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Uncategorized•वाह जिन्दगी !

संस्थान सही हाथों में है। 

February 17, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

गर संस्था खुद परिवार बने, संस्थान सही हाथों में है।

छल और प्रपञ्च से दूर रहे,  संस्थान सही हाथों में है।

यह सच है, दुनिया वाले, पथ में कण्टक बिछवायेंगे।

गर उन सबसे बच के निकले, संस्थान सही हाथों में है। ।1।

मानवीय मूल्य का ख्याल रखे, संस्थान सही हाथों में है।

यदि भूल के भी भटकाव न हो, संस्थान सही हाथों में है।

जब हम दायित्व निर्वहन कर, संस्था को उन्नत बनाएंगे। 

कर्म को उचित सम्मान मिले, संस्थान सही हाथों में है। ।2।

जब दिन प्रतिदिन परवान चढ़े, संस्थान सही हाथों में है।

जब वह समाज की दिशा गढ़े, संस्थान सही हाथों में है।

हमसब समाज संग मिलकर के यह करतब दिखलाएंगे।

जब सभी कर्त्तव्य निर्वहन करें, संस्थान सही हाथों में है। ।3।

सब भेद – भाव को भूल चलें, संस्थान सही हाथों में है।

ना जातिवाद को प्रश्रय मिले, संस्थान सही हाथों में है।

आवाहन और सौगन्ध यही हिलमिल समरसता लाएँगे।

पावन परिवार का साथ मिले, संस्थान सही हाथों में है। ।4।

चापलूसी को न जगह मिले, संस्थान सही हाथों में है।

मर्यादा रीति और नीति बढे ,संस्थान सही हाथों में है।   

संस्था की मान प्रतिष्ठा हित नित कदम उठाए जाएंगे।

संस्था को नवसम्मान मिले , संस्थान सही हाथों में है। ।5।

हो वादों का अम्बार नहीं, संस्थान सही हाथों में है।

निष्ठा को उसका मूल्य मिले,संस्थान सही हाथों में है।   

निष्ठा, लगन, उत्साह सहित पथ प्रशस्त कर जाएंगे।

स्वप्नों का नाथ किला न ढहे, संस्थान सही हाथों में है।।6।

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वाह जिन्दगी !

जीवन की समस्याओं का समाधान(Solution of life’s problems)

February 15, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

समस्या = आवश्यकता – साधन

जब हमारी आवश्यकताओं की अधिकता हो और साधन ओछे पड़ जाएँ तो जन्म होता है समस्या का।

ऐसा कोई नहीं, जिसे समस्याओं का सामना न करना पड़ा हो। हर एक की समस्या का स्तर उसकी आवश्यकता के अनुसार भिन्न भिन्न होता है लेकिन हम सबको समस्या से जूझना चाहिए और पलायनवादिता से बचना चाहिए।

यहाँ समस्या को धराशाई करने के आठ उपाय आपकी नज़र हैं –

1 – जिन्दादिली – जिन्दादिली का यह गुण समस्या के प्रभाव में आश्चर्यजनक कमी लाता है वास्तव में हमें हमारी समस्या हमारे डर के कारण बड़ी दिखती है उतनी बड़ी होती नहीं। लाखों लोग उससे विषम परिस्थिति में आनन्द से जी रहे हैं। कारण है उनकी जिन्दादिली, किसी ने ठीक ही कहा है –

 जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं।

2 – मौन – मौन एक अद्भुत जादुई शब्द है और इसका प्रयोग हमें असीमित ऊर्जा से भर देता है। याद रखें हम स्वयम् ऊर्जा के अजस्र स्रोत हैं, जब हम शान्त चित्त होकर समस्या समाधान का प्रयास, चिन्तन मनन और आत्मिक शक्ति के आधार पर करते हैं तो समस्या छू मन्तर हो जाती है। मौन से हम सारी शक्ति अन्तः केन्द्रित कर लेते हैं और समस्या का निदान हो जाता है। 

