Education Aacharya - एजुकेशन आचार्य
  • शिक्षा
  • दर्शन
  • वाह जिन्दगी !
  • शोध
  • काव्य
  • बाल संसार
  • विविध
  • समाज और संस्कृति
  • About
    • About the Author
    • About Education Aacharya
  • Contact

शिक्षा
दर्शन
वाह जिन्दगी !
शोध
काव्य
बाल संसार
विविध
समाज और संस्कृति
About
    About the Author
    About Education Aacharya
Contact
Education Aacharya - एजुकेशन आचार्य
  • शिक्षा
  • दर्शन
  • वाह जिन्दगी !
  • शोध
  • काव्य
  • बाल संसार
  • विविध
  • समाज और संस्कृति
  • About
    • About the Author
    • About Education Aacharya
  • Contact
दर्शन

YOGA AND EDUCATION

April 10, 2023 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


योग और शिक्षा

योग एक भारतीय दर्शन है यह प्रतिनिधि दर्शन की श्रेणी में आता है योग दर्शन तीन मार्गों का प्रमुखतः निर्देशन प्रदान करता है ज्ञान योग, कर्म योग और भक्ति योग। व्यक्ति को अपनी क्षमता, अभिरुचि, योग्यता के आधार पर स्व हेतु मार्ग का चयन करना चाहिए। इसके अष्टांग मार्ग का विवेचन पहले ही educationaacharya.com  किया जा चुका है।

योग दर्शन के प्रवर्तक महर्षि पतञ्जलि के नाम पर इसे पातञ्जल दर्शन भी कहा जाता है। भारत में योग दर्शन के प्रमुख ग्रन्थ  पातञ्जलयोग सूत्र(महर्षि पतञ्जलि),

तत्व वैशारदी (वाचस्पति मिस्र), व्यास भाष्य (महर्षि व्यास), भोज वृत्ति( महाराजा भोज -धारा नरेश), योग वार्तिक (विज्ञान भिक्षु ), छाया (नागेश भट्ट ), योग सार संग्रह (विज्ञान भिक्षु )हैं।

योग दर्शन से आशय (Meaning of yoga philosophy) –

भारतीय आस्तिक षडदर्शनों में से एक है योग दर्शन,महर्षि पातञ्जलि इसके प्रमुख प्रणेता हैं यह दर्शन सांख्य दर्शन के पूरक के रूप में भी जाना जाता है। इस दर्शन का मुख्य लख्य मानव को मोक्ष या परमआनन्द से जोड़ना है। प्रो।  रमन बिहारी लाल जी ने योग दर्शन को पारिभाषित करते हुए बताया –

“योग दर्शन भारतीय दर्शन भारतीय दर्शन की वह विचारधारा है जो इस ब्रह्माण्ड को ईश्वर द्वारा प्रकृति एवं पुरुष के योग से निर्मित मानती है और यह मानती है कि  प्रकृति, पुरुष व ईश्वर तीनों अनादि और अनन्त हैं। यह  ईश्वर को कर्मफल के भोग से मुक्त और आत्मा को कर्म फल का भोक्ता मानती है और यह प्रतिपादन करती है कि मनुष्य जीवन काअन्तिम उद्देश्य परमानन्द अनुभूति है जिसे अष्टांग योग साधन द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।”

आँग्ल भाषा में इसे इस प्रकार अनुवादित कर सकते हैं –

“Yoga Darshan is that ideology of Indian philosophy which believes that this universe is created by God from the combination of Prakriti and Purusha and believes that Prakriti, Purush and God all three are eternal and infinite. It regards God as free from the enjoyment of the fruits of action and the soul as the enjoyer of the fruits of action and renders that the ultimate aim of human life is the feeling of ecstasy which can be achieved by means of Ashtanga Yoga.”

