रूसो का जीवन बहुत से विरोधाभासों का एक समुच्चय है,वह जेनेवा के एक साधारण कसवे में पैदा हुआ
जिसकी माँ बाल्यावस्था में चल बसी और पिता ने उपन्यासों, कल्पना, संवेदना
द्वारा उसे अकाल प्रौढ़ता प्रदान कर दी, वह
दो वर्ष जेनेवा से बाहर रहा जिसमें उसे प्रकृति के प्रति अनुराग जाग्रत हुआ। उसका
निजी जीवन निम्न कोटि का रहा काहिली और बुरी सङ्गति में उसने कई वर्ष व्यतीत किये
बाद में जीवन की कृत्रिमताओं ने उसे व्यथित कर दिया लेकिन इन सारी स्थितियों में
वह अध्ययन करता रहा वह उसकी निम्न कोटि की नौकरी के कारण जैसा भी रहा। कृत्रिमता
के प्रति घृणा का स्तर बढ़ा और प्रतिक्रिया स्वरुप व्यर्थ सामाजिक आदर्श, कृत्रिमता के आवरण में लिपटी चरित्र हीनता को
जब उसने जनमानस के समक्ष रखा तो सुषुप्त जनमानस में क्रांतिकारी ज्वार आ गया और वह
अकस्मात् प्रसिद्द हो गया। अन्ततः वह एक अच्छे अध्यापक, नाटककार, संगीतज्ञ
व लेखक के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उसने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ सृजित किये।
1 – प्रोजेक्शन फॉर द एजुकेशन ऑफ़ एम० डीसेंट मैरी
2 – डिस्कोर्स ऑन द साइंसेज
एन्ड आर्ट्स (1750)
3 – ओरिजिन ऑफ़ इनइक्विलिटी एमंग मैन (1755)
4 – डिस्कोर्सऑन पोलिटिकल इकोनॉमी (1755)
5 – द न्यू हेलाइस (1761)
6 – द सोशल कॉन्ट्रेक्ट (1762)
7 – एमील (1762)
8 – सोशल इनइक्विलिटी(1754)
9 – कॉनफैशन ऑफ़ द विकार ऑफ़
सेवाय
रूसो के अनुसार शिक्षा (Education according to Rousseau)-
1 – शिक्षा
एक स्वाभाविक प्रक्रिया
2 – शिक्षा
के दो रूप
(a) – सार्वभौमिक शिक्षा -राज्य द्वारा जैसा कि
प्लैटो की रिपब्लिक में
(b) – घरेलू शिक्षा – घर द्वारा जैसा कि एमील में
वर्णित
3 – आन्तरिक
शक्ति का विकास सच्ची शिक्षा
Rousseau –
“True education is something
that happens from within the individual. It is an unfolding of his own latent
powers.”
“सच्ची शिक्षा वह है जो व्यक्ति के भीतर से होती है। यह उसकी अपनी
गुप्त शक्तियों का प्रकटीकरण है।”
4 – शिक्षा
सभी के लिए आवश्यक
5 – शिक्षा
का परम लक्ष्य – सुव्यवस्थित स्वतन्त्रता
रूसो महोदय के अनुसार –
“वही व्यक्ति स्वतन्त्र है जो उसी बात की
कामना करता है जो करना चाहता है और वही करता है जो चाहता है।”
6 – शिक्षा
आयु के अनुसार →शैशवावस्था →बाल्यावस्था →किशोरावस्था →युवावस्था
7 – शिक्षा
का उद्देश्य मानव को मानव बनाना →रूसो
स्वयं कहते हैं कि →
“मैं यह बात स्वीकार करता हूँ कि मेरे पढ़ाने के
बाद वह सबसे पहले मनुष्य बनेगा,न्यायाधीश,सैनिक,पादरी
बाद में। ”
8 – शिक्षा
प्राकृतिक शक्तियों का विस्तार → उन्होंने
स्पष्ट रूप से कहा –
“यह प्राकृतिक शक्तियों का एक विस्तार है न कि
सूचनाओं का एक संग्रह। यह स्वयं जीवन है न कि बाल्यजीवन की रुचियों एवं विषमताओं से दूर भावी जीवन की एक तैयारी। ” ((भाषा और भूगोल थोपना गलत)
शिक्षा के उद्देश्य (Aims of education) –
1 – इन्द्रिय
प्रशिक्षण (Sense training)
2 – शारीरिक
विकास (Physical
development)
3 – बुध्दि
का विकास (Development of intelligence)
4 – भावात्मक
विकास Emotional
development)
5 – जीवन
कला (Life art)
6 – अधिकार
रक्षा (Protection of
rights)
7 -व्यक्तित्व
विकास (Personality development)
पाठ्यक्रम (Syllabus) →
रूसो महोदय ने पाठ्यक्रम को तीन भागों में बाँटा –
A – प्रकृति
सम्बन्धी विषय – प्राकृतिक विज्ञान,भूगोल
आदि
B – मनुष्य
सम्बन्धी विषय – भाषा,मनोविज्ञान,समाजिकशास्त्र, राजनीति शास्त्र,अर्थशास्त्र,आदि।
C – वस्तु
सम्बन्धी विषय – भौतिक शास्त्र और पदार्थ विज्ञान।
4 – युवावस्था
→ धर्म, नीति, इतिहास, कला, संगीत, यौन
शिक्षा, प्राकृतिक विज्ञान, अर्थ शास्त्र, राजनीति शास्त्र,सामाजिक
शास्त्र आदि
नारी शिक्षा हेतु गृह
विज्ञान,संगीत,नृत्य,सिलाई,बुनाई,धर्म,नीति
आदि ।
*निषेधात्मक शिक्षा – रूसो महोदय के अनुसार -→
“शिक्षा निषेधात्मक होनी चाहिए। निषेधात्मक शिक्षा का अर्थ आलस्य में
समय बिताना नहीं है बल्कि जो ज्ञान देने के पूर्व बालक के शारीरिक व मानसिक विकास
के द्वारा उसे विचारशील बनाती है वही निषेधात्मक शिक्षा है। इस शिक्षा के द्वारा
बालक अपना अच्छा बुरा पहचानने में समर्थ हो जाता है।”
रूसो तत्कालीन व्यवस्था से इतना दुःखी था कि उसे कहना पड़ा -→
“Take the reverse of the accepted practice and you will
almost always do right.”
“शिक्षा के जितने प्रचलित सिद्धान्त हैं उसके विपरीत कार्य करो तभी
तुम सही काम कर सकोगे।”
शिक्षण विधियाँ (Teaching methods) –
व्यवसाय की शिक्षा तथा हाथों का प्रयोग उसे प्रिय है पुस्तकों में
संलग्नता की जगह हाथों का काम उचित है इस हेतु ‘योजना पद्यति’
का एक रूप उसने दिया। करके सीखना, योजना
पद्यति का वर्णन उसने व्यवहार वाद से पहले ही कर दिया। केवल भाषण व आदेशात्मक
शिक्षा का वह विरोधी था। भ्रमण द्वारा शिक्षा, प्रकृति
निरीक्षण व स्व अनुभव द्वारा शिक्षण पर वह बल देता था। उसने स्वयं शोध व
उपदेशात्मक शिक्षण विधि को स्वीकार किया।
गुरु शिष्य सम्बन्ध (Teacher-disciple relationship) –
वह बालकेन्द्रित शिक्षा पर अधिक बल देता है, अध्यापक शिक्षा हेतु वातावरण सृजित करे उसकी
महती भूमिका परदे के पीछे है। कृत्रिमता से हटाकर प्रकृति सानिध्य में लाने का
कार्य अध्यापक का है उसने ऐन्द्रिक विकास हेतु शिक्षक का आवाहन किया और कहा –
“All wickedness comes from weakness, a child is
bad because hi is weak, make him strong and hi will be good.”