3 – मानसिक शक्ति – मानस की शक्ति ही आत्म विश्वास का आधार हुआ करती है याद रखें समस्या है तो समाधान है। मानस की शक्ति ने पहाड़ में से रास्ते बनाये हैं, दुर्गम क्षेत्र विजित किए हैं आपकी मानसिक शक्ति आपके मानस का वह उत्थान कर सकती है की समस्या का पूर्ण विलोपन हो जाए। मानस की शक्ति स्वयम् पर ऐसा विश्वास जगाती है की हम मौत के मुँह से जिन्दगी छीन लेते हैं।

4 – आध्यात्मिक अवलम्बन – हमारे सबके अपने अपने ईष्ट हैं जो हमारी परम शक्ति के द्योतक हैं। इन पर दृढ़ विश्वास अद्भुत उल्लासमई जीवन शक्ति प्रदान करता है और असम्भव को सम्भव कर देता है, आवश्यकता है अपने ईष्ट पर दृढ़ विश्वास की। वे करुणा निधान हैं और अहैतुकी कृपा करने वाले हैं। सङ्कल्प लीजिए विकल्प मत छोड़िए। समस्या भाग जाएगी।

5 – लगन – लगन या धुन का पक्का व्यक्ति वह कर गुजरता है जिसे तमाम साधन सम्पन्न व्यक्ति भी नहीं कर पाते। आज के तमाम आविष्कार, चाहे आकाश में उड़ने की बात हो या समुद्र के अन्दर यात्रा की, लगन ने ही रास्ता बनाया है। ध्येय निर्धारित कर उसे पाने की लगन व्यक्ति के व्यक्तित्व में वह निखार लाती है जिसे कोई कृत्रिम साधन नहीं दे सकता। लगन की इस शक्ति के आगे समस्या दम तोड़ देती है।

6 – संयम – संयम या धैर्य वह महत्व पूर्ण गुण है जो हमें हारने नहीं देता और चीख चीख कर कहता है एक प्रयास और। विवेकानन्द जी ने धैर्य की ताक़त को महसूस करते हुए कहा – “उठो …… जागो ….. और तब तक मत रुको ; जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए।”

7 – निरन्तर संघर्ष शीलता – हमेशा संघर्ष को तैयार रहें। ईश्वर को धन्यवाद कहें और निरन्तर प्रयास को अपना स्वभाव बना लें। मन्थन की निरन्तरता दूध से घी और समन्दर से अमृत निकाल सकती है। छोटी छोटी समस्या तिनके के मानिन्द कब उड़ गईं पता तब चलेगा जब लोग कहेंगे कि जीवट हो तो उस निरन्तर संघर्ष शील व्यक्ति जैसा।

  8 – समस्या समाधान का विश्वास – समस्या के समाधान का हमें पूर्ण विश्वास होना चाहिए। याद रखें समस्या  समाधान का कोई न कोई रास्ता होता अवश्य है। सम्यक योजना बनाएं। ठीक ही कहा गया है कि –

रास्ता किस जगह नहीं होता

सिर्फ हमको पता नहीं होता।

छोड़ दें डरकर रास्ता ही हम

यह  कोई रास्ता नहीं होता ।

            अन्त में समस्त मानवता का आवाहन है कि पूर्ण क्षमता से समस्या का सामना करें आप अवश्यमेव विजित होंगे। शोणित के ज्वार को दिशा देतीं अनाम पंक्तियाँ –

आरम्भ जब जो कुछ किया, हमने उसे पूरा किया।

था जो असम्भव भी उसे सम्भव हुआ दिखला दिया।

कहना हमारा बस यही था,  विघ्न और विराम से।

कर के हटेंगे, हम कि अब, मर के हटेंगे काम से।

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वाह जिन्दगी !

