समावेशी शिक्षा से विस्तृत परिक्षेत्र सम्बद्ध है यहाँ अधोलिखित तीन बिन्दुओं पर मुख्यतः विचार करेंगे।
1 – समावेशन की अवधारणा और सिद्धान्त /Concept and principles of inclusion
2 – समावेशन के लाभ / Benefits of inclusion
3 – समावेशी शिक्षा की आवश्यकता / Need of inclusive education
समावेशनकीअवधारणाऔरसिद्धान्त /Concept and principles of inclusion –
जब हम समावेशन की बात करते हैं तो यह जानना परमावश्यक है कि यह किनका करना है। समाज में बहुत से लोग हाशिये पर हैं शिक्षण संस्थाओं में अधिगम करने वाले विविध वर्ग हैं कुछ में शारीरिक, कुछ में मानसिक क्षमताएं, अक्षमताएं विद्यमान हैं। हमारे विद्यालयों में अध्यापन करने वाला व्यक्ति समस्त अधिगमार्थियों से उनकी क्षमतानुसार अधिगम क्षेत्र उन्नयन हेतु पृथक व्यवहार कर सभी का समावेशन करना चाहता है।
समावेशन वह क्रिया है जो विविधता युक्त व्यक्तित्वों में निर्दिष्ट क्षमता समान रूप से स्थापन करने हेतु की जाती है।
गूगल द्वारा समावेशन सिद्धान्त तलाशने पर ज्ञात हुआ –
“Inclusive teaching and learning recognizes the right of all students to a learning experience that respects diversity, enables participation, removes barriers and considers a variety of learning needs and preferences.”
समावेशन का यह प्रयास विविध क्षेत्रों में विविध प्रकार से हो सकता है लेकिन यदि हम केवल शिक्षा के दृष्टिकोण से इस पर विचार करें तो प्रसिद्द शिक्षाविद श्री मदन सिंह जी(आर लाल पब्लिकेशन) का यह विचार भी तर्क सङ्गत है –
“In the field of education, inclusive education means the process of restructuring of schools aimed at providing educational and social opportunities to all children.”
समावेशी शिक्षा की प्रक्रियाओं में अधिगमार्थी की उपलब्धि, पाठ्य क्रम पर अधिकार, समूह में प्रतिक्रया, शिक्षण, तकनीक, विविध क्रियाकलाप, खेल, नेतृत्व, सृजनात्मकता आदि को शामिल किया जा सकता है।
समावेशनकेलाभ / Benefits of inclusion –
चूँकि हम शैक्षिक परिक्षेत्र में सम्पूर्ण विवेचन कर रहे हैं अतः समावेशी शिक्षा के लाभों पर मुख्यतः विचार करेंगे। इस हेतु बिन्दुओं का क्रम इस प्रकार संजोया जा सकता है।
01- स्वस्थ सामाजिक वातावरण व सम्बन्ध / Healthy social environment and relationships
02- समानता (दिव्याङ्ग व सामान्य) / Equality
03- स्तरोन्नयन / Upgradation
04 – मानसिक व सामाजिक समायोजन / Mental and social adjustment
05- व्यक्तिगत अधिकारों का संरक्षण / Protection of individual rights
06- सामूहिक प्रयास समन्वयन / Coordination of collective efforts
07- समान दृष्टिकोण का विकास / Development of common vision
08- विज्ञजनों के प्रगति आख्यान / Progress stories of experts
09- समानता के सिद्धान्त को प्रश्रय / Support the principle of equality
10- विशिष्टीकरण को प्रश्रय / Support for specialization
11- प्रगतिशीलता से समन्वय / Progressive coordination
12- चयनित स्थानापन्न / Selective placement
समावेशी शिक्षा की आवश्यकता / Need for inclusive education –
जब समावेशी शिक्षा की आवश्यकता क्यों ? का जवाब तलाशा जाता है तो निम्न महत्त्वपूर्ण बिन्दु दृष्टिगत होते हैं –
01- सौहाद्रपूर्ण वातावरण का सृजन / Creation of harmonious environment
02- सहायता हेतु तत्परता / Readiness for help
03- परस्पर आश्रयता की समझ का विकास / Development of understanding of mutual support
04- जैण्डर सुग्राह्यता / Gender sensitivity
05- विविधता में एकता / Unity in diversity
06- सम्यक अभिवृत्ति विकास / Proper attitude development
07- अद्यतन ज्ञान से सामञ्जस्य / Alignment with updated knowledge
08- विश्व बन्धुत्व की भावना को प्रश्रय / Fostering the spirit of world brotherhood
09- हीनता से मुक्ति / Freedom from inferiority
10- मानसिक प्रगति सुनिश्चयन / Ensuring mental progress
बसन्त पञ्चमी के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म ग्रन्थों में कई कथाएं प्रचलित हैं भगवान शिव की सगाई के दिन के रूप में यह वर्णित है। कुछ कथाएं इसे पृथ्वी पर जीवन की शुरआत का दिन मानती हैं लेकिन माघ मास की इस पञ्चमी को अधिकांशतः सरस्वती पूजा अर्थात माँ शारदे की आराधना का दिवस माना जाता है। प्राचीन समय से ही ज्ञान और कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के जन्म दिवस या प्रागट्य दिवस के रूप में मनाते हैं।
बसन्त पञ्चमी का समय व शुभ मुहूर्त –
बसन्त पञ्चमी इस बार 23 जनवरी 2026 को मनाई जायेगी क्यों कि बसन्त पञ्चमी तिथि की शुरुआत 22 जनवरी 2026 यानी गुरुवार की रात 1 बजकर 30 मिनट से प्रारम्भ होगी और 23 जनवरी की रात 12 बजकर 22 मिनट तक रहेगी. इसीलिए उदय तिथि के अनुसार शुक्रवार को ही मां सरस्वती की पूजन करना शुभ माना जाएगा।
विविध क्षेत्रों में बसन्त पञ्चमी –
माँ शारदे की आराधना, पूजा का यह दिवस इस विविधता वाले देश में अलग अलग क्षेत्रों में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। महाराष्ट्र में विवाहोपरान्त पहली बसन्त पञ्चमी के दिन विवाहित जोड़ा पीत वस्त्र धारण कर मन्दिरों में जाते हैं। पंजाब में इस दिन पतङ्ग उड़ाई जाती हैं और पतंग उत्सव मनाते हैं पीले चावल बना कर खाते हैं सिख बन्धु पीले रंग की पगड़ी भी पहनते हैं। बिहार प्रान्त में भगवान मार्तण्ड अर्थात सूर्य देव की मूर्ति की स्थापना की गई, इस दिन सूर्य पूजन दिवस के रूप में पूर्ण साजसज्जा व उत्साह के साथ मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के पूर्वाञ्चल में विधिवत मूर्ति स्थापित कर पूर्ण श्रद्धा से मनाई जाती है शेष परिक्षेत्र में भी विधिवत मान शारदे की उपासना होती है। कतिपय लोग भगवान शिव की आराधना करने के साथ इस दिन विवाह का विशिष्ट दिन मानते हैं। मुस्लिम समुदाय के सूफी सन्त भी इस दिन को विशेष दिन मानते हैं। चिश्ती वंश के मुस्लिम सूफी सन्त इस दिनदिल्ली की प्रसिद्द निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर सजदा करते हैं।
बसन्त पञ्चमी मनाने का ढंग –
विद्या, बुद्धि, वाणी की शुद्धता, स्मरण शक्ति और कलाओं में सिद्धि हेतु इस दिन माँ की आराधना करते हैं इस वर्ष अभिजित मुहूर्त: प्रात:काल 11:53 से दोपहर 12:38 बजे तक है। इस दिन प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि के उपरांत स्वच्छ धवल या पीत वस्त्र धारण करे जाते हैं यहाँ तक की आसन भी इसी रंग का लेना विशेष शुभ माना जाता है। दाहिने हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर सङ्कल्प लेते हैं। सामान्यतः इस मन्त्र से मान शारदे का आवाहन होता है –
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।।
या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा।।
उक्त ध्यान मंत्र के सस्वर वाचन उपरान्त मां शारदे को पुष्प, रोली, चंदन, अक्षत, धूप, दीप, अर्पित किया जाता है।
तदोपरान्त वाग्देवी के श्री चरणों में पुस्तक, कलम, कला साधन व वाद्य यंत्रों आदि को रखकर वन्दन करते हैं
मां सरस्वती को फल, पुष्प व नैवेद्य अर्पण करने के बाद पुनः ‘ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः‘, अथवा ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं सरस्वत्यै नमः‘मंत्र का जप करें.
