जब मेरा जन्म हुआ तब तक मेरा परिवार निर्धनता की श्रेणी में आ चुका
था पिताजी उस समय एक शुगर फैक्ट्री में फिटर की हैसियत से कार्य रहे थे मेरे पढ़ने के लिए वहाँ 12वीं तक विद्यालय था जिसे पूरा कर आगे पढ़ाना
हालाँकि चार बच्चों वाले परिवार में विलासिता जैसा था लेकिन मेरे माता पिता ने
जीवटता का परिचय दे आगे पढ़ाने का निश्चय किया। अपने स्नातक अध्ययन के दौरान कुछ
धनार्जन कर परिवार का सहयोग करने की इच्छा बलवती हुई। तमाम प्रयास के बाद कोई आय
का निश्चित साधन नहीं बन पा रहा था।
एक दिन मैं अत्याधिक चिन्ता से व्यथित फैक्ट्री
कालोनी में अपने दरवाजे पर मूढ़ा डाले बैठा था अचानक मुझे अपने एक परिचित का ध्यान
आया जो गलत तरीके से चोरी, डकैती व ठगी के माध्यम से पैसे कमा रहा था और
हमेशा उसकी जेब रुपयों से भरी रहती थी मैं उसके साथ काम करने के लिए उससे बात करने
की सोचने लगा तभी मेरे से एक घर पहले रहने वाले मेरे इण्टर मीडिएट वाले
प्रधानाचार्य जी आ गए उन्होंने मुझे चिन्तामग्न देखकर अपने पास बुलाया और परेशानी
का कारण जानना चाहा मैंने सच सच जो मेरे मन में आ रहा था सब बता दिया। उन्होंने
मुझे अपनी बैठक में बैठने का आदेश दिया।
मैं स्वचलित यन्त्र सा उनके समक्ष बैठा था
उन्होंने धीमी प्रभावशाली आवाज में मुझसे कहा कि तुम्हारे भविष्य की बहुत
सकारात्मक सम्भावनाएं मुझे दीख पड़ती हैं मैंने तुममें एक अच्छे वक्ता और कवि के
लक्षण देखे हैं मेर विद्यालय में तुम 7 वर्ष पढ़े हो,जहां तक मैं समझता हूँ तुम एक मेधावी छात्र हो
और जिन लोगों के बच्चों को तुम आजकल पढ़ा रहे हो वो सब तुम्हारी तारीफ़ करते हैं
क्या तुम किसी दूसरे का धन छीन सकोगे किसी अन्य को दुखी करके खुद सुख प्राप्त कर सकोगे किसी अन्य की मेहनत
की रोटी छीनकर स्वयम् खा सकोगे।
मैं अवाक रह गया किंकर्त्तवय विमूढ़ता की स्थिति
में मैंने सुना वे मुझसे पूछ रहे थे यदि तुम्हें कहीं जाने के लिए टिकट खरीदना हो
और दो जगह से टिकट मिल रहे हों एक जगह
लगभग तीन सौ लोग लाइन में हों और
दूसरी जगह तीन तो किससे टिकट लेना पसन्द करोगे। मैंने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया
जहाँ तीन लोग खड़े हैं उन्होंने तुरन्त पुछा, क्यों ? मैंने कहा वहाँ जल्दी नम्बर आएगा और दूसरी जगह
से तो टिकट मिलते मिलते ट्रेन छूट भी सकती है।
प्रधानाचार्य जी मुस्कुराए और बोले यहाँ चोरों, डकैतों, ठगों, भ्रष्टाचारियों, बेईमानों और दुष्टों की बहुत लम्बी लम्बी पंक्तियाँ लगी हैं यदि उस लाइन
में लग गए तो इस जन्म में तुम्हारा नंबर आ पाएगा इसमें संशय है दूसरी ओर सत्यनिष्ठ, ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ लोगों की लाइन बहुत
छोटी है जहां तुम सच्चाई और लगन से अपनी पहचान बना सकते हो।
उन्होंने बताया एक बार इन्दिरा गाँधी ने भी कहा
था -“मेरे दादाजी ने एक बार मुझसे कहा था कि दुनियाँ में दो तरह के लोग होते
हैं वो जो काम करते हैं और जो श्रेय लेते हैं,उन्होंने
मुझसे कहा कि पहले समूह में रहने की कोशिश करो वहाँ बहुत कम प्रतिस्पर्धा है।”
प्रधानाचार्य जी की बातों ने मेरी तन्द्रा तोड़