शुभ पर्व मनाते हैं।

February 14, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आज है चौदह फरवरी का दिन

सब विविध तरह से मनाते हैं।

पच्चीसवीं सालगिरह शादी की

नव खुशियों से जुड़ जाते हैं।

आओ आओ

गरिमा संग ये शुभ पर्व मनाते हैं ।1।

विगत दिनों के साक्षी गत दिन

किस्से सब याद दिलाते हैं।

वह अजब घड़ी थी परीक्षा की

हम क्षण सब याद दिलाते हैं।

आओ आओ

गरिमा संग ये शुभ पर्व मनाते हैं ।2।

शिशु किलकारियों के वे दिन

हमको सब याद दिलाते हैं।

खुशियाँ शुभ युगल आरती की

अनुराग सहित हम गाते हैं।

आओ आओ

गरिमा संग ये शुभ पर्व मनाते हैं ।3।

बच्चों साथ परिश्रम के दिन

सब प्रतिपल याद आते हैं।

गुजर गई घड़ी दीक्षा की

अक्षत संग रोली लगाते हैं।

आओ आओ

गरिमा संग ये शुभ पर्व मनाते हैं ।4।

खट्टे मीठे अनुभव के वे दिन

कुछ ना कुछ हमें सिखाते हैं।

सम्बन्धों की महिमा गरिमा की

स्नेहमयी शपथ दिलवाते हैं 

आओ आओ

गरिमा संग ये शुभ पर्व मनाते हैं ।5।

नई नई चुनौतियों के वे दिन

सम्बन्ध सु-मधुर बनाते हैं।

स्वागत विविध परीक्षा की

‘नाथ’ मर्यादित रीति बताते हैं। 

आओ आओ

गरिमा संग ये शुभ पर्व मनाते हैं ।6।

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वाह जिन्दगी !

आलस्य (Laziness)

February 2, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आलस्य से आशय –

जीवन में सक्रियता में कमी व निष्क्रियता की अधिकता आलस्य के नाम से जानी जाती है आलस्य वह ढंग है जिसके कारण अनमने मन से धीमी गति से या दूसरों के माध्यम से कार्य कराने की प्रवृत्ति प्रभावी हो जाती है ऐसे लोग कामचोरी के बहाने ढूँढते हैं और अपना कार्य दूसरों पर टालते हैं।

आलस्य और प्रमाद में अन्तर –

आलस्य की स्थिति में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की क्रियाओं में मन्दता या ढीलापन देखा जाता है जबकि प्रमाद की स्थिति तन की अपेक्षा मन की दुर्बलता की द्योतक है।

आलस्य से नुकसान –

आलस्य ने विश्व का बहुत बड़ा नुकसान किया है रिचर्ड स्टील महोदय ने इसी लिए कहा है कि –

“…… sloth has ruined more nations than the sword.”

अर्थात तलवार की तुलना में आलस ने अधिक राष्ट्र तबाह किये हैं।

  1. दुःख का कारण

आलस्य हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।

ना सत्युद्यम समो बन्धु कृत्वा यं न अवसीदते।।

मानव के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उनका सबसे  शत्रु है परिश्रम के समान कोई दूसरा बन्धु नहीं है कार्य करने वाला कभी दुःखी नहीं होता।

यजुर्वेद में भी कहा गया कि “आलस्य दरिद्रता का मूल है।”

  • निर्णय में विलम्ब

आलस्य का सताया कोई कार्य समय पर नहीं कर पाता क्यों कि उसके निर्णय विलम्ब से हो पाते हैं। पूरा जीवन अव्यवस्था का शिकार हो जाता है कबीर दास जी ने भी यही समझाने की कोशिश की है –

पाछे दिन पाछे गए, हरि से किया न हेत।

अब पछतावै होत का जब चिड़िया चुग गई खेत।                                                                                                                                          

  • नकारात्मकता को बढ़ावा

आलसी व्यक्ति का चिन्तन तो नकारात्मक होता ही है सारी उपलब्धियाँ उससे दूरी बनाने लगती हैं विद्या उससे दामन बचाती है कोई उसे मित्र भी नहीं बनाना चाहता इसी भाव को दर्शाता श्लोक –

अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्।

अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतो सुखम्।

अर्थात आलसी को विद्या कहाँ, विद्याहीन को धन कहाँ। धनहीन को मित्र कहाँ और मित्रहीन को सुख कहाँ।

  • रक्त प्रवाह असन्तुलन
  • दिवास्वप्न को बढ़ावा

आलस्य का मारा व्यक्ति कल्पना लोक में विचरण करता रहता है यथार्थ से कतराता है। दिवा स्वप्न देखना उसका मुकद्दर बन जाता है कोई कोई पूरी जिन्दगी इस भ्रम का शिकार बना रहता है। सुकरात महोदय ने कहा भी है –

“आलस्य में जीवन बिताना आत्म ह्त्या के समान है।”

  • संकल्प शक्ति का ह्रास
  • आत्मविश्वास क्षय

आत्म विश्वास जैसे सम्बल को आलस्य छीन लेता है और व्यक्ति भाग्यवादी बनने लगता है दैव योग पर भरोसा करने लगता है जबकि तुलसी दासजी ने स्वयं रामचरित मानस में लक्ष्मण से कहलाया –

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा॥

कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा॥

(लक्ष्मणजी ने कहा-) हे नाथ! दैव का कौन भरोसा! मन में क्रोध ले आइए और समुद्र को सुखा डालिए। यह दैव तो कायर के मन का एक आधार (तसल्ली देने का उपाय) है। आलसी लोग ही दैव-दैव पुकारा करते हैं॥

  • महत्त्वाकाँक्षा अवरोधक

आलस्य प्रगति मार्ग और महत्त्वाकांक्षा पूर्ति का सबसे बड़ा अवरोधक है और जब हम कोई महत्वांकाक्षा नहीं पालते तो कबीर के शब्द अक्षरशः सत्य सिद्ध होने लगते हैं –

रात गँवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय

हीरा जनम अनमोल सा, कौड़ी बदले जाए।

  • अवसर दुरूपयोग-

मौके पर चौका लगाना तो दूर की बात है आलसी हाथ आये मौके को भी सहज ही छोड़ देता है और अन्त में पछताता है कि काश उस समय जागा होता। जो समय का उपयोग नहीं कर सकता उससे सदुपयोग की तो आशा ही नहीं की जा सकती तो अन्ततः दुरूपयोग ही उसका मुकद्दर बन जाता है।  

  1. निर्णयन शक्ति क्षय

आलस्य के कारण –

            1 – नकारात्मक चिन्तन

            आज व्यक्ति का चिन्तन कुप्रभावित हो गया है उसकी निर्भरता दूसरों पर बढ़ रही है इससे सफलता संदिग्ध हो जाती है किसी ने ठीक ही कहा है –

वो सफलता क्या पायेगा,

जो निर्भर रहता गैरों पर।

मञ्जिल उनको मिलती है,

जो चलता अपने पैरों पर।

2 – नींद पूरी न होना

3 – असन्तुलित भोजन

4 – समय कुप्रबन्धन

समय पर सोना, समय पर जागना न होने से नियत समय पर नियत कार्य सम्पन्न नहीं हो पाते पहले से गन्तव्य का आरक्षण करवाने के बाद भी अन्त समय तक सामान नहीं लगाया जाता  कुछ हड़बड़ी में होता है।  

समय का उचित प्रबन्धन न करना आलस्य का बहुत बड़ा कारण बनता है यह तथ्य सत्य है कि

 ‘वक़्त बरबाद करने वालों को वक़्त बरबाद करके छोड़ेगा।‘

 और बर्बादी का प्रवेश द्वार बन जाता है आलस्य। आलसी का रोम रोम कह उठता है –

यूँ भी तो आराम बहुत है आलसियों में नाम बहुत है।

दिन भर खाली बैठे रहते कहते सबसे काम बहुत है।

5 – नशे की प्रवृत्ति

6 – मोबाइल की लत

7 – स्वास्थय जागरूकता में कमी   

8 – अन्तिम क्षण पर कार्य सम्पादन

आज करै सो काल्ह कर

काल करै सो परसों।

क्यों इतनी जल्दी करै

अभी पड़े हैं बरसों।

उक्त चिन्तन का अवलम्ब लेने वाले असफलता को अंगीकार करते हैं और कार्य को समय पर सम्पादित नहीं कर पाते।

9 – ब्रह्म मुहूर्त का दुरूपयोग

बेंजामिन फ्रैंकलिन महोदय ने कहा –

“Early to bed and early to rise

makes a man healthy, wealthy and wise.

10 – स्पष्ट लक्ष्याभाव

आलस्य भगाने के उपाय –

ऐसा भी नहीं है कि आलस से छुटकारा नहीं मिल सकता बस सही दिशा बोध की आवश्यकता है किसी विचारक ने ठीक ही कहा है –

रास्ता किस जगह नहीं होता, सिर्फ हमको पता नहीं होता।

छोड़ दें डरकर रास्ता ही हम, यह  कोई रास्ता नहीं होता।

आलस्य मुक्ति के उपायों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।- 

1 – सकारात्मक चिन्तन

2 – आत्म विश्वास में वृद्धि

3 – प्राणायाम, व्यायाम

4 – कर्म पर विश्वास

रामधारी सिंह दिनकर जी हमें सचेत करते हुए कहते हैं –

ब्रह्मा से कुछ लिखा भाग्य में मनुज नहीं लाया है

अपना सुख उसने अपने भुज बल से ही पाया है ….

5 – आत्मानुशासन

दीन दयाल शर्माजी कहते हैं –

“आलस है हम सबका दुश्मन

नहीं काम करने देता।

जो भी होता पास हमारे,

उसको भी यह हर लेता।   

6 – महत्त्वाकांक्षा

7 – लक्ष्य प्राप्ति ललक

काल्ह करै सो आजकर

आज करै सो अब

पल में परलै हो गई

तो बहुरि करैगो कब।

8 – प्रतिमान स्थापन

            ऐसा आदर्श मौलिक प्रतिमान कायम करने की जिद हो जिसका लोग अनुसरण करें और मानवता का उत्थान सम्भव हो किसी विचारक ने ठीक ही कहा है –

सीढ़ियाँ उनको मुबारक

जिनको छत तक जाना है।

जिन्हें अम्बर को छूना है

उन्हें रस्ता खुद बनाना है।

9 – प्रगतिशील सोच

10 – आरामदायक परिधियों का त्याग

कभी तो अपने आलस्य का हिसाब करो,

सफल क्यों नहीं हुए ?खुद से सवाल करो।

11 –  ब्रह्म मुहूर्त जागरण

सफलता पाना है, तो आलस्य को मिटाना है

इस कमजोरी को हर सुबह उठकर हराना है।

12 – यथोचित आहार विहार

हमें समय पर हल्का सुपाच्य भोजन ग्रहण करना चाहिए गरिष्ठ भोजन से बचना चाहिए यह आलस्य को बढ़ाता है कुण्डलिनी की शक्तियाँ पचाने में व्यस्त हो जाएंगी तो अन्य महत्वपूर्ण कार्य कैसे सम्पादित होंगे। इसीलिये श्रीमद्भगवदगीता में छठे अध्याय में जगद्गुरु कृष्ण कहते हैं। –

युक्ता हार विहारस्य युक्त चेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।6.17।।

अर्थात

दुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।  

उक्त समस्त विश्लेषण से स्पष्ट है कि निर्विकल्प होकर दृढ़ इच्छा शक्ति से जब ऊपर दिए गए बिंदुओं का अनुपालन सुनिश्चित करेंगे तो आलस्य से अवश्यमेव छुटकारा मिलेगा ।

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वाह जिन्दगी !

