वैदिक शिक्षा के उत्तरकाल के उपरान्त उसमें आई कतिपय कमियों के निवारणार्थ कतिपय परिवर्तनों की आहट महसूस होने लगी बलि प्रथा समापन , सर्व जन शिक्षा, स्त्री शिक्षा, व्यावसायिक शिक्षा आदि की आवश्यकता महसूस होने लगी ऐसे काल में महान शिक्षक व धर्म पथ निर्देशक महात्मा बुद्ध ने कुछ वैदिक और कुछ आवश्यक नवीन तथ्यों का समावेशन कर एक विशिष्ट शिक्षा पद्धति का विकास किया जिसे बौद्ध शिक्षा के नाम से जाना जाता है यद्यपि इसे धरातल वैदिक शिक्षा से मिला था इसीलिये आर ० के ० मुकर्जी ने अपनी पुस्तक एन्सिएंट इण्डियन एजुकेशन के पृष्ठ 374 पर लिखा –
“Buddhist education rightly regarded is but a phase of the ancient Hindu or Brahmanical system of education.” R.K.Mookerji : Ancient Indian Education, p.374
बौद्धशिक्षाव्यवस्था / Buddhist Education System –
बौद्ध शिक्षा व्यवस्था के अध्ययन हेतु सुविधा की दृष्टि से दो भागों प्राथमिक और उच्च शिक्षा में बाँट कर अध्ययन करेंगे। पहले प्राथमिक शिक्षा पर विचार करते हैं
प्राथमिकशिक्षा –
बौद्ध शिक्षा व्यवस्था में प्राथमिक शिक्षा के केन्द्र मठ थे पहले यहाँ केवल धार्मिक शिक्षा की व्यवस्था थी लेकिन ब्राह्मणीय शिक्षा से प्रतिस्पर्धा के कारण सांसारिक शिक्षा भी दी जानी लगी। 7 वीं शताब्दी में आए चीनी यात्री व्हेनसाँग के लेखों में उल्लिखित है कि प्राथमिक शिक्षा 6 वर्ष की आयु से प्रारम्भ होती थी और 6 माह तक पढ़ाई जाने वाली पुस्तक सिद्धिरस्तु में 49 अक्षर थे। इसके बाद शब्द विद्या, शिल्पस्थान विद्या, चिकित्सा विद्या, हेतु विद्या, अध्यात्म विद्या आदि पांच विद्याओं के अध्ययन का विधान था। अध्ययन का माध्यम पाली भाषा थी।
उच्च शिक्षा / Higher Education – उक्त पाँच विद्याओं का अध्ययन करने के उपरान्त प्राथमिक शिक्षा पूर्ण होती थी तथा उच्च शिक्षा का श्री गणेश होता था। यह शिक्षा बौद्ध मठों में दी जाती थी इसकी प्राप्ति उपरान्त विशेषज्ञता हासिल होती थी। धर्म, व्याकरण, दर्शन, औषधि विज्ञान, ज्योतिष आदि का अधिगम कर विशेष योग्यता की लब्धि होती थी। ए ० एस ० अल्तेकर महोदय ने लिखा –
“मठों ने अपनी उच्च शिक्षा की योग्यता से, जहाँ अध्ययन करने के लिए कोरिया, चीन, तिब्बत,और जावा ऐसे सुदूर देशों के छात्र आकर्षित होते थे, भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को ऊँचा उठा दिया। ”
“The monasteries raised the international status of India by the efficiency of their higher education, which attracted students from distant countries like Korea, China, Tibet and Jawa.” – A.S.Altekar, Education in Ancient India, p.234
वास्तव में उस काल में शिक्षा का उत्थान हुआ। नालन्दा, विक्रम शिला, ओदन्तपुरी, जगद्दला, नदिया आदि उच्च शिक्षा के प्रमुख केन्द्र थे। नालन्दा विश्वविद्यालय को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था यहाँ लगभग 20,000 विद्यार्थियों को 4000 भिक्षुओं द्वारा शैक्षिक कार्य सम्पन्न कराया जाता था . लगभग 800 वर्षों तक भारतीय दर्शन,कला और ज्ञान का प्रसार करने वाला यह अद्भुत केन्द्र बख्तियार खिलजी द्वारा धूल धूसरित कर दिया गया। बी ० पी ० जौहरी, कुलपति, आगरा विश्व विद्यालय, आगरा ने तत्कालीन शिक्षा के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक ‘भारतीय शिक्षा का इतिहास’ में पृष्ठ 22 पर लिखा –
“विश्व विद्यालय में बौद्ध धर्म, जैन धर्म, वैदिक धर्म, वेदों, व्याकरण,ज्योतिष,पुराणों दर्शन शास्त्र और ओषधि विज्ञान की शिक्षा दी जाती थी।‘’
“Buddhism, Jainism, Vedic religion, Vedas, grammar, astrology, Puranas, philosophy and pharmaceutical science were taught in the university.”
बौद्ध शिक्षा की विशेषताएं / Features of Buddhist education –
बौद्ध शिक्षा व्यवस्था में यज्ञ का स्थान संघ को स्थानान्तरित हो गया बौद्ध संघ की शिक्षा पद्धति इन्हीं संघों पर आधारित थी प्रसिद्द शिक्षाविद आर ० के ० मुकर्जी ने बताया –
“बौद्ध शिक्षा पद्धति प्रायः बौद्ध संघ की पद्धति है। जिस प्रकार वैदिक युग में यज्ञ संस्कृति के केंद्र थे उसी प्रकार बौद्ध युग में संघ शिक्षा और विद्या के केन्द्र थे। बौद्ध संसार में अपने संघों से पृथक या स्वतंत्र रूप में शिक्षा प्राप्त करने का कोई अवसर नहीं था।”
“The Buddhist system is practically that of the Buddhist order or Sangha. Buddhist education and learning centred round monasteries as Vedic culture centred round the sacrifice. The Buddhist world did not offer any educational opportunities apart from or independently of its monasteries. All education sacred as well as secular, was in the hands of monks,”
बौद्ध संघों ने ज्ञान का जो पथ आलोकित किया उस शिक्षा व्यवस्था की विशेषताओं को बिन्दुवार देने का प्रयास परिलक्षित है –
एफ ० ई ० केई के अनुसार -” विद्याध्ययन आरम्भ करने की आयु 8 वर्ष थी। प्रवेश के बाद छात्र ‘श्रमण’ ‘सामनेर’ या नवशिष्य कहलाता था।”
According to F.E.K.E. – “The age for starting studies was 8 years. After admission, the student was called ‘Shraman’, ‘Samner’ or Navashishya.”
