Education Aacharya - एजुकेशन आचार्य
  • शिक्षा
  • दर्शन
  • वाह जिन्दगी !
  • शोध
  • काव्य
  • बाल संसार
  • विविध
  • समाज और संस्कृति
  • About
    • About the Author
    • About Education Aacharya
  • Contact

शिक्षा
दर्शन
वाह जिन्दगी !
शोध
काव्य
बाल संसार
विविध
समाज और संस्कृति
About
    About the Author
    About Education Aacharya
Contact
Education Aacharya - एजुकेशन आचार्य
  • शिक्षा
  • दर्शन
  • वाह जिन्दगी !
  • शोध
  • काव्य
  • बाल संसार
  • विविध
  • समाज और संस्कृति
  • About
    • About the Author
    • About Education Aacharya
  • Contact
शिक्षा

शिक्षार्थी स्वायत्तता / LEARNER AUTONOMY

May 30, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सुविधा की दृष्टि से हमने शिक्षार्थी स्वायत्तता को कुछ भागों में बाँट लिया है।

शिक्षार्थी स्वायत्तता से आशय/ Meaning of learner autonomy

शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य /Objective of learner autonomy

शिक्षार्थी स्वायत्तता व शिक्षा के अंग /Learner autonomy and part of education

1 – पाठ्यक्रम व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Curriculum and learner autonomy

2 – शिक्षक व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Teacher and learner autonomy

3 – शिक्षार्थी व शिक्षार्थी स्वायत्तता /learner and learner autonomy

4 – शिक्षण विधि व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Method of teaching and learner autonomy

5 – विद्यालय व शिक्षार्थी स्वायत्तता /School and learner autonomy

निष्कर्ष /conclusion

शिक्षार्थी स्वायत्तता से आशय/ Meaning of learner autonomy

शिक्षार्थी की स्वायत्तता को अधिगम कर्त्ता के मनन, चिन्तन, निर्णयन, कार्य इच्छा और और स्वशक्ति पर विश्वास के रूप में परिकल्पित किया जा सकता है। इसे अधिगम कर्त्ता की जिम्मेदारी लेने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है। अधिगम करने वाले को अधिगम हेतु स्वायत्त स्थिति प्रदान करना मानवीय दृष्टिकोण से एक वहनीय जिम्मेदारी है।

शिक्षार्थी की स्वायत्तता के बारे में Henri Holec महोदय का विचार है –

“Autonomy is the ability to take charge of one’s own learning.”

“स्वायत्तता अपने स्वयं के सीखने का प्रभार लेने की क्षमता है।”

Leslie Dickinsion महोदय का विचार है कि 

“Autonomy is a situation in which the learner is totally responsible for all the decisions concerned with his learning and the implementation of those decisions.”

“स्वायत्तता एक ऐसी स्थिति है जिसमें शिक्षार्थी अपने सीखने और उन निर्णयों के कार्यान्वयन से संबंधित सभी निर्णयों के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है।”

उक्त विवेचना के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिगम कर्त्ता की स्वायत्तता से आशय अधिगम के परिक्षेत्र में उसके सीखने व निर्णयन हेतु स्वयं जिम्मेदारी लेने से है।

शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य /Objective of learner autonomy

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में अपनी जवाबदेही हेतु खुद जिम्मेदारी लेने की प्रवृत्ति को बल मिला है और सभी अपने अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं शिक्षार्थी को गुण  सिखाना ही शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य है। आज की पीढ़ी निःसन्देह पूर्व पीढ़ी से अधिक जागरूक है और विभिन्न संसाधनों का प्रयोग कर ज्ञान परिक्षेत्र बढ़ा रही है। शिक्षार्थी स्वायत्तता उसे उसके अधिकारों के प्रति सचेष्ट करना एक उद्देश्य मानती है। Phill Bension महोदय लिखते हैं –

“Autonomy is a recognition of the rights of learner within educational system.” 

“स्वायत्तता शैक्षिक प्रणाली के भीतर शिक्षार्थी के अधिकारों की मान्यता है।”

शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य शिक्षार्थी को प्रभावी निर्णयन क्षमता की दक्षता प्रदान कर उसके परिणामों की जिम्मेदारी स्वीकार करने योग्य बनाती है।

संक्षेप में उद्देश्यों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

1 – स्वायत्त निर्णय लेने की क्षमता का विकास/Develop the ability to make autonomous decisions

 2 – सहयोग की भावना का विकास / Develop a spirit of cooperation

3 – स्वमूल्यांकन व स्वप्रबन्धन /Self-evaluation and self-management

4 – शिक्षार्थी की सम्प्रभुता को महत्त्व /Importance of learner’s sovereignty

5 – व्यक्तिगत भिन्नता की स्वीकारोक्ति /Acknowledgment of individual difference

6 – आत्मविश्वास वृद्धि /Confidence Increase

7 – सृजनात्मकता का विकास /Development of creativity

8 – शैक्षणिक दवाब में कमी / Reduction of academic pressure

शिक्षार्थी स्वायत्तता व शिक्षा के अंग /Learner autonomy and part of education

परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है शिक्षा जगत को क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए स्वयं को तैयार करना होगा और शिक्षा के समस्त अंगों को बदलते परिदृश्य के अनुसार शिक्षार्थी स्वायत्तता के अनुरूप स्वयं  ढालना होगा। David Little महोदय ने कहा –

“Autonomy is essentially a matter of the learner’s psychological relation to the process and content of learning.”

 “स्वायत्तता अनिवार्य रूप से सीखने की प्रक्रिया और सामग्री के लिए शिक्षार्थी के मनोवैज्ञानिक संबंध का मामला है।”

1 – पाठ्यक्रम व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Curriculum and learner autonomy

2 – शिक्षक व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Teacher and learner autonomy

3 – शिक्षार्थी व शिक्षार्थी स्वायत्तता /learner and learner autonomy

4 – शिक्षण विधि व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Method of teaching and learner autonomy

5 – विद्यालय व शिक्षार्थी स्वायत्तता /School and learner autonomy

निष्कर्ष /conclusion

आज के परिप्रेक्ष्य में जब हम शिक्षार्थी स्वायत्तता की बात करते हैं समस्त शिक्षा जगत को शिक्षार्थी स्वायत्तता के हिसाब से स्वयं को परिवर्तित करना होगा। गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा –

“The boys were encouraged to manage their own affairs, and to elect their own judge, if any punishment was to be given. I never punished them myself.”

