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वाह जिन्दगी !

अभय से अपना नाता है ।/ Abhay se apna nata h.

March 11, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बचपन से भय रोपा जाता, वह ही वृक्ष बन जाता है,

जो डर उनपर थोपा जाता, वह डर घर कर जाता है,

परीक्षा का हौवा बन जाता, बालमन घबरा जाता है,

जो भी उन्हें बताया जाता वह सब डर में दबजाता है।

अभय से अपना नाता है, हाँ अभय से अपना नाता है ।1।

मातपिता का डर बन जाता भोला मन सहमा जाता है,

जो कुछ उन्हें बताया जाता वह सब डर में दब जाता है,

बचपन से जो भय रोपाजाता वह ही वृक्ष बन जाता है,

जो कुछ उन्हें बताने जाता, सब ही मन में रह जाता है।

अभय से अपना नाता है, हाँ अभय से अपना नाता है । 2।

अन्तर्मुखी व्यक्तित्व बन जाता सब मन में रह जाता है,

दुनियाँ से जो बाँटना चाहता अन्तर्मन में घुट जाता है,

बालक जब वयस्क बनता गुस्सा मन पर छा जाता है,

जिसने उसे डराया होता,  सब पर भारी पड़ जाता है।

अभय से अपना नाता है, हाँ अभय से अपना नाता है ।3।

प्रेम सौम्यसाधन बनता, ये  अभय बीज बन जाता है,

मार्ग सुमार्ग बनता जाता, अच्छा रास्ता बन जाता है,

जो भय ना करवा पाता वो प्रेम सहज करवा जाता है,

भय से रूखापन बढ़ता अपनापन प्रेम बढ़ा जाता है।

अभय से अपना नाता है, हाँ अभय से अपना नाता है । 4 ।

प्रेम प्रगति कारण बन जाता मार्ग विकास बन जाता है,

पथ का हर शूल खो जाता सरल मार्ग तब बन जाता है,

सारा पतन भाव दब जाता, समत्व भाव बढ़ता जाता है,

जो अब तक था दूर भागता वो सब घर वापस आता है।

अभय से अपना नाता है, हाँ  अभय से अपना नाता है । 5 ।

दम्भ सुगंध ना फैलापाता, प्रेम सुरभि फैला जाता है,

यह है हर रस का दाता उसका प्रश्रय बढ़ता जाता है,

आनन्द का दर्शन हो जाता परमानन्द सहज भाता है,

भय होता घमंड प्रदाता’नाथ’ अभय सिखला जाता है।

अभय से अपना नाता है, हाँ अभय से अपना नाता है । 6 ।

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काव्य

कमियों का क्षरण कर दो।

March 6, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

बन जाओ शक्ति मेरी

जीवन को सबल कर दो।

ना कोई क्रन्दन हो

शुभ कर्म का अभिनन्दन।

सद्कर्म करे कोई

तो दिखता अच्छा मन।

नयी लीक पकड़ कर तुम

रूढ़ि का अन्त कर दो।

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

मानव का स्वार्थीपन

ना दीखे इस जग में।

सब कुछ खोकर अपना

बस प्रीत प्रबल कर दो।

बस प्रीत प्रबल कर दो।

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

अवसर छीने हमसे

हमें जो भी लगे अच्छे

सब सफल हुए अबतक

हम हो न सके अच्छे।

प्रभु साथ हमें देकर

जीवन को सफल कर दो।

बनकर नैतिकता तुम

कमियों का क्षरण कर दो।

बन जाओ शक्ति मेरी

जीवन को सबल कर दो।

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वाह जिन्दगी !

