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शिक्षा

योग अवधारणा व अष्टांग योग 

May 21, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


योग –

योग के सम्बन्ध में महर्षि पतञ्जलि से लेकर आजतक के मनीषियों का क्रमिक योग दान रहा है निश्चित रूप से महर्षि पतञ्जलि के व्यवस्थित क्रम देने से पूर्व यह विद्यमान रहा होगा और बहुत से अनुभवों से व लम्बी साधना से इसका  प्रागट्य सम्भव हुआ होगा। यह मानव मात्र को ऋषि मुनि परम्परा की अद्भुत भेंट है। श्रीमद्भगवद्गीता में ज्ञान योग ,भक्ति योग व कर्म योग के बारे में विस्तार से समझाया गया है योग को स्पष्ट रूप से समझने हेतु इन तीन मार्गों ज्ञान योग ,भक्ति योग व कर्म योग को समझना होगा। मानव मात्र में विविध वृत्तियों के दर्शन होते हैं अपनी वृत्ति प्रधानता के आधार पर हमें योग मार्ग का चयन करना चाहिए। जो लोग ज्ञान की और झुकाव रखते हों उन्हें ज्ञान मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।जिन मानवों का झुकाव कर्म की और हो उन्हें कर्म योग के मार्ग का अनुसरण करना चाहिए और भावना प्रधान लोगों को भक्ति मार्ग का अनुसरण करना चाहिए।  

अष्टाँग योग –

अष्टांग योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का संयोग है।   

यम –

इससे आशय संयम से है हमें कायिक,वाचिक व मानसिक संयम का परिचय देना होगा। यम को पाँच भागों में विभक्त किया गया है।

a – अहिंसा – विचार को इस कोटि का बनाना है कि हमारे चिन्तन व व्यवहार से प्राणिमात्र के प्रति किसी प्रकार का हिंसात्मक आचरण न हो।

b – सत्य – व्यवहार व सिद्धान्त में समान होना अर्थात मन व वचन द्वारा समान व्यवहार, अनुगमन या अनुसरण किया जाना।  

c – अस्तेय – किसी दूसरे के द्रव्य के प्रति अनासक्त भाव।

d – अपरिग्रह – विषयों के विभिन्न दोषों से विमुख रहना यानी विषयों के अर्जन, रक्षण से विमुक्त भाव रहना।  

e – ब्रह्मचर्य – संयम का परिचय अर्थात गुप्तेन्द्रिय उपस्थ का संयम में रहना।

नियम –

 नियम प्रवृत्तिमूलक होते हैं और शुभ या मंगल कार्यों केप्रति हमारी प्रवृत्ति के परिचायक होते हैं।ये ही शुभ कार्यो हेतु हमें प्रवृत्त कराते हैं  इन्हें पाँच भागों में विभक्त किया गया है –

a – शौच – शौच से आशय आंतरिक व वाह्य शुद्धि से है आन्तरिक से आशय मानस के मलों से निवृत्ति व वाह्य से आशय बाहरी शुद्धि जिसके लिए पहले मिट्टी व जल का प्रयोग होता था और आज साबुन व विविध उपादानों का प्रयोग किया जाता है।

b – सन्तोष – यह शान्ति प्राप्ति का सर्वथा सशक्त उपागम है। जो है जैसा है उसी में सन्तुष्ट रहना। यह गुण ही सन्तोष है। 

c – तप – इससे आशय है सुख दुःख को समान समझने की शक्ति का जागरण जो शरीर को तपाने, दुःख सहने योग्य बनाने, और इस हेतु गर्मी ,सर्दी,बरसात की त्रासदई स्थिति में रहने व कठिन व्रतों के अनुपालन के अभ्यास से है।   

d – स्वाध्याय – नियम, विधि विधान को ध्यान में रखकर धर्म ग्रंथों की स्वयम द्वारा की गई अनवरत साधना। 

e – ईश्वर प्राणिधान – भक्तिपूर्वक ईष्ट के प्रति सम्पूर्ण समर्पण।

आसन –

हमें साधना हेतु शरीर को एक ऐसी स्थिति में रखना होता है जिसमें दीर्घ अवधि तक सुख पूर्वक रहा जा सके.इसी स्थिति को आसन नाम से जाना जाता है। जगत में विविध प्रकार की जीव जातियां हैं उतने ही प्रकार के आसन हैं सिद्धासन,गरुण आसन,भुजङ्गासन, शीर्षासन आदि विविध प्रकार के आसान हैं हाथ प्रदीपिका में इसका सुन्दर वर्णन द्रष्टव्य है आजकल बाबा रामदेव व आचार्य बालकृष्ण की तत्सम्बन्धी पुस्तक में इसे देखा जा सकता है।

