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शिक्षा

विश्व विद्यालय की परीक्षा में अच्छे अंक कैसे प्राप्त करें /How to get good marks in university exam?

April 5, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आज जो परिचर्चा आपके समक्ष प्रस्तुत है उसका मूल उद्देश्य विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में अच्छे अंकों की प्राप्ति से है। ध्यान रहे यह परिचर्चा स्नातक, परास्नातक और प्रशिक्षण कार्यक्रम को ध्यान में रखकर की जा रही है। कोरोना काल में प्रश्नों की संख्याऔर समय में जो कमी की गयी थी वह सामान्य स्थिति में पुनः पहले जैसी रहेगी अर्थात वही तीन घण्टे वाला प्रश्नपत्र। यहाँ पूछे गए प्रश्नों के आधार पर प्रभावी उत्तर लेखन (प्रस्तुतीकरण) सम्बन्धी मत दिए जा रहे हैं जिससे निश्चित रूप से अच्छे अंक प्राप्त होंगे।

A -दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [Long Answer Type Question]

B – लघु उत्तरीय प्रश्न [Short Answer Type Question] 

C – शब्द संख्या वाले प्रश्न [word count question]

D – अति लघु उत्तरीय प्रश्न [Very Short Answer Type Question]

A –दीर्घ उत्तरीय प्रश्न [Long Answer Type Question] –

1 – प्रश्न सावधानी से पढ़ें और केवल पूछी गई बात का ही उत्तर दें अनावश्यक नहीं।

2 – प्रश्न में ध्यान से देखें क्या अंक विभाजन दिया गया है ?यदि हाँ ,तो उत्तर उसी आधार पर लिखा जाना चाहिए। यदि 16 अंक के प्रश्न में 4 +6 +6  लिखा है तो उत्तर में इस अनुपात का ध्यान रखकर प्रभावोत्पादकता सृजित करनी है।

3 – बड़ा बड़ा लिखकर पृष्ठ भरने का अनर्गल प्रयास कदापि न करें। सम्यक लिखें।

4 – परीक्षक को धोखा देने का कोई प्रयास न करें अपने ऊपर और अपने लेखन कौशल पर नियन्त्रण रखें। रटे हुए शीर्षक की जगह प्रश्न में पूछे गए तथ्यों को शीर्षक के रूप में प्रयोग करें।

5 – अपनी बात के समर्थन में विद्वानों के उद्धरण ( Quotes ) या तथ्यात्मक तर्क(Logic) दें। इन्हें अलग रंग की स्याही से लिख सकते हैं (वर्जित रंग को छोड़कर), रेखांकित(Under Line ) भी किया जा सकता है।

6 – स्वयम् बनाकर उद्धरण (Quotation) न लिखें यह विद्वान् परीक्षकों द्वारा सहज ही पकड़ लिए जाएंगे और आपके सम्पूर्ण मूल्यांकन पर विपरीत प्रभाव डालेंगे।  

7 – उद्धरण को इस तरह लिखें कि वह स्पष्ट नज़र आये यद्यपि आज डॉट पेन या बाल पेन से लिखने का चलन है लेकिन यदि आप इंक पेन या निब वाले पेन से लिखने के अभ्यस्त हैं तो इससे लिखें यदि प्रतिबन्ध नहीं है।

8 – कोई ऐसा अवसर नहीं छोड़ना है जिससे प्रभाव पैदा किया जा सके।

9 – वास्तव में आपके नोट्स ही वह अवलम्ब हैं जो आपको संतुलन या सकारात्मकता प्रदान करते हैं।

10 – योजना, प्रदर्शन, परिमार्जन का चक्र आपके प्रश्नोत्तर लिखने के कौशल में निरन्तर सुधार करेगा।

B – लघु उत्तरीय प्रश्न [Short Answer Type Question] –

1 – लघु उत्तरीय प्रश्न हल करने में ध्यान रखना है कि अति अल्प में प्रभाव पैदा करना है।

2 – केवल उतना ही लिखें जो प्रश्न की मांग हो।

3 – उत्तर बिन्दुवार लिखने का प्रयास करें।

4 – यदि प्रश्न में चार कारण या पाँच उपाय जो व जितना पुछा है उतना ही लिखें।

5 – समय के साथ यथायोग्य साम्य रखें।

6 – गागर में सागर भरने का प्रयास करें लेकिन जितने अंक का प्रश्न है उसी के अनुसार लिखना है।

C – शब्द संख्या वाले प्रश्न [word count question]-

कभी कभी प्रश्न अपने उत्तर हेतु शब्द संख्या का निर्देश साथ लेकर आता है और इसी से उसके आकार का पता चलता है पुछा जा सकता है कि 2000 शब्दों में उत्तर दें या 100 शब्दों में लिखें।

उक्त स्थिति में आपके द्वारा लिखे एक पंक्ति के शब्दों को गईं लीजिये और उसके आधार पर तय कीजिये की उत्तर कितने स्थान में देना है।

उदाहरण स्वरुप यदि मैं एक पंक्ति में औसतन 10 शब्द लिखता हूँ तो 100 शब्दों हेतु 10 पंक्तियाँ पर्याप्त हैं इससे थोड़ा बहुत ज्यादा हो सकता है पर कई पृष्ठ लिखना असंगत होगा।

 पूरे उत्तर के शब्द गिनने में समय बरबाद न करें पहले ही अन्दाज विकसित करें घर पर लिखकर भी ठीक विचार कर सकते हैं। प्रश्न पात्र बांटने से पहले पृष्ठ की पंक्तियाँ गिन सकते हैं।

शब्द सीमा देने का सीधा आशय यह होता है कि प्रश्न के अनुसार उत्तर की चाह स्पष्ट की गयी है।

D – अति लघु उत्तरीय प्रश्न [Very Short Answer Type Question]-

कतिपय विश्व विद्यालय सभी तरह के प्रश्न ,प्रश्नपत्र में शामिल करते हैं जिससे अधिक से अधिक पाठ्य क्रम का प्रतिनिधित्व प्रश्न पात्र कर सके। इसमें अति लघु उत्तरीय प्रश्न विशिष्ट भूमिका का निर्वहन करते हैं। यह संक्षेप में उत्तर की माँग, एक शब्द में उत्तर की माँग या बहु विकल्पीय प्रकार के हो सकते हैं।

इनका उत्तर लिखने में स्पष्टता एक विशेष गुण है जिस खण्ड या भाग का यह प्रतिनिधित्व करते हैं वह लिखें ,और प्रश्नपत्र में इनके लिए निर्धारित प्रश्न नम्बर का उल्लेख करें व प्रश्न की प्रकृति के अनुसार उत्तर लिखें।

अन्त में यह अवश्य कहूँगा की प्रश्न पात्र प्रारम्भ होने से ठीक पहले ित्तरों को लेकर कोइ बहस न करें शांत चित्त से आत्म विश्वास से युक्त होकर परीक्षा कक्ष में जाए प्रसन्न रहें और प्रसन्न रहने दें अनायास किसी से न उलझें क्षमा करें, क्योंकि समय केवल आपका जाया होगा।

परीक्षा हेतु समस्त राष्ट्रीय ऊर्जाओं को हार्दिक शुभ कामना।

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शिक्षा

मूल्य और समाज (VALUE AND SOCIETY)

April 4, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मूल्य का अर्थ (Meaning of value) –

मूल्य शब्द अंग्रेजी के value शब्द का समानार्थी है यह लैटिन भाषा के Valare शब्द से बना है और इसका अर्थ है योग्यता या महत्त्व। इसे संस्कृत में इष्ट कहा जाता है इष्ट का अर्थ है “वह जो इच्छित है।” वास्तव में मूल्य वह मानदण्ड हैं जिसके द्वारा लक्ष्यों का चुनाव किया जाता है मूल्य एक व्यवस्था है मूल्य यथार्थ तथा आदर्श के विभेद के मध्य संयोजक की भूमिका का निर्वहन करते हैं मूल्यों का बोध विवेक शक्ति उत्पन्न होने पर ही सम्भव होता है। मूल्य चाहे व्यावहारिक हों या आदर्शवादी, पारमार्थिक हों या नैतिक। यह सभी मानव को नैतिक जीवन जीने में सहायक होते हैं।

