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शिक्षा

महात्मा गाँधी/ MAHATMAGANDHI

January 1, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

महात्मा गाँधी का नाम किसी परिचय का मुहताज नहीं है इनका पूरा नाम मोहन दास करम चन्द्र गाँधी था और वास्तव में इनके कार्यों ने व्यवहार में परिणति पाकर शैक्षिक जगत के कई विषयों में स्थान पाया अर्थ शास्त्र, राजनीति शास्त्र, इतिहास, समाज शास्त्र, हिन्दी, दर्शन शास्त्र, शिक्षाशास्त्र  आदि विभिन्न विषयों में हम सब इनका अध्ययन करते हैं।

गाँधीजी के व्यक्तित्व व कृतित्व से प्रभावित होकर एम0 एस0 पटेल महोदय ने कहा –

” Gandhiji  has secured a unique place in the galaxy of the great teachers who have brought fresh light in the field of education.”

”गाँधीजी ने उन महान शिक्षकों और उपदेशकों की गौरवपूर्ण मण्डली में स्थान प्राप्त किया है जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में नवज्योति दी है।” 

PHILOSOPHY OF LIFE

जीवन दर्शन

आजाद भारत के प्रणेता महात्मा गाँधी का जीवन दर्शन जिन आधारों पर अवलम्बित है उन्हें इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है। –

→ सृष्टि के सभी मानवों में आध्यात्मिक समानता है क्योंकि सृष्टि के सभी मानव आत्माधारी हैं।

→ परमात्मा का अंश आत्मा है और परमात्मा सत्य है अतः आत्मा भी सत्य है।

→ मानव को ज्ञान प्राप्ति में भौतिकता व आध्यात्मिकता का यथायोग्य सामन्जस्य करना चाहिए।

→ आत्मानुभूति मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य है।

→ भक्ति आत्मानुभूति का पवित्र साधन है।

→ गाँधीजी के दर्शन का मूल आधार सत्य और अहिंसा हैं।

    सत्य के बारे में इनका मानना है की साधारणतः सत्य का अर्थ सच बोलना मात्र समझा जाता है पर मैंने विशाल अर्थ में सत्य का प्रयोग किया है। विचार में वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है।

गाँधीजी अपने दूसरे अमोघ शस्त्र अहिंसा के बारे में कहते हैं -”अहिंसा बिना सत्य की खोज असम्भव है अहिंसा और सत्य ऐसे ओतप्रोत हैं जैसे सिक्के के दोनों रूप ,उसमें किसे उल्टा कहें और किसे सीधा, फिर भी अहिंसा को साधन और सत्य को साध्य मानना चाहिए। साधन  हाथ की बात है सत्य परमेश्वर है।”

→जीवन दर्शन के व्यावहारिक पक्ष में सत्याग्रह और निर्भयता दीख पड़ता है।

गाँधीजी सत्याग्रह को सामाजिक व राजनीतिक बुराई से लड़ने की अचूक प्राविधि मानते थे इसीलिए उन्होंने 8 अक्टूबर 1952 के यंग इंडिया में लिखा –

”मैं अत्याचारी की तलवार की धार को पूरी तरह कुण्ठित करना चाहता हूँ इसके विरोध में एक से अधिक तेज शस्त्र को रखकर नहीं,किन्तु उसकी इस आशा को कि मैं उसका शारीरिक प्रतिरोध करूँगा,निराशा में बदलकर। “

वे मानते थे कि जो निडर नहीं होगा वह सत्य और अहिंसा का अनुयायी हो ही नहीं सकता भय कई प्रकार का हो सकता है शारीरिक आघात का भय, बीमारी का भय,अधिकार या पद छिनने का भय। हमें सभी प्रकार के भय से मुक्त हो निर्भय होना चाहिए।

→ गाँधीजी के जीवन दर्शन में उनके सर्वोदय सिद्धान्त का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

EDUCATIONAL THOUGHT OF GANDHIJI

गाँधीजी के शैक्षिक विचार

Or

GANDHIJI’S PHILOSOPHY OF EDUCATION

गाँधीजी का शिक्षा दर्शन

गाँधीजी कोई शिक्षाविद नहीं थे ये राजनैतिक पटल से उभरे व्यावहारिक पक्ष का मूर्तिमान स्वरुप थे इन्होने स्वीकार किया –