“सारे दोष कमजोरी से आते हैं बालक कमजोर है
इसलिए बुरा है उसे बलिष्ठ बनाओ और वह अच्छा हो जाएगा।”
अनुशासन (Discipline) –
ये बच्चे को समाज से दूर प्राकृतिक वातावरण में रखना चाहते थे इनका
मानना था –
“Everything is good as it comes from the hands of
the author of nature, men maddle with it and it degenerates.”
“सब कुछ अच्छा है क्योंकि यह प्रकृति के लेखक के
हाथों से आता है, पुरुष इसके साथ खिलवाड़ करते हैं और यह पतित हो जाता है।”
इसीलिये इन्होने स्वतन्त्रता का सिद्धान्त व प्राकृतिक परिणामों को
स्वीकारने की बात कही।
विद्यालय (School)-
ये चाहते थे की प्राकृतिक वातावरण में विद्यार्थी स्वतन्त्रता पूर्वक
अध्ययन करें और अध्यापक उनके सहयोगी के रूप में कार्य करें न कि अनुदेशक के रूप
में। बच्चे को प्रेम पूर्वक सिखाएं व अधिकतम स्वतन्त्रता प्रदान करें।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उनके कई विचार
अर्थहीन हो चुके हैं लेकिन उनका ‘प्रकृति की ओर लौटो‘
का नारा आज भी प्रासंगिक है और बाल केन्द्रित
शैक्षिक अवधारणाएं आज भी रूसो के विचारों की प्रदक्षिणा करती दीखती हैं। उन्हें
लोकतन्त्र के प्रणेता के रूप में हमेशा याद किया जाएगा।
इससे आशय आंग्ल भाषा के Creativity से है सर्जनात्मकता शब्द कुछ ऐसे शब्दों द्वारा भी लोगों द्वारा
अभिव्यक्त किया जाता है जो अर्थ में इससे अन्तर रखते हैं जैसे विधायकता, उत्पादकता, खोज
आदि जबकि विधायकता से एकत्रीकरण का,उत्पादकता(Productivity) से उत्पादन का और खोज से Search या Discovery का बोध होता है। सृजनात्मकता को इसका पर्याय या
सबसे करीबी माना जा सकता है जब कि सृजन में शून्य का भाव निहित है और सर्जन में
वर्तमान या विद्यमान में नवीनता या मौलिकता की सृष्टि करनी पड़ती है। वर्तमान
परिप्रेक्ष्य में सर्जनात्मकता के समानान्तर सृजनात्मकता, रचनात्मक, सर्जक,उत्पन्न करना, बनाना आदि को आवश्यकता नुसार लिया जा सकता है।
सर्जनात्मकता की परिभाषाएं (Definitions of creativity) :-
विविध विद्वानों द्वारा इसे विविध रूप से पारिभाषित किया गया है स्टेन
महोदय का मानना है –
“When it results in a novel work that is accept
as tenable or useful or satisfying by a group at some point in time.”
“जब किसी कार्य का परिणाम नवीन हो जो किसी समय
में समूह द्वारा उपयोगी मान्य हो, वह कार्य सृजनात्मकता कहलाता है। ”
एक अन्य विद्वान् मेडनिक महोदय का मानना है कि –
“Creative thinking consists of forming new
combinations of associative elements. Which combinations either meet specified
requirements or are in some way useful.The more mutually remote the elements of
new combinations. The more creative is the process of solution.”
“सर्जनात्मक चिन्तन में साहचर्य के तत्वों का
मिश्रण रहता है जो विशिष्ट आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु संयोगशील होते हैं या किसी
अन्य रूप में लाभ दायक होते हैं। नवीन संयोग के विचार जितने कम होंगे,सृजनात्मकता की सम्भावना उतनी ही अधिक होगी।”
क्रो एण्ड क्रो महोदय का विचार है :-
“Creativity is a mental process to express the
original outcomes.”
“सृजनात्मकता मौलिक परिणामों को व्यक्त करने की मानसिक प्रक्रिया
है।”
एक अन्य महत्त्वपूर्ण विचारक सी० वी ० गुड महोदय का मानना है :-
“A quality of thought to be composed of broad
continue upon which all members of the population may be placed in different
degrees, the factors of creativity are tentatively described as associate and
ideational fluency, originality adaptive and spontaneously flexibility and
ability to make logical evaluation
“सर्जनात्मकता वह विचार है जो किसी समूह में
विस्तृत सातत्य का निर्माण करता है सर्जनात्मकता के कारक हैं -साहचर्य, आदर्शात्मक मौलिकता, अनुकूलता,सातत्यता,लोच एवम तार्किक विकास की योग्यता।”
उक्त विचारों के आलोक में कहा जा सकता है कि सर्जनात्मकता में
मौलिकता, नवीनता, उपयोगिता, संयोग से सृजन, आवश्यकतानुसार सृजन के गुण विद्यमान रहते हैं। जिनका आधार चिन्तन
होता है।
विद्यार्थियों में
सृजनात्मकता की वृद्धि के उपाय (Ways to increase creativity in students) –
1- विद्यार्थियों
की प्रतिक्रियाओं को उचित सम्मान (Due respect to the responses of the students)
2 – कल्पना
आधारित प्रस्तुतीकरण (Imagination Based Presentation)
3 – पाठ्यक्रम
में क्रिया आधारित अधिगम को बढ़ावा (Promotion of action based learning in
the curriculum)
4 – सूचना
संग्रहण, आकलन
विश्लेषण का उपयोग (Information collection, use of assessment analysis)
5 – पाठ्य
सहगामी क्रियाओं से सृजनशीलता का विकास (Development of creativity through
co-curricular activities)
6 – उपयुक्त
शिक्षण विधियों का प्रयोग (Use of appropriate teaching methods)
7 – तार्किकता
का उन्नयन (Upgrading
Logic)
8 – अभिव्यक्ति
के समुचित अवसर (Reasonable opportunities for expression)
विषय वस्तु को अध्ययन व अधिगम के दृष्टिकोण से निम्न भागों में बाँट
कर अध्ययन करेंगे :-
1 – सामाजिक
नियन्त्रण की अवधारणा (concept
of social control)
2 – सामाजिक
नियन्त्रण से आशय व विविध परिभाषाएं
(Meaning and definitions of social
control)
3 – शैक्षिक
विकास में सामाजिक नियन्त्रण की भूमिका
(Role of
social control in educational development)
4 – निष्कर्ष
(Conclusion)
1 – सामाजिक नियन्त्रण की अवधारणा (concept of social control): –
भारत में सामाजिक नियन्त्रण की अवधारणा सर्वाधिक पुरातन व सनातन है
सर्व प्रथम ऋषि परम्पराओं व उनके निर्देशों में इनके दर्शन होते हैं और इनका
सर्वाधिक व्यवस्थित रूप कर्म प्रधान वर्ण व्यवस्था में द्रष्टव्य होता है विविध
राजाओं, कबीलों व समुदायों की व्यवस्था में भी इसके अंश
दिखाई देते हैं। कर्म प्रधान वर्ण व्यवस्था पर विविध विद्वत जनों ने कार्य किया
है।
हम स्वभावतः या उदार या गुलाम मानसिकता के चलते
हर विचार की जड़ हिन्दुस्तान से बाहर देखना चाहते हैं इस क्रम में अमेरिका के
प्रसिद्द समाज शास्त्री E.A.Ross की 1901 में लिखी गई पुस्तक सोशल कन्ट्रोल (SOCIAL
CONTROL) का
आधार लिया जाता है इन्होने अपनी पुस्तक में व्यवस्थित रूप से समाज के नियन्त्रण
कार्य, संस्थाओं
में धर्म, विश्वास
कानून नैतिकता लोकमत रीति रिवाज व शिक्षा की भूमिकाओं का वर्णन किया है।
2 – सामाजिक नियन्त्रण से आशय व विविध परिभाषाएं
(Meaning and definitions of social
control)
सामाजिक नियंत्रण से आशय उस नियंत्रण से है जिसमें समाज की उन्नति के
बीज छिपे होते हैं इस हेतु जिन मर्यादाओं परम्पराओं व नियमों का अनुपालन आवश्यक
होता है उसके सुनिश्चितीकरण का प्रयास
किया जाता है। इसके माध्यम से समूह द्वारा निर्धारित नियमों का अनुपालन कराने हेतु
बाध्यकारी शक्तियों को भी प्रयोग में लाया जाता है। वस्तुतः सामाजिक उद्देश्यों व
सामाजिक आदर्शों के स्थापन हेतु इनका प्रयोग किया जाता है।
प्रसिद्ध समाजशास्त्री रॉस महोदय कहते हैं –
“सामाजिक नियन्त्रण का तात्पर्य उन तमाम
व्यक्तियों से है, जिसके द्वारा समुदाय व्यक्तियों को अपने अनुसार
ढालता है। ”
“Social
control refers to all those individuals by which the community molds
individuals according to itself.”