प्राणायाम –

प्राण शक्ति अर्थात श्वांस प्रश्वांस के विविध आयामों को ही प्राणायाम कहा जाता है। प्राणायाम वस्तुतः श्वांस प्रश्वांस का गति विच्छेद ही है। इसमें मुख्यतः पूरक, कुम्भक व रेचक का आधार रहता है पूरक अर्थात श्वांस को पूरा अन्दर की ओर खींचना, कुम्भक से आशय इसके रोके जाने से एवं रेचक से आशय इसके छोड़े जाने से है। इनसे शारीरिक,मानसिक दृढ़ता व चित्त की एकाग्रता में अद्भुत प्रगति देखी जाती है।

प्रत्याहार –

मानव में विविध इन्द्रियों का समागम रहता है जो विविध क्रियाओं का आधार है जब इन्द्रियाँ वाह्य प्रपंचों से मुक्त होकर अर्थात वाह्य विषयों से हटकर चित्त के समान निरुद्ध हो जाती हैं तो यह स्थिति प्रत्याहार है। जब वाह्य जगत में मन विचरण की यात्रा अन्तर्मुखी  अन्दर की यात्रा सुनिश्चित करती है तब प्रत्याहार निष्पन्न होता है इस स्थिति में संसार में रहते हुए सांसारिक वस्तुएं साधक को बाँध नहीं पातीं।

धारणा –

चित्त को किसी एक स्थान पर स्थिर कर देना धारणा कहलाता है जैसे हृदय कमल में ,नाभि चक्र में या किसी भी बाहर की वस्तु में  स्थिर कर देना धारणा कहलायेगा।

ध्यान –

ध्यान की अवस्था में ध्येय का निरन्तर मनन किया जाता है और विषय का ज्ञान स्पष्ट रूप से प्राप्त हो जाता है एवम् इस तरह से योगी के मन में ध्येय वस्तु का यथार्थ स्वरुप प्रगट हो जाता है। अतः जब ध्येय वस्तु का ज्ञान एकाकार रूप लेनेलगता है तो उसे ध्यान कहते हैं।

समाधि –

योग का अन्तिम लक्ष्य व्यक्ति को पूरी तरह से अन्तर्मुखी बनाना है समाधि, चित्त की वह अवस्था है जिसमें प्रतीति केवल ध्येय की ही होती है और चित्त का अपना स्वरुप शून्य सा हो जाता है।

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शिक्षा

शिक्षक की जवाबदेही/TEACHER’S ACCOUNTABILITY

May 19, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक अपने दायित्वबोध को समझ कर कई कार्यों को अंजाम देता है वे कार्य व्यक्तिगत, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जन आकांक्षाओं की पूर्ति का माध्यम बनते हैं। एक शिक्षक की जवाब देही को भौतिक जगत बांधने की कोशिश कर सकता है लेकिन वह प्रकृति, पशु पक्षियों और सम्पूर्ण मानवता के प्रति जवाब देह है।आज बदलती हुई परिस्थितियों में शिक्षक के प्रति समय की अवधारणाओं ने करवट ली है जिससे जनमानस की सोच और आज के शिक्षक के दृष्टिकोण में परिवर्तन हुआ है।

बदलते हुए काल ने बाजारवाद का प्रभाव हर परिक्षेत्र पर छोड़ा है और अध्यापकीय परिवेश भी इससे अछूता नहीं है।श्रीवास्तव एवं पण्डा ने अपने 2006 के शोध में दर्शाया –