मूल्य सम्बन्धी भारतीय दृष्टिकोण –

भारतीय मनीषियों ने मानवीय मूल्यों की विवेचना  के कल्याण की कामना करते हुए की है हमारा आदर्श है गरुण पुराण के यह शब्द –

सर्वे भवन्तु सुखिनः।      

सर्वे सन्तु निरामयाः ।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।

मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत् ॥

भारतीय मनीषियों ने मूल्य के लिए पुरुषार्थ शब्द का प्रयोग किया है इनके आधार पर मूल्य इस प्रकार हैं –

भारतीय मूल्य

(1) – आध्यात्मिक मूल्य(Spiritual Value)  मोक्ष Self Perfection

(2) – लौकिक मूल्य (Empirical value)- धर्म (Virtue),  अर्थ (Wealth), काम(Pleasure)

 यहाँ यह कहना प्रासंगिक होगा कि अर्थ और काम वही नैतिक जो धर्मयुक्त हो।  

मनु स्मृति धर्म पथ को मूल्य अनुगमन स्वीकारती है इनके अनुसार  धर्म के गुणों का धारण करने वाला ही मूल्य संरक्षक है इनके अनुसार-

इसे सुनें

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ।

अर्थात्:— धर्म के ये दस लक्षण होते हैं:- धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन को अधर्म से हटा कर धर्म में लगाना) अस्तेय (चोरी न करना), शौच (सफाई), इन्द्रियनिग्रह, धी (बुद्धि), विद्या, सत्य, अक्रोध (क्रोध न करना)।

इन दस गुणों से युक्त व्यक्ति धार्मिक है शिक्षोपरान्त आचार्य शिष्य को उपदेश देता था –

सत्यं वद धर्मं चर स्वाध्यायान्मा प्रमदः

अर्थात सामाजिक गृहस्थ जीवन में  सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में आलस्य मत करो।और इस प्रकार मूल्यों को दिशा दी गयी है।

यद्यपि चार्वाक दर्शन सुखवादी है। वह साधन और साध्य में अन्तर नहीं मानता। वह साध्य को सदैव सुख मानता है चार्वाक अर्थ और काम दो ही मूल्य मानता है। खाओ पीओ और मौज करो यही उसके मूल्य हैं जब कि अन्य दार्शनिक काम को निम्न कोटि का मूल्य मानते हैं।

पाश्चात्य दृष्टिकोण –

प्लेटो के अनुसार

1 – मूल्य बुद्धि ग्राह्य है न कि इन्द्रिय ग्राह्य पदार्थ

2 – मूल्य और सात का मौलिक अभेद है

3 – मूल्य निरपेक्ष, नित्य स्वरुप सत विषय है 

4 – ज्ञान का परायण क्षेय और क्षय में श्रेष्ठता का सम्पर्क अथवा प्रमाण 

5 – भौतिक और सामाजिक स्तर पर वस्तु का द्योतक वस्तु की नियत रूपता एवम् उसके घटकों का परस्पर          अवरोध मूल्य है।

ह्यूम और सिजविक ने “मनुष्य के नैतिक जीवन को द्वन्दात्मक प्रवृत्तियों का विकास निरूपित कर स्वार्थ और परमार्थ के सहज बोध को मूल्य की संज्ञा दी है।”

अर्बन के अनुसार – “मूल्य वह है जो मानव इच्छाओं की तुष्टि करे। ”

जेम्सवार्ड ने मूल्य को इच्छाओं की सन्तुष्टि करने वाली वस्तु बताया है इच्छा की पूर्ति से सुख का अनुभव होता है इस प्रकार सुखानुभूति में मूल्य की अनुभूति होती है।

हॉफ डिंग के अनुसार -“मूल्य वस्तु या विचार में निहित वह गुण है जिससे हमें तात्कालिक सन्तुष्टि मिलती है या उस संतुष्टि के लिए साधन मिलता है। ”

मूल्यों का सङ्कट (VALUE CRISIS )

आज मूल्य परक अवधारणा में बदलाव आ रहा है पुराने भारतीय मूल्य लुप्त हो रहे हैं हमारी मान्यताएं परम्पराएं और प्राथमिकताएं बदल रही हैं हम आध्यात्मिकता को नकार कर पाश्चात्य जगत के जीवन मूल्यों और उनकी भौतिकवादी सभ्यता को अपनाते जा रहे हैं हमारे जीवन मूल्यों का क्षरण हो रहा है प्रसिद्द अर्थशास्त्री ग्रेशम का नियम है कि

  “खोटा सिक्का अच्छे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है। ”

हमारे मूल्यों पर ग्रेशम का नियम पूरी तरह लागू हो रहा है इन मूल्यों के क्षरण के पीछे निम्न कारण उत्तरदाई हैं। –

1 – आधुनिकता का प्रभाव

2 – पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण

3 – भौतिकता वादी सभ्यता के प्रति अप्रत्याशित मोह

4 – अनीश्वरवादी प्रवृत्ति

5 – तर्क प्रधान चिन्तन

6 – वैज्ञानिक प्रवृत्ति का अधकचरा विकास 

क्षरण की इस प्रवृत्ति के बावजूद मानवीय मूल्यों का ह्रास हुआ है नाश नहीं। अवश्य ही वे दब गए हैं परन्तु नष्ट नहीं हुए। भारतीय संस्कृति आज भी जीवित है जबकि यूनान मिश्र और रोम की संस्कृतियां विलुप्त हो गईं। भारतीय संस्कृति अपनी प्राचीन धरोहर के रूप में मूल्यों को आज भी संचित किये हुए है।

उभरते सामाजिक सन्दर्भ में मूल्य (Values in Emerging Social Context) –

आज देश को अपने सामाजिक ढाँचे को मजबूत करने की सर्वाधिक आवश्यकता महसूस हो रही है देश द्रोही शक्तियां येन केन प्रकारेण इसमें सेंध लगाकर मूल्यों को छिन्न भिन्न करने का हर सम्भव प्रयास कर रही हैं। उभरते सामाजिक सन्दर्भ में निम्न आधारित मूल्यों का सृजन व संरक्षण करना होगा।

1 – समता आधारित

2 – ममता आधारित

3 – दया, करुणा आधारित 

4 – समय आधारित

5 – संविधान आधारित

6 – राष्ट्रवाद आधारित

7 – आदर्श स्थापन

8 – विवेक आधारित

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वाह जिन्दगी !

