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वाह जिन्दगी !

मन प्रीत छोटे भाईयों के नाम करता हूँ .

July 16, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ममन प्रीत छोटे भाईयों के नाम करता हूँ

मैं हूँ बड़ा बस इसलिए आराम करता हूँ

तुम्हारा रुक कर पढ़ना वो याद है मुझे

उन विगत अग्रजों को राम राम करता हूँ ।1

याद गली मुहल्लों को बारम्बार करता हूँ

जिन वृक्षों ने खिलाया, धन्यवाद करता हूँ

तुम्हारी हर शरारत अब भी याद है मुझे

लोगों के प्रेम जज्बे को सलाम करता हूँ ।2

हर बात पर हास्य, कला याद करता हूँ

बन्द आँखकर ईश से फरियाद करता हूँ

वो अमरुद,आम,जामुन सब याद हैं मुझे

खट्टी मीठी उन यादों में हर वक़्त रमता हूँ ।3

मनस बरसाती स्नान से सानन्द भरता हूँ  

मौसमी बदलावों पर बस, आह भरता हूँ

नाव की हर सवारी अब भी याद है मुझे

त्यौहारी उन रंगों को आँखों में भरता हूँ ।4 

होती आँख नम तुम्हें जब आज लखता हूँ

जिम्मेदारी व दुश्वारियों से आज थकता हूँ

वो जिंदादिली के किस्से सभी याद हैं मुझे

दायित्व डूबे खून में आँसूओं से लिखता हूँ ।5

बेकली बेबसी में अब दिनरात फँसता हूँ

तुम्हारी बात याद कर जब तब हँसता हूँ

माँ पितृ युगल डाँटें अब भी याद हैं मुझे

क्या करूँ दिन में कई कई बार मरता हूँ ।6

मन प्रीत छोटे भाईयों के नाम करता हूँ

मैं हूँ बड़ा बस इसलिए आराम करता हूँ …….    

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काव्य

मैं अज्ञ हूँ ……. / Main Agy Hoon.

July 7, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मैं अज्ञ हूँ, तुम विज्ञ हो,

अल्पज्ञ मैं,  सर्वज्ञ तुम। 

मैं अंश हूँ, तुम पूर्ण हो,

मैं बूँद हूँ सागर हो तुम ।1।

मैं अनाथ हूँ तुम नाथ हो

मैं दीन, दीना नाथ तुम।

मैं कृति,  तुम उद्गार हो,

मैं आत्म हूँ परमात्म तुम ।2।

मैं क्षेत्र, तुम क्षेत्रज्ञ हो,

मैं गीत हूँ गायक हो तुम,

मैं पथिक तुम प्रकाश हो,

मैं शिल्प हूँ शिल्पी हो तुम ।3।

मैं गात हूँ, तुम चेतना,

मैं दीप हूँ ज्वाला हो तुम।

मैं रुण्ड हूँ तुम मुण्ड हो,

मैं अर्थी हूँ सारथी हो तुम।4।

मैं अज्ञ हूँ तुम विज्ञ हो,

अल्पज्ञ मैं, सर्वज्ञ तुम।।…….   

