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काव्य

ऐ भारत में रहने वालो……….

May 4, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मेरी कलम आज देती है,

ऐ नव पीढ़ी यह सन्देश।

यदि आपस में बैर करोगे,

कैसे बढ़ पाएगा देश।  

ऐ भारत में रहने वालो,

सजग रहो गढ़ो नवपरिवेश ।1।

जंग कभी नहीं देती है,

मधुमय याद मंगल सन्देश।

खुद का कैसे अस्तित्व रखोगे,

आज पूछता तुमसे देश।     

ऐ भारत में रहने वालो,

सजग रहो गढ़ो नवपरिवेश ।2।

पूजा कभी नहीं देती है,

प्रतिष्ठानों का लूट आदेश।

दुश्मन को कैसे खोजोगे,

निष्क्रिय रह खोकर आवेश।       

ऐ भारत में रहने वालो,

सजग रहो गढ़ो नवपरिवेश ।3।

संस्कृति कभी नहीं देती है,                     

मिथ्या तुष्टिकरण सन्देश।

निज स्वार्थों को याद रखोगे,

नहीं बचेगा कुछ अवशेष।        

ऐ भारत में रहने वालो,

सजग रहो गढ़ो नवपरिवेश ।4।

धरती कभी नहीं देती है,

निज लहू बहाने का आदेश।

तुम जी कर भी क्या कर लोगे,

नहीं बचा यदि प्यारा देश।        

ऐ भारत में रहने वालो,

सजग रहो गढ़ो नवपरिवेश ।5।

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शिक्षा

प्रजातन्त्रीय भारत में शिक्षा के उद्देश्य [Aims of Education in Democratic India ]

May 3, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जिन्हें शिक्षा के उद्देश्य कहा जाता है वास्तव में वे सम्पूर्ण मानवता के उद्देश्य होते हैं और शिक्षा वह साधन है जिससे यह उद्देश्य प्राप्त किए जाते हैं।लेकिन बलचाल में हम शिक्षा के उद्देश्य का प्रयोग करते हैं और ये इतने आवश्यक हैं कि बी ० डी ० भाटिया जी को कहना पड़ा कि :-

“Without the knowledge of aims, the educator is like a sailor who does not know the goal or his determination, and the child is like a rudderless vessel which will be drifted along somewhere ashore.”

“उद्देश्यों के ज्ञान के अभाव में शिक्षक उस नाविक के समान है जो अपने लक्ष्य या मन्जिल को नहीं जानता है और बालक उस पतवार विहीन नौका के सामान है जो लहरों के थपेड़े खाकर किसी भी किनारे जा लगेगी।”’

प्रजातन्त्रीय देश भारत के उत्थान हेतु यह परम आवश्यक होगा कि वह लोकतन्त्र की मर्यादा के अनुरूप सम्पूर्ण देश की शिक्षा हेतु उद्देश्यों का निर्धारण करे और इस उद्देश्य निर्धारण में निम्न बिन्दु महती भूमिका का निर्वहन करेंगे। सुविधा की दृष्टिकोण से इन्हें तीन भागों में विभक्त किया गया है।

[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य

[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य

[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य

[A] – व्यक्ति सम्बन्धी उद्देश्य या वैयक्तिक उद्देश्य

01 – शारीरिक विकास

02 – चारित्रिक विकास

03 – आध्यात्मिक विकास

04 – मानसिक विकास

05 – सांस्कृतिक विकास

06 – वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास

07 – सकारात्मक रूचि का विकास

08 – चिन्तन शक्ति का विकास

09 – आर्थिक सक्षमता का विकास

10 – प्रजातान्त्रिक नागरिकता का विकास

[B] – समाज सम्बन्धी उद्देश्य

01 – कल्याणकारी राज्य की स्थापना

02 – सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना का विकास

03 – सामाजिक बुराइयों का अन्त

04 – जन शिक्षा का प्रसार

05 – वातावरण से सामन्जस्य शक्ति का विकास

[C] – राष्ट्र सम्बन्धी उद्देश्य

01 – राष्ट्रीय एकता

02 – भावनात्मक एकता

03 – अन्तर्राष्ट्रीयता की भावना का विकास

04 – बेरोजगारी निवारण, व्यावसायिक विकास

05 – उत्पादन क्षमता में वृद्धि

06 – आधुनिकीकरण शक्ति का विकास

07 – मूल्य संरक्षण

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दर्शन

श्री अरविन्द/SRI AUROBINDO)[15अगस्त1872 – 05 दिसम्बर 1950]

May 1, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

एक ऐसा महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्त्व जो राजनैतिक गलियारों की सुर्ख़ियों में आने और जेल यात्राओं के बाद भी अपने आप को आध्यात्मिक चिन्तन से विलग न कर सका। एक विशुद्ध दार्शनिक जो महान चिन्तक, विश्लेषक, योगाचार्य सभी की विशिष्ट भूमिका में जीवन पर्यन्त दिखाई पड़ा। इसीलिए पी ० टी ० राजू कहते हैं –

“Of all Indian Philosophers Shri Aurobindo is the only who is known both as yogi and philosopher……..  .Hi is much respected in India and regarded as one of her greatest sons.”

“भारत के सभी दार्शनिकों में श्री अरविन्द ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति हैं जो एक योगी और एक दार्शनिक दोनों रूपों में प्रसिद्द हैं। वे भारत में बहुत ही सम्मानित और उसके महानतम पुत्रों में से एक माने जाते हैं।”

श्री अरविन्द का दार्शनिक चिन्तन  

PHILOSOPHICAL THOUGHT OF SHRI AUROBINDO

श्री अरविन्द आधुनिक युग में ऋषि परम्परा के वे साधक हैं जो महान चिन्तक, विश्लेषक, क्रान्तिकारी, पत्रकार। शिक्षा सुधारक सभी के गुणों को वहन करते हुए मूल रूप से गीता का विशेष आलाम्बिक बल रखते थे ये मानव और दिव्य शक्ति के संयोग को दिव्यानुभूति कराने वाला योग मानते हैं ये सम्पूर्ण मानव जाति सर्वांगीण सर्वोत्थान की और ले जाने का प्रयास है। इसीलिये इनकी विचारधारा को सर्वांग योग दर्शन भी कहा जाता है इस दर्शन के अधिगमन हेतु विभिन्न मीमांसाओं का अध्ययन समीचीन होगा।

तत्त्व मीमांसा –

ये सृष्टि का कर्त्ता ईश्वर को स्वीकार करते हैं और जगत के निर्माण हेतु विभिन्न विकास सोपानों की बात करते हैं। ये आरोहण और अवरोहण विकास की दो दिशाएँ बताते हैं।इस प्रक्रम को अधिगमन हेतु  इस प्रकार विवेचित किया जा सकता है –

सत् → चित्त→ आनन्द → अतिमानस → मानस → प्राण → द्रव्य      (अवरोहण)

द्रव्य → प्राण → मानस → अतिमानस → आनन्द → चित्त → सत्    (आरोहण)

ज्ञान एवं तर्क मीमांसा –

इनके अनुसार ज्ञान और अज्ञान में परस्पर विरोध नहीं है बल्कि अज्ञान का स्वाभाविक गन्तव्य ज्ञान है ये भौतिक और आध्यात्मिक तत्त्वों में अभेद को जानना ही सच्चे ज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं व इसे द्रव्य ज्ञान और तत्त्व ज्ञान नामक दो विभागों में बाँटते हैं द्रव्य ज्ञान से आशय जगत ज्ञान अर्थात साधारण ज्ञान से है जबकि आत्म ज्ञान को ये उच्च ज्ञान के रूप में स्वीकारते हैं आत्म ज्ञान अन्तःकरण द्वारा होता है इनका तर्क है कि इसकी प्राप्ति का महत्त्वपूर्ण साधन योग की क्रियाएं यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि हैं।

मूल्य एवम् आचार मीमाँसा –

इनके योग दर्शन की मूल्य व आचार मीमांसा को समझने के लिए महर्षि अरविन्द के आरोहण क्रम का अध्ययन परम आवश्यक है इनके आरोहण सोपान हैं – – द्रव्य → प्राण →मानस→ अतिमानस→ आनन्द→ चित्त→ सत। इसमें द्रव्य, प्राण, मानस के स्तर को तो मानव जन्म के समय पार कर चुका होता है जन्म के पश्चात अति मानस की स्थिति को प्राप्त कर उसका ध्येय अर्थात अंतिम उद्देश्य आनन्द+ चित्त+ सत की प्राप्ति होता है। सत चित्त आनन्द की प्राप्ति का साधन गीता का कर्म योग व ध्यान योग है और इसके लिए यह परम आवश्यक है कि मन विकार रहित हो, शरीर स्वस्थ व जीवन संयमी हो और इस उद्देश्य की प्राप्ति का साधन योग की क्रियाएं – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि हैं।

जीवन दर्शन  (Philosophy of life) –

1 – मानव, सर्वोत्तम योनि

2 – ब्रह्म -सर्वशक्तिमान और निरपेक्ष

3 – सच्चा ज्ञान भौतिक और आध्यात्मिक तत्वों के अभेद को जानना।

4 – ज्ञान के दो रूप – द्रव्य ज्ञान और आत्म ज्ञान

5 – कर्म योग व ध्यान योग सत चित्त आनन्द की प्राप्ति का साधन

6 – जीवन का अन्तिम उद्देश्य सत चित्त आनन्द की प्राप्ति।

7 – पुनर्जन्म सम्बन्धी धारणा 

      वे लिखते हैं -“यदि किसी सचेतन व्यक्तित्व का विकास होता है तो पुनर्जन्म होना आवश्यक है। पुनर्जन्म एक युक्ति संगत आवश्यकता है और एक आध्यात्मिक तथ्य है जिसका हम अनुभव कर सकते हैं।”

शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त (fundamentals of Educational philosophy ) –

 श्री अरविन्द का कहना है –

“That alone would be true and living education which helps to bring out to full advantage all that is in an individual man.”