हम भुला न पाते हैं।

April 2, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।।

यहाँ इस शहर में बहुत मॉल नज़र आते हैं

कृत्रिमता युक्त चेहरे सौम्य न लग पाते हैं,

खो गयीं निमकौरियाँ पावन सी अमराइयाँ

पसीने से सरोबार कई चेहरे याद आते हैं। 

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।1।

खेत की पगडण्डियाँ फिर हमें बुलाते हैं

नंगे पैर चलने की अनुभूतियाँ जगाते  हैं

वर्षा की रिमझिम व मिट्टी की सुगन्धियाँ

आज भी हम को मौन रह कर बुलाते हैं।  

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।2

वो पुराने मञ्जर सुख -दुःख याद दिलाते हैं ,

भूलने की कोशिश की पर भुला न पाते हैं,

वो मेले, वो प्यारे दंगल और वो कबड्डियाँ

आज भी जेहन को खुशनुमा पल लौटाते हैं।  

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।3।

अब ना किसी मैदान में हम पतँग उड़ाते हैं

गुल्ली डण्डा, आइस पाइस कल की बातें हैं

खो गया सब कुछ वो चौपाल की कहानियाँ

टॉकीज में बैठ भी वो सब दिन याद आते हैं     

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।4।

वो रैले, वो झमेले, वो तबेले याद आते हैं

वो सरसों के पीत पुष्प क्यों हमें बुलाते हैं

नहीं भूल पाते चूल्हे चक्की वाली रोटियाँ

ओवन, ए० सी०, फ्रिज कत्तई न भाते हैं।   

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।5।

धीरे – धीरे हम सब यूँ ही बड़े हुए जाते हैं,

वो डालें, वो झूले, नहीं अब हमें बुलाते हैं

वो बरगद, पीपल, शीशम की परछाइयाँ

वो वृक्ष अपने साथी थे बहुत याद आते हैं।    

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।6।

वो लोरियाँ वो सावन गीत झुरझुरी जगाते हैं,

निःस्वार्थ उपजे अनमोल रिश्ते याद आते हैं,

किसी घर में घुस खाई हुई प्यारी चपातियाँ

उस ममता समता से अब अलग हुए जाते हैं।

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।7।

गेंदतड़ी चोरसिपाही सब खेल याद आते हैं,

बगिया में लबासादिया हम भुला न पाते हैं

वो नहर में तैरना और भोली सी बदमाशियाँ

खो गए वो सारे दिन अब साये नज़र आते हैं 

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।8।

बचपन मोबाइल में व्यस्त अब हम पाते हैं,

दौड़ धूप के खेल मोबाइल में खेल पाते है,

बहुत कुछ छूटता इनसे आती हैं बीमारियाँ,

पसीने की कहानियाँ ए ० सी ० में सुनाते हैं।     

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।9।

आज भी कुछ फूल पत्ते किताबों में पाते हैं

ये सब किस्से, यादों की बारात ले आते हैं,

आज भी याद हैं कुछ दीवाने व दीवानियाँ,

पत्नी के गुस्से के कारण हम बाँट न पाते हैं।        

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।10।

बचपन की किताबों की यूँ बहुत सी बातें हैं

वो सारी यादगार आज भी बाँट नहीं पाते हैं

बुजुर्ग सुनाते थे निज बचपन की कहानियाँ

हम नहीं कह पाते, अन्तर दिल जलाते हैं।          

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।11।

आजकल बिन बात के भी हम मुस्कुराते हैं,

बचपन के ठहाके मगर बहुत याद आते हैं,

वो कञ्चे, रस भरी वो सब्जी वाले, वालियाँ

जिन्हें हम भूलना चाहें वो जमकर याद आते हैं।          

छुटपन वाले दर और दीवार नज़र आते हैं

बचपन की कई घटना हम भुला न पाते हैं।12।

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वाह जिन्दगी !

सच्चाई की राह

March 30, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जब मेरा जन्म हुआ तब तक मेरा परिवार निर्धनता की श्रेणी में आ चुका था पिताजी उस समय एक शुगर फैक्ट्री में फिटर की हैसियत से कार्य  रहे थे मेरे पढ़ने के लिए वहाँ 12वीं तक विद्यालय था जिसे पूरा कर आगे पढ़ाना हालाँकि चार बच्चों वाले परिवार में विलासिता जैसा था लेकिन मेरे माता पिता ने जीवटता का परिचय दे आगे पढ़ाने का निश्चय किया। अपने स्नातक अध्ययन के दौरान कुछ धनार्जन कर परिवार का सहयोग करने की इच्छा बलवती हुई। तमाम प्रयास के बाद कोई आय का निश्चित साधन नहीं बन पा रहा था।

            एक दिन मैं अत्याधिक चिन्ता से व्यथित फैक्ट्री कालोनी में अपने दरवाजे पर मूढ़ा डाले बैठा था अचानक मुझे अपने एक परिचित का ध्यान आया जो गलत तरीके से चोरी, डकैती व ठगी के माध्यम से पैसे कमा रहा था और हमेशा उसकी जेब रुपयों से भरी रहती थी मैं उसके साथ काम करने के लिए उससे बात करने की सोचने लगा तभी मेरे से एक घर पहले रहने वाले मेरे इण्टर मीडिएट वाले प्रधानाचार्य जी आ गए उन्होंने मुझे चिन्तामग्न देखकर अपने पास बुलाया और परेशानी का कारण जानना चाहा मैंने सच सच जो मेरे मन में आ रहा था सब बता दिया। उन्होंने मुझे अपनी बैठक में बैठने का आदेश दिया।

            मैं स्वचलित यन्त्र सा उनके समक्ष बैठा था उन्होंने धीमी प्रभावशाली आवाज में मुझसे कहा कि तुम्हारे भविष्य की बहुत सकारात्मक सम्भावनाएं मुझे दीख पड़ती हैं मैंने तुममें एक अच्छे वक्ता और कवि के लक्षण देखे हैं मेर विद्यालय में तुम 7 वर्ष पढ़े हो,जहां तक मैं समझता हूँ तुम एक मेधावी छात्र हो और जिन लोगों के बच्चों को तुम आजकल पढ़ा रहे हो वो सब तुम्हारी तारीफ़ करते हैं क्या तुम किसी दूसरे का धन छीन सकोगे किसी अन्य को दुखी करके  खुद सुख प्राप्त कर सकोगे किसी अन्य की मेहनत की रोटी छीनकर स्वयम् खा सकोगे।

            मैं अवाक रह गया किंकर्त्तवय विमूढ़ता की स्थिति में मैंने सुना वे मुझसे पूछ रहे थे यदि तुम्हें कहीं जाने के लिए टिकट खरीदना हो और दो जगह से टिकट मिल रहे हों एक जगह  लगभग तीन सौ  लोग लाइन में हों और दूसरी जगह तीन तो किससे टिकट लेना पसन्द करोगे। मैंने शान्तिपूर्वक उत्तर दिया जहाँ तीन लोग खड़े हैं उन्होंने तुरन्त पुछा, क्यों ? मैंने कहा वहाँ जल्दी नम्बर आएगा और दूसरी जगह से तो टिकट मिलते मिलते ट्रेन छूट भी सकती है।

            प्रधानाचार्य जी मुस्कुराए और बोले यहाँ चोरों, डकैतों, ठगों, भ्रष्टाचारियों, बेईमानों और दुष्टों की बहुत लम्बी लम्बी पंक्तियाँ लगी हैं यदि उस लाइन में लग गए तो इस जन्म में तुम्हारा नंबर आ पाएगा इसमें संशय है दूसरी ओर सत्यनिष्ठ, ईमानदार और कर्त्तव्यनिष्ठ लोगों की लाइन बहुत छोटी है जहां तुम सच्चाई और लगन से अपनी पहचान बना सकते हो।

उन्होंने बताया एक बार इन्दिरा गाँधी ने भी कहा था -“मेरे दादाजी ने एक बार मुझसे कहा था कि दुनियाँ में दो तरह के लोग होते हैं वो जो काम करते हैं और जो श्रेय लेते हैं,उन्होंने मुझसे कहा कि पहले समूह में रहने की कोशिश करो वहाँ बहुत कम प्रतिस्पर्धा है।”

            प्रधानाचार्य जी की बातों ने मेरी तन्द्रा तोड़ दी थी मुझे लग रहा था की किसी ने झकझोर कर मुझे जगा दिया था उसी दिन से मैंने सच्चाई और कर्त्तव्य परायणता का जो पाठ सीखा उसी की बदौलत आज कई विषय में स्नातकोत्तर, एम० एड० ,नेट पीएच डी आदि करके एक प्रतिष्ठित पी ० जी ० महाविद्यालय में प्राचार्य पद पर हूँ और मेरी कवितायें व वादविवाद परिक्षेत्र में जीता गया स्वर्णपदक मुझे अपने प्रधानाचार्यजी द्वारा बताई सच्चाई की राह पर चलने की अनवरत प्रेरणा देता है।

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शिक्षा

सामाजिक गतिशीलता Social Mobility 

March 23, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

परिवारों,व्यक्तियों,और अन्य स्तर के लोग जब समाज के एक वर्ग से दूसरे वर्ग में गति करते हैं तो इसे सामाजिक गतिशीलता कहते हैं इससे उसकी सामाजिक स्थिति में बदलाव हो जाता है। अर्थात एक सामाजिक स्थिति से दूसरी सामाजिक स्थिति को प्राप्त करना सामाजिक गतिशीलता कही जाती है।

मिलर और वूक के शब्दों में –

“व्यक्तियों अथवा समूह का एक सामाजिक  दूसरे  संचलन होना ही सामाजिक गतिशीलता है।”

“Social mobility is a movement of individuals or group from one social class stratum to another.”