”जो शिक्षा चित्त की शुद्धि न करे, निर्वाह का साधन न बनाये तथा स्वतंत्र रहने का हौसला और सामर्थ्य न उपजाए,उस शिक्षा में चाहे जितनी जानकारी का खजाना, तार्किक कुशलता और भाषा पाण्डित्य मौजूद हो वह सच्ची शिक्षा नहीं। “

CONCEPT OF EDUCATION

शिक्षा का सम्प्रत्यय

गाँधीजी शिक्षा का दायरा विकसित कर इसमें पढ़ने लिखने के साथ हाथ, मस्तिष्क और हृदय के विकास को भी शामिल करना चाहते हैं। इसीलिये इन्होने कहा है कि –

”By education I mean an all round drawing out of the best, in child and man-body,mind and spirit.”

”शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा के उच्चतम विकास से है। “

ये केवल पढ़ना लिखना या साक्षरता को शिक्षा की श्रेणी में नहीं रखते बल्कि स्पष्ट कहते हैं कि –

”Literacy is not the end of education nor even the biginning. It is only one of the means whereby men and women can be educated.”

”साक्षरता न तो शिक्षा का अन्त है और न प्रारम्भ। यह केवल एक साधन है जिसके द्वारा पुरुष और स्त्रियों को शिक्षित किया जा सकता है।”

Aims of Education

शिक्षा के उद्देश्य

गाँधीजी के शिक्षा सम्बन्धी विचारों के आधार पर उद्देश्यों को दो भागों में बाँटकर अभिव्यक्त किया जा सकता है। यथा –

→Immediate Aim of Education

   शिक्षा के तात्कालिक उद्देश्य 

A – शारीरिक विकास (Physical Development)-

गाँधीजी ने अपने जीवन के अनुभव के आधार पर आत्मिक विकास  हेतु शारीरिक विकास को अवलम्ब के रूप में स्वीकार किया।

B — Intellectual and Mental Development

बौद्धिक व मानसिक विकास  

गाँधीजी शारीरिक विकास के साथ बुद्धि एवं मानसिक विकास को आवश्यक मानते थे सत्य व अहिंसा का आचरण सशक्त बौद्धिक व मानसिक स्थिति वाला व्यक्तित्व ही कर सकता है।

C – Individual and Social Development

वैयक्तिक तथा सामाजिक विकास

गाँधीजी समाज को पुष्ट करने हेतु उसकी प्रत्येक इकाई को सशक्त करने के पक्षधर थे ये शासन द्वारा प्रदत्त साधनों को समाज केअन्तिम व्यक्ति तक पहुँचाना व्यवस्था का धर्म समझते थे।मानव मानव में प्रेम के बढ़ने से सामाजिक समरसता का विकास होगा जो अन्ततः विश्व बन्धुत्व की भावना को बलवती करेगा।

D – Character Development

      चारित्रिक विकास

गाँधीजी शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को चारित्रिक उत्कृष्टता प्रदान करना चाहते थे इन्होने अपनी आत्म कथा में लिखा –

”मैंने सदैव हृदय की संस्कृति अथवा चरित्रनिर्माण को प्रथम स्थान दिया है तथा चरित्र निर्माण को शिक्षा का उचित आधार माना है । “

उत्तम चरित्र में ये सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, निर्भयता आदि को शामिल करना चाहते थे इन्होने विद्यालय को चरित्र निर्माण की उद्योगशाला मानते हुए लिखा। –

”The end of all knowledge must be the building up of character, personal purity.”