“लड़कों को अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था, और यदि कोई सजा दी जानी थी, तो अपने स्वयं के न्यायाधीश का चुनाव करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। मैंने उन्हें स्वयं कभी दंडित नहीं किया।”

निष्कर्षतः कहा  सकता है कि इस अवधारणा द्वारा शिक्षार्थी सशक्तीकरण  का नया अध्याय  हेतु शिक्षा जगत को तैयार रहना होगा। शिक्षार्थी को मानसिक सशक्त बनाने में ही शिक्षक व शिक्षा जगत की खुशी छिपी है।

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

योग अवधारणा व अष्टांग योग 

May 21, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


योग –

योग के सम्बन्ध में महर्षि पतञ्जलि से लेकर आजतक के मनीषियों का क्रमिक योग दान रहा है निश्चित रूप से महर्षि पतञ्जलि के व्यवस्थित क्रम देने से पूर्व यह विद्यमान रहा होगा और बहुत से अनुभवों से व लम्बी साधना से इसका  प्रागट्य सम्भव हुआ होगा। यह मानव मात्र को ऋषि मुनि परम्परा की अद्भुत भेंट है। श्रीमद्भगवद्गीता में ज्ञान योग ,भक्ति योग व कर्म योग के बारे में विस्तार से समझाया गया है योग को स्पष्ट रूप से समझने हेतु इन तीन मार्गों ज्ञान योग ,भक्ति योग व कर्म योग को समझना होगा। मानव मात्र में विविध वृत्तियों के दर्शन होते हैं अपनी वृत्ति प्रधानता के आधार पर हमें योग मार्ग का चयन करना चाहिए। जो लोग ज्ञान की और झुकाव रखते हों उन्हें ज्ञान मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।जिन मानवों का झुकाव कर्म की और हो उन्हें कर्म योग के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और भावना प्रधान लोगों को भक्ति मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।  

अष्टाँग योग –

अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का संयोग है।   

यम –

इससे आशय संयम से है हमें कायिक,वाचिक व मानसिक संयम का परिचय देना होगा। यम को पाँच भागों में विभक्त किया गया है।

a – अहिंसा – विचार को इस कोटि का बनाना है कि हमारे चिन्तन व व्यवहार से प्राणिमात्र के प्रति किसी प्रकार का हिंसात्मक आचरण न हो।

b – सत्य – व्यवहार व सिद्धान्त में समान होना अर्थात मन व वचन द्वारा समान व्यवहार, अनुगमन या अनुसरण किया जाना।  

c – अस्तेय – किसी दूसरे के द्रव्य के प्रति अनासक्त भाव।

d – अपरिग्रह – विषयों के विभिन्न दोषों से विमुख रहना यानी विषयों के अर्जन, रक्षण से विमुक्त भाव रहना।  

e – ब्रह्मचर्य – संयम का परिचय अर्थात गुप्तेन्द्रिय उपस्थ का संयम में रहना।

नियम –

 नियम प्रवृत्तिमूलक होते हैं और शुभ या मंगल कार्यों केप्रति हमारी प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं।ये ही शुभ कार्यो हेतु हमें प्रवृत्त कराते हैं  इन्हें पाँच भागों में विभक्त किया गया है –

a – शौच – शौच से आशय आंतरिक व वाह्य शुद्धि से है आन्तरिक से आशय मानस के मलों से निवृत्ति व वाह्य से आशय बाहरी शुद्धि जिसके लिए पहले मिट्टी व जल का प्रयोग होता था और आज साबुन व विविध उपादानों का प्रयोग किया जाता है।

b – सन्तोष – यह शान्ति प्राप्ति का सर्वथा सशक्त उपागम है। जो है जैसा है उसी में सन्तुष्ट रहना। यह गुण ही सन्तोष है। 

c – तप – इससे आशय है सुख दुःख को समान समझने की शक्ति का जागरण जो शरीर को तपाने, दुःख सहने योग्य बनाने, और इस हेतु गर्मी ,सर्दी,बरसात की त्रासदई स्थिति में रहने व कठिन व्रतों के अनुपालन के अभ्यास से है।   

d – स्वाध्याय – नियम, विधि विधान को ध्यान में रखकर धर्म ग्रंथों की स्वयम द्वारा की गई अनवरत साधना। 

e – ईश्वर प्राणिधान – भक्तिपूर्वक ईष्ट के प्रति सम्पूर्ण समर्पण।

आसन –

हमें साधना हेतु शरीर को एक ऐसी स्थिति में रखना होता है जिसमें दीर्घ अवधि तक सुख पूर्वक रहा जा सके.इसी स्थिति को आसन नाम से जाना जाता है। जगत में विविध प्रकार की जीव जातियां हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं सिद्धासन,गरुण आसन,भुजङ्गासन, शीर्षासन आदि विविध प्रकार के आसान हैं हाथ प्रदीपिका में इसका सुन्दर वर्णन द्रष्टव्य है आजकल बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्ण की तत्सम्बन्धी पुस्तक में इसे देखा जा सकता है।

प्राणायाम –

प्राण शक्ति अर्थात श्वांस प्रश्वांस के विविध आयामों को ही प्राणायाम कहा जाता है। प्राणायाम वस्तुतः श्वांस प्रश्वांस का गति विच्छेद ही है। इसमें मुख्यतः पूरक, कुम्भक व रेचक का आधार रहता है पूरक अर्थात श्वांस को पूरा अन्दर की ओर खींचना, कुम्भक से आशय इसके रोके जाने से एवं रेचक से आशय इसके छोड़े जाने से है। इनसे शारीरिक,मानसिक दृढ़ता व चित्त की एकाग्रता में अद्भुत प्रगति देखी जाती है।

प्रत्याहार –

मानव में विविध इन्द्रियों का समागम रहता है जो विविध क्रियाओं का आधार है जब इन्द्रियाँ वाह्य प्रपंचों से मुक्त होकर अर्थात वाह्य विषयों से हटकर चित्त के समान निरुद्ध हो जाती हैं तो यह स्थिति प्रत्याहार है। जब वाह्य जगत में मन विचरण की यात्रा अन्तर्मुखी  अन्दर की यात्रा सुनिश्चित करती है तब प्रत्याहार निष्पन्न होता है इस स्थिति में संसार में रहते हुए सांसारिक वस्तुएं साधक को बाँध नहीं पातीं।

धारणा –

चित्त को किसी एक स्थान पर स्थिर कर देना धारणा कहलाता है जैसे हृदय कमल में ,नाभि चक्र में या किसी भी बाहर की वस्तु में  स्थिर कर देना धारणा कहलायेगा।

ध्यान –

ध्यान की अवस्था में ध्येय का निरन्तर मनन किया जाता है और विषय का ज्ञान स्पष्ट रूप से प्राप्त हो जाता है एवम् इस तरह से योगी के मन में ध्येय वस्तु का यथार्थ स्वरुप प्रगट हो जाता है। अतः जब ध्येय वस्तु का ज्ञान एकाकार रूप लेनेलगता है तो उसे ध्यान कहते हैं।

समाधि –

योग का अन्तिम लक्ष्य व्यक्ति को पूरी तरह से अन्तर्मुखी बनाना है समाधि, चित्त की वह अवस्था है जिसमें प्रतीति केवल ध्येय की ही होती है और चित्त का अपना स्वरुप शून्य सा हो जाता है।