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काव्य

पितृ प्रेम का सारा परिचय……………

June 21, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

पितृ प्रेम का सारा परिचय एक दिवस से जुड़ आया।

उसी दिवस के कुछ लम्हों  में, पिता उन्हें याद आया ।

वही पिता जिसने सर्वस्व जीवन का हरपल बिखराया।

वक़्त ने निज चाल बदल ली बदला बदला क्षण आया ।।

पितृ और मातृशक्ति ने मिलजुल करके नीड़ बनाया।

उसी नीड़ की छाया में तन मन टुकड़ों को सरसाया।

इक दूजे का हाथ थाम दृढ़ता व प्रेम का पाठ पढ़ाया।

नईनवेली शिक्षा ने दोनों हित अलग से दिवस बनाया।।

ऐसा लगता रात्रि बिन दिन का अस्तित्व उभर आया।

धूप का शुभअस्तित्व बना तभी तो प्रिय लगती छाया।

बच्चों ने अपने हृदयों  में, जिनको न कभी अलग पाया।

उन्हें अलगथलग करने का कुचक्र नया चलता पाया ।।

ये सब खेल बाज़ारों का है बहुत देर में समझ आया।

कार्ड,उपहार,कृत्रिम साधन हैं हमने तोअमूल्य पाया।

एक दिवस में ना सिमटेगा भारतीय मन ने समझाया।

मातृ पितृ ऋण चुक जाए जीवन इस हित छोटा पाया।। 

जीवन में जो पढ़े आज तक उससे यही समझ आया।

कृतज्ञता भाव महिमा अपार, हमसे कुछ ना हो पाया।

ईश्वर ने मातृ पितृ रूप में दे दी ‘ नाथ ‘ अद्भुत छाया।

यह जीवन है उन्हें निछावर जिसने ये अस्तित्व दिलाया।।

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वाह जिन्दगी !

अकुलाना छोड़ दे। Akulana Chhor De.

June 9, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

सपने देख कर बड़े बड़े नज़रें चुराना छोड़ दे।

ना होंगे पूरे पड़े पड़े इसलिए इतराना छोड़ दे।

ख़ुदी हो इतनी बुलन्द कि वो घबराना छोड़ दे।

पसीना बहा क्षमता भर आलस्य लाना छोड़ दे।

छोटे रस्ते मत ले चल ईमानदारी की डगर पर।

तड़प सपनों के लिए बस दुनिया दारी छोड़ दे।

दिन हो चाहे रात हो हाँ नज़र हो बस ध्येय पर।

मौसम, महीना देख मत सब ही बहाने छोड़ दे।

विविध जन बताएंगे कि ऐसा कर वैसा न कर।

मेहनत ही औजार हो जिन्दादिली को जोड़ दे।

नाथ संशय छोड़ दे व कण्टक पथ की राह धर।

सफलता अनुचर बनेगी अब अकुलाना छोड़ दे।    

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वाह जिन्दगी !

मुझसे कितना दूर भागता मेरा मन ? 

June 1, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मेरा बिलकुल कहा न करता मेरा मन,

क्या यह सम्भव है दोनों में अन बन पन ?

बहु बन्धन में बस बँध जाता मेरा तन,

पर बिल्कुल, स्वच्छन्द घूमता मेरा मन।

मुझसे कितना दूर .. .. .. ..

अन्तर्मुखता से जुड़ता जाता है यह तन,

पर बहिर्मुखी बनता जाता है, मेरा मन।

कर्त्तव्यपथ पर बढ़ने को तत्पर यह तन,

पर केवल अधिकार चाहता है ये मन।

मुझसे कितना दूर .. .. .. ..           

गुत्थम – गुत्था होता रहता है तन मन,

ऐसा लगता नहीं किसी से कोई कम।

जीवन यापन को प्रस्तुत होता है तन,

कल्पना जगत में रह जाता बेचारा मन।

मुझसे कितना दूर .. .. .. ..

समझ समस्या सुलझाने को तत्पर तन,

पर मन उड़ता लेने को आकाश कुसुम।

आवारागर्दी से मन की, तपता है तन ,

पर बाज नहीं आता फितरत से मेरा मन।

मुझसे कितना दूर .. .. .. ..

सभी विवशताओं से विवश होता है तन,

लेकिन सारी डोर काट, उड़ जाता मन।

धरातलीय ठोकर खाने को प्रस्तुत तन,

पर सब तथ्यों को हल्के में लेता है मन।   

मुझसे कितना दूर .. .. .. ..

ऐसा कब तक द्वन्द चलेगा ऐ तन मन ,

दोनों में अब संगत करवा दे अन्तर्मन।

जीवन के चलने तक चलता है ये तन,

तन के साथ ‘ नाथ ‘ हरण होता है मन।

मुझसे कितना दूर .. .. .. ..

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वाह जिन्दगी !