मैकाइवर व पेज के अनुसार –
“सामाजिक नियन्त्रण से आशय उस तरीके से है
जिससे सम्पूर्ण सामाजिक व्यवस्था अपने को संगठित बनाये रखती है।”
“Social
control refers to the manner in which the whole social system keeps itself
organized.”
बोगार्ड के अनुसार –
“सामाजिक नियन्त्रण वह पद्यति है,जिसमें एक समूह अपने सदस्य के व्यवहारों को
नियन्त्रित करता है। ”
“Social
control is the method in which a group controls the behavior of its
members.”
लेण्डिस महोदय के अनुसार –
“सामाजिक नियन्त्रण वह प्रक्रिया है जिसके
द्वारा सामाजिक व्यवस्था स्थापित तथा बनाये राखी जाती है।”
“Social
control is the process by which social order is established and
maintained.”
आर. जी. स्मिथ महोदय के अनुसार –
“सामाजिक नियन्त्रण उन उद्देश्यों की प्राप्ति
है जो उन उद्देश्यों के साधनों के प्रति चेतन सामूहिक अनुकूलन द्वारा होती है।”
“Social control is the attainment of those
objectives by conscious collective adaptation to the means of those
objectives.”
3 – शैक्षिक विकास में सामाजिक नियन्त्रण की भूमिका
(Role of social control in educational development)
01- व्यवहार नियन्त्रण द्वारा शैक्षिक विकास(Educational Development by Behavioral
Control)
02- सामाजिक समानता को प्रश्रय (Supporting social equality)
03- स्वीकृत मूल्यों का स्थापन(Establishment of Accepted Values)
04- एकता स्थापन हेतु (To establish unity)
05- व्यावहारिक प्रतिमानों व सामाजिक बुराइयों के
प्रति सजगता(Awareness of practical norms and social evils)
06- शैक्षिक सामाजिक उद्देश्यों का गठन(Formation of Educational Social
Objectives)
07- विविध निष्पादित कार्यों में सन्तुलन(Balance in various tasks)
08- सुख, शान्ति स्थापन(Happiness, Peace Establishment)
09- समरसता को बढ़ावा (Promote harmony)
10 – रूढ़िवाद से मुक्ति(Freedom from conservatism)
4 – निष्कर्ष (Conclusion):
सारतः कहा जा सकता है कि निष्पक्ष सामाजिक नियन्त्रण मानव मात्र की प्रगति का एक सुखद उपागम है इससे अन्ततः मानवीय मूल्यों का संरक्षण होगा और मानव की क्रमिक प्रगति को बढ़ावा मिलेगा। शिक्षा को नई व्यावहारिक दिशा मिलेगी और यहां की स्थितियों के आधार पर कार्य संपन्न हो सकेंगे।
भारतीय षड दर्शन में सांख्य सर्वाधिक प्राचीन
है सांख्य सिद्धान्त के संकेत छान्दोग्य, प्रश्न, कठ और विशेषतया श्वेताश्वर उपनिषद से प्राप्त
होते हैं याकोबी के अनुसार इसका प्रगटन उपनिषदों के रचनाकाल के बीच हुआ। प्राचीन
काल से ‘नहि
सांख्य सम ज्ञानम्’
कहकर इसकी प्रशंसा की जाती रही है इसी आधार पर
मैक्समूलर जैसे पाश्चात्य विद्वान ने इसे
अद्वैत वेदान्त के बाद हिन्दुओं का प्रिय और प्रमुख दर्शन कहा है। आचार्य शंकर ने
इसे वेदान्त का प्रमुख मल्ल कहा है। सांख्य दर्शन को ‘षष्टि तन्त्र ‘ के नाम से भी जाना जाता है आचार्य कपिल सांख्य के प्रतिस्थापक आचार्य
माने जाते हैं।
इस दर्शन ने सर्वप्रथम तत्वों की गिनती की
जिसका ज्ञान हमें मोक्ष की ओर ले जाता है गिनती को संख्या कहते हैं संख्या की
प्रधानता के कारण इस दर्शन का नाम सांख्य पड़ा।
दूसरी व्याख्या के अनुसार सांख्य का अर्थ विवेक
ज्ञान है प्रकृति तथा पुरुष के विषय में अज्ञान होने से यह संसार है और जब हम इन
दोनों के ‘विवेक’ को
जान लेते हैं कि पुरुष प्रकृति से भिन्न तथा स्वतन्त्र है तब हमें मोक्ष की
प्राप्ति होती है। इसी विवेक ज्ञान की
प्रधानता होने के कारण इस दर्शन का नाम सांख्य पड़ा।
आचार्य कपिल की दो रचनाएँ उपलब्ध हैं एक तत्व
समास और दूसरी सांख्य सूत्र। तत्व समास सांख्य दर्शन की प्राचीनतम रचना है इसमें
केवल 22 सूत्र हैं सांख्य सूत्र में केवल 537 सूत्र हैं इसकी व्याख्या में निम्न सांख्य
ग्रन्थ उपलब्ध हैं।
1 – सांख्य कारिका (ईश्वर कृष्ण)
2 – जय मङ्गला
3 – युक्ति दीपिका
4 – हिरण्य सप्तति (परमार्थ भिक्षु)
5 – सांख्य तत्व कौमुदी (वाचस्पति मिश्र)
6 – चन्द्रिका (नारायण तीर्थ)
7 – सरल सांख्य योग (हरि हराण्यक
8 – सांख्य प्रवचन (विज्ञान भिक्षु)
9 – सांख्य तत्व विवेचन
(सोमा नन्द)
10 – सांख्य तत्व यथार्थ दीपन (भाव गणेश)
सांख्य दर्शन के अनुसार शिक्षा :-
सांख्य दर्शन में प्रकृति तथा पुरुष दोनों को
मूल तत्व माना गया है और इन दोनों में मूल भूत अन्तर किया गया है इस प्रकार शिक्षा
की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए जो प्रकृति और पुरुष
भेद का ज्ञान प्रदान कर सके। यह शिक्षा प्रक्रिया को बालकेन्द्रित बताते
हुए प्रतिपादित करती है कि मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य मुक्ति है। जो विवेक ज्ञान एवम् योग साधना द्वारा प्राप्त
किया जा सकता है। हम
सृष्टि प्रक्रिया को इस प्रकार समझ सकते हैं –
त्रिगुणात्मक
पुरुष —-प्रकाश ——— ↓
महत
(बुद्धि)
↓
अहंकार
↓
पञ्च महाभूत
आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी
सांख्य
दर्शन के मूल सिद्धान्त :-
