माघ

माघ माह की मघ बदरिया का चिन्तन हमें एक विशिष्ट ज्ञान प्रवाह से जोड़ देता है और एक शरद अहसास कराता है। यह माह हिन्दू राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग और हिन्दू चन्द्र पञ्चाङ्ग का ग्यारहवाँ मास है। इस माह का नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की माघ नक्षत्र के निकटतम स्थिति से उद्भवित हुआ है। माघ माह का अद्भुत आनन्द माँ गङ्गा की निकटतम कुटिया में जाड़े, बूँदाबाँदी, अद्भुत वायु व गङ्गा प्रवाह और मौन चिन्तन के समय अन्तर में महसूस किया जाता है। यथा आनन्द वर्णन दुष्कर है।

माघ मास व माघ मेला –

माघ, मेघ, मेधा का अद्भुत समन्वयन इस माह में दिखता है इस वर्ष 2026 में 3 जनवरी को माघ मेले का शुभारम्भ हुआ है प्रथम पवित्र स्नान पौष पूर्णिमा को होता है। यह मेला 40 दिन से अधिक चलता है और महाशिव रात्रि को इसका समापन होता है अर्थात 15 फरवरी 2026 को प्रयागराज में यह पूरा हो जाएगा। कतिपय विद्वानों के अनुसार इस वर्ष 4 जनवरी से माघ माह का प्रारम्भ हुआ है व इसका समापन 01 फरबरी 2026 को होगा। बहुत सारे लोग कल्पवास प्रयाग तट पर करते हैं। एक मान्यता के अनुसार समग्र नदियों व कूपों का जल इस अवधि में परम पावस हो जाता है। ब्रह्म मुहूर्त इस काल खण्ड का विशेष महत्त्व रखता है।

भगवान कृष्ण और माघ

यह माह भगवान कृष्ण को समर्पित है यद्यपि भगवान कृष्णका जन्म इस माह नहीं हुआ था भगवान कृष्ण से जुड़ते ही इसमें विशिष्ट आयाम जुड़ जाते हैं। हमारे मन मानस में इनका चिर युवा स्वरुप विद्यमान है इनका बचपन इतना विशिष्ट कि आज भी हर हिन्दुस्तानी मान अपने बच्चे को लाड़ से कान्हा पुकारती है। किशोरावस्था और किशोरीजी की धूम ऐसी कि बालिकाओं में लोकप्रिय होने पर आज भी लोग कह देते हैं कैसा कन्हैया बना घूम रहा है। युद्ध के मैदान से ज्ञान सम्प्रेषण आज भी भगवद्गीता के प्रति हमारे मन मानस में विद्यमान है। गुरुता ऐसी कि सहज स्वीकारा जाता है -कृष्णम वन्दे जगद्गुरु। भारत में आज भी इनके बचपन से युवा स्वरुप का पूजन होता है।

हिन्दी माह के बारह माह चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण (सावन), भाद्रपद (भादो), अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ, व फाल्गुन (फागुन) हैं। इसमें माघ 11 नम्बर पर आता है।

पावन माघ मास का महत्त्व व मान्यताएं –

विविध शास्त्रों के आधार पर कहा जाता है कि इस पावन माघ मास में विविध पावन नदियों का जल अमृत सदृश हो जाता है। इस माह का ब्रह्म मुहूर्त स्नान विगत पाप नाशिनी क्षमता को धारण करने वाला है।

पावन माघ मास में सूर्योदय से पूर्व स्नान की अधिक महत्ता है। यदि पावन नदी के  जल में स्नान का अवसर उपलब्ध नहीं है तो घर पर भी जल में काले तिल व गंगा जल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।

[A] महत्त्व –

1 – इस माह में ब्रह्म मुहूर्त स्नान आरोग्य व सकारात्मक ऊर्जा प्रदाता है। तिल का प्रयोग शनि व सूर्य दोष निवारक की भूमिका का निर्वहन करता है।

2 – इस माह सात्विक भोजन करने से तामस प्रवृत्तियों का निरोध होता है व वाणी प्रभावी व ओजपूर्ण बनती है। चिन्तन में भटकाव नहीं होता।

3 – भगवान विष्णु का मन्त्र ‘ऊँ नमः भगवते वासुदेवाय’ इस माह में विशिष्ट शक्ति प्रदाता है। नियमित सूर्य अर्घ्य व ब्रह्म मुहूर्त जागरण नेत्र सम्बन्धी विकारों को क्षय करने में सक्षम है।

4 – इस माह में गरम कपड़े, कम्बल, गुड़, तिल सेवन, सूर्य उपासना, सूर्य नमस्कार विविध शारीरिक दोष निवारण में सक्षम भूमिका का अधिक तीव्रता से निर्वहन करता है।

[B] – मान्यताएं –

01 – माघ माह को देवताओं के महीने के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस माह में देवता मानव रूप में पृथ्वी पर आकर स्नान दान, ध्यान, सत्संग करते हैं इसीलिये इसे देवताओं का स्नान काल भी कहा जाता है।   

02 – पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक स्नान का यह अवसर देवताओं की सकारात्मक ऊर्जा का सञ्चयन करता है।

03 – इस समय कल्पवास विशिष्ट ऊर्जा से जुड़ आध्यात्मिक चिन्तन पथ प्रशस्त करता है व सकारात्मकता को अक्षुण्ण बनाने का प्रयास करता है।

04 – माघी पूर्णिमा को देवता अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं इस दिन पावन नदियों में स्नान करने वाले इनके विशेष कृपा पात्र बनते हैं।

05 – मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसन्त पञ्चमी, माघी पूर्णिमा, सकारात्मक ऊर्जा का अक्षय प्रसरण में समर्थ हैं लेकिन मौनी अमावस्या को शुभ मांगलिक कार्य जैसे शादी, गृह प्रवेश आदि का निषेध है।

उक्त सम्पूर्ण विवेचन और विज्ञ जनों का सत्संग यह बताता है कि इस अवधि में प्रगति उन्मुख होने हेतु बनाई गयी रणनीतियाँ और उन पर अमल हमें शीघ्रता से लक्ष्योन्मुख करता है।        

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