संग्राम तय करना पड़ेगा ।Sangram Tay Karna Padega,

May 27, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शाश्वत नियम है परिवर्तन सहज हो वरना पड़ेगा ।

जड़त्व, ठहराव, स्थिरता मोह तज चलना पड़ेगा ।।

गर इस चक्कर में पड़े तो समय तुम्हें पिछड़ा कहेगा ।

प्रगति हमराह को बदलता ताललय सुनना पड़ेगा ।1।

देखना नव प्रभात में, दिन मान पुनः ऊपर उठेगा।

आशा का दामन पकड़ विश्वास से कोपल खिलेगा।

विश्वास को तुम साध लेना फिर मनस ऊँचा उठेगा।

पुरातन इस धरातल पर, नव शुभ्र सा उगने लगेगा।2।

वेदना का मर्म जान कर नव कारवाँ जुड़ने लगेगा।

मर्माशय भेद का समझ मर्मज्ञ मनस बनने लगेगा।

सारे भावों को समझ यह मन मनन करना लगेगा।

सुशासन समागम पर शुभ लाभ नव जुड़ने लगेगा ।3।

नेपथ्य में कुछ शोर है, नेतृत्व सहज करना पड़ेगा।

भीड़ सारी दिशा हीन, दिशाबोध से जुड़ना पड़ेगा।

पत्तियों को जल दिया तो, फर्क भूतल क्या पड़ेगा।

सोच कर सब बातें हवाई जमीन से जुड़ना पड़ेगा।4।

सोचना ये सब छोड़ दें कौन कबकब क्या कहेगा।

आत्मबल केवल सद्कर्म कर संग तेरे रैला चलेगा।

सच से बिल्कुल मत भटकना धैर्य से बढ़ना पड़ेगा।

धैर्य, संयम, वीरता संग उत्साह मेल करना पड़ेगा ।5।

छोड़ दो दुर्भावना सब राष्ट्रवाद अब गढ़ना पड़ेगा।

धीमी गति कुछ नहीं अब, तीव्रता से बढ़ना पड़ेगा।

सीख है इतिहास की, कौशल बदल चलना पड़ेगा।

‘ नाथ ‘ डर कर कुछ नहीं संग्राम तय करना पड़ेगा ।6।

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काव्य

त्रास मत दीजिए।Traas Mat Deejiye,

May 23, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मूल्य की सीढ़ियाँ सत्यपथ पर बढ़ें

त्रास मत दीजिए, त्रास मत दीजिए।

बाँसुरी का जमाना, विदा हो चुका

ओज ले वीरपथ अनुकरण कीजिए।।

इस कठिन दौर में हम सभी चल रहे

अब न आराम है, काम ही काम है।

थम गए तुम अगर लक्ष्य कैसे मिले

प्रगति जिन्दगी शुभ का नव नाम है।

कर्म पथ से, कहीं  अब  भटकें नहीं

अनुसरण कीजिए अनुसरण कीजिए।

मूल्य की सीढ़ियाँ …….. …….. ……..

कुछ सभी काम में खामियाँ खोजते

नहीं करते हैं कुछ और बस बोलते ।

उन  सभी से निवेदन,  यही है यही 

छोड़ मन भेद निश्चित कर लो अभी।

सारे आदर्श,  मिल जाएंगे  देश  में

अनुगमन कीजिए,अनुगमन कीजिए।

मूल्य की सीढ़ियाँ …….. …….. ……..

दृढ़  प्रतिज्ञा करें, आत्म निर्भर बनें

कर्म हो सर्व प्रथम फिर सपने गढ़ें।

अति कुशल, हम बनें व आगे बढ़ें

तोड़ दें रूढ़ियाँ हर दम आगे चलें।

देशहित में सभी भेद तज दें अभी

आइए सौम्यपथ का वरण कीजिए।

मूल्य की सीढ़ियाँ …….. …….. ……..

कुल घाती कुछ तो रहेंगे संग सदा

वक़्त के साथ, वो भी बदल जाएंगे।

जो भटकते रहे स्वार्थवश ही सदा

वो कब तक भला अब बच पाएँगे।

मुख्य धारा, बुलाती सदा ही  रही

नाथ अब प्रेमरस आचमन कीजिए।

मूल्य की सीढ़ियाँ …….. …….. ……..

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काव्य

हमें सोने नहीं देतीं।/ Hamen Sone Naheen Deteen.