1 – प्रकृति व पुरुष के योग से सृष्टि निर्मित
2 – प्रकृति व पुरुष दोनों मूल तत्व – पूरक
3 – पुरुष की स्वतन्त्र सत्ता – वह अनेक –
अनेकात्मवादी दर्शन
4 – मनुष्य (प्रकृति व पुरुष का योग) – सप्रयोजन
5 – मनुष्य का विकास उसके जड़ व चेतन तत्वों पर
निर्भर -तीन दशाएं -1 -शारीरिक, 2 – मानसिक, 3 –
आध्यात्मिक
6 – मानव जीवन का अन्तिम उद्देश्य मुक्ति (दुःख
त्रय से मुक्ति) – शरीर का नाश
7 – मुक्ति के लिए विवेक ज्ञान आवश्यक
8 – विवेक ज्ञान के लिए अष्टांग मार्ग (योग साधन
आवश्यक)
9 – योग मार्ग की प्रमाणिकता हेतु नैतिक आचरण
आवश्यक (यम, नियम अनुपालन)
सांख्य
दर्शन के अनुसार शिक्षा के उद्देश्य :-
1 – शारीरिक विकास
2 – मानसिक विकास
3 – भावनात्मक विकास
4 – बौद्धिक विकास
5 – नैतिक विकास
6 – मोक्ष प्राप्ति
7 – सद् तथा असद् को समझना (उचित आचरण विकास)
8 – सर्वाङ्गीण विकास
शिक्षा
का पाठ्यक्रम :-
इन्होने
अपने पाठ्यक्रम को भौतिक व आध्यात्मिक आधार प्रदान किया।
भौतिक
विकास के अन्तर्गत ये कर्मेन्द्रिय का विकास लक्ष्य मानते हैं और इसके लिए विविध
पाठ्य सहगामी क्रियाओं व खेल कूद को प्रश्रय देना चाहते हैं।
आध्यात्मिक
विकास हेतु ये ज्ञानेन्द्रियों का विकास करना चाहते हैं और इस हेतु योग,दर्शन,मनोविज्ञान
को प्रश्रय देना चाहते हैं।
शिक्षण
विधि :-
सांख्य
दर्शन मुख्यतः तीन विधियों प्रत्यक्ष, अनुमान, शब्द को प्रयोग करने पर जोर देता है।
प्रत्यक्ष
विधि – इसमें ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों को क्रिया शील बनाया जाता है
जिससे अनुभव व प्रत्यक्षीकरण का अवसर मिलता है।
अनुमान
विधि – इसमें इन्द्रियों से परे चेतना को जिसमें अनुभूति हेतु अवसर प्रदान किया
जाता है इसमें भाव पक्ष प्रधान होता है।
शब्द
विधि – इसके अन्तर्गत दृष्टान्तों,उदाहरणों का उपयोग किया जाता है जिसमें ज्ञान
की प्रमाणिकता सिद्ध होती है।
इनके
अतिरिक्त यह कुछ अन्य विधियों के प्रयोग को भी उचित समझते हैं यथा – सूत्र विधि, कहानी विधि, व्याख्यान
विधि,तर्क विधि, क्रिया
एवम् अभ्यास विधि।
शिक्षक
शिष्य सम्बन्ध –
सांख्य
गहन मीमाँसा का दर्शन है अतः शिक्षक का विषय पर स्वामित्व परमावश्यक है। अध्यापक
में यह योग्यता होनी चाहिए कि वह प्रकृति, पुरुष, जगत सम्बन्धी ज्ञान रखने के साथ विविध सूक्ष्म
अन्तरों को व्यवस्थित तरीके से अधिगम कराने में समर्थ हो।
शिष्य
–
इस
दर्शन के अनुसार विद्यार्थी का व्यवहार नैतिकता पर अवलम्बित हो वह ज्ञान लब्धि
हेतु जिज्ञासु हो व अपने गुरुओं के प्रति आदरभाव रखने वाला हो। सांख्य दर्शन अनुशासन को सर्व प्रथम वरीयता देता
हैं वस्तुतः सांख्य और योग दर्शन एक दूसरे के पूरक हैं और इसीलिये ये यम (अहिंसा,सत्य,अस्तेय,अपरिग्रह,ब्रह्मचर्य)
व नियम (शौच, सन्तोष, तप,स्वाध्याय,ईश्वर
प्राणिधान) का अनुपालन सुनिश्चित करना चाहते हैं।
विद्यालय
–
योग
और सांख्य समकालीन दर्शन हैंइस समय गुरुकुल प्रणाली प्रचलित थी तथा शिक्षा गुरु
आश्रम में प्रदान की जाती थी।
सांख्य दर्शन का प्रभाव शिक्षा के विभिन्न अंगों पर आज भी परिलक्षित
होता है और इसे किसी प्रकार कमतर नहीं आँका जा सकता।
सर्व प्रथम यहाँ शब्द पाठ्यक्रम की
विवेचना कर आशय समझने का प्रयास करते हैं। शब्द पाठ्यक्रम लैटिन भाषा के
शब्द ‘Currere’ शब्द से निकला है जिसका आशय है दौड़ का मैदान (Race Course ) अर्थात पाठ्यक्रम (Curriculum) से आशय उस साधन से है जिसके द्वारा शिक्षा के मन्तव्य प्राप्त
किये जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है की यह वह साधन है जिसके माध्यम से
शिक्षा लक्ष्यों की प्राप्ति एक तर्कपूर्ण क्रम का अनुसरण कर प्राप्त की जा सकती
है।
शिक्षा की तरह
पाठ्यक्रम के आशय के सम्बन्ध में भी दो धारणाएं प्रचलित हैं जिसे संकुचित अर्थ व
व्यापक अर्थ के नाम से जाना जाता है। संकुचित अर्थ में पाठ्यक्रम भी केवल विभिन्न
विषयों के पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित है लेकिन व्यापक अर्थ में वे सभी ज्ञान व अनुभव
आ जाते हैं जिसे नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से प्राप्त करती है साथ ही विद्यालय में
अध्यापकीय संरक्षण में विद्यार्थी द्वारा जो भी क्रियाएं सम्पादित होती हैं सारी
की सारी पाठ्यक्रम के तहत स्वीकार की जाती हैं इसके अतिरिक्त पाठ्य सहगामी
क्रियाएं भी पाठ्यक्रम का ही भाग होती हैं अर्थात वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पाठ्यक्रम
से आशय उसके इसी व्यापक स्वरूप से ही है।
पाठ्यक्रम की
परिभाषाएं / Definition of Curriculum –
पाठ्यक्रम की कुछ महत्त्वपूर्ण परिभाषों को इस
प्रकार क्रम दे सकते हैं। जॉनसन महोदय के अनुसार –
“A
curriculum is a structured series of intended learning outcomes.”
“पाठ्यक्रम भावी सीखने
के परिणामों की एक संरचित श्रृंखला है।”
एक अन्य विचारक मोनरो महोदय का मानना है –
“Curriculum
embodies all the experiences which are utilized by the school to atain the aims
of education.”