”सभी ज्ञान का उद्देश्य उत्तम चरित्र का निर्माण व्यक्तिगत पवित्रता होना चाहिए।”

E – Spiritual and  Cultural Development

आध्यात्मिक तथा  सांस्कृतिक विकास

वे गीता से बहुत प्रभावित थे इसलिए ज्ञान कर्म भक्ति तथा योग आदि सद्गुणों का समर्थन करते थे और बालक के आध्यात्मिक पक्ष को प्रबल करना चाहते थे।  सांस्कृतिक विकास के बारे में  गाँधीजी का विचार था –

 ”मैं शिक्षा के साहित्यिक पक्ष के स्थान पर सांस्कृतिक पक्ष को अधिक महत्त्व देता हूँ। संस्कृति शिक्षा का आधार तथा विशेष अंग है। अतः मानव के प्रत्येक व्यवहार पर संस्कृति की छाप  होनी चाहिए। “

F – Vocational Aim

जीविकोपार्जन का उद्देश्य –

गाँधीजी की बेसिक शिक्षा की अवधारणा बालक को किसी एक शिल्प में दक्ष करने की थी ये स्पष्ट कहा करते थे –

”Education ought to be a kind of insurance against unemployment.

”शिक्षा को बेरोजगारी के विरुद्ध एक बीमा होना चाहिए।”

Ultimate Aim of Education

शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य

यहाँ गाँधीजी के विचारों में आदर्शवादी दर्शन का प्रभाव पारिलक्षित होता है ये ईश्वर प्राप्ति और आत्मानुभूति को सर्वोच्च वरीयता प्रदान करते हैं और स्वीकार करते हैं कि शिक्षा के द्वारा अंतिम वास्तविकता से साक्षात्कार कराया जाना चाहिए। आत्मानुभूति की महत्ता प्रतिपादित करते हुए उद्देश्य निर्धारित करते हैं –

”Realization of ultimate reality, a knowledge of God and self realization.”

”अन्तिम वास्तविकता का अनुभव, ईश्वर और आत्मानुभूति का ज्ञान। “

Curriculum

पाठ्यक्रम

गाँधीजी देश के नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाकर वर्गविहीन समाज को स्थापित करना चाहते थे। इनके पाठ्यक्रम में सत्य, कल्याण व सौन्दर्यबोध जाग्रत करने वाले विषयों को स्थान मिला है जिन्हे इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

1 – मातृ भाषा

2 – विभिन्न शिल्प यथा चर्म कार्य, कताई, बुनाई, बागवानी, कृषि, काष्ठ कला, मछली पालन, मिट्टी का काम व क्षेत्र आधारित अन्य शिल्प। 

3 – अंक गणित, बीज गणित, रेखा गणित, नाप तौल आदि।

4 – भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान,स्वास्थ्य विज्ञान, शरीर विज्ञान, गृह विज्ञान, प्रकृति ज्ञान, नक्षत्र ज्ञान आदि। 

5 – खेलकूद व व्यायाम। 

6 – कला व संगीत।

7 – इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, अर्थ शास्त्र व सामाजिक अध्ययन।

8 – नैतिक शिक्षा व सामाजिक कार्य।

9 – हिन्दी जहाँ यह मातृ भाषा नहीं है ।

Methods of Teaching

शिक्षण विधि  

गाँधीजी इस प्रकार की शिक्षण विधियों को प्रयोग करना चाहते थे जिसमें शिक्षार्थी भी सक्रिय रहे वह प्रयोग कर्त्ता ,शोध कर्त्ता, निरीक्षण कर्त्ता के रूप में कार्य करे।

उन्होंने करके सीखना(Learning by doing), अनुभव द्वारा सीखना (Learning by experience), सीखने की प्रक्रिया में समन्वयन (Correlation in the process of learning), प्रशिक्षण द्वारा सीखना (Learning by training) आदि पर जोर दिया।

Teacher

अध्यापक

गाँधीजी कहते थे कि जो शिक्षण कार्य को व्यवसाय न मानकर सेवा धर्म के रूप में स्वीकार करता है वही अध्यापक बन सकता है वे चाहते थे कि सेवा भावी,सहिष्णु, सत्य का आचरण करने वाले, धैर्यवान, ज्ञान पुञ्ज,साधन की पवित्रता समझने वाले लोग इस पावन कार्य से जुड़ें।     