“शिक्षकों की जवाबदेही से तात्पर्य है कि शिक्षक दिए गए उत्तरदायित्वों को किस मात्रा व् किस सीमा तक निभाता है। ऐसा न करने पर वह कारण बताने पर बाध्य होता है। जवाबदेही अथवा प्रतिबद्धता किसी अधिकारी द्वारा सॉंप गए कार्य को गुणात्मक एवं सर्वोत्तम रूप से अधिकारी के निर्देशन अनुरूप करने का बंधन एवं कार्य है।” 

हुमायूं कबीर के वे शब्द याद आते हैं –

“शिक्षक ही राष्ट्र के भविष्य निर्माता हैं।”

इस तरह के विचार जवाबदेही हेतु और विवश करते हैं। जिसे हम इस प्रकार विवेचित कर सकते हैं।

शिक्षक की जवाबदेही का वर्गीकरण  [Classification of teacher accountability]-

A – व्यक्तिगत जवाब देही (Personal accountability)

(1) – स्वयं के प्रति

                        (2) – स्वयं के छात्र के प्रति

B – सामाजिक जवाब देही (Social accountability)

1 – सामाजिक आदर्श स्थापन हेतु

2 – भविष्य की दिशा निर्धारण हेतु

3 – सामाजिक कुरीति उन्मूलन हेतु

4 – सामाजिक सुदृढ़ीकरण हेतु जवाब देही

 C - राष्ट्र के प्रति जवाबदेही (Accountability to the nation)

                        (1) – एकता हेतु 

                        (2) – अधिकारियों के प्रति जवाबदेही

(3) – राष्ट्रोत्थान हेतु जवाबदेही

(4) – विश्वबन्धुत्व हेतु जवाबदेही

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शिक्षा

TEACHER AUTONOMY/शिक्षक स्वायत्तता

May 18, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षक स्वायत्तता से आशय उस शक्ति से है जिससे एक अध्यापक को अपना स्वयं पर फैसला करने का अधिकार मिलता है यहाँ स्वयं पर फैसला से तात्पर्य स्वयं के दायित्वबोध के निर्वहन हेतु उपयुक्त विधि के प्रयोग से लिया जा सकता है वह अपने कार्यों के सम्पादन हेतु सम्प्रभु है। वास्तव में स्वायत्तता एक प्रकार की सम्प्रभुता ही है जिससे निर्णय लेने में उत्तमता आती है।

उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि स्वायत्तता से आशय है किसी अन्य के हस्तक्षेप के बिना व्यक्ति विशेष , राज्य, संस्था,का देश के अधिकार क्षेत्र में विषयों और मामलों में स्वतन्त्र निर्णय लेना।

कॉलिन्स (Collins) महोदय कहते हैं कि   –

“स्वायत्तता का अर्थ उस योग्यता से लगाया जा सकता है जो व्यक्ति को दूसरों के कथनों या विचारों से प्रभावित होने के बजाय स्वयं निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है।”

शिक्षक स्वायत्तता का कार्य क्षेत्र (Scope of teacher autonomy)

[A] – विद्यालय परिक्षेत्र में (In school premises)

[B] – विद्यालय परिक्षेत्र के बाहर (Outside school premises)

[A] – विद्यालय परिक्षेत्र में (In school premises)

        1 – पाठ्य क्रम सम्प्रेषण

        2 – शिक्षण विधियों के प्रयोग में

        3 – विद्यालय का वातावरण

        4 – पाठ्य सहगामी क्रियाओं में

        5 – समाज उत्पादक कार्यों से सम्बद्धता

        6 – अनुशासन

        7 – शिक्षक छात्र सम्बन्ध

[B] – विद्यालय परिक्षेत्र के बाहर (Outside school premises)

         1 – पाठ्य क्रम निर्माण में सहभागिता

         2 – शिक्षा सम्बन्धी नीति निर्णयन

         3 – प्रश्न पत्र निर्माण।

         4 – मूल्याङ्कन व सुधार

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विविध

शरीर को गर्मी में ठण्डा रखने के उपाय. Tips to keep the body cool in summer.