पी ०सोरोकिन महोदय के अनुसार –

“समाजिक गतिशीलता का अर्थ समाजिक समूहों एवं सामाजिक स्तरों में किसी व्यक्ति का एक सामाजिक स्थिति से दूसरी सामाजिक स्थिति में पहुँच जाना है। ”

By social mobility is meant any transition of an individual from one social position to another in constellation of social group and strata.”

कार्टर वी गुड के अनुसार –

“सामाजिक गतिशीलता का अर्थ है -व्यक्ति या मूल्य का एक समाजीक स्थिति से दूसरी समाजिक स्थिति में परिवर्तन।”

“Social mobility is the change of person or value from one social position to another.”

समाजिक गतिशीलता, शैक्षिक विकास के सम्बन्ध में  Social mobility in reference to educational development-

सामाजिक गतिशीलता और शैक्षिक विकास आपस में एक दूसरे से जुड़े हुए पहलू हैं जहां शिक्षा सामाजिक गतिशीलता में प्रभावी वृद्धि करती है वहीं सामाजिक गतिशीलता के फलस्वरूप यह ज्ञात होता है की शिक्षा में इस हेतु कौन से सुधार आवश्यक हैं यह अन्योनाश्रित गुण इनकी वर्तमान में उपादेयता परिलक्षित करता है। शैक्षिक विकास द्वारा सामाजिक गतिशीलता की वृद्धि इन बिंदुओं द्वारा दर्शाई जा सकती है। –

1 – विद्यालय की प्रभावी भूमिका –

वस्तुतः जिस शिक्षा के आधार पर सामाजिक स्थिति में परिवर्तन होता है वह विद्यालयों की देन है कार्ल वीनवर्ग के शब्दों में –

“विद्यालय का प्रमुख कार्य, नवीन मार्ग प्रशस्त करना तथा इनमें सभी को स्थान देना है जिससे वह सामाजिक गतिशीलता के बदलते हुए ढाँचे के साथ कदम मिला सके। विद्यालय इस कार्य को तभी पूरा कर सकता है जब वह सभी प्रकार के आर्थिक स्तरों के बालकों को अपनी उन्नति के लिए व्यापक अवसर प्रदान करेगा।”

“The function of the school in keeping pace with the changing structure of social mobility has been to open channels and keep them open. This is accomplished by providing widespread opportunities to children of all economic statutes to advance their position.”

2 – औपचारिक शिक्षा, सामाजिक गतिशीलता का अधिक प्रभावी साधन –

यह निर्विवाद सत्य है की बहुत से शैक्षिक संवर्धन के साधन अस्तित्व में हैं लेकिन औपचारिक शिक्षा इस गतिशीलता का सशक्त साधन है  मिलर और वूक लिखते हैं –

“औपचारिक शिक्षा, सामाजिक गतिशीलता से प्रत्यक्ष रूप में तथा कारणतः सम्बन्धित है। इस सम्बन्ध को सामान्यतः इस रूप में समझा जाता है की शिक्षा स्वयं शीर्षात्मक सामाजिक गतिशीलता का एक प्रमुख कारण है। ”

“Formal education is directly and causally related to social mobility. Than relationship is generally understood to be one in which formal education itself is a cause or one of the causes of vertical social mobility.”

3 – सार्वभौम अनिवार्य शिक्षा दृष्टिकोण –

शासन का यह दृष्टिकोण भी गतिशीलता की वृद्धि में सहायक है क्योंकि एक स्तर तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिक्षा के सम्बन्ध में परिपक़्व दृष्टिकोण विकसित हो जाता है। भारत जैसे देश में जहां बेटे और बेटियों के प्रति दृष्टिकोण में भिन्नता देखने को मिल जाती है वहां इस व्यवस्था से बेटे और बेटियां दोनों लाभान्वित हो रहे हैं और पारिवारिक प्रगति का आधार बन रहे हैं।

4 – विविध पाठ्यक्रम

5 – प्रशिक्षण व व्यावसायिक पाठ्यक्रम

6 – वैज्ञानिक, तकनीकी व शोधपरक शिक्षा

7 – शैक्षिक अवसरों की यथार्थ समानता

8 – शिक्षक और सामाजिक गतिशीलता

            अन्ततः यह कहा जा सकता है कि किसी भी देश की प्रगति उसके यहाँ होने वाले सामाजिक उन्नयन या सामाजिक गतिशीलता पर निर्भर है और निः सन्देह शिक्षा का इस क्षेत्र में महत्त्व पूर्ण योगदान है और रहेगा लेकिन इसका अभाव पतन की कहानी लिखेगा नयी शिक्षा नीति भी अध्यापकों के साथ यदि न्याय हेतु अपने को तैयार नहीं कर पाई तो वांछित परिणाम नहीं मिलेंगे।

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शिक्षा

क्रोध (Anger)

March 21, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

क्रोध एक मानसिक भाव है शरीर का सॉफ्टवेयर बिगड़ने का संकेत है इसमें आवाज ऊँची होने लगती है मुखाकृति बिगड़ने लगती है बुराइयों का ज्वार उठने लगता है एक एक पुरानी भटकी हुई बातें याद आने लगती हैं एक दूसरे में कमी के सिवाय कुछ नहीं दीखता, मति भ्रम कब पैदा हुआ, कब नासूर बना। सम्बन्ध कब तिरोहित हुए। सब कुछ अनहोनी शीघ्रता से घाटित हो जाती है थोड़े से सजग रहकर इस अनहोने घटना क्रम से बचा जा सकता है। सम्बन्धों के रिक्ताकाश को लबालब प्रेम से भरा जा सकता है। क्रोध से निपटना दुष्कर अवश्य लगता है पर यह असम्भव कदापि नहीं है।

            आइए जानने का प्रयास करते हैं कि समस्त विवाद का मूल क्रोध का कैसे नाश किया जा सकता है ?

क्रोध शान्त करने के उपाय (Ways to calm anger) –

मानव की मूल प्रकृति शान्ति है लेकिन यह भी अटल सत्य है कि कुछ परिस्थितियां मानव को क्रोध दिलाने में सक्षम हैं हालाँकि कोई क्रोध को जानबूझ कर अपना स्वभाव बनाना नहीं चाहेगा। अपनी मूल प्रकृति शान्ति की और लौटने तथा वाणी के घाव से खुद और दूसरे को बचाने के लिए कुछ उपाय प्रयोग में लाए जा सकते हैं आइए ध्यानपूर्वक संज्ञान में लेने का प्रयास करते हैं। –

  • स्वभाव में परिवर्तन –

परदोष देखने के मानवीय स्वभाव ने समाज में क्रोध के स्तर का उन्नयन किया है अपनी आदतों की और ध्यान देना चाहिए स्वयम् का विश्लेषण करने का प्रयास होना चाहिए। कुछ भी अनायास नहीं होता और प्रयास अन्ततः सफल होता है मिलनसार स्वभाव बनाना है यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए। व्यवहार परिवर्तन की शुरुआत स्वभाव परिवर्तन की अनुगामी होती है। हमें गिले शिकवे की आदत नहीं बनानी है। अपने व्यवहार का रिमोट अपने पास ही रखना है भूल कर भी नियन्त्रण नहीं खोना है। याद रखें हम स्वयम् में परिवर्तन शीघ्र ला सकते हैं दूसरे में नहीं। इसीलिए कहना चाहूँगा –