————————–

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

शिक्षक की जवाबदेही/TEACHER’S ACCOUNTABILITY

May 19, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक अपने दायित्वबोध को समझ कर कई कार्यों को अंजाम देता है वे कार्य व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जन आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बनते हैं। एक शिक्षक की जवाब देही को भौतिक जगत बांधने की कोशिश कर सकता है लेकिन वह प्रकृति, पशु पक्षियों और सम्पूर्ण मानवता के प्रति जवाब देह है।आज बदलती हुई परिस्थितियों में शिक्षक के प्रति समय की अवधारणाओं ने करवट ली है जिससे जनमानस की सोच और आज के शिक्षक के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है।

बदलते हुए काल ने बाजारवाद का प्रभाव हर परिक्षेत्र पर छोड़ा है और अध्यापकीय परिवेश भी इससे अछूता नहीं है।श्रीवास्तव एवं पण्डा ने अपने 2006 के शोध में दर्शाया –

“शिक्षकों की जवाबदेही से तात्पर्य है कि शिक्षक दिए गए उत्तरदायित्वों को किस मात्रा व् किस सीमा तक निभाता है। ऐसा न करने पर वह कारण बताने पर बाध्य होता है। जवाबदेही अथवा प्रतिबद्धता किसी अधिकारी द्वारा सॉंप गए कार्य को गुणात्मक एवं सर्वोत्तम रूप से अधिकारी के निर्देशन अनुरूप करने का बंधन एवं कार्य है।” 

हुमायूं कबीर के वे शब्द याद आते हैं –

“शिक्षक ही राष्ट्र के भविष्य निर्माता हैं।”

इस तरह के विचार जवाबदेही हेतु और विवश करते हैं। जिसे हम इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

शिक्षक की जवाबदेही का वर्गीकरण  [Classification of teacher accountability]-

A – व्यक्तिगत जवाब देही (Personal accountability)

(1) – स्वयं के प्रति

                        (2) – स्वयं के छात्र के प्रति

B – सामाजिक जवाब देही (Social accountability)

1 – सामाजिक आदर्श स्थापन हेतु

2 – भविष्य की दिशा निर्धारण हेतु

3 – सामाजिक कुरीति उन्मूलन हेतु

4 – सामाजिक सुदृढ़ीकरण हेतु जवाब देही

 C - राष्ट्र के प्रति जवाबदेही (Accountability to the nation)

                        (1) – एकता हेतु 

                        (2) – अधिकारियों के प्रति जवाबदेही

(3) – राष्ट्रोत्थान हेतु जवाबदेही

(4) – विश्वबन्धुत्व हेतु जवाबदेही

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

TEACHER AUTONOMY/शिक्षक स्वायत्तता

May 18, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक स्वायत्तता से आशय उस शक्ति से है जिससे एक अध्यापक को अपना स्वयं पर फैसला करने का अधिकार मिलता है यहाँ स्वयं पर फैसला से तात्पर्य स्वयं के दायित्वबोध के निर्वहन हेतु उपयुक्त विधि के प्रयोग से लिया जा सकता है वह अपने कार्यों के सम्पादन हेतु सम्प्रभु है। वास्तव में स्वायत्तता एक प्रकार की सम्प्रभुता ही है जिससे निर्णय लेने में उत्तमता आती है।

उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि स्वायत्तता से आशय है किसी अन्य के हस्तक्षेप के बिना व्यक्ति विशेष , राज्य, संस्था,का देश के अधिकार क्षेत्र में विषयों और मामलों में स्वतन्त्र निर्णय लेना।

कॉलिन्स (Collins) महोदय कहते हैं कि   –

“स्वायत्तता का अर्थ उस योग्यता से लगाया जा सकता है जो व्यक्ति को दूसरों के कथनों या विचारों से प्रभावित होने के बजाय स्वयं निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।”

शिक्षक स्वायत्तता का कार्य क्षेत्र (Scope of teacher autonomy)

[A] – विद्यालय परिक्षेत्र में (In school premises)

[B] – विद्यालय परिक्षेत्र के बाहर (Outside school premises)

[A] – विद्यालय परिक्षेत्र में (In school premises)

        1 – पाठ्य क्रम सम्प्रेषण

        2 – शिक्षण विधियों के प्रयोग में

        3 – विद्यालय का वातावरण

        4 – पाठ्य सहगामी क्रियाओं में

        5 – समाज उत्पादक कार्यों से सम्बद्धता

        6 – अनुशासन

        7 – शिक्षक छात्र सम्बन्ध

[B] – विद्यालय परिक्षेत्र के बाहर (Outside school premises)

         1 – पाठ्य क्रम निर्माण में सहभागिता

         2 – शिक्षा सम्बन्धी नीति निर्णयन

         3 – प्रश्न पत्र निर्माण।

         4 – मूल्याङ्कन व सुधार

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

वैदिक कालीन शिक्षा[2500 ई ०पू ०-500 ई ०पू ०]

May 12, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

वैदिक कालीन शिक्षा एवम् सामाजिक व्यवस्था पर ब्राह्मणों का एक मात्र अधिकार था इसलिए वैदिक शिक्षा को ब्राह्मणीय शिक्षा के नाम से भी जानते हैं कुछ इतिहासकार इसे वैदिक काल,उत्तर वैदिक काल,ब्राह्मण काल,उपनिषद काल,सूत्र काल और स्मृतिकाल में विभक्त कर वर्णित करते हैं परन्तु इन सभी कालों में वेदों की प्रधानता रही अतः इस सम्पूर्ण काल को वैदिक काल कहते हैं।

वैदिक शिक्षा का अर्थ – वैदिक साहित्य में ‘शिक्षा’ शब्द विद्या,ज्ञान, प्रबोध एवम् विनय आदि अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। वैदिक शिक्षा का तात्पर्य शिक्षा के उस प्रकार से था जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके और वह धर्म के आधार पर वर्णित मार्ग पर चलकर मानव जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सके जैसा  अल्तेकर महोदय ने लिखा –

“शिक्षा को ज्ञान, प्रकाश और शक्ति का ऐसा स्रोत माना जाता था जो हमारीशारीरिक,मानसिक,भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों तथा क्षमताओं का उत्तरोत्तर और सामन्जस्य पूर्ण विकास करके हमारे स्वभाव को परिवर्तित करती है और उत्कृष्ट बनाती है।”

“Education was regarded as a source of illumination and power which transforms and ennobles our nature by the progressive and harmonious development of our physical, mental, intellectual and spiritual powers and faculties.