“सच्ची और वास्तविक शिक्षा वही है जो मानव की अन्तर्निहित समस्त शक्तियों को इस प्रकार विकसित करती हैं कि वह उनसे पूर्ण रूप से लाभान्वित होता है।”

उक्त स्थिति को प्राप्त तभी किया जा सकता है जब इनके शिक्षा दर्शन को पूर्ण आयाम मिले जिसके प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं –

01 – बालक शिक्षा का केन्द्र

02 – मातृ भाषा, शिक्षा का माध्यम 

03 – ब्रह्मचर्य शिक्षा का आधार

04 – अन्तर्निहित समस्त शक्तियों का व्यावहारिक विकास

05 – पूर्ण मानव बनाने का साधन शिक्षा

06 – सुरुचि पूर्णता

07 – धर्म को यथोचित स्थान

08 – चेतना का सम्यक विकास

09 – ज्ञानेन्द्रियों का यथाशक्ति प्रशिक्षण

10 – सुषुप्त शक्तियों का विकास

11 – मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों से अनुकूलन

12 – मित्र व पथ प्रदर्शक हो शिक्षा

श्री अरविंद का शैक्षिक चिन्तन (Educational thought of Shri Aurobindo) –

ये शिक्षा के द्वारा मानव का सच्चा उत्कर्ष चाहते थे इन्होने कहा –

“Education to be true must not be a machine made fabric, but a true building or living evocation of the powers of the mind and spirit of human being.”

“सच्ची शिक्षा को मशीन से बना सूत नहीं होना चाहिए, अपितु इसको मानव के मस्तिष्क तथा आत्मा की शक्तियों का निर्माण अथवा जीवित उत्कर्ष करना चाहिए।”

श्री अरविन्द ने दार्शनिक के रूप में इतना श्लाघनीय कार्य किया है कि जहाँ इतिहास के पृष्ठ उन्हें समेटने को आकुल दिखे वहीं आने वाले युग ने उनके विचारों में अपने लिए पथ की तलाश की। ये राष्ट्र के समग्र उत्थान हेतु नवीन शिक्षा से युक्त करना चाहते थे इसीलिये इन्होंने अपनी दो पुस्तकों नेशनल सिस्टम ऑफ़ एजुकेशन (National System Of Education)और ऑफ़ एजुकेशन (Of Education)) के माध्यम से एक राष्ट्रीय योजना प्रस्तुत की। उक्त को आधार बनाकर उनके शिक्षा सम्बन्धी विचारों को यहाँ दिया गया है :-

शिक्षा का सम्प्रत्यय [Concept Of Education]-

महर्षि अरविन्द के अनुसार –

“सूचनाओं का संग्रह मात्र शिक्षा नहीं है। सूचनाएं ज्ञान की नींव नहीं हो सकती। वे अधिक से अधिक वह सामग्री हो सकती हैं जिसके द्वारा जानने वाला अपने ज्ञान की वृद्धि कर सकता है अथवा वे वह बिन्दु हैं, जहां से ज्ञान को आरम्भ किया जाए या नई खोजों को निकालना प्रारम्भ किया जाए। वह शिक्षा जो अपने आप को ज्ञान देने तक सीमित रखती है शिक्षा नहीं है।”

इनका दृढ़ विश्वास था कि मनुष्य द्रव्य और प्राण की अवस्था पार कर मानस की स्थिति में होता है जन्म के बाद उसे क्रमशः अति मानस ,आनन्द ,चित् , सत् की स्थिति को प्राप्त करना होता है अतः शिक्षा ऐसी हो जो मानव का आध्यात्मिक, भौतिक, प्राणिक, मानसिक विकास करे इस प्रकार की शिक्षा को सम्पूर्ण शिक्षा (Integral Education ) के रूप में इन्होने स्वीकार किया। श्री अरविन्द के अनुसार –

“Education is the building of the power of the human mind and spirit. It is the evoking of knowledge, character and culture.”

“शिक्षा मानव के मष्तिस्क और आत्मा की शक्तियों का निर्माण करती है और उसमें ज्ञान, चरित्र और संस्कृति को जागृत करती है। ”

शिक्षा के उद्देश्य (Aim of Education) –

1 – भौतिक या व्यावसायिक विकास

2 – प्राणिक उत्थान

3 – मानसिक उत्कृष्टता

4 – अन्तः करण का विकास

5 – सत् चित्त आनन्द की प्राप्ति

पाठ्यक्रम (Syllabus)–

यदि ध्यान से देखा जाए तो पाठ्यक्रम शिक्षा के उद्देश्यों पर आलम्बित होता है यहां भी शिक्षा उन उद्देश्यों की प्राप्ति का साधन भर है और इसी वजह से इनके पाठ्यक्रम को इस प्रकार वर्णित किया जा सकता है।

भौतिक उत्थान हेतु विषय – मातृ भाषा, राष्ट्र भाषा व उत्थान हेतु आवश्यक अन्य अन्तर्राष्ट्रीय भाषाएँ। भूगोल,इतिहास,अर्थशास्त्र,समाज शास्त्र विज्ञान, गणित,स्वास्थय विज्ञान,भूगर्भ विज्ञान,कृषि,वाणिज्य,कला और मनोविज्ञान आदि।

शारीरिक क्रियाएं – व्यायाम, खेलकूद, योगासन, शिल्प व अन्य श्रमसाध्य कार्य।   

आध्यात्मिक विषय – वेद, उपनिषद,नीति शास्त्र, गीता, धर्म शास्त्र ,विभिन्न देशों का धर्म व दर्शन।

आध्यात्मिक क्रियाएं – भजन, कीर्तन, प्राणायाम आदि।

शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods)–

ये प्राचीन विधियों को नवीन रूप देना चाहते थे और चाहते थे कि रटाने की प्रवृत्ति से बचा जाए। इनकी क्रियाओं व शिक्षण विधियों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।

1 – रूचि आधारित

2 – प्रेम, सहानुभूति आधारित 

3 – स्वातंत्रय अनुभूति आधारित 

4 – स्वप्रयत्न विधि,स्व अनुभव विधि 

5 – स्वनिरीक्षण विधि

6 – क्रिया आधारित शिक्षण विधि

7 – मौखिक विधि

इसके अतिरिक्त ये उपदेश,प्रवचन,तर्क ,तुलना,अभिव्यक्ति,विवेचना,व्याख्यान,व स्वाध्याय विधियों को भी उचित सम्मान देते हैं।

शिक्षक (Teacher) –

ये शिक्षक को रटाने वाली मशीन नहीं बनाना चाहते बल्कि उसे निर्देशक,पथ प्रदर्शक,सहायक,के रूप में देखना चाहते हैं और चाहते हैं कि वह अभिरुचि आधारित संकलन के प्रस्तुतीकरण कर्ता के रूप में कार्य सम्पादित करे। वह प्रकृति के अनुरूप चलाने हेतु अभिप्रेरक की भूमिका का निर्वहन करे। उन्होंने कहाकि –

“The teacher is not an instructor or task master, he is helper and guide this business is to suggest and not to impose. He does not actually train the pupils mind, he only shows him how to perfect his instruments of knowledge and helps him and encourages him in the process.”

“अध्यापक निर्देशक या स्वामी नहीं है। वह सहायक और पथ प्रदर्शक है। उसका कार्य सुझाव देना है, न कि ज्ञान को लादना। वह वास्तव में छात्र के मष्तिस्क को प्रशिक्षित नहीं करता है। वह छात्र को केवल यह बताता है कि वह अपने ज्ञान के साधनों को किस प्रकार समृद्ध बनाए। वह छात्र को सीखने की प्रक्रिया में सहायता और प्रेरणा देता है।”

विद्यार्थी (Student) –

इनकी शिक्षा बाल केन्द्रित शिक्षा है और इसीलिये ये चाहते हैं की बालक की विभिन्नताओं को ध्यान में रखकर उसके विकास के सोपान बहुत सोच समझ कर विकसित किये जाने चाहिए। इन्होने कहा :-

“The idea of hammering the child into shape desired by the parent or teacher is a barbarous and ignorant supersituation, there can be no great error than for the parent to arrenge before hand that his son shall develop particular qualities and capacities.”

“बालक को मातापिता अथवा शिक्षक की इच्छानुकूल ढालना अंधविश्वास और जंगलीपन है।  मातापिता इससे बड़ी भूल और कोइ नहीं कर सकते कि वे पहले से ही इस बात की व्यवस्था करें कि उनके पुत्र में विशिष्ट गुणों, क्षमताओं तथा विचारों का विकास होगा।”

विद्यालय (The School) –

ये प्राचीन ऋषियों द्वारा संचालित आश्रम पद्धतियों के साथ आधुनिक परिस्थतियों का भी पूर्ण ध्यान रखना चाहते हैं और विद्यालयों में मनसा,वाचा,कर्मणा,पर अधिक ध्यान देना चाहते हैं और नहीं चाहते कि रंग, रूप, देश, जाति, धर्म के आधार पर कोइ भेद भाव हो। ये विश्व बन्धुत्व के विकास का वातावरण विद्यालयों में चाहते हैं। 

अनुशासन (Discipline ) – 

इनके अनुसार शिक्षा और अनुशासन में अनुलोम सम्बन्ध है ये चाहते हैं की विद्यालय ब्रह्मचर्य का अनुपालन सुनिश्चित करने साथ मुक्तिवादी अनुपालन सिद्धान्त का अनुकरण करें और बच्चों में स्वतंत्र रूप सर आदर्श स्वीकारोक्ति का गुण विकसित करेंऔर स्व अनुशासन की भावना बलवती करें।

शिक्षा के अन्य पक्षों के सम्बद्ध में विचार (Views of other Aspects of  Education)-

1 – राष्ट्रीय शिक्षा सम्बन्धी विचार (Views about National Education)  

2 – धार्मिक व नैतिक शिक्षा (Religious and Moral Education)

3 – अन्तर्राष्ट्रीयता की शिक्षा (Education of internationalism)

4 – नारी शिक्षा (Women Education)

5 – धर्म सम्बन्धी विचार (Views about religion)-

श्री अरविन्द के अनुसार :-

“हम भारतवासी आर्य जाति के वंशधर हैं, आर्य शिक्षा और आर्य नीति के अधिकारी हैं। यह आर्य भाव ही हमारा कुलधर्म और ज्योति धर्म है। ज्ञान, भक्ति और निष्काम कर्म आर्य शिक्षा के मूल तत्व हैं तथा ज्ञान, उदारता, प्रेम, साहस, शक्ति, विनय आर्य चरित्र के लक्षण हैं।”

शिक्षा दर्शन का मूल्याङ्कन (Evaluation of Philosophy of Education) –

इनकी विदेशी शिक्षा पद्धति से मुक्ति की छटपटाहट और भारतीय समाज के कल्याण की भावना स्पष्ट परिलक्षित होती है। ऐसा लगता है गुरु शिष्य परम्परा से कालान्तर में इस पर प्रभावी कार्य नहीं हो सका और शिक्षा पर जो इनका प्रभाव परिलक्षित होना चाहिए था नहीं हो सका जबकि इन्होने शिक्षा के विविध पहलुओं को समयानुकूल बनाने का प्रयास किया।  श्री कंगाली चरणपति के भाव द्रष्टव्य हैं :-

“श्री अरविन्द का शिक्षा दर्शन मूलतः उनके आध्यात्मिक योग दर्शन पर आधारित है। श्री अरविन्द ने अपनी दिव्य दृष्टि की शक्ति से मानव जीवन के जिन गंभीर तत्वों का उदघाटन किया है, वे ही उनके शिक्षा दर्शन की आधारशिला हैं। इसमें हमें समग्र मानव जीवन व समग्र संसारके सर्वांगीण रूप का आभास मिल जाता है। श्री अरविन्द ने जीवन और संसार के किसी पहलू को त्यागा नहीं है।”

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शिक्षा

शिक्षक स्वायत्तता और जवाबदेही (Teacher autonomy and accountability)

April 24, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक स्वायत्तता से आशय –

शिक्षक स्वायत्तता का सीधा सादा अर्थ है शिक्षक को उसके निमित्त कार्यों में स्वतन्त्रता। शिक्षक के दायित्व बदलते समय के साथ सामाजिक मांगों के अनुरूप परिवर्तित होते रहते हैं और सारी समस्याओं के निदानीकरण हेतु शिक्षा की और देखा जाता है जिसका निर्वहन शिक्षक को करना होता है शिक्षक को स्वतंत्र चिंतन के साथ स्वायत्त रूप से कार्य करने की आवश्यकता यहीं से पारिलक्षित होने लगती है। शिक्षक स्वायत्तता वस्तुतः अधिगम को प्रभावी व व्यावहारिक बनाने के  लिए  विषयवस्तु की आवश्यकतानुरूप शिक्षक द्वारा बिना किसी बाहरी दवाब से प्रभावित हुए कार्य को परिणति तक पहुँचाने से है।

            यह कोई ऐसी निश्चित सत्ता नहीं है जो कुछ लोगों के पास होती है और कुछ के पास नहीं यह संस्थान,पाठ्यक्रम ,राज्य तन्त्र से सीधे प्रभावित होती है वैतनिक अध्यापक निर्धारित पाठ्यवस्तु को अपनी क्षमता के अनुसार अधिगम कराने हेतु शिक्षण विधियों व सम्प्रेषण के लिए स्वायत्त है। . संजीव बिजल्वाण महोदय ने प्रवाह मई -अगस्त 2015 में ‘अध्यापक स्वायत्तता ‘ नमक लेख में लिखा –

“बदलते सन्दर्भों, मायनों,व भूमिकाओं में सबसे महत्त्वपूर्ण बात हे शिक्षक और शिक्षार्थी की स्वायत्तता। सीखने और सिखाने की प्रक्रिया तभी लचीली और सन्दर्भ व परिवेश आधारित होगी जब शिक्षक इसके लिए स्वायत्त होगा। ” 

अध्यापक स्वायत्तता से आशय विविध परिसीमाओं के अन्तर्गत शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति हेतु शिक्षक द्वारा स्वायत्त रूप से कार्य करने से है।

शिक्षक स्वायत्तता और विविध काल –

a – वैदिक काल

b – बौद्ध काल

c – मुस्लिम काल

d – ब्रिटिश शासन काल

e – आजाद भारतीय कालावधि

आज का अध्यापक एक व्यवस्था (System ) का एक हिस्सा है जो राज्य द्वारा संचालित होता है और यह राजनीति से इतना अधिक प्रभावित है की गलत तथ्यों ,गलत इतिहास व अनावश्यक परोसने से भी नहीं चूकता। व्यवस्था है किसी हाथ में और दिखती दूसरे हाथों में है।

शिक्षक स्वायत्तता का यथार्थ –

जब समाज व राष्ट्र के उत्थान हेतु पाठ्यक्रम निर्माण से लेकर अधिगम तक के सम्पूर्ण कालन्तराल पर विविध विज्ञ अध्यापकों के स्वतन्त्र मौलिक विचारों की छाप दिखाई देने लगेगी कुछ लोगों के निहित स्वार्थों से ऊपर उठ शिक्षा की सम्पूर्ण व्यवस्था एक स्वायत्त पक्षपात पूर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठ राष्ट्रवाद के आलोक में निर्णय लेने में सक्षम होगी। जब वास्तविक अध्यापक शिक्षा की विविध नीतियों के निर्माण से लेकर परिणाम की प्राप्ति तक प्रभावी भूमिका बिना किसी बाहरी दवाब के निभाएगा। वास्तविक अर्थों में शिक्षक स्वायत्तता होगी।

शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही –

आजाद भारत की सारी व्यवस्थाएं न तो शिक्षा के साथ न्याय कर पाईं और न सम्पूर्ण अध्यापकों के साथ, सभी राजनैतिक पार्टियां शिक्षा के दायित्व से अपना हाथ खींचने में लगीं रहीं। परिणाम यह हुआ कि लगभग 80 %शिक्षा व्यवस्था व्यक्तिगत हाथों में पहुँचकर व्यक्तिगत लाभ का साधन मात्र बनकर रह गयीं। अध्यापक बेचारा बन गया उसके अस्तित्व पर संकट के बादल मंडराने लगे और सारी स्वायत्तता अपने सच्चे अर्थ खो बैठी। वर्तमान भारत में सम्पूर्ण शिक्षा की व्यवस्था की जिम्मेदारी का निर्वहन निम्न माध्यम से सम्पन्न होता है और इनमें स्वायत्तता व जवाबदेही की स्थिति में अन्तर स्पष्ट द्रष्टव्य है –

1 – सरकारी संस्थाएं

2 – गैर सरकारी संस्थाएं

1 – सरकारी संस्थाएं –

इसमें सरकारी व अर्धसरकारी संस्थान आते हैं। माध्यमिक स्तर तक अलग अलग राज्यों के बोर्ड व्यवस्थाओं को संभालते हैं सीधे शासन की नीतियों के अनुरूप कार्य सम्पादित होते हैं बहुत बड़े तंत्र के रूप में इनका विकास हुआ है केन्द्रीय व राज्य स्तर पर विभिन्न नियमों विनियमों के आधार पर कार्य सम्पादित होता है।

और अध्यापक स्वायत्तता अलग अलग नियामक सत्ताओं द्वारा कार्य करने के कारण बाधित होती है चूंकि स्वायत्तता व सामञ्जस्य का स्तर निम्न है अतः जवाबदेही का स्तर भी बहुत प्रभावी नहीं बन पड़ा है। इन शिक्षण संस्थाओं में बहुत अधिक परिवर्तन की आवश्यकता है मर्यादित स्वायत्तता व प्रभावी जवाबदेही की उचित व्यवस्था न होने के कारण ,मोटा वेतन देने के बाद भी इनके विश्व स्तरीय बनाने में संदेह है।