स्वभाव में सु परिवर्तन का आगाज़ हो जाए,

स्वयम् की गलतियों का हमें दीदार हो जाए,

फिर क्रोध को न मिल पाएगा कोई ठिकाना,

यदि स्वभूलों के सुधार का व्यवहार हो जाए।

  • वाणी सदुपयोग –

कबीर दास जी ने कहा –

 “ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये।

औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।

इन शब्दों में क्रोध विनाश का मूल मन्त्र छिपा हुआ है याद रखें सम्राट के क्रोध भरे वचनों से भिखारी के मधुर शब्द ज्यादा अच्छे लगते हैं। वाणी से लगे घावों का आज तक कोई मरहम नहीं बना इसीलिये मधुर गरिमामयी वाणी का सोच समझ कर प्रयोग करना चाहिए। अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध‘ ने कितने सरल शब्दों  समझाया –

लड़कों जब अपना मुँह खोलो

तुम भी मीठी बोली बोलो

इससे कितना सुख पाओगे

सबके प्यारे बन जाओगे ।

  • क्षमा –

जब हमसे गलती हो तो क्षमा मांग लेना चाहिए और यदि गलती अन्य की हो तो उदारता से क्षमा कर देना चाहिए ध्यान रखना है कि क्षमा माँगने का अधिकार क्षमा देने की बुनियाद पर खड़ा है क्षमा से आनन्द का वह प्रवाह जीवन से जुड़ता है जो क्रोध तिरोहित कर जीवन को आनन्दमयी बना देता है रहीम दास जी ने कितना सुन्दर कहा –

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात,

का रहीम हरी को घट्यो, जो भृगु मारी लात।

याद रखें क्षमा के प्रभाव से जवानी में गुस्सा मन्द और बुढ़ापे में बन्द हो जाता है।

  • सत्संग –

सत्संग का मानव पर व्यापक प्रभाव पड़ता है सकारात्मक परिवर्तन की चाह का प्रादुर्भाव सत्संग के प्रभाव से आता है और मानव मन पर फिर ऐसी अमिट छाप पड़ती है कि बुरी मनोवृत्ति की छाया सत्संगी पर कोई प्रभाव नहीं डाल पाती रहीम जी ने कितना अच्छा समझाया है –

जो रहीम उत्तम प्रकृति का करि सकत कुसंग,

 चंदन विष व्यापत नहीं लिपटे रहत भुजंग

  • गहरी श्वाँस –

गहरी गहरी श्वाँस और इनकी निरन्तरता किसी भी क्रोध आवेग का क्षरण करने का अचूक उपाय है इससे जहाँ ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा का हम सेवन करते हैं वहीं समस्या पर विचार मन्थन का पर्याप्त समय मिल जाता है। स्थान परिवर्तन व पूर्ण श्वाँस प्रश्वाँस क्रोध शमन में वह कार्य कर जाता है जो कई बार वह पूर्वाग्रह युक्त मष्तिष्क नहीं कर पाता। इसी लिए कहता हूँ –

पूर्ण श्वांस प्रश्वांस का क्रम

वह जादू सा कर जाता है।

क्रोध आवेग और मतिभ्रम

सब का हरण कर जाता है।

06- कामना नियन्त्रण –

कामना नियन्त्रण एक दुष्कर कार्य है असम्भव नहीं। कामना में बाधा पड़ने पर क्रोध उत्पन्न हो जाता है इसीलिये यह जानना परमावश्यक है की आखिर कामना का जन्म कैसे हो जाता है यह जन्म पाती है रूप, रस, गन्ध आदि प्रधान कारणों से, इसका आधार होती हैं इन्द्रियाँ। इन्द्रियों पर नियन्त्रण का सबल आधार है सच्चा अध्यात्म, कामना अर्थात इच्छा भोग प्रवृत्ति से जन्म लेती है और योग इस पर अंकुश में सहायक है।

07- क्षमता सदुपयोग –

ज्यों ज्यों हमारी क्षमता में वृद्धि होती है सामान्यजन विवेक खोने लगता है और क्रोध मद में वृद्धि होने लगती है, जोकि क्षमता का दुरूपयोग कराती है इसके उदाहरण हमें यत्र तत्र सर्वत्र दीख पड़ते हैं। इसे साधने की क्षमता विवेक युक्त ज्ञान के पास है। हमारी आत्मिक शक्ति ही दिशा बोध पैदा कर  सकती है। क्षमता के साथ विवेक जन्य संयम आवश्यक है। educationaacharya.com पर ‘हमें क्रोध क्यों आ जाता है’ रचना में यह प्रश्न उठा है जिसका लिंक मैं डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दूँगा।

08- सम्यक विवेचन –

आज होने वाले विवादों से उत्पन्न क्रोध सम्यक विवेचन के अभाव के कारण होता है जब दिशा देने वाली शक्तियाँ और धर्म के तथा कथित मसीहा दिशाबोध स्वयं के स्वार्थ से युक्त होकर देने लगते हैं तो सामान्य भोलाभाला जनमानस किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाता है और क्रोध प्रादुर्भावित हो जाता है। इसीलिये कहा है –

क्रोध को सिरे से दरकिनार करना चाहिए।

जीवन छोटा है, बहुत प्यार करना चाहिए।

किसी विवाद से पूर्व विचार करना चाहिए।

प्रेम व सम रसता का प्रसार करना चाहिए।।

09-क्रोध उपवास–

जिस प्रकार अन्न उपवास शरीर में भू तत्व नहीं बढ़ने देता। अलग अलग उपवास अलग तरह के फल प्रदान करते हैं। ठीक उसी तरह क्रोध उपवास आपको आनन्द से भर देगा पहले कोई एक दिन चुनें और अपने सेदृ दृढ़ प्रतिज्ञा करें आज क्रोध उपवास करूंगा कुछ भी हो जाए आज विवाद नहीं करूंगा। हर हाल में उसे टालने का मन बनाना है। आप देखेंगे वह दिन खुशनुमा होगा। धीरे धीरे इन उपवासों की संख्या बढ़ा सकते हैं।

10 – एकान्त वास –

यदि सम्भव हो तो पूर्व निर्धारित समय पर मौन का सहारा ले मोबाइल और तमाम संचार साधनों से दूर रहकर देखें। अंग प्रत्यंग का चेतना स्तर उच्च हो जाएगा एक विलक्षण शक्ति की अनुभूति करेंगे लोक कल्याण की भावना आपको और सबल करेगी व्यक्तित्व प्रखर होगा प्रतिक्रियाओं में जान आएगी। क्रोध पर प्रभावी अंकुश लगेगा। याद रखें, करेंगे तो इसका महत्त्व समझ पाएंगे।

वस्तुतः आत्म साक्षात्कार हेतु साधक को इस गुण का अभ्यास करना ही चाहिए। मन प्रसन्न रहेगा और क्रोध छु मंतर हो जाएगा।

11 – शान्ति की साधना-

श्री मद्भगवद्गीता में सोलह कला सम्पूर्ण भगवान् श्री कृष्ण स्वयम् कहते हैं –

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।

न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्।।2.66।।

जिसके मनइन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं ऐसे मनुष्यकी व्यवसाय आत्मिका बुद्धि नहीं होती। व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है।

वस्तुतः जहां शान्ति नहीं है वहाँ अशान्ति है ,क्रोध है, असन्तुलन है, तम है इसीलिए क्रोध मुक्ति हेतु शान्ति परमावश्यक है। इसीलिये शान्ति के साधक ध्यान, धारणा, समाधि आदि अन्तरङ्ग साधनों से इसे वरण करने में निरन्तर लगे रहते हैं।

ॐ शान्ति शान्ति शान्ति।

परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना कि हम सब क्रोध पर नियन्त्रण रखना सीख सकें। उक्त बिन्दु सभी के लिए मददगार साबित होंगे ऐसा विश्वास है। धन्यवाद

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वाह जिन्दगी !

