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शोध

Difference between questionnaire and schedule

April 6, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


प्रश्नावली व अनुसूची में अन्तर

शोध की दुनियाँ में समंक एकत्रित करने के बहुत से लोकप्रिय तरीके हैं उन्हीं तरीकों में प्रश्नावली और अनुसूची भी आते हैं यद्यपि इन दोनों ही विधियों में बहुत कुछ प्राकृतिक समानता है।  इसी कारण कुछ लोगों को इनमें अन्तर करने में परेशानी महसूस होती है। व्यावहारिक दृष्टिकोण से दोनों में बहुत सी समानताएं दीख पड़ती हैं। तकनीकी दृष्टि से सूक्ष्म विश्लेषण दोनों के अन्तर का प्रगटन करता है जिसे इस प्रकार अभिव्यक्त किया जा सकता है। –

      प्रश्नावली/Questionnaire              अनुसूची/Schedule  
01-प्रश्नावली को विविध तरीकों से लोगों के पास भेजने की व्यवस्था की जाती है इसे मेल की माध्यम से, डाक से , वाहक के माध्यम से भेजकर उन लोगों तक पहुँचाया जाता है जिनका दृष्टिकोण लेना होता है।01-अनुसूची को शोधकर्त्ता या उसके प्रगणक के द्वारा ही लेकर जाया जाता है वह दृष्टिकोण जानकार स्वयं भरता है। आवश्यकता होने पर अनुसूची के प्रश्नों या तथ्यों की व्याख्या भी की जाती है।
02-समंकों को एकत्रित करना प्रश्नावली के माध्यम से सस्ता पड़ता है केवल प्रश्नावली को छपवाने का व उसे विविध माध्यम से मंतव्य तक पहुँचाना पर खर्चा करना होता है जो अपेक्षाकृत सस्ता पड़ता है।02-अनुसूची द्वारा समंकों का एकत्रीकरण अपेक्षाकृत महँगा पड़ता है क्योंकि प्रगणकों को प्रशिक्षण देना या खुद जाकर समंक एकत्रित करने में अच्छाखासा खर्चा हो जाता है।
03 – प्रश्नावली को हम छोड़कर चले आते हैं इसे किसके द्वारा भरा जा रहा है निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। भ्रम की सम्भावना बनी रहती है।03 -चूँकि अनुसूची हम स्वयं या हमारा प्रगणक खुद उसे पूछ पूछ कर भरता है तो ऐसे में प्रत्यक्ष समक्ष होने से कोई किसी तरह का भ्रम नहीं रह जाता।
04 -प्रश्नावली के बारे में यह सर्व विदित है कि यह जितनी भेजी जाती है उतनी लौटती नहीं। कई बार लोग जान बूझकर प्रश्नावली भरकर नहीं भेजते। बे मन से की गई आलसययुक्त प्रतिक्रिया भी सम्यक नहीं कही जा सकती।    04 -अनुसूची प्रगणक द्वारा भरे जाने के कारण ज्यादा प्रभावी बन पड़ती है सारे जवाब पाने की सम्भावना के उत्तरोत्तर नए आयाम प्राप्त होते हैं क्योंकि प्रगणक और उत्तर देने वाले आमने सामने होते हैं।
05 -प्रश्नावली का प्रयोग करने पर व्यक्तिगत सम्पर्क नहीं हो पाता जिस माध्यम से प्रश्नावली भरने भेजी जाती है उसी माध्यम से मँगाई जाती है और व्यक्तिगत सम्पर्क सम्भव नहीं हो पाता।05 – अनुसूची भरने तो प्रगणक स्वयं उपस्थित रहता है और उत्तरदाताओं के साथ सहज, सरल सम्पर्क स्थापित होता है। 
06 – प्रश्नावली का प्रयोग करने वाले सभी शोधार्थियों को यह कटु अनुभव होता है कि इसके माध्यम से सम्पूर्ण प्रक्रिया गति नहीं पकड़ पाती और धीमी गति कभी कभी इतनी अधिक होती है कि प्रश्नावली वापस आने की आस भी धूमिल हो जाती है।06 – अनुसूची का प्रयोग करने पर यह बाधा उपस्थित नहीं हो पाती। और समय पर परिणाम प्राप्त हो जाता है क्योंकि प्रगणक स्वयं सारे कार्य अपनी उपस्थिति में ही पूर्ण कर लेता है।
07 – प्रश्नावली विधि में हम न्यादर्श बड़ा ले सकते हैं क्योंकि इसका बड़े क्षेत्र में वितरण सम्भव होता है और दूरदराज के क्षेत्रों से भी समंक संग्रहण सम्भव हो जाता है।07 – प्रगणकों को दूर दराज के क्षेत्रों में भेजना सम्भव नहीं हो पाता  इसलिए व्यापक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी सम्भव नहीं हो पाता।
08 – प्रश्नावली का उपयोग करने पर अवलोकन विधि का प्रयोग सम्भव नहीं है।08 -अनुसूची भरने के साथ अवलोकन विधि का प्रयोग निस्संदेह किया जा सकता है।
09 -प्रश्नावली विधि का प्रयोग करने के लिए यह परम आवश्यक है कि उत्तरदाता सहयोग की भावना से युक्त हो और पढ़ा लिखा हो।09 – अनुसूची का प्रयोग करने पर यह आवश्यक नहीं रह जाता कि उत्तरदाता पढ़ा लिखा ही हो यदि वह निरक्षर होगा तब भी दृष्टिकोण का अंकन किया जा सकता है।
10 – प्रश्नावली के माध्यम से प्राप्त जानकारी अधूरी, अपर्याप्त, गलत, व सन्देहयुक्त होने का जोखिम बना रहता है। कई बार प्रश्नावली के आइटम ही समझ में नहीं आते और जवाब तय कर दिया जाता है।10 -अनुसूची से प्राप्त जानकारी अधिक सटीक होती है क्योंकि प्रगणक प्रश्न समझ न आने पर स्पष्टीकरण देने के लिए मौजूद रहता है।
11 –  प्रश्नावली की गुणवत्ता के साथ उसे आकर्षक बनाने का प्रयास भी करना पड़ता है आन्तरिक गुणवत्ता पर ही प्रश्नावली की सफलता निर्भर करती है।11 -अनुसूची के परिणामों की विश्वसनीयता गणना करने वाले लोगों की ईमानदारी व क्षमता पर निर्भर करती है इसमें भौतिक रूप या साजसज्जा का प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि इसे प्रगड़क  द्वारा खुद भरा जाता है।
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शोध

INTERDISCIPLINARY APPROACH TO EDUCATIONAL RESEARCH

April 3, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शैक्षिक अनुसन्धान के लिए अन्तर-विषयक दृष्टिकोण

वैदिक काल से आज तक शिक्षा के क्षेत्र में अंतर दृष्टिगत होते रहे हैं जिस काल की जैसी आवश्यकता होती है शिक्षा उसी तरह के पथ प्रशस्त करती है लेकिन आज शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक प्रसार हुआ है और ज्ञान के विस्फोट जैसी स्थिति दृष्टिगत होने लगी है। शिक्षा के प्रसार के साथ इसकी गुणवत्ता का अवनमन चिन्ता  का विषय बनता जा रहा है। इस क्षेत्र में इतनी जटिल समस्याओं का प्रादुर्भाव हुआ कि उनका समाधान ऊँट के मुँह में जीरे के मानिन्द दिखने लगा।

            आज सभी विज्ञ-जन  यह महसूस कर रहे हैं कि उक्त समस्याओं का समाधान किसी एक विशेषज्ञ या किसी एक क्षेत्र विशेष द्वारा सम्भव नहीं है आज विविध विषयों के विषय विशेषज्ञ व विशेषज्ञों के विशेष समूह के समन्वित प्रयास से ही समस्या समाधान सम्भव है दूसरे शब्दों में अन्तर विषयक शोध विशेषज्ञों से समस्या समाधान में योग मिल सकता है।

अन्तर-विषयक का अर्थ / Meaning of inter disciplinary –

उदग्र अधिगम और सामानान्तर अधिगम के साथ आज हम अनेकों विषयों को परस्पर सम्बन्धित पाते हैं। अनुसन्धान के क्षेत्र में अन्तर विषयकता से आशय परस्पर सम्बन्धित विषय आधारित शोध विशेषज्ञों के समूह कृत शोध अध्ययनों से है। अतः विविध विषयों के शोध विशेषज्ञों द्वारा एक प्रयोजन को ध्यान में रखकर समस्या समाधान हेतु जो शोध अध्ययन किया जाता है। इस उपागम को अन्तर विषयकता या अन्तर विषयक उपागम (INTERDISCIPLINARY APPROACH) कहा जाता है।

परिभाषाएं / Definitions –

इसको पारिभाषित करते हुए शिक्षा शब्दकोष में कहा गया कि –

“आन्तरिक – विषयक उपागम अध्ययन की एक विधि है, जिसके द्वारा ज्ञान के अनेक पृथक पृथक क्षेत्रों से विशेषज्ञ अथवा श्रेष्ठ शोध कार्यकर्त्ता एक विशेष समस्या के परीक्षण में एक साथ लाये जाते हैं, जो सभी उन उपागमों के लिए प्रासंगिक हैं। “

“Inter – disciplinary approach is a method of study by which experts or the best research workers from many different fields of learning, are brought together in the examination of a particular problem, that is relevant to all their approaches.” 

Dictionary of Education, p .311

शिक्षा आयोग ने अपने मत को स्पष्ट करते हुए कहा –

“विभिन्न संस्थानों और शिक्षक वर्ग के लिए पैटर्न्स के मध्य विषयों के नए संयोजन, सहयोग की नई विधियाँ इसके लिए आवश्यक होंगी। क्षेत्र अत्यंत विशाल है परन्तु उदाहरण के तौर पर हम एक क्षेत्र ‘शिक्षा‘ को उद्धृत कर सकते हैं। इसकी समस्याओं का उनकी समस्त जटिलताओं के साथ अध्ययन करने के लिए शिक्षा, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, तुलनात्मक धर्म, अर्थ शास्त्र, लोक प्रशासन और क़ानून के विभागों के मध्य अन्तर – विषयक उपागम आवश्यक हो जाता है।”

“This will need new combinations of subjects, new methods of cooperation between different institutions and new patterns of staffing. The field is vast But by way of illustration, we may refer to one field; education. For a study of its problems in all their complexity, an inter-disciplinary approach is needed between the departments of education, sociology, psychology, comparative religion, economics, public administration and law.”

Report of the Education Commission. P.319

अन्तर विषयक उपागम की विशेषताएं / Features of interdisciplinary approach –

01 – एक विषय विशेषज्ञ सक्षम नहीं / One subject expert is not competent   –     जटिल समस्या –

02 – विशेषज्ञों के समन्वित प्रयास की आवश्यकता /Coordinated efforts of experts are required

03 – सामान कार्यविधि / Common methodology  

04 – समन्वित विश्लेषण द्वारा परिणाम/ Results through integrated analysis  

05 – विविध आवश्यक विषयों को पूर्ण सम्मान।/ Full respect for the diverse disciplines required.

06 – वैधता व विश्वसनीयता / Validity and reliability

07 – समन्वित प्रभावी अनुसन्धान प्रतिवेदन / Coordinated Effective Research Report

अन्तर विषयक उपागम से शैक्षिक शोध में लाभ

Benefits of interdisciplinary approach in educational research –

01 – समन्वित प्रयास से सूक्ष्म विश्लेषण सम्भव / Coordinated efforts make detailed analysis possible

02 – विशेषज्ञों की सहयोग भावना का विकास / Development of a spirit of cooperation among experts

03 – विशेषज्ञों के ज्ञान व अनुभव का लाभ /Benefit from the knowledge and experience of experts

04 – शिक्षा का व्यवस्थित अग्रसरण /Systematic advancement of education

05 – जटिल शैक्षिक समस्याओं का अध्ययन/Study of complex educational problems

06 – शोध निष्कर्षों की विश्वसनीयता व वैद्यता /Reliability and validity of  research findings

07 – शैक्षिक अनुसन्धान का समुन्नत स्तर /Advanced level of educational research

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शोध

Educational Research

March 31, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शैक्षिक अनुसन्धान

मानव की उत्तरोत्तर प्रगति में शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योग है समाज में उठने वाली किसी भी समस्या के समाधान हेतु शिक्षा की और देखा जाता है और शिक्षा अपने अनुसंधान पर निर्भर करती है। शैक्षिक अनुसन्धान वह साधन है जो विवेक पूर्ण,व्यवस्थित अध्ययन के माध्यम से समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करता है।

आज प्रत्येक क्षेत्र में सम्यक व व्यवस्थित शोध का आधार लेकर प्रगति की आधार शिला रखी जाती है बजट बनाने, नीति निर्माण,भविष्य के संसाधन विकास हेतु और विविध योजनाओं को उसके अंजाम तक पहुंचाने हेतु शोध की आवश्यकता महसूस की जाती है। शैक्षिक शोध की समस्याओं के समाधान हेतु प्रयुक्त शोध शैक्षिक शोध कहा जाता है।

शैक्षिक शोध की परिभाषा / Definition of Educational Research –

विविध विद्वानों ने शैक्षिक शोध का अर्थ स्पष्ट करने हेतु अपने भावों को इस प्रकार गुम्फित किया है।

 –जॉन डब्लू बेस्ट (John W Best) के अनुसार

“शैक्षिक अनुसंधान, शैक्षिक परिवेश में छात्र कैसे व्यवहार करते हैं ,के सिद्धान्तों के परीक्षण करने और विकास से सम्बन्धित है।” 

“Educational research is concerned with the development and testing of theories of how students behave in an educational setting.”

प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री John W. Creswell (जॉन डब्ल्यू. क्रेसवेल) के अनुसार

“Educational research is a systematic and organized approach to asking questions, collecting and analyzing data, and effectively reporting findings to understand and improve educational practices and policies.”

“शैक्षिक अनुसंधान प्रश्न पूछने, डेटा एकत्र करने और उसका विश्लेषण करने, तथा शैक्षिक प्रथाओं और नीतियों को समझने और उनमें सुधार करने के लिए निष्कर्षों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने का एक व्यवस्थित और संगठित दृष्टिकोण है।”

आर डब्लू एम ट्रैवर्स (R.W.M.Travers) महोदय के अनुसार

“शैक्षिक अनुसंधान वह प्रक्रिया है, जो शैक्षिक परिस्थितियों में व्यवहार विज्ञान के विकास की ओर निर्देशित हैं। ”

“Educational research is that activity which is  directed towards development of science behaviour in educational situations.”

An introduction to Educational Research .(1954) p 5

शैक्षिक अनुसन्धान का क्षेत्र / Field of academic research –

जादू शब्द जब संसार में प्रचलित हो रहा होगा तब तक निश्चित से दो वर्गों का अभ्युदय हो चुका     होगा एक वह जो इससे प्रभाव में आ जाए एक वह जो ट्रिक का प्रयोग करके सामने वाले भ्रमित कर सके। वास्तव में जब तक आवरण है और सच्चाई परदे में है विश्व उत्थान बाधित ही रहेगा। सारी सच्चाई को सामने लाने के लिए और तमाम समस्याओं का निदान शोध के आधार पर ही सम्भव है। आज हर क्षेत्र में समस्याएं विद्यमान है शिक्षा जगत भी इससे अछूता नहीं है। शिक्षा क्षेत्र की समस्याओं के निदान में शैक्षिक शोध में अपार सम्भावनाएं छिपी हैं। शैक्षिक अनुसंधान के विविध क्षेत्रों को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है।

1 – शिक्षा दर्शन Educational Philosophy

2 – विविध स्तरीय परिक्षेत्र / Different Level Fields

3 – शिक्षा मनोविज्ञान / Educational Psychology

4 – मौलिकता विवेचन / Originality Discussion

5 – शिक्षा का इतिहास / History of Education

6 – शैक्षिक समाजशास्त्र / Educational Sociology

7 – तुलनात्मक शिक्षा / Comparative Education

8 – शैक्षिक प्रशासन / Educational Administration

9 – शैक्षिक मापन व मूल्यांकन /Educational Measurement and Evaluationशैक्षिक शोध का क्षेत्र कोई भी हो शोध अपना कार्य पूर्ण करता ही है शोध वह दिशाबोध है जो हमें सकारात्मक दिशा प्रदान करता है और हम समस्या के निदान तक पहुंचते हैं।

शैक्षिक शोध की आवश्यकता क्यों ? 

Why is educational research needed? –

आज का शैक्षिक शोध कहीं भ्रमित हो गया है। शोध को सही दिशा देने के लिए जो शोध निर्देशक कार्य करा रहे हैं उनमें से कुछ भटक कर स्वार्थी हो गए हैं लेकिन शोध का स्तर कहीं दुष्प्रभावित हो रहा है। लेकिन सत्य स्थापन हेतु फिर भी शोध परमावश्यक है शोध का क्षेत्र व्यापक है और आज के भारत को सकारात्मक शोध की आवश्यकता है निम्न कारणों से शैक्षिक शोध की आवश्यकता है।

01 – ज्ञान परिमार्जन व विकास हेतु /For knowledge refinement and development

02 – उद्देश्य प्राप्ति का महत्त्वपूर्ण साधन / Important means of achieving the objective

03 – नवीन ज्ञान प्रसार हेतु / For spreading new knowledge

05 – अंतर्राष्ट्रीयता व सद्भावना हेतु /For internationalism and goodwill

06 – उद्देश्य प्राप्ति का व्यवहारिक साधन / Practical means of achieving the objective

07 – ज्ञान पिपासा पूर्ति का प्रमुख साधन / The main means of satisfying the thirst for knowledge

08 – कुशल प्रशासन हेतु / For Efficient administration

09 – अध्यापन की प्राण ऊर्जा स्थायित्व हेतु /For the stability of the life energy of teaching

10 – वैश्विक प्रगति के साथ सामञ्जस्य / Keeping pace with global progress.

11 – विश्वबन्धुत्व की भावना के विकास हेतु /For the development of the feeling of universal     brotherhood

सच मानो तो आज सत्य शोधक समाज की आवश्यकता है लेकिन भौतिकता की अन्धी दौड़ ने हमारी सोच पर आवरण चढ़ा दिया है जिससे सत्य की वास्तविक अनुभूति नहीं हो पा  रही है। आशा की किरण आने वाले कल में सच्चा शोध ही हो सकता है।

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शोध

ACTION RESEARCH

March 29, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

क्रियात्मक अनुसन्धान

मानव की प्रारम्भिक अवस्था से आज तक बहुत से परिवर्तन हुए हैं और यह परिवर्तन निरन्तर जारी हैं,  विशिष्ट शोध पर्यवेक्षकों की अनुपस्थिति में स्वयम् अध्यापकों, विद्यार्थियों और विविध संस्थानों द्वारा किसी समस्या पर स्वयं शोध क्रिया सम्पन्न की जाती है क्रियात्मक अनुसन्धान के नाम से जानी जाती है। इसके माध्यम से हम अपने क्षेत्र, संस्थान, लोगों की विविध समस्याओं का अध्ययन कर समाधान व कारणों का अध्ययन करते हैं।

इस प्रकार का शोध शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत शोध का नया दृष्टिकोण है क्रियात्मक अनुसंधान में समस्या से जूझ रहे लोग स्वयं अपनी समस्या को समझने के क्रम में शोध करते हैं विशेषज्ञ की आवश्यकता महसूस नहीं की जाती। इस प्रकार का शोध क्रियात्मक अनुसंधान के नाम से जाना जाता है। क्रियात्मक अनुसन्धान को भली भाँति समझने हेतु कुछ विद्वानों के दृष्टिकोण का अध्ययन करना सम्यक रहेगा।  

क्रियात्मक अनुसन्धान की परिभाषाएं / Definitions of Action research –

विविध विद्वानों ने तत्सम्बन्धी विविध आयामों को समेटते हुए अपने शब्दों को गुंथित कर जो विचार अभिव्यक्त किये हैं उनमें से कुछ प्रभावी अधिगम के दृष्टिकोण से यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ।

जे डब्लू बैस्ट (J.W.Best) के अनुसार

“क्रियात्मक अनुसन्धान किसी सिद्धान्त के विकास की अपेक्षा तात्कालिक उपयोग पर केंद्रित रहता है। इसमें वर्तमान स्थानीय परिस्थितियों से सम्बन्धित वास्तविक समस्याओं पर ही बल दिया जाता है।”

“Action research is focused on the immediate application, not on the development of theory. It has placed its emphasis on a real problem- here and now in a local setting.” 1963,p.10

गुड (Good) महोदय के अनुसार

“क्रिया -अनुसन्धान शिक्षकों, निरीक्षकों और प्रशासकों द्वारा अपने निर्णयों और कार्यों की गुणात्मक उन्नति के लिए प्रयोग किये जाने वाला अनुसन्धान है।”

“Action research is research used by teachers, supervisors and administrators to improve the quality of their decisions and action.” p.464

मोले (Mouley) महोदय के अनुसार

“मौके पर किये जाने वाले ऐसे अनुसंधान को, जिसका उद्देश्य तात्कालिक समस्या का समाधान होता है। शिक्षा में साधारणतया क्रियात्मक अनुसन्धान के नाम से जाना जाता है। ”

“On the spot research aimed at the solution of an immediate problem is generally known in education as action research.” 1964 p.406

कोरे (Korey) महोदय के अनुसार

“शिक्षा में क्रिया अनुसन्धान, कार्य कर्त्ताओं द्वारा किया जाने वाला अनुसन्धान है ताकि वे अपने कार्यों में सुधार कर सकें।”

“Action research in education is research undertaken by practitioners in order that they may improve their practices.” p.241

क्रियात्मक अनुसन्धान की समस्याएं / Problems of action research –

प्रशिक्षणार्थियों को यह जानना परम आवश्यक है कि क्रियात्मक अनुसन्धान हेतु विद्यालय के कौन से विषय हो सकते हैं ? उन्हें समस्या के नाम से जाना जाता है और इसकी विविध समस्याओं को क्रियात्मक अनुसन्धानका क्षेत्र भी कहा जा सकता है मोटे तौर पर कुछ का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है ये समस्याएं समय के साथ बदल जाएंगी कुछ नई भी उत्पन्न होंगी। विद्यालय परिक्षेत्र की समस्याओं को इस प्रकार कर्म दिया जा सकता है।

01 – बालमनोविज्ञान व व्यवहार सम्बन्धित समस्याएं / Child psychology and behavior related      problems

02 – शिक्षण अधिगम सम्बन्धित समस्याएं / Problems Related to Teaching Learning

03 – पाठ्य सहगामी क्रियाओं से सम्बन्धित समस्याएं / Problems related to co-curricular activities 

04 – परीक्षा सम्बन्धित समस्याएं / Examination related problems

05 – अनुशासन सम्बन्धित समस्याएं / Discipline related problems

06 – विद्यालय प्रशासन सम्बन्धित समस्याएं / School administration related problems

07 – अध्यापक सम्बन्धित समस्याएं / Teacher related problems

08 – अभिभावक दखलन्दाजी सम्बन्धित समस्याएं / Problems related to parent interference

विद्यालय में क्रियात्मक अनुसन्धान का प्रयोजन / Purpose of action research in school –

क्रियात्मक अनुसन्धान का प्रयोजन अलग अलग संस्थाओं हेतु उनकी आवश्यकता के दृष्टिकोण से भिन्न हो सकता है। सामान्यतः इसका  विविध तत्सम्बन्धी क्षेत्रों में उन्नयन ही है। विविध विज्ञ जनों के विचारों के आधार पर सामान्यतः यह प्रयोजन कहे जा सकते हैं।

01 – विद्यालयी वातावरण में सिद्धान्तों का परीक्षण / Testing of theories in school environment

02 – प्रजातन्त्रात्मक मूल्यों का स्थापन / Establishment of democratic values ​​

03 – विद्यालय संगठन व व्यवस्था सुधार / Improvement of school organization and system

04 – विद्यालय के चेतना तत्वों का सामान्य उन्नयन / General upgradation of school consciousness    elements

05 – प्रधानाचार्य, प्रबन्धक, निरीक्षक, अध्यापकों व अन्य कर्मचारियों को उत्तर दायित्व के प्रति सजग करना / Making the principal, manager, inspector, teachers and other employees aware of their responsibilities  

06 – जब जागो तब सवेरा का व्यावहारिक प्रयोग। Practical use of Jab Jago Tab Savera.

07 – विद्यालय क्रियाओं में सुधार / Improvement in school activities

08 – सामूहिक कार्यों को सकारात्मक दिशा बोध / Positive direction to collective work

क्रियात्मक अनुसंधान के पद / Steps of Action Research –

क्रियात्मक अनुसन्धान से वांछित फल प्राप्त करने के लिए यह परमावश्यक है कि समस्त आवश्यक पदों पर गम्भीरता पूर्वक कार्य किया जाए। इन पदों को भली भाँति जानने जानने समझने की आवश्यकता है जिन्हे इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है।

01 – समस्या को स्पष्ट रूपेण समझना / Understand the problem clearly                   

02 – कार्य प्रस्तावों पर गहन विमर्श / In-depth discussion on work proposals

03 – उद्देश्य व परिकल्पना / Purpose and Hypothesis 

04 – तथ्य संग्रहण व क्रियात्मक कार्यक्रम / Fact gathering and action plan

05 – विश्लेषण व परिणाम / Analysis and results

06 – समस्त क्रियात्मक कार्य का मूल्याङ्कन / evaluation of overall performance

07 – परिणाम का प्रचार प्रसार / Dissemination of results

क्रियात्मक अनुसंधान का महत्त्व  / Importance of Action Research –

हर समाज के अपने नियम, रीति रिवाज और मान्यताएं होती है और इस क्षेत्र के शिक्षण संस्थानों पर इसका प्रभाव परिलक्षित होता है। संस्थान यान्त्रिक न होकर धरातल पर व्यावहारिक रूप से जुड़े रहें। इस हेतु क्रियात्मक अनुसन्धान और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं आइये इसके महत्त्व पर विचार निम्न बिन्दुओं के आलोक में करते हैं।

1- संस्थान में सुधार का महत्त्व पूर्ण आलम्ब / An important pillar of institutional reform

2 -जनतन्त्रात्मक मूल्य संरक्षक / Guardians of democratic values

3 – यान्त्रिक की जगह व्यावहारिक / Practical instead of mechanical

4 – दैनिक अनुभव से लाभ उठाने हेतु प्रेरक / Motivation to benefit from everyday experience

5 – विद्यालयी शिक्षा के समस्त अंगों के सकारात्मक उत्थान में सक्षम / Capable of positive upliftment of all aspects of school education

6 – विद्यालय का समाज के लघु रूप में स्थापन / Establishing school as a miniature society

7 – छात्रों का सर्वांगीण विकास / All round development of students

8 – परस्पर प्रेम, सहयोग, सद्भावना वृद्धि / Increase in mutual love, cooperation and goodwill

9 – विज्ञान सम्मत विधियों को प्रश्रय /Promotion of scientific methods       

क्रियात्मक अनुसन्धान की महत्ता सर्व विदित है इसे विविध विद्यालयों द्वारा अपनाया जाना आज की आवश्यकता है इसकी महत्ता को समझते हुए कोरे (Corey)महोदय ने उचित ही कहा है –

“हमारे विद्यालय तब तक जीवन के अनुकूल कार्य नहीं क्र सकते हैं, जब तक शिक्षक, छात्र, निरीक्षक, प्रशासक और विद्यालय संरक्षक इस बात की निरन्तर जाँच न करें कि वे क्या क्र रहे हैं। इसी प्रक्रिया को मैं क्रिया अनुसंधान कहता हूँ।”

”Our schools cannot function sustainably unless teachers, students, inspectors, administrators and school patrons constantly examine what they are doing. This process is what I call action research.”

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Uncategorized•शोध

MERITS AND DEMERIS OF SAMPLING

January 13, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

न्यादर्श के गुण और दोष

शोध का परिक्षेत्र अत्यन्त व्यापक है और किसी भी परिणाम तक पहुँचने हेतु पग पग पर तथ्यों के गुण दोष का विवेचन करने पर यथार्थ का बोध होता है शोध कार्य से सामान्यीकरण तक पहुँचने के लिए भी न्यादर्श के गुण दोषों को समझना परम आवश्यक है। यद्यपि न्यादर्श अत्याधिक उपयोगी है लेकिन इसके भी कुछ गुण दोष हैं जिन्हे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

MERITS OF SAMPLING

न्यादर्श के गुण

01 – समय की बचत /Saving of time

02 – श्रम की बचत /Saving of labour

03 – गहन व सूक्ष्म अध्ययन /In-depth and detailed study

04 – प्रशासकीय सुविधा /Administrative convenience

05 – विशिष्ट दशाओं में उपयोगी /Useful in specific conditions

06 – लोच का गुण /Quality of flexibility

07 – मितव्ययता/ Economy

DEMERIS OF SAMPLING

न्यादर्श के दोष अथवा सीमाएं

01 – प्रतिनिधि न्यादर्श चयन दुष्कर / Representative sample selection is difficult

02 – पक्षपात की सम्भावना /Possibility of bias

03 – पर्याप्त ज्ञान का अभाव / Lack of sufficient knowledge

04 – विशिष्ट ज्ञान आवश्यक /Special knowledge required

05 – न्यादर्श पर स्थिर रहना कठिन /Difficult to stick to the sample

06 – न्यादर्श सार्वभौमिक विधि नहीं /Sampling is not a universal method

07 – न्यादर्शन प्रयोज्य की अस्थिरता  / Instability of sampling subject

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शोध

न्यादर्श के प्रारूप / SAMPLING PATTERN

January 11, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ज्ञान के सम्यक विकास को जो आलम्बन प्राप्त होता है, उसके मूल में विद्यमान है शोध।

शोध प्रारूप में उसे उद्देश्य तक ले जाने वाला महत्त्वपूर्ण कारक है न्यादर्श।

न्यादर्श का भलीभाँति अधिगम करने के लिए परम आवश्यक है कि न्यादर्श के प्रारूप को अधिगमित किया जाए। आज इसी विषयवस्तु पर विचार का महत्त्वपूर्ण दिवस है।

प्रारूप (FORMAT) –

न्यादर्श के विविध नाम, विविध विधियों और विविध प्रकारों का वर्णन देखने सुनने को मिलता है लेकिन सुविधाजनक और सरलतम सामान्य रूप से अधिगमित करने हेतु न्यादर्श के प्रकारों का इस प्रकार वर्गीकरण किया जा सकता है। 

                        न्यादर्श  के  प्रकार  / TYPES OF SAMPLING

सम्भाव्यता नमूनाकरण (Probability Sampling)गैर सम्भाव्यता नमूनाकरण  (Non-probability Sampling)
यादृच्छिक न्यादर्श (Random Sampling) स्तरीकृत न्यादर्श (Stratified Sampling) गुच्छ न्यादर्श (Cluster Sampling)         क्रमबद्ध न्यादर्श (Systematic Sampling) बहुस्तरीय न्यादर्श (Multistage Sampling)अभ्यंश न्यादर्श (Quota Sampling) सोद्देश्य न्यादर्श (Purposive Sampling) आकस्मिक न्यादर्श ( Incidental  Sampling) निर्णित न्यादर्श (Judgement Sampling)

 सम्भाव्यता नमूनाकरण (Probability Sampling) –

यादृच्छिकन्यादर्श (Random Sampling) – इस विधि द्वारा जनसँख्या के प्रत्येक सदस्य के चुने जाने की सम्भावना बराबर रहती है इसमें एक का चुना जाना दूसरे पर कोई असर नहीं डालता। प्रसिद्द विचारक गुडे व हैट ने इस सम्बन्ध में कहा –

“The unit of the universe must be so arranged that the selection process give equi-probability of selection to every unit in that universe.” Goode and Hatt,

“दैव निदर्शन के लिए समग्र की सभी इकाइयों को इस प्रकार क्रमबद्ध किया जाता है कि चयन प्रक्रिया समग्र की प्रत्येक इकाई को चुनाव की सम्भावना प्रदान कर सके।“

कुछ इसी तरह के भाव संजोते हुए Frankyates ने अपनी पुस्तक Sampling methods for Censues and Surveys में कहा –

” देव निदर्शन वह है जिसमें समग्र अथवा जनसँख्या की प्रत्येक इकाई को निदर्शन में सम्मिलित होने का समान अवसर प्राप्त होता है।“

आंग्ल अनुवाद –

“Random Sampling is one in which every unit of the population or the population as a whole gets an equal opportunity to be included in the sample.”

इसमें सामान्यतः निम्न विधियों को प्रयोग में लाते हैं –

  • लॉटरी विधि २- सिक्का उछालकर ३ – पासा फैंक कर ४- टिपिट तालिका द्वारा (41600 – 10400)

स्तरीकृत न्यादर्श (Stratified Sampling) –

यह विधि एक महत्त्वपूर्ण विधि है इसमें किन्ही विशेषताओं के आधार पर जनसंख्या को अलग अलग स्तरों या वर्गों में बाँट लिया जाता है तत्पश्चात इसी में से यादृच्छिक विधि से अभीष्ट न्यादर्श का चयन कर लेते हैं। जैसा कि Dictionary of Education  के पृष्ठ संख्या 506 पर लिखा  है –

” Stratified Sample is a sample obtained by dividing the entire population into categories or strata according to some factor or factors and sampling proportionality and independently from each categories usually being done randomly.”

“स्तरीकृत न्यादर्श एक न्यादर्श है. जो समस्त समग्र को कुछ तत्व/तत्वों के आधार पर स्तरों / वर्गों में विभाजित करके प्रत्येक श्रेणी से आनुपातिक एवम् स्वतन्त्र रूप से न्यादर्श चुनकर प्राप्त किया जाता है। सामान्यतया न्यादर्श यादृच्छिक रूप से चुना जाता है।“

गुच्छ न्यादर्श (Cluster Sampling)-

इस विधि में कुल जनसंख्या को कुछ इकाइयों में या समूहों में बाँट लेते हैं इसे ग्रुप न्यादर्श भी कहते हैं इन्हीं गुच्छों या समूहों में से यादृच्छिक तरीके से अभीष्ट न्यादर्श को चुन लिया जाता है। जैसा कि Fred N  Karlinger महोदय कहते हैं। –

“Cluster Sampling most used method in survey’s, is the successive random sampling of units or sets or subsets.”

Fred N Karlinger, op ct p 130      

“सर्वेक्षणों में बहुतायत में प्रयुक्त गुच्छ न्यायदर्शन इकाइयों अथवा समूहों अथवा उपसमूहों का क्रमिक यादृच्छिक न्यायदर्शन है।“

क्रमबद्ध न्यादर्श (Systematic Sampling) –

इस विधि में कुल जनसँख्या का संख्यात्मक मान पता होना जरूरी है इस पूरी सूची को किसी भी तरह से जैसे वर्णमाला या क्रमिक नम्बर से क्रमबद्ध कर लेते हैं ,सभी को एक ही विधि से लिखा जाता है इसके बाद एक क्रम से इकाई या व्यक्ति का चयन करते हैं जैसे हर 20 वां व्यक्ति अभीष्ट न्यादर्श में शामिल होगा। अर्थात यदि 1000 में से 50 को न्यादर्श रूप में लेना है तो 1000 में 50 का भाग देने से पता चल जाएगा कि हर 20वां व्यक्ति लेना होगा।

बहुस्तरीय न्यादर्श (Multistage Sampling) –

जब क्षेत्र बहुत अधिक विस्तृत होता है तो इस विधि को प्रयोग में लाया जाता है इसमें इकाइयों का चयन विविध स्तरों से किया जाता है इनको ज्ञात करने हेतु प्रमुख आधार यादृच्छिक न्यादर्शन ही होता है इसमें विविध स्तरों से किसी के भी चयन की सम्भावना बनी रहती है और सभी स्तरों को प्रतिनिधित्व मिल जाता है। शिक्षा शब्दकोष में पृष्ठ 507 पर लिखा –

” बहु स्तरीय न्यायदर्शन क्रमिक स्तरों में क्रियान्वित किया जाने वाला न्यादर्शन है। उदाहरण के लिए स्तरीकृत समूहों की प्रत्येक संख्या से यादृच्छिक रूप से अनेक समुहों को चुनना। “

” Multistage Sampling is sampling carried out in a successive stages; for example, selecting several clusters randomly from each of a number of stratified clusters.” Dictionary of Education p.507

गैर सम्भाव्यता नमूनाकरण (Non-probability Sampling) –

अभ्यंश न्यादर्श (Quota Sampling) – यह असम्भाव्य न्यादर्श की एक महत्त्वपूर्ण विधि है यह काफी कुछ स्तरीकृत न्यायदर्शन जैसी लगती है लेकिन इसमें प्रत्येक स्तर या वर्ग हेतु कोटा पूर्व निर्धारित होता है जिसकी जानकारी शोधकर्ता को रहती है इसे स्पष्ट करते हुए करलिंगर(Kerlinger)  महोदय कहते हैं –

” असम्भाव्यता न्यादर्श न्यायदर्शन का एक रूप कोटा / अभ्यंश न्यादर्शन है, जिसमें समग्र के स्तरों –यौन, प्रजाति, क्षेत्र और ऐसे ही, का ज्ञान न्यादर्श सदस्यों को चुनने के लिए प्रयुक्त होता है ,जो निश्चित शोध उद्देश्यों के लिए प्रतिनिधिक, विशिष्ट और उपयुक्त हैं।” 

“One form of non probability sampling is Quota Sampling, in which knowledge of strata of the population sex, race, region and so on is used to select sample members that are representative ,typical and suitable for certain research purposes.” Fred N Kerlinger

सोद्देश्य न्यादर्श (Purposive Sampling) –

सोद्देश्य न्यादर्शन विधि में उद्देश्य प्रमुख होता है ,इस उद्देश्य के अनुसा ही शोध कर्त्ता अपनी इच्छाओं व विवेक का प्रयोग करता है उद्देश्यानुरूप विविध इकाइयों का चयन अभीष्ट न्यादर्श हेतु किया जाता है शेष को छोड़ दिया जाता है। समग्र का प्रतिनिधित्व करने वाला न्यादर्श बन सके इस बात का प्रमुखतः ध्यान रखा जाता है। इस सम्बन्ध में Guillford महोदय ने लिखा –

“सोद्देश्य न्यादर्श स्वेच्छा से चयनित (न्यादर्श) है क्योंकि यह एक अच्छा साक्ष्य है ,जो समस्त समग्र का वास्तविक प्रतिनिधि है। “

“A purposive sample is one arbitrarily selected because there is a good evidence that sample is very representative of the total population.”

J.P.Guillford, Fundamentalof statistics in Psychology and Education.(1956) p.199

आकस्मिक न्यादर्श ( Incidental  Sampling) –

यह वह न्यादर्श है जो सहजता से सुविधानुसार उपलब्ध हो जाता है एवम् इसी कारण इसे सुविधाजनक न्यायदर्शन (Convenient Sampling ) के नाम से भी जाना जाता है शिक्षा शब्दकोष में पृष्ठ 506 पर इस सम्बन्ध में लिखा है कि –

“प्रासंगिक न्यादर्श एक एकाकी न्यादर्श के रूप में प्रयुक्त एक समूह है क्योंकि यह सरलता से प्राप्य है।“

“Incidental Sample is a group used as a sample solely because it is readily available.”

Dictionary of Education p. 506

निर्णित न्यादर्श (Judgement Sampling) –

इसमें शोध कर्त्ता अपने किसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए स्वयं निर्णीत इकाइयों के समूह का चयन करता है इस चयनित न्यादर्श को निर्णित न्यादर्श कहा जाता है।

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शोध

SAMPLING

January 4, 2025 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

न्यादर्श

जिस चराचर जगत में मानव रहता है उसमें उस जैसे जीवों की संख्या अरबों खरबों में है। जिस क्षेत्र पर शोध कार्य सम्पन्न किया जाना होता है उसमेंसभी से आंकड़े एकत्रित करना न तर्क संगत है और न व्यावहारिक। जिस तरह भगौने में बनाने वाले चावलों में से एक निकालकर सम्पूर्ण के पकने का अहसास हो जाता है यहाँ एक चावल प्रतिनिधिकारी शक्ति के रूप में कार्य करता है लेकिन मानव चेतन है और प्रत्येक मानव के कार्य व्यवहार सोचने का ढंग पृथक पृथक होता है इसीलिये सम्पूर्ण जनसंख्या में से शोध हेतु प्रतिनिधिकारी संख्या की आवश्यकता होती है उस निश्चित जनसंख्या (Papulation) को ही न्यादर्श (Sample)कहते हैं। मानविकी या सामाजिक शोध कार्यों में न्यादर्श बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। विज्ञान विषयों के परिक्षेत्र में न्यादर्श चयन की समस्या नहीं होती यद्यपि न्यादर्श वहां भी प्रयोग किया जाता है।

न्यादर्श की परिभाषा /  Definition of Sampling –

विविध विद्वानों ने इसे विविध प्रकार से पारिभाषित किया है प्रस्तुत हैं कुछ परिभाषाएं –

गुड व हैट महोदय के अनुसार –

” एक निदर्शन जैसा कि नाम से स्पष्ट है कि विशाल समग्र का एक छोटा प्रतिनिधि है। “

“A Sample, as the name implies, is a smaller representation of a larger whole,”

Goode & Hatt, Methods in Social Research, p-209

कुछ इसी तरह के भाव सिन पाओ येंग ने भी प्रस्तत किये हैं –

“एक सांख्यिकीय निदर्शन, सम्पूर्ण समूह का प्रतिनिधि अंश है।“

“A statistical sample is a cross -section of the entire group.”

Hsin Pao Yang, Fact Finding with Rural People, p 35

बोगार्डस महोदय के अनुसार

” निदर्शन किसी पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार इकाइयों के समूह में से एक निश्चित प्रतिशत को चयन करना है। “

” Sampling is the selection of certain percentage of a group of items according to a pre determined plans.”

 Bogards, Sociology, p 548

एक अन्य विद्वान् पी ० वी ० यंग के अनुसार –

“एक सांख्यिकीय निदर्शन उस सम्पूर्ण समूह अथवा योग का एक लघु चित्र अथवा प्रतिनिधि अंश है जिसमें से वह निदर्शन लिया गया है। “

“A statistical sample is a miniature picture or cross section of the entire group of aggregate from which the sample taken.”

Scientific Social Survey and Research, p 302

न्यादर्श के चयन की आवश्यकता क्यों ?

/ Why is there a need for sample selection?

01 – समग्र का प्रतिनिधित्व / Representation of the whole

02 – समाज के समुचित निर्देशन हेतु / For proper direction of society

03 – मितव्ययी प्राविधि / Economical method

04 – कुशल समय प्रबन्धन सम्भव / Efficient time management is possible

05 – सम्पूर्ण जनसंख्या का अध्ययन सम्भव / Study of entire population is possible

06 – गहन शुद्धतम जानकारी सम्भव /Deepest and most accurate information possible

07 – असम्भव परिक्षेत्र का अध्ययन सम्भव / Studying the impossible area is possible

न्यादर्श की परिसीमाएं / limitations of sampling –

01 – पूर्वधारणा का प्रभाव /  Effect of prejudice

02 – पक्षपात की सम्भावना / Possibility of bias

03 – पूर्ण जनसँख्या का प्रतिनिधित्व दुष्कर / Difficult to represent the entire population

04 – योग्य कार्यकर्त्ता अभाव / Lack of qualified workers

05 – प्रयोज्य की  गाम्भीर्य हीनता / Serious lack of usability

06 – यादृच्छिक तकनीक सर्वोत्तम तो नहीं / Random technique is not the best

उक्त सम्पूर्ण विवेचन न्यादर्श के बारे में बताने में सक्षम है लेकिन इसके बारे में विस्तार से जानना शोधार्थियों और उच्च शिक्षा के विद्यार्थियों हेतु आवश्यक है न्यादर्श के प्रारूप पर आगे विचार कर आपके समक्ष रखने का प्रयास किया जाएगा .

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सांख्यिकी

MEDIAN (मध्यांक)

August 10, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मध्यांक की परिभाषा, उपयोग, गणना (Definition, Uses, Computation of Median) –

जब प्रदत्त आंकड़ों की केन्द्रीय प्रवृत्ति को ज्ञात करना हो तब माध्य के सहारे की आवश्यकता के विकल्प के रूप में माध्यिका का प्रयोग किया जाता है। मध्यांक की गणना में प्रदत्त आंकड़ों को जोड़ने की जगह उसे आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर गणनाकी जाती है।मध्यांक को ही माध्यिका भी कहा जाता है।

मध्यांक की परिभाषा (Definition of Median) – विविध विचारकों ने मध्यांक को पारिभाषित किया है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं –

विकिपीडिया के अनुसार –

“माध्यिका सांख्यिकी और प्रायिकता सिद्धान्त में वह मान है जो सांख्यिकीय जनसंख्या, प्रायिकता बंटन या प्रतिचयन के पदों को दो बराबर भागों में इस प्रकार बांटता है कि आधे पद इससे बड़े तथा आधे पद इससे छोटे हों। जब पदों को परिमाण अनुसार आरोही या अवरोही कर्म में व्यवस्थित किया जाता है तब बीच वाला पद माध्यिका या मध्यक  कहलाता है। “

“Median in statistics and probability theory is the value which divides the terms of statistical population, probability distribution or sampling into two equal parts in such a way that half of the terms are bigger than it and half of the terms are smaller than it. When the terms are arranged in ascending or descending order according to the magnitude Then the middle term is called Median.

गिल्फर्ड (Guilford) महोदय के अनुसार –

“मध्यांक एक ऐसा बिन्दु होता है जिसके मापन के किसी एक स्केल पर ठीक आधे अंक ऊपर की तरफ तथा ठीक आधे अंक नीचे की तरफ होते हैं।”

“The median is defined as that point on the scale of measurement above which are exactly half the cases and below which are the other half.”

एच ई गैरट (H.E.Garrett) महोदय के अनुसार –

“जब अव्यवस्थित अंक या अन्य मापक्रम में व्यवस्थित हों तो मध्य का अंक मध्यांक कहलाता है।”

“When ungrouped scores or other measures are arranged in order of size, the median is the mid- point of series.”  

 एल आर कॉनर महोदय के अनुसार –

“माध्यिका आंकड़ों की श्रेणी का वह पद मूल्य है जो समूह को दो बराबर भागों में इस प्रकार विभाजित करता है, कि एक भाग में समस्त मूल्य माध्यिका से अधिक तथा दूसरे भाग में समस्त मूल्य माध्यिका से कम होता है। “

“The Median is that value of a series of the variable which divides the group into two equal parts, one part comprising of all values greater and the other all values less than the median.”

मध्यिका की उपयोगिता / Uses of Median –

यह स्वीकार किया जाता है कि यदि वितरण का केन्द्र विशेष रूप से मध्य में हो तो मध्यमान की अपेक्षा प्रतिदर्श विभ्रम (Sampling Error) माध्यिका में कम होती है। साथ ही इसकी विविध उपयोगिताओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

01 – अंक समूह का वास्तविक मध्य बिन्दु ज्ञात करने हेतु

02 – बहुलक हेतु

03 – केन्द्रीय प्रवृत्ति के अपेक्षाकृत कम शुद्ध मान हेतु।

04 – छोटे आंकड़ों के वितरण हेतु

05 – मध्यांक पर पद संख्या का प्रभाव ,पद मूल्यों का नहीं।

06 – मध्यांक का निर्धारण ग्राफ द्वारा सम्भव 

07 –असमान वितरण की स्थिति में उपयोगी

मध्यांक की गणना (Computation of Median) –

प्रदत्त आंकड़ों के आधार पर दो तरह से माध्यिका  की गणना की जाती है ।

1 – अव्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना

      (a )  – सम आँकड़े होने पर

      (b )  – विषम आंकड़े होने पर

2 – व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना

आइए इन्हे सूत्र व उदाहरण के साथ अधिगमित करने का प्रयास करते हैं।

1 – अव्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना

      (a )  – सम आँकड़े होने पर – आंकड़ों की संख्या सम होने पर माध्यिका निकालने के लिए इस सूत्र को प्रयुक्त किया जाता है। लेकिन उससे पहले वितरण को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर लेते हैं।

मध्यांक  (Me) = {N /2 वां पद +(N /2 +1) वां पद } / 2 

यहाँ  N = पदों की सँख्या

एक उदाहरण के माध्यम से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।

EXAMPLE – निम्न आंकड़ों से मध्यांक की गणना कीजिए

8, 4, 7, 3, 13 , 9, 11, 12, 15, 14, 17, 19

हल –

आँकड़ों को आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर

3, 4, 7, 8, 9, 11, 12 , 13, 14 , 15, 17 , 19 

यहाँ आँकड़ों की संख्या = 12 ( सम ) = N

मध्यांक  (Me) = {N /2 वां पद +(N /2 +1) वां पद } / 2 

                       = {(12/2) वां पद +(12/2 + 1) वां पद}} / 2

                       =(6 वां पद + 7 वां पद) / 2

                       =(11 + 12) / 2

                        =23/2

  मध्यांक  (Me) =11.5               

      (b )  – विषम आंकड़े होने पर – आंकड़ों की संख्या विषम होने पर माध्यिका निकालने के लिए इस सूत्र को प्रयुक्त किया जाता है। लेकिन उससे पहले वितरण को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर लेते हैं।

मध्यांक  (Me) = (N +1)/ 2  वां पद   

यहाँ  N = पदों की सँख्या

एक उदाहरण के माध्यम से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।

EXAMPLE – निम्न आंकड़ों से मध्यांक की गणना कीजिए

8, 4, 7, 3, 13, 9, 11

हल –

आँकड़ों को आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर

3, 4, 7, 8, 9, 11, 13

यहाँ आँकड़ों की संख्या = 7 ( विषम )

मध्यांक (Mdn) = {(N+1) / 2} वाँ पद

                     = (7 + 1) / 2 वाँ पद

                     = 4  वाँ पद

 मध्यांक (Mdn) = 8 

2 – व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना –

व्यवस्थित आँकड़ों से मध्यांक की गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है 

मध्यांक(Mdn) = L+ {(N/2- F)/ Fm }  X  CI

एक उदाहरण के माध्यम से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।

EXAMPLE – निम्न व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना कीजिए।

C-I47-5142-4637-4132-3627-3122-2617-21
F    3    7      5   10    9     6     7

हल-

            C-I                 C-I            F             CF
         47-51         46.5 – 51.5            347
         42-46         41.5 – 46.5            744
          37-41         36.5 -41.5             537
     ↦  32-36         31.5 -36.5             1032↦
          27-31         26.5 -31.5             922
           22-26         21.5 – 26.5             613
           17-21         16.5 – 21.5             77

                                                                                         N=47

L=31.5, N/2=47/2=23.5, F=22, Fm =10,C-I =5

मध्यांक(Mdn) = L+ {(N/2- F)/ Fm }  X  CI

मध्यांक(Mdn) =31.5+{(23.5- 22)/10}5

मध्यांक(Mdn) =31.5+0.15 X 5

मध्यांक(Mdn) =31.5+0.75

मध्यांक(Mdn) =32.25

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सांख्यिकी

MEAN/ माध्य 

August 4, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

माध्य  [MEAN]

माध्य की परिभाषा, उपयोग, गणना(Definition, Uses, Computation of mean) –

सांख्यिकी की दुनियाँ में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप एक क्रान्ति से कम नहीं है, यद्यपि इसमें कई तरह के मध्यमान,मध्यांक और बहुलांक की गणना शामिल है लेकिन इस अंक में हम यहॉं केवल माध्य जिसे कुछ लोग समान्तर माध्य या अंक गणितीय माध्य के नाम से भी जानते हैं, के बारे में अध्ययन करेंगे और इस अध्ययन में मुख्यतः इसकी परिभाषा, उपयोग और गणना को शामिल करेंगे।

माध्य की परिभाषा (Definitions of mean) – जब किसी आंकड़े में प्राप्त अंकों का योग करके उस समूह की कुल संख्या (N) द्वारा विभाजित किया जाता है और इस प्रक्रिया के माध्यम से जो संख्या प्राप्त होती है उसे उस समूह का मध्यमान (Mean) कहा जाता है।

विकिपीडिया के अनुसार –

”समान्तर माध्य वह मूल्य है ,जो किसी श्रेणी के समस्त पदों के मूल्य के योग में उसकी संख्या का भाग देने से प्राप्त होता है।“

आंग्ल अनुवाद

“The arithmetic mean is the value which is obtained by dividing the sum of the values ​​of all the terms of a series by its numbers.”

रेबर और रेबर  के अनुसार –

” मूल्यों या प्राप्तांकों के समूह को मूल्यों या प्राप्तांकों की संख्या से भाग देना ही अंकगणितीय मध्यमान कहलाता है।“

 ” Arithmetic mean is the sum of a set of value or score divided by the number of value or score.”

ग्लीट मैन के अनुसार –

“किसी अंक सामग्री के समस्त अंकों के योगफल को उन अंकों की संख्या से भाग देने से जो भाग फल प्राप्त होता है उसे मध्यमान कहते हैं।“

“The mean is the sum of the separate score of the measures divided by their number.”

माध्य का उपयोग(Uses of mean) –

01 – गणना में सरलता के कारण इसकी अधिक लोकप्रिय ढंग से उपादेयता है।

02 – अनुमानित न होने की वजह से यह यथार्थ के निकट मानकर उपयोग में लाया जाता है क्योंकि इसे ज्ञात करने की एक निश्चित विधि व सूत्र है। 

03 – केंद्रीय प्रवृत्ति में इसे तुलना का महत्त्वपूर्ण आधार मानकर प्रयोग करते हैं।

04 – वितरण के प्रत्येक अंक को स्थान मिलने के कारण इसकी विश्वसनीयता अधिक है।

 05 – अधिगम में सरलता के कारण भी यह अधिक उपयोगी है।

06 – शुद्ध और विश्वसनीय गणना हेतु इसकी अधिक उपयोगिता है।

माध्य की गणना (Computation of mean) –

अव्यवस्थित और व्यवस्थित आंकड़ों के मध्यमान हेतु  सामान्य रूप से यह विधियाँ प्रयोग में लाई जाती हैं –

1- अव्यवस्थित आंकड़ों का मध्यमान [Mean of unsystematic data]

2 – व्यवस्थित आंकड़ों का मध्यमान [Mean of systematic data]

  1. अव्यवस्थित आंकड़ों का मध्यमान [Mean of unsystematic data]-

यदि आंकड़े बिखरे हुए या अव्यवस्थित हों तो इस तरह के आंकड़ों का मध्यमान निम्न सूत्र के माध्यम से ज्ञात किया जाता है –

मध्यमान (M ) = ∑X / N

∑X = आंकड़ों का योग

N = आंकड़ों की संख्या

उदाहरण /Example –

प्रश्न  – निम्न अवव्यवस्थित आंकड़ों के मध्यमान की गणना कीजिए।

32, 36, 37, 39, 43, 47

हल – उक्त प्राप्तांकों के अनुसार

N = आंकड़ों की संख्या = 6

∑X = आंकड़ों का योग = 32+ 36+ 37+ 39+ 43+ 47 = 234

मध्यमान (M ) = ∑X / N = 234/6 = 39

प्रश्न  – इस वितरण में राम और श्याम के विगत 5 माह के प्रयुक्त विद्युत् यूनिट दिए गए हैं  दोनों का विगत 5 माह की  विद्युत खपत का मध्यमान ज्ञात कीजिए।   

क्रमाङ्क  12345
राम के यूनिट  142145168131150
श्याम के यूनिट  232243254212249

हल – उक्त प्राप्तांकों के अनुसार

N = माह की संख्या = 5

∑X = राम के यूनिट  का योग = 142+ 145 + 168 + 131+ 150 = 736

राम के यूनिट  का मध्यमान (M ) = ∑X / N = 736/5 = 147.2

N = माह की संख्या = 5

∑X = श्याम  के यूनिट  का योग = 232 + 243 + 254 + 212 + 249 = 1190

श्याम के यूनिट  का मध्यमान (M ) = ∑X / N = 1190/5 = 238

2 – व्यवस्थित आंकड़ों का मध्यमान [Mean of systematic data]  –

अभी जिन आंकड़ों का मध्यमान ऊपर निकाला गया है वह सरल है क्योंकि सीमित अर्थात कम आंकड़ों का प्रयोग किया है जब आँकड़े बहुत ज्यादा होते हैं तो मध्यमान को अन्य विधियों द्वारा ज्ञात किया जाता है। विस्तृत, जटिल तथा व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यमान ज्ञात करने की दो विधियाँ प्रचलित हैं।

मध्यमान (दीर्घ विधि द्वारा गणना) – दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

मध्यमान (M ) = ∑f. X / N

M = मध्यमान (Mean)

∑ = योग का चिन्ह

f  = आवृत्ति

X = वर्गान्तर का मध्य बिन्दु 

N = आवृत्तियों का योग

f. X = आवृत्ति और वर्गान्तर मध्यमान का गुणनफल

इस सूत्र के प्रयोग को निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है ।

उदाहरण /Example –

प्रश्न  – निम्न आवृत्ति वितरण से दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान की गणना कीजिए।

वर्ग अन्तराल0-45-910-1415-1920-2425-29
f479111514

 हल – उक्त प्राप्तांकों के अनुसार

वर्ग अन्तराल C- Iमध्य बिन्दु ( X)आवृत्ति( f)f. X
25-292714378
20-242215330
15-191711187
10-14129108
5-977  49
0-424    8
  N = 60∑f. X = 1060

 दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

मध्यमान (M ) = ∑f. X / N

M = मध्यमान (Mean)

∑ = योग का चिन्ह

f  = आवृत्ति

X = वर्गान्तर का मध्य बिन्दु 

N = आवृत्तियों का योग

f. X = आवृत्ति और वर्गान्तर मध्यमान का गुणनफल

मध्यमान (M ) = ∑f. X / N

                         =1060 / 60

                         = 17.666

                         =17.67

मध्यमान (लघु विधि द्वारा गणना) – दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है –

मध्यमान (M ) = A,M + (∑f. d / N) x i

M = मध्यमान (Mean)

A.M = कल्पित माध्य

∑ = योग का चिन्ह

f  = आवृत्ति

d= कल्पित मध्यमान से विचलन

N = आवृत्तियों का योग

f. d = आवृत्ति और मध्यमान से विचलन का गुणनफल

उदाहरण /Example –

प्रश्न  – निम्न आवृत्ति वितरण से लघु विधि द्वारा मध्यमान की गणना कीजिए।

वर्ग अन्तराल0-45-910-1415-1920-2425-29
f479111514

हल – उक्त प्राप्तांकों के अनुसार

वर्गअन्तरालC-Iआवृत्ति( f)कल्पित मध्यमान से विचलन (d)fXd
25-2914342
20-2415230
15-1911111
10-14 (कल्पित माध्य वर्ग)900
5-97-1-7
0-44-2-8
 N = 60 ∑f.d=68

– दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु  सूत्र  –

मध्यमान (M ) = A,M + (∑f. d / N) x i

M = मध्यमान (Mean)

A.M = कल्पित माध्य

∑ = योग का चिन्ह

f  = आवृत्ति

d= कल्पित मध्यमान से विचलन

N = आवृत्तियों का योग

f. d = आवृत्ति और मध्यमान से विचलन का गुणनफल

–दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु  सूत्र  –

मध्यमान (M ) = A,M + (∑f. d / N) x i

A,M =(10+14)/2=12

∑f. d = 68

N = 60

I = 5

मध्यमान (M ) = A,M + (∑f. d / N) x i

                      =12+(68/60) X 5

                      =12 +5.666

                      =17.666

                      =17.67

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सांख्यिकी

INTRODUCTION TO STATISTICS

July 9, 2024 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सांख्यिकी का परिचय

सांख्यिकी शब्द की उत्पत्ति के सम्बन्ध दो विचार धाराएं विश्लेषण का परिणाम बंटी दिखाई पड़ती हैं इसके बारे में जानना और इतिहास जानना अत्याधिक रोचक है। ऐसा कहा जाता है कि सांख्यिकी शब्द की उत्पत्ति इटैलियन भाषा के स्टैटिस्टा (Statista) शब्द से हुई है या लैटिन के स्टेटस(Status) शब्द इसके अस्तित्व में आने का कारण है। दोनों ही शब्दों का अर्थ राजनैतिक स्टेट (Political State) है प्रत्येक स्टेट को आय, व्यय, जनसंख्या, सैनिक संख्या व जन्म मरण का लेखा जोखा रखना पड़ता है कोई भी स्टेट इन आंकड़ों का सही लेका जोखा करके ही अपनी विभिन्न नीतियों को धरातल पर उतारता रहा होगा। इसी लिए ये कहा जा सकता है कि बदलते समय के साथ यही स्टैटिस्टा (Statista) ya स्टेटस (Status) शब्द Statistics(सांख्यिकी) कहा लगा। यह विचार धारा वर्णनात्मक सांख्यिकी (Descriptive Statistics)के सम्बन्ध में ज्यादा तर्क सांगत दिखाई पड़ती है।

एक अन्य विचारधारा के अनुसार यह माना  जाता है कि कि इसका जन्म वैज्ञानिकों की जगह जुआरियों की आवश्यकता के कारण हुआ। अनुमानात्मक सांख्यिकी (Inferential Statistics) की विचार धारा इस आधार पर बलवती हुई कि इटली के कुछ जुआरियों ने उस काल के प्रसिद्द वैज्ञानिक गैलीलियो की इस सम्बन्ध में राय माँगी कि किस नम्बर पर जुआ लगाएं कि जीत सुनिश्चित हो सके। गैलीलियो ने प्रसम्भाव्यता (Probability) के आधार पर जो राय दी वह उपयोगी सिद्ध हुयी।इसी समय फ़्रांस में जुआरियों ने पास्कल के प्रसम्भाव्यता सिद्धान्त  (Pascal’s Theory of Probability)के निर्माण में विशेष योग दिया।इनके अलावा सांख्यिकी विकास में बरनॉली, गॉस, बैकन व पीयर्सन का नाम भी लिया जाता है।

HISTORY OF STATISTICS

सांख्यिकी का इतिहास

सांख्यिकी के सम्बन्ध में कहा जा सकता है की इसका इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव सभ्यता  इतिहास। इसका विधिवत उपयोग राजतन्त्र के समय हुआ जब राज्यों ने तर्कसंगत विकास हेतु जन शक्ति,धन शक्ति, सैन्य शक्ति,पशु शक्ति,कृषि व भूमि सम्बन्धी आंकड़ों का प्रयोग किया। जन्म दर, मृत्यु दर, वनीय संसाधन आदि की गणना हेतु सांख्यिकी राजतन्त्र की सहायिका सिद्ध हुई।

            आधुनिक सांख्यिकी के जन्मदाता व प्रवर्तक के रूप में फ्रांसिस गॉल्टन, कार्ल पियर्सन व आर ए फिशर का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। सांख्यिकी का वर्तमान स्वरुप विगत चार शताब्दियों में हुए अनुसंधान का परिणाम है यद्यपि इस सम्बन्ध में 1620 में प्रसिद्द गणितज्ञ गैलीलियो ने तार्किक विचार को धरातलीय आधार दिया। ग्राण्ड ड्यूक को लिखे चार पृष्ठीय पत्र में प्रायिकता के चार सिद्धान्त – अनुपात का सिद्धान्त, औसत का सिद्धान्त, योग का सिद्धान्त व गुणन के सिद्धान्त को प्रस्तुत किया।

            फ्रांसिस गॉल्टन को सांख्यिकी के सह सम्बन्ध गुणांक ( Coefficient of correlation) का पता लगाने का श्रेय है . प्रसरण विश्लेषण(Analysis of Variance) हेतु आर ए फिशर का योगदान कभी भुलाया नहीं जा सकता। जेम्स बरनौली(1654 – 1705 ) ,अब्राहम डी मोइबर (1667 -1754 )  आदि गणतज्ञों ने प्रायिकता का व्यवस्थित रूपेण अध्ययन किया परिणाम स्वरुप प्रायिकता सिद्धान्त (Probability Theory) अस्तित्व में आया। सन 1733 में  डी मोइबर महोदय ने सामान्य प्रायिकता वक्र (Normal Probability Curve ) का समीकरण ज्ञात किया। पीयरे साइमन लाप्लास (1749 – 1830 ) व कार्ल फ्रेड्रिच गॉस (1777 – 1827) ने 19 वीं शताब्दी के पहले दो दशकों में प्रायिकता पर महत्त्वपूर्ण कार्य किया सन 1812 में लाप्लास महोदय ने प्रायिकता सिद्धान्त पर महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा। और इसी के माध्यम से उन्होंने अल्पतम वर्ग विधि (Least Squares Method) को सत्यापित किया। गॉस महोदय ने तो सामान्य प्रायिकता वक्र हेतु इतना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया की इनके नाम पर सामान्य प्रायिकता वक्र को आज भी गॉसियन वक्र के नाम से जाना जाता है।

            उन्नीसवीं शताब्दी प्रसिद्द गणितज्ञ ए क्युलेट (1796 -1874 ) ने सामाजिक समस्याओं के अध्ययन में सांख्यिकी का प्रयोग कर बेल्जियम की उपस्थिति इस क्षेत्र में दर्ज की।इनके द्वारा प्रायिकता वक्र व अन्य सांख्यिकीय विधियों का प्रयोग विविध व्यावहारिक विज्ञानों में किया गया। सर फ्रांसिस गाल्टन 1882 -1911 ने भी अपना अपूर्व योगदान सांख्यिकी को सामाजिक विज्ञानों में प्रयोग करके दिया। सह सम्बन्ध  व शतांशीय मान के प्रत्यय को गाल्टन महोदय ने ही प्रस्तुत किया। आपके साथ गणितज्ञ कार्ल पियर्सन ने भी कार्य किया। सहसम्बन्ध व प्रतिगमन (Correlation and Regression) के अनेक सूत्रों के विकास में गाल्टन महोदय ने विशेष योगदान दिया।

            बीसवीं शताब्दी सांख्यिकी के प्रयोग के हिसाब से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रही। इस काल में लघु प्रतिदर्शों पर कार्य करने हेतु विविध प्रविधियों का विकास किया गया। लघु प्रतिदर्शों के विकास में अंग्रेज सांख्यिकीविद रोनाल्ड ए फिशर(1890 -1962 ) का महत्त्व पूर्ण योगदान रहा। इन्होने अपनी विविध विधियों का प्रतिपादन चिकित्सा, कृषि व जीव विज्ञानों के क्षेत्र में किया लेकिन बहुत जल्दी ही सामाजिक विज्ञानो ने इन विकसित विधियों की उपयोगिता जानकर समस्याओं के अध्ययन हेतु इनका प्रयोग प्रारम्भ कर दिया। वर्तमान समय में सामाजिक विज्ञानों के अनुसंधान कार्यों में सांख्यिकी का प्रयोग अति महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में किया जाता है।

Definition and need of Statistics

सांख्यिकी की परिभाषा एवं आवश्यकता –

सांख्यिकी को प्रारम्भिक दौर में औसत, सामान्य विज्ञान और सामान्य प्रयोग तक सीमित मान कुछ संकीर्ण परिभाषाएं दी गयीं ज्यों ज्यों इस ने अपने क्षेत्र का विस्तार किया परिभाषाएं यथार्थ के अधिक निकट आईं और व्यापक दृष्टिकोण से सांख्यिकी को पारिभाषित किया गया। इसमें तत्सम्बन्धी आंकड़ा संग्रहण, वर्गीकरण, वितरण , प्रस्तुतीकरण, विश्लेषण, संश्लेषण, व्याख्या, स्पष्टीकरण सभी को समाहित किया गया। यह वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सांख्यिकी के यथार्थ से तालमेल की क्षमता रखती हैं। प्रस्तुत हैं कुछ परिभाषाएं –

“सांख्यिकी औसतों का विज्ञान है।” – ब्राउले

“Statistics is the science of averages.”

“सांख्यिकी अनुमानों तथा सम्भावनाओं का विज्ञान है।” – बोडिंगटन

“Statistics is the science of estimates and probabilities.”

“सांख्यिकी वैज्ञानिक पद्धति की वह शाखा है जिसका सम्बन्ध प्राकृतिक तथ्यों व घटनाओं के उन समंकों के अध्ययन से है जिनको गणना अथवा मापन द्वारा एकत्रित किया गया है।”   – एम० जी० केण्डल

” Statistics is the branch of scientific method which deals with data obtained by counting of measuring properties of population of natural phenomena.”

“सांख्यिकी किसी जाँच क्षेत्र पर प्रकाश डालने के लिए समंकों के संकलन, वर्गीकरण, प्रस्तुतीकरण, तुलना तथा व्याख्या करने  विधियों से सम्बन्धित विज्ञान है।”  – सेलिंग मेन

“Statistics is the science which deals with the methods of collecting, classifying, presenting, comparing and interpreting numerical data collected to through some light on any sphere of inquiry.”

“सांख्यिकी एक ऐसा विज्ञान है, जिसके अन्तर्गत सांख्यिकीय तथ्यों का सङ्कलन, वर्गीकरण तथा सारणीयन इस आधार पर किया जाता है कि उसके द्वारा घटनाओं की व्याख्या, विवरण व तुलना की जा सके।” – लोविट 

“Statistics is the science which deals with the collection, classification, and tabulation of numerical facts as the basis for explanation, description, and comparison of phenomena.” –  Lovitt

अभी तक दी गई परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि सांख्यिकी की आवश्यकता मुख्यतः इन कारणों से है।

1 – तत्सम्बन्धी तथ्यपूर्ण आंकड़ों का संकलन / Compilation of relevant factual data

2 – प्राप्त आंकड़ों का व्यवस्थापन / Organization of received data

3 – प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण  / Analysis of received data

4 – सामान्यीकरण व भविष्य कथन / Generalization and prediction

5 – गुणों को संख्यात्मक मान प्रदान करना / Assigning numerical values ​​to properties6 – शोध हेतु परिकल्पना का निर्धारण / Determining the hypothesis for research

7 – सामान्य ज्ञान के स्तर में प्रामाणिक वृद्धि / Authentic increase in the level of general knowledge

8 – नीति निर्माण व क्रियान्वयन में योगदान / Contribution in policy formulation and implementation

सांख्यिकी के प्रकार

Types of statistics –

-सांख्यिकी को जब हम विषय सामिग्री के आधार पर विवेचित करते हैं तो सामान्यतः इसे पाँच भागों में विभक्त किया जा सकता है। यह पाँच प्रकार इस तरह अधिगमित किये जा सकते हैं।

 01 – सैद्धान्तिक सांख्यिकी / Theoretical Statistics

 02 – वर्णनात्मक सांख्यिकी / Descriptive Statistics

 03 – आनुमानिक सांख्यिकी / Inferential Statistics

 04 – व्यावहारिक सांख्यिकी / Applied Statistics

 05 – भविष्य कथनात्मक सांख्यिकी / Predictive Statistics

उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन में सांख्यिकी का परिचय देते हुए  इतिहास, परिभाषाएं सरलतम ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है साथ ही यह भी सरलतम रूप से बताया है कि सांख्यिकी की आवश्यकता किन कारणों से है और इसके कौन कौन से प्रकार हैं।

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