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।

January 10, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जोश दमखम के स्वामी थे हम, बताना चाहिए

बच्चे क्या करें, न पूछें फिर भी, बताना चाहिए,

गुमराह न हों, सत्य से वाकिफ कराना चाहिए।

सफेदी यूँही नहीं आई है, ये भी जताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।1।

देश की सीमाएं बदलीं कैसे ये सुनाना चाहिए।

पुनः गलती न हो कहीं राह तो दिखाना चाहिए,

कहाँ, क्या चूक हुई खुल करके जताना चाहिए,

उम्र कुछ नहीं संख्या है यह भी बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।2।

जवानी के दिशा बोधक किस्से सुनाना चाहिए,

जो गलत है गलत है बुरी शै से बचाना चाहिए,

नशा छोड़कर,आदर्श का पाठ पढ़ाना चाहिए,

गन्दा साहित्य नाश करेगा, भेद बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।3।

मूल्य अवरोहण न हो, सत्पथ दिखाना चाहिए,

ग़मों से जूझते कैसे, वह रास्ता बताना चाहिए,

कुछ मानें न मानें मगर, साम्य बैठाना चाहिए,

मगरूर न हों वे, सेहत के राज बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

जितना सम्भव हो, समय दर्पण दिखाना चाहिए,

मर्यादा सीमा रेखाएं, बे झिझक बताना चाहिए,

अस्तित्वबोध जरूरी है, दॉँवपेच सिखाना चाहिए,

गुर आत्मरक्षार्थ सभी, बेटियों को बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

ठोकरों से बचें कैसे अनुभव से सिखाना चाहिए,

कार्यनिर्वहन कहकर नहीं करके दिखाना चाहिए,

निज समस्या छोड़, देशहित पाठ पढ़ाना चाहिए,

‘नाथ’ यथा समय विश्वबन्धुत्व राग सुनाना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

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वाह जिन्दगी !

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

December 26, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

इस जहाँ में भाग्य लेखा बुनने का अधिकार किसको?

किस भरम में हाथ देखा, हाथ का श्रम दान किसको?

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

श्रम साध्य अवलम्ब देखा,बढ़ने का अधिकार उसको।

श्रम का बहुप्रकार देखा, सारे जगत का प्यार उसको।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

काम देखा कौशल देखा, श्रम का है प्रतिदान उसको।

वीर रस प्रतिमान देखा, आधार देता नव फलक को।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

 भाग्य ने कुछनहीं फेंका दिग्भ्रमित करते हो किसको?

भाग्य का है किसका ठेका, भाग्य लिखना है हमीं को।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

 भाग्य गर कोई लिखके देता,सारे फल मिलते उसीको।

सड़क पर बोरे पर बैठा, वह हाथ देखे जाल किस को।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

 जाल में क्यों फँस कर देखा, सत्कर्म लेता ताड़ उनको।

जाहिलों ने ये पाश फेंका,क्यों बे वजह प्रणाम उनको ?

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

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वाह जिन्दगी !

जड़ से मिटाना चाहिए ।

December 16, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

काव्य की गहराई में यूँ डूब जाना चाहिए।

जिन्दगी का दर्दोग़म सब छूट जाना चाहिए।।

छा रही है कालिमा हर सम्त दुनियाँ में यहाँ।

चमचमाता एक सूरज अब उगाना चाहिए।।

दुष्टता बढ़ने लगे जब शान्ति के मैदान में ।

मर्दानगी मुर्दानगी में युद्ध होना चाहिए ।।

लग रहे हों दाग जब बिलकुल गलत अन्दाज में ।

दाग का यह चलन ही बल से मिटाना चाहिए ।।

वार्ता के दौर से हासिल न कुछ होता हो गर ।

‘नाथ’ दौरे दुश्मनी जड़ से मिटाना चाहिए ।।

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वाह जिन्दगी !

यह नई सरगम जोड़ दें।

December 11, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मौत गर सिर पर खड़ी

क्या खिलखिलाना छोड़ दें ?

सिर तो हथेली पर रखें

और मौत का मुँह मोड़ दें

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

गर मुश्किलें पीछे पड़ीं

क्या मुस्कुराना छोड़ दें ?