May 22, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

तेरी यादों की बारातें

हमें  सोने नहीं  देतीं।

गुम होनाभी अगर चाहूँ,

तो गुम होने नहीं देतीं।।

जाने क्यों खूबसूरत से

वो मञ्जर याद आते हैं।

उन्हें ग़र भूलना चाहूँ,

भुलाने भी नहीं देतीं ।।

बूढ़ा  हो  गया  हूँ  मैं

कशिश यादों में बाकी है।

उनसे बचना  गर चाहूँ

तो बचने भी नहीं देतीं ।।

नाबीना हो गया हूँ मैं

यादों में नूर बाकी है।

चाहूँ गर्दिश में मैं खोना,

तो खोने भी नहीं देती ।।

आँधीअंधड़ की मौसम से

अजब सी, दोस्ती है ये

नाथ आँसू लरजते हैं

बरसने भी नहीं देतीं ।।

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वाह जिन्दगी !

अध बुना था स्वपन ……..

May 21, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

अध बुना था स्वपन अधबना रह गया

सिलसिला जो रुका, तो रुका रह गया। 

वक़्त ने तंग दिल चाल कुछ ऐसी चली

जो रुका जिस जगह वह वहीं रह गया।

मैंने  चलने की पुर जोर कोशिश  करी

क्या करूँ पीछे पर काफिला रह गया।

आँधिया यादों की क्यों कर भारी पड़ीं

तब मैं ज्यों बुत बना त्यों बना रह गया।

तेरी स्मृति में, अँखियाँ  भी पथरा गयीं

जिस जगह पे पड़ा था अड़ा रह गया।

मेरे मन की तपन हर दम  बढ़ने लगी

मेरा सबकुछ जला बस धुआँ रह गया।

मिलन की भावना, प्रणय  सीढ़ी  चढ़ीं

तन तो, सारा जला पर मनस रह गया।

बेरुखी ने, सितम का शिखर छू लिया

नाथ जड़वत खड़ा था, खड़ा रहगया। 

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Uncategorized•वाह जिन्दगी !

दीर्घ कालिक युवा ऊर्जा बनाये रखने के उपाय।

May 18, 2020 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

दीर्घ कालिक युवा ऊर्जा बनाये रखने के उपाय | Way to keep yourself young for long time

हमें जीवन पर्यन्त क्रियाशील रहने के लिए और शैथिल्य या बुढ़ापे में भी युवाओं जैसी ऊर्जा बनाये रखने हेतु मष्तिस्क की जाग्रत स्थिति बनाये रखने के लिए निम्न बिंदुओं पर कार्य करना होगा।

महत्त्वपूर्ण तथ्य  ( Important Facts )-

(0 1) – मष्तिस्क के वातायन में सकारात्मक विचारों के नवीनतम झोंके आने दें।

(0 2) – मष्तिस्क को आदेश दें कि हमेशा सक्रिय रहना सम्भव है।

(0 3) – हल्का व्यायाम हमारी दिनचर्या का हिस्सा होना चाहिए।

(0 4) – प्रतिदिन प्राणायाम अवश्य किया जाना चाहिए।

(0 5) – टहलना एवम् खुश रहना चमत्कारिक प्रभाव देगा।  

(0 6) – सुपाच्य भोजन, फल आदि ग्रहण करके पेट ठीक रखा जाना चाहिए। 

(0 7) – जल की पर्याप्त मात्रा का सेवन करें।

(0 8) – स्वच्छ वस्त्र ,शुचिता एवं एवम् उत्तम वातावरण में रहें।

(09) – आध्यात्मिक चिन्तन को दिनचर्या का अनिवार्य अंग बनाएं।

(10) – कम बोलें, खुश रहें, खुश रहने दें के सिद्धान्त पर कार्य करें।   

(11) – अपने से कम उम्र के लोगों से मिलें उनके अच्छे विचारों का स्वागत करें।

(12) –  पुरानी अनावश्यक वस्तुओं के मोह से बचें।

(13) – अनावश्यक वस्तु एवम् विचार संग्रह न करें।

(14) –  यथोचित व यथा समय पर्याप्त नींद लें।

                        उक्त तथ्यों से जुड़कर आप अवश्य कह उठेंगे, वाह जिन्दगी।

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