May 16, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

गर्मी के दिनों में लोग इस बात से परेशान रहते हैं की वे अपनी पूरी क्षमता से कार्य नहीं कर पाते। यदि सम्पूर्ण दिन को गर्मी के लिहाज से तीन भागों में बाँटते हैं प्रातः, दोपहर, शाम तो इसमें बीच वाला भाग अर्थात दोपहर सबसे तपिश भरी होती है। बहुत सारे शरीर इस मौसम से इतने अधिक प्रभावित होते हैं कि उन्हें हमेशा गर्मी महसूस होती है जिससे उनके कार्य में बाधा पड़ती है। यहाँ प्रस्तुत हैं –

गर्मी में कूल कूल रहने के आठ उपाय

Eight ways to stay cool in summer

01 – जल का सेवन (Water intake)

02 – तरल खाद्य पदार्थों का उचित सेवन (Suitable intake of liquid foods)

03 – यथोचित प्राणायाम, योग, व्यायाम (Proper pranayama, yoga, exercises)

04 – फल, सब्जी और सुपाच्य भोजन (Fruits, vegetables and nutritious food)

05 – मसालेदार, अधिक तले भुने, अधिक नमक व कैफीन युक्त पदार्थों का सेवन नहीं

       (Do not consume spicy, excessive fried, high salt and caffeinated substances)

06 –मौसम के अनुसार वस्त्र (Clothing according to the season)

07 – नींद और स्नान (Sleep and bath)

08 – पैर के तलवे की देखभाल (Foot care)

01 – जल का सेवन (Water intake)-

गर्मी के दिनों में जल का सेवन सोच समझ कर किया जाना चाहिए पानी घूँट घूँट करके पिया जाना चाहिए केवल शौच निवृत्ति से पूर्व आप लगातार पानीपी सकते हैं। यदि  गुन गुना  जल नहीं ले सकते तो फ्रिज का बहुत ठण्डा पानी भी वर्जित है सादा जल या घड़े के जल का सेवन किया जा सकता है इसे आप अपने थर्मस में भरकर कार्य स्थल पर भी ले जा सकते हैं। सुबह सुबह, रात्रि को ताँबे के लोटे में रखे जल का सेवन किया जा सकता है। यह पूरे दिन में प्यास के अनुसार या तीन से चार लीटर लिया जा सकता है।गर्मी में बाहर निकलने से पहले पर्याप्त जल का सेवन करना चाहिए। पानी उंकड़ू बैठ कर पीना मुफीद है खड़े होकर नहीं पीना चाहिए।

02 – तरल खाद्य पदार्थों का उचित सेवन (Suitable intake of liquid foods) –

खाद्य सामग्री के मामले में भारत सचमुच बहुत भाग्य शाली है इसमें जहां विविधता पूर्ण व्यञ्जन उपलब्ध हैं वहीं मौसमानुकूल खाद्य सामग्री की बह भरमार है गर्मी में अधिक जल वाले तत्वों का विकल्प चुना जाना चाहिए जैसे नीबू पानी,नारियल पानी, छाछ, आम का पना, पानी की सेंधा नमक वाली शिकन्जी,जौ के सत्तू का शरबत,विविध दोष रहित जूस, दही की लस्सी आदि इनमें आवश्यकतानुसार पुदीना,प्याज,धनिया सौंफ आदि का प्रयोग किया जा सकता है। कृत्रिम शीतल पेय बोतल बन्द या डिब्बे बन्द बासी तरल पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए। घाट की राबड़ी जिसमें जौ का दलिया व छाछ होता है, लिया जा सकता है।

03 – यथोचित प्राणायाम, योग, व्यायाम (Proper pranayama, yoga, exercises) –

प्राणायाम, योग और सूक्ष्म व्यायाम किया जाना चाहिए शीतली, शीतकारी प्राणायाम अधिक उपयोगी है educationaacharya.com पर Tip to Top Exercise दो भागों में पहले दी जा चुकी हैं जो उपयोगी रहेंगी। सुविधा की दृष्टि से इसका लिंक यू ट्यूब (Education Aacharya) के डिस्क्रिप्शन बॉक्स में दे दूँगा।[ https://youtu.be/-Pw39aG5-IQ, https://youtu.be/bl2uqMUk_f8] याद रखें मानसिक शान्ति भी शारीरