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शिक्षा

FASHION

October 21, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रचलन

विविध विचारकों और विविध क्षेत्र के विद्वानों ने इसे अपने परिक्षेत्र से जोड़ कर विवेचित किया है। असल में फैशन एक व्यापक शब्द है हिन्दी में इसका अर्थ बताने वाले शब्द पूरा चित्र खींचने में कुछ कम समर्थ दीखते हैं। अपने व्यावहारिक जीवन में इसका प्रयोग अक्सर देखने को मिलता है। पहनावा को फैशन का एक अंग माना जा सकता है पर्याय नहीं।

फैशन की परिभाषाएं / Definitions of Fashion –

फैशन को व्यावहारिक जीवन में गहने, वस्त्र, घर, पुल, होटल सभी हेतु अलग अलग अन्दाज़ से अभिव्यक्त किया जाता है विविध विचारकों ने इसे जिस प्रकार पारिभाषित किया है उसे इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं –

कोको शनेल महोदय जो कि एक प्रसिद्ध डिजाइनर व लेखिका हैं कहती हैं –

“फैशन केवल कपड़ों में नहीं होता है, फैशन आसमान में है, सडकों पर है, फैशन का सम्बन्ध हमारे विचारों से है हमारे जीने के तरीके से है और जो कुछ भी घटित हो रहा है उससे है।”

“Fashion is not limited to clothing; it exists in the sky and on the streets. It is connected to our thoughts, our way of life, and everything that is happening around us.”

रॉस महोदय इस सम्बन्ध में कहते हैं –

“फैशन का तात्पर्य जनसमूह की पसन्दों में पुनरावर्तक परिवर्तनों के अनुक्रम से है, जिनमें उपयोगिता निहित हो सकती है, किन्तु वे उपयोगिता द्वारा निर्धारित नहीं होते हैं ।”

“Fashion is a series recurring in the choices of a group of people which, though may be accompanied by utility, are not determined by it.” 

मैकाइवर महोदय फैशन के सम्बन्ध में कहते हैं –

“फैशन किसी प्रथागत विषय या ढर्रे पर सामाजिक रूप से स्वीकृत विविधताओं का एक क्रम है।”

“Fashion is a sequence of socially accepted variations upon a conventional subject or pattern.”

हर्बर्ट स्पेंसर महोदय फैशन के सम्बन्ध में कहते हैं –

“फैशन प्रथाओं का एक समान स्तर बनाने वाला साधन है। “

Fashion is a means of establishing a common level of practices. 

उक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि फैशन किसी विशेष कालखण्ड में समाज के द्वारा अपनाया गया व्यवहार या सलीका होता है जो अल्प  कालखण्ड में तो अत्याधिक लोकप्रिय होता है लेकिन दीर्घकाल में परिवर्तित हो जाता है।

फैशन की प्रकृति या फैशन की विशेषताएं / The nature of fashion or the characteristics of fashion –      पहनावा, वास्तु कला, भोजन, साहित्य, कला, बदलाव के रुझान सभी फैशन से प्रभावित होता है। संस्कृति व रीति रिवाज का प्रभाव भी इसकी प्रकृति व विशेषताओं को प्रभावित करता है। इसकी प्रकृति व विशेषताओं को समझने हेतु कुछ बिन्दुओं का आधार लेना उचित रहेगा।

01 – नवाचार है फैशन का आधार / Innovation is the foundation of fashion.

02 – फैशन सामाजिक स्वाभाविक पसन्द / Fashion: A natural social preference

03 – फैशन जन समूह की पसन्द / Fashion group of people favorite.

04 – फैशन सन्तुष्टि का आधार / Fashion as a Basis for Satisfaction

05 – फैशन अस्थाई है / Fashion is temporary

06 – नवीनता, फैशनका आधार / Novelty, the foundation of fashion

07 – फैशन विस्तृत होता है। / Fashion is broad.

08 – फैशन अनुकरणीय / Exemplary fashion

09 – फैशन उपयोगी हो जरूरी नहीं / Fashion does not necessarily have to be functional.

10 – कभी कभी फैशन अन्धानुकरण / Sometimes, fashion is blind imitation.

फैशन के विकास के कारण / Reasons for the development of fashion –

फैशन के निर्धारक तत्वों का यदि विश्लेषण किया जाए तो मानव फैशन सम्बन्ध व  फैशन के मनोविज्ञान का पता चलता है। वास्तव में इसके बीज मानव मष्तिष्क में निहित हैं। इसका निर्धारक कारण कोइ एक नहीं है बल्कि विविध कारक  फैशन के विकास का मार्ग बनाते हैं। श्रृंगार और पहनावे पर कटाक्ष उचित मानसिकता नहीं है और फैशन यहीं तक सीमित नहीं है।  फैशन के विकास के कुछ कारण इस प्रकार दिए जा सकते हैं –

01 – परिवर्तन की प्रवृत्ति / Inclination towards change

02 – नवाचार से जुड़ाव / Engagement with innovation

03 – प्रगति आकांक्षा व दिखावा / Progress, aspiration, and ostentation

04 – भौतिक चकाचौंध / Material dazzle

05 – नवीनता के प्रति आकर्षण / Attraction towards novelty

06 – व्यक्तिगत छाप की इच्छा /  Desire for a personal imprint

07 – हीन भावना का निवारण / Overcoming feelings of inferiority

08 – अहम् की सन्तुष्टि / Ego satisfaction

09 – समूह दवाब का प्रभाव / The impact of group pressure

10 – जिज्ञासा / Curiosity

11 – सम्यक समायोजन / proper adjustment

यह सारे बिन्दु यह स्पष्ट करते हैं कि यह अलग अलग मानव में भिन्न हो सकता है सामान्यतः ये कारण नज़र आते हैं लेकिन इनकी इससे बहुत अधिक संख्या से इंकार नहीं किया जा सकता। किम्बल यंग महोदय के ये शब्द आज इतने वर्षों बाद भी प्रासंगिक हैं जिसमें उन्होंने कहा –

“फैशन की परिभाषा दी जा सकती है कि फैशन वह प्रचलित व्यवहार या रिवाज, ढंग, रीति या अभिव्यक्ति की विशेषता, उन विशेष सांस्कृतिक शीलगुणों का प्रस्तुतीकरण या अवधारणा है, जिन्हें बदलने की अनुमति स्वयं प्रथा द्वारा मिलाती है। ”    