बसन्त पञ्चमी के दिन मां सरस्वती की आरती के बिना उनकी पूजा अधूरी रहती है, इसलिए माँ शारदे की आरती अवश्य की जानी चाहिए।
बसन्त पञ्चमी का दिन गीत, संगीत, नृत्य, लेखन तथा कला साधना के प्रारम्भ हेतु अत्यंत ही शुभ और फलप्रदाता माना जाता है. नवीन कार्यों की शुरुआत व मांगलिक कार्य हेतु भी बसंत पंचमी का दिन शुभ माना जाता है.इस दिन विद्यार्थी अध्ययन हेतु उपयोगी वस्तुओं का दान देते हैं और माँ शारदे का आशीष लेते हैं। पीले वस्त्र धारण करते हैं पीले पुष्प चढ़ाना अच्छा माना जाता है प्रकृति भी अपना पीला श्रृंगार करती है सरसों के पुष्प प्रतिनिधित्व करते जान पड़ते हैं। बासन्ती मिष्ठान आज का प्रमुख प्रसाद रहता है। केसर हलवा विशेषतः इस दिन प्रमुखता से खाया जाता है।
अन्त यह कहना समीचीन होगा कि यदि कर्मकाण्ड पूर्ण न भी हो पाएं और सच्चे मन से मान शारदे के ध्यान के साथ दृढ़ संकल्पित होकर साधना में पूर्ण मनोयोग से तत्पर होते हैं तो यह दिवस विशेष फल प्रदाता है। बसन्त पञ्चमी पर्व के आगमन के साथ खेतों में सरसों, गेहूं आदि फसलें लहलहाने लगती हैं. प्रकृति में इस कालखण्ड में नवजीवन, उल्लास और सौंदर्य का संचरण होता है. सनातन हिन्दू धर्म में पीला रंग चाहे हल्दी का हो या सरसों का, बसन्त का प्रतीक माना जाता है. यह रंग विद्या की देवी मां शारदे को भी अत्यन्त प्रिय है. इसी कारण बसन्त पञ्चमी महापर्व पर लोग विशेष रूप से पीले परिधान धारण कर पीले ही व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते हैं।
सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि भावात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक पक्ष का विकास शिक्षा शिक्षण के माध्यम से किया जाता है। इसमें से क्रियात्मक पक्ष के मूल्यांकन हेतु प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। पहले भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि, सङ्गीत, व्यावसायिक विषय, कौशल, प्रशिक्षण कार्य क्रम, भूगोल आदि में प्रयोगात्मक परीक्षा का चलन था पर वर्तमान में हिन्दी, अंग्रेजी, विविध मानविकी विषय में भी प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। कुछ विषयों की उपलब्धियों का मूल्याङ्कन प्रयोगात्मक परीक्षा के बिना संभव ही नहीं है। विद्यार्थियों के विकास के दृष्टिकोण से इन परीक्षाओं का विशेष महत्त्व है।
प्रयोगात्मक परीक्षा के उद्देश्य / Objectives of Practical Examination :-
01 – लिखित परीक्षा के पूरक के रूप में / To supplement the written examination
02 – उपलब्धियों के व्यावहारिक मापन व मूल्यांकन हेतु / For practical measurement and evaluation of achievements
03 – शिक्षार्थियों के सम्यक विकास हेतु / For the holistic development of learners
04 – यथार्थ वाद के उद्देश्यों की पूर्ति / To fulfill the objectives of realism
05 – कौशल विकास का मूल्यांकन / Assessment of skill development
06 – क्रियात्मक विकास का मूल्यांकन / Assessment of functional development
07 – विद्यार्थियों के व्यक्तित्व गठन हेतु / For personality development of students
08 – जीवन के यथार्थ अवलम्बन हेतु / For real life support
प्रयोगात्मक परीक्षा की प्रविधियाँ / Techniques of Practical Examination
01- प्रदत्त कार्य मूल्याङ्कन / Assigned Task Evaluation
02 – व्यावहारिक कार्य मूल्यांकन / Practical Task Evaluation
03 – निरीक्षण व मौखिक का सम्यक सम्मिश्रण / A Proper Combination of Observation and Oral Testing
04 – क्रिया सम्पन्नता मूल्यांकन / Activity Completion Evaluation
05 – यथार्थ गणना के आधार पर / Based on accurate calculations
06 – Proper use of equipment
06 – उपकरणों का यथोचित प्रयोग / Proper use of equipment
07 – परिणाम मूल्यांकन /Result evaluation
08 – कार्य व पृच्छा के आधार पर / Based on tasks and questions
प्रयोगात्मक परीक्षा की विशेषताएं / Features of the practical exam
01 – ज्ञानात्मक व्यावहारिकता व उपयोगिता का मूल्याङ्कन / Evaluation of cognitive practicality and utility
02 – क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों का मूल्यांकन / Evaluation of practical objectives
03 – ज्ञान व कौशल मूल्यांकन / Assessment of knowledge and skills
04 – रुचियों का मूल्यांकन / Assessment of interests
05 – व्यक्तिगत क्षमता का मूल्यांकन / Assessment of individual abilities
06 – नकल पर पूर्ण प्रतिबन्ध / Complete prohibition of cheating
07 – व्यावहारिक स्थितियों में मूल्यांकन / Assessment in practical situations
08 – विश्वसनीयता व वैधता में सकारात्मक वृद्धि / Positive increase in reliability and validity
प्रयोगात्मक परीक्षा के दोष / Limitations of Experimental Examination –
व्यावहारिक रूप से यह समस्त तत्सम्बन्धी शोध विषय को ज्ञानात्मक धरातल उपलब्ध कराता है मानव के पास विश्लेषणात्मक बुद्धि है जहाँ वह अपने चिन्तन मन्थन को तर्क सङ्गत समझता है वहीं दूसरे विद्वान जो उस विषय पर पहले कार्य कर चुके होते हैं उसके लिए प्रकाश स्तम्भ का कार्य करते हैं। तत्सम्बन्धी ज्ञान सङ्कलन, हस्तान्तरण और सम्वर्धन में शोध की महती भूमिका होती है।
* *सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय व परिभाषा / Meaning and definition of the study of related literature –
शोधार्थी को वैचारिक आधार पूर्व के शोध अध्ययन व तत्सम्बन्धी साहित्य से मिलता है असल में हर बार कार्य प्रारम्भ से शुरू अधिक समय लेगा इसलिए पूर्व शोध जो नींव तैयार करते हैं नई इमारत उस पर मजबूती से खड़ी होती है पूर्व शोध कार्यों का लाभ उठाते हुए उनके निष्कर्ष, उनके अनुभव, उनका विश्लेषण नए शोधार्थियों को काफी कुछ सचेत कर देता है। सम्बंधित साहित्य का अध्ययन एक आवश्यक व वैज्ञानिक चिन्तन का परिणामी चरण है।
सम्बन्धित साहित्य के अध्ययन से आशय उस साहित्य से है जो विषयानुकूल है और जिसके प्रदत्त प्रस्तुत शोध में सहायक हो सकते हैं यह कलेवर नवीन शोध हेतु दिशा बोधक का कार्य करता है और पलायनवादी सोच विकसित होने से पूर्व व्यावहारिक धरातल प्रदान करता है। इस समस्त ज्ञान को शोधार्थी अपने प्राप्त कलेवर में जोड़ता है और विकास के नए अग्रिम सोपान तय करता है।इस सम्बन्ध में जॉन डब्लू बेस्ट का मानना है कि –
“व्यावहारिक रूप में सम्पूर्ण ज्ञान पुस्तकों और पुस्तकालयों में मिल सकता है। अन्य प्राणियों से भिन्न मानव को अतीत से प्राप्त ज्ञान को प्रत्येक पीढ़ी के साथ नए ज्ञान के विस्तृत भण्डार के रूप में प्रारम्भ करना चाहिए।ज्ञान के विस्तृत भण्डार के रूप में उसका निरन्तर योगदान प्रत्येक क्षेत्र में मानव द्वारा किये गए प्रयासों की सफलता को सम्भव बनाता है।”
आँग्ल अनुवाद
“Practically all knowledge can be found in books and libraries. Humans, unlike other creatures, must build on past knowledge to create a new storehouse of knowledge with each generation. Its continuous contribution as a vast repository of knowledge makes possible the success of human endeavors in every field.”