सद्कर्म करना चाहिए।

March 5, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जीवन में एैसे कर्म का वरण करना चाहिए,

सर्वजन कल्याण हो, वह कर्म करना चाहिए,

अपने लिए अपनों के हित कर्म करते हैं सभी,

विश्व का कल्याण मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

पुरुष हैं पुरुषत्व का ही वरण करना चाहिए,

लिङ्ग भेद कारण ना बने कर्म करना चाहिए,

स्वजन के उत्थान हित, तो काम करते हैं सभी,

जगत कल्याणार्थ हमको करम करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

रक्त बह चुका बहुत, रस धार बहना चाहिए,

कटुताप्रश्रय है बहुत सदवचन कहना चाहिए,

क्रोध का अवलम्ब ले सर गरम करते हैं सभी,

करुणा रस आधार ले आचरण करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

प्रत्येक रोम महन्त हो वह सन्त बनना चाहिए,

घृणा प्रसरण हो नहीं यह धरम बनना चाहिए,

अपने ज़रा से कार्य पर हम गर्व करते हैं सभी,

कर्मफल जिनका जगत उसे नमन करना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

भ ग व अ न के अर्थ का प्रसार करना चाहिए,

भू गगन वायु अगन नीर पावस रहना चाहिए,

अपने अपने ईश को ले, क्यों झगड़ते हैं सभी,

ईश्वर सभी का एक है, यह मान लेना चाहिए।

धर्मअर्थ काममोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।।

त्रितापहारिणी शक्ति शिव मनन करना चाहिए,

दैहिक,दैविक,भौतिक ताप हरण करना चाहिए,

अर्थ शिव कल्याण है क्यों अनजान बनते हैं सभी,

सकल जग कल्याण हित ही करम करना चाहिए।

धर्म अर्थ काम मोक्ष हित सद्कर्म करना चाहिए।

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वाह जिन्दगी !

प्रगति अवरोध नहीं बनते।

March 2, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ऐ मित्र मित्रता करके हम घाती व्यवहार नहीं करते,

विश्वास में ले पीठ पीछे, खञ्जर का वार नहीं करते।

हम बच्चे भारत माता के, मरयादा हनन नहीं करते,

टुकड़े वाली धारा का हम, चिन्तन मनन नहीं करते।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

यलगारों वाली धारणा के, बिलकुल साथ नहीं रहते,

राष्ट्रवाद के संवाहक हम, द्रोही व्यवहार नहीं करते।

हम बेटे हिन्दुस्तान के लुकछिप कर वार नहीं करते,

सिद्धान्त नहीं अपने छलके,  हल्की बात नहीं करते।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

देश में देश द्रोही फिरके हम उनको माफ़ नहीं करते,

मातृशक्ति का वन्दन करके ढोंगी व्यवहार नहीं करते।

मरने मिटने वाले तबके स्वप्निल व्यापार नहीं करते,

देशद्रोही विषबेलों के जड़ बीज संरक्षित नहीं करते।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

करनी भरनी निर्णय करके हम पुनर्विचार नहीं करते,

मृत्यु दण्ड वाले हक़ के विरुद्ध व्यवहार नहीं करते,

हम सब छल छन्द फरेबों के पक्ष में बात नहीं करते,

दुष्टों की गलत धारणा के, राष्ट्र वादी साथ नहीं रहते।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

राष्ट्र का ध्वजवन्दन करके हम गन्दे भाव नहीं रखते,

जो भी देश द्रोही भाव रखे हम उसको माफ़ करते।

भोलेभाले सद्भावों के खिलाफ विषवमन नहीं करते,

रखवाले हम सिद्धान्तों के हम झूठी बात नहीं करते।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

हम लय बद्ध प्रगति करके भद्दे जज्बात नहीं करते,

शुभकामनायें अर्पित करके वैरी सा भाव नहीं रखते,

मतवाले हम देश प्रेम के दुश्मन सा भाव नहीं रखते,

देश का खाके पलबढ़ के हम किसी से रार नहीं रखते।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

पूजक हैं हम मातृ भूमि के द्रोही को प्यार नहीं करते।

संहारक हैं हम दुश्मन के किसी का उधार नहीं रखते,

कृतज्ञ भाव के प्रतिपादक हैं, कृतघ्नता भाव नहीं रखते,

समृद्धि राष्ट्र कारक बन कर, ऊर्जस्वी भाव नहीं तजते ।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

मनस्विता आलम्बन बनकर, कोई दुरभाव नहीं रखते,

आराधक महाकाल बनकर कामी सा भाव नहीं रखते।

ज्ञान सागर का मन्थन कर, रत्नों को पास नहीं रखते,

प्रकृति से सब कुछ पाकर, सब अपने पास नहीं रखते।

स्वराष्ट्रधर्म के संवाहक हम प्रगति अवरोध नहीं बनते।।

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वाह जिन्दगी !