मानसिक स्वास्थ्य(Mental-Health)

March 18, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मानव के सम्पूर्ण व्यक्तित्त्व को आधार प्रदान करने वाला सबसे महत्त्वपूर्ण कारक है मानसिक स्वास्थ्य। सुन्दर सलोना मुखड़ा, सुन्दर गहरी झील सी आँखे, सुडौल शरीर में यदि मानसिक विकृति आ जाए तो व्यक्ति अपनी पहचान खो बैठता है। मानसिक स्वास्थय का अभाव जिन्दगी के 10 से 15 वर्ष तो कम कर ही देता है। सम्पूर्ण परिवार को एक त्रासदी, अनचाही यन्त्रणा भोगने को विवेश होना पड़ता है। शारीरिक आयु बढ़ने पर मानसिक आयु उससे साम्य रखने में खुद को असमर्थ पाती है। इसी लिए मानसिक स्वास्थय की यत्न पूर्वक रक्षा की जानी चाहिए।

मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाए रखने हेतु उपाय

(Tips to maintain good mental health) –

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मानव शरीर, चेतन जगत का अद्भुत उपागम है और इस अद्भुत उपागम का सशक्त आलम्ब है उत्तम मानसिक स्वास्थय। विधाता विलक्षण शक्तियों को हमें प्रदान कर उनके संरक्षण की विशेष जिम्मेदारी भी हमें प्रदान करता है इस जिम्मेदारी का निर्वहन करने हेतु कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दु आपसे साझा कर रहा हूँ जो इस प्रकार हैं। –

  • स्वयम् से प्रेम (Self-esteem ) –

यदि हम खुद से प्रेम नहीं कर सकते या खुद को सम्मान नहीं दे सकते तो अन्य के साथ भी हम केवल दिखावा कर सकते हैं उसमें प्रमाणिकता नहीं होगी। इसलिए सबसे पहले खुद की इज्जत करें और अपने प्रिय अच्छे कार्यों हेतु समय दें। प्रत्येक वह कार्य जो हमें सचमुच खुशी प्रदान करता है और दूसरों के दुःख का कारण नहीं बनता वह हमें पूर्ण मनोयोग से करना चाहिए। वह नृत्य, सङ्गीत, लेखन, बागवानी, प्रिय भोज्य पदार्थ बनाना आदि कुछ भी हो सकता है।

  •  आत्म संयम (Self-control) –

संसार की समस्त व्यवस्था का व्यवस्थापन हमारे वश में नहीं है हम अपने ऊपर ही नियन्त्रण कर लें यही बड़ी बात है दूसरों को दिशा भर देने का क्षमता भर प्रयास किया जा सकता है अपना कार्य पूर्ण करें दूसरे की प्रतिक्रिया भिन्न हो तो खिन्न न हों। सभी का मानसिक स्तर व क्षमता भिन्न होती है। संयम हमें व्यवस्थित रख मानसिक स्वास्थ्य को सम्बल देगा।

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मति: |

वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायत: || 36||

अर्थात

जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग दुष्प्राप्य है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा साधन से उसका प्राप्त होना सहज है- यह मेरा मत है॥36॥

  • सकारात्मकता का प्रशिक्षण (Training of positivity) –

अपने मष्तिस्क को सकारात्मकता प्रकीर्णन का अजस्र स्रोत बनाना है परिस्थितियों के वशीभूत नहीं हो जाना है उन्हें अपने अनुकूल बनाने की समग्र विशिष्ट रणनीति बनाकर अमल करने की आवश्यकता है इससे मष्तिस्क कुशल रहने हेतु सबल हो जाएगा और बहुत से मष्तिष्कों को दिशा देने में सफल रहेगा। मानसिक अस्वस्थता का तो सवाल ही नहीं उठ सकता।

  • व्यायाम, प्राणायाम (Exercise, Pranayam ) –

मानसिक रूप से सबल बनाने का यह सबसे सशक्त माध्यम है, व्यायाम प्राणायाम, एरोबिक्स, स्ट्रैचिंग आदि इस तरह की क्रियाएं हैं जिससे फेफड़े और हृदय शक्तिशाली हो जाते हैं और अधिक क्षमता से ऑक्सीजन ग्रहण कर पाते हैं इससे शरीर की सब क्रियाएं व्यवस्थित हो जाती हैं और हम मानसिक रूप से सबल कब हो गए यह विषम स्थिति आने पर ही पता चलता है और लोग आपके नेतृत्त्व में कार्य करने को लालायित रहते हैं। व्यायाम, प्राणायाम में निरंतरता रहना परमावश्यक है। ये अपनी क्षमता के अनुसार सभी कर सकते हैं। Education Aacharya पर YOU TUBE  पर TIP TO  TOP Exercise part 1  & 2  में सभी के करने वाली सरलतम क्रियाएं दी हैं। 

  • सत्संगति (Satsang)–

भारत में एक कहावत प्रसिद्ध है की खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है जिससे आशय है की साथ का संगति का प्रभाव पड़ता ही है इसीलिये अलग अलग तरह के लोग अलग अलग ग्रुप में दीख पड़ते हैं। चूंकि यहां बात मानसिक स्वास्थय के सम्बन्ध में हो रही है इसलिए यह बताएं प्रासंगिक हो जाता है कि सबल मानसिक स्वास्थ्य या सकारात्मक व्यक्तित्वों का साथ सत्संगति कहलायेगा तथा मानसिक उत्थान व सशक्तिकरण में योग देगा। इसीलिए घर में उच्च मानसिक क्षमता वाले व्यक्तित्वों के ही चित्र लगाए जाएँ भले ही वे सशरीर हों या नहीं।

  • विचार विनिमय व तार्किकता  (Exchange of thoughts and reasoning)–

सत्य और तार्किकता का चोली दामन का  साथ है इसे झुठलाया नहीं जा सकता। मानसिक उत्थान हेतु हमें अध्ययन, मनन, चिन्तन, अनुभव का आधार लेकर स्वस्थ विचार विनिमय में सक्रियता दिखानी चाहिए और सत्य को स्वीकार कर लेना चाहिए। किसी भी विवाद में बातचीत बंद नहीं करनी चाहिए हम सब आपस में दुश्मन नहीं हैं जो विचार त्याज्य है वह तार्किकता की कसौटी पर हार जाएगा और सबल मानसिक स्वास्थय का पथ प्रशस्त होगा तथा मन पर कोइ बोझ नहीं रहेगा। और हम पुनः उद्घोष कर सकेंगे। –

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामया।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्।।

अर्थात

सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगल के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

  • स्वयम् को समय और उपहार दें (Give yourself time and gifts,  ) –

यदि हम मानसिक रूप से सशक्त महापुरुषों का अध्ययन करें तो पाएंगे की इन्हें गढ़ने में एकान्त और इनके खुद के विचारों को धार इन्होने स्वयम् के लिए समय निकाल कर दी है। वह समय कोई भी हो सकता है,स्थितप्रज्ञता की स्थिति तभी बनती है श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय में भगवन कहते हैं –

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।

यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः।। 69 

अर्थात्

सभी प्राणियों के लिये जब रात होती है, तब सयंमी(मुनि) जागता रहता है और जब सभी प्राणियों के लिये जागने का समय होता है तब मुनि के लिये रात होती है।

मानसिक बल से युक्त होने हेतु हमें खुद को गढ़ना होगा तथा अपने लिए दंड व उपहार का निर्णयन करना होगा।

  • समाज सेवा और चैन की नींद (Social service and sleep in peace) –

मानसिक स्वास्थ्य की उच्चता का एक मापन यह भी है की हम अपना ही नहीं समाज के उत्थान में योग दें सकें। रामचरित मानस में आया है –

”परहित सरिस धरम नहिं भाई ।

  पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ।।”

यह परहित चिन्तन जहां हमें मानसिक रूप से सशक्त करता है वहीं इससे मिलने वाली संतुष्टि चैन की नींद लाने में मदद करती है इससे हम उत्तरोत्तर मानसिक स्वास्थय की स्थिति को प्राप्त करते हैं।

            अन्ततः कहा जा सकता है कि खुद से हारना छोड़ दो आप इतने अधिक मानसिक स्वास्थ्य के मालिक बन जाओगे की दुनियाँ आपका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी।    

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वाह जिन्दगी !