“Fashion may be defined as the current or prevailing usage, mode, manner or characteristic of expression, presentation of conception of those particular cultural traits which custom itself allows to change.” – K, Young 1953

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मनोविज्ञान

Symptoms and Importance of Mental Health

October 12, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मानसिक स्वास्थय के लक्षण व महत्त्व 

01 – Symptoms of good and poor mental health /अच्छे व खराब मानसिक स्वास्थय के लक्षण

[A ] – अच्छे मानसिक स्वास्थय के लक्षण / Symptoms of good mental health

[B ] – खराब मानसिक स्वास्थय के लक्षण / Symptoms of poor mental health

02 – मानसिक स्वास्थय का महत्त्व / The Importance of Mental Health

जिस प्रकार शरीर में कोई विकार आने से पहले कुछ संकेत मिलने लगते हैं, अलग अलग विकारों यथा हृदयाघात, क्षय, ज्वर, पथरी आदि के पृथक पृथक लक्षण दिखाई पड़ते हैं। इसी तरह अच्छे व बुरे मानसिक स्वास्थय के भी कुछ लक्षण हैं जिन्हे हम इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।   

01 – Symptoms of good and poor mental health /अच्छे व खराब मानसिक स्वास्थय के लक्षण

अध्ययन की सुविधा के दृष्टिकोण से एक एक करके इनका अध्ययन उचित रहेगा अतः इन दोनों पर अलग अलग शीर्षक के तहत विचार प्रगटन का प्रयास करता हूँ।

[A ] – अच्छे मानसिक स्वास्थय के लक्षण / Symptoms of good mental health

01 – कार्य चयन व सम्पादन / work selection and editing

02 – सामाजिक सामंजस्य / Social Harmony

03 – लोच पूर्णता / Elasticity perfection

04 – स्वतन्त्र व सम्यक चिन्तन / Free and fair thinking

05 – सांवेगिक परिपक्वता / Emotional Maturity

06 – चिन्तन का यथार्थ तार्किक आधार / The Realistic Logical Basis of thinking

07 – दायित्व के प्रति समर्पण / Dedication to Responsibility

08 – विषम स्थिति से सम्यक तालमेल / Proper adjustment to adverse situations

09 – आत्म विश्वास से युक्त / Self-confident

10 – स्वस्थ आदत व रुचियाँ / Healthy habits and interests

11 – सम्यक जीवन आदर्श व जीवन दर्शन / Proper Ideals and Philosophy of Life

12 – आशावादिता व प्रगति शीलता / Optimism and progressiveness

[B ] – खराब मानसिक स्वास्थय के लक्षण / Symptoms of poor mental health

01 – काल्पनिक दुनिया में विचरण / Wandering in a fantasy world

02 – सांवेगिक अपरिपक्वता / Emotional immaturity

03 – आत्म हीनता व नकारात्मक दृष्टिकोण / self inferiority and negative attitude

04 – सामञ्जस्य बिठाने में असफल /  Fail to accommodate

05 – अपराध व हीन भावना से ग्रस्त / Plagued by guilt and a sense of inferiority

06 – शंकालु व असुरक्षा भाव से ग्रस्त / Suspicious and plagued by a sense of insecurity

07 – सभी के प्रति मिथ्या दृष्टिकोण / A distorted view of everyone

 08 – स्वयं पर अविश्वास/ Lack of self-belief

09 – धैर्य व सहनशीलता का अभाव / Lack of patience and tolerance

10 – कुण्ठा,  तनाव, निराशा व अवसाद युक्त / Characterized by frustration, stress, hopelessness, and depression

11 – उद्देश्य हीनता / Aimlessness

02 – मानसिक स्वास्थय का महत्त्व / The Importance of Mental Health

आज कहीं भी मानव अपने आपको सुरक्षित नहीं महसूस करता। कहीं डांस करते हुए, कहीं व्यायाम करते हुए, कहीं भाषण देते समय, कहीं कोई कार्य सम्पन्न करते हुए विविध आयु वर्ग के लोग काल कवलित हो जा रहे हैं। यह शारीरिक स्वास्थय में आए विकार के कारण होता है। मानसिक स्वास्थय में विकार आने पर कभी कभी स्थिति इतनी जटिल हो  जाती है कि शरीर अपनी क्षमता और उस पर विश्वास खो बैठता है। मानव जीवन को सुखमय व आनन्द युक्त करने हेतु मानसिक स्वास्थय परम आवश्यक है। इसके महत्त्व को निम्न बिन्दुओं के आधार पर विवेचित किया जा सकता है।

01 – सांवेगिक विकास में सहायक / Aids in emotional development

02 – व्यक्तित्त्व उन्नयन में सहायक / Aids in personality enhancement

03 – शारीरिक स्वास्थय उन्नयन में सहायक / Aids in improving physical health

04 – सामाजिक विकास उन्नयन / Social Development and Advancement

05 – सम्यक सामाजिक विकास / Proper social development

06 – नैतिक सबलता / Moral strength

07 – कलात्मक विकास / artistic development

08 – सम्यक सामञ्जस्य क्षमता अभिवृद्धि / Enhancement of Capacity for Proper Harmony

09 – जीवन के अभीप्सित की प्राप्ति / Attainment of life’s cherished goals

10 – सकारात्मक वातावरण का सृजन / Creation of a positive environment

11 – ज्ञानात्मक विकास / Cognitive Development

12 – आशातीत प्रगति / Remarkable Progress

वास्तव में मानसिक स्वास्थय वह आधार है जो प्रगति की रूपरेखा को पुष्पित पल्लवित करता है। लक्षण जब खराब मानसिक स्वास्थय के उभरने लगें तो हमें तुरन्त जागरूक व चौकन्ना रहते हुए अपनी भूमिका निर्वाहित करनी ही होगी जब सम्पूर्ण सामाजिक परिवेश में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई पड़ेगा तभी भारत 2047 तक विकसित हो सकेगा। असल में अच्छा मानसिक स्वास्थय और राष्ट्रीय उन्नयन एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

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मनोविज्ञान

MENTAL HEALTH

October 11, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मानसिक स्वास्थय

सामान्य रूप से मानसिक स्वास्थय को मानस के व्यवस्थित रूप से कार्य करने से लिया जाता है। मानसिक स्वास्थय समायोजन की वह प्रक्रिया है जिसमें निरन्तरता, सामंजस्य और समझौता को समाविष्ट कर जीवन को सकारात्मक दिशा की क्षमता विद्यमान है। मानसिक स्वास्थय जहाँ मानस की समग्रता की ओर इंगित करता है वहीं बहुत से विद्वतजन मानसिक स्वास्थय को सुखी, आनन्द पूर्वक जीवनयापन  का आधार मानते हैं।

मानसिक स्वास्थय की परिभाषाएं / Definitions of mental health –

मानसिक स्वास्थय की विशेषताओं के आधार पर इसकी विविध विमाओं के आधार पर इसे विवेचित किया जाता है। मानसिक स्वास्थय को विविध विद्वानों ने इस प्रकार पारिभाषित किया है।

जे ० ए ० हैडफील्ड महोदय का मानना है –

“सामान्य रूप से मानसिक स्वास्थय सम्पूर्ण व्यक्तित्व का सामंजस्य पूर्णता के साथ कार्य करना है।”

“In general, mental health is the harmonious functioning of the whole personality.”