 उच्च शिक्षा के स्तर पर स्थिति अत्यन्त दयनीय है इसमें प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर उनके मूल्याँकन तक में अध्यापक भागीदारी दिखाई देती है जितने भी अतिरिक्त लाभ के कार्य हैं बखूबी निभाए जाते हैं सिर्फ कक्षा शिक्षण के, अधिकाँश विद्यार्थी अधिकाँश जगह अनुपस्थित रहते हैं नाम मात्र की कक्षागत क्रियाएं होती हैं। शासन के साधनों का उपयोग कम दुरूपयोग अधिक देखने को मिलता है महाविद्यालय से लेकर विश्विविद्यालय तक आमूलचूल परिवर्तन की दरकार है कोई ऐसा विश्वविद्यालय खोजना मुश्किल होगा जहाँ दलाल न हों। अध्यापक स्वायत्तता, शिक्षण वातावरण के अभाव में कुप्रभावित है जवाबदेही के अभाव का प्रभाव कार्यों पर देखा जा सकता है नाम मात्र के लोग जिम्मेदारी से कार्य निर्वहन करते हैं व्यवस्था भ्रष्ट आचरण से प्रभावित दिखती है।

2 – गैर सरकारी संस्थाएं –

शासन की नीतियों के कारण ये संस्थाएं सरकारी संस्थाओं की तुलना में तीन से चार गुने विद्यार्थियों के अधिगम की व्यवस्था कर रही हैं कुछ समितियों द्वारा भी इनका संचालन किया जा रहा है लेकिन इन पर शासन द्वारा निर्धारित संस्थाओं का अप्रत्यक्ष नियंत्रण रहता है ये स्ववित्त पोषित संस्थान, विविध कार्यों हेतु शासन के संस्थानों के अनुरूप कार्य करने को बाध्य होते है जिनके प्रतिनिधि हर कार्य के बदले भौतिक लाभ लेते हैं  प्रायोगिक परीक्षाओं में शतप्रतिशत प्रथम श्रेणी इन्हीं की कृपा दृष्टि का परिणाम है।

अध्यापकों के साथ भेदभाव पूर्ण दृष्टिकोण के कारण न तो इन संस्थाओं को शासन से उचित लाभ मिल पाता है और न इनके अध्यापकों को। समान कार्य के लिए असमान वेतन प्राप्त करने के साथ अल्प वेतन भोगी अध्यापक आयाराम गयाराम की भूमिका में अधिक देखा जाता है। इनकी पूर्ण स्वायत्तता की तो कल्पना ही व्यर्थ है  हाँ अधिगम को प्रभावी बनाने के लिए ये स्वायत्त रूप निर्णय लेते हैं और यह तुलनात्मक रूप से अधिक जवाब देह होते हैं। प्रबन्धन के सीधे सम्पर्क में रहने के कारण ये कार्य दायित्व निर्वहन के प्रति अधिक सजग रहते हैं।

            यदि समग्र रूप से विवेचना की जाए तो यह मानना ही होगा कि कुछ अच्छे लोगों ने ही सम्पूर्ण व्यवस्था को सही दिशा दे रखी है और ये सब जगह हैं इनकी संख्या सीमित है और ये अपने कार्य के प्रति उत्तरदायित्व पूर्ण दृष्टिकोण रखते हैं और जवाबदेही स्वीकार करते हैं। राष्ट्रोत्थान हेतु सीमित शिक्षक स्वायत्तता व जवाबदेही शिक्षा के प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित करना परम आवश्यक है।

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विविध

आत्म विश्वास/SELFCONFIDENCE

April 22, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आज का मानव जानता बहुत कुछ है पर मानता बहुत कम है। सफलता हर कोइ चाहता है पर प्रयास ओछे रह जाते हैं कभी आत्म विश्वास नहीं जग पाता और कभी अति आत्मविश्वास असफलता का पर्याय बन जाता है। आखिर मानव अपने सपने, अपने मन्तव्य, अपने गन्तव्य तक क्यों नहीं पाते। कभी सारा जीवन किस एक तत्व की कमी के कारण अभिशप्त सा दीख पड़ता है। भाग्य का ताला आखिर खुलता किस चाभी से है जब आप अपने कर्म बोध को जगाकर विश्लेषण करते हैं तब पाएंगे की सफलता की कुञ्जी है आत्मविश्वास । आइए जानते हैं कि किन आठ तत्वों से आत्मविश्वास का शीर्ष स्तर छूकर जीवन को सफल बनाया जा सकता है।

सक्रिय जीवन चर्या (Active Life Style) –

मानव का शरीर गुब्बारे की तरह फूलने के लिए नहीं बना है वह पसीना बहाकर शुचिता कर्मठता का अनुगमन कर लक्ष्य प्राप्ति का साधन है हमेशा ऋगवेद पर आधारित ऐतरेय ब्राह्मण के शब्द ‘चरैवेति चरैवेति’ चलते रहो चलते रहो का उद्घोष कर हमेशा हमें प्रेरणा देते हैं की तन को ,मन को,मस्तिष्क को हमेशा सक्रिय रखना है। हमारे और लक्ष्य के बीच का अन्तराल कम होता चला जाएगा वह महिला पुरुष का अन्तर नहीं देखता पुरुषार्थ की सक्रियता देखता है। इसीलिये स्वामी विवेकानन्द ने कठोपनिषद से दिशाबोधक  उद्घोष किया –

“उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।” अर्थात् उठो, जागो, और ध्येय की प्राप्ति तक मत रूको।

अतः अवश्य मानें – जीवन है, चलने का नाम …

सद सङ्गति (Good Fellowship) -आत्म विश्वास का सूर्य तब जाग्रत स्थिति में होता है जब उच्च ऊर्जाओं का समन्वयन होता है इसीलिये उन लोगों का साथ करें,उन लोगों को मॉडल या आदर्श के रूप में स्वीकारें जिनके विचार आपके आत्मिक उत्थान में योग दे सकें यह मुहावरा तो आपने अवश्य सुना होगा कि -खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग बदलता है। आप जैसा बनना चाहते हैं वैसे लोगों का साथ करें।

संयमित जिद –

 जी हाँ जिद जरूरी है, उत्थान के लिए, उत्कर्ष के लिए, प्रगति के लिए इतना जिद्दी तो अपने आप को बनाना होगा कि जो ठान लिया, जो उद्देश्य बना लिया, जो लक्ष्य तय कर लिया उस उद्देश्य को उचित साध्यों से प्राप्त करके रहूँगा और अपने कम्फर्ट जॉन का परित्याग तत्परता से करूंगा।

     याद रखें सफलता का पथ दुरूह होता है कण्टकाकीर्ण होता है ,भयावह दीख पड़ता है पर आत्म विश्वासी उसी पथ का पथिक होता है और अन्ततः विजिट होता है।

            हमें अपनी जिद की पूर्णता हेतु सैद्धान्तिक धरातल की जगह यथार्थ के कठोर धरातल पर संयमित होकर चलना पड़ेगा। किताबी सैद्धान्तिक धरातल पर तैरना सीखें, सुन्दर नृत्य करें, व्यापार में शिखर छुएं आदि सम्भव नहीं है अतः व्यावहारिक कठोर धरातल पर पूर्ण अनुशासन से अपनी मर्यादित जिद पूर्ण करने हेतु उतरना ही होगा। फल के परिपक्व होने में उसमें तीन परिवर्तन परिलक्षित होते हैं वह नम्र हो जाता है , उसमें मिठास आ जाती है, तीसरे उसका रंग बदल जाता है। आत्म विश्वास की परिपक्वता में मानव में इसी परिवर्तन के लक्षण दीखते हैं।

आस्था –

विश्वास रखें आप सफल होंगे,जीवन की छोटी छोटी सफलताओं, उपलब्धियों, प्रशंसा की स्मृतियों को कुरेदकर स्वस्थ धरातल तैयार करें। यदि बचपन के डगमगाने वाले कदम दौड़ने में समर्थ हो सकते हैं तो हमारा आस्था का अवलम्ब, विजय पथ का निर्माण अवश्यम्भावी कर सकता है शङ्कर के उपासक हर हर महादेव, देवी के उपासक जय भवानी के उद्घोष से अन्य मतावलम्बी अपने अपने इष्टों को याद कर जाग्रत स्थिति में आ जाते हैं। सीधे चेतना के अनंत सागर से अविरल परवाह को निरंतरता मिलाती है ऊर्जा के अजस्र स्रोत से आस्था हमको जोड़ती है।

संघर्षशील प्रवृत्ति –

विश्वास रखें। आप ईश्वर की अमूल्य कृति हैं। हम सभी का अस्तित्व किसी न किसी उद्देश्य से जुड़ा है सपनों को साकार करने के लिए मानस में  विचारों के अन्धड़ चलते हैं संघर्ष के विभिन्न उपादान तय करते समय याद रखें समुद्र मन्थन से विभिन्न रत्नों की प्राप्ति हो सकती है तो हमारा चिन्तन, मंथन,द्वन्द संघर्षशील जुझारू प्रवृत्ति अन्ततः हमें सफल बना आत्म विश्वास में वृद्धि सुनिश्चित करेगी। इसी दिशा में मेरी कुछ पंक्तियाँ आपको समर्पित हैं –