Discipline

अनुशासन

गाँधीजी आत्म अनुशासन के पक्षधर थे ऊपर से थोपे जाने वाले अनुशासन इन्हें स्वीकार्य नहीं था ये चाहते थे की अध्यापक अपने मर्यादित आचरण व अनुकरणीय व्यवहार द्वारा विद्यार्थी में अनुशासन का समावेशन करे।

Student

विद्यार्थी

गाँधीजी बालकों के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक उत्थान हेतु ब्रह्मचर्य पर बल देते थे। वे चाहते थे की बालक संयमी, धैर्यवान,आत्म विश्वासी व आध्यात्मिक बल से युक्त हों।

Other aspects of Education

शिक्षा के अन्य पक्ष

गाँधीजी भारतीय जनमानस से घुले मिले विशिष्ट व्यक्तित्व थे, उन्हें भारतीय सामाजिक संरचना का विशेष ज्ञान था इसीलिए वे शिक्षा से प्रत्येक वर्ग को बिना विवाद के जोड़ना चाहते थे.समग्र को शिक्षा से जोड़ने के क्रम में उन्होंने निम्न कारकों को भी स्थान प्रदान किया।

धर्म शिक्षा (Education of Religion)

महिला शिक्षा(Women Education)

जन शिक्षा(Mass Education)

सह शिक्षा(Co Education)

व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education)

Evaluation of Educational Thought of Mahatma Gandhi

महात्मा गाँधी के शैक्षिक विचारों का मूल्यांकन

 गाँधीजी के विचार भारतीय पृष्ठभूमि में भारत की आवश्यकता के अनुसार तत्कालीन परिस्तिथियों की उपज हैं और उस समय के इनके विचार एक प्रयोग के रूप में भारत में धारित भी किये गए और आधिकांश को विद्वतजनों का व जन समर्थन भी प्राप्त हुआ। बालकों की सक्रिय साझेदारी व बाल केन्द्रित शिक्षण विधियाँ आज भी आवश्यक हैं प्रभावात्मक विधि द्वारा अनुशासन स्थापन भी शिक्षा शास्त्रियों को स्वीकार्य हैं। आज की परिस्थितियों में भी लोग शिक्षक में आदर्श तलाशते हैं भले ही वह बाजारवादी व्यवस्था का शिकार हो गया हो। इन्होने जन शिक्षा,सह शिक्षा, स्त्री शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा आदि के विषय में जो अमूल्य विचार दिए उनके लिए देश उनका चिर ऋणी रहेगा।

अध्यापक, धर्म शिक्षा,बेसिक शिक्षा, आत्म निर्भर शिक्षण संस्थान आदि से जुड़े उनके विचार कालातीत हुए से लगते हैं यद्यपि गाँधीजी के विचारों पर गीता दर्शन का प्रभाव स्पष्ट पारिलक्षित होता है और यह प्रभाव कुछ पाश्चात्य दर्शनों से मेल खाता लगता है एम0 एस0 पटेल महोदय कहते हैं-

“It is naturalistic in its setting, Idealistic in its aim and pragmatic in its method and programme of work. The real greatness of Gandhiji as educational philosopher consists in the fact that the dominant tendencies of naturalism, idealism and pragmatism are not seprate and independent in his philosophy, but they fuse into a unity.”

“दार्शनिक के रूप में गांधीजी की महानता इस बात में है की उनके शिक्षा दर्शन में प्रकृतिवाद, आदर्शवाद और प्रयोजनवाद की मुख्य प्रवृत्तियां अलग और स्वतंत्र नहीं हैं वरन वे सब मिलजुलकर एक हो गयी हैं जिससे ऐसे शिक्षा दर्शन का जन्म हुआ जो आज की आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त होगा, मानव आत्मा की सर्वोच्च आकांक्षाओं को सन्तुष्ट करेगा।”

उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है की शिक्षा जगत के निरभ्र आकाश में महात्मा गांधीजी एक जाज्वलयमान नक्षत्र के रूप में युगों तक अपनी आभा से मानवता को आलोकित करते रहेंगे। उनके जैसे शिक्षाविद की मौलिकता हमेशा संसार का इतिहास संजोकर रखेगा।

——————————————————————धन्यवाद। ————————————————————-                                                                       

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