“पाठ्यचर्या उन सभी अनुभवों
को समाहित करती है जो स्कूल द्वारा शिक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए
उपयोग किए जाते हैं।”
भारतीय शिक्षाविद डॉ ० एन ० एल ० शर्मा जी
कहते हैं –
“Curriculum
is the statement of cource content to be learnt and tought during the course of
a specific study within a stipulated time period.”
“पाठ्यचर्या एक निश्चित
समय अवधि के भीतर एक विशिष्ट अध्ययन के दौरान सीखी और पढ़ी जाने वाली पाठ्यक्रम
सामग्री का विवरण है।”
एक सुप्रसिद्ध चिन्तक Cunningham
ने अपने भावों को इस
प्रकार शब्दों में ढाला है –
“The curriculum
is a tool in the hands of into artist (teacher) is mauld his material (the
pupil) according to his ideals (objectives) in the studio (the school).
“पाठ्यक्रम कलाकार
(शिक्षक) के हाथों में एक उपकरण है जो स्टूडियो (स्कूल) में अपने आदर्शों
(उद्देश्यों) के अनुसार अपनी सामग्री (छात्र) को ढालता है।”
वेण्ट और क्रोनबर्ग के अनुसार
“Curriculum
is the systematic from the subject matter which is prepared to fulfil the needs
of pupils.”
“पाठ्यचर्या उस विषय
वस्तु से व्यवस्थित है जो बालकों की जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार की जाती
है।”
इस प्रकार पाठ्यक्रम
वह साधन मात्र है जो समय की मॉंग के आधार पर कालानुरूप विविध आवश्यकताओं को ध्यान
में रखकर तैयार किया जाता है।
पाठ्यक्रम की प्रकृति
(Nature of Curriculum) –
पाठ्यक्रम की प्रकृति के सम्बन्ध में यह
नहीं कहा जा सकता कि यह स्थाई रहेगी। इसकी प्रकृति में स्थान, काल, दिशा, व्यवस्था,दर्शन आदि के अनुसार परिवर्तन दिखाई पड़ते हैं।
पाठ्यक्रम हर काल की आवश्यकता के अनुसार स्वयम् को व्यवस्थित कर मानवता का कल्याण
करता है।पाठ्यक्रम की मूल प्रकृति मानव कल्याण की है डॉ० सोती शिवेन्द्र सिंह व
अन्य द्वारा इसकी विशेषता जिसमें इसकी प्रकृति के दर्शन होते हैं भली भाँति
विवेचित किया गया है। जो इसके नाम में ही छिपा है यथा –
C –
Central point of Education / शिक्षा का केन्द्रीय बिन्दु
U –
Understanding of educational demand./ शैक्षिक माँग की स्थिति की समझ
M –
Management of educational process / शैक्षिक प्रक्रिया का प्रबंधन।
पाठ्यक्रम को प्रभावित
करने वाले घटक / Curriculum
Affecting Factors –
शिक्षा व्यवस्था का गहन अध्ययन यह स्पष्ट
संकेत देता है कि शिक्षा और पाठ्यक्रम का एक दूसरे से गहन सम्बन्ध रहा है इसी आलोक
में पाठ्यक्रम को प्रभावित करने वाले घटकों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
सुविधा की दृष्टि से हमने शिक्षार्थी स्वायत्तता को कुछ भागों में बाँट लिया है।
शिक्षार्थी स्वायत्तता से आशय/ Meaning of learner autonomy
शिक्षार्थी
स्वायत्तता का उद्देश्य /Objective
of learner autonomy
शिक्षार्थी
स्वायत्तता व शिक्षा के अंग /Learner autonomy and part of education
1 – पाठ्यक्रम व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Curriculum and learner autonomy
2 – शिक्षक व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Teacher and learner autonomy
3 – शिक्षार्थी व शिक्षार्थी स्वायत्तता /learner and learner autonomy
4 – शिक्षण विधि व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Method of teaching and learner
autonomy
5 – विद्यालय व शिक्षार्थी स्वायत्तता /School and learner autonomy
निष्कर्ष
/conclusion
शिक्षार्थी
स्वायत्तता से आशय/ Meaning of learner autonomy
शिक्षार्थी
की स्वायत्तता को अधिगम कर्त्ता के मनन, चिन्तन, निर्णयन, कार्य
इच्छा और और स्वशक्ति पर विश्वास के रूप में परिकल्पित किया जा सकता है। इसे अधिगम
कर्त्ता की जिम्मेदारी लेने की क्षमता के रूप में देखा जा सकता है।
अधिगम करने वाले को अधिगम हेतु स्वायत्त स्थिति
प्रदान करना मानवीय दृष्टिकोण से एक वहनीय जिम्मेदारी है।
शिक्षार्थी
की स्वायत्तता के बारे में Henri Holec महोदय
का विचार है –
“Autonomy
is the ability to take charge of one’s own learning.”
“स्वायत्तता अपने स्वयं के सीखने का प्रभार लेने
की क्षमता है।”
Leslie
Dickinsion महोदय
का विचार है कि
“Autonomy
is a situation in which the learner is totally responsible for all the
decisions concerned with his learning and the implementation of those
decisions.”
“स्वायत्तता एक ऐसी स्थिति है जिसमें शिक्षार्थी
अपने सीखने और उन निर्णयों के कार्यान्वयन से संबंधित सभी निर्णयों के लिए पूरी
तरह जिम्मेदार है।”
उक्त
विवेचना के आधार पर कहा जा सकता है कि अधिगम कर्त्ता की स्वायत्तता से आशय अधिगम
के परिक्षेत्र में उसके
सीखने व निर्णयन हेतु स्वयं जिम्मेदारी लेने से है।
शिक्षार्थी
स्वायत्तता का उद्देश्य /Objective of learner autonomy
वर्तमान
परिप्रेक्ष्य में अपनी जवाबदेही हेतु खुद जिम्मेदारी लेने की प्रवृत्ति को बल मिला
है और सभी अपने अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार हैं शिक्षार्थी को गुण सिखाना ही शिक्षार्थी स्वायत्तता का उद्देश्य
है। आज की पीढ़ी निःसन्देह पूर्व पीढ़ी से अधिक जागरूक है और विभिन्न संसाधनों का
प्रयोग कर ज्ञान परिक्षेत्र बढ़ा रही है। शिक्षार्थी स्वायत्तता उसे उसके अधिकारों
के प्रति सचेष्ट करना एक उद्देश्य मानती है। Phill Bension महोदय लिखते हैं –
“Autonomy
is a recognition of the rights of learner within educational system.”
“स्वायत्तता शैक्षिक प्रणाली के भीतर शिक्षार्थी
के अधिकारों की मान्यता है।”
शिक्षार्थी
स्वायत्तता का उद्देश्य शिक्षार्थी को प्रभावी निर्णयन क्षमता की दक्षता प्रदान कर
उसके परिणामों की जिम्मेदारी स्वीकार करने योग्य बनाती है।
संक्षेप
में उद्देश्यों को इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है –
1 – स्वायत्त निर्णय लेने की क्षमता का विकास/Develop the ability to make autonomous decisions
2 – सहयोग
की भावना का विकास / Develop a spirit of cooperation
3 – स्वमूल्यांकन व स्वप्रबन्धन /Self-evaluation and self-management
4 – शिक्षार्थी की सम्प्रभुता को महत्त्व /Importance of learner’s sovereignty
5 – व्यक्तिगत भिन्नता की स्वीकारोक्ति /Acknowledgment of individual
difference
6 – आत्मविश्वास वृद्धि /Confidence Increase
7 – सृजनात्मकता का विकास /Development of creativity
8 – शैक्षणिक दवाब में कमी / Reduction of academic pressure
शिक्षार्थी
स्वायत्तता व शिक्षा के अंग /Learner autonomy and part of education
परिवर्तन
प्रकृति का अटल नियम है शिक्षा जगत को क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए स्वयं को
तैयार करना होगा और शिक्षा के समस्त अंगों को बदलते परिदृश्य के अनुसार शिक्षार्थी
स्वायत्तता के अनुरूप स्वयं ढालना होगा। David Little महोदय ने कहा –
“Autonomy
is essentially a matter of the learner’s psychological relation to the process
and content of learning.”