जीवन की धूप छाँह, नया मार्ग देती है,

पत्थर, कण्टक,अग्नि संताप हरलेती है,

मार्ग खोज देते हैं, उन्नति, उत्कर्ष का

संघर्षशील प्रवृत्ति अन्ततः तार देती है।      

उत्तम स्वास्थय –

स्वस्थ शरीर स्वस्थ मस्तिष्क का आधार है और आत्म विश्वास का वृक्ष उत्तम स्वास्थय रूपी जड़ों पर विकास के सोपान तय करता है जितने भी प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं सभी ने तमाम व्यस्तताओं के बीच स्वास्थय को संभाले रखने के क्षमता भर प्रयास अवश्य किये हैं। भारतेन्दु हरिश चन्द्र, स्वामी विवेका नन्द, राहुल सांकृत्यायन अपने अल्प स्वस्थ जीवन में जो ज्योति बिखेर गए हैं वह युगों तक हमारा मार्ग दर्शन करेगी।

व्यक्तित्व सुधार –

आज गुणवत्ता प्रबन्धन के युग में व्यक्ति का व्यक्तित्व कार्य की सफलता सशक्त पृष्ठभूमि तैयार करता है कार्य की निरन्तर सफलताएं जो तेज जो ओज पैदा करती हैं वह सञ्चित कर्मों का योग होता है। रामधारी सिंह दिनकर जी ने कहा है –

तेजस्वी सम्मान खोजते नहीं गोत्र बतलाके

पाते हैं जग में प्रशस्ति अपना करतब दिखला के

हीन मूल की ओर देख जग गलत करे या ठीक

वीर खींच कर ही रहते हैं इतिहासों में लीक।

खुश रहें खुश रहने दें –

यह सर्व विदित है कि जो जैसा करता है उसे वैसा फल मिलता है तो हम सबके लिए खुशियों का आधार बनाएं इससे हम पर भी खुशियां बरसेंगी और उससे आलोकित पथ ही तो आत्मविश्वास हेतु सर्वोत्कृष्ट पथ होगा। चेहरे पर हमेशा विजेता वाली मुस्कान रखें आनन्द में मगन हो सकारात्मक निर्णय लें क्रोध को तिरोहित करें।हमारी खुश रहो और रहने दो की मूल भावना आत्मविश्वास का ऐसा प्रासाद खड़ा करेगी जो चिर स्थाई होगा। 

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शिक्षा

आत्मअभिव्यक्ति/Self Expression

April 18, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आत्म अभिव्यक्ति से आशय (MEANING OF SELF EXPRESSION )-

आत्म अभिव्यक्ति एक महत्त्वपूर्ण व कम व्याख्यायित शब्द है हिन्दी भाषा में आत्म शब्द स्व का परिचायक है और अभिव्यक्ति का आशय सरल शब्दों में प्रगटन से है। विकीपीडिया के अनुसार : –

 “अभिव्यक्ति का अर्थ विचारों के प्रकाशन से है व्यक्तित्व के समायोजन के लिए मनोवैज्ञानिकों ने अभिव्यक्ति को मुख्य साधन माना है । इसके द्वारा मनुष्य अपने मनोभावों को प्रकाशित करता तथा अपनी भावनाओं को रूप देता है।”

साधारण शब्दों में कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति से आशय प्रगटन से है और स्वयम का प्रगटन चाहे वह किसी भी माध्यम से हो,आत्म अभिव्यक्ति कहलाता है।

आत्म अभिव्यक्ति के प्रकार (TYPES OF SELF EXPRESSION)-

विविध विद्वानों ने इसे विविध प्रकार से विवेचित किया है जिससे इसका स्वरुप जटिल हो गया है लेकिन मुख्य रूप से इसके प्रकारों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है। –

1 – शाब्दिक

 (a )- लिखित

 (b) – मौखिक

2 – अशाब्दिक -समस्त कलाएं

3 – चेतन शारीरिक भाषा  

आत्म अभिव्यक्ति को सुधारने के उपाय   (Ways to improve self expression) –

आत्म अभिव्यक्ति को सुधारने के उपायों को समझने हेतु यह आवश्यक है कि आत्म अभिव्यक्ति को प्रभावित करने वाले कारक  (TYPES OF SELF EXPRESSION) की समझ विकसित करने के साथ निम्न बिंदुओं पर गहनता से सम्पूर्ण क्षमता भर ध्यान दिया जाए। 

शारीरिक भाषा (Body Language) में सुधार हेतु वे सभी प्रयास सम्मिलित किये जाने चाहिए जो कौशल विकास से सम्बंधित हैं।

अशाब्दिक अभिव्यक्ति हेतु निरन्तरता ,जिज्ञासा, धैर्य, क्षमता सम्वर्धन की अनवरत साधना परमावश्यक है।

  आत्म अभिव्यक्ति को प्रभावी बनाने हेतु डॉ ० सतीश बत्रा जी का मानना है कि सम्प्रेषण या अभिव्यक्ति में निम्न का विशेष संज्ञान लिया जाए –

1 – अधिक

2 – अनावश्यक

3 – अप्रिय

4 – अप्रासंगिक

5 – असमय

6 – असम्बन्धित

7 – अपात्र

साथ ही बत्राजी प्रभावी अभिव्यक्ति हेतु KISSSSS पर विशेष जोर देते हैं जिसका आशय है –

K – keep

I – it

S – Simple

S – Short

S – Straight

S – Sense full 

S – Strength of evidence

यानि कि तथ्यों को सम्प्रेषित करने में बात को सरल संक्षिप्त सीधा सार्थक व प्रभावी तरीके से रखा जाए।

अन्त में अध्यापकों से मैं विशेष रूप से कहना चाहूँगा कि वे यदि निम्न पर ध्यान देंगे तो अच्छी आत्म अभिव्यक्ति कर पाएंगे –

T – Talent

E – Evaluation before communication

A – Apologize for mistakes

C – Confusion Removal

H – Harmony

E – Effectiveness

R – Realistic Approach

 वस्तुतः यह तथ्य सर्व विदित है कि जहां चाह वहाँ राह ,यदि आप पूरे आत्म विश्वास से आत्म अभिव्यक्ति प्रभावी बनाने का प्रयास करेंगे तो लक्ष्य की निकटता महसूस करेंगे और जल्दी आपका सपना साकार होगा।

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काव्य

नया भारत है अब ये सहेगा नहीं

by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

बूढ़े तोते को कुछ भी रटाते रहो,

ये फितरत है उसकी रटेगा नहीं ।

राजे दिल यूँ कितने छिपाते रहो

मेरा दावा है हमसे छिपेगा नहीं ।

तुम सदा वैर के गुल खिलाते रहे

नया भारत है अब ये सहेगा नहीं ।1।

तुम पानी पर बरछी चलाते रहो,

वो रवानी है उसमें फटेगा नहीं।

तुम तो चेहरे पे चेहरे लगाते रहो,

जो सच है वो हमसे छिपेगा नहीं। 

तुम सदा वैर के गुल खिलाते रहे,

नया भारत है अब ये सहेगा नहीं ।2।

हम लिखते रहें तुम मिटाते रहो,

सच तो सच है फिर भी मिटेगा नहीं।

हम जलाते रहें तुम बुझाते रहो,

भोर का सूर्य है अब छिपेगा नहीं।   

तुम सदा वैर के गुल खिलाते रहे,

नया भारत है अब ये सहेगा नहीं ।3।

चाहे कितने भी काँटे बिछाते रहो,

काफिला प्यार का अब रुकेगा नहीं।

अमन की बस्तियाँ तुम जलाते रहो,

ज्वार संचेतना का रुकेगा नहीं ।    

तुम सदा वैर के गुल खिलाते रहे,

नया भारत है अब ये सहेगा नहीं ।4।

तुम दामन को दागी बनाते रहो,

यह सिलसिला अब टिकेगा नहीं।

तुम सदा घाव पर घाव लगाते रहे,

इम्तिहाँ हो गई अब सहेगा नहीं।  

तुम सदा वैर के गुल खिलाते रहे,

नया भारत है अब ये सहेगा नहीं ।5।

मधुर रिश्तों का राग ‘नाथ’ गाते रहे,

अब जाकर के समझे फबेगा नहीं।

मीठी बातों से उसे समझाते रहे

भूत लातों का है,वो समझेगा नहीं।      

तुम सदा वैर के गुल खिलाते रहे,

नया भारत है अब ये सहेगा नहीं।6। 

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शिक्षा

पाठ्यक्रम मूल्याँकन के मानदण्ड और प्रक्रिया /CRITERIA AND PROCESS OF CURRICULUM EVALUATION

April 15, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षा की त्रिमुखी प्रक्रिया का और अध्यापक व विद्यार्थी के बीच सम्वाद का प्रमुख साधन पाठ्यक्रम ही है। यह इतना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि इसके बिना शैक्षिक प्रगति और उसकी क्रमबद्धता की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती। सम्यक पाठ्यक्रम मानव जाति की प्रगतिशीलता का आधार है इसलिए पाठ्यक्रम का कुछ मानदण्डों पर खरा उतरना परमावश्यक है।