दी थी मुझे लग रहा था की किसी ने झकझोर कर मुझे जगा दिया था उसी दिन से मैंने
सच्चाई और कर्त्तव्य परायणता का जो पाठ सीखा उसी की बदौलत आज कई विषय में
स्नातकोत्तर, एम० एड० ,नेट
पीएच डी आदि करके एक प्रतिष्ठित पी ० जी ० महाविद्यालय में प्राचार्य पद पर हूँ और
मेरी कवितायें व वादविवाद परिक्षेत्र में जीता गया स्वर्णपदक मुझे अपने
प्रधानाचार्यजी द्वारा बताई सच्चाई की राह पर चलने की अनवरत प्रेरणा देता है।
मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्त्व को आधार प्रदान करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है मानसिक स्वास्थ्य। सुन्दर सलोना मुखड़ा, सुन्दर गहरी झील सी आँखे, सुडौल शरीर में यदि मानसिक विकृति आ जाए तो व्यक्ति अपनी पहचान खो बैठता है। मानसिक स्वास्थय का अभाव जिन्दगी के 10 से 15 वर्ष तो कम कर ही देता है। सम्पूर्ण परिवार को एक त्रासदी, अनचाही यन्त्रणा भोगने को विवेश होना पड़ता है। शारीरिक आयु बढ़ने पर मानसिक आयु उससे साम्य रखने में खुद को असमर्थ पाती है। इसी लिए मानसिक स्वास्थय की यत्न पूर्वक रक्षा की जानी चाहिए।
मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने हेतु उपाय
(Tips to maintain good mental health) –
इस
बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मानव शरीर, चेतन
जगत का अद्भुत उपागम है और इस अद्भुत उपागम का सशक्त आलम्ब है उत्तम मानसिक
स्वास्थय। विधाता विलक्षण शक्तियों को हमें प्रदान कर उनके संरक्षण की विशेष
जिम्मेदारी भी हमें प्रदान करता है इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने हेतु कुछ
महत्त्वपूर्ण बिन्दु आपसे साझा कर रहा हूँ जो इस प्रकार हैं। –
स्वयम् से प्रेम (Self-esteem ) –
यदि
हम खुद से प्रेम नहीं कर सकते या खुद को सम्मान नहीं दे सकते तो अन्य के साथ भी हम
केवल दिखावा कर सकते हैं उसमें प्रमाणिकता नहीं होगी। इसलिए सबसे पहले खुद की
इज्जत करें और अपने प्रिय अच्छे कार्यों हेतु समय दें। प्रत्येक वह कार्य जो हमें
सचमुच खुशी प्रदान करता है और दूसरों के दुःख का कारण नहीं बनता वह हमें पूर्ण
मनोयोग से करना चाहिए। वह नृत्य, सङ्गीत, लेखन, बागवानी, प्रिय भोज्य पदार्थ बनाना आदि कुछ भी हो सकता
है।
आत्म संयम (Self-control) –
संसार की समस्त व्यवस्था का व्यवस्थापन हमारे
वश में नहीं है हम अपने ऊपर ही नियन्त्रण कर लें यही बड़ी बात है दूसरों को दिशा भर
देने का क्षमता भर प्रयास किया जा सकता है अपना कार्य पूर्ण करें दूसरे की
प्रतिक्रिया भिन्न हो तो खिन्न न हों। सभी का मानसिक स्तर व क्षमता भिन्न होती है।
संयम हमें व्यवस्थित रख मानसिक स्वास्थ्य को सम्बल देगा।
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति: |
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायत: || 36||
अर्थात
जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में
किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह
मेरा मत है॥36॥
सकारात्मकता का प्रशिक्षण (Training of positivity) –
