश्वास का सूर्य तब जाग्रत स्थिति में
होता है जब उच्च ऊर्जाओं का समन्वयन होता है इसीलिये उन लोगों का साथ करें,उन लोगों को मॉडल या आदर्श के रूप में
स्वीकारें जिनके विचार आपके आत्मिक उत्थान में योग दे सकें यह मुहावरा तो आपने
अवश्य सुना होगा कि -खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। आप जैसा बनना चाहते हैं
वैसे लोगों का साथ करें।
संयमित जिद –
जी हाँ जिद जरूरी है, उत्थान के लिए, उत्कर्ष के लिए, प्रगति
के लिए इतना जिद्दी तो अपने आप को बनाना होगा कि जो ठान लिया, जो उद्देश्य बना लिया, जो लक्ष्य तय कर लिया उस उद्देश्य को उचित
साध्यों से प्राप्त करके रहूँगा और अपने कम्फर्ट जॉन का परित्याग तत्परता से
करूंगा।
याद रखें सफलता का पथ
दुरूह होता है कण्टकाकीर्ण होता है ,भयावह
दीख पड़ता है पर आत्म विश्वासी उसी पथ का पथिक होता है और अन्ततः विजिट होता है।
हमें अपनी जिद की पूर्णता हेतु सैद्धान्तिक
धरातल की जगह यथार्थ के कठोर धरातल पर संयमित होकर चलना पड़ेगा। किताबी सैद्धान्तिक
धरातल पर तैरना सीखें, सुन्दर नृत्य करें,
व्यापार में शिखर छुएं आदि सम्भव नहीं है अतः
व्यावहारिक कठोर धरातल पर पूर्ण अनुशासन से अपनी मर्यादित जिद पूर्ण करने हेतु
उतरना ही होगा। फल के परिपक्व होने में उसमें तीन परिवर्तन परिलक्षित होते हैं वह
नम्र हो जाता है , उसमें मिठास आ जाती है,
तीसरे उसका रंग बदल जाता है। आत्म विश्वास की
परिपक्वता में मानव में इसी परिवर्तन के लक्षण दीखते हैं।
आस्था –
विश्वास रखें आप सफल होंगे,जीवन की छोटी छोटी सफलताओं,
उपलब्धियों, प्रशंसा की स्मृतियों को कुरेदकर स्वस्थ धरातल
तैयार करें। यदि बचपन के डगमगाने वाले कदम दौड़ने में समर्थ हो सकते हैं तो हमारा
आस्था का अवलम्ब, विजय पथ का निर्माण अवश्यम्भावी कर सकता है
शङ्कर के उपासक हर हर महादेव, देवी के उपासक जय भवानी के उद्घोष से अन्य
मतावलम्बी अपने अपने इष्टों को याद कर जाग्रत स्थिति में आ जाते हैं। सीधे चेतना
के अनंत सागर से अविरल परवाह को निरंतरता मिलाती है ऊर्जा के अजस्र स्रोत से आस्था
हमको जोड़ती है।
संघर्षशील प्रवृत्ति –
विश्वास रखें। आप ईश्वर की अमूल्य कृति हैं। हम सभी का अस्तित्व किसी
न किसी उद्देश्य से जुड़ा है सपनों को साकार करने के लिए मानस में विचारों के अन्धड़ चलते हैं संघर्ष के विभिन्न
उपादान तय करते समय याद रखें समुद्र मन्थन से विभिन्न रत्नों की प्राप्ति हो सकती
है तो हमारा चिन्तन, मंथन,द्वन्द
संघर्षशील जुझारू प्रवृत्ति अन्ततः हमें सफल बना आत्म विश्वास में वृद्धि
सुनिश्चित करेगी। इसी दिशा में मेरी कुछ पंक्तियाँ आपको समर्पित हैं –
जीवन की धूप छाँह, नया
मार्ग देती है,
पत्थर, कण्टक,अग्नि
संताप हरलेती है,
मार्ग खोज देते हैं, उन्नति, उत्कर्ष का
संघर्षशील प्रवृत्ति अन्ततः तार देती है।
उत्तम स्वास्थय –
स्वस्थ शरीर स्वस्थ मस्तिष्क का आधार है और आत्म विश्वास का वृक्ष
उत्तम स्वास्थय रूपी जड़ों पर विकास के सोपान तय करता है जितने भी प्रभावशाली
व्यक्तित्व हैं सभी ने तमाम व्यस्तताओं के बीच स्वास्थय को संभाले रखने के क्षमता
भर प्रयास अवश्य किये हैं। भारतेन्दु हरिश चन्द्र, स्वामी विवेका नन्द,
राहुल सांकृत्यायन अपने अल्प स्वस्थ जीवन में
जो ज्योति बिखेर गए हैं वह युगों तक हमारा मार्ग दर्शन करेगी।
व्यक्तित्व सुधार –
आज गुणवत्ता प्रबन्धन के युग में व्यक्ति का व्यक्तित्व कार्य की
सफलता सशक्त पृष्ठभूमि तैयार करता है कार्य की निरन्तर सफलताएं जो तेज जो ओज पैदा
करती हैं वह सञ्चित कर्मों का योग होता है। रामधारी सिंह दिनकर जी ने कहा है –
तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाके
पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के
हीन मूल की ओर देख जग गलत करे या ठीक
वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।
खुश रहें खुश रहने दें –
यह सर्व विदित है कि जो जैसा करता है उसे वैसा फल मिलता है तो हम
सबके लिए खुशियों का आधार बनाएं इससे हम पर भी खुशियां बरसेंगी और उससे आलोकित पथ
ही तो आत्मविश्वास हेतु सर्वोत्कृष्ट पथ होगा। चेहरे पर हमेशा विजेता वाली मुस्कान
रखें आनन्द में मगन हो सकारात्मक निर्णय लें क्रोध को तिरोहित करें।हमारी खुश रहो
और रहने दो की मूल भावना आत्मविश्वास का ऐसा प्रासाद खड़ा करेगी जो चिर स्थाई
होगा।