कोई दम समस्या में नहीं

क्यों हल बताना छोड़ दें ?

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

ठण्ड जो इतनी पड़ रही,

क्या कँपकँपाना छोड़ दें ?

काँपना तो कोई हल नहीं,

कुछ दण्ड बैठक जोड़ लें।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

दुश्मन की संख्या बढ़ रही,

क्या घर को जाना छोड़ दें ?

घर जाना बिल्कुल न छोड़ें,

दुश्मन की टँगड़ी तोड़ दें।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

गर गलतियाँ होती रहीं,

क्या कसमें वादे तोड़ दें ?

दोनों पक्षों की मर्जी है,

सब भूल दिल को जोड़ लें।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

गूँज अधिकार की होती रही,

क्या अपने स्वर भी जोड़ दें ?

अधिकार तो भूलें मियाँ

कर्त्तव्य का स्वर जोड़ दें ।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

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वाह जिन्दगी !

मस्ती का मौसम

January 19, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

यह नरतन ले इस दुनियाँ में

कुछ धूम मचाने आए हैं

सोये सोये अब क्यों हो

हम अलख जगाने आए हैं।

यह जन्म मिला है इस जग में

कुछ सार्थक करने आये हैं,

तुम खोये खोये अब क्यों हो

सपनों को जगाने आये हैं।

सम्बन्धों की गरिमा जग में

हम उन्हें निभाने आए हैं,

प्रारब्ध हमारा जो भी हो

अब ज्योति जलाने आए हैं।

जोभी करना है जीवन में

क्रम उनका लगाने आए हैं,

जीवन में उथल पुथल जो

हम सम्यक दृढ़ता लाये हैं।

कोरा भ्रम नहीं है इस जग में

जग क्या है जताने आए हैं,

चाहे अवलम्बन जो भी हो

हम पता लगाने आये हैं।

यद्यपि नर तन नश्वर जग में

हम भाव टिकाने आये हैं,

जीवन की सच्चाई जो भी हो

मस्ती का मौसम लाये हैं।     

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वाह जिन्दगी !

दाने दाने पर लिखा नाम मिटा देते हैं लोग।Daane Daane Par Likha Naam Mita Dete Hain Log.

November 4, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

दाने दाने पर लिखा  नाम मिटा देते हैं लोग,

इक दूजे के हिस्से के दाने चुरा लेते हैं लोग,

पर उपदेश कुशल बहुतेरे को सही मानकर,

परवरदिगार को भी चूना लगा देते  हैं लोग।1

जाने क्यों धर्म को भी धन्धा बना देते हैं लोग,

सिद्धान्त कुछ है कुछ और बता देते हैं लोग,

सही आशय को बस खुद की बपौती मानकर

आवाम के घरद्वार को सूना बना देते हैं लोग।2 

बस ये खता है कि शिक्षा नहीं पा पाए लोग,

सीधे लोगों को गलत राह दिखा देते हैं लोग,

खुद को भगवान की, अमर रचना मानकर,

बहुत से गरीबों की हस्ती मिटा देते हैं लोग।3

बहुत कम ही मंजिलों, का पता देते हैं लोग,

ज्यादातर गुमराह कर, सबको धता हैं लोग,

क्या सही है क्या नहीं इस सभी को जानकर,

जाने क्यों पथिकों को गलत पता देते हैं लोग।4

चिल्ला चिल्ला के झूठ सच दबा देते हैं लोग,

सच दबाने हेतु सारा, जोर लगा देते हैं लोग,

सत्य को भ्रमित करने की, निश्चित ठानकर,

जाने कैसे नए नए, बहाने बना देते हैं लोग।5

गलत होता देखके खुदको बचा लेते हैं लोग,

उनका नम्बर आएगा क्यों भुला देते हैं लोग,

ईश्वर के दरबार में होता है, न्याय जान कर,

उसे खुदसा मानके प्रसाद चढ़ा देते हैं लोग।6

  

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