अपने मष्तिस्क को सकारात्मकता प्रकीर्णन का अजस्र स्रोत बनाना है परिस्थितियों के वशीभूत नहीं हो जाना है उन्हें अपने अनुकूल बनाने की समग्र विशिष्ट रणनीति बनाकर अमल करने की आवश्यकता है इससे मष्तिस्क कुशल रहने हेतु सबल हो जाएगा और बहुत से मष्तिष्कों को दिशा देने में सफल रहेगा। मानसिक अस्वस्थता का तो सवाल
ही नहीं उठ सकता।
व्यायाम, प्राणायाम
(Exercise, Pranayam) –
मानसिक रूप से सबल बनाने का यह सबसे सशक्त माध्यम है, व्यायाम प्राणायाम, एरोबिक्स, स्ट्रैचिंग आदि इस तरह की क्रियाएं हैं जिससे फेफड़े और हृदय शक्तिशाली हो जाते हैं और अधिक क्षमता से ऑक्सीजन ग्रहण कर पाते हैं इससे शरीर की सब क्रियाएं व्यवस्थित हो जाती हैं और हम मानसिक रूप से सबल कब हो गए यह विषम स्थिति आने पर ही पता चलता है और लोग आपके नेतृत्त्व में कार्य करने को लालायित रहते हैं। व्यायाम, प्राणायाम में निरंतरता रहना परमावश्यक है। ये अपनी क्षमता के अनुसार सभी कर सकते हैं। Education Aacharya पर YOU TUBE पर TIP TO TOP Exercise part 1 & 2 में सभी के करने वाली सरलतम क्रियाएं दी हैं।
सत्संगति (Satsang)–
भारत में एक कहावत प्रसिद्ध है की खरबूजे को
देखकर खरबूजा रंग बदलता है जिससे आशय है की साथ का संगति का प्रभाव पड़ता ही है
इसीलिये अलग अलग तरह के लोग अलग अलग ग्रुप में दीख पड़ते हैं। चूंकि यहां बात
मानसिक स्वास्थय के सम्बन्ध में हो रही है इसलिए यह बताएं प्रासंगिक हो जाता है कि
सबल मानसिक स्वास्थ्य या सकारात्मक व्यक्तित्वों का साथ सत्संगति कहलायेगा तथा
मानसिक उत्थान व सशक्तिकरण में योग देगा। इसीलिए घर में उच्च मानसिक क्षमता वाले
व्यक्तित्वों के ही चित्र लगाए जाएँ भले ही वे सशरीर हों या नहीं।
विचार विनिमय व तार्किकता (Exchange of thoughts and reasoning)–
सत्य और तार्किकता का चोली दामन का साथ है इसे झुठलाया नहीं जा सकता। मानसिक
उत्थान हेतु हमें अध्ययन,
मनन, चिन्तन, अनुभव का आधार लेकर स्वस्थ विचार विनिमय में
सक्रियता दिखानी चाहिए और सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए। किसी भी विवाद में
बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए हम सब आपस में दुश्मन नहीं हैं जो विचार त्याज्य है वह
तार्किकता की कसौटी पर हार जाएगा और सबल मानसिक स्वास्थय का पथ प्रशस्त होगा तथा
मन पर कोइ बोझ नहीं रहेगा। और हम पुनः उद्घोष कर सकेंगे।
–
सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग्
भवेत्।।
अर्थात
सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी
मंगल के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
स्वयम् को समय और उपहार दें(Give
yourself time and gifts, ) –
यदि हम मानसिक रूप से सशक्त महापुरुषों का
अध्ययन करें तो पाएंगे की इन्हें गढ़ने में एकान्त और इनके खुद के विचारों को धार
इन्होने स्वयम् के लिए समय निकाल कर दी है। वह समय कोई भी हो सकता है,स्थितप्रज्ञता की स्थिति तभी बनती है
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय में भगवन कहते हैं –
या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। 69
अर्थात्
सभी प्राणियों के लिये जब रात होती है, तब सयंमी(मुनि) जागता रहता है और जब सभी
प्राणियों के लिये जागने का समय होता है तब मुनि के लिये रात होती है।
मानसिक बल से युक्त होने हेतु हमें खुद को गढ़ना
होगा तथा अपने लिए दंड व उपहार का निर्णयन करना होगा।
समाज सेवा और चैन की नींद(Social
service and sleep in peace)–
मानसिक स्वास्थ्य की उच्चता का एक मापन यह भी
है की हम अपना ही नहीं समाज के उत्थान में योग दें सकें। रामचरित मानस में आया है
–
”परहित सरिस धरम नहिं भाई ।
पर
पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।”
यह परहित चिन्तन जहां हमें मानसिक रूप से सशक्त
करता है वहीं इससे मिलने वाली संतुष्टि चैन की नींद लाने में मदद करती है इससे हम
उत्तरोत्तर मानसिक स्वास्थय की स्थिति को प्राप्त करते हैं।
अन्ततः कहा जा सकता है कि खुद से हारना छोड़ दो
आप इतने अधिक मानसिक स्वास्थ्य के मालिक बन जाओगे की दुनियाँ आपका कुछ नहीं बिगाड़
सकेगी।
संसार का सर्व श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य कहा जाता है लेकिन किसी भी मनुष्य के ऊपर हावी हो सकता है तनाव। इसने अवतारों को भी नहीं बख्शा। भले ही आप उसे लीला कह लें। जिसने इन तनावों का जितनी कुशलता से निवारण किया वह उतना अधिक सफल हुआ। तनावों से बचाने के लिए न तो आपके ऊपर मनोवैज्ञानिक भारी भारी सिद्धान्तों का बोझ डालूँगा और न धर्माचार्यों के चक्र व्यूह में आपको फँसाऊँगा। यह एक असन्तुलन है जिसे सहजता से सन्तुलन की दहलीज पर लाया जा सकता है। तमाम साहित्य और दृश्य श्रव्य सामग्री से जो जवाब नहीं मिल पाया वह लगभग 500 लोगों के विचारों से मुझे प्राप्त हुआ आपके साथ उसी प्रतिक्रिया को बिन्दुवत तनाव मुक्ति के स्वीकृत विचारों के रूप में आपसे साझा करता हूँ। विश्वास रखिये तनाव उड़न छू हो जाएगा।
तनाव
से मुक्ति के उपाय –
आप इनकी सरलता पर मत जाना ये लोगों के विचारों का सार है जिन्हें इस
प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
1⇒प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में जागरण
–
सुबह चार बजे उठने से पूरे दिन की दिनचर्या व्यवस्थित हो जाती है याद
रखें हमें तनाव प्रबन्धन नहीं करना है प्रबन्धन अच्छी चीजों का किया जाता है तनाव
का तो समूल विनाश किया जाना है इसीलिए जब उचित समय पर जागेंगे तो सारे कार्यों को
समय मिल सकेगा और तनाव उत्पत्ति के कई कारण दम तोड़ देंगे।
2⇒शौच स्नानादि क्रिया –
दैनिक क्रियाओं का व्यवस्थित सम्पादन करेंगे मल त्याग से पूर्व
पर्याप्त जल का सेवन मौसम के अनुसार करेंगे। मालिश और रगड़ रगड़ कर स्नान की आदत का
अनुपालन करेंगे।दन्त धावन के पश्चात आँख पर छपाके लगाते समय मुँह में पानी अवश्य
भरा हो। समय प्रबन्धन का विशेष ध्यान रखेंगे। यहीं से खुशनुमा दिन हमारी प्रतीक्षा
करेगा। ध्यान रखें इन छोटी छोटी बातों का तनाव मुक्ति
से सीधा सम्बन्ध है।
3⇒चिन्तन – मनन व व्यूह रचना –
आदि शक्तियों और अच्छे अच्छे विचारों का चिन्तन मनन करने के साथ पूरे