“स्वायत्तता अनिवार्य रूप से सीखने की प्रक्रिया
और सामग्री के लिए शिक्षार्थी के मनोवैज्ञानिक संबंध का मामला है।”
1 – पाठ्यक्रम व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Curriculum and learner autonomy
2 – शिक्षक व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Teacher and learner autonomy
3 – शिक्षार्थी व शिक्षार्थी स्वायत्तता /learner and learner autonomy
4 – शिक्षण विधि व शिक्षार्थी स्वायत्तता /Method of teaching and learner
autonomy
5 – विद्यालय व शिक्षार्थी स्वायत्तता /School and learner autonomy
निष्कर्ष
/conclusion
आज
के परिप्रेक्ष्य में जब हम शिक्षार्थी स्वायत्तता की बात करते हैं समस्त शिक्षा
जगत को शिक्षार्थी स्वायत्तता के हिसाब से स्वयं को परिवर्तित करना होगा। गुरुदेव
रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कहा –
“The
boys were encouraged to manage their own affairs, and to elect their own judge,
if any punishment was to be given. I never punished them myself.”
“लड़कों को अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए
प्रोत्साहित किया गया था, और
यदि कोई सजा दी जानी थी, तो
अपने स्वयं के न्यायाधीश का चुनाव करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। मैंने
उन्हें स्वयं कभी दंडित नहीं किया।”
निष्कर्षतः कहा सकता है कि
इस अवधारणा द्वारा शिक्षार्थी सशक्तीकरण
का नया अध्याय हेतु शिक्षा जगत को
तैयार रहना होगा। शिक्षार्थी को मानसिक सशक्त बनाने में ही शिक्षक व शिक्षा जगत की
खुशी छिपी है।
बचपन, जवानी, बुढ़ापे का एक क्रम है और ये इस क्रम में ही आता है लेकिन हमारी जीवन शैली बुढ़ापे को शीघ्र निमंत्रण दे हमें निष्क्रिय कर रही है जबकि थोड़ा सा सचेत रहकर न हम बुढ़ापे को पीछे धकेल सकते हैं बल्कि बुढ़ापे में भी जवानों जैसे सक्रिय रह सकते हैं। आइये इसके कारण,निवारण पर विचार करते हैं।
1 – जल का सेवन –
जल
का यथोचित सेवन होना चाहिए कुछ लोग कम सेवन करते हैं और इसके नुकसान शीघ्र
परिलक्षित होने लगते हैं जो कब्ज,किडनी
समस्या,ऊर्जा स्तर में कमी ,त्वचा का रुखापन,सिर दर्द आदि के रूप में सामने आता है। जब की अधिक जल का सेवन किडनी
का कार्य भार बढ़ा देता है वात, पित्त, कफ के असन्तुलन का भी यह प्रमुख कारण है अधिक
पानी के नुकसान बुढ़ापे को करीब लाने में मदद करते हैं।
अतः
‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ को ध्यान में रखकर शरीर की मांग के अनुरूप पानी
पीना चाहिए। जल घूँट घूँट कर बैठकर ही पीना चाहिए उकड़ूँ बैठकर पीएं तो सबसे अच्छा।
फ्रिज के अधिक ठन्डे पानी से बचें। सदा सामान्य ताप युक्त जल का सेवन करें। पानी
की स्वच्छता का ध्यान रखा जाए। कहीं का भी पानी न पीने लगें अच्छा होगा अपने साथ
स्वच्छ जल रखें। दिन के पूर्वार्ध में अधिक और उत्तरार्ध में अपेक्षाकृत कम जल का
सेवन करें।
2 –
निद्रा –
संयमित
निद्रा शरीर को व्यवस्थित रखने का एक उपक्रम है। आज लोगों को सोने का कार्यक्रम
दुष्प्रभावित हुआ है कुछ लोग रात्रि में जागरण करते हैं और दिन में सोते हैं या
देर तक सोते रहते हैं। कुछ दिन और रात दोनों में सोने की आदत विकसित कर लेते हैं
रात्रि जागरण सम्पूर्ण दिनचर्या बिगाड़ बुढ़ापे को जल्दी बुलाने में मदद करता है,शरीर हर समय थका थका महसूस करता है।
हमारा
शरीर रात्रि विश्राम व सूर्योदय के साथ जागृत रहकर कार्य करने में सुगमता महसूस
करता है,जल्दी
सोना और जल्दी जागना कई रोगों का उपचार है। इसीलिये सुबह को अमृत बेला गया है।
त्वचा की चमक या आज वृद्धि का इससे सीधा सम्बन्ध है।
3 – गरिष्ठ भोजन व अधिक नमक –
गरिष्ठ व अधिक नमक वाला भोजन सीधा झुर्रियों को
निमन्त्रण पत्र है,नमक की अधिक मात्रा कोशिकाओं को शीघ्र बूढ़ा
करती है जबकि नमक का कम सेवन कोशिकाओं की आयु में वृद्धि करता है। गरिष्ठ भोजन
स्वाद में आपको अच्छा लग सकता है पर है वो धीमा जहर ही।एक तो गरिष्ठ और दूसरे काम
चबाने से दाँतों का काम भी आँतों को करना पड़ता है जो कब्ज, अम्लता,उदर
रोग, मोटापा, अजीर्ण
को खुला आमन्त्रण देता है। आजकल जंकफूड और फास्ट फ़ूड ने सेहत का बेड़ा गर्क कर रखा
है।शरीर को युवा और दीर्घकालिक क्रियाशील रखने के लिए सहज सुपाच्य व ताजा भोजन खूब
चबा चबाकर करना चाहिए।
4 – व्यायाम –
व्यायाम,
प्राणायाम, योगासन, खेलकूद, दंगल, दौड़
आदि वह साधन हैं जिससे शरीर मानसिक रूप से अधिक युवा रहने हेतु तैयार होता है।
ब्रह्म मुहूर्त की जादुई हवा तनमन को स्फूर्तिवान रखती है। और इनका अभाव हमें
बुढ़ापे की और तेजी से बढ़ाता है।
5 – प्रवाह अवरुद्धन –
हमें
मल, मूत्र के आवेग को बल पूर्वक नहीं रोकना चाहिए।
शरीर पर अनावश्यक दवाब रखना उचित नहीं। छींक आदि के समय सामान्य ही रहना
चाहिए।प्राकृतिक आवेग को रोकने से किडनी व आँतों पर अनावश्यक दवाब पड़ता है। और
सम्पूर्ण शरीर इस व्याधि के नुक्सान झेलता है।
6 – नशा –
सबको पता है होश में रहना परमावश्यक है लेकिन
होश खोने वालों की कतार भी छोटी नहीं है। पता नहीं क्यों लोग नशा करते हैं व अपनी जिन्दगी को छोटा और रोग ग्रस्त कर लेते
हैं और जवानी में बुढ़ापे का शिकार हो जाते हैं। हमारा सारा चयापचय बिगड़ जाता है।
प्रतिरक्षा तन्त्र ध्वस्त हो जाता है अपने साथ परिवार को गर्त में जाता देख नशेड़ी
अवसादग्रस्त हो जाता है मस्तिष्क सोचने समझने की शक्ति खो तेजी से बुढ़ापे की और
अग्रसर होता है।
प्रारम्भ
से ही सचेत रहें, किसी के नशा करने के आमन्त्रण को सिरे से ठुकरा
दें नहीं तो वही बात हो जाएगी मौत आई तो नहीं पर घर तो देख गयी। चिन्ता,परेशानी, समस्या प्रत्येक के जीवन में आती है सम्यक
विमर्श करें स्वास्थ्य वर्धक चीजों का सेवन करें। सत्सङ्ग करें कुसंग से बचें। नशा
किसी भी रूप में शरीर में प्रवेश न करे हमारा शरीर खुद इसको व्यवस्थित रखने का
प्रयास करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के छठे अध्याय में कितना सुन्दर मार्ग सुझाया है
–
युक्ताहार-विहारस्य
युक्त-चेष्टस्य कर्मसु
युक्त-स्वप्नावबोधस्य
योगो भवति दुःख-हा ॥ १७ ॥
7 – प्रदूषण –
जल,
वायु, ध्वनि के अलावा तमाम अन्य प्रदूषण मानव के जीवन
को शीघ्र बुढ़ापे की और खींच कर ख़तम कर रहे हैं जबकि इन पर अंकुश लगाना,परिशोधन करना हमें आता है। मास्क का प्रयोग
कोरोना ने हमें सीखा दिया जो दोपहिया वाहन चलाते हुए हेलमेट जितना ही आवश्यक है।
प्रदूषण से बचने के यथा शक्ति प्रयास हमें दीर्घकालिक युवा रख सकता है निर्मल जल,
वायु, आकाश अपरिहार्य है किसी ने सचेत किया
–
हमीं
गर्क करते हैं जब अपना बेडा तो बतलाओ फिर नाखुदा क्या करेंगे
जिन्हें
दर्दे दिल से ही फुर्सत नहीं है फिर वो दर्दे वतन की दवा के करेंगे।
सचेत
रहें,हर
संभव बचाव का प्रयास करें।
08 – बुढ़ापा दिमाग की खिड़की से आता है।–
मानव मन अद्भुत है और सर्वाधिक सशक्त हैं विचार ,पहले हमारे मन में किसी भी वस्तु,क्रिया,सिद्धान्त
को वरण करने का विचार आता है तत्पश्चात हमारी चेष्ठा उसे हमसे सम्बद्ध कर देती है
यहाँ तककि हमारे शरीर पर हमारी सोच का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है यदि हम सकारात्मक
सोच के हामी हैं तो व्यक्तित्व पर उसका प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता है। हम अलग
लोगों को अलग अलग मिजाज का देखते हैं यह स्वभाव मानव मन की तरंग दिशा से ही
निर्धारित होता है कुछ लोगों को युवावस्था में बुढ़ापे का और कुछ वयो वृद्धों को
वृद्ध होने पर भी युवावस्था का आनन्द लेते देखा जा सकता है।
गलत चिन्तन, कामुक चिन्तन, नकारात्मक चिन्तन वह कारक है जो हमें अन्दर से
खोखला कर कहीं का नहीं छोड़ता। हम वीर्य,ओज, तेज, स्फूर्ति खो बुढ़ापे के दुष्चक्र में फँस जाते
हैं। सकारात्मक सोचें जिन्दादिली को व्यक्तित्व का हिस्सा बनाएं। याद रखें –
‘जिन्दगी
जिन्दादिली का नाम है, मुर्दादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं।’
शोध उपकरण से आशय उन साधनों से है जिनका उपयोग करके समंकों का
एकत्रीकरण किया जाता है यह अध्ययन हेतु डेटा संग्रह का उपागम बन जाता है। शोध को
सही दिशा मिल जाती है यदि सम्यक उपकरण का प्रयोग किया जाता है। कभी कभी शोध के
स्वरुप के अनुसार एक से अधिक उपकरणों की आवश्यकता परिलक्षित होती है। लेकिन कुल
मिलाकर है यह एक साधन ही,
जो डाटा (समंक ) संग्रहण में हमारी मदद करता
है।
शोध की दृष्टि से आज बहुत से उपकरण विद्यमान हैं सर्वेक्षण,केस स्टडी, प्रश्नावली, साक्षात्कार, अभिरुचि व निर्धारण पैमाने आज समंक संग्रहण हेतु प्रयुक्त किये जाते हैं। लेकिन किसी भी शोध उपकरण या मनोवैज्ञानिक परीक्षण की गुणात्मकता हेतु यह आवश्यक होगा कि वह निम्न विशेषताओं को धारण करे।
कसौटियाँ या विशेषताएँ (Criteria or Characteristics) –
आज शोध को सही दिशा देने हेतु यह आवश्यक है कि समंक सही प्राप्त हों ,क्योंकि समंकों के बारे में कहा जाता है कि
समंक झूठ नहीं बोलते पर स्वयं झूठे हो सकते हैं। आज डाटा एकत्रीकरण हेतु हम
मनोवैज्ञानिक परीक्षणों का सहारा लेते हैं। Klausmeier & Goodwin महोदय कहते हैं –
“Good standardized tests must meet the criteria of
validity, reliability, and usability.”
जिन गुण धर्मों के आकलन हेतु हम शोध उपकरण या मनोवैज्ञानिक परीक्षण
का निर्माण करते हैं उस सम्पूर्ण साधन को उस गुण के मापन हेतु ही समर्पित रहना
चाहिए। Douglas and
Holland का मानना है –
“A good examination must possess a number of
characteristics, and these characteristics become the basic principles
underlying the construction of each test.”