 योग दर्शन को अधिगमित करने हेतु यह परमावश्यक होगा की इसकी विविध मीमांसाओं को जान लिया जाए यहां क्रमशः समझने का प्रयास है –

(A)-योग दर्शन की तत्व मीमांसा (Metaphysics of yoga philosophy) –

सांख्य दर्शन की भाँति ही योग दर्शन प्रकृति और पुरुष की सत्ता को स्वीकार करता है अर्थात इस दर्शन ने सांख्य की तत्व मीमांसा को स्वीकार कर लिया है। योग दर्शन सृष्टि का निमित्त कारण (कर्त्ता) ईश्वर को मानता है तथा उसके उपादान कारण (आधारभूत साधन) प्रकृति व पुरुष को स्वीकार करता है, पुरुष चेतनतत्व अर्थात जीवात्मा है ईश्वर अनादि है अनन्त है और भोग से रहित है आत्मा भोक्ता है।

(B) – योग दर्शन की ज्ञान व तर्क मीमांसा (Epistemology and logic of yoga philosophy)

योग दर्शन चित्त की अवधारणा का प्रयोग करता है जिसमें मन, बुद्धि,अहंकार शामिल हैं जैसा कि सांख्यदर्शन में भी देखने को मिलता है योग दर्शनयह मानता है  कि मानव को पदार्थ का ज्ञान इन्द्रियों व चित्त के माध्यम से प्राप्त होता है और आत्मा को इसका साक्षात्कार होता है। वस्तुतः शरीर ,चित्त,और पुरुष भिन्न भिन्न होते हुए भी इस प्रकार समेकित रहते हैं कि पृथक्करण सम्भव नहीं लगता।योग दर्शन के अनुसार योगी अंततः समाधि को प्राप्त कर लेता है इस स्थिति में उसका यानि आत्मा का परमात्मा से योग हो जाता है और वह सर्वज्ञ हो जाता है।

  (C) – योग दर्शन की मूल्य व आचार मीमांसा (Values ​​and Ethics of yoga philosophy) –

           योग दर्शन में योग हेति चित्तवृत्तियों के निषेध हेतु अष्टांग मार्ग बताया है इसमें यम, नियम, आसन.              प्राणायाम मुख्य रूप से शरीर से सम्बंधित हैं और इसीलिये इन्हें अन्तरङ्ग साधन कहते है जबकि प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, व समाधि आध्यात्मिक विकास से सम्बन्धित हैं व इन्हें बहिरंग साधन कहा जाता है। अन्तिम मूल्य की प्राप्ति अष्टांग मार्ग के आचरण से सम्भव है।

योग दर्शन के मूल सिद्धान्त

Basic principles of yoga philosophy

01 – प्रकृति, पुरुष के योग से ईश्वर द्वारा सृष्टि प्रक्रिया (Creation process by God with the combination of Prakriti, Purusha)

02 – मूल तत्व – प्रकृति, पुरुष, ईश्वर (Basic elements – Prakriti, Purusha, God) 

03 – आत्मा कर्मफल भोक्ता ईश्वर नहीं (The soul is the enjoyer of the fruits of action, not God.)

04 – प्रकृति, पुरुष, ईश्वर का मेल मानव (Prakriti, Purusha, God’s Combination – Human)

05 – प्रकृति, पुरुष व ईश्वर द्वारा मानव विकास सम्भव (Human development possible by nature, man and God)

06 – मानव जीवन का अन्तिम उद्देश्य मोक्ष (Salvation is the ultimate goal of human life)

07 – चित्तवृत्ति निरोध मोक्ष हेतु आवश्यक (Control of mind is essential for salvation)

08 – चित्तवृत्ति निरोध हेतु आवश्यक अष्टांग मार्ग(Eightfold path necessary for control of mind)

योग दर्शन व  शिक्षा

Yoga philosophy and education

योग एक मानस शास्त्र है जिसमें मानव मात्र को मन संयत करना और पाशविक वृत्तियों से बचाव हेतु दिशा प्राप्त होती है। इस छोटे से जीवन में सफलता किसी भी क्षेत्र में संयत मन पर निर्भर करती है संयत मन से आशय एक कालखण्ड में एक ही वास्तु पर चित्त की एकाग्रता। वैसे योग दर्शन ने शिक्षा को कोई निश्चित विचार पृथकतः नहीं दिया लेकिन इसकी विभिन्न मीमांसाओं का विश्लेषण कर सार ग्रहण किया जा सकता है यहाँ मुख्यतः यही प्राप्त करने का प्रयास रहेगा।

शिक्षा के उद्देश्य/Aims of education

योग शिक्षा अपने उद्देश्य कालानुरूप तय करती है। श्रीमद्भगवद्गीता में सोलह कला सम्पूर्ण भगवान् श्री कृष्ण ने 18 योग के माध्यम से अर्जुन को शिक्षा प्रदान की यद्यपि इनमें से कर्म योग, भक्ति योग और ज्ञान योग पर अधिक चर्चा की जाती है और इस में से ही  प्राप्त ज्ञान के आधार पर आज की योग गठित करती है शिक्षा अपने मुख्य उद्देश्य गठित करती है जिन्हे अध्ययन की सुविधा की दृष्टि से इस प्रकार वर्णित कर सकते हैं –

A – साध्य उद्देश्य (Achievable objective)

1 – मुक्ति का उद्देश्य /The purpose of salvation

B – साधन उद्देश्य (Instrument purpose)

1 – शारीरिक विकास / Physical development

2 – मानसिक विकास / Mental development

3 – बौद्धिक विकास / Intellectual development

4 – भावात्मक विकास / Emotional development

5 – आध्यात्मिक विकास / Spiritual development

 6 – नैतिक विकास /Moral development

पाठ्यक्रम / Syllabus

योग दर्शन का सम्यक विश्लेषण यह इंगित  करता कि आत्म ज्ञान के विषयों को अधिक और पदार्थगत विषयों की और अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया है योग दर्शन की पाठ्य चर्या में मनोविज्ञान, नीति शास्त्र, धर्म शास्त्र, दर्शन, योगाभ्यास,  वेद,  पुराण,  भाषा,  तर्क शास्त्र,  आयुर्विज्ञान,  शरीर विज्ञान आदि को स्थान दिया जा सकता है।

शिक्षण विधियाँ।/ Teaching methods

योग दर्शन चूंकि साँख्य दर्शन की ज्ञान मीमांसा का अनुमोदन करता है इस लिए ज्ञान का विकास अन्तः कारन की बुनियाद पर होने का इसे सहज समर्थन प्राप्त हो जाता है। जिसे योग दर्शन चित्त स्वीकार करता है वही सांख्य दर्शन में मन, बुद्धि, अहंकार के रूप में वर्णित है। दोनों की एकरूपता के कारण जो साधन ज्ञान प्राप्ति के सांख्य दर्शन द्वारा सुझाये गए वही योग हेतु स्वीकार किये जा सकते हैं जिन्हे इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है

प्रत्यक्ष विधि – भ्रमण विधि, इन्द्रिय प्रत्यक्षीकरण।

अनुमान विधि – शोध विधि, परिकल्पना, आगमन -निगमन, विश्लेषण -संश्लेषण , खोज विधि आदि।    

शब्द विधि -प्रश्नोत्तर, व्याख्या, प्रवचन, तर्क विधि, स्वाध्याय आदि।

योग विधि – ज्ञाता और ज्ञेय का भेद ख़तम लम्बी योगिक साधना द्वारा ,योगी द्वारा ही सम्भव सामान्य शिक्षार्थी द्वारा नहीं।

अनुशासन / Discipline

अनुशासन के सम्बन्ध में इस दर्शन को विशिष्ट स्थान प्राप्त है चित्त वृत्तियों के निरोध को अनुशासन की परिणति के रूप में स्वीकार किया जा सकता है और स हेतु अष्टाङ्ग मार्ग भी सुझाया गया है इसके विविध अंग गहन उपादेयता रखते हैं यदि सचमुच अनुकरण का प्रयास  उच्च कोटि का अनुशासन स्वतः स्थापित हो जाएगा। इस दर्शन ने चित्त की स्थितियाँ और उनके आरोहण की स्थिति द्वारा भी क्रमशः उच्च अनुशासन स्थापन की स्थिति को बताया है जिसे समझने हेतु इस प्रकार वर्णित कर सकते हैं –

चित्त की स्थितियाँ —– प्रधान गुण ———————–     प्रवृत्ति

मूढ़                                  तमोगुण                                              अकरणीय कार्यों की ओर

                                                                                    विवेक शून्य

क्षिप्त                              रजोगुण                                     अति चञ्चल

विक्षिप्त                          सतोगुण                                     सुख के साधनों की ओर

एकाग्र                           अधिक सतोगुण                           एक विषय पर केन्द्रित

निरुद्ध                           अपेक्षाकृत अधिक सतोगुण                        स्थिर

योग दर्शन के अनुसार मनुष्य इनमें से जितनी अधिक स्थितियां पार कर लेता है वह उतना ही अधिक अनुशासित हो जाता है।

शिक्षक व शिक्षार्थी / Teacher and student

योग दर्शन क्रिया आधारित दर्शन है यह गुरु से अष्टांग योग में महारत की आशा करता है और विद्यार्थी द्वारा उसके सम्यक अनुकरण की। चित्त को साध अंतिम लक्ष्य की ओर निरन्तर प्रगति की अन्तः प्रेरणा जगाने वाला शिक्षक ही उत्तम शिक्षक है तथा अष्टांग योग से समाधि की और तीव्र प्रवृत्त विद्यार्थी उत्तम विद्यार्थी है।

विद्यालय / School

यह सुरम्य वातावरण में योग के अष्टांग मार्ग के अनुसरण हेतु अध्ययन स्थली को प्रशिक्षण स्थली के रूप में विकसित करने पर बल देते हैं। विद्यालय ऐसे हों जो अन्तिम उद्देश्य  की प्राप्ति के साधन के रूप में कार्य कर सकें।

शिक्षा के अन्य पक्ष –

  1. जन स्वास्थय

      2 – आध्यात्मिक और नैतिक शिक्षा

मूल्याँकन / Evaluation

भारतीय पुरातन गौरवशाली इतिहास के महत्त्वपूर्ण स्तम्भों में से एक है योग दर्शन। इस दर्शन के सम्यक आकलन में, संरक्षण व विकास में लम्बे समय तक तत्सम्बन्धी शोध का अभाव रहा है। लेकिन यह दर्शन मानसिक और शारीरिक विकास में अद्भुत योग प्रदान करता है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसकी महत्ता को सम्पूर्ण विश्व स्वीकार कर रहा है इसके शिक्षा के अंगों पर प्रभाव गहन गरिमा से युक्त हैं जो मानवता का पोषण करने में समर्थ है। शोध के अभाव में इसके विविध आयाम आज भी अछूते हैं। सम्यक विश्लेषण व सार संकलन से इससे सम्पूर्ण मानवता को शिक्षा परिक्षेत्र में विकास हेतु शारीरिक क्षमताओं की वृद्धि का वरदान प्राप्त हो सकता है। 

Share:
Reading time: 3 min

Recent Posts

  • असफलता से सफलता की ओर
  • IMPACT OF INFORMATION
  • SOCIAL MOBILITY AND SOCIAL CONTROL IN REFERENCE TO EDUCATIONAL DEVELOPMENT
  • SCHOOL AND OUT OF SCHOOL
  • भद्रा/ Bhadra

My Facebook Page

https://www.facebook.com/EducationAacharya-2120400304839186/

Archives

  • April 2026
  • March 2026
  • February 2026
  • January 2026
  • December 2025
  • November 2025
  • October 2025
  • September 2025
  • August 2025
  • July 2025
  • June 2025
  • May 2025
  • April 2025
  • March 2025
  • February 2025
  • January 2025
  • December 2024
  • November 2024
  • October 2024
  • September 2024
  • August 2024
  • July 2024
  • June 2024
  • May 2024
  • April 2024
  • March 2024
  • February 2024
  • September 2023
  • August 2023
  • July 2023
  • June 2023
  • May 2023
  • April 2023
  • March 2023
  • January 2023
  • December 2022
  • November 2022
  • October 2022
  • September 2022
  • August 2022
  • July 2022
  • June 2022
  • May 2022
  • April 2022
  • March 2022
  • February 2022
  • January 2022
  • December 2021
  • November 2021
  • January 2021
  • November 2020
  • October 2020
  • September 2020
  • August 2020
  • July 2020
  • June 2020
  • May 2020
  • April 2020
  • March 2020
  • February 2020
  • January 2020
  • December 2019
  • November 2019
  • October 2019
  • September 2019
  • August 2019
  • July 2019
  • June 2019
  • May 2019
  • April 2019
  • March 2019
  • February 2019
  • January 2019
  • December 2018
  • November 2018
  • October 2018
  • September 2018
  • August 2018
  • July 2018

Categories

  • Uncategorized
  • काव्य
  • दर्शन
  • बाल संसार
  • मनोविज्ञान
  • वाह जिन्दगी !
  • विविध
  • शिक्षा
  • शोध
  • समाज और संस्कृति
  • सांख्यिकी

© 2017 copyright PREMIUMCODING // All rights reserved
Lavander was made with love by Premiumcoding