इसी सम्बन्ध में बोर्ग महोदय का मानना है कि
“किसी भी क्षेत्र का साहित्य उसकी नींव को बनाता है, जिसके ऊपर भविष्य का कार्य किया जाता है। यदि हम साहित्य का पुनर्निरीक्षण द्वारा प्रदान किये गए ज्ञान की नींव बनाने में असमर्थ होते हैं तो हमारा कार्य सम्भवतः तुच्छ और प्रायः उस कार्य की नक़ल मात्र ही होती है जोकि पहले ही किसी के द्वारा किया जा चुका है।”
आँग्ल अनुवाद
“The literature of any field forms the foundation upon which future work is built. If we fail to build on the foundation of knowledge provided by reviewing the literature, our work is likely to be trivial and often merely a copy of what has already been done by someone else.”
* *सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन की आवश्यकता क्यों ? / Why is there a need to review the related literature?
01 – अग्रिम योजना निर्धारण
02 – मात्रात्मक व गुणात्मक विश्लेषण
03 – तत्सम्बन्धी ज्ञान के विविध ज्ञान से जुड़ने हेतु
04 – पूर्वाग्रहों से मुक्ति हेतु
05 – परिकल्पना बनाने हेतु
06 – उद्देश्य निर्धारण हेतु
07 – परिणामों व निष्कर्षों के सम्यक विवेचन हेतु
* * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का महत्त्व –
वास्तव में शोध कार्य समाज के उत्थान में व्यक्ति या शोधार्थी का सहयोग है। उसे जब यह पता होता है कि इस क्षेत्र में इतना कार्य हो चुका है तब वह उसका आधार से आगे अपने कार्य को अंजाम देगा अन्यथा पुनरावृत्ति की संभावना रहेगी।इसके महत्त्वपूर्ण बिंदुओं को इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है।–
01 – अनुसन्धान सम्बन्धी ज्ञान सम्वर्धन
02 – दिशात्मक बोध हेतु
03 – परिकल्पना निर्माण हेतु
04 – उद्देश्य निर्धारण व स्पष्टीकरण
05 – दोहराव से बचाव
06 – उपकरण चयन
07 – शोध सामग्री एकत्रीकरण हेतु
08 – विधि निर्धारण में
09 – आत्म निरीक्षण व परिमार्जन
10 – शोध परिणाम विश्लेषण
11 – सुझावों के समृद्धीकरण में
* * अनुसन्धान कार्य में पुनः अवलोकन का उद्देश्य /The purpose of re-observation in research work –
शोध कार्य में गम्भीरता व दिशात्मक बोध जागरण और अधिक प्रभावी हो जाता है जब शोधार्थी उद्देश्य के सम्बन्ध में क्रिस्टल क्लियर होता है। किसी भी अनुसंधान के पुनः अवलोकन के पीछे निम्न उद्देश्य कहे जा सकते हैं। –
01 – व्याख्या, सिद्धान्त, परिकल्पना प्रदत्तीकरण
02 – यथार्थ अवलम्बन
03 – परिकल्पना निर्धारण
04 – सम्यक विधियों व तथ्य सङ्कलन में सहायक
05 – सांख्यिकीय विश्लेषण निर्धारण
06 – तुलनात्मक विवेचन
07 – निष्कर्ष विवेचन
08 – सकारात्मक चिन्तन व धैर्य सम्वर्धन
09 – सीमाएं, सुधार व अंर्तदृष्टि विकास
10 – समस्या का समुचित समाधान
* * सम्बन्धित साहित्य के पुनरावलोकन स्रोत / Review sources of related literature –
01 – पत्र पत्रिकाएं
02 – तत्सम्बन्धी पुस्तकें
03 – पाठ्य सामग्री
04 – मासिक, त्रैमासिक, अर्ध वार्षिक, वार्षिक शोध समीक्षाएं
प्रश्न – शिक्षण व्यूह रचना से समझते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। शिक्षण व्यूह रचनाओं के प्रकार बताइए।
Question – What do you understand by teaching strategy? Describe its main characteristics. Explain the types of teaching strategies.
शिक्षण व्यूह रचना से आशय / Meaning of teaching strategy-
शिक्षण व्यूह रचना से आशय शिक्षक द्वारा बनाई गई उस योजना से है जो वह अधिगम को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए बनाता है। रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर शिक्षण व्यूह रचना के बारे में कहा –
“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”
आंग्ल अनुवाद
“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”
शिक्षण व्यूह रचना सचमुच अधिगम को प्रभावी बनाने का कारगर उपाय है। इसी लिए ई स्टॉंस व मौरिस (1972) ने अपनी पुस्तक टीचिंग प्रैक्टिस प्रॉब्लम्स एण्ड पर्स्पेक्टिव्स में कहा –
“शिक्षण व्यूह रचना से तात्पर्य किसी पाठ के शिक्षण हेतु अपनाई गई उस सामान्यीकृत योजना से है जिसमें संरचना, अनुदेशनात्मक उद्देश्यों के रूप में वांछित विद्यार्थी व्यवहार तथा व्यूह रचना को प्रयोग में लाने के लिए आवश्यक युक्तियों की रूपरेखा का समावेश हो।”
“Teaching strategy is a generalized plan for a lesson which includes structure, desired learner behaviour in terms of goals of instruction and an outline of planned tactics necessary to implement the strategy.”