तनाव मुक्ति (STRESS RELIEF)

March 14, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

संसार का सर्व श्रेष्ठ प्राणी मनुष्य कहा जाता है लेकिन किसी भी मनुष्य के ऊपर हावी हो सकता है तनाव। इसने अवतारों को भी नहीं बख्शा। भले ही आप उसे लीला कह लें। जिसने इन तनावों का जितनी कुशलता से निवारण किया वह उतना अधिक सफल हुआ। तनावों से बचाने के लिए न तो आपके ऊपर मनोवैज्ञानिक भारी भारी सिद्धान्तों का बोझ डालूँगा और न धर्माचार्यों के चक्र व्यूह में आपको फँसाऊँगा। यह एक असन्तुलन है जिसे सहजता से सन्तुलन की दहलीज पर लाया जा सकता है। तमाम साहित्य और दृश्य श्रव्य सामग्री से जो जवाब नहीं मिल पाया वह लगभग 500 लोगों के विचारों से मुझे प्राप्त हुआ आपके साथ उसी प्रतिक्रिया को बिन्दुवत तनाव मुक्ति के स्वीकृत विचारों के रूप में आपसे साझा करता हूँ। विश्वास रखिये तनाव उड़न छू हो जाएगा।

 तनाव से मुक्ति के उपाय –

आप इनकी सरलता पर मत जाना ये लोगों के विचारों का सार है जिन्हें इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

1⇒ प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में जागरण –

सुबह चार बजे उठने से पूरे दिन की दिनचर्या व्यवस्थित हो जाती है याद रखें हमें तनाव प्रबन्धन नहीं करना है प्रबन्धन अच्छी चीजों का किया जाता है तनाव का तो समूल विनाश किया जाना है इसीलिए जब उचित समय पर जागेंगे तो सारे कार्यों को समय मिल सकेगा और तनाव उत्पत्ति के कई कारण दम तोड़ देंगे।

2⇒ शौच स्नानादि क्रिया –

दैनिक क्रियाओं का व्यवस्थित सम्पादन करेंगे मल त्याग से पूर्व पर्याप्त जल का सेवन मौसम के अनुसार करेंगे। मालिश और रगड़ रगड़ कर स्नान की आदत का अनुपालन करेंगे।दन्त धावन के पश्चात आँख पर छपाके लगाते समय मुँह में पानी अवश्य भरा हो। समय प्रबन्धन का विशेष ध्यान रखेंगे। यहीं से खुशनुमा दिन हमारी प्रतीक्षा करेगा। ध्यान रखें इन छोटी छोटी बातों का तनाव मुक्ति से सीधा सम्बन्ध है।

3⇒ चिन्तन – मनन व व्यूह रचना –

आदि शक्तियों और अच्छे अच्छे विचारों का चिन्तन मनन करने के साथ पूरे दिन के कार्यों हेतु व्यवस्थापन की व्यवस्थित रणनीति बनाई जानी चाहिए। किसी तरह का कोई बोझ मन पर नहीं रखना चाहिए। कोई बोझिल विचार लम्बे समय तक जुड़कर तनाव में परिवर्तित होता है इसीलिये उसे प्रारम्भ में ही दरकिनार कर देना चाहिए।

4⇒ आसन, प्राणायाम, व्यायाम –

आसन और व्यायाम तन के तनाव का निदान करता है और प्राणायाम मन को तनाव से बचाता है तन मन इससे तनाव मुक्त व्यवहार का निर्वहन करने का आदी हो जाता है अचेतन मष्तिस्क अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ मानस में शक्ति संचरण के प्रवाह को बनाये रखता है।

5⇒ ऊर्जा स्तर उन्नयन –

हमारा शरीर एक अत्याधिक उन्नत किस्म का यन्त्र है जो अपने आप अपने को ठीक करने करने की व्यवस्था करता है और तनाव शैथिल्य हेतु दर्द, आँसू, ऐंठन, बेहोशी, उन्माद आदि का प्रगटन करता है और कालान्तर में स्वयं को ठीक कर लेता है। लेकिन लगातार तनाव उत्पादक विचार का चिन्तन इस शरीर को अपूरणीय क्षति पहुँचाता है इसीलिए हमें अपने शरीर के ऊर्जा स्तर को बनाये रखना है और हर वह सकारात्मक कार्य करना है जिससे हम अपने आप को तरोताज़ा महसूस करते हैं फिर चाहे संगीत सुनना हो ,तैरना हो, नृत्य हो, या आपकी अन्य कोई अभिरुचि का क्षेत्र। कुछ नहीं कर सकते तो पूर्ण श्वांस प्रश्वांस ही करें।

6⇒ स्वास्थ्य अनुकूल व्यवहार –

हमारी सम्पूर्ण क्रियांए मर्यादित व शारीरिक क्षमता में अभिवृद्धि करने वाली हों, किसी भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तु का सेवन न करने की आदत व्यवहार में लाई जानी चाहिए। नशे की चीजों का तत्काल प्रभाव से परित्याग किया जाना चाहिए। स्वस्थ मस्तिष्क से किसी समस्या पर जितना गहन अध्ययन किया जा सकता नशे की हालत में कदापि सम्भव नहीं। स्वास्थय के अनुकूल कृत्यों को व्यवहार में लाने की आदत का परिष्करण किया जाना चाहिए।

7⇒ यथा योग्य निद्रा व जागरण –

किसी भी कार्य का अतिरेक सन्तुलन बिगाड़ने का कार्य करता है इसी लिए यथायोग्य आहार विहार के साथ नींद की उचित मात्रा भी परम आवश्यक है श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण जी ने अपने मुखारबिन्द से कहा –

युक्ताहार विहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।

युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।।

अर्थात दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का तथा यथा योग्य सोने और जागने वाले का ही सिद्ध होता है।

और जब दुखों का ही नाश हो जाएगा तो तनाव कहाँ बचेगा।

8⇒ सकारात्मक चिन्तन –

यदि नकारात्मकता हार का कारण है तो सकारात्मकता जीत की। शत प्रतिशत यह मानने की आवश्यकता है नकारात्मकता मष्तिस्क और शरीर की सबसे बड़ी दुश्मन है इससे हृदयाघात  होता है और रोग प्रतरोधक क्षमता पर बुरा असर होता है जो तनाव का प्रमुख कारण है इसीलिये सकारात्मक चिन्तन से जुड़ें। ऐसे साहित्य ,व्यक्ति, विचार का अनुकरण करें जो आपको सकारात्मक प्रेरणा देने में सक्षम हो।कितना सही कहा गया है कि –

“Positive thinking can reduce your stress level, help you feel better about yourself and improve your overall well-being and outlook.”