व्यक्तित्व / PERSONALITY

February 8, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

व्यक्तित्व वह है जो हैरान परेशान न हो,

छोटीछोटी बात पर कोई घमासान न हो,

चन्दा सूरज में भी लगे है इक बार ग्रहण,

सोच को बदलती चाल से नुकसान न हो।

सोच गुलजार रहे उस में शमशान न हो,

जो प्रगति शील न हो ऐसा उनवान न हो,

यूँ विभीषण ने भी ली थी इक बार शरण,

हो सब हो मगर बौद्धिक अवसान न हो।

किसी बेगैरत पर, यूँ ही मेहर बान न हो,

और याद रहे जरूरतमन्द परेशान न हो,

याद आते, ऐसे लोग जिन्दगी  में हर क्षण,

भले ही उनके पास एक भी मकान न हो।

शब्द मधुर ही रहे भाषा बदजुबान न हो,

ईमान कायम रहे व्यवहार बेईमान न हो,

यूँ आम हो चला है बद नीयती का चलन,

नर्क न बने जीवन, इस लिए गुमान न हो।

सोच बदलो, बे बात ही हलकान मत हो,

चिन्तनद्वार खोलो अगर रोशनदान न हो,

बदलती रहती है दुनियाँ तो क्षणप्रतिक्षण,

व्यक्तित्व है तब गर सोच बियाबान न हो।

पल न गुजरें ऐसे,अधरों पर मुस्कान न हो,

काम अच्छे करो, भले जान पहचान न हो,

गुजर जाने पर रात, आती सूर्य की किरण,

नाथ लगे रहना अनवरत नाम हो या न हो।

व्यक्तित्व वह है जो हैरान परेशान न हो ।

छोटीछोटी बात पर कोई घमासान न हो ।

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वाह जिन्दगी !

जिन्दादिली से जिन्दगी जीता रहा हूँ मैं।

March 9, 2019 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जीवन भर गीली लकड़ी सा सुलगता रहा हूँ मैं,
जमाने के सारे दर्दो – ग़ुबार समझता रहा हूँ मैं,
आत्मघाती तत्वों के ताप से, पिघलता रहा हूँ मैं,
फिर भी दुरुस्त होशोहवास में चलता रहा हूँ मैं ।

मानस-पटल पर छाई धुन्ध से लड़ता रहा हूँ मैं,
सत्य की हिमायत हित सदा,तड़पता रहा हूँ मैं,
ग़म मजदूर और किसानों के लखता रहा हूँ मैं,
फिर भी जहरीले घूँट पी कर, जिन्दा रहा हूँ मैं।

लोभलालच के अन्धड़ों से उलझता रहा हूँ मैं,
ईमान औ लगन की दौलत से,पलता रहा हूँ मैं,
वक़्त के जन्जालों में, अन्य का मुहरा रहा हूँ मैं,
फिर भी वक़्त की तब्दीलियाँ, सहता रहा हूँ मैं।

आँसू औ मुस्कान के फलसफे पढ़ता रहा हूँ मैं,
युवा दिशाबोध का सार्थक प्रयास कर रहा हूँ मैं,
जमाने की टीस, रुसवाईयों से रिसता रहा हूँ मैं,
फिर भी फकीरी की मस्तचाल चलता रहा हूँ मैं।

पैमाइश,आजमाईश के दौर में तपता रहा हूँ मैं,
हालात की दुरूह थापों पर, मटकता रहा हूँ मैं,
बेरोजगारी,भूख के आलम में भटकता रहा हूँ मैं,
फिर भी जला खुद को, मशाल बनाता रहा हूँ मैं।