 A.S.Altekar; Education in Ancient India    

1973, p. 8

शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श –

चूंकि जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना था इसलिए इसके अनुसार ही शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श निर्धारित किये गए जैसा कि अल्तेकर महोदय ने लिखा –

 “प्राचीन भारतीय उद्देश्यों एवम् आदर्शों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है – ईश्वर भक्ति की भावना एवम् धार्मिकता का समावेश, चरित्र का निर्माण,व्यक्तित्व का विकास, सामाजिक कर्तव्यों को समझाना,सामाजिक कुशलता की उन्नति तथा संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार।”

“Infusion of a spirit of piety and religiousness, formation of character, development of personality, inculcation of civic and social duties, promotion of social efficiency and preservation and spread of national culture may be described as the chief aims and ideals of ancient Indian Education.” – A. S. Altekar,pp8-9

1 – धर्म परायणता की भावना एवम् धार्मिकता का समावेश

      (Infusion of a spirit of piety and religiousness)

2 – सामाजिक कुशलता की उन्नति (Promotion of Social Efficiency)

3 – चरित्र निर्माण (Formation of character)

4 – व्यक्तित्व का विकास (Development of personality)

5 – नागरिक एवम् सामाजिक कर्त्तव्यों की समझ (Inculcation of civic and social duties)

6 – राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण व प्रसार (Preservation and spread of National culture)

शिक्षा व्यवस्था (Organization of Education) –

01 – गुरुकुल प्रवेश

02 – उपनयन संस्कार

03 – पाठ्य क्रम

04 – शिक्षण विधि

05 – शिक्षा की अवधि

06 – शिक्षण सत्र

07 – अवकाश

08 – शिक्षण संस्थाओं का समय

09 – शिक्षण शुल्क व अर्थ व्यवस्था

10 – शिक्षा वाह्य नियन्त्रण से मुक्त

11 – परीक्षाएं व उपाधियाँ

12 – समावर्तन संस्कार

विशिष्ट शिक्षाएं –

1 – स्त्री शिक्षा

2 – व्यावसायिक शिक्षा

3 – पुरोहितीय शिक्षा

4 – सैनिक शिक्षा

5 – वाणिज्य शिक्षा

6 – कला कौशल की शिक्षा

7 – आयुर्वेद शास्त्र 

8 – पशु चिकित्सा

वैदिक शिक्षा का मूल्याँकन –

गुण :-

1 – धार्मिक भावना का विकास

2 – चरित्र निर्माण

3 – व्यक्तित्व का विकास

4 – नागरिक व सामाजिक उत्तरदायित्व भावना का विकास

5 – सामाजिक सुख समृद्धि की वृद्धि

6 – राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण व विकास

7 – गुरु छात्र सम्बन्ध

8 – पवित्र प्राकृतिक वातावरण

दोष :-

1 – धार्मिकता पर अधिक बल

2 – भौतिक विज्ञानों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान

3 – लोक भाषाओँ की उपेक्षा

4 – विषयों में समन्वय का अभाव

5 – हस्त कार्य के प्रति हे भावना

6 – स्त्री शिक्षा की उपेक्षा

7 – शूद्रों के साथ न्याय नहीं

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

प्रजातन्त्रीय भारत में शिक्षा के उद्देश्य [Aims of Education in Democratic India ]

May 3, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जिन्हें शिक्षा के उद्देश्य कहा जाता है वास्तव में वे सम्पूर्ण मानवता के उद्देश्य होते हैं और शिक्षा वह साधन है जिससे यह उद्देश्य प्राप्त किए जाते हैं।लेकिन बलचाल में हम शिक्षा के उद्देश्य का प्रयोग करते हैं और ये इतने आवश्यक हैं कि बी ० डी ० भाटिया जी को कहना पड़ा कि :-

“Without the knowledge of aims, the educator is like a sailor who does not know the goal or his determination, and the child is like a rudderless vessel which will be drifted along somewhere ashore.”

“उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मन्जिल को नहीं जानता है और बालक उस पतवार विहीन नौका के सामान है जो लहरों के थपेड़े खाकर किसी भी किनारे जा लगेगी।”’

प्रजातन्त्रीय देश भारत के उत्थान हेतु यह परम आवश्यक होगा कि वह लोकतन्त्र की मर्यादा के अनुरूप सम्पूर्ण देश की शिक्षा हेतु उद्देश्यों का निर्धारण करे और इस उद्देश्य निर्धारण में निम्न बिन्दु महती भूमिका का निर्वहन करेंगे। सुविधा की दृष्टिकोण से इन्हें तीन भागों में विभक्त किया गया है।

[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य

[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य

[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य

[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य

01 – शारीरिक विकास

02 – चारित्रिक विकास

03 – आध्यात्मिक विकास

04 – मानसिक विकास

05 – सांस्कृतिक विकास

06 – वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास

07 – सकारात्मक रूचि का विकास

08 – चिन्तन शक्ति का विकास

09 – आर्थिक सक्षमता का विकास

10 – प्रजातान्त्रिक नागरिकता का विकास

[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य

01 – कल्याणकारी राज्य की स्थापना

02 – सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास

03 – सामाजिक बुराइयों का अन्त

04 – जन शिक्षा का प्रसार

05 – वातावरण से सामन्जस्य शक्ति का विकास

[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य

01 – राष्ट्रीय एकता

02 – भावनात्मक एकता

03 – अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का विकास

04 – बेरोजगारी निवारण, व्यावसायिक विकास

05 – उत्पादन क्षमता में वृद्धि

06 – आधुनिकीकरण शक्ति का विकास

07 – मूल्य संरक्षण

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

शिक्षक स्वायत्तता और जवाबदेही (Teacher autonomy and accountability)

April 24, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक स्वायत्तता से आशय –

शिक्षक स्वायत्तता का सीधा सादा अर्थ है शिक्षक को उसके निमित्त कार्यों में स्वतन्त्रता। शिक्षक के दायित्व बदलते समय के साथ सामाजिक मांगों के अनुरूप परिवर्तित होते रहते हैं और सारी समस्याओं के निदानीकरण हेतु शिक्षा की और देखा जाता है जिसका निर्वहन शिक्षक को करना होता है शिक्षक को स्वतंत्र चिंतन के साथ स्वायत्त रूप से कार्य करने की आवश्यकता यहीं से पारिलक्षित होने लगती है। शिक्षक स्वायत्तता वस्तुतः अधिगम को प्रभावी व व्यावहारिक बनाने के  लिए  विषयवस्तु की आवश्यकतानुरूप शिक्षक द्वारा बिना किसी बाहरी दवाब से प्रभावित हुए कार्य को परिणति तक पहुँचाने से है।

            यह कोई ऐसी निश्चित सत्ता नहीं है जो कुछ लोगों के पास होती है और कुछ के पास नहीं यह संस्थान,पाठ्यक्रम ,राज्य तन्त्र से सीधे प्रभावित होती है वैतनिक अध्यापक निर्धारित पाठ्यवस्तु को अपनी क्षमता के अनुसार अधिगम कराने हेतु शिक्षण विधियों व सम्प्रेषण के लिए स्वायत्त है। . संजीव बिजल्वाण महोदय ने प्रवाह मई -अगस्त 2015 में ‘अध्यापक स्वायत्तता ‘ नमक लेख में लिखा –