Head Field, J.A , 1952, pp 1 -2   

एक अन्य प्रसिद्द विद्वान् कट्स एवं मोसले महोदय कहते हैं –

“मानसिक स्वास्थय वह योग्यता है जो हमें अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों में समायोजन करने में सहायक होती हैं।”

“Mental Health is the ability which helps us to seek adjustment in the difficult situations of our life.”

– Cuts & Mosale,1941,pp 4

के ० ए ० मिनिगर महोदय का मानना है –

“मानसिक स्वास्थय को मानव मात्र के एक दूसरे तथा दुनिया के साथ अधिक से अधिक प्रभावपूर्ण एवं आनन्द दायक समायोजन के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है।”

“Let us define mental health as the adjustment of human beings to the world and to each other with a maximum of effectiveness and happiness.” – Minigar, K.A. 1967, p 46.

उक्त विविध परिभाषाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि मन की स्वस्थ दशा से युक्त व्यक्ति  मानसिक स्वास्थय का धनी कहा जाएगा। ऐसे व्यक्ति का व्यक्तित्व इस प्रकार का विकसित हो जाता है जो विविध जनों और अपने वातावरण के साथ संयमित, सन्तुलित  व सामंजस्य पूर्ण व्यवहार करने में समर्थ होता है।

 मानसिक स्वास्थय अवधारणा की विशेषताएं / Characteristics of the concept of mental health-

01 – शारीरिक स्वास्थय, मानसिक स्वास्थय का आधार / Physical health: the foundation of mental health. 

02 – कार्य कुशलता व मानसिक स्वास्थय / Work Efficiency and Mental Health

03 – नैतिकता और मानसिक स्वास्थय / Ethics and Mental Health

04 – सामाजिक सामन्जस्य और मानसिक स्वास्थय / Social Cohesion and Mental Health

05 – पूर्ण मानसिक स्वास्थ्य मिथ्या / The Myth of Perfect Mental Health

06 – आर्थिक परिक्षेत्र व मानसिक स्वास्थय / Economic sphere and mental health

07 – पारिवारिक जीवन और मानसिक स्वास्थय / Family life and mental health

08 – गतिशील धारणा है मानसिक स्वास्थय / Mental health is a dynamic concept

मानसिक स्वस्थ व्यक्ति की विशेषताएं / Characteristics of a mentally healthy person –

शरीर का स्वास्थय से युक्त होना वात, पित्त, कफ के सन्तुलन पर अवलम्बित होता है इसी प्रकार मानसिक स्वास्थय का प्रमुख आलम्ब है शारीरिक स्वास्थय। सामान्यतः मानसिक रूप से सशक्त व्यक्ति में निम्न विशेषताओं देखने को मिलते हैं।

01 – स्वास्थय के प्रति जागरूकता / Health awareness

02 – आत्म विश्वास व सकारात्मकता / Self-confidence and positivity

03 – लोच पूर्णता व सम्यक जीवन दर्शन / Flexibility and a balanced philosophy of life

04 – सामञ्जस्य क्षमता / Ability to adapt

05 – विवेक आधारित सहनशीलता / Tolerance based on discernment

06 – आत्म सम्मान के प्रति सचेष्ट / Conscious of self-respect

07 – स्वमूल्यांकन क्षमता / Self-assessment ability

08 – वातावरण व यथार्थ का सम्यक तालमेल / Proper coordination of environment and reality

09 – सांवेगिक परिपक्वता / Emotional Maturity

10 – नीर क्षीर विवेक युक्त निर्णयन / Discriminative judgment

मानसिक स्वास्थय वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सर्वाधिक महत्वपूर्ण है व्यक्ति के रूप में समस्त जीवनचर्या व राष्ट्र के रूप में यह प्रगति का प्रमुख कारक है। अतः इस पर ध्यान अपेक्षित है।

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शिक्षा

PERFORMING ARTS IN EDUCATION

October 3, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षा में निष्पादन कलाएं

आज यदि हमें प्राकृतिक सौन्दर्य प्रभावित करता है, पसन्द आता है तो इनके प्रतिरूप भी भाते हैं। वर्तमान काल खण्ड दृश्य कला, श्रव्य कला और इनके समन्वित रूप अर्थात श्रव्य दृश्य कला से प्रभावित है। आज अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर बहुत कुछ सकारात्मक व नकारात्मक परोसा जाता है। जो लोग यह अभिव्यक्तियाँ देते हैं उन्हें कलाकार कहा जाता है। गायक, सङ्गीतकार, विदूषक, नायिका, नायक, नर्तक, जादूगर, सर्कस में रिंग मास्टर और नाटक कार सभी अपनी कलाओं का प्रदर्शन करते हैं अर्थात अपनी कलाओं का निष्पादन करते हैं। इस कला को हम निष्पादन कला (Performing Art ) कहते हैं।

निष्पादन कला से आशय व परिभाषाएं / Meaning and Definitions of Performing Arts –

वास्तव में निष्पादन कला उस कला को कहा जाता है जिसमें कलाकार अपने शरीर मुख मंडल आवाज तथा भाव भंगिमाओं का प्रयोग करके दर्शकों के समक्ष सीधे अपनी कला का प्रदर्शन करता है। इसमें पार्श्व में कार्य कर रहे कलाकारों को शामिल किये बिना काम नहीं चल सकता क्यों कि वे भी निष्पादन कर रहे हैं और दिखाई देने वाला कलाकार भी उससे ताल मेल बैठाता है।  सम्बन्ध में विकिपीडिआ का मानना है कि –

” निष्पादन कला में पाँच मूल अवयव शामिल हैं कलाकार की उपस्थिति, समय, स्थान, शरीर और कलाकार और जनता के बीच सम्बन्ध।”

“Performance art comprises five fundamental elements: the artist’s presence, time, space, the body and the relationship between the artist and the audience.”