04 – प्रब्रज्या संस्कार –प्रवेश के समय पबज्जा नामक संस्कार होता था। जिसे प्रव्रज्या संस्कार भी कहा जाता था पबज्जा का अर्थ होता है बाहर जाना। विनय पिटक के अनुसार पबज्जा संस्कार के समय होने वाली क्रिया इस प्रकार थी -श्रमण सर के बाल मुण्डवा कर पीत वस्त्र धारण करता था मठ के भिक्षुओं के चरणों में श्रद्धावनत होने के उपरान्त पालथी मारकर बैठ जाता था और मठ का वरिष्ठ भिक्षु उससे तीन बार कहलवाता था –
05 – उप सम्पदा संस्कार – 8(श्रमण) +12(अध्ययन) = 20 भिक्षु (संघ सदस्य ) → तत्पश्चात ‘उपसम्पदा संस्कार’
आगरा विश्वविद्यालय के तत्कालीनकुलपति बी ० पी ० जौहरी महोदय ने अपनी पुस्तक ‘भारतीय शिक्षा का इतिहास’ में बताया –
” ‘उपसम्पदा संस्कार’ संघ के कम से कम 10 योग्य भिक्षुओं की उपस्थिति में होता था। उनमें से एक श्रमण का परिचय कराता था। उसके बाद अन्य भिक्षु उनसे अनेक प्रश्न पूछते थे। उनके उत्तर सुननने के बाद उपस्थित भिक्षु यह निर्णय करते थे कि नवशिष्य ‘उपसम्पदा’ ग्रहण करने का अधिकारी है या नहीं। “
“The ‘Upasampada Sanskar’ took place in the presence of at least 10 qualified monks of the Sangha. One of them would introduce the Shramana. After that the other monks would ask him a number of questions. After hearing his answers, the monks present would decide whether Is the new disciple entitled to receive ‘Upasampada’ or not?
06 – अध्ययन अवधि –
8 वर्ष पर श्रमण के रूप में प्रवेश →12वर्ष (पबज्जा उपरान्त अध्ययन) + ‘उपसम्पदा संस्कार'(10 वर्ष ) → कुल अध्ययन अवधि 22 वर्ष
07 – विद्यार्थी नियम – बौद्ध शिक्षा प्रणाली में श्रमणों हेतु भिक्षाटन, भोजन, वस्त्र – तिसिवरा, स्नान ,अनुशासन आदि के सम्बन्ध में पूर्व निर्धारित कठोर नियम थे।
08 – शिक्षण विधि – श्रवण. मनन. आवृत्ति,वाद विवाद,तर्क, व्याख्या, विश्लेषण आदि विधियों का प्रयोग होता था। आर ० के ० मुकर्जी ने अपनी पुस्तक में ह्वेन सांग के इन विचारों को शिक्षण विधि के सम्बन्ध में उद्धृत किया –
” शिक्षक पाठ्य वास्तु का सामान्य अर्थ बताते हैं और छात्रों को सविस्तार पढ़ाते हैं। वे उन्हें परिश्रम के लिए प्रोत्साहित करते हैं और कुशलता से उन्नति के पथ पर अग्रसर करते हैं। वे क्रियाशून्य छात्रों को निर्देशित करते हैं और मन्द बुद्धि विद्यार्थियों को ज्ञान के अर्जन के लिए उत्सुक करते हैं।”
“The teachers explain the general meaning and teach them the minutiae; they rouse them to activity and skillfully win them to progress; they instruct the inert and sharpen the dull.”
09 – पाठ्यक्रम –
सिद्धिरस्तु नामक बालपोथी का आधार लेकर चलने वाली बौद्ध उच्च शिक्षा विविध ज्ञान विमाओं को अपने आप में समाहित करती थी यथा -बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म, जैन धर्म, राज्य व्यवस्था, प्रशासन, दर्शन शास्त्र, तर्क शास्त्र, औषधि विज्ञान, खगोल विज्ञान,नक्षत्र विद्या, गणन विद्या, पाली, संस्कृत, न्याय शास्त्र आदि।पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में प्रसिद्द शिक्षाविद डॉ राम शकल पाण्डेय के विचार जो उन्होंने अपनी पुस्तक ‘भारत में शिक्षा व्यवस्था का विकास’ के पृष्ठ 38 पर दिए का उल्लेख समीचीन होगा –
“अध्यापन विधियों के अन्तर्गत वेद त्रयी एवम् अठारह शिल्पों का उल्लेख मिलता है। अठारह शिल्पों में धनुर्वेद प्रमुख था। बौद्ध ग्रंथों से ज्ञात होता है कि यहाँ धार्मिक अनुष्ठान अतीन्द्रिय विज्ञान,विधि शिक्षण एवम् आयुर्वेद की शिक्षा प्रदान की जाती थी।”
10 – गुरु शिष्य सम्बन्ध –
ए ० एस ० अल्तेकर महोदय के अनुसार –
“अपने गुरु के साथ नवशिष्य के सम्बन्धों का स्वरुप पुत्रानुरूप था। वे पारस्परिक सम्मान विश्वास और प्रेम से आबद्ध थे। “
“The relations between the novice and his teacher were final in character; they were united together by mutual reverence, confidence and affection.” – A.S.Altekar : Education in Ancient India, pp 61-62
11 – सामाजिक शिक्षा पद्धति
12 – विज्ञ मण्डलियाँ
मिरडेल महोदय के अनुसार –
“शास्त्रीय विवादों को प्रोत्साहन दिया जाता था। इस प्रकार की विज्ञ मंडलियाँ बौद्ध उच्च शिक्षा की एक अनोखी विशेषता थी।”
“Scholastic debates were encouraged. Such learned assemblies were a novel feature of Buddhist higher education.”
13 – सामान्य विद्यालयीकरण –
मिरडेल महोदय के अनुसार –
“मठ विद्यालय बहुत कुछ सामान्य विद्यालयों के समान कार्य करने लगे ,जिनमें बालक अपने परिवारों में रहकर शिक्षा प्राप्त कर सकते थे।”
आंग्ल अनुवाद
“Monastic schools began to function much like normal schools, in which children could receive education while living in their families.”
14 – स्त्री शिक्षा
ए ० एस ० अल्तेकर महोदय के अनुसार –
“स्त्रियों के संघ में प्रवेश की आज्ञा ने स्त्री शिक्षा को ,विशेष रूप से समाज के कुलीन और व्यावसायिक वर्गों की स्त्रियों की शिक्षा को बहुत अधिक प्रोत्साहन दिया। “
“The permission given to women to enter the order gave a fairly good impetus to the cause of female education, especially in aristrocratic and commercial sections of society.”