“बदलते सन्दर्भों, मायनों,व भूमिकाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण बात हे शिक्षक और शिक्षार्थी की स्वायत्तता। सीखने और सिखाने की प्रक्रिया तभी लचीली और सन्दर्भ व परिवेश आधारित होगी जब शिक्षक इसके लिए स्वायत्त होगा। ” 

अध्यापक स्वायत्तता से आशय विविध परिसीमाओं के अन्तर्गत शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षक द्वारा स्वायत्त रूप से कार्य करने से है।

शिक्षक स्वायत्तता और विविध काल –

a – वैदिक काल

b – बौद्ध काल

c – मुस्लिम काल

d – ब्रिटिश शासन काल

e – आजाद भारतीय कालावधि

आज का अध्यापक एक व्यवस्था (System ) का एक हिस्सा है जो राज्य द्वारा संचालित होता है और यह राजनीति से इतना अधिक प्रभावित है की गलत तथ्यों ,गलत इतिहास व अनावश्यक परोसने से भी नहीं चूकता। व्यवस्था है किसी हाथ में और दिखती दूसरे हाथों में है।

शिक्षक स्वायत्तता का यथार्थ –

जब समाज व राष्ट्र के उत्थान हेतु पाठ्यक्रम निर्माण से लेकर अधिगम तक के सम्पूर्ण कालन्तराल पर विविध विज्ञ अध्यापकों के स्वतन्त्र मौलिक विचारों की छाप दिखाई देने लगेगी कुछ लोगों के निहित स्वार्थों से ऊपर उठ शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था एक स्वायत्त पक्षपात पूर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठ राष्ट्रवाद के आलोक में निर्णय लेने में सक्षम होगी। जब वास्तविक अध्यापक शिक्षा की विविध नीतियों के निर्माण से लेकर परिणाम की प्राप्ति तक प्रभावी भूमिका बिना किसी बाहरी दवाब के निभाएगा। वास्तविक अर्थों में शिक्षक स्वायत्तता होगी।

शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही –

आजाद भारत की सारी व्यवस्थाएं न तो शिक्षा के साथ न्याय कर पाईं और न सम्पूर्ण अध्यापकों के साथ, सभी राजनैतिक पार्टियां शिक्षा के दायित्व से अपना हाथ खींचने में लगीं रहीं। परिणाम यह हुआ कि लगभग 80 %शिक्षा व्यवस्था व्यक्तिगत हाथों में पहुँचकर व्यक्तिगत लाभ का साधन मात्र बनकर रह गयीं। अध्यापक बेचारा बन गया उसके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे और सारी स्वायत्तता अपने सच्चे अर्थ खो बैठी। वर्तमान भारत में सम्पूर्ण शिक्षा की व्यवस्था की जिम्मेदारी का निर्वहन निम्न माध्यम से सम्पन्न होता है और इनमें स्वायत्तता व जवाबदेही की स्थिति में अन्तर स्पष्ट द्रष्टव्य है –

1 – सरकारी संस्थाएं

2 – गैर सरकारी संस्थाएं

1 – सरकारी संस्थाएं –

इसमें सरकारी व अर्धसरकारी संस्थान आते हैं। माध्यमिक स्तर तक अलग अलग राज्यों के बोर्ड व्यवस्थाओं को संभालते हैं सीधे शासन की नीतियों के अनुरूप कार्य सम्पादित होते हैं बहुत बड़े तंत्र के रूप में इनका विकास हुआ है केन्द्रीय व राज्य स्तर पर विभिन्न नियमों विनियमों के आधार पर कार्य सम्पादित होता है।

और अध्यापक स्वायत्तता अलग अलग नियामक सत्ताओं द्वारा कार्य करने के कारण बाधित होती है चूंकि स्वायत्तता व सामञ्जस्य का स्तर निम्न है अतः जवाबदेही का स्तर भी बहुत प्रभावी नहीं बन पड़ा है। इन शिक्षण संस्थाओं में बहुत अधिक परिवर्तन की आवश्यकता है मर्यादित स्वायत्तता व प्रभावी जवाबदेही की उचित व्यवस्था न होने के कारण ,मोटा वेतन देने के बाद भी इनके विश्व स्तरीय बनाने में संदेह है।

 उच्च शिक्षा के स्तर पर स्थिति अत्यन्त दयनीय है इसमें प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर उनके मूल्याँकन तक में अध्यापक भागीदारी दिखाई देती है जितने भी अतिरिक्त लाभ के कार्य हैं बखूबी निभाए जाते हैं सिर्फ कक्षा शिक्षण के, अधिकाँश विद्यार्थी अधिकाँश जगह अनुपस्थित रहते हैं नाम मात्र की कक्षागत क्रियाएं होती हैं। शासन के साधनों का उपयोग कम दुरूपयोग अधिक देखने को मिलता है महाविद्यालय से लेकर विश्विविद्यालय तक आमूलचूल परिवर्तन की दरकार है कोई ऐसा विश्वविद्यालय खोजना मुश्किल होगा जहाँ दलाल न हों। अध्यापक स्वायत्तता, शिक्षण वातावरण के अभाव में कुप्रभावित है जवाबदेही के अभाव का प्रभाव कार्यों पर देखा जा सकता है नाम मात्र के लोग जिम्मेदारी से कार्य निर्वहन करते हैं व्यवस्था भ्रष्ट आचरण से प्रभावित दिखती है।

2 – गैर सरकारी संस्थाएं –

शासन की नीतियों के कारण ये संस्थाएं सरकारी संस्थाओं की तुलना में तीन से चार गुने विद्यार्थियों के अधिगम की व्यवस्था कर रही हैं कुछ समितियों द्वारा भी इनका संचालन किया जा रहा है लेकिन इन पर शासन द्वारा निर्धारित संस्थाओं का अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहता है ये स्ववित्त पोषित संस्थान, विविध कार्यों हेतु शासन के संस्थानों के अनुरूप कार्य करने को बाध्य होते है जिनके प्रतिनिधि हर कार्य के बदले भौतिक लाभ लेते हैं  प्रायोगिक परीक्षाओं में शतप्रतिशत प्रथम श्रेणी इन्हीं की कृपा दृष्टि का परिणाम है।

अध्यापकों के साथ भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण के कारण न तो इन संस्थाओं को शासन से उचित लाभ मिल पाता है और न इनके अध्यापकों को। समान कार्य के लिए असमान वेतन प्राप्त करने के साथ अल्प वेतन भोगी अध्यापक आयाराम गयाराम की भूमिका में अधिक देखा जाता है। इनकी पूर्ण स्वायत्तता की तो कल्पना ही व्यर्थ है  हाँ अधिगम को प्रभावी बनाने के लिए ये स्वायत्त रूप निर्णय लेते हैं और यह तुलनात्मक रूप से अधिक जवाब देह होते हैं। प्रबन्धन के सीधे सम्पर्क में रहने के कारण ये कार्य दायित्व निर्वहन के प्रति अधिक सजग रहते हैं।