बिहार के लोक सेवा आयोग हेतु प्रयुक्त दृष्टि IAS की पुस्तक कला एवं संस्कृति के पृष्ठ 8 पर निष्पादन कला के सम्बन्ध में बताया गया –

“कला का वह रूप जो मुख्यतः दृश्य प्रकृति का होता है जैसे वास्तु कला, मूर्ती कला, चित्र कला, फोटो ग्राफी,वीडिओ ग्राफी इत्यादि।”

“That form of art which is primarily visual in nature—such as architecture, sculpture, painting, photography, Videography, etc.”

वर्तमान में हमें इसके विविध रूप परिलक्षित होते हैं।

निष्पादन कला के विविध प्रकार / Various forms of performing arts –

01 – नृत्य / Dance   

02 – रंग मंच / Theatre       

03 – जादू / Magic

04 – कठपुतली का खेल / Puppet Play

05 – गीत – सङ्गीत / Song Music

06 – नाटक / Drama

07 – सर्कस / Circus

08 – भाषण / Speech

09 – पार्श्व प्रस्तुति व प्रस्तुति / Background presentation and presentation

निष्पादन कला प्रबन्धन हेतु प्रमुख तत्व / Key Elements of Performing Arts Management –

01 – आत्मविश्वास व निष्ठा / Self-confidence and Dedication

02 – विद्युत व्यवस्था / Electrical System

03 – टीम की दक्षता / Team Efficiency

04 – व्यवधान निवृत्ति व्यवस्था / System for Handling Disruptions

05 – मेक अप कक्ष व ड्रेसिंग कक्ष की उत्तम व्यवस्था / Excellent arrangements for make-up and dressing rooms

06 – सम्यक परिधान / Appropriate attire

07 – तत्सम्बन्धी विविध कार्यों में सम्यक तालमेल / Proper coordination of related tasks

08 – समय प्रबन्धन / Time management

            सचमुच इस कला में असीम शक्ति छिपी है यह हँसते को रुला सकती है और रोते हुए को हंसा सकती है। प्रेरणा के सारे पायदान इसके माध्यम से चढ़े जा सकते हैं। अध्यापन कला या भाषण भी निष्पादन कला ही है।

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शिक्षा

Factors affecting teaching.

September 14, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षण को प्रभावित करने वाले तथ्य / Factors affecting teaching

यह दुनियाँ है और निरन्तर परिवर्तनशील है। बदलती हुई इस दुनिया के शिक्षण को प्रभावित करने वाले कारक भी परिवर्तनशील हैं। सामान्यतः शिक्षण सूत्र, शिक्षण प्राविधि और शैक्षणिक रणनीति या व्यूह रचना को इसका प्रमुख कारक मन जाता है और ये भी ठीक है लेकिन बहुत से कारक शिक्षण को प्रभावित करते हैं जिन्हे हम इस प्रकार बिन्दुवत विवेचित कर सकते हैं। –

01 – विषय वस्तु का सम्यक ज्ञान / Thorough knowledge of the subject matter

02 – शैक्षणिक योग्यता / Educational qualifications

03 – विविध शैक्षणिक कौशलों का ज्ञान / Knowledge of various pedagogical skills

04 – शिक्षक प्रवृत्ति / Teacher Disposition 

05 – शिक्षण अभिरुचि / Teaching Aptitude

06 – अनुभव व प्रबन्धन / Experience and Management

07 – शिक्षक प्रबन्धन सम्बन्ध / Teacher-Management Relationship

08 – प्रभावशीलता / Effectiveness

09 – आर्थिक कारक / Economic factors

10 – विद्यालय प्रबन्धन / School management

11 – कक्षा-कक्ष स्थिति / Classroom situation

12 – मूल्य / Values

               

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शिक्षा

IMPACT OF INFORMATION

April 12, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सूचना का प्रभाव

आज सूचनाएं विद्युत की गति से उड़ान भर रही हैं इन सूचनाओं में ज्ञान है, विज्ञान है और अज्ञान भी। सूचनाओं की यह दुनियाँ विविध समाजों पर विविध असर रखती है प्रभावोत्पादकता की दृष्टि से कहा जा सकता है कि सूचनाएं स्वाभाविक हैं, कृत्रिम हैं और रण नीतिक योजना से युक्त भी। गलत सूचनाएँ भ्रमित कर जन आक्रोश को उद्वेलित भी कर देती हैं। मिथ्या सूचनाएं बड़े बड़े घटनाक्रम को उद्भवित करने की क्षमता रखती हैं। सत्य और असत्य में निर्णायक स्तर भी सूचना द्वारा ही स्थापित होता है। सूचनाएं ज्ञान के ही पर्याय के रूप में भूमिका का निर्वहन करती हैं। सूचनाओं की दुनियाँ समस्त विश्व को दिशा देने में सक्षम है। सचमुच अद्भुत दुनियाँ है सूचनाओं की।

भ्रम और यथार्थ / Illusion and Reality –

आज जो भी सूचनाएं सम्प्रेषित हो रही हैं ख़ास कर आधुनिक सञ्चार क्रान्ति के दौर में मानव को दिग्भ्रमित करने वाली हैं क्योंकि उनमें सच और झूठ का सम्मिश्रण है। प्रसारित ज्ञान का स्तर अलग स्तर का है जिसमें सच के साथ झूठ की चाशनी भी है कहीं इसके पीछे आर्थिक लाभ है तो कहीं सामाजिक विघटन के बीज रोपित होते हुए दीख पड़ते हैं। आर्टिफिशियल इन्टेलीजेन्स (A. I)  की व्यवस्था ने और उलझन पैदा कर दी है। सच और झूठ की पहचान और भी दूभर हो गयी है। विविध जिम्मेदार चैनल नीर क्षीर विवेक का प्रयास कर सच को आवाम के सामने रखने का क्षमता भर प्रयास करते हैं फिर भी बहुत सी सूचनाओं की जाँच नहीं हो पाती।