शिक्षण व्यूह रचना की प्रमुखविशेषताएं/ Special features of teaching strategy –
01 – इसके माध्यम से पाठ के निर्धारित उद्देश्य प्राप्ति सुगम हो जाती है।
02 – शिक्षण व्यूह रचना के माध्यम से अधिगम प्रभावी व विशेष उद्देश्यों के प्रति समर्पित किया जा सकता है।
03 – शिक्षण व्यूह रचना द्वारा अधिगम पूर्ण होता है कोइ अंश छूट नहीं पता।
04 – शिक्षण युक्ति के माध्यम से शिक्षण आव्यूह को सशक्त बनाया जाता है।
05 – इसमें प्रमुख ध्यान अधिगम उद्देश्य की प्राप्ति पर रहता है जो अनुशासन की व्यवस्था स्वयमेव कर देता है।
06 – अलग अलग तरह के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर एक ही पाठ के लिए पृथक शिक्षण व्यूह रचना है।
07 – शिक्षार्थियों द्वारा मिलने वाले पृष्ठ पोषण के आधार पर शिक्षण व्यूह रचना में परिवर्तन किया जाता है।
08 – इसका लचीलापन इसे विविध परिस्थितियों में सफल बनाता है।
09 – इसमें शिक्षार्थी, शिक्षण अधिगम उद्देश्य व शिक्षण व्यूह रचना का व्यावहारिक संतुलन दृष्टव्य होता है।
10 – इसमें आवश्यकता, रुचियाँ, अधिगम परिस्थितियों और सुविधाओं का सम्यक सम्मिश्रण मिलता है।
शिक्षण व्यूह रचना के प्रकार / Types of teaching strategies –
भारत में अध्यापन एक परम पवित्र कार्य है इसकी व्यूह रचना जिस तरह की जाती है उसमें देखा जा सकता है एक में अध्यापक अधिनायक की तरह से कार्य करता दीखता है और दूसरे में व्यूह रचनाएं जनतांत्रिक रूप से किया जाता है दोनों आधार पर बनने वाली विविध व्यूह रचनाओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –
[A ] – अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचनाएं –
01 – व्याख्यान व्यूह रचना / Lecture Strategy
02 – वर्णन व्यूह रचना / Narrative Strategy
03 – विवरण व्यूह रचना / Description Strategy
04 – व्याख्या व्यूह रचना / Explanation Strategy
05 – प्रदर्शन व्यूह रचना / Demonstration Strategy
06 – ट्यूटोरियल व्यूह रचना / Tutorial Strategy
07 – दृष्टांत व्यूह रचना / Illustrations Strategy
08 – अभिक्रमित अनुदेशन व्यूह रचना / Programmed Instruction Strategy
उक्त सम्पूर्ण व्यूह रचनाएं यह उद्घोषणा करती हैं कि शिक्षा को समय के साथ चलने के लिए इन व्यूह रचनाओं का सम्यक प्रयोग आवश्यक है और प्रशिक्षण महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे सूक्ष्म शिक्षण की तरह तैयारी करानी होगी।
भारत में व्यूह शब्द आते ही अभिमन्यु का स्वाभाविक ध्यान आता है जो चक्र व्यूह का अन्तिम द्वार तोड़ने में इस लिए असफल रहा क्योंकि उसको भेदन का ज्ञान मिल नहीं पाया था ठीक इसी तरह यदि अध्यापक शिक्षण अधिगम को प्रभावी बनाना चाहता है तो सही व्यूह रचना परम आवश्यक है अपने उद्देश्य के साथ सम्पूर्ण तत्सम्बन्धी ज्ञान उसके पास होता है एक सही व्यूह रचना उसे अवश्य उद्देश्य प्राप्ति में सफल बनाएगी।
रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर बताया –
“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”
आंग्ल अनुवाद
“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”
व्याख्यान व्यूह रचना से आशय / Meaning of lecture strategy –
आदिकाल से भारत में इस व्यूह रचना का प्रयोग होता रहा है पहले गुरु चबूतरे पर बैठकर और शिष्य भूमि पर बैठ कर इसका लाभ लेते रहे हैं। आज विद्यार्थी बैठ कर और अध्यापक खड़े होकर इस व्यूह रचना का लाभ लेते हैं। यद्यपि इसकी गणना अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचना के तहत आती है लेकिन इसके माध्यम से सम्पूर्ण अधिगम परिक्षेत्र से शिक्षार्थी का परिचयीकरण ही नहीं बल्कि साक्षात्कार हो जाता है और वे अपनी पात्रता के अनुसार उसे अधिगमित करते हैं। व्याख्यान व्यूह रचना एक महत्त्वपूर्ण व्यूह रचना है इस सम्बन्ध में रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकीके 2014के संस्करण में पृष्ठ 243 पर बताया –
“व्याख्यान व्यूह रचना से अभिप्राय शिक्षक द्वारा निर्मित और उपयोग में लाये जाने वाले ऐसे प्रारूप या कार्य योजना से है जिसके द्वारा वह किसी विषय विशेष के एक अंश या इकाई को इस प्रकार प्रस्तुत करने का प्रयत्न करता है ताकि विद्यार्थियों के ज्ञानात्मक एवं भावात्मक व्यवहार से सम्बन्धित विशिष्ट शिक्षण अधिगम उद्देश्यों की उपलब्धि ठीक प्रकार की जा सके।”
“Lecture strategy” means a format or plan of action designed and used by a teacher. By which he tries to present a part or unit of a particular subject in such a way So that specific teaching-learning objectives related to the cognitive and emotional behaviour of students can be achieved properly.”
व्याख्यान व्यूह रचना से लाभ / Benefits of Lecture Strategy –
वह व्यूह रचना जो तमाम आलोचनाओं से जूझ कर अधिगमार्थियों व शिक्षाविदों को लाभ दे रही है उसके लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –
01 – शिक्षण गतिविधियों पर स्वइच्छानुसार अंकुश / Voluntary control of teaching activities
02 – सृजनात्मकता, विश्लेषण व मूल्याङ्कन हेतु सम्यक चिंतन का विकास / Developing critical thinking for creativity, analysis, and evaluation
03 – मितव्ययी व्यूह रचना / Economical strategy
04 – प्रेरणात्मक वातावरण सृजन में सहयोगी / Helps create an inspiring environment
05 – लचीलापन / Flexibility
06 – विचारों, अवधारणाओं की श्रंखलाबद्ध प्रस्तुति सम्भव / Performs a systematic presentation of ideas and concepts
07 – तार्किक नियोजन / Logical planning
08 – व्यक्तित्व के गुणों की छाप छोड़ना सम्भव / It is possible to leave an impression of personality traits
09 – व्यवहार के भावात्मक पक्ष को सकारात्मक दिशा देना सम्भव / It is possible to give positive direction to the emotional aspect of behavior
व्याख्यान व्यूह रचना की सीमाएं / Limitations of Lecture Strategy –
02 – रूचि, आवश्यकता व योग्यता स्तर का ध्यान नहीं / Not considering interest, need, and ability levels
03 – एक पक्षीय सम्प्रेषण / One-sided communication
04 – प्रयोगात्मक कौशलों व क्रियात्मक गतिविधियों का अभाव / Lack of practical skills and hands-on activities
05 – केवल शाब्दिक सम्प्रेषण की सफलता सन्दिग्ध / The success of verbal communication alone is questionable.
06 – शिक्षण अधिगम से अर्जित अनुभव के प्रयोगीकरण का अभाव / Lack of application of teaching-learning experience.
07 – अपूर्ण व त्रुटिपूर्ण ज्ञान सम्प्रेषण सम्भव / Incomplete and inaccurate knowledge transmission is possible
08 – पुनरावृत्ति व विषय से भटकाव / Repetition and distraction
09 – आवश्यक तैयारी व कुशल सम्प्रेषण का अभाव / Lack of necessary preparation and effective communication
10 – स्मृति स्तर को चिन्तन स्तर से प्रभावी मानना / Believing the memory level as more effective than the thinking level
व्याख्यान व्यूह रचना को अधिक प्रभावी बनाने हेतु सुझाव / Suggestions for making Lecture Strategy more effective –
यदि हम सम्पूर्ण व्याख्यान को उसके अलग अलग हिस्सों में बांटे तो यह स्पष्ट होगा कि व्याख्यान में नियोजन, प्रस्तुतीकरण और मूल्याङ्कन के रूप में तीन महत्त्वपूर्ण चरण समाहित हैं। इसलिए इस प्रत्येक चरण में सुधार अपेक्षित होंगेजिन्हे इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है। –
[A] – नियोजन सम्बन्धी सुझाव / Planning tips
01 – पूर्व ज्ञान व विषय वस्तु का सम्बन्ध विवेचन।/ Analysis of the relationship between prior knowledge and subject matter
02 – स्पष्ट उद्देश्य निर्धारण / Crystal Clear objective setting;
03 – अधिगम स्तर आधारित सम्प्रेषण / Learning level based communication
04 – विषय वस्तु पर अधिकार / Mastery of the subject matter
05 – आत्मविश्वास युक्त सम्प्रेषण / Confident communication
06 – विविध विश्वसनीय ज्ञान स्रोतों से विषयवस्तु का चयन / Selecting content from a variety of reliable knowledge sources
07 – अधिगम -शिक्षण प्रभावी वातावरण सृजन / Creating an effective learning – teaching environment
08 – रूचि, ध्यान, उत्साह का सम्यक सृजन / Properly cultivate interest, attention and enthusiasm.