            यदि समग्र रूप से विवेचना की जाए तो यह मानना ही होगा कि कुछ अच्छे लोगों ने ही सम्पूर्ण व्यवस्था को सही दिशा दे रखी है और ये सब जगह हैं इनकी संख्या सीमित है और ये अपने कार्य के प्रति उत्तरदायित्व पूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं और जवाबदेही स्वीकार करते हैं। राष्ट्रोत्थान हेतु सीमित शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित करना परम आवश्यक है।

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

आत्मअभिव्यक्ति/Self Expression

April 18, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आत्म अभिव्यक्ति से आशय (MEANING OF SELF EXPRESSION )-

आत्म अभिव्यक्ति एक महत्त्वपूर्ण व कम व्याख्यायित शब्द है हिन्दी भाषा में आत्म शब्द स्व का परिचायक है और अभिव्यक्ति का आशय सरल शब्दों में प्रगटन से है। विकीपीडिया के अनुसार : –

 “अभिव्यक्ति का अर्थ विचारों के प्रकाशन से है व्यक्तित्व के समायोजन के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अभिव्यक्ति को मुख्य साधन माना है । इसके द्वारा मनुष्य अपने मनोभावों को प्रकाशित करता तथा अपनी भावनाओं को रूप देता है।”

साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति से आशय प्रगटन से है और स्वयम का प्रगटन चाहे वह किसी भी माध्यम से हो,आत्म अभिव्यक्ति कहलाता है।

आत्म अभिव्यक्ति के प्रकार (TYPES OF SELF EXPRESSION)-

विविध विद्वानों ने इसे विविध प्रकार से विवेचित किया है जिससे इसका स्वरुप जटिल हो गया है लेकिन मुख्य रूप से इसके प्रकारों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है। –

1 – शाब्दिक

 (a )- लिखित

 (b) – मौखिक

2 – अशाब्दिक -समस्त कलाएं

3 – चेतन शारीरिक भाषा  

आत्म अभिव्यक्ति को सुधारने के उपाय   (Ways to improve self expression) –

आत्म अभिव्यक्ति को सुधारने के उपायों को समझने हेतु यह आवश्यक है कि आत्म अभिव्यक्ति को प्रभावित करने वाले कारक  (TYPES OF SELF EXPRESSION) की समझ विकसित करने के साथ निम्न बिंदुओं पर गहनता से सम्पूर्ण क्षमता भर ध्यान दिया जाए। 

शारीरिक भाषा (Body Language) में सुधार हेतु वे सभी प्रयास सम्मिलित किये जाने चाहिए जो कौशल विकास से सम्बंधित हैं।

अशाब्दिक अभिव्यक्ति हेतु निरन्तरता ,जिज्ञासा, धैर्य, क्षमता सम्वर्धन की अनवरत साधना परमावश्यक है।

  आत्म अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाने हेतु डॉ ० सतीश बत्रा जी का मानना है कि सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति में निम्न का विशेष संज्ञान लिया जाए –

1 – अधिक

2 – अनावश्यक

3 – अप्रिय

4 – अप्रासंगिक

5 – असमय

6 – असम्बन्धित

7 – अपात्र

साथ ही बत्राजी प्रभावी अभिव्यक्ति हेतु KISSSSS पर विशेष जोर देते हैं जिसका आशय है –

K – keep

I – it

S – Simple

S – Short

S – Straight

S – Sense full 

S – Strength of evidence

यानि कि तथ्यों को सम्प्रेषित करने में बात को सरल संक्षिप्त सीधा सार्थक व प्रभावी तरीके से रखा जाए।

अन्त में अध्यापकों से मैं विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि वे यदि निम्न पर ध्यान देंगे तो अच्छी आत्म अभिव्यक्ति कर पाएंगे –

T – Talent

E – Evaluation before communication

A – Apologize for mistakes

C – Confusion Removal

H – Harmony

E – Effectiveness

R – Realistic Approach

 वस्तुतः यह तथ्य सर्व विदित है कि जहां चाह वहाँ राह ,यदि आप पूरे आत्म विश्वास से आत्म अभिव्यक्ति प्रभावी बनाने का प्रयास करेंगे तो लक्ष्य की निकटता महसूस करेंगे और जल्दी आपका सपना साकार होगा।

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

पाठ्यक्रम मूल्याँकन के मानदण्ड और प्रक्रिया /CRITERIA AND PROCESS OF CURRICULUM EVALUATION

April 15, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षा की त्रिमुखी प्रक्रिया का और अध्यापक व विद्यार्थी के बीच सम्वाद का प्रमुख साधन पाठ्यक्रम ही है। यह इतना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि इसके बिना शैक्षिक प्रगति और उसकी क्रमबद्धता की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। सम्यक पाठ्यक्रम मानव जाति की प्रगतिशीलता का आधार है इसलिए पाठ्यक्रम का कुछ मानदण्डों पर खरा उतरना परमावश्यक है।

पाठ्यक्रम मूल्याँकन के मानदण्ड (CRITERIA  OF CURRICULUM EVALUATION) –

चूँकि पाठ्यक्रम विद्यार्थी के अधिगम का आधार होने के साथ उसके व्यवहार परिवर्तन का भी प्रमुख आलम्ब है अतः यह परम आवश्यक है की उसे निम्न मानदण्डों को अवश्यमेव अपने में समाहित करना चाहिए। पाठ्यक्रम मानदंडों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।

1 – विश्वसनीयता (Reliability)

2 – वैधता (Validity)

3 – क्रमबद्ध सम्बद्धता (Serial affiliation)

4 – सामन्जस्यता (Harmony)

5 – व्यावहारिकता (Practicality)

6 – लोचशीलता (Elasticity)

पाठ्यक्रम मूल्याँकन की प्रक्रिया (PROCESS OF CURRICULUM EVALUATION) –

पाठ्यक्रम का निर्माण शिक्षा के उद्देश्यों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि इससे अधिगम की सुगमता व व्यवहार में परिवर्तन के गुण की भी अपेक्षा की जाती है ऐसी स्थिति में जाहिर सी बात है कि पाठ्यक्रम के मूल्यांकन की प्रक्रिया शिक्षा व मानव व्यवहार के व्यापक परिदृश्य से सम्बन्ध रखती है। पाठ्यक्रम के मूल्यांकन के माध्यम से ही यह ज्ञात होता है कि कोई अपने निर्माण का उद्देश्य कहाँ तक पूर्ण करने में सक्षम है। अतः पाठ्यक्रम मूल्यांकन की प्रक्रिया निम्न सोपानों से होकर गुजरती है।

1 – शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति

2 – शैक्षिक स्तर से समन्वयन

3 – प्राप्त अधिगम अनुभव का विवेचन

4 – व्यावहारिक सक्रियता में परिवर्तन

5 – विद्यार्थियों हेतु सार्थकता

6 – अधिगम स्थानान्तरण से अनुकूलता

7 – व्यावहारिक जीवन में उपादेयता

8 – ज्ञानात्मक व भावात्मक पक्ष की प्रबलता

            वस्तुतः पाठ्य क्रम मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है जो एक चक्र पाठ्यक्रम नियोजन -पाठ्यक्रम प्रस्तुतीकरण -विकास प्रक्रिया -मूल्यांकन तक पहुँचती है तत्पश्चात पुनः शुरू हो जाता है  पुनः पाठ्यक्रम नियोजन -पुनः पाठ्यक्रम प्रस्तुतीकरण -पुनः विकास प्रक्रिया -पुनः मूल्यांकन।

क्योंकि मानव की प्रगति काल के सापेक्ष होती है अतः एक बार का मूल्यांकन हर काल का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।

—————————-

Share:
Reading time: 1 min
शिक्षा

माह भर में परीक्षा की तैयारी कैसे करें. How to prepare for the exam in a month?

