व्याख्यान व्यूह रचना

भारत में व्यूह शब्द आते ही अभिमन्यु का स्वाभाविक ध्यान आता है जो चक्र व्यूह का अन्तिम द्वार तोड़ने में इस लिए असफल रहा क्योंकि उसको भेदन का ज्ञान मिल नहीं पाया था ठीक इसी तरह यदि अध्यापक शिक्षण अधिगम को प्रभावी बनाना चाहता है तो सही व्यूह रचना परम आवश्यक है अपने उद्देश्य के साथ सम्पूर्ण तत्सम्बन्धी ज्ञान उसके पास होता है एक सही व्यूह रचना उसे अवश्य उद्देश्य प्राप्ति में सफल बनाएगी।

रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर बताया –

शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”

आंग्ल अनुवाद

“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”

व्याख्यान व्यूह रचना से आशय / Meaning of lecture strategy –

 आदिकाल से भारत में इस व्यूह रचना का प्रयोग होता रहा है पहले गुरु चबूतरे पर बैठकर और शिष्य भूमि पर बैठ कर इसका लाभ लेते रहे हैं। आज विद्यार्थी बैठ कर और अध्यापक खड़े होकर इस व्यूह रचना का लाभ लेते हैं। यद्यपि इसकी गणना अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचना के तहत आती है लेकिन इसके माध्यम से सम्पूर्ण अधिगम परिक्षेत्र से शिक्षार्थी का परिचयीकरण ही नहीं बल्कि साक्षात्कार हो जाता है और वे अपनी पात्रता के अनुसार उसे अधिगमित करते हैं। व्याख्यान व्यूह रचना एक महत्त्वपूर्ण व्यूह रचना है इस सम्बन्ध में रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकीके 2014 के संस्करण में पृष्ठ 243 पर बताया –

व्याख्यान व्यूह रचना से अभिप्राय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाये जाने वाले ऐसे प्रारूप या कार्य योजना से है जिसके द्वारा वह किसी विषय विशेष के एक अंश या इकाई को इस प्रकार प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है ताकि विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक एवं भावात्मक व्यवहार से सम्बन्धित विशिष्ट शिक्षण अधिगम उद्देश्यों की उपलब्धि ठीक प्रकार की जा सके।”

“Lecture strategy” means a format or plan of action designed and used by a teacher. By which he tries to present a part or unit of a particular subject in such a way So that specific teaching-learning objectives related to the cognitive and emotional behaviour of students can be achieved properly.”

व्याख्यान व्यूह रचना से लाभ / Benefits of Lecture Strategy –

वह व्यूह रचना जो तमाम आलोचनाओं से जूझ कर अधिगमार्थियों व शिक्षाविदों को लाभ दे रही है उसके लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

01 – शिक्षण गतिविधियों पर स्वइच्छानुसार अंकुश / Voluntary control of teaching activities

02 – सृजनात्मकता, विश्लेषण व मूल्याङ्कन हेतु सम्यक चिंतन का विकास / Developing critical thinking for creativity, analysis, and evaluation

03 – मितव्ययी व्यूह रचना / Economical strategy

04 – प्रेरणात्मक वातावरण सृजन में सहयोगी / Helps create an inspiring environment

05 – लचीलापन / Flexibility

06 – विचारों, अवधारणाओं की श्रंखलाबद्ध प्रस्तुति सम्भव / Performs a systematic presentation of ideas and concepts

07 – तार्किक नियोजन / Logical planning

08 – व्यक्तित्व के गुणों की छाप छोड़ना सम्भव / It is possible to leave an impression of personality traits

09 – व्यवहार के भावात्मक पक्ष को सकारात्मक दिशा देना सम्भव / It is possible to give positive direction to the emotional aspect of behavior

व्याख्यान व्यूह रचना की सीमाएं  / Limitations of Lecture Strategy –

01 – उद्देश्य प्राप्ति नज़र अन्दाज / Neglecting objective achievement –

02 – रूचि, आवश्यकता व योग्यता स्तर का ध्यान नहीं / Not considering interest, need, and ability levels

03 – एक पक्षीय सम्प्रेषण / One-sided communication

04 – प्रयोगात्मक कौशलों व क्रियात्मक गतिविधियों का अभाव / Lack of practical skills and hands-on activities

05 – केवल शाब्दिक सम्प्रेषण की सफलता सन्दिग्ध / The success of verbal communication alone is questionable.

06 – शिक्षण अधिगम से अर्जित अनुभव के प्रयोगीकरण का अभाव / Lack of application of teaching-learning experience.

07 – अपूर्ण व त्रुटिपूर्ण ज्ञान सम्प्रेषण सम्भव / Incomplete and inaccurate knowledge transmission is possible

08 – पुनरावृत्ति व विषय से भटकाव / Repetition and distraction

09 – आवश्यक तैयारी व कुशल सम्प्रेषण का अभाव / Lack of necessary preparation and effective communication

10 – स्मृति स्तर को चिन्तन स्तर से प्रभावी मानना / Believing the memory level as more effective than the thinking level 

व्याख्यान व्यूह रचना को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सुझाव / Suggestions for making Lecture Strategy more effective –

यदि हम सम्पूर्ण व्याख्यान को उसके अलग अलग हिस्सों में बांटे तो यह स्पष्ट होगा कि व्याख्यान में नियोजन, प्रस्तुतीकरण और मूल्याङ्कन के रूप में तीन महत्त्वपूर्ण चरण समाहित हैं। इसलिए इस प्रत्येक चरण में सुधार अपेक्षित होंगेजिन्हे इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है। –

[A] – नियोजन सम्बन्धी सुझाव / Planning tips

01 – पूर्व ज्ञान व विषय वस्तु का सम्बन्ध विवेचन।/ Analysis of the relationship between prior knowledge and subject matter

02 – स्पष्ट उद्देश्य निर्धारण / Crystal Clear objective setting;                             

03 – अधिगम स्तर आधारित सम्प्रेषण / Learning level based communication

04 – विषय वस्तु पर अधिकार / Mastery of the subject matter

05 – आत्मविश्वास युक्त सम्प्रेषण / Confident communication

06 – विविध विश्वसनीय ज्ञान स्रोतों से विषयवस्तु का चयन / Selecting content from a variety of reliable knowledge sources

07 – अधिगम -शिक्षण प्रभावी वातावरण सृजन / Creating an effective learning – teaching environment

08 – रूचि, ध्यान, उत्साह का सम्यक सृजन / Properly cultivate interest, attention and enthusiasm.

09 – विविध विधियों व सहायक साधनों का सम्यक प्रयोग / Properly utilize various methods and aids.

[B] – प्रस्तुतीकरण सम्बन्धी सुझाव / Presentation tips –

01 – प्रभावी अधिगम हेतु निरन्तर सजगता व क्रियाशीलता / Constant alertness and activity for effective learning

02 – उत्साहयुक्त प्रभावी सम्प्रेषण / Enthusiastic and effective communication

03 – क्रमबद्ध व तार्किक आधार / Systematic and logical approach

04 – अधिगम उद्देश्यों पर विशेष ध्यान / Focus on learning objectives

05 – सार्वजनिक संबोधन प्रणाली का उपयोग /use of public address system

06 – आवश्यकतानुसार विविध विधियों का प्रयोग / Use a variety of methods as needed

07 – नवीनतम श्रव्य दृश्य साधनों का प्रयोग / Use the latest audio-visual aids

08 – आवश्यकतानुसार साझेदारी का प्रयोग / Use partnerships as needed

09 – महत्त्वपूर्ण तथ्य व सूचना सम्प्रेषण का रेखाङ्कन / Outline of important facts and information communication

10 – पुनरावृत्ति व भटकाव से सावधान / Beware of repetition and deviation

[C]– मूल्याङ्कन हेतु सुझाव /Evaluation Tips –

01 – स्व सम्प्रेषण मूल्यांकन / Self-Communication Assessment

02 – अधिगम स्तर उन्नयन मूल्याङ्कन/ Learning Level Improvement Assessment

03 – व्याख्यान आधारित अधिगम मूल्यांकन / Lecture-Based Learning Assessment

04 – पक्षपात रहित सम्यक प्रश्न वितरण / Fair, Unbiased Question Distribution

05 – उद्देश्य आधारित मूल्यांकन / Objective-Based Assessment

06 – पृष्ठ पोषण के निर्देशों पर ध्यान / Follow nutrition guidelines

07 – प्रश्नावली या मौखिक प्रश्नों द्वारा / Through questionnaires or oral questions

08 – सतत स्व आलोचनात्मक मूल्यांकन / Continuous self-critical assessment

प्रस्तुत समस्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी कौशल या व्यूह रचना में निरन्तर परिमार्जन की गुन्जायिश बनी रहती है लेकिन अपनी सजगता से इसे काफी प्रभावी बनाया जा सकता है नए सम्प्रत्ययों, विश्वसनीय सूचनाओं, आगामी जानकारियों और नवीनतम ज्ञान का प्रयोग कर व्याख्यान को निरंतर समृद्ध करने की आवश्यकता हमेशा रहेगी। निरन्तर छोटे तथ्यों नवीनतम ज्ञान व तार्किक क्रमबद्ध सम्प्रेषण द्वारा व्याख्यान और प्रभावी बन पड़ेगा। आवश्यकता है विविध परिस्थितियों में सम्यक समायोजन की। 

  

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