15 – शिल्प शिक्षा –
डॉ ० आर ० के ० मुकर्जी के अनुसार
” सिप्पाओं या प्राविधिक तथा वैज्ञानिक शिक्षा के ज्ञान की माँग सामान्य शिक्षा या धार्मिक अध्ययन की माँग से किसी प्रकार कम नहीं थी। “
“The demand for knowledge of the Sippas or for techinical and scientific education was not less keen than that for general education or religious studies.”
बौद्ध शिक्षा अनूठी विशेषताओं से युक्त थी बौद्ध शिक्षा को नालन्दा, तक्षशिला,विक्रमशिला,बल्लभी,ओदन्त पुरी,नदिया,मिथिला,जगद्दला आदि शिक्षा के उच्च केन्द्रों ने अन्तर्राष्ट्रीय गरिमा प्रदान की। बौद्धकालीन विश्व-विद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थियों ने चीन, श्री लंका, जापान, सुमात्रा आदि देशों में भी बौद्ध शिक्षाओं का प्रसार किया।
शिक्षावादियों की बेहतरीन कण्ठ माला का अद्भुत मोती है जॉन डीवी। विलिम जेम्स से विचारों का जो प्लावन हुआ उससे प्रेरणा पाकर डीवी को जो दिशा मिली उससे जॉन डीवी ने संसार को दिग्दर्शित किया। एक सामान्य से दुकानदार का यह बेटा कालान्तर में सुप्रसिद्ध दार्शनिक के रूप में स्थापित हुआ।
डीवीकीरचनाएं / DEWEY’s creations – डीवी महोदय ने अपनी 92 साल की उम्र में लगभग 50 ग्रन्थों की रचना की। इनमें से जो ज्ञात हो पाए उन्हें यहाँ देने का प्रयास किया है –
1 – Interest and Effort as Related to Will – 1896
2 – My Pedagogic Creed – 1897
3 – The School and Society – 1899
4 – The Child and the Curriculum – 1902
5 – Relation of Theory and Practice in the Education of Teachers – 1907
6 – The School and the Child -1907
7 – Moral Principle in Education – 1907
8 – How We Think – 1910
9 – Interest and Effort in Education – 1918
10 – School of Tomorrow – 1915
11 – Democracy and Education – 1916
12 – Reconstruction and Nature in Philosophy – 1920
13 – Human Nature in Conduct -1921
14 – Experience and Nature – 1925
15 – Quest for Certainity – 1929
16 – Sources of a Science Education – 1929
17 – Philosophy and Civilization -1931
18 – Experience and Education – 1938
19 – Education of Today – 1940
20 – Problems of Man –
21 – Knowing and Known –
डीवीदर्शनकीमीमांसा / Meemansa’s of Philosophy –
इस दर्शन की मीमांसाओं के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाएगा कि इसके मूल में क्या है किस आधार पर यह विस्तारित हुआ, इस चिन्तन का दिशा निर्धारण कैसे हुआ इसे खाद पानी कहाँ से मिला। सबसे पहले विचार करते हैं इसकी तत्त्व मीमांसा (Metaphysics)पर –
तत्त्वमीमांसा / Metaphysics –
विलियम जेम्स की वैचारिक पृष्ठ भूमि को पुष्ट करने वाला यह खुले दिमाग वाला व्यक्तित्व आत्मा परमात्मा की व्याख्या से दूर रहकर भौतिकता पर अवलम्बित रहा। इनका मानना था की संसार अनवरत निर्माण की अवस्था में रहता है यह लगातार परिवर्तनशील है इसमें कोई सर्वकालिक सत्य या मूल्य हो ही नहीं सकता। निरन्तर बदल रहे सत्य व मूल्यों हेतु प्रयोग किये जाते रहने चाहिए इसी लिए डीवी की विचार धारा प्रयोगवाद (Experimentalism) के नाम से भी जानी जाती है।
ये मानव को सामाजिक प्राणी स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि वही तथ्य सही है जो मानव मात्र हेतु उपयोगी हो। मानव को पूर्ण समर्थ मानते हुए ये कहते हैं कि अपनी समस्त समस्याओं को हल करने में वह समर्थ है अपनी प्रगति का निमित्त वह स्वयम् है विविध विषम परिस्थितियों, झंझावातों से टकराने में जो मानव समर्थ वह स्वयम् अपनी उन्नति का निमित्त कारण है इस उन्नति की कोई निर्धारित सीमा नहीं है इस तरह के विचारों का सम्पोषण करने के कारण ही इनकी विचारधारा नैमेत्तिक वाद (Instrumentalism) के नाम से भी जानी गयी।
ज्ञानऔरतर्कमीमांसा(Epistemology and logic) – डीवी का स्पष्ट मत है कि ज्ञान क्रिया अवलम्बित होता है पहले समस्या आती है उसके समाधान हेतु मानव सक्रिय हो जाता है और विविध समाधानों की परिकल्पना बनाता है। इन्हें प्रयोग की कसौटी पर कसता है इस प्रकार प्राप्त सत्य को वह अंगीकृत करता है। इस प्रकार स्वहित और समाजहित हेतु सत्य स्थापन की तात्कालिक व्यवस्था के सोपान हुए –
1 – समस्या
2 – तत्सम्बन्धी विवेचना
3 – परिकल्पना
4 – प्रायोगिक कसौटी
5 – सत्य स्थापन
आचार व मूल्य मीमाँसा (Ethics and Axiology) – ये अध्यात्म या आध्यात्मिक मूल्यों पर तो विश्वास नहीं करते थे लेकिन मानव और मानव में कोइ भेद नहीं मानते थी इनका विश्वास था कि प्रत्येक मानव को उसकी रूचि, क्षमता व योग्यतानुसार स्वतन्त्रता मिलनी चाहिए इनका मानना था कि पूर्व निर्धारित आदर्श न लादकर प्रत्येक को अपने लिए खुद आदर्श व सत्य निर्धारण करना चाहिए। जिस आचरण व मूल्य से स्वविकास हो और समाज के विकास में बढ़ा न पहुँचे वह उचित है।
डीवी का शिक्षा दर्शन / Dewey’s philosophy of education –
आजाद भारत के जितने भी प्रधानमन्त्री हुए वे विकास के क्रम में आध्यात्मिक विकास को भी शामिल करते हैं और मनुष्य के समग्र विकास हेतु आवश्यक समझते हैं। डीवी भी मानव जीवन की विशेषता विकास को स्वीकार करता है लेकिन मानव के सामाजिक,शारीरिक व मानसिक विकास की बात प्रमुखतः करता है। वह यह भी स्वीकार करता है कि विकास हेतु अनुकूलन की स्थिति प्राप्ति हेतु वह पर्यावरण को नियन्त्रित करने का भी प्रयास करता है। इसी आधार पर वह शिक्षा के सम्बन्ध में कहता है –
“Education is the development of all those capacities in the individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”
“The process of education is a continuous process of adjustment whose aim at each stage is to provide increasing capacity for development.”