April 10, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आज जहाँ कुछ बच्चे जान बूझ कर पढ़ने से जी चुराते हैं वहीं कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो सचमुच पढ़ना चाहते हैं और परिस्थितियाँ विपरीत हैं। कुछ बच्चे परिवर्तित स्थिति से साम्य बनाकर अपने अभीप्सित प्राप्त करना चाहते हैं।चाहे कारण कोई रहा हो कुछ बच्चों का समय  रेत की तरह हाथ से फिसल गया है  और मात्र एक माह शेष है और उनकी बलवती इच्छा।

सबसे पहले इन सभी की सकारात्मक ऊर्जाओं का वन्दन ,उक्त सारी परिस्थितियाँ अपने विद्यार्थियों, चाहे वो कहीं भी हैं से मुझे मिली हैं उन सभी विद्यार्थियों में से चुने हुए 10 प्रश्न और क्षमता भर उनके उत्तर देने का प्रयास करता हूँ आशा है सभी को जवाब मिल जाएगा। सामान परिस्थिति वाले देश के अन्य अधिगमार्थियों को भी लाभ मिलेगा। वादे के अनुसार किसी भी नाम का उच्चारण नहीं करूंगा ?

प्रश्न – मेरे परिवार का गुजारा एक दूकान से चलता है पिताजी की अस्वस्थता के कारण मैं दूकान पर बैठता हूँ प्रातः 10 बजे सुबह से रात्रि 8 बजे तक का समय दूकान के कार्यों में लग जाता है। परीक्षा की तैयारी कैसे हो ?

उत्तर – ये सही है कि बारह घण्टे कार्य के बाद थकान होती है आप दूकान से आकर अपने आप को तारो ताजा करें स्नान अनुकूल लगे तो किया जा सकता है खाइये पीजिए थोड़ा बहुत समय अपने मनोरञ्जन को दीजिये और सो जाइए कम से कम 6 घण्टे की नींद भी लीजिए तनाव रहित रहिए सब आराम से प्रबंधन हो जाएगा 10 बजे रात्रि से सुबह 4 बजे तक की आराम दायक नींद लीजिये उठिए प्रभु का कृतज्ञता ज्ञापन कीजिये दैनिक कार्यों यथा शौच, दन्त धावन, शेविंग,स्नान आदि से निवृत्त होकर सुबह 5 बजे से 10 बजे तक में से केवल 3 घण्टे अध्ययन को प्रति दिन दीजिए और इसमें चुने हुए कम से कम 4  प्रश्न याद कीजिए। विश्वास रखिये इन प्रश्नों की संख्या कब बढ़ गयी आपको पता ही नहीं चलेगा। 10 दिनों में आपका आत्म विश्वास लौट आएगा। सप्ताहान्त का समुचित प्रयोग करें। आप निश्चित सफल होंगे। 

प्रश्न – मेरे पति सहयोगी प्रवृत्ति के हैं मेरा बच्चा छोटा है मेरे से चिपका रहता है कब और कैसे पढ़ूँ ?

उत्तर – ऐसी स्थिति में आपको समय प्रबन्धन की आवश्यकता है जल्दी सोना और जल्दी उठना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है यह सोचकर आप दोनों समय का ऐसा विभाजन करें कि आप दोनों बच्चे की देखभाल के साथ पूरी नींद ले सकें। पूरी नींद लेने से अधिगम सशक्त होता है यदि आप रात्रि 8 बजे से दो बजे तक सोने का क्रम रखें ,हॉस्टल वाले बच्चों की तरह तो सुबह 2 बजे से पाँच, छः बजे तक अच्छी पढ़ाई हो सकती है बशर्ते की आप यह दिन में नोट कर लें कि रात्रि में क्या क्या याद करना है। सुबह उठने पर आप 30 मिनट प्राणायाम हेतु निकाल कर अपनेआप को रीचार्ज कर सकती हैं। पाँच  छः दिन में स्थिति अनुकूल हो जाएगी स्वास्थय का पूरा ध्यान रखना है।

प्रश्न – मैं एम० एड ० प्रथम वर्ष का छात्र हूँ  आठ घण्टे की प्राइवेट फर्म में सेवा व दो घण्टे आने जाने के व्यय करके जीवनयापन कर रहा हूँ मेरा अवकाश सोमवार को पड़ता है इसलिए केवल सोमवार को व कभी छुट्टी लेकर महाविद्यालय जा पाता हूँ।कब व कैसे तैयारी करूँ ?

उत्तर – जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं। … ये पंक्तियाँ आपको दिशा देंगीं। आप दो दो हफ़्तों में पूरे होने वाले लेक्चर्स यू ट्यूब – Education Aacharya पर देख सुन सकते हैं और वो भी एक घण्टे से भी कम समय में,यानी जब आप बस यात्रा कर रहे होते हैं। यदि लिखा हुआ मैटर चाहिए तो educationaacharya.com से ले सकते हैं। शेष आप जो भी समय निकाल सकते हैं उसे 40 मिनट के कालांश में तोड़ लें व सलेक्टेड स्टडी करें। कुछ भी असम्भव नहीं है।

प्रश्न – मेरा प्रायोगिक कार्य पूर्ण है लघु शोध भी हो चुका है लेकिन अब परीक्षा में लगभग एक माह शेष है प्रश्नों की तैयारी एम० एड ० परीक्षा हेतु कैसे करूँ ?

उत्तर –  घबराने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है इतना प्रायोगिक कार्य पूर्ण होने पर अब समस्त ध्यान पढ़ने पर ही लगाने की आवश्यकता है ,आप यूनिट के हिसाब से 10 -10 उद्धरण (Quotation) लिख लिखकर याद करें।  प्रश्न के शीर्षक उपशीर्षक बार बार लिखकर याद करें। अलग अलग तरह के प्रश्नों में अपने याद किये उद्धरण प्रयुक्त करने की कला सीखें। निश्चित रूप से आप अच्छा कर पाएंगे। स्वयं योजना बनाकर विगत वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर अपने उत्तरों को व्यवस्थित करें।अवश्यमेव कल्याण होगा।

प्रश्न – मैं बी० एड ० द्वित्तीय वर्ष की विद्यार्थी हूँ मेरा लेख बहुत खराब है ब्लैक बोर्ड स्किल से डर लगता है वैसे मैं याद सब कर लेती हूँ सुना भी सकती हूँ पर लेख कैसे सुधारूँ ?