पाकर आपका असीम दुलार, संवरता रहा हूँ मैं,
मुख़्तलिफ़ दौर के विचारों से टकराता रहा हूँ मैं,
कूप मण्डूक विचार जकड़न सेभिड़ता रहा हूँ मैं,
फिर भी संकीर्ण कालिमा से निकलता रहा हूँ मैं।

समस्याएं इस दौरे दुनियाँ की लपकता रहा हूँ मैं,
समाधान की सौम्य तलाश में, उलझता रहा हूँ मैं,
देखकर बेबसी इस देश की, सिसकता रहा हूँ मैं,
फिर भी पुष्प पंखुड़ी मानिन्द, बिखरता रहा हूँ मैं।

काल के कण्टकाकीर्ण पथ का,प्रवक्ता रहा हूँ मैं,
गहन अँधेरे छाँटने के प्रयास में जलता रहा हूँ मैं,
विश्वबन्धुत्व सिद्धान्त का हरदम कायल रहा हूँ मैं,
फिर भी राष्ट्रवाद के उत्थान को, लड़ता रहा हूँ मैं।

रंग बदलते चेहरों का विज्ञान, तकता रहा हूँ मैं,
कलुषता पर पावस लबादा, निरखता रहा हूँ मैं,
खासअपनों से मिले जख्म को ढकता रहा हूँ मैं,
फिर भी जिन्दादिली से जिन्दगी जीता रहा हूँ मैं।

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वाह जिन्दगी !

कर्मवीर,दृढ़निष्ठा से हर मुहूर्त शुभ कर लेता है।

February 2, 2019 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

वक़्त अपनी ताक़त का अहसास करा देता है,
चाँद और सूरज को भी वो ग्रहण लगा देता है,
इंसान वह है जो हरहालात से टक्कर लेता है,
विषमता को अपने होने का बोध करा देता है।

ब्रह्मा कुछ रचकर, मानव के हाथ नहीं देता है,
मानव जो कुछ लेता,कर्म प्रति-फल में लेता है,
सब कुछ पाने हेतु जगत में एक रस्ता होता है,
धीर पुरुष करके प्रयास बस मार्ग बना लेता है।

का पुरुष रो रोकर, अपना काल, गँवा देता है,
अपने साथ जुड़े स्वजनों की नाव डुबो देता है,
आत्मबली इतने क्षण में, तस्वीर बदल देता है,
काल पे कब्जा कर सुखद संसार बना लेता है।

ईर्ष्या-द्वेष को पाल जी का जंजाल बना लेता है,
ऐसा मानव ग़म का अपना संसार बना लेता है,
दुःख-सुख को जो धैर्य से छांवधूप मान लेता है,
जीवन आवर्तन हैं ये सहज,समत्व भाव लेता है।

यूँ तो राग भैरवी सुबह का सुबोध करा देता है,
पर यही कार्यक्रम समापन का सन्देश देता है,
अतः विज्ञपुरुष मुहूर्त का भ्रमजाल नहीं लेता है,
कर्मवीर,दृढ़निष्ठा से हर मुहूर्त शुभ कर लेता है।

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Uncategorized•काव्य

मूँछों का सफल अहसास रहने दो/Munchon ka safal ahsaas rahne do.

September 28, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

किसी भी देश का उत्थान और पतन उस देश के चिन्तन से प्रत्यक्षतः प्रभावित होता है लेकिन चिन्तन की दिशा राष्ट्रवादी करने के लिए कुछ सिद्धान्तों ,मर्यादाओं ,परम्पराओं ,स्तिथियों को ख़ास प्रकार का रहने की आवश्यकता परिलक्षित होती है प्रस्तुत हैं सन्दर्भित भावनाएँ :-

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काव्य

बैठ चिता पर हवन न होते हैं।[BAITH CHITA PR HAWAN N HOTE HEAN]

September 20, 2018 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

खुलीआँखों देखकर सपना लक्ष्य संजोते हैं।
लक्ष्य प्राप्त करने की धुन में जुनूनी होते  हैं।
स्थाई जीवन  की चाह में नही रोते- धोते  हैं।
सफलता  हेतु लगन व  निष्ठा साथी होते  हैं।

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