पाठ्यक्रम मूल्याँकन के मानदण्ड (CRITERIA  OF CURRICULUM EVALUATION) –

चूँकि पाठ्यक्रम विद्यार्थी के अधिगम का आधार होने के साथ उसके व्यवहार परिवर्तन का भी प्रमुख आलम्ब है अतः यह परम आवश्यक है की उसे निम्न मानदण्डों को अवश्यमेव अपने में समाहित करना चाहिए। पाठ्यक्रम मानदंडों को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।

1 – विश्वसनीयता (Reliability)

2 – वैधता (Validity)

3 – क्रमबद्ध सम्बद्धता (Serial affiliation)

4 – सामन्जस्यता (Harmony)

5 – व्यावहारिकता (Practicality)

6 – लोचशीलता (Elasticity)

पाठ्यक्रम मूल्याँकन की प्रक्रिया (PROCESS OF CURRICULUM EVALUATION) –

पाठ्यक्रम का निर्माण शिक्षा के उद्देश्यों तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि इससे अधिगम की सुगमता व व्यवहार में परिवर्तन के गुण की भी अपेक्षा की जाती है ऐसी स्थिति में जाहिर सी बात है कि पाठ्यक्रम के मूल्यांकन की प्रक्रिया शिक्षा व मानव व्यवहार के व्यापक परिदृश्य से सम्बन्ध रखती है। पाठ्यक्रम के मूल्यांकन के माध्यम से ही यह ज्ञात होता है कि कोई अपने निर्माण का उद्देश्य कहाँ तक पूर्ण करने में सक्षम है। अतः पाठ्यक्रम मूल्यांकन की प्रक्रिया निम्न सोपानों से होकर गुजरती है।

1 – शैक्षिक उद्देश्यों की प्राप्ति

2 – शैक्षिक स्तर से समन्वयन

3 – प्राप्त अधिगम अनुभव का विवेचन

4 – व्यावहारिक सक्रियता में परिवर्तन

5 – विद्यार्थियों हेतु सार्थकता

6 – अधिगम स्थानान्तरण से अनुकूलता

7 – व्यावहारिक जीवन में उपादेयता

8 – ज्ञानात्मक व भावात्मक पक्ष की प्रबलता

            वस्तुतः पाठ्य क्रम मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है जो एक चक्र पाठ्यक्रम नियोजन -पाठ्यक्रम प्रस्तुतीकरण -विकास प्रक्रिया -मूल्यांकन तक पहुँचती है तत्पश्चात पुनः शुरू हो जाता है  पुनः पाठ्यक्रम नियोजन -पुनः पाठ्यक्रम प्रस्तुतीकरण -पुनः विकास प्रक्रिया -पुनः मूल्यांकन।

क्योंकि मानव की प्रगति काल के सापेक्ष होती है अतः एक बार का मूल्यांकन हर काल का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता।

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शिक्षा

माह भर में परीक्षा की तैयारी कैसे करें. How to prepare for the exam in a month?

April 10, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

आज जहाँ कुछ बच्चे जान बूझ कर पढ़ने से जी चुराते हैं वहीं कुछ बच्चे ऐसे भी हैं जो सचमुच पढ़ना चाहते हैं और परिस्थितियाँ विपरीत हैं। कुछ बच्चे परिवर्तित स्थिति से साम्य बनाकर अपने अभीप्सित प्राप्त करना चाहते हैं।चाहे कारण कोई रहा हो कुछ बच्चों का समय  रेत की तरह हाथ से फिसल गया है  और मात्र एक माह शेष है और उनकी बलवती इच्छा।

सबसे पहले इन सभी की सकारात्मक ऊर्जाओं का वन्दन ,उक्त सारी परिस्थितियाँ अपने विद्यार्थियों, चाहे वो कहीं भी हैं से मुझे मिली हैं उन सभी विद्यार्थियों में से चुने हुए 10 प्रश्न और क्षमता भर उनके उत्तर देने का प्रयास करता हूँ आशा है सभी को जवाब मिल जाएगा। सामान परिस्थिति वाले देश के अन्य अधिगमार्थियों को भी लाभ मिलेगा। वादे के अनुसार किसी भी नाम का उच्चारण नहीं करूंगा ?

प्रश्न – मेरे परिवार का गुजारा एक दूकान से चलता है पिताजी की अस्वस्थता के कारण मैं दूकान पर बैठता हूँ प्रातः 10 बजे सुबह से रात्रि 8 बजे तक का समय दूकान के कार्यों में लग जाता है। परीक्षा की तैयारी कैसे हो ?

उत्तर – ये सही है कि बारह घण्टे कार्य के बाद थकान होती है आप दूकान से आकर अपने आप को तारो ताजा करें स्नान अनुकूल लगे तो किया जा सकता है खाइये पीजिए थोड़ा बहुत समय अपने मनोरञ्जन को दीजिये और सो जाइए कम से कम 6 घण्टे की नींद भी लीजिए तनाव रहित रहिए सब आराम से प्रबंधन हो जाएगा 10 बजे रात्रि से सुबह 4 बजे तक की आराम दायक नींद लीजिये उठिए प्रभु का कृतज्ञता ज्ञापन कीजिये दैनिक कार्यों यथा शौच, दन्त धावन, शेविंग,स्नान आदि से निवृत्त होकर सुबह 5 बजे से 10 बजे तक में से केवल 3 घण्टे अध्ययन को प्रति दिन दीजिए और इसमें चुने हुए कम से कम 4  प्रश्न याद कीजिए। विश्वास रखिये इन प्रश्नों की संख्या कब बढ़ गयी आपको पता ही नहीं चलेगा। 10 दिनों में आपका आत्म विश्वास लौट आएगा। सप्ताहान्त का समुचित प्रयोग करें। आप निश्चित सफल होंगे। 

प्रश्न – मेरे पति सहयोगी प्रवृत्ति के हैं मेरा बच्चा छोटा है मेरे से चिपका रहता है कब और कैसे पढ़ूँ ?

उत्तर – ऐसी स्थिति में आपको समय प्रबन्धन की आवश्यकता है जल्दी सोना और जल्दी उठना एक अच्छा विकल्प हो सकता है। कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है यह सोचकर आप दोनों समय का ऐसा विभाजन करें कि आप दोनों बच्चे की देखभाल के साथ पूरी नींद ले सकें। पूरी नींद लेने से अधिगम सशक्त होता है यदि आप रात्रि 8 बजे से दो बजे तक सोने का क्रम रखें ,हॉस्टल वाले बच्चों की तरह तो सुबह 2 बजे से पाँच, छः बजे तक अच्छी पढ़ाई हो सकती है बशर्ते की आप यह दिन में नोट कर लें कि रात्रि में क्या क्या याद करना है। सुबह उठने पर आप 30 मिनट प्राणायाम हेतु निकाल कर अपनेआप को रीचार्ज कर सकती हैं। पाँच  छः दिन में स्थिति अनुकूल हो जाएगी स्वास्थय का पूरा ध्यान रखना है।

प्रश्न – मैं एम० एड ० प्रथम वर्ष का छात्र हूँ  आठ घण्टे की प्राइवेट फर्म में सेवा व दो घण्टे आने जाने के व्यय करके जीवनयापन कर रहा हूँ मेरा अवकाश सोमवार को पड़ता है इसलिए केवल सोमवार को व कभी छुट्टी लेकर महाविद्यालय जा पाता हूँ।कब व कैसे तैयारी करूँ ?

उत्तर – जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं। … ये पंक्तियाँ आपको दिशा देंगीं। आप दो दो हफ़्तों में पूरे होने वाले लेक्चर्स यू ट्यूब – Education Aacharya पर देख सुन सकते हैं और वो भी एक घण्टे से भी कम समय में,यानी जब आप बस यात्रा कर रहे होते हैं। यदि लिखा हुआ मैटर चाहिए तो educationaacharya.com से ले सकते हैं। शेष आप जो भी समय निकाल सकते हैं उसे 40 मिनट के कालांश में तोड़ लें व सलेक्टेड स्टडी करें। कुछ भी असम्भव नहीं है।

प्रश्न – मेरा प्रायोगिक कार्य पूर्ण है लघु शोध भी हो चुका है लेकिन अब परीक्षा में लगभग एक माह शेष है प्रश्नों की तैयारी एम० एड ० परीक्षा हेतु कैसे करूँ ?

उत्तर –  घबराने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है इतना प्रायोगिक कार्य पूर्ण होने पर अब समस्त ध्यान पढ़ने पर ही लगाने की आवश्यकता है ,आप यूनिट के हिसाब से 10 -10 उद्धरण (Quotation) लिख लिखकर याद करें।  प्रश्न के शीर्षक उपशीर्षक बार बार लिखकर याद करें। अलग अलग तरह के प्रश्नों में अपने याद किये उद्धरण प्रयुक्त करने की कला सीखें। निश्चित रूप से आप अच्छा कर पाएंगे। स्वयं योजना बनाकर विगत वर्षों के प्रश्नपत्रों के आधार पर अपने उत्तरों को व्यवस्थित करें।अवश्यमेव कल्याण होगा।

प्रश्न – मैं बी० एड ० द्वित्तीय वर्ष की विद्यार्थी हूँ मेरा लेख बहुत खराब है ब्लैक बोर्ड स्किल से डर लगता है वैसे मैं याद सब कर लेती हूँ सुना भी सकती हूँ पर लेख कैसे सुधारूँ ?