“सकारात्मक सोच आपके तनाव के स्तर को कम कर सकती है, आपको अपने बारे में बेहतर महसूस करने में मदद करती है और आपके समग्र कल्याण और दृष्टिकोण में सुधार करती है।”

अन्ततः कहा जा सकता है कि अपना तनाव हम स्वयम् दूर कर सकते हैं और दूसरों की मदद भी कर सकते हैं, यहाँ बताये गए तरीकों पर सकारात्मकता के साथ अमल करें बाकी सब शुभ ही होगा। मुस्कुराइए आपके जीवन प्रगति की चाभी आपके हाथ है।

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शिक्षा

पुस्तक समीक्षा (BOOK REVIEW)

March 13, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पुस्तक समीक्षा एक अत्याधिक महत्त्वपूर्ण कार्य है क्यों कि पुस्तक का लेखक जहाँ अपने मानस से निकाल कर विषय वस्तु सम्पूर्ण जनमानस को परोसता है वहीं समीक्षक के शब्द, जो की गरिमा पूर्ण विश्लेषण पर आधारित होते हैं विचारक को दिशा भी देते हैं और यह भी बताते हैं कि तत्सम्बन्धी साहित्य का कितनी गहराई से अध्ययन किया गया है और समीक्षक का मानसिक स्तर क्या है।

            चूँकि यह एक महत्त्वपूर्ण कृत्य है इसीलिये इसे शिक्षा के उच्च स्तरीय पाठ्य क्रम या एम० एड० के पाठ्य क्रम से जोड़ा गया है। पुस्तक समाज को समर्पित होती है इसलिए लेखन और समीक्षा दोनों ही सामाजिक उत्थान में योग देते हैं और अत्याधिक सावधानी पूर्वक किये जाने की अपेक्षा रखते हैं।

            महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखण्ड विश्व विद्यालय, बरैली के एम ० एड ० पाठ्यक्रम में Practicum  में दिया है – Study of any one thinkers’ original literature (one book) and write review on it. इसी तरह विभिन्न विश्व विद्यालयों ने उच्च शिक्षा स्तर पर पुस्तक समीक्षा सिखाने का प्रयास किया है। आज कल व्यावसायिक रूप से यह धनार्जन के क्षेत्र के रूप में भी उभर कर सामने आया है। इसीलिये वर्तमान समय उच्चकोटि के पुस्तक समीक्षकों की आवश्यकता महसूस कर रहा है।

            बदलते परिवेश में पुस्तक समीक्षा, समीक्षा के साथ कुछ अन्य तथ्यों की आवश्यकताओं को महसूस करती है इसीलिए पहले की तुलना में कुछ नए बिंदुओं का समावेशन आवश्यक है। इस सम्बन्ध में अलग अलग विद्वानों की राय अलग हो सकती है। यहाँ आज के दृष्टिकोण से पुस्तक समीक्षा हेतु बिंदुओं का निर्धारण किया गया है। 

पुस्तक समीक्षा (Book Review) लिखने की विधि –

                             Or

पुस्तक समीक्षा कैसे लिखें ?( How to write a book review?)

किसी भी पुस्तक  की समीक्षा लिखने में सबसे पहले निम्न जानकारी साझा की जनि चाहिए और उसके बाअद मुख्य रूप से केवल समीक्षा सरल सुबोध भाषा में प्रस्तुत की जानी चाहिए। समस्त बिन्दुओं को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –

⇨ पुस्तक का नाम

⇨ लेखक का नाम

⇨ प्रकाशक

⇨ संस्करण

⇨ मूल्य

⇨ मुद्रक

⇨ समीक्षा –

            पुस्तक को समीक्षा हेतु सम्यक भागों में विभक्त कर लेना चाहिए और उन खण्डों को विषय वस्तु, चरित्रों, सम्वादों, भावनाओं, प्रस्तुति, प्रभाव उत्पादकता, तुलना, प्रासंगिकता, भाषा शैली, गुणधर्मों आदि सम्यक मानदण्डों की कसौटी व विश्लेषण के आधार पर समीक्षा की जानी चाहिए।

⇨ समीक्षक का नाम, हस्ताक्षर व दिनाँक सहित 

पुस्तक समीक्षा में ध्यान रखने योग्य तथ्य [Facts to keep in mind in book reviews]- 

01 – विषय वस्तु को गम्भीरता पूर्वक कई बार देखा, सुना, पढ़ा और समझा जाना चाहिए।  

02 – सभी आवश्यक सूचनाओं का संग्रहण किया जाना चाहिए।

03 – सम्यक दृष्टिकोण रखा जाना चाहिए।

04 – यह समीक्षा जिन लोगों के बीच जानी है उनके स्तर को संज्ञान में रखा जाना चाहिए।

05 – आप किसी अन्तिम निर्णय पर किस आधार पर पहुँचे? स्पष्टीकरण दिया जाना चाहिए।

0 6 – अपने प्रस्तुत विचार को तर्काधार भी दिया जाना चाहिए।

07 – जिस भाषा में समीक्षा लिखी जा रही है उसकी भाषा शैली पर पूर्ण अधिकार होना चाहिए।

08 – तुलना (Compare) और व्यतिरेक (Contrast) की सूक्ष्मताओं को जटिलता से बचाकर सहज, सरल, बोधगम्य और सम्प्रेषणीय बनाया जाना चाहिए।

09 – सम्पूर्ण का सारांश देने से बचाव रखते हुए आवश्यक विषय वस्तु, तथ्य, समीक्षा के घेरे में मर्यादित ढंग से लिए जाने चाहिए।  

10 – याद रखें, यह प्राक्कथन नहीं है हमारी भाषा शैली, प्रस्तुति, तुलना आदि सभी में समीक्षात्मक दृष्टिकोण दीख पड़ना चाहिए।

11 – पुस्तक के सम्बन्ध में कुछ वाक्य, पसन्दगी या नापसन्दगी का कारण, आकर्षित होने का कारण समाहित किया जाना चाहिए।

12 – अन्त में बिना कोई भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण रखे हुए मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

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वाह जिन्दगी !

नारी की सुबह …………..

March 7, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

गर कोख में हत्या कर दोगे,

उसको पढ़ने भी ना दोगे।

पिछड़ के तम को बढ़ाएगी,

गर केवल अपनी थोपोगे।

नारी की सुबह कब आएगी ?

नारी की सुबह कब आएगी ?

वैषम्य द्वार यदि खोलोगे,

अधिकार समान भी ना दोगे।

वह कैसे सेहत बनाएगी,

खाने में भेद यदि रक्खोगे।  

नारी की सुबह कब आएगी ?

नारी की सुबह कब आएगी ?

कौशल से विमुख यदि कर दोगे

आर्थिक रीढ़ यदि तोड़ोगे।

निज पैरों पर कैसे खड़ी होगी,

यदि बन्धन में तुम जकड़ोगे।   

नारी की सुबह कब आएगी ?

नारी की सुबह कब आएगी ?

यदि आपस में तुम उलझोगे

नारी शक्ति को ना नवस्वर दोगे।

तब घर नवज्योति क्यों आएगी,

मिलजुल जब प्रगति पथ रोकोगे। 

नारी की सुबह कब आएगी ?

नारी की सुबह कब आएगी ?

यदि बाधाएं खड़ी तुम कर दोगे,

उसको केवल नव सपने दोगे।

फिर कैसे वह साम्य बनाएगी,

जब केवल भ्रम ही भ्रम दोगे।       

नारी की सुबह कब आएगी ?

नारी की सुबह कब आएगी ?

……………………………………

यदि छीन के हक़ तुम ले लोगी

खुद को हल्का नहीं तोलोगी।

आत्मविश्वास शक्ति बढ़ जाएगी

और पिछले सितम सब धो लोगी।        

नारी की सुबह तब आएगी। 

नारी की सुबह तब आएगी।

जब याचक स्वर तुम खो दोगी,

निज बाजू में ताक़त भर लोगी।

मति रूढ़ि से विमुख हो जाएगी,

प्रगतिपथ पर स्वयं ही बढ़ लोगी।          

नारी की सुबह तब आएगी। 

नारी की सुबह तब आएगी।

जब चिन्तन को नव दिशा दोगी

खुद बढ़ नवमार्ग तुम खोलोगी।

भावना – भेद, ख़तम हो जाएगी,

निज दम पर समरसता घोलोगी।             

नारी की सुबह तब आएगी। 

नारी की सुबह तब आएगी।

पढ़ लिख नवचिन्तन जोड़ोगी,

नव कौशल खुद संग जोड़ोगी।

जग प्रकृति हैरान हो जाएगी,

जब खुद को बदलकर रख दोगी।         

नारी की सुबह तब आएगी। 

नारी की सुबह तब आएगी।

आक्षेपों का तार्किक जवाब दोगी,

सच दुनियाँ, सम्मुख रख दोगी।

‘नाथ’ दुनियाँ कायल हो जाएगी,

जब प्रतिमान स्वयं के गढ़ लोगी।             

नारी की सुबह तब आएगी । 

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