4 – लचीले मष्तिष्क का निर्माण
5 – सामाजिक समायोजन में निपुणता
डीवी के अनुसार –
“शिक्षा का कार्य असहाय प्राणी को सुखी नैतिक एवम् कार्य कुशल बनाना है। “
“The function of education is to help growing of helpness young animal in to a happy moral and efficient human being.” -Dewey
6 – लोकतन्त्रीय व्यवस्था विकास
डीवीकाशिक्षाकेअंगोंपरप्रभाव /Impact of Dewey on educational institutions – डीवी वह व्यक्तित्त्व था जो तत्कालीन व्यवस्था में यथार्थ के सन्निकट खड़ा दीख पड़ता था उसकी वाणी ऐसा ही उद्घोष करती थी लोग उससे प्रभावित हो रहे थे उसका जो दृष्टिकोण शिक्षा के विविध अंगों के प्रति था यहाँ संक्षेप में द्रष्टव्य है।–
पाठ्यक्रम / Syllabus – तत्कालीन पाठ्यक्रम सम्बन्धी विचारों से ये असंतुष्ट थे इनका साफ़ मानना था कि मानव कल्याण हेतु पाठ्यक्रम निर्माण अधोलिखित सिद्धान्तों पर अवलम्बित होने चाहिए –
01 – रूचि का सिद्धान्त / Principle of interest
02 – बालकेन्द्रित शिक्षा का सिद्धान्त /Principle of child centered education
03 – लोच का सिद्धान्त / Principle of elasticity
04 – सक्रियता का सिद्धान्त / Principle of activation
05 – सामाजिक व्यावहारिक अनुभवों का सिद्धान्त /Principle of social practical experiences
06 – उपयोगिता का सिद्धान्त / Principle of utility
07 – सानुबन्धिता का सिद्धान्त / Principle of co-relation
शिक्षण विधि / Teaching method – शिक्षण विधि के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में इनका मानना है कि उचित सामाजिक वातावरण परमावश्यक है बिना सामाजिक चेतना की जाग्रति और सक्रिय क्रियाशीलता के विधि सम्यक आयाम ले ही नहीं पाएगी इन्होने कहा –“समस्त शिक्षा व्यक्ति द्वारा जाति की सामाजिक चेतना में भाग लेने से आगे बढ़ती है।””All education proceeds by the participation of the individual in the social consciousness of the race.”
ये किसी भी पूर्व प्रतिपादित सिद्धान्त अथवा ज्ञान को तब तक स्वीकार नहीं करते जब तक वह प्रयोग की कसौटी पर खरा न उतर जाए। ये प्रयोग को अच्छी शिक्षण विधि स्वीकार करते हैं क्योंकि इसमें अवलोकन / observation, क्रिया / action, स्वानुभव / Self experience, तर्क /Reasoning, निर्णयन / Decision making और परीक्षण सभी शामिल होता है।इसी वजह से ये करके सीखना और स्वानुभव द्वारा सीखने पर सर्वाधिक बल देते हैं। इससे प्रभावित होकर ही इनके शिष्य किल पैट्रिक ने प्रोजेक्ट मेथड (Project method) का सृजन किया। शिक्षण विधि के सम्बन्ध में डीवी के ये शब्द बहुत महत्त्वपूर्ण हैं – “विधि का तात्पर्य पाठ्यक्रम की उस अवस्था से है जो उसको सर्वाधिक उपयोग के लिए व्यवस्थित करती है। ……… विधि पाठ्य वस्तु के विरुद्ध नहीं होती बल्कि वह तो वांछित परिणामों की ओर पाठ्यवस्तु निर्देशन है।”
“Method means that arrangement of subject matter which makes it most effective in use …… Method is not antithetical to subject matter, it is the effective direction of subject matter to desired results.”-Dewey
शिक्षक / Teacher – यद्यपि ये भौतिकता से ओतप्रोत थे लेकिन गुरु के सम्मान को अपना पूर्ण समर्थन देते हैं और स्वीकार करते हैं कि वह समाज सुधारक, समाज सेवक, सम्यक सामाजिक वातावरण का निर्माता है और ईश्वर का सच्चा प्रतिनिधि है। डीवी महोदय के अनुसार –
“शिक्षक सदैव परमात्मा का सच्चा पैगम्बर होता है। वह परमात्मा के राज्य में प्रवेश कराने वाला होता है। “
“The teacher is always a prophet of true God. He leads to the kingdom of God.”
ये स्वीकार करते हैं कि अध्यापक अपने विद्यार्थी का पथ प्रदर्शक और मित्र होता है इसी भावना के आधार पर जी० एस० पुरी लिखते हैं –
“शिक्षक बालक का मित्र तथा पथ प्रदर्शक है। वह अपने छात्रों को सूचनाएं या ज्ञान प्रदान नहीं करता बल्कि वह उनके लिए ऐसी स्थिति या अवसरों को प्रदान करता है जो इन्हें सीखने में सहायता देती है। “
“The teacher is to be friend and a guide to the child .He is not transmit any information or knowledge to his pupils but he has only arrange the situation and opportunities which may enable them to learn.”