अतः जनमानस को स्वविवेक के आधार पर विश्लेषण करना होगा। उत्तेजना पैदा करने वाले लोग इन भोले भाले लोगों को अपना शिकार बना लेते हैं। डिजिटल अरेस्ट इसी तरह का एक झूठ को आलम्ब देता हुआ प्रयास है।

Role of Information in human life / मानव जीवन में सूचना की भूमिका –

अत्याधिक सुख या दुःख की एक सूचना मानव जीवन को समाप्त करने की क्षमता रखती है और फिर हार्ट अटैक जैसी बातों को प्रश्रय मिलता है एक सूचना जीवन में उत्साह का संचरण करने की क्षमता रखती है। इससे समूचा जीवन प्रभावित होता है। प्रेरणा प्रदान करने की ताक़त सूचना सम्प्रेषण से ही विविध सकारात्मक आयाम पाती है। सेना की जीत हो या टीम की विजय, आलम्ब यह सूचना या विचार सम्प्रेषण ही बनता है। जहाँ एक सूचना या विचार किसी को आत्महत्या हेतु प्रेरित करता है वहीं एक विचार या सूचना बहुत से लोगों को आत्म ह्त्या से दूर रहने की संचेतना विकसित करती है। अद्भुत आकाश है सूचनाओं की इस विलक्षण दुनियाँ का।

POSITIVE INFORMATION INTAKE MAKE YOUR PERSONALITY / सकारात्मक सूचना संग्रहण आपका व्यक्तित्व निर्माणक –

हमारा मानस शरीर के प्रत्येक हिस्से की सञ्चेतना रखता है और किसी भी हिस्से पर होने वाले किसी भी प्रभाव के प्रति मस्तिष्क जागरूक रहता है। इसी तरह जो सूचनाएँ आज पटल पर हैं उनमें से जब मानस केवल सकारात्मक सूचनाओं का अवलम्ब लेना सीख जाता है तब व्यक्तित्व के गढ़ने की शुरुआत होती है।

आज अद्भुत समय है हमारे हजारों मित्र हैं विविध सोशल प्लेटफार्म पर बहुत से लोग सभी से जुड़े होते हैं बहुत से रिश्ते बनते हैं लेकिन वो कन्धा मिलना मुश्किल होता है जो अवलम्ब बने। इन परिस्थितियों में सकारात्मक अवलम्ब सूचना के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण से आता है। जिस प्रकार की संवेदनशीलता मष्तिष्क शरीर के प्रत्येक अवयव के प्रति रखता है वैसा संवेदनशील शील व्यक्तित्व सकारात्मक सूचनाओं के संग्रहण से आधारिक अवलम्ब प्राप्त करता है और निम्न बदलाव दृष्टिगत होते हैं। –

01 – व्यापक दृष्टिकोण / Broad Vision

02 – सहृदयता / Kindness

03 – सम्यक व्यवहार / Righteous Behavior

04 – भेदभाव परक चिन्तन का अन्त / End of Discriminatory Thinking

05 – विशिष्ट जागरूकता / Special Awareness

06 – सर्वजन के प्रति संवेदनशीलता / Sensitivity to All

07 –  निर्भयता / Fearlessness

08 – स्वानुशासन / Self-Discipline

09 – स्वास्थय सचेतता/ Health Awareness

सृजनात्मक व विध्वंशक / Creative and Destructive –

सूचनाएं दो धारी तलवार की तरह हैं इनमें सृजन की अपूर्व क्षमता है तो विनाश के बीज भी छिपे हैं। हमारी जागरूकता ही हमारे दृष्टिकोण में सृजन के तत्व उद्भवित कर सकती है सच मानिये -सावधानी हटी, दुर्घटना घटी। समाज में अलग अलग वैचारिक आधार वाले लोग रहते हैं जिनपर इन सूचनाओं का प्रभाव भी अलग होता है। मिथ्या सूचनाएं या विध्वंशात्मक सूचनाएं जान बूझ कर अराजक तत्वों द्वारा समाज में पहुंचाई जाती हैं जिसका घातक असर कई बार दृष्टिगत हो चुका है। आजकल कई राजनैतिक दल भी इस मिथ्या प्रचार को हवा देकर वातावरण को विषाक्त करने का कार्य कर रहे हैं

अन्ततः सार रूपेण कहा जा सकता है कि इन सूचनाओं के प्रति नीर क्षीर विवेक जाग्रत करने की नितान्त आवश्यकता है। हमारे शिक्षालयों की इसमें महती भूमिका है। ऐसे विषाक्त पाठ्यक्रम को भी हटाने की आवश्यकता है जो समाज की सहृदयता छीनकर उसमें कट्टरता का जहर फैलाने का कार्य करते हैं। सूचनाओं के प्रति सम्यक विश्लेषण व संश्लेषण परमावश्यक है इसलिए तुरन्त किसी प्रकार की प्रतिक्रिया न की जाए। बुद्धिजीवी वर्ग की भी जिम्मेदारी है की वह सत्य स्थापन में अपनी भूमिका का निर्वहन करे। ।

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शिक्षा

SCHOOL AND OUT OF SCHOOL

March 28, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

SCHOOL AND OUT OF SCHOOL/स्कूल और स्कूल के बाहर

(Knowledge generation and child centered education / ज्ञान सृजन और बाल केंद्रित शिक्षा)

स्कूल और स्कूल के बाहर, ज्ञान सृजन और बाल केंद्रित शिक्षा से आप क्या समझते हैं। What do you understand by knowledge generation and child-centered education, in and out of school ?

बाल केन्द्रित ज्ञान Child Centered Knowledge  –

जब ज्ञान को इस प्रकार अधिगमित कराने का प्रयास होता है कि उसके केन्द्र में बालक होता है तब इसे बाल केन्द्रित ज्ञान की श्रेणी में रखा जाता है। इसमें अधिगम विषयवस्तु बालक की रूचि, आवश्यकता व क्षमता पर आधारित होती है। इस प्रक्रिया में बालक की रचनात्मक क्षमता को क्रियाशील इस प्रकार किया जाता है जिससे वह प्राकृतिक तरीके से जिज्ञासु बने और अपने आप करके सीखने की ओर प्रवृत्त हो।

स्कूल में बाल केन्द्रित ज्ञान / Child Centered Knowledge in School –

स्कूल में बाल केन्द्रित ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए सामान्यतः निम्न कारकों के सकारात्मक प्रयोग करने का प्रयास रहता है।

01 – नैतिक शिक्षा आधारित कहानियों द्वारा / Moral lessons based stories

02 – खेल द्वारा शिक्षण /Learning through play

03 – विज्ञान प्रयोगशाला का व्यवस्थित प्रयोग /Systematic use of the science laboratory

04 – परियोजना पद्धति या करके सीखने जैसी शिक्षण विधियों का उपयोग।/ Use of teaching methods such      as project method or learning by doing

05 – व्यावहारिकता का सम्मिश्रण / A blend of practicality

06 – पलायनवादिता का पूर्ण परित्याग / Complete abandonment of escapism 

07 – नीर क्षीर विवेक जागरण / Awakening the discernment between right and wrong

08 – पाठ्यक्रम में सकारात्मक परिवर्तन /Positive changes in the curriculum

स्कूल के बाहर बाल केन्द्रित ज्ञान / Child-centered learning outside of school –

01 – अनुभव आधारित अधिगम व्यवस्था / Experiential Learning System

02 – सामाजिक पुस्तकालय / Community Library

03 – संग्रहालय / Museum

04 – स्वनिर्देशित अन्वेषण / Self-Directed Exploration

05 – रूचि आधारित सञ्चार सामिग्री का विकास / Development of interest-based communication materials

06 – शैक्षिक वृत्त चित्र / Educational Documentary

07 – सामाजिक कौशल / Social Skills

08 – विविध टोलियों का सकारात्मक कार्य / Positive Work of Various Groups

09 – आत्म निर्भरता विधियों का सम्यक विकास / Proper Development of Self-Reliance Methods

स्कूल के बाहर बाल केन्द्रित शिक्षा की बात हो या स्कूल के अन्दर बाल केन्द्रित शिक्षा की बात, एक तरह से यह देश की आधार शिला को सशक्त बनाने का महत्त्वपूर्ण उपागम है। अतः सरकारी और गैर सरकारी मष्तिष्कों को इस दिशा में गम्भीर प्रयास करने होंगे। व्यक्तिगत स्तर पर भी उन्नयन को अंगीकार करने के साथ इसे जन आन्दोलन का रूप दिए जाने की आवश्यकता है। शैक्षिक उन्नयन के साथ सङ्कीर्ण मानसिकता के तिरस्कार की आवश्यकता है।

    

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मनोविज्ञान

Maladjustment

February 24, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

कुसमायोजन (Maladjustment)

आज की दुनियाँ में यह देखने को मिलता है कि कोई व्यक्ति अपने सामंजस्य पूर्ण व्यवहार से अधिकाँश लोगों के साथ तालमेल बैठा लेता है और कोई नहीं। जब कोई भी व्यक्ति समाज की अपेक्षाओं, विविध परिस्थितियोँ और वातावरण के साथ ताल मेल नहीं बैठा पाता तो उसे  कुसमायोजित व्यक्ति कहा जाता है और इस व्यवहार को  कुसमायोजन कहा जाता है। कुसमायोजन की स्थिति में सन्तुलन बिगड़ जाता है आवश्यकतानुसार व्यवहार दिखाई नहीं पड़ता।

कुसमायोजन (Maladjustment) से आशय –

कुसमायोजन (Maladjustment) एक तरह की व्यवहारिक व मानसिक स्थिति है, जिसमें प्रभावित मानव अपने वातावरण, परिस्थितियों व स्वयं के साथ प्रभावी ढंग से सामन्जस्य  बैठाने में असफल रहता है। इसके सामान्यतः तनाव, अवसाद, चिन्ता, अत्याधिक क्रोध, सामाजिक अलगाव, अल्प आत्मविश्वास व हीन भावना का मानव व्यक्तित्व में प्रभाव बढ़ जाता है।

कुसमायोजन की परिभाषायें–

क्रो एवं क्रो महोदय ने इस सम्बन्ध में कहा –

 “कुसमायोजन (Maladjustment) तब होता है जब व्यक्ति की आवश्यकताओं और उसकी संतुष्टि से संबंधित परिस्थितियों के बीच कोई संबंध नहीं रह जाता है।”

 आंग्ल अनुवाद                                                        

“Maladjustment occurs when there is a disconnect between the individual’s needs and the circumstances that satisfy them.”    -Crow and Crow

Dictionary.com के अनुसार –

 “कुसमायोजन अपने परिवेश की मांगों पर सफलतापूर्वक और संतोषजनक ढंग से प्रतिक्रिया करने में असमर्थता है”।

 आंग्ल अनुवाद –“Maladjustment is the inability to respond successfully and satisfactorily to the demands of one’s environment”.

मनोवैज्ञानिक शब्दकोश (Psychological Dictionary) के अनुसार:

 “कुसमायोजन एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति वातावरण या जीवन की माँगों के साथ तालमेल बिठाने में विफल रहता है।”

“Maladjustment is a condition in which a person fails to cope with the demands of the environment or life.”

विविध मनोवैज्ञानिकों का विचार है कि –

 कुसमायोजन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें व्यक्ति अपने व्यवहार को सामाजिक या व्यक्तिगत परिस्थितियों के अनुसार समायोजित नहीं कर पाता है।

उक्त विवेचन के आधार पर इस व्यावहारिक परिभाषा को स्वीकार किया जा सकता है –

यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति की आवश्यकताओं और वातावरण के बीच सामंजस्य नहीं बन पाता, और वह अजीब या संघर्षपूर्ण व्यवहार करने लगता है।

कुसमायोजन के कारण/Causes of maladjustment – 

मानव के कुसमायोजित होने के पीछे बहुत से कारण हैं उनमें से प्रमुख कारणों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

01 – पारिवारिक वातावरण।Family environment.

02 – शारीरिक कारण।/Physical reasons.

03 – मानसिक कारण। /Mental reasons.

04 – सामाजिक कारण।/ Social reasons

05 – आर्थिक कारण ।/ .Economic reasons

06 – निराशाजन्य अनुभव।/Depressing experiences.

07 – व्यक्तिगत कारण/ Personal reasons.

08 – क्षेत्र विशेष के कारण / Reasons specific to the area

09 – शैक्षणिक कारण / Educational reasons

कुसमायोजन का निदान व उपचार (Diagnosis & Remedies of Maladjustment) /  Diagnosis and treatment of maladjustment –

कुसमायोजित व्यक्ति को स्वस्थ जीवन में वापस लाने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जा सकते हैं:

01 – सम्यक प्रेरणा व निर्देशन /Proper motivation and guidance

02 – प्रेमपूर्ण और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार / Loving and compassionate behavior

03 – सकारात्मक वातावरण / Positive environment

04 – परामर्श (Counseling)

05 – स्वस्थ वातावरण / Healthy environment

06 – रुचि के अनुसार कार्य / Work according to interests

07 – मानसिक चिकित्सा / Psychiatric therapy

08 – शारीरिक चिकित्सा / Physical therapy

09 – सामंजस्य शक्ति विकास कार्यक्रम / Cohesion development program

10 – सामाजिक कौशल विकास / Social skills development

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मनोविज्ञान•शिक्षा

PRACTICAL EXAMINATION

January 18, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रयोगात्मक परीक्षा

सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि भावात्मक, ज्ञानात्मक और क्रियात्मक पक्ष का विकास शिक्षा शिक्षण के माध्यम से किया जाता है। इसमें से क्रियात्मक पक्ष के मूल्यांकन हेतु प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। पहले भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, गृह विज्ञान, कृषि, सङ्गीत, व्यावसायिक विषय, कौशल, प्रशिक्षण कार्य क्रम, भूगोल आदि में प्रयोगात्मक परीक्षा का चलन था पर वर्तमान में हिन्दी, अंग्रेजी, विविध मानविकी विषय में भी प्रयोगात्मक परीक्षा का आयोजन किया जाता है। कुछ विषयों की उपलब्धियों का मूल्याङ्कन प्रयोगात्मक परीक्षा के बिना संभव ही नहीं है। विद्यार्थियों के विकास के दृष्टिकोण से इन परीक्षाओं का विशेष महत्त्व है।

प्रयोगात्मक परीक्षा के उद्देश्य / Objectives of Practical Examination :-

01 – लिखित परीक्षा के पूरक के रूप में / To supplement the written examination

02 – उपलब्धियों के व्यावहारिक मापन व मूल्यांकन हेतु / For practical measurement and evaluation of achievements

03 – शिक्षार्थियों के सम्यक विकास हेतु / For the holistic development of learners

04 – यथार्थ वाद के उद्देश्यों की पूर्ति / To fulfill the objectives of realism

05 – कौशल विकास का मूल्यांकन / Assessment of skill development

06 – क्रियात्मक विकास का मूल्यांकन / Assessment of functional development

07 – विद्यार्थियों के व्यक्तित्व गठन हेतु / For personality development of students

08 – जीवन के यथार्थ अवलम्बन हेतु /  For real life support  

प्रयोगात्मक परीक्षा की प्रविधियाँ / Techniques of Practical Examination

01- प्रदत्त कार्य मूल्याङ्कन / Assigned Task Evaluation

02 – व्यावहारिक कार्य मूल्यांकन / Practical Task Evaluation

03 – निरीक्षण व मौखिक का सम्यक सम्मिश्रण / A Proper Combination of Observation and Oral Testing

04 – क्रिया सम्पन्नता मूल्यांकन /  Activity Completion Evaluation

05 – यथार्थ गणना के आधार पर / Based on accurate calculations

06 – Proper use of equipment

06 – उपकरणों का यथोचित प्रयोग / Proper use of equipment

07 – परिणाम मूल्यांकन /Result evaluation

08 – कार्य व पृच्छा के आधार पर / Based on tasks and questions

प्रयोगात्मक परीक्षा की विशेषताएं / Features of the practical exam

01 – ज्ञानात्मक व्यावहारिकता व उपयोगिता का मूल्याङ्कन / Evaluation of cognitive practicality and utility

02 – क्रियात्मक पक्ष के उद्देश्यों का मूल्यांकन / Evaluation of practical objectives

03 – ज्ञान व कौशल मूल्यांकन / Assessment of knowledge and skills

04 – रुचियों का मूल्यांकन / Assessment of interests

05 – व्यक्तिगत क्षमता का मूल्यांकन / Assessment of individual abilities

06 – नकल पर पूर्ण प्रतिबन्ध / Complete prohibition of cheating

07 – व्यावहारिक स्थितियों में मूल्यांकन / Assessment in practical situations

08 – विश्वसनीयता व वैधता में सकारात्मक वृद्धि / Positive increase in reliability and validity

प्रयोगात्मक परीक्षा के दोष / Limitations of Experimental Examination –

01 – व्यक्तिनिष्ठता / Subjectivity

02 – पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण / Biased Viewpoints

03 – मूल्यांकन मापनी विविधता / Rating Scale Variability

04 – परीक्षकों पर दवाब / Pressure on Examiners

05 – अन्याय पूर्ण / Unfair

06 – प्रामाणिक मापदण्ड नहीं / No authentic criteria

07 – प्राप्तांकों पर प्रभाव /  Impact on scores

08 – संस्थान का प्रभाव / Institutional influence

प्रयोगात्मक परीक्षा हेतु सुझाव / Suggestions for practical exam –

01 – अद्यतन तकनीकी का प्रयोग / Use of the latest technology

02 – आन्तरिक व वाह्य परीक्षक अंक निर्धारण / Internal and external examiner marking

03 – सम्यक यथोचित निर्देश / Proper and appropriate instructions

04 – तत्काल मूल्यांकित अंक सम्प्रेषण / Immediate transmission of evaluated marks

05 – पक्षपात रहित दृष्टिकोण / Unbiased Approach

06 – दवाब मुक्ति / Relieve Pressure

07 – प्रयोग अवधि निर्धारण / Determining the Duration of Experiments

08 – अनुभव व दक्षता को महत्त्व / Emphasize Experience and Skills

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विविध•शिक्षा

TEACHING STRATEGY

January 12, 2026 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

प्रश्न – शिक्षण व्यूह रचना से  समझते हैं ? इसकी प्रमुख विशेषताओं का वर्णन कीजिए। शिक्षण व्यूह रचनाओं के प्रकार बताइए।

Question – What do you understand by teaching strategy? Describe its main characteristics. Explain the types of teaching strategies.

शिक्षण व्यूह रचना से आशय / Meaning of teaching strategy-

शिक्षण व्यूह रचना से आशय शिक्षक द्वारा बनाई गई उस योजना से है जो वह अधिगम को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने के लिए बनाता है। रोहतक, हरियाणा के प्रसिद्द शिक्षाविद प्राचार्य एस के मिंगल ने अपनी पुस्तक शिक्षा तकनीकी के 2014 के संस्करण में पृष्ठ 232 पर शिक्षण व्यूह रचना के बारे में कहा –

“शिक्षण व्यूह रचनाओं से अभिप्राय एक शिक्षक द्वारा विशेष रूप से निर्मित और अपनाई गई उन सभी योजनाओं, विशिष्ट कार्य पद्धतियों तथा साधनों से है जिनके द्वारा वह अपने विद्यार्थियों का उचित मार्गदर्शन कर उन्हें निर्धारित शिक्षा अधिगम उद्देश्यों की प्राप्ति में अधिक से अधिक सहायता प्राप्त कर सके।”

आंग्ल अनुवाद

“Teaching strategies” means all those plans, specific methods and tools specially devised and adopted by a teacher. Through which hi can provide proper guidance to his students and help them in achieving the set educational learning objectives.”

शिक्षण व्यूह रचना सचमुच अधिगम को प्रभावी बनाने का कारगर उपाय है। इसी लिए ई स्टॉंस व मौरिस (1972) ने अपनी पुस्तक टीचिंग प्रैक्टिस प्रॉब्लम्स एण्ड पर्स्पेक्टिव्स में कहा –

“शिक्षण व्यूह रचना से तात्पर्य किसी पाठ के शिक्षण हेतु अपनाई गई उस सामान्यीकृत योजना से है जिसमें संरचना, अनुदेशनात्मक उद्देश्यों के रूप में वांछित विद्यार्थी व्यवहार तथा व्यूह रचना को प्रयोग में लाने के लिए आवश्यक युक्तियों की रूपरेखा का समावेश हो।”

“Teaching strategy is a generalized plan for a lesson which includes structure, desired learner behaviour in terms of goals of instruction and an outline of planned tactics necessary to implement the strategy.”

शिक्षण व्यूह रचना की प्रमुख विशेषताएं/ Special features of teaching strategy –   

01 – इसके माध्यम से पाठ के निर्धारित उद्देश्य प्राप्ति सुगम हो जाती है।

02 – शिक्षण व्यूह रचना के माध्यम से अधिगम प्रभावी व विशेष उद्देश्यों के प्रति समर्पित किया जा सकता है।

03 – शिक्षण व्यूह रचना द्वारा अधिगम पूर्ण होता है कोइ अंश छूट नहीं पता।

04 – शिक्षण युक्ति के माध्यम से शिक्षण आव्यूह को सशक्त बनाया जाता है।

05 – इसमें प्रमुख ध्यान अधिगम उद्देश्य की प्राप्ति पर रहता है जो अनुशासन की व्यवस्था स्वयमेव कर देता है।

06 – अलग अलग तरह के विद्यार्थियों को ध्यान में रखकर एक ही पाठ के लिए पृथक शिक्षण व्यूह रचना है।

07 – शिक्षार्थियों द्वारा मिलने वाले पृष्ठ पोषण के आधार पर शिक्षण व्यूह रचना में परिवर्तन किया जाता है। 

08 – इसका लचीलापन इसे विविध परिस्थितियों में सफल बनाता है।

09 – इसमें शिक्षार्थी, शिक्षण अधिगम उद्देश्य व शिक्षण व्यूह रचना का व्यावहारिक संतुलन दृष्टव्य होता है।

10 – इसमें आवश्यकता, रुचियाँ, अधिगम परिस्थितियों और सुविधाओं का सम्यक सम्मिश्रण मिलता है।  

शिक्षण व्यूह रचना के प्रकार / Types of teaching strategies –

भारत में अध्यापन एक परम पवित्र कार्य है इसकी व्यूह रचना जिस तरह की जाती है उसमें देखा जा सकता है एक में अध्यापक अधिनायक की तरह से कार्य करता दीखता है और दूसरे में व्यूह रचनाएं जनतांत्रिक रूप से किया जाता है दोनों आधार पर बनने वाली विविध व्यूह रचनाओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

[A ] – अधिनायकवादी शिक्षण व्यूह रचनाएं –

01 – व्याख्यान व्यूह रचना / Lecture Strategy

02 – वर्णन व्यूह रचना / Narrative Strategy

03 – विवरण व्यूह रचना / Description Strategy

04 – व्याख्या व्यूह रचना / Explanation Strategy

05 – प्रदर्शन व्यूह रचना / Demonstration Strategy

06 – ट्यूटोरियल व्यूह रचना / Tutorial Strategy

07 – दृष्टांत व्यूह रचना / Illustrations Strategy

08 – अभिक्रमित अनुदेशन व्यूह रचना / Programmed Instruction Strategy

09 – भूमिका व्यूह रचना / Introduction Strategy

10 – पुनः अवलोकन व्यूह रचना / Review Strategy

11 – स्पष्टीकरण व्यूह रचना / Explanation Strategy

[B] – जनतान्त्रिक शिक्षण व्यूह रचनाऐं / Democratic Teaching Strategies –

01 – सामूहिक चर्चा व्यूह रचना / Group discussion strategy

02 – समस्या समाधान व्यूह रचना / Problem solving strategy

03 – प्रश्नोत्तर व्यूह रचना / Question and Answer Layout

04 – स्वाधीन अध्ययन व्यूह रचना / Independent Study Strategy

05 – ह्यूरिस्टिक अथवा अनुसंधान व्यूह रचना / Heuristic or Research Strategy

06 – परियोजना व्यूह रचना /  Project Strategy

07 – भ्रमण व्यूह रचना / Tour Strategy

08 – दत्त कार्य व्यूह रचना / Assignment Strategy

09 – भूमिका निर्वाह व्यूह रचना / Role Play Strategy

10 – अभ्यास कार्य व्यूह रचना / Practice Strategy

11 – दृश्य श्रव्य साधन उपयोग व्यूह रचना / Strategy for using audio-visual aids

12 – संवेदना प्रशिक्षण व्यूह रचना / Sensory Training Strategy

13 – मस्तिष्क उद्वेलन व्यूह रचना / Brain Stimulation Strategy

14 – कम्प्यूटर सह – अनुदेशन व्यूह रचना / Computer Assisted Instruction Strategy

उक्त सम्पूर्ण व्यूह रचनाएं यह उद्घोषणा करती हैं कि शिक्षा को समय के साथ चलने के लिए इन व्यूह रचनाओं का सम्यक प्रयोग आवश्यक है और प्रशिक्षण महाविद्यालयों के पाठ्यक्रम में इसे सूक्ष्म शिक्षण की तरह तैयारी करानी होगी।     

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