उत्तर – महाकवि वृन्द ने कहा –

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निशान।

इसी में आपके प्रश्नका उत्तर छिपा है  आपको निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता है यह ध्यान रखना है अक्षर सीधे लिखे जाएँ अक्षर और अक्षर के बीच की दूरी व शब्द और शब्द की दूरी बराबर रखी जाए। पंक्तियाँ एक दूसरे के समानान्तर रहें। शीघ्र ही वाँछित लाभ मिलेगा। अभ्यास में निरंतरता रखें।

प्रश्न – मैं सॉफ्ट बॉल और मेरी बहिन कबड्डी की खिलाड़ी हैं अभी हम दोनों अन्तर्विश्वविद्यालयी प्रतियोगिता से लौटे हैं क्रीड़ा की तैयारी में पढ़ाई कहीं पीछे छूट गई अब 30 – 35 दिनों में परीक्षा की तैयारी कैसे करें ?

उत्तर – आपसे बस यह कहना है –

          करे कोशिश अगर इंसान तो क्या क्या नहीं मिलता 

          वो सिर उठा कर तो देखे, जिसे रास्ता नहीं मिलता,

         भले ही धूप हो काँटे हों राहों में मगर चलना तो पड़ता है,

         क्योंकि किसी प्यासे को घर बैठे कभी दरिया नहीं मिलता।

         स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मष्तिष्क निवास करता है उचित रणनीति, सही समय विभाजन, लिख लिखकर अभ्यास, विगत वर्षों के प्रश्न पत्र सभी आपकी मदद को तैयार बैठे हैं। विश्वास रखें और एक भी दिन खराब न जाने दें ,गुरुओं से निर्देशन लें। पूर्ण विश्वास है  मैदान की तरह परीक्षा में में भी आपका प्रदर्शन लाजवाब रहेगा। 

प्रश्न – मैं MSW का छात्र हूँ मेरी समस्या यह है कि मैं  याद किया हुआ परीक्षा कक्ष में भूल जाता हूँ, क्या करूँ ?

उत्तर –  कई विद्यार्थी इस समस्या से ग्रस्त हैं सबसे पहले अपने खान पान की आदत में सुधार करना है अधिक गरिष्ठ भोजन से बचना है और तजा सुपाच्य भोजन करना है जब कुण्डलिनी की सारी शक्ति भोजन पचाने में लगी रहती है तब भी ऐसा देखने को मिलता है। दूसरे आत्मविश्वास विकसित करना है प्रश्नो को  निश्चित समय में खुद लिखकर अभ्यास करना है। पर्याप्त पानी का सेवन करना है। प्राणायाम, व्यायाम, ध्यान को दिनचर्या का हिस्सा बनाना है। निश्चित रूप से आशातीत सफलता मिलेगी।

प्रश्न – मैंने  PCM ग्रुप से B.Sc. की है बी० एड ० के बाद ईश्वर कृपा से नौकरी भी मिल गई है हाई स्कूल को पढ़ाता हूँ अब की M.A राजनीति शास्त्र का प्राइवेट फार्म भरा है,इसमें तो फार्मूले भी नहीं होते,  इतना सारा कैसे लिखा जाएगा ?

उत्तर – आप अध्यापक हैं कई विद्यार्थियों के प्रेरणा स्रोत,निश्चित रूप से आपने कहावत सुनी होगी –

 जहाँ चाह वहाँ राह 

आप यकीन मानिए विचार संसार की सबसे ताकतवर शक्ति है और जब आप दृढ़ इच्छा शक्ति से इस दिशा में कार्य करेंगे तो कई पथ प्रकाशित होते चले जाएंगे रही बात फार्मूले की तो वो आप यहां भी बना सकते हैं प्रत्येक शीर्षक का पहले अक्षर को लेकर मिला लीजिये फार्मूला तैयार है। मानलीजिए आपको अपने प्रश्न के उत्तर में 10 उप शीर्षक देने हैं तो आप हेड्स याद करने के साथ 10 अक्षर का फार्मूला बना लीजिये वह दसों शीर्षक क्रम से याद आते जाएंगे।

यहाँ मैंने अपनी क्षमता भर आपके प्रश्नों का समाधान देने का प्रयास किया है लेकिन याद रखें एक ही समस्या के कई समाधान होते हैं इसलिए हिम्मत न हारते हुए हम सबको तब तक प्रयास करना चाहिए जब तक समस्या समाधान न हो जाए अन्त में आपसे यही कहूँगा –

रास्ता किस जगह नहीं होता

सिर्फ हमको पता नहीं होता

छोड़ दें डरकर रास्ता ही हम

ये कोई  रास्ता नहीं होता।  

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दर्शन

EXISTENTIALISM/अस्तित्व वाद

April 7, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

अस्तित्व वाद एक ऐसा चिन्तन है जिसे दायरे में कैद करना बहुत मुश्किल है विश्लेषक कई बार इस भ्रम का शिकार हो जाते हैं कि क्या इसे दार्शनिक चिन्तन के परिक्षेत्र में स्वीकारा जाए। वस्तुतः यह एक सङ्कट का दर्शन है मानव आज स्वयं से भी अजनबी होता जा रहा है। यह विविध चिन्तनों के विरोध स्वरुप उत्पन्न हुआ है। और मानव मात्र के अस्तित्व से जुड़ा है, इसीलिए इस वाद के चिन्तन की धुरी मानव व उसका अस्तित्व ही है। अस्तित्ववाद सङ्कट (Crises) का वह दर्शन है जो बीसवीं शताब्दी की देन है और व्यक्ति के मौलिक व्यक्तिगत अस्तित्व पर बल देता है।

सोरेन किर्कगार्द, मार्टिन हीडेगर,जीन पॉल सात्रे वे प्रसिद्ध नाम हैं जो अस्तित्ववाद के पोषकों में सबसे महत्त्वपूर्ण हैं।

सोरेन किर्कगार्द(Soren Kierkegaard) चाहते थे कि व्यक्ति को चयन की पूर्ण स्वतन्त्रता मिले और जो वह बनाना चाहता है उसके लिए वह स्वतंत्र हो।

मार्टिन हीडेगर(Martin Heidegger) मानते थे कि मनुष्य का अस्तित्व नश्वर है सीमित है मृत्यु सभी सम्भावनाओं का अन्त कर देती है और सभी मनुष्यों की मृत्यु निश्चित है।

जीन पॉल सात्रे Jean Paul Satre (1905 -82) ने अपने दर्शन को अस्तित्ववादी स्वीकारा है वह इस दर्शन को किसी का पिछलग्गू नहीं मानता। वे स्वीकार करते हैं कि मनुष्य का अस्तित्व किसी पूर्वसत्ता और सिद्धान्त पर निर्भर नहीं करता बल्कि वे कहते हैं  ‘मैं हूँ इस लिए मेरा अस्तित्व है।’ 

DEFINITIONS OF EXISTENTIALISM

अस्तित्व वाद की परिभाषाएं –

अस्तित्ववाद वह दर्शन है जिसमें मानव की स्वतन्त्रता के सच्चे दर्शन होते हैं इसे हम एक अभिमत के रूप में स्वीकार कर सकते हैं इसे मानव जीवनके प्रति एक दृष्टिकोण कहना भी तर्क संगत होगा आर०एन० बेक महोदय  कहते हैं –

“The term (Existentialism) refers to a type of thinking that Emphasizes human existence and the qualities peculiar to it rather than to nature or Physical world.”

“अस्तित्ववाद एक प्रकार के चिन्तन की और संकेत करता है जो प्रकृति अथवा भौतिक संसार की अपेक्षा मनुष्य के अस्तित्व और उसके गुणों पर बल देता है।”

एक अन्य प्रसिद्ध विचारक एच० एच० टाइटस महोदय कहते हैं –

“Existentialism is an attitude and outlook that Emphasizes human existence that is distinctive qualities of individual persons rather than man in the abstractor nature and the world in general.”