विद्यार्थी / Student – वे विद्यार्थी केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था के पक्षधर थे इन्होने अपनी शिक्षा योजना में सब कुछ बाल केन्द्रित रखा है बच्चों की पूर्ण स्वतन्त्रता व चयन की पूरी छूट देते हुए ही अपना आदर्श व मूल्य निर्धारण की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान करते हैं। बाल केन्द्रित शिक्षा व्यवस्था व बाल केन्द्रित पाठ्यक्रम इसी के उदाहरण हैं।
अनुशासन / Discipline – ये शिक्षा को समाजोन्मुखी बनाकर चारित्रिक दृढ़ नागरिक का निर्माण करना चाहते हैं। ये बालक के सहयोग द्वारा उसमे आज्ञा पालन, अनुशासन, विनम्रता आदि गुणों का विकास करना चाहते हैं सहयोग व रूचि के आधार पर अनुशासन स्थापन चाहते हैं प्रजातन्त्र की सुदृढ़ता हेतु सहयोग, आत्म निर्भरता के पद चिन्ह बनाकर अनुशासन स्थापन का कार्य होना चाहिए।
डीवीकेशिक्षादर्शनकीविशेषताएं /Features of Dewey’s educational philosophy –
01 – ;साध्य के ऊपर साधन की महत्ता
02 – सत्य परिवर्तनशील
03 – कर्म प्रधान चिन्तन द्वित्तीयक
04 – समस्या (parikalpanaa,kriya nirdhaaran)
05 – योजना पद्धति
06 – प्रजातन्त्र सर्वश्रेष्ठ
07 – नैमेत्तिक वाद
08 – प्रयोग पर बल
09 – आगमन प्रमुख ,निगमन द्वित्तीयक
10 – प्रयोजनहीन कला व्यर्थ
11 – धर्म सम्बन्धी धारणा
डीवी के शिक्षा दर्शन की सीमाएं /Limitations of Dewey’s educational philosophy –
01 – साधनको प्रमुख मानना उचित नहीं
02 – विचार द्वित्तीयक कैसे सम्भव
03 – समस्त सत्य स्थापन की प्रायोगिक जाँच सम्भव नहीं
04 – कला सम्बन्धी विचार अव्यावहारिक
05 -धर्म के प्रति संकुचित दृष्टिकोण
06 -आगमन व निगमन दोनों से सत्य स्थापन
07 -सत्य परिवर्तनशील
08 -परिवर्तन को सत्य मानाने पर लक्ष्य निर्धारण सम्भव नहीं
09 – योजना पद्धति अधिक खर्चीली
उपरोक्त सम्पूर्ण विवेचन यह स्पष्ट करता है कि तत्कालीन रूढ़िवादी समाज को प्रगतिशील बनाने में उसका अपूर्व योगदान है उसने भौतिकता की लब्धि को ध्यान में रखकर शिक्षा को नया आयाम प्रदान करने की कोशिश की लेकिन धर्म के प्रति उसका दृष्टिकोण उचित नहीं कहा जा सकता। सत्य के निर्धारण में उसकी सोच पर आज के परिप्रेक्ष्य में पुनः विचार मन्थन इतना आवश्यक है कि इसके बिना भटकाव की स्थिति आ जायेगी। सत्य निरंतर परिवर्तनशील मानने के कारण इन सिद्धांतों में परिवर्तन आना ही है।
जब केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप का अध्ययन किया जाता है तो अंक वितरण के मध्यमान के बारे में अधिगमित होता है परिणामों में विचलन भी देखने को मिलता है कुछ वितरणों में अंक मध्यमान के निकट और कुछ में दूर तक फैले दीख पड़ते हैं। जब किसी अंक वितरण के विविध अंक अपेक्षाकृत अपने मध्यमान के निकट रहते हैं तो विचलन शीलता (Variability) कम होती है लेकिन जब अंकों का विस्तार मध्यमान से अपेक्षाकृत दूर-दूर तक फैला होता है अर्थात विचलित रहता है तब अंक वितरण की विचलन शीलता (Variability) अधिक होती है।
lindiquist लिन्डक्यूस्टि महोदय विचलनशीलता के सम्बन्ध कहते हैं –
“Variability is the extent to which the scores tend to scatter or spread above and below the average.”
“विचलनशीलता वह अभिसीमा है, जिसके अन्तर्गत अंक अपने मध्यमान से नीचे व ऊपर की ओर वितरित या विचलित रहते हैं।”
स्पीगेल महोदय विचलनशीलता के सम्बन्ध में कहते हैं। –
“वह सीमा जहां तक आंकड़े अपने मध्यमान मूल्य के दोनों ओर प्रसार की प्रवृत्ति रखते हैं, आंकड़ों का विचलन कहलाती है।”
अनुवाद “The extent to which data tend to spread on either side of its mean value is called variability of data.”
गैरट महोदय विचलनशीलता के सम्बन्ध में कहते हैं। –
“विचलनशीलता से तात्पर्य आँकड़ों के वितरण या प्रसार से है यह वितरण आंकड़ों की केन्द्रीय प्रवृत्ति के चारों ओर होता है।”
अनुवाद ” Variability refers to the distribution or spread of data. This distribution is around the central tendency of the data.”
Methods Of Measuring Variability
विचलनशीलताकोमापनेकीविधियाँ –
विचलनशीलता को मापने की विधियों को दो प्रमुख भागों में विभक्त कर सकते हैं।
[A] – निरपेक्षमाप / Absolute Measures of Dispersion
i – प्रसार / Range
ii – चतुर्थाङ्क विचलन/ Quartile Deviation
iii – माध्य विचलन/ Mean Deviation
iv – मानक विचलन/ Standard Deviation
[B] – सापेक्षमाप / Relative Measures of Dispersion
i – प्रसार गुणाँक / Coefficient of Range
ii – चतुर्थक विचलन गुणाँक / Coefficient of Quartile Deviation
iii – माध्य विचलन गुणाँक / Coefficient of Mean Deviation
iv – विचलन गुणाँक / Coefficient of Variance
विचलनशीलताज्ञातकरनेकेउद्देश्य / Objectives of determining deviation – विचलनशीलता सांख्यिकीय परिक्षेत्र में महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है इससे हम परिणामों की सटीक स्थिति समझने में सक्षम हुए हैं, सुविधाजनक अध्ययन हेतु विचलनशीलता के अधोलिखित उद्देश्य कहे जा सकते हैं –
1 – मध्यमान की विश्वसनीयता हेतु / For reliability of mean – सांख्यिकीय विश्लेषण में विश्वसनीयता एक महत्त्वपूर्ण कारक है यही समूची गणना का दिशा निर्धारक हैअगर किसी श्रंखला में विचलन कम है तो कहा जाता है कि यह मध्यमान अंक वितरण का सही प्रतिनिधित्व करता है इसके विपरीत यदि श्रंखला में अधिक विचलन दृष्टिगत होता है तो इससे आशय है कि यह मध्यमान अंक वितरण का सही प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है। इस प्रकार मध्यमान की विश्वसनीयता पुष्ट होती है।
2 – यथार्थ से निकटता हेतु / To be closer to reality – मध्यमान एक प्रतिनिधिकारी शक्ति है और इसका यथार्थ बोध सत्य के निकट लाता है इसके मापन द्वारा ही यह जाना जाता है कि कौन सा परिणाम सत्य के अधिक निकट है, विचलनशीलता का यह मापन अन्य विविध गणितीय विश्लेषण का आधार बनता है और उन्हें ज्ञात करना सरल,सुबोध व लाभकारी हो जाता है ।