09 – विविध विधियों व सहायक साधनों का सम्यक प्रयोग / Properly utilize various methods and aids.
[B] – प्रस्तुतीकरण सम्बन्धी सुझाव / Presentation tips –
01 – प्रभावी अधिगम हेतु निरन्तर सजगता व क्रियाशीलता / Constant alertness and activity for effective learning
02 – उत्साहयुक्त प्रभावी सम्प्रेषण / Enthusiastic and effective communication
03 – क्रमबद्ध व तार्किक आधार / Systematic and logical approach
04 – अधिगम उद्देश्यों पर विशेष ध्यान / Focus on learning objectives
05 – सार्वजनिक संबोधन प्रणाली का उपयोग /use of public address system
06 – आवश्यकतानुसार विविध विधियों का प्रयोग / Use a variety of methods as needed
07 – नवीनतम श्रव्य दृश्य साधनों का प्रयोग / Use the latest audio-visual aids
08 – आवश्यकतानुसार साझेदारी का प्रयोग / Use partnerships as needed
09 – महत्त्वपूर्ण तथ्य व सूचना सम्प्रेषण का रेखाङ्कन / Outline of important facts and information communication
10 – पुनरावृत्ति व भटकाव से सावधान / Beware of repetition and deviation
02 – अधिगम स्तर उन्नयन मूल्याङ्कन/ Learning Level Improvement Assessment
03 – व्याख्यान आधारित अधिगम मूल्यांकन / Lecture-Based Learning Assessment
04 – पक्षपात रहित सम्यक प्रश्न वितरण / Fair, Unbiased Question Distribution
05 – उद्देश्य आधारित मूल्यांकन / Objective-Based Assessment
06 – पृष्ठ पोषण के निर्देशों पर ध्यान / Follow nutrition guidelines
07 – प्रश्नावली या मौखिक प्रश्नों द्वारा / Through questionnaires or oral questions
08 – सतत स्व आलोचनात्मक मूल्यांकन / Continuous self-critical assessment
प्रस्तुत समस्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि किसी कौशल या व्यूह रचना में निरन्तर परिमार्जन की गुन्जायिश बनी रहती है लेकिन अपनी सजगता से इसे काफी प्रभावी बनाया जा सकता है नए सम्प्रत्ययों, विश्वसनीय सूचनाओं, आगामी जानकारियों और नवीनतम ज्ञान का प्रयोग कर व्याख्यान को निरंतर समृद्ध करने की आवश्यकता हमेशा रहेगी। निरन्तर छोटे तथ्यों नवीनतम ज्ञान व तार्किक क्रमबद्ध सम्प्रेषण द्वारा व्याख्यान और प्रभावी बन पड़ेगा। आवश्यकता है विविध परिस्थितियों में सम्यक समायोजन की।
माघ माह की मघ बदरिया का चिन्तन हमें एक विशिष्ट ज्ञान प्रवाह से जोड़ देता है और एक शरद अहसास कराता है। यह माह हिन्दू राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग और हिन्दू चन्द्र पञ्चाङ्ग का ग्यारहवाँ मास है। इस माह का नाम पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की माघ नक्षत्र के निकटतम स्थिति से उद्भवित हुआ है। माघ माह का अद्भुत आनन्द माँ गङ्गा की निकटतम कुटिया में जाड़े, बूँदाबाँदी, अद्भुत वायु व गङ्गा प्रवाह और मौन चिन्तन के समय अन्तर में महसूस किया जाता है। यथा आनन्द वर्णन दुष्कर है।
माघ मास व माघ मेला –
माघ, मेघ, मेधा का अद्भुत समन्वयन इस माह में दिखता है इस वर्ष 2026 में 3 जनवरी को माघ मेले का शुभारम्भ हुआ है प्रथम पवित्र स्नान पौष पूर्णिमा को होता है। यह मेला 40 दिन से अधिक चलता है और महाशिव रात्रि को इसका समापन होता है अर्थात 15 फरवरी 2026 को प्रयागराज में यह पूरा हो जाएगा। कतिपय विद्वानों के अनुसार इस वर्ष 4 जनवरी से माघ माह का प्रारम्भ हुआ है व इसका समापन 01 फरबरी 2026 को होगा। बहुत सारे लोग कल्पवास प्रयाग तट पर करते हैं। एक मान्यता के अनुसार समग्र नदियों व कूपों का जल इस अवधि में परम पावस हो जाता है। ब्रह्म मुहूर्त इस काल खण्ड का विशेष महत्त्व रखता है।
भगवान कृष्ण और माघ –
यह माह भगवान कृष्ण को समर्पित है यद्यपि भगवान कृष्णका जन्म इस माह नहीं हुआ था भगवान कृष्ण से जुड़ते ही इसमें विशिष्ट आयाम जुड़ जाते हैं। हमारे मन मानस में इनका चिर युवा स्वरुप विद्यमान है इनका बचपन इतना विशिष्ट कि आज भी हर हिन्दुस्तानी मान अपने बच्चे को लाड़ से कान्हा पुकारती है। किशोरावस्था और किशोरीजी की धूम ऐसी कि बालिकाओं में लोकप्रिय होने पर आज भी लोग कह देते हैं कैसा कन्हैया बना घूम रहा है। युद्ध के मैदान से ज्ञान सम्प्रेषण आज भी भगवद्गीता के प्रति हमारे मन मानस में विद्यमान है। गुरुता ऐसी कि सहज स्वीकारा जाता है -कृष्णम वन्दे जगद्गुरु। भारत में आज भी इनके बचपन से युवा स्वरुप का पूजन होता है।
हिन्दी माह के बारह माह चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़, श्रावण (सावन), भाद्रपद (भादो), अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष (अगहन), पौष, माघ, व फाल्गुन (फागुन) हैं। इसमें माघ 11 नम्बर पर आता है।
पावन माघ मास का महत्त्व व मान्यताएं –
विविध शास्त्रों के आधार पर कहा जाता है कि इस पावन माघ मास में विविध पावन नदियों का जल अमृत सदृश हो जाता है। इस माह का ब्रह्म मुहूर्त स्नान विगत पाप नाशिनी क्षमता को धारण करने वाला है।
पावन माघ मास में सूर्योदय से पूर्व स्नान की अधिक महत्ता है। यदि पावन नदी के जल में स्नान का अवसर उपलब्ध नहीं है तो घर पर भी जल में काले तिल व गंगा जल मिलाकर स्नान किया जा सकता है।
[A] महत्त्व –
1 – इस माह में ब्रह्म मुहूर्त स्नान आरोग्य व सकारात्मक ऊर्जा प्रदाता है। तिल का प्रयोग शनि व सूर्य दोष निवारक की भूमिका का निर्वहन करता है।
2 – इस माह सात्विक भोजन करने से तामस प्रवृत्तियों का निरोध होता है व वाणी प्रभावी व ओजपूर्ण बनती है। चिन्तन में भटकाव नहीं होता।
3 – भगवान विष्णु का मन्त्र ‘ऊँ नमः भगवते वासुदेवाय’ इस माह में विशिष्ट शक्ति प्रदाता है। नियमित सूर्य अर्घ्य व ब्रह्म मुहूर्त जागरण नेत्र सम्बन्धी विकारों को क्षय करने में सक्षम है।
4 – इस माह में गरम कपड़े, कम्बल, गुड़, तिल सेवन, सूर्य उपासना, सूर्य नमस्कार विविध शारीरिक दोष निवारण में सक्षम भूमिका का अधिक तीव्रता से निर्वहन करता है।
[B] – मान्यताएं –
01 – माघ माह को देवताओं के महीने के रूप में मान्यता प्राप्त है। इस माह में देवता मानव रूप में पृथ्वी पर आकर स्नान दान, ध्यान, सत्संग करते हैं इसीलिये इसे देवताओं का स्नान काल भी कहा जाता है।
02 – पौष पूर्णिमा से माघ पूर्णिमा तक स्नान का यह अवसर देवताओं की सकारात्मक ऊर्जा का सञ्चयन करता है।
03 – इस समय कल्पवास विशिष्ट ऊर्जा से जुड़ आध्यात्मिक चिन्तन पथ प्रशस्त करता है व सकारात्मकता को अक्षुण्ण बनाने का प्रयास करता है।
04 – माघी पूर्णिमा को देवता अपने लोकों को प्रस्थान करते हैं इस दिन पावन नदियों में स्नान करने वाले इनके विशेष कृपा पात्र बनते हैं।
05 – मकर संक्रान्ति, मौनी अमावस्या, बसन्त पञ्चमी, माघी पूर्णिमा, सकारात्मक ऊर्जा का अक्षय प्रसरण में समर्थ हैं लेकिन मौनी अमावस्या को शुभ मांगलिक कार्य जैसे शादी, गृह प्रवेश आदि का निषेध है।
उक्त सम्पूर्ण विवेचन और विज्ञ जनों का सत्संग यह बताता है कि इस अवधि में प्रगति उन्मुख होने हेतु बनाई गयी रणनीतियाँ और उन पर अमल हमें शीघ्रता से लक्ष्योन्मुख करता है।
वास्तव में कुछ चीजें होती हैं और कुछ उस आधार पर बनती हैं जैसे नदी होती है और नहरें बनती हैं। इसी तरह हमारे पास हमारा शरीर होता है लेकिन हमारी सोच बनाने से बनती है। हम जो आज हैं यह अपनी पूर्ववर्ती सोच के कारण हैं। जो हम कल होंगे वह आज की सोच का परिणाम होगा। सृजनकर्त्ता के व्यक्तित्त्व को समझना आसान नहीं होता उसके मस्तिष्क में विस्तृत आकाश होता है उसमें छिपे सृजन के बीज दिखाई तो नहीं पड़ते लेकिन परिणाम सामान्यजन को उसका बोध अवश्य करा जाते हैं।
विगत दो सहस्त्राब्दि अर्थात 2000 वर्षों की पूर्णता के पश्चात नई शताब्दी के एक चौथाई वर्ष यानि कि 25 वर्ष बीतते हुए हममें से कई लोगों ने देखे होंगे और कई नवजवानों ने नहीं। विगत वर्ष 2025 अलग अलग लोगों को अलग अनुभूति कराने वाला रहा है और यह नववर्ष 2026 भी विविध परिणाम प्रदाता की भूमिका का निर्वहन करेगा। मानव मात्र का स्वभाव प्रगति उन्मुख रहा है इस लिए वह बेहतर, सुखद सकारात्मक परिणामों की कामना करता है लेकिन केवल कामना या सोचने से कार्य सिद्धि नहीं होगी उसके लिए सकारात्मक प्रयास अवश्यम्भावी होंगे। आपने सुना भी होगा।
“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।
2026 को 2025 से इन 10 आधारों पर बेहतर बनाया जा सकता है –
01 – सफलता का समग्र कार्यक्रम / A holistic program for success
02 – उद्देश्य को छोटे छोटे हिस्से में समयबद्ध लक्ष्य पूर्ति / Break down your goals into small, timely goals
03 – स्वानुसाशन / Self-discipline
04 – स्वप्रेरणा /Self-motivation
05 – नियमित स्वस्थ दिनचर्या /Regular, healthy routine
06 – सम्यक कृत्य निरीक्षण व परिमार्जन /Inspection and refinement of proper actions
07 – जोखिम लेने की क्षमता वृद्धि /By Increasing risk-taking ability
08 – तर्क सङ्गत व्यय / Reasonable spending
09 – स्वयं पर विश्वास / Self-confidence
10 – सकारात्मक दृष्टिकोण / Positive attitude
यह १० तथ्य एक मजबूत आधार बनाने हेतु हैं जब हमारा लक्ष्य हमारे जेहन में स्पष्ट होगा तो हमें अपने आप उस दिशा में प्रगति के विविध आलम्ब दिखाई देंगे। जब आपने ठान लिया तो निश्चित रूप से वर्ष 2026, विगत वर्ष 2025 से अवश्य अच्छा होगा क्योंकि सच्चे कर्मयोगी लक्ष्य प्राप्ति हेतु ही पृथ्वी पर आये हैं।
ज्ञान से आशय /Meaning of knowledge-ज्ञान (Knowledge) से आशय है किसी विषय या तथ्य का बोध या सत्य जानकारी होना, जो शिक्षा, अनुभव या सूझ से प्राप्त होता है।
ज्ञान की विविध परिभाषाएँ / Various definitions of knowledge – ज्ञान शब्द संस्कृत की ‘ज्ञा’ धातु से बना है, जिसका अर्थ ‘जानना’ या ‘पहचानना’ है।
प्लेटो महोदय के अनुसार
“विचारों की दिव्य व्यवस्था और आत्मा-परमात्मा के स्वरूप को जानना ज्ञान है।“
“Knowing the divine system of thoughts and the nature of the soul and God is knowledge.”
अल्बर्ट आइंस्टीन महोदय के अनुसार –
“अनुभव ही ज्ञान है, बाकी सब सिर्फ जानकारी है।”
“Experience is knowledge, everything else is just information.”
मगध विश्व विद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की विद्वान प्राचार्य के मत में –
“नॉलेज और ज्ञान के दार्शनिक विवेचन में सर्वाधिक प्रमुख भेद यही है कि नॉलेज सिर्फ सत्य होता है जबकि ज्ञान सत्य और असत्य दोनों ही रूपों में पाया जाना संभव है।”
“The most important difference in the philosophical discussion of knowledge and wisdom is that knowledge is only true whereas wisdom can be found in both true and false forms.”
उक्त सम्पूर्ण परिभाषाओं के अध्ययन से स्पष्ट है कि यदि ज्ञान को सामान्य अर्थों में लिया जाए तो इसे आंग्ल भाषा में सामान्यतः knowledge कहा जाता है जिसका अर्थ जानना, सीखना, अनुभव लेना, कुशल होना या सत्यता के प्रमाणित होने से है।
ज्ञान मीमांसा से आशय / Meaning of Epistemology –
अंग्रेजी भाषा का शब्द Epistemology ग्रीक भाषा के दो शब्दों ‘Episteme’ और Logos शब्द से मिलकर बना है। जिनका अर्थ क्रमशः ज्ञान और विज्ञान है। दूसरे शब्दों में एपिस्टेमोलोजी से आशय है ज्ञान का सिद्धान्त जिसे दर्शन की भाषा में ज्ञान मीमांसा कहा जाता है। ज्ञान मीमांसा में मुख्यतः तीन प्रश्न शामिल हैं –
01 – ज्ञान – उद्गम (स्रोत ) व वास्तविक ज्ञान
02 – ज्ञान का स्वरुप – आभास बनाम सत्य
03 – ज्ञान – प्रामाणिक विश्वसनीयता व वैधता
ज्ञान का क्षेत्र व्यापक है इसे असीम कहना भी तार्किक होगा इसमें ज्ञान स्थापन, विश्लेषण, संश्लेषण सभी शामिल है जो आगमन, निगमन, सूक्ष्म तार्किक विवेचन व ज्ञान की सत्यता की कसौटी पर आधारित समस्याएं को शामिल करता है। उक्त समस्त परिक्षेत्रों के प्रश्नों का विवेचन ज्ञान की जिस शाखा के अन्तर्गत किया जाता है वह ज्ञान मीमांसा के नाम से जानी जाती है।
ज्ञान मीमांसा के सिद्धान्त / Principles of Epistemology –
किसी भी तथ्य, तर्क, सिद्धान्त को सत्यता की कसौटी पर कसने के क्रम में ज्ञान मीमांसा हेतु बहुत से सिद्धांत प्रचलित हैं उनमें से कतिपय प्रमुख सिद्धांतों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।
01 – संशय वाद / Scepticism – संशयवाद इस या उस ज्ञान को संशय की दृष्टि से नहीं देखता बल्कि यह किस्से भी प्रकार की ज्ञान प्राप्ति की संभावना के दावे को ही खारिज कर देता है। टी एच हक्सले महोदय का विचार है कि –
“किसी भी व्यक्ति के लिए यह कहना अनुचित है कि वह किसी भी तर्क वाक्य के वस्तुगत सत्य के बारे में निश्चित है। संशयवादी पूर्ण स्वीकार एवं पूर्ण नकार के मध्य स्थित हैं। “
“It is unreasonable for anyone to say that he is certain of the objective truth of any proposition. The skeptic stands between absolute acceptance and absolute denial.”
02 – अनुभव वाद / Empiricism –
यह वह ज्ञान शास्त्रीय सिद्धांत है जो ज्ञान का एक मात्र साधन इन्द्रियानुभूत ज्ञान को स्वीककार करता है। इसके समर्थन में जॉन लॉक महोदय कहते हैं कि –
“ऐसी कोई भी चीज़ हमारी बुद्धि में नहीं होती, जो पहले अनुभव में नहीं होती।”
“There is nothing in our intellect, which was not previously in our senses.”
03 – बुद्धिवाद / Rationalism – सामान्यतः हम स्वीकार करते हैं कि ज्ञान, बुद्धि व अनुभव दोनों की उपज है लेकिन बुद्धिवाद वह सिद्धांत है जो ज्ञान का साधन, उद्गम, स्रोत केवल बुद्धि को ही स्वीकार करते हैं बुद्धिवादियों के अनुसार –
“सिर्फ विश्लेषणात्मक (Analytic) तथा प्रागनुभविक (Apriori) ज्ञान ही वास्तविक ज्ञान है और ऐसे ज्ञान का स्रोत है बुद्धि।”
“Only analytical and apriori knowledge is real knowledge and the source of such knowledge is intellect.
04 – प्रत्यय वाद/ Idealism
05 – यथार्थ वाद / Realism
06 – व्यवहार वाद / Pragmatism
ज्ञान मीमांसा की प्रकृति एवं क्षेत्र / Nature and Scope of Epistemology –
जब हम मीमांसात्मक विवेचन ज्ञान के आधार पर अनुभव, प्रमाण, बुद्धि, सत्य, व विश्वास का सम्बल लेकर करते हैं तो यह विवेचन ज्ञान मीमांसात्मक विवेचन कहलाता है। यह दर्शन शास्त्र की एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रही है। ज्ञान विश्वास का आधार लेकर चलता है सत्य की प्राप्ति हेतु प्रमाणों को लेकर सम्यक विवेचन करता है यही ज्ञान मीमांसा की मूल प्रकृति है। ज्ञान मीमांसा का क्षेत्र संकुचित न होकर अत्यन्त व्यापक है। जब तथ्यों, विचारों, सिद्धान्तों को ज्ञान की तार्किक कसौटी पर कसने का प्रयास प्रारम्भ होता है इसके व्यापक परिक्षेत्र के दर्शन प्रारम्भ हो जाते हैं।
ज्ञान के स्रोत (Sources of Knowledge) –
ज्ञान मीमांसात्मक विवेचन में ज्ञान के प्रमुख स्रोत मुख्यतः निम्न हैं –
01 – इन्द्रियानुभव [Sense experience]
02 – तर्क बुद्धि [Reason]
03 – आप्त वचन [Authority]
04 – अन्तः प्रज्ञा [Intuition]
ज्ञान मीमांसा की प्रमुख अवधारणाएं / Key concepts of epistemology –
01 – प्रागनुभाविक तथा अनुभवाश्रित [A Priory and a Posteriori]
02 – विश्लेषणात्मक तथा संश्लेषणात्मक [Analytic and Synthetic]
03 – साक्षात ज्ञान तथा विवरण ज्ञान [Knowledge by Acquaintance and knowledge by Description]
(i) ज्ञाता / Knower
(ii) ज्ञेय / knowable
(iii) ज्ञान / knowledge
ज्ञान मीमांसा एवं शिक्षा / Epistemology and Education
जब आमने सामने बैठकर निरीक्षण और पृच्छा के आधार पर जानकारी प्राप्त की जाती है इस जानकारी के आधार पर मूल्याङ्कन व परिणामों का विश्लेषण किया जाता है इस प्राविधि को साक्षात्कार कहा जाता है।
साक्षात्कार से आशय / Meaning of Interview – साक्षात्कार वह व्यक्तिनिष्ठ व आत्मनिष्ठ विधि है जिससे उद्देश्य केन्द्रित प्रश्नों के आधार पर योग्यताओं, गुणों, समस्याओं आदि के बारे में जानकारी एकत्रित की जाती है। विविध समस्याओं का यथार्थ अधिगम उपयुक्त निर्देशन हेतु साक्षात्कार महत्त्वपूर्ण भूमिका अभिनीत करता है। साक्षात्कार के आशय को स्पष्ट करते हुए गुड व हॉट महोदय ने कहा –
“किसी उद्देश्य हेतु किया गहन वार्तालाप ही साक्षात्कार है।”
अंग्रेजी अनुवाद –
“An interview is an in-depth conversation with a purpose.”
इस सम्बन्ध मेंP.V.Yong ये के विचार भी मनन करने योग्य हैं –
“साक्षात्कार को एक क्रम बद्ध प्रणाली माना जा सकता है , जिसके द्वारा एक व्यक्ति, दूसरे के आन्तरिक जीवन में अधिक या कम कल्पनात्मक रूप से प्रवेश करता है, जो उसके लिए सामान्यतः तुलनात्मक रूप से अपरिचित है।”
अंग्रेजी अनुवाद –
“Interview may be regarded as a systematic method by which one person enters, more or less imaginatively, into the inner life of another, who is generally comparatively unknown to him.”
एक अन्य प्रसिद्द विद्वान् जॉन डब्लू बेस्ट (John W. Best ने अपने विचार अत्यन्त सरल शब्दों में प्रगटित किये –
“साक्षात्कार एक प्रकार से एक मौखिक प्रश्नावली है। इसके अन्तर्गत उत्तर लिखने के स्थान पर आमने सामने की स्थिति में विषयी मौखिक उत्तर देता है।”
“The interview, is in a sense, an oral type of questionnaire. Instead of writing the response, the subject or interviewee gives the needed information verbally in a face to face relationship.”
उक्त परिभाषाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि शैक्षिक व मनोवैज्ञानिक स्तर संपन्न की गई वह प्रक्रिया साक्षात्कार कहलाती है जो दो व्यक्तियों को निकट लाती है और उनके सम्बन्ध में हमारे ज्ञान में वृद्धि करती है। यह तथ्यों की प्रमाणिकता सिद्ध करने में मदद करती है।
साक्षात्कार के प्रकार / Types of Interview – साक्षात्कार के प्रकार को अच्छी तरह अध्ययन करने हेतु इसे वर्गीकृत कर एक एक का स्पष्टीकरण आवश्यक है इसे मोटे तौर पर इस तरह अभिव्यक्त कियता जा सकता है।
[A] – कार्य के अनुसार [According to functions]
I – निदानात्मक साक्षात्कार (Diagnostic Interview)
II – उपचारात्मक साक्षात्कार (Treatment Based Interview)
III – अनुसन्धान साक्षात्कार (Research Interview)
[B] – भाग लेने वालों के अनुसार (According to Participants) –
I – व्यक्तिगत साक्षात्कार (Individual Interview)
II – सामूहिक साक्षात्कार (Group Interview)
[C] – सम्पर्क अवधि के अनुसार (According to Length of contact) –
I – अल्पकालिक सम्पर्क (Short term contact)
II – दीर्घ कालीन सम्पर्क (Prolong contact)
अध्ययन विधि के आधार पर साक्षात्कार / Interview based on study method –
I – अनिर्देशित साक्षात्कार / Unguided Interview
II – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार /Objective based Interview
III – पुनरावर्तित साक्षात्कार (Repeated Interview)
साक्षात्कार प्राविधि के गुण / Merits of InterviewTechnique –
01 – शिक्षित, अशिक्षित व सभी पक्षों का अध्यययन
02 – समस्या आधारित महत्त्वपूर्ण विश्वसनीय प्राविधि
03 – वैश्विक घटनाओं के प्रभाव का अध्ययन सम्भव
04 – मनोवैज्ञानिक अध्ययन सम्भव
05 – अभिवृत्तियों, भावनाओं, संवेगों का प्रभावी अध्ययन
06 – प्रत्यक्ष निरीक्षण असम्भव होने पर भी अध्ययन सम्भव
07 – उद्देश्य केन्द्रित साक्षात्कार से तत्सम्बन्धी सङ्कलन सम्भव
08 – प्राप्त सूचनाओं की सत्यता की जाँच सम्भव
09 – तत्सम्बन्धी समस्त तथ्यों का संकलन
10 – वार्तालाप से अप्रत्याशित तथ्य जानकारी सम्भव
साक्षात्कार प्राविधि की सीमाएं / Limitations of Interview Technique
01 – उपयुक्त मनोवैज्ञानिक तथा योग्य साक्षात्कार कर्त्ता प्राप्ति दुष्कर
02 – हाँ, नहीं में उत्तर प्राप्ति पर विश्लेषण दुष्प्रभावित
ब्रह्माण्ड के यथार्थ स्वरुप और उसमें मनुष्य के जीवन की तात्त्विक विवेचना तत्त्व मीमांसा के माध्यम से सम्पन्न होती है। इसी के माध्यम से मानव जीवन के उद्देश्य और उनकी प्राप्ति के उपाय विवेचित किये जाते हैं और इस आधार पर यह कहना समीचीन होगा कि जीवन दर्शन के आधार पर समाज के उद्देश्य निर्धारित होते हैं जिन्हें शिक्षा अपना उद्देश्य बना लेती है। इन उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षा के विविध अंग सहयोग करते हैं इसीलिए शिक्षा की पाठ्यचर्या, शिक्षण विधि , शिक्षक, विद्यार्थी, अनुशासन सभी जीवन दर्शन के आलोक में क्रियान्वित होते हैं। अतः यह पूर्णतया स्पष्ट है कि इन सभी शिक्षा के अंगों का विकास तत्त्व मीमांसा के आधार पर होता है।
विविध दर्शन की तात्त्विक विवेचना हमें बताती है कि विविध दर्शन चाहे वह आदर्शवाद, प्रकृतिवाद, प्रयोजनवाद, अस्तित्ववाद कोई भी हो। तत्त्व मीमांसा में उसकी व्याख्या का प्रभाव इनके शैक्षिक उद्देश्यों व इसके अन्य अंगों पर पड़ता है जिसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।
तत्त्व मीमांसा और शिक्षा के विविध घटक
Metaphysics and various components of education
शिक्षा के विविध घटकों की तत्त्व मीमांसात्मक विवेचना निम्न शिक्षा के उद्देश्य स्व आलोक में प्रस्तुत करती दीख पड़ती है –
A –शिक्षा के उद्देश्य –
01 – शिक्षा के सामाजिक उद्देश्य / Social objectives of education – सामाजिक उद्देश्यों का निर्धारण शिक्षा इस प्रकार करती है जिससे मानव समाज से सामंजस्य बिठाकर समाज ,राज्य, राष्ट्र सबकी प्रगति में अपना योगदान सुनिश्चित कर सके। बॉसिंग महोदय कहते हैं कि
“The function of education is concerned to be the adjustment of man to environment and that the most enduring satisfaction may accrue (अक्रू= अर्जित) to the individual and to the society.”
“शिक्षा का कार्य मनुष्य को पर्यावरण के अनुरूप ढालना है और यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति और समाज दोनों को ही सबसे स्थायी संतुष्टि प्राप्त हो।”
02 – व्यक्तित्त्व का पूर्ण विकास / Complete development of personality – शिक्षा के द्वारा समग्र क्षमताओं का सम्यक विकास होना चाहिए जैसा कि गांधीजी ने कहा –
“By education I mean an all round drawing out of the best in child and man – body, mind and spirit.”
“शिक्षा से मेरा तात्पर्य बच्चे और मनुष्य के भीतर की सर्वोत्तम विशेषताओं – शरीर, मन और आत्मा – को समग्र रूप से बाहर निकालना है।”
03 – चारित्र, ज्ञान व स्वस्थ आदतों का विकास /Development of character, knowledge and healthy habits. – इस तरह के विकास से सामान्यतः सभी दार्शनिक सहमति रखतेहैं जैसाकि ड्रेवर महोदय का विचार है –
“Education is a process in which and by which the knowledge, character and behavior of the young are shaped and molded.”
“शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके द्वारा युवाओं के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को आकार दिया जाता है।”
04 – पूर्ण जीवन की तैयारी का उद्देश्य / The purpose of preparing for a fulfilling life –
हर्बर्ट की तरह कई विद्वान् पूर्ण जीवन की तैयारी पर बल देते हैं जैसाकि डीवी महोदय ने भी कहा –
“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”
“शिक्षा व्यक्ति में उन सभी क्षमताओं का विकास है जो उसे अपने परिवेश को नियंत्रित करने और अपनी संभावनाओं को पूरा करने में सक्षम बनाएंगी।”
05 – समग्र व्यक्तिगत विकास का उद्देश्य / Aim for holistic personal development – बालक में निहित गुणों के विकास की बात विविध दर्शन करते हैं इन्ही विचारों से सहमति जताते हुए विवेका नन्द जी कहतेहैं –
“Education is the manifestation of perfection already in man”
“शिक्षा मनुष्य में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”
06 – सभी स्थितियों में सामंजस्यपूर्णता का उद्देश्य / Aim for harmony in all situations –
जीविकोपार्जन की क्षमता हासिल करना हो या प्रतिकूल परिस्थितियों में स्वयं को ढालना, शिक्षा और इससे जुड़े दर्शनों की तात्त्विक विवेचना उसे सामंजस्यपूर्ण बनाने पर जोर देती है। जैसा कि रबीन्द्र नाथ टैगोर के इन शब्दों से दृष्टिगत होता है। –
“The highest education is that which does not merely give us information but makes our life in harmony with all existence.”
“सर्वोत्तम शिक्षा वह है जो हमें केवल जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सामंज स्यपूर्णबनाती है।”
B- शिक्षा का पाठ्यक्रम / Curriculum of education –
जहाँ आदर्शवादी शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के साथ नैतिकता को पाठ्यक्रम का महत्त्वपूर्ण अंग मानते हैं वहीं प्रकृतिवादी पाठ्यक्रम में स्वानुभव विविध विज्ञान, गणित आदि के स्थापन के साथ इन्द्रिय प्रशिक्षण को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाना चाहते हैं। प्रयोजनवादी सामाजिक तात्कालिक समस्याओं से सम्बंधित विषयों का चयन करना चाहते हैं।