उत्तर – महाकवि वृन्द ने कहा –

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निशान।

इसी में आपके प्रश्नका उत्तर छिपा है  आपको निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता है यह ध्यान रखना है अक्षर सीधे लिखे जाएँ अक्षर और अक्षर के बीच की दूरी व शब्द और शब्द की दूरी बराबर रखी जाए। पंक्तियाँ एक दूसरे के समानान्तर रहें। शीघ्र ही वाँछित लाभ मिलेगा। अभ्यास में निरंतरता रखें।

प्रश्न – मैं सॉफ्ट बॉल और मेरी बहिन कबड्डी की खिलाड़ी हैं अभी हम दोनों अन्तर्विश्वविद्यालयी प्रतियोगिता से लौटे हैं क्रीड़ा की तैयारी में पढ़ाई कहीं पीछे छूट गई अब 30 – 35 दिनों में परीक्षा की तैयारी कैसे करें ?

उत्तर – आपसे बस यह कहना है –

          करे कोशिश अगर इंसान तो क्या क्या नहीं मिलता 

          वो सिर उठा कर तो देखे, जिसे रास्ता नहीं मिलता,

         भले ही धूप हो काँटे हों राहों में मगर चलना तो पड़ता है,

         क्योंकि किसी प्यासे को घर बैठे कभी दरिया नहीं मिलता।

         स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मष्तिष्क निवास करता है उचित रणनीति, सही समय विभाजन, लिख लिखकर अभ्यास, विगत वर्षों के प्रश्न पत्र सभी आपकी मदद को तैयार बैठे हैं। विश्वास रखें और एक भी दिन खराब न जाने दें ,गुरुओं से निर्देशन लें। पूर्ण विश्वास है  मैदान की तरह परीक्षा में में भी आपका प्रदर्शन लाजवाब रहेगा। 

प्रश्न – मैं MSW का छात्र हूँ मेरी समस्या यह है कि मैं  याद किया हुआ परीक्षा कक्ष में भूल जाता हूँ, क्या करूँ ?

उत्तर –  कई विद्यार्थी इस समस्या से ग्रस्त हैं सबसे पहले अपने खान पान की आदत में सुधार करना है अधिक गरिष्ठ भोजन से बचना है और तजा सुपाच्य भोजन करना है जब कुण्डलिनी की सारी शक्ति भोजन पचाने में लगी रहती है तब भी ऐसा देखने को मिलता है। दूसरे आत्मविश्वास विकसित करना है प्रश्नो को  निश्चित समय में खुद लिखकर अभ्यास करना है। पर्याप्त पानी का सेवन करना है। प्राणायाम, व्यायाम, ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाना है। निश्चित रूप से आशातीत सफलता मिलेगी।

प्रश्न – मैंने  PCM ग्रुप से B.Sc. की है बी० एड ० के बाद ईश्वर कृपा से नौकरी भी मिल गई है हाई स्कूल को पढ़ाता हूँ अब की M.A राजनीति शास्त्र का प्राइवेट फार्म भरा है,इसमें तो फार्मूले भी नहीं होते,  इतना सारा कैसे लिखा जाएगा ?

उत्तर – आप अध्यापक हैं कई विद्यार्थियों के प्रेरणा स्रोत,निश्चित रूप से आपने कहावत सुनी होगी –

 जहाँ चाह वहाँ राह 

आप यकीन मानिए विचार संसार की सबसे ताकतवर शक्ति है और जब आप दृढ़ इच्छा शक्ति से इस दिशा में कार्य करेंगे तो कई पथ प्रकाशित होते चले जाएंगे रही बात फार्मूले की तो वो आप यहां भी बना सकते हैं प्रत्येक शीर्षक का पहले अक्षर को लेकर मिला लीजिये फार्मूला तैयार है। मानलीजिए आपको अपने प्रश्न के उत्तर में 10 उप शीर्षक देने हैं तो आप हेड्स याद करने के साथ 10 अक्षर का फार्मूला बना लीजिये वह दसों शीर्षक क्रम से याद आते जाएंगे।

यहाँ मैंने अपनी क्षमता भर आपके प्रश्नों का समाधान देने का प्रयास किया है लेकिन याद रखें एक ही समस्या के कई समाधान होते हैं इसलिए हिम्मत न हारते हुए हम सबको तब तक प्रयास करना चाहिए जब तक समस्या समाधान न हो जाए अन्त में आपसे यही कहूँगा –

रास्ता किस जगह नहीं होता

सिर्फ हमको पता नहीं होता

छोड़ दें डरकर रास्ता ही हम

ये कोई  रास्ता नहीं होता।  

Share:
Reading time: 1 min
Page 6 of 8« First...«5678»

Recent Posts

  • APTITUDE
  • स्वतन्त्रता दिवस
  • रक्षा बन्धन
  • तुलसी लौट आएंगी।
  • Objectives of higher education

My Facebook Page

https://www.facebook.com/EducationAacharya-2120400304839186/

Archives

  • August 2025
  • July 2025
  • June 2025
  • May 2025
  • April 2025
  • March 2025
  • February 2025
  • January 2025
  • December 2024
  • November 2024
  • October 2024
  • September 2024
  • August 2024
  • July 2024
  • June 2024
  • May 2024
  • April 2024
  • March 2024
  • February 2024
  • September 2023
  • August 2023
  • July 2023
  • June 2023
  • May 2023
  • April 2023
  • March 2023
  • January 2023
  • December 2022
  • November 2022
  • October 2022
  • September 2022
  • August 2022
  • July 2022
  • June 2022
  • May 2022
  • April 2022
  • March 2022
  • February 2022
  • January 2022
  • December 2021
  • November 2021
  • January 2021
  • November 2020
  • October 2020
  • September 2020
  • August 2020
  • July 2020
  • June 2020
  • May 2020
  • April 2020
  • March 2020
  • February 2020
  • January 2020
  • December 2019
  • November 2019
  • October 2019
  • September 2019
  • August 2019
  • July 2019
  • June 2019
  • May 2019
  • April 2019
  • March 2019
  • February 2019
  • January 2019
  • December 2018
  • November 2018
  • October 2018
  • September 2018
  • August 2018
  • July 2018

Categories

  • Uncategorized
  • काव्य
  • दर्शन
  • बाल संसार
  • मनोविज्ञान
  • वाह जिन्दगी !
  • विविध
  • शिक्षा
  • शोध
  • समाज और संस्कृति
  • सांख्यिकी

© 2017 copyright PREMIUMCODING // All rights reserved
Lavander was made with love by Premiumcoding