3 – विविध श्रृंखलाओं के तुलनात्मक अध्ययन हेतु / For comparative study of various series – विचलनशीलता का अध्ययन ही दो या अधिक श्रंखलाओं के तुलनात्मक अध्ययन में सक्षम बनाता है यदि विचलनशीलता उच्च कोटि की है तो यह स्वीकार किया जाता है कि यहां आँकड़ों का सामंजस्य उच्च नहीं है जबकि विचलनशीलता के निम्न कोटि के होने से आशय है कि श्रृंखला में आँकड़े सही समायोजित हैं।
कुल मिलकर यह कहा जा सकता है विचलन शीलता के अध्ययन ने सांख्यिकीय विश्लेषण के क्षेत्र में हमें अधिक विश्वसनीय और पुष्ट बनाया है इससे परिणाम यथार्थ के अधिक निकट पहुँचे हैं।
प्रातः काल उठने से प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के दर्शन होते हैं जो लोग प्रकृति की गोद में निवास कर रहे हैं वे प्रकृति की प्रातः कालीन सुषमा की जादुई शक्ति को भलीभाँति अनुभव कर चुके हैं। प्रातः काल में पक्षी कलरव, पुष्प,कली, मञ्जरियाँ, हरीतिमा, प्राची दिशा से मार्तण्ड भगवन का उद्भव,उनकी सुखद रश्मियाँ हमारे शरीर के रोम को पुलकित कर देती हैं। प्रातः कालीन मन्द बयार जीवन का सुखद आधार है। सचमुच प्रातःकालीन प्रदत्त शक्तियों को पैसे द्वारा नहीं खरीदा जा सकता। भोर के अनुपम सौन्दर्य के साथ प्राणवायु की गुणवत्ता का स्तर भी इस समय सर्व श्रेष्ठ होता है। सभी इन लाभों को अर्जित करना भी चाहते हैं लेकिन विविध कारक इसमें बाधा (Barrier) का कार्य करते हैं।
सुबह उठने में बहुत से लोग दिक्कत का अनुभव करते हैं और इन कारणों को अव्यावहारिक नहीं कहा जा सकता। आइये इन पर क्रमशः विचार करते हैं –
01 – देर रात्रि तक जागरण / Staying awake till late night
02 – रात्रि कालीन सेवाएं / Night Services
03 – घर से कार्य / Work from home
04 – रात्रि जागरण आदत / Night waking habit
05 – घरेलू वातावरण / home environment
06 – आलस्य / Laziness
07 – तथाकथित आधुनिकता / So-called modernity
08 – अनुपयुक्त गरिष्ठ भोजन व पेय / Inappropriate heavy food and drink
09 – स्वास्थय सम्बन्धी परेशानी / Health problems
10 – शिक्षण संस्थानों की संस्कृति पोषण से विरक्ति /
Disinterest in nurturing the culture of educational institutions.
प्रातःजागरणसमस्यासमाधान –
किसी विद्वतजन ने कितना सुन्दर कहा है – ‘मन के हारे हार है मन के जीते जीत’। यदि हम अपने मानस को तैयार करें तो अपने शरीर का रिमोट अपने हाथ में आ जाएगा जिसे हम आवश्यकतानुसार निर्देशित कर सकेंगे।स्वामी अमर नाथ जी ने अपने प्रवचन में स्पष्ट रूप से कहा –
कोई मुश्किल नहीं ऐसी है जो आसान न हो।
आदमी वह है जो मुसीबत में परेशान न हो।।
मानस को साध इन व्यवस्थाओं को करने से इस समस्या का भी समाधान सम्भव हो सकेगा।
01 – समय व्यवस्थापन / time management
02 – जल्दी सोयें जल्दी जागें / Early to bed early to rise
03 – अवकाश सदुपयोग / Utilization of leisure time
04 – आलस्य त्याग / Give up laziness
05 – शारीरिक स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान / Special attention to physical health
06 – रात्रि कालीन सेवा समायोजन / Night service adjustment
07 – जहाँ चाह वहाँ राह / where there is a will there is a way
08 – शिक्षण संस्थानों की जागरूकता / Awareness of educational institutions
09 – माता, पिता, अध्यापकों का सम्यक आदर्श / Proper role model of mother, father, teachers
10 – स्वस्थ आदत निर्माण / Healthy habit formation
प्रातःजागरणकेलाभ /
Benefits of waking up in the morning –
कुछ तथ्य निर्विवाद सत्य है और प्रातः जागरण के लाभों से इन्कार नहीं किया जा सकता। केवल अपने देश में ही नहीं बल्कि सारे विश्व में प्रातः भ्रमण, प्रातः प्राणायाम, व्यायाम आदि को स्वास्थय हित में स्वीकार किया गया और इस लिए भोर में जागरण परमावश्यक है। इसके लाभों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
01 – समय नियोजन में सरलता / Ease of time planning
02 – पूर्ण नींद की उचित व्यवस्था / Proper sleep arrangement
03 – व्यायाम, प्राणायाम, भ्रमण की सम्यक व्यवस्था /
Proper arrangements for Exercise, Pranayama, Travel
04 – आँखों की सम्यक देखभाल / Proper eye care
05 – जीवन की औसत आयु में वृद्धि / Increase in average age of life
06 – सम्पूर्ण स्वस्थ जीवन हेतु आवश्यक / Necessary for a completely healthy life
07 – आध्यात्मिक उच्चता सम्भव / Spiritual heights possible
08 – सांस्कृतिक विरासत संरक्षण / Cultural heritage protection
उक्त सम्पूर्ण चिन्तन मन्थन हमें गम्भीरता से सचेत करता है विकल्पों में निर्विकल्प होकर हमें प्रातः उठकर उन्नति की नई पट कथा लिखनी होगी। यह प्रातः जागरण, जीवन जागरण का आधार बन सकेगा। भारतीय चिन्तन, मंथन, विश्लेषण, बलिष्ठ होकर विश्व को सम्यक दिशा दे सकेगा। अवधी भाषा में श्रद्धेय वंशीधर शुक्ल ने बहुत सुन्दर लिखा है –
मध्यांक की परिभाषा, उपयोग, गणना (Definition, Uses, Computation of Median) –
जब प्रदत्त आंकड़ों की केन्द्रीय प्रवृत्ति को ज्ञात करना हो तब माध्य के सहारे की आवश्यकता के विकल्प के रूप में माध्यिका का प्रयोग किया जाता है। मध्यांक की गणना में प्रदत्त आंकड़ों को जोड़ने की जगह उसे आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर गणनाकी जाती है।मध्यांक को ही माध्यिका भी कहा जाता है।
मध्यांक की परिभाषा (Definition of Median) – विविध विचारकों ने मध्यांक को पारिभाषित किया है उनमें से कुछ इस प्रकार हैं –
विकिपीडिया के अनुसार –
“माध्यिका सांख्यिकी और प्रायिकता सिद्धान्त में वह मान है जो सांख्यिकीय जनसंख्या, प्रायिकता बंटन या प्रतिचयन के पदों को दो बराबर भागों में इस प्रकार बांटता है कि आधे पद इससे बड़े तथा आधे पद इससे छोटे हों। जब पदों को परिमाण अनुसार आरोही या अवरोही कर्म में व्यवस्थित किया जाता है तब बीच वाला पद माध्यिका या मध्यक कहलाता है। “
“Median in statistics and probability theory is the value which divides the terms of statistical population, probability distribution or sampling into two equal parts in such a way that half of the terms are bigger than it and half of the terms are smaller than it. When the terms are arranged in ascending or descending order according to the magnitude Then the middle term is called Median.