दिन के कार्यों हेतु व्यवस्थापन की व्यवस्थित रणनीति बनाई जानी चाहिए। किसी तरह का
कोई बोझ मन पर नहीं रखना चाहिए। कोई बोझिल विचार लम्बे समय तक जुड़कर तनाव में
परिवर्तित होता है इसीलिये उसे प्रारम्भ में ही दरकिनार कर देना चाहिए।
4⇒आसन, प्राणायाम, व्यायाम –
आसन और व्यायाम तन के तनाव का निदान करता है और प्राणायाम मन को तनाव
से बचाता है तन मन इससे तनाव मुक्त व्यवहार का निर्वहन करने का आदी हो जाता है
अचेतन मष्तिस्क अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मानस में शक्ति संचरण के प्रवाह को
बनाये रखता है।
5⇒ ऊर्जा स्तर उन्नयन –
हमारा शरीर एक अत्याधिक उन्नत किस्म का यन्त्र है जो अपने आप अपने को
ठीक करने करने की व्यवस्था करता है और तनाव शैथिल्य हेतु दर्द,
आँसू, ऐंठन, बेहोशी, उन्माद आदि का प्रगटन करता है और कालान्तर में
स्वयं को ठीक कर लेता है। लेकिन लगातार तनाव उत्पादक विचार का चिन्तन इस शरीर को
अपूरणीय क्षति पहुँचाता है इसीलिए हमें अपने शरीर के ऊर्जा स्तर को बनाये रखना है
और हर वह सकारात्मक कार्य करना है जिससे हम अपने आप को तरोताज़ा महसूस करते हैं फिर
चाहे संगीत सुनना हो ,तैरना हो, नृत्य हो, या आपकी अन्य कोई अभिरुचि का क्षेत्र। कुछ नहीं
कर सकते तो पूर्ण श्वांस प्रश्वांस ही करें।
6⇒ स्वास्थ्य अनुकूल व्यवहार –
हमारी सम्पूर्ण क्रियांए मर्यादित व शारीरिक क्षमता में अभिवृद्धि
करने वाली हों, किसी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तु का
सेवन न करने की आदत व्यवहार में लाई जानी चाहिए। नशे की चीजों का तत्काल प्रभाव से
परित्याग किया जाना चाहिए। स्वस्थ मस्तिष्क से किसी समस्या पर जितना गहन अध्ययन
किया जा सकता नशे की हालत में कदापि सम्भव नहीं। स्वास्थय के अनुकूल कृत्यों को
व्यवहार में लाने की आदत का परिष्करण किया जाना चाहिए।
7⇒ यथा योग्य निद्रा व जागरण –
किसी भी कार्य का अतिरेक सन्तुलन बिगाड़ने का कार्य करता है इसी लिए
यथायोग्य आहार विहार के साथ नींद की उचित मात्रा भी परम आवश्यक है श्रीमद्भगवद्गीता
में श्री कृष्ण जी ने अपने मुखारबिन्द से कहा –
युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा
।।
अर्थात दुःखों का नाश करने वाला योग तो
यथायोग्य आहार विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथा योग्य
सोने और जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
और जब दुखों का ही नाश हो जाएगा तो तनाव कहाँ बचेगा।
8⇒ सकारात्मक चिन्तन –
यदि नकारात्मकता हार का कारण है तो सकारात्मकता जीत की। शत प्रतिशत
यह मानने की आवश्यकता है नकारात्मकता मष्तिस्क और शरीर की सबसे बड़ी दुश्मन है इससे
हृदयाघात होता है और रोग प्रतरोधक क्षमता
पर बुरा असर होता है जो तनाव का प्रमुख कारण है इसीलिये सकारात्मक चिन्तन से
जुड़ें। ऐसे साहित्य ,व्यक्ति, विचार
का अनुकरण करें जो आपको सकारात्मक प्रेरणा देने में सक्षम हो।कितना सही कहा गया है
कि –
“Positive
thinking can reduce your stress level, help you feel better about yourself and
improve your overall well-being and outlook.”