“अस्तित्ववाद सामान्य रूप में विश्व और प्रकृति अथवा सामान्य मानव की अपेक्षा ‘व्यक्ति‘ के रूप में मनुष्य के विशिष्ट गुणों पर जोर देता है।”

अस्तित्ववाद के सम्बन्ध में प्रो ० रमन बिहारी लाल का कहना है –

“अस्तित्ववाद एक ऐसा बन्धनमुक्त चिन्तन है जो नियतिवाद एवं पूर्व निश्चित दार्शनिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक सिद्धान्तों एवं नियमों में विश्वास नहीं करता और यह प्रतिपादन करता है कि मनुष्य का स्वयं में अस्तित्व है और जो वह बनाना चाहता है उसका चयन करने के लिए स्वतंत्र है। इसके अनुसार मनुष्य वह है जो वह बन सका है अथवा बन सकता है और उसका यह बनना उसके स्वयं के प्रयासों पर निर्भर करता है। ”

अस्तित्व वाद की विभिन्न मीमांसाएँ  –

किसी दर्शन किसी को समझना उसकी मीमांसाओं को जानने से सरल हो जाता है आइये सबसे पहले जानते हैं –

अस्तित्ववाद की तत्व मीमांसा (Metaphysics of Existentialism) –

सात्रे चेतना और पदार्थ दोनों की सत्ता के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार करते हैं और कहते हैं कि वास्तु का अपना स्वतंत्र अस्तित्व है ,मानव की चेतना में आने से पहले भी वस्तु अस्तित्व में थी,  है और रहेगी। ये मानव के अस्तित्व को व्यक्तिगत मानते थे और विश्वास करते थे कि यह उसके साथ ही समाप्त हो जाने वाला है इनके अनुसार मनुष्य जन्म के साथ अस्तित्व में आता है और मृत्यु के साथ अस्तित्व विहीन हो जाता है। हीदेगर के अनुसार हताशा,चिन्ता तथा इसके द्वारा होने वाला दुःख स्वयं प्रमाणित है इनका अनुभव प्रत्येक मानव करता है।

अस्तित्ववाद की ज्ञान व तर्क मीमांसा (Epistemology of Existentialism) – 

इन विचारकों का मानना था कि मनुष्य जीवन पर्यन्त जो अनुभव विभिन्न माध्यमों से करता है और इस माध्यम से अपनी चेतना और भावनाओं को जिस प्रकार युक्त करता है वही ज्ञान है इस ज्ञान को वह स्वतंत्र तरीकों से विभिन्न विधियों द्वारा प्राप्त करता है। लेकिन यह सत्य तभी स्वीकारा जाएगा जब सत्यापित हो जाएगा। ये अनुभव जनित ज्ञान के ठीक विपरीत विचार को लेकर तर्क द्वारा ज्ञान की सत्यता को प्रमाणित करना आवश्यक मानते हैं।

अस्तित्ववाद की मूल्य व आचार मीमांसा (Values ​​and Ethics of Existentialism)-

ये मानव हेतु किसी पूर्व स्वीकृत मूल्य या आचार संहिता को स्वीकार नहीं करते,इनका तो मूल मन्त्र ही यह है की वह अपने अनुसार चयन के लिए स्वतन्त्र है ये स्वतन्त्रता और उत्तरदायित्व को ही मानव जीवन के आधार भूत मूल्य मानते हैं। सात्रे कहता है कि संसार बहुत कठोर है और इस कठोरता व दुरूहता का सामना कोई तभी कर सकता है यदि वह साहसी हो। अधिकाँश अस्तित्ववादी विचारक मृत्यु को सबसे बड़ा सत्य मानते हैं और स्वीकारते हैं कि मृत्यु का ज्ञान ही मनुष्य को सही मार्ग पर लाता है।

अस्तित्व वाद के मूल तत्व और सिद्धान्त

Fundamental Elements and Principles of Existentialism-

01 – केन्द्र बिन्दु मानव मात्र 

02 – केवल भौतिक जगत सत्य

03 – नियामक सत्ता के बिना ब्रह्माण्ड का अस्तित्व

04 – निराशा व दुःख विशद तत्व

05 – जीवन अन्तिम उद्देश्य विहीन

06 – मानव की स्वतन्त्र सत्ता

07 – चयन की स्वतन्त्रता

08 – विकास की निर्भरता स्वयं पर

अस्तित्ववाद और शिक्षा

Existentialism and Education

अस्तित्ववाद और शिक्षा

Existentialism and Education

शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है और इनका समूचा ध्यान वैयक्तिकता पर है यह दर्शन एक स्वतन्त्र दृष्टिकोण तो रखता है लेकिन कहीं कहीं अन्य दर्शनों को छूटा सा दीखता है वैयक्तिकता के क्षेत्र में यह आदर्शवादियों की तरह वैयक्तिकता के महत्त्व को स्वीकारता है आत्मविकास और आत्म अनुभव के विचार भी आदर्शवादियों से साम्य रखते हैं लेकिन फिर भी यह कई विचारों में इतना अलग है कि पलायन वाद की कोइ गुंजाइश नहीं छोड़ता ये कहते हैं –

“शिक्षा मनुष्य को उसके अस्तित्व और उत्तरदायित्व का बोध कराने की प्रक्रिया होनी चाहिए।”

मानव को अस्तित्वहीनता के दौर से हटाकर उसकी पुनः प्रतिष्ठा के क्रम में शिक्षा को उपयोगी साधन स्वीकार किया है। अस्तित्ववादी दृष्टिकोण से शिक्षा के उद्देश्यों व अंगों पर जो प्रभाव परिलक्षित हुए हैं उन्हें इस प्रकार व्यवस्थित किया जा सकता है।

शिक्षा के उद्देश्य  (Aims of Education ) –

1 – उत्तरदायित्व की क्षमता का विकास (To Development of Responsibility)

2 – अपने भाग्य का निर्माता स्वयं (The maker of own destiny)

3 – सृजनात्मकता का विकास (Development of creativity)

4 – शक्तिशाली व साहसी बनाना (Make strong and courageous)

5 – श्रेष्ठ मानव प्रजाति का विकास (Evolution of the best human species)

पाठ्य क्रम (Curriculum) –

इनके अनुसार व्यक्तियों की व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के कारण विविध विषयों को स्थान मिलना चाहिए। सौन्दर्यात्मकता और भावनाओं का महत्त्व अस्तित्ववादी महसूस करते हैं यही तो उन्हें अन्य प्राणियों से अलग करते हैं इस लिए कला,साहित्य,संगीत विषयों को स्थान मिलना चाहिए। किर्क गार्द मानव को नैतिक प्राणी मानते हैं इसलिए नीति शास्त्र की उपादेयता है। अस्तित्व रक्षार्थ व्यावसायिक विषयों को पाठ्य क्रम में स्थान आवश्यक है। धार्मिक विषयों के स्थान पर ये क्रियात्मक व वैज्ञानिक विषयों को संकट निवारणार्थ रखना चाहते हैं अर्थात भौतिक विज्ञान,रसायन विज्ञान,जीव विज्ञान ,कृषि विज्ञान,चिकित्सा शास्त्र,व तकनीकी विषयों पर बल देना चाहते हैं।

शिक्षण विधियाँ (Teaching Methods) –

यह समूह शिक्षण के पक्षधर नहीं हैं इसलिए निर्धारित पूर्व नियोजित शिक्षण विधियों कीजगह स्वाध्याय, चिन्तन, मनन,व अनुभव द्वारा सीखने की महत्ता प्रतिपादित करते हैं व तार्किक विधि का समर्थन करते हैं।ये विविध मंतव्यों हेतु विविध विधियों के समर्थक हैं।

शिक्षक (Teacher) –

इनका विचार है की अध्यापक अपने निर्णय बालकों पर न थोपें बल्कि उन्हें इस योग्य बनाएं कि वे अपने लिए उचित निर्णय ले सकें, विभिन्न परिस्थितियों से लड़ने हेतु उसे समर्थ बनाते हुए यह बोध भी कराना है कि वह अकेला है आत्मबोध से युक्त कर कर्मपथ पर बढ़ने का कौशल विकसित किया जाना है। इस प्रकार अध्यापक की भूमिका दुरूह है।

विद्यार्थी (Student) –

विद्यार्थी चयन हेतु स्वतन्त्र है और इस चयन व स्वतन्त्रता की रक्षा अध्यापक द्वारा की जानी चाहिए ये बालक की पूर्ण स्वतन्त्रता के  समर्थक हैं और उसके सम्मान का कार्य शिक्षा द्वारा सम्पादित होना चाहिए।

विद्यालय (School) –

जिस तरह ये विद्यार्थी की स्वतन्त्रता के पक्षधर हैं ठीक उसी तरह ये विद्यालयों को नियन्त्रण मुक्त रखना चाहते हैं  सामूहिक शिक्षा के स्थान पर व्यक्तिगत शिक्षा के पक्षधर हैं। ये मानते हैं की कुछ सिखाने या बालकों की स्वतन्त्रता छीनने के प्रयास न हों वे अपने आप ही सीखेंगे। कुछ चुने हुए लोगों का  बौद्धिक विकास कर उन्हें उत्तरदायित्व दिया जाना चाहिए।

अनुशासन (Discipline) –

ये मानते हैं की मनुष्य स्वभाव से ही अनुशासन प्रिय है और यदि उससे चयन में गलती हो जाती है तो इसका दुःख वह स्वयं भोगेगा  सुधार कर लेगा। ये किसी भी आचार संहिता के विरोधी थे। इस विचार धारा के अनुसार बालकों द्वारा उत्तरदायित्व पूर्ण व्यवहार सच्चा अनुशासन है। 

मूल्याङ्कन (Evaluation) –

अस्तित्ववाद पूर्व निश्चित ,मान्यताओं,धारणाओं,मूल्यों,धार्मिक नैतिक अवधारणाओं से छिटक  खड़ा हो गया है। संकट ग्रस्त हेतु इसने आकर्षक छवि बनाने का प्रयास अवश्य किया पर कोइ भी भारतीय विचारक इसे न तो शैक्षिक चिंतन में स्थान दे पायेगा  दार्शनिक चिन्तन में। ये मानव हेतु कोइ ऐसा आलम्ब न दे सका जो उज्जवल भविष्य हेतु  बोधक हो। शिक्षा के हर अंग पर इस वाद का प्रभाव कोई निशाँ न छोड़ सका। इन्हें सब कुछ मानव विरोधी लगता है।यही कह सकते हैं कि इनके इरादे बुरे नहीं थे बस सही रास्ता नहीं बना सके।

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