गिल्फर्ड (Guilford) महोदय के अनुसार –
“मध्यांक एक ऐसा बिन्दु होता है जिसके मापन के किसी एक स्केल पर ठीक आधे अंक ऊपर की तरफ तथा ठीक आधे अंक नीचे की तरफ होते हैं।”
“The median is defined as that point on the scale of measurement above which are exactly half the cases and below which are the other half.”
एच ई गैरट (H.E.Garrett) महोदय के अनुसार –
“जब अव्यवस्थित अंक या अन्य मापक्रम में व्यवस्थित हों तो मध्य का अंक मध्यांक कहलाता है।”
“When ungrouped scores or other measures are arranged in order of size, the median is the mid- point of series.”
एल आर कॉनर महोदय के अनुसार –
“माध्यिका आंकड़ों की श्रेणी का वह पद मूल्य है जो समूह को दो बराबर भागों में इस प्रकार विभाजित करता है, कि एक भाग में समस्त मूल्य माध्यिका से अधिक तथा दूसरे भाग में समस्त मूल्य माध्यिका से कम होता है। “
“The Median is that value of a series of the variable which divides the group into two equal parts, one part comprising of all values greater and the other all values less than the median.”
मध्यिका की उपयोगिता / Uses of Median –
यह स्वीकार किया जाता है कि यदि वितरण का केन्द्र विशेष रूप से मध्य में हो तो मध्यमान की अपेक्षा प्रतिदर्श विभ्रम (Sampling Error) माध्यिका में कम होती है। साथ ही इसकी विविध उपयोगिताओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
01 – अंक समूह का वास्तविक मध्य बिन्दु ज्ञात करने हेतु
02 – बहुलक हेतु
03 – केन्द्रीय प्रवृत्ति के अपेक्षाकृत कम शुद्ध मान हेतु।
04 – छोटे आंकड़ों के वितरण हेतु
05 – मध्यांक पर पद संख्या का प्रभाव ,पद मूल्यों का नहीं।
06 – मध्यांक का निर्धारण ग्राफ द्वारा सम्भव
07 –असमान वितरण की स्थिति में उपयोगी
मध्यांक की गणना (Computation of Median) –
प्रदत्त आंकड़ों के आधार पर दो तरह से माध्यिका की गणना की जाती है ।
1 – अव्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना
(a ) – सम आँकड़े होने पर
(b ) – विषम आंकड़े होने पर
2 – व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना
आइए इन्हे सूत्र व उदाहरण के साथ अधिगमित करने का प्रयास करते हैं।
1 – अव्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना
(a ) – सम आँकड़े होने पर – आंकड़ों की संख्या सम होने पर माध्यिका निकालने के लिए इस सूत्र को प्रयुक्त किया जाता है। लेकिन उससे पहले वितरण को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर लेते हैं।
मध्यांक (Me) = {N /2 वां पद +(N /2 +1) वां पद } / 2
यहाँ N = पदों की सँख्या
एक उदाहरण के माध्यम से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
EXAMPLE – निम्न आंकड़ों से मध्यांक की गणना कीजिए
8, 4, 7, 3, 13 , 9, 11, 12, 15, 14, 17, 19
हल –
आँकड़ों को आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर
3, 4, 7, 8, 9, 11, 12 , 13, 14 , 15, 17 , 19
यहाँ आँकड़ों की संख्या = 12 ( सम ) = N
मध्यांक (Me) = {N /2 वां पद +(N /2 +1) वां पद } / 2
= {(12/2) वां पद +(12/2 + 1) वां पद}} / 2
=(6 वां पद + 7 वां पद) / 2
=(11 + 12) / 2
=23/2
मध्यांक (Me) =11.5
(b ) – विषम आंकड़े होने पर – आंकड़ों की संख्या विषम होने पर माध्यिका निकालने के लिए इस सूत्र को प्रयुक्त किया जाता है। लेकिन उससे पहले वितरण को आरोही या अवरोही क्रम में व्यवस्थित कर लेते हैं।
मध्यांक (Me) = (N +1)/ 2 वां पद
यहाँ N = पदों की सँख्या
एक उदाहरण के माध्यम से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
EXAMPLE – निम्न आंकड़ों से मध्यांक की गणना कीजिए
8, 4, 7, 3, 13, 9, 11
हल –
आँकड़ों को आरोही क्रम में व्यवस्थित करने पर
3, 4, 7, 8, 9, 11, 13
यहाँ आँकड़ों की संख्या = 7 ( विषम )
मध्यांक (Mdn) = {(N+1) / 2} वाँ पद
= (7 + 1) / 2 वाँ पद
= 4 वाँ पद
मध्यांक (Mdn) = 8
2 – व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना –
व्यवस्थित आँकड़ों से मध्यांक की गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है
मध्यांक(Mdn) = L+ {(N/2- F)/ Fm } X CI
एक उदाहरण के माध्यम से इसे और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
EXAMPLE – निम्न व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यांक की गणना कीजिए।
माध्यकीपरिभाषा, उपयोग, गणना(Definition, Uses, Computation of mean) –