“सकारात्मक
सोच आपके तनाव के स्तर को कम कर सकती है, आपको अपने बारे में बेहतर महसूस
करने में मदद करती है और आपके समग्र कल्याण और दृष्टिकोण में सुधार करती है।”
अन्ततः कहा जा सकता है कि अपना तनाव
हम स्वयम् दूर कर सकते हैं और दूसरों की मदद भी कर सकते हैं, यहाँ बताये गए तरीकों पर
सकारात्मकता के साथ अमल करें बाकी सब शुभ ही होगा। मुस्कुराइए आपके जीवन प्रगति की
चाभी आपके हाथ है।
अवसाद (Depression)एक स्वनिमन्त्रित मानसिक रोग कहा जाता है और अवसादग्रस्तता अनिद्रा, चिड़चिड़ापन,अनायास गुस्सा, नकारात्मकता गुमसुम रहना, अचानक एकान्त प्रियता, असन्तुलित व्यक्तित्व आदि आदि के रूप में पारिलक्षित होने लगता है। यह अवसाद मानव पर जब भारी पड़ने लगता है तो मानव हारने लगता है। यहाँ प्रस्तुत है अवसाद भगाने के अचूक उपाय, जो अवसाद ग्रस्तता के रूप के अनुसार अपनाए जा सकते हैं। –
1- सुबह जल्दी उठें –
ब्रह्म मुहूर्त में उठना या सूर्योदय से पूर्व उठना अपनी दिनचर्या
बना लें और उठते ही अपने ईष्ट को जिन्दगी नया दिन, नया अवसर देने के लिए धन्यवाद कहें। जो लोग विभिन्न मन्त्रोच्चार
करते हैं करें लेकिन अपनी भाषा अपनी बोली में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता अपने शब्दों
में अभिव्यक्त करें। नित्य कर्मों से मुस्कुराते हुए आनन्द के साथ निवृत्त हों।
नया सुखद समय प्रतीक्षारत है ,याद
रखें –
हर सुबह नव जीत का ख़ास पैगाम लाती है।
सद्पात्र को स्वर्णिम अवसर ये बाँट आती है।।
(2) – शरीर को समय दें –
शरीर प्रकृति प्रदत्त एक विशिष्ट नेमत है यह अद्भुत जादुई शक्ति का
निमित्त साधन है शरीर को व्यवस्थित रखने हेतु रक्तसञ्चार व्यवस्थित रखना परमावश्यक है।
इस हेतु प्रातः भ्रमण, दौड़, व्यायाम, मालिश, प्राणायाम आदि अपनी क्षमता के अनुसार करें। निःसन्देह प्राणायाम इसमें सर्वोत्तम है।
यह अवसर चूक न जाएँ। स्नानादि के उपरान्त अपने
दैनिक कार्यों के सम्पादन हेतु खुद को खुशी खुशी तैयार करें। ध्यान दें –
काया प्रकृति प्रदत्त अनुपम उपहार है,
क्या इसके साथ सम्यक में व्यवहार है।
सुसमय ही सचेत होंअन्यथा
पछतायेंगे,
क्यों कि स्वस्थ तनमन असली श्रृंगार है।
(3) – सहज सुपाच्य भोजन –
अवसाद भगाने का सूक्ष्म तरीका भोजन में छिपा है, गरिष्ठ भोजन का सेवन न करें, भूख से थोड़ा काम खाएं, ताजा खाने का प्रयास करें। भूख से अधिक न खाएं
क्योंकि यदि कुण्डलिनी की समस्त शक्ति पचाने में व्यस्त रहेगी तो उन्नति पथ कब
प्रशस्त करेगी। तरल,
पोषक, रेशेदार,शरीरानुरूप भोजन शान्त मनोरम वातावरण में करें।
याद रखें –