एक अच्छे मनोवैज्ञानिक या शोध परीक्षण को कुछ व्यावहारिक व कुछ
तकनीकी कसौटियों पर परखना होगा ,जिन्हे
इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।
सामान्य सम्भावना वक्र आज की ऐसी आवश्यकता है कि विविध विज्ञानों में इसका प्रयोग किया जाता है मनोविज्ञान और शिक्षा भी इससे अछूता नहीं है। यदि किसी चर से सम्बन्धित प्राप्ताङ्क वितरण किसी ग्राफ पेपर के माध्यम से दिखाने का प्रयास करेंगे तो घण्टे जैसी आकृति दिखाई पड़ती है खासकर तब जब वितरण का परिक्षेत्र बड़ा होता है यही आकृति सामान्य सम्भावना वक्र कहलाती है।
सामान्य सम्भावना वक्र से आशय (Meaning of normal probability curve)–
सामान्य सम्भावना वक्र एक गणितीय वक्र है जो आवृत्ति के वितरण को
सामान्य रूप से निरूपित करता है। जब हम किसी परीक्षण से प्राप्त अंकों के आधार पर
आवृत्ति वितरण बनाते हैं और इसे ग्राफ पेपर पर प्रदर्शित करते हैं तो जो वक्र बनता
है उसे अवलोकित वक्र कहते हैं जब यही किसी बड़े यादृच्छिक समूह के आंकड़ों पर अवलम्बित
होता है तो वक्र की आकृति घण्टे के आकार की (Bell Shaped) होती है समूह का आकर बड़ा होने पर यह घण्टाकृति ही सामान्य सम्भावना
वक्र (NPC) या Normal
Probability Curve के
नाम से जानी जाती है। इस सम्बन्ध में डॉ ० डी ० एन ० श्रीवास्तव ने लिखा –
“सामान्य सम्भावना वक्र एक गणितीय आदर्श वक्र ही नहीं है बल्कि यह एक
सैद्धान्तिक वक्र भी है जिसकी पूर्ण प्राप्ति बहुत कठिन है लेकिन इसके बाद भी
व्यावहारिक समस्याओं से सम्बन्धित चरों के अध्ययन में इस वक्र का बहुत अधिक उपयोग
है।”
सामान्य सम्भावना वक्र की विशेषताएं (Characteristics of Normal Probability
Curve) –
यथार्थ तथ्य यह है की सामान्य सम्भाव्यता वक्र का व्यावहारिक उपयोग
है और इसे सांख्यिकीय परिक्षेत्र से जुड़े अध्ययन कर्त्ता को जानना ही चाहिए इसकी
कतिपय प्रमुख विशेषताओं को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।–
01 – आकृति (Shape) –
सामान्य प्रायिकता वक्र का आकार घण्टाकार (Bell Shaped),पूर्ण सममिति (Symmetrical),एकल बहुलांकी (Uni modal) तथा सामान्य वक्रता वाला (Mesokurtic) होता है। इसके मध्य में सर्वाधिक प्राप्तांकों की संख्या होती है।
02 – सामान्य सम्भावना वक्र का समीकरण (Equation of Normal Probability Curve)
–
सामान्य प्रायिकता वक्र NPC की गणितीय समीकरण (Mathematical Equation) को इस प्रकार दिया जाता है इससे NPC का X अक्ष से विस्तार और Y अक्ष की ऊँचाई का निर्धारण किया जाता है –
x = मध्यमान से विचलन, x =X –M
Y= X अक्ष के ऊपर वक्र की ऊँचाई
N = कुल आवृत्ति
σ = प्राप्ताँकों का मानक विचलन
e = स्थिरांक, जिसका मान 2.71828
होता है।
π = स्थिरांक,जिसका मान 3.1416
होता है।
03 – केन्द्रीय मानों की समानता (Equality of Central Tendency Measures) –
सामान्य सम्भावना वक्र में केन्द्रीय प्रवृत्ति के तीनों मानों में
समानता रहती है। कहने का आशय यह है कि
मध्यमान (M), मध्यांक (Mdn) और बहुलांक (Mo) तीनों का मान एक ही होता है अर्थात ये
तीनों ही NPC के मध्य बिंदु पर स्थित होते हैं। यानी
M =
Mdn = Mo
04 – विषमता गुणाङ्क ( Cofficient of Skewness ) –
सामान्य सम्भावना वक्र में पूर्ण सीमितता पाई जाती है अतः सामान्य
सम्भावना वक्र का विषमता गुणाङ्क शून्य माना जाता है अर्थात
Sk =0
05 – वक्रता या कुकुदता गुणाङ्क (Cofficient of Kurtosis )–
सामान्य सम्भावना वक्र (NPC)न तो बहुत अधिक नुकीला होता है और न चपटा बल्कि यह औसत ऊँचाई वाला वक्र होता है सामान्य
सम्भावना वक्र के वक्रता गुणाङ्क का मान 0.263 होता है अर्थात
Ku = 0.263
06
– अनन्त स्पर्शी (Agymptotic) –
सामान्य सम्भावना वक्र के दाहिने और बांए चोर को यदि X – अक्ष पर निरीक्षित किया जाए तो दिखाई पड़ेगा कि इसका विस्तार ऋण अनन्त (-∞) से धन अनन्त (+∞) तक फैला होता है। इसी कारण सामान्य सम्भावना वक्र के दाएं और बांए सिरे कभी X – अक्ष को स्पर्श नहीं करते। अपनी इसी विशेषता के कारण इस वक्र को अनन्त स्पर्शी कहा जाता है जैसा कि पूर्व के चित्रों से स्पष्ट है।
07 – क्षेत्रफल
सम्बन्ध (Area under NPC) –
सामान्य प्रायिकता वक्र (NPC)
एवम् आधार
रेखा के मध्य का क्षेत्रफल सामान्य प्रायिकता वक्र का क्षेत्रफल कहलाता है।
प्राप्तांकों का के ±1σ के अन्तर्गत वितरण या जनसँख्या का 2
/3 क्षेत्रफल यानि
68.26 %भाग आ जाता है।
सामान्य सम्भावना वक्र के ±2σ
के अन्तर्गत
वितरण या जनसँख्या या प्राप्तांकों का 95.44 % क्षेत्र आ
जाता है।
सामान्य सम्भावना वक्र के ±3
σ के अन्तर्गत वितरण या जनसँख्या या प्राप्तांकों का 99.72
% क्षेत्रफल आ जाता है।
चूँकि ±3 σ के अन्तर्गत वितरण या जनसँख्या के 99.72 % प्राप्तांक आ जाते हैं अतः व्यावहारिक समस्याओं के समाधान हेतु यह मान लिया जाता है कि सामान्य प्रायिकता वक्र के ±3 σ के बीच लगभग समग्र परिक्षेत्र या प्राप्तांक आ जाते हैं।
08 – मानक
प्राप्तांकों में परिवर्तन (Conversion in Standard Scores) –
सामान्य सम्भावना वक्र के प्राप्तांकों को मानक प्राप्तांकों (Standard Scores) में परिवर्तित किया जा सकता है। मानक प्राप्तांकों को मानक दूरी (σ distance द्वारा व्यक्त करते हैं )यह Z प्राप्तांक कहलाता है।
Z=(X-M )/σ = x/σ
=
09
–चतुर्थांशों में सामान अन्तर(similar difference in quartiles) –
सामान्य सम्भावना वक्र के पहले और तीसरे चतुर्थांश का मध्यांक से
सामान अंतर होता है। यह अन्तर चतुर्थांश विचलन (Q) के बराबर होता है। इस समान अन्तर को सम्भाव्य त्रुटि Probable Error या P.E कहते हैं।
10
– Q व S.D में सम्बन्ध (Relationship between Q and SD) –
सामान्य सम्भावना वक्र में चतुर्थांश विचलन (Q) का मान प्रामाणिक विचलन (SD) के मान का लगभग 2/3
होता है।
सामान्य सम्भावना वक्र के उपयोग (Applications of NPC) –
शिक्षा,समाज शास्त्र, मनोविज्ञान आदि के अधिकाँश चर सामान्य सम्भावना वक्र या सामान्य
प्रायिकता वक्र के अनुरूप वितरित होते हैं। इसके अतिरिक्त मापन व मूल्याङ्कन के
परिक्षेत्र में सामान्य प्रायिकता वक्र का अत्याधिक महत्त्व है। चिन्ता, बुद्धि,
स्मृति आदि से सम्बंधित मापों ,प्राप्तांकों को सामान्य प्रायिकता वक्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता
है अर्थात यह सामाजिक विज्ञानों के प्राप्तांकों, वितरणों को व्यवस्थित क्रम देने में सहयोगी की भूमिका का निर्वहन
करता है। इसके विविध उपयोग इस प्रकार हैं –
1 – किसी समूह में किसी दिए गए प्राप्ताङ्क से कम या अधिक अंक प्राप्त
करने वालों की संख्या ज्ञात करना।
2 – किसी समूह में दिए गए दो प्राप्तांकों के बीच पाए जाने वाले
शिक्षार्थियों की संख्या ज्ञात करना।
3 – परीक्षण के प्रश्नों के कठिनाई स्तर को ज्ञात करना।
4 – योग्यता का प्रसार ध्यान में रखते हुए सामान्य प्रायिकता वक्र के
आधार पर विभिन्न उप समूहों में विभाजित करना।
5 – किसी समूह में किसी विशेष स्थिति वाले छात्रों हेतु प्राप्ताङ्क
सीमायें ज्ञात करना।