सांख्यिकी की दुनियाँ में केन्द्रीय प्रवृत्ति की माप एक क्रान्ति से कम नहीं है, यद्यपि इसमें कई तरह के मध्यमान,मध्यांक और बहुलांक की गणना शामिल है लेकिन इस अंक में हम यहॉं केवल माध्य जिसे कुछ लोग समान्तर माध्य या अंक गणितीय माध्य के नाम से भी जानते हैं, के बारे में अध्ययन करेंगे और इस अध्ययन में मुख्यतः इसकी परिभाषा, उपयोग और गणना को शामिल करेंगे।
माध्यकीपरिभाषा (Definitions of mean) – जब किसी आंकड़े में प्राप्त अंकों का योग करके उस समूह की कुल संख्या (N) द्वारा विभाजित किया जाता है और इस प्रक्रिया के माध्यम से जो संख्या प्राप्त होती है उसे उस समूह का मध्यमान (Mean) कहा जाता है।
प्रश्न – इस वितरण में राम और श्याम के विगत 5 माह के प्रयुक्त विद्युत् यूनिट दिए गए हैं दोनों का विगत 5 माह की विद्युत खपत का मध्यमान ज्ञात कीजिए।
क्रमाङ्क
1
2
3
4
5
राम के यूनिट
142
145
168
131
150
श्याम के यूनिट
232
243
254
212
249
हल – उक्त प्राप्तांकों के अनुसार
N = माह की संख्या = 5
∑X = राम के यूनिट का योग = 142+ 145 + 168 + 131+ 150 = 736
राम के यूनिट कामध्यमान (M ) = ∑X / N = 736/5 = 147.2
N = माह की संख्या = 5
∑X = श्याम के यूनिट का योग = 232 + 243 + 254 + 212 + 249 = 1190
श्याम के यूनिट कामध्यमान (M ) = ∑X / N = 1190/5 = 238
2 – व्यवस्थितआंकड़ोंकामध्यमान [Mean of systematic data] –
अभी जिन आंकड़ों का मध्यमान ऊपर निकाला गया है वह सरल है क्योंकि सीमित अर्थात कम आंकड़ों का प्रयोग किया है जब आँकड़े बहुत ज्यादा होते हैं तो मध्यमान को अन्य विधियों द्वारा ज्ञात किया जाता है। विस्तृत, जटिल तथा व्यवस्थित आंकड़ों से मध्यमान ज्ञात करने की दो विधियाँ प्रचलित हैं।
मध्यमान (दीर्घविधिद्वारागणना) – दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
मध्यमान (M ) = ∑f. X / N
M = मध्यमान (Mean)
∑ = योग का चिन्ह
f = आवृत्ति
X = वर्गान्तर का मध्य बिन्दु
N = आवृत्तियों का योग
f. X = आवृत्ति और वर्गान्तर मध्यमान का गुणनफल
इस सूत्र के प्रयोग को निम्न उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है ।
उदाहरण /Example –
प्रश्न – निम्न आवृत्ति वितरण से दीर्घ विधि द्वारा मध्यमान की गणना कीजिए।
वर्ग अन्तराल
0-4
5-9
10-14
15-19
20-24
25-29
f
4
7
9
11
15
14
हल – उक्त प्राप्तांकों के अनुसार
वर्ग अन्तराल C- I
मध्य बिन्दु ( X)
आवृत्ति( f)
f. X
25-29
27
14
378
20-24
22
15
330
15-19
17
11
187
10-14
12
9
108
5-9
7
7
49
0-4
2
4
8
N = 60
∑f. X = 1060
दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
मध्यमान (M ) = ∑f. X / N
M = मध्यमान (Mean)
∑ = योग का चिन्ह
f = आवृत्ति
X = वर्गान्तर का मध्य बिन्दु
N = आवृत्तियों का योग
f. X = आवृत्ति और वर्गान्तर मध्यमान का गुणनफल
मध्यमान (M ) = ∑f. X / N
=1060 / 60
= 17.666
=17.67
मध्यमान (लघुविधिद्वारागणना) – दीर्घ विधि द्वारा गणना करने हेतु निम्न सूत्र का प्रयोग किया जाता है –
मध्यमान (M ) = A,M + (∑f. d / N) x i
M = मध्यमान (Mean)
A.M = कल्पित माध्य
∑ = योग का चिन्ह
f = आवृत्ति
d= कल्पित मध्यमान से विचलन
N = आवृत्तियों का योग
f. d = आवृत्ति और मध्यमान से विचलन का गुणनफल
उदाहरण /Example –
प्रश्न – निम्न आवृत्ति वितरण से लघु विधि द्वारा मध्यमान की गणना कीजिए।
जब समंक एकत्रीकरण में कोई अंक बार बार आता है या वह पुनः पुनः दीख पड़ रहा है इसे ही आवृत्ति नाम से जाना जाता है और जितनी बार वह अंक आता है उसे उसकी आवृत्ति कहा जाएगा। मान लीजिये शिक्षा शास्त्र की परीक्षा में 50 विद्यार्थियों को इस प्रकार प्राप्तांक प्राप्त हुए।
आवृत्ति वितरण को जब हम प्रदर्शित करते हैं तो ऊपरी और निचली वर्ग सीमा को तालिका के माध्यम से निरूपित करते हैं अर्थात यह प्रत्येक वर्ग की चौड़ाई ही होती है इस समूहीकृत आवृत्ति वितरण को समावेशी वर्ग अन्तराल के आधार पर क्रमबद्ध किया जा सकता है।
वर्गअन्तरालसूत्र :-
वर्ग अन्तराल = उच्चतम सीमा – निम्नतम सीमा
अर्थात वर्ग अन्तराल ज्ञात करने के लिए किसी वर्ग की उच्चतम सीमा से उसी वर्ग की निम्नतम सीमा को घटा देते हैं.
वर्गअन्तरालहेतुउदाहरण (Example for Class Interval) –
वर्ग अन्तराल को वास्तविक ऊपरी परास तथा निचली वास्तविक परास के मध्य जो जो वास्तविक अन्तर होता है उसे ही वर्ग अंतराल कहा जाता है इसे हम निम्न उदाहरण के माध्यम से अच्छी तरह समझ सकते हैं –
(यहाँ हम ऊपर प्रयुक्त समंकों का ही प्रयोग कर रहे हैं। )
वर्ग अन्तराल (Class Interval) or C I
आवृत्ति (Freequency) or f
40 – 50
14
50 – 60
6
60 – 70
3
70 – 80
23
80 – 90
4
इस उदाहरण के माध्यम से तथ्य पूर्णतः स्पष्ट हो गए होंगे।