सुपाच्य भोजन हम सब को स्वीकार हो जाए।
अवसाद की कड़ी टूटे और बेड़ा पार हो जाए।
(4) – मादक पदार्थों का त्याग –
आज विविध प्रकार के मादक पदार्थ उपयोग में लाये जाते हैं नशे का एक
बहुत बड़ा तन्त्र विकसित हो गया है अनपढ़ से लेकर पढ़ी लिखी मानवता इसकी गिरफ्त में
है इसके दुष्चक्र ने अवसाद को मिटाने में बहुत बड़ी बाधा खड़ी की है तत्काल प्रभाव
से इसका परित्याग सुनिश्चित करना होगा। educationaacharya.com पर इस सम्बन्ध में ‘नशा
छोड़ देते हैं लोग’ शीर्षक से ऐसी पंक्तियाँ लिखी गई हैं कि आप
सोचने पर विवश हो जाएंगे। इसीलिए कहना पड़ता है। –
मादक पदार्थ सच में,
हमारी खिल्ली उड़ाते हैं।
हम गटकते हैं उन्हें,
और वो हमें खा जाते हैं।
(5) – शौक पालें –
अवसाद से बचाव हेतु एक सरल मन्त्र है- व्यस्त रहें, मस्त रहें, स्वस्थ
रहें। इसीलिए खाली न बैठें। जो भी अच्छा लगता है यथा समाज सेवा, संगीत, लेखन, बागवानी, अध्ययन, भजन, क्रीड़ा
कुछ भी करें। खुलकर जियें। अवसाद की फुरसत ही नहीं मिलेगी।
(6) – सकारात्मक चिन्तन –
जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है,
मुर्दा दिल क्या ख़ाक जिया करते हैं।
उक्त पंक्तियों में किसी विद्वान ने समाज को दिशा देने का प्रयास
किया है। वास्तव में सकारात्मक चिन्तन हमारे व्यवहार में नई ऊर्जा भर देता है
समस्याएं तो राम, कृष्ण के सम्मुख भी आईं पर उनके कृत्य हमारे
आदर्श हैं। जो भी महान हुआ है वह सकारात्मक चिन्तन से मानस को आकण्ठ डुबाने वाला
मष्तिस्क है। दशरथ माँझी,
स्वामी रामदेव, ए पी जे कलाम,
सरदार बल्लभ भाई पटेल …आदि का उदाहरण लिया जा
सकता है।
(7) – क्रोध करने से बचें –
अवसाद पीड़ित अनायास क्रोध करता है, चिड़चिड़ापन का असर कम होने पर ग्लानि अनुभव करता है इसलिए क्रोध आने
पर संयम रखें। 3 मिनट गहरी गहरी श्वांस लें और प्रभावी चिन्तन
का प्रयास करें। सोलह कला सम्पूर्ण भगवान् श्री कृष्ण चन्द्र महाराज ने
श्रीमद्भगवद्गीता में कहा –
अवसाद की औषधियों में भरपूर सुलाने की व्यवस्था रहती है इसी लिये खूब
श्रम करें। रात्रि में शयन पूर्व गर्म जल से या मौसमानुकूल जल से स्नान करें। हरी
इलायची का सेवन करें। खुद को प्रसन्न रखें। अधिगमार्थी अध्ययनोपरान्त सोने की आदत
डालें। इतना सोएं कि स्नायु सबल हो सकें व उठने
पर स्वयम् को तरोताज़ा महसूस कर सकें। याद रखें-
नींद केवल, वह नहीं
जो हमको, सुलाती है,
ये औषधि है, गात की
पुनः नवजीवन लाती है।
यहाँ केवल आठ सरलतम उपाय दिए गए हैं जिन्हे
आसानी से अपनाया जा सकता है और दीर्घकालिक दवाओं की नौबत आने से पूर्व स्वयम् को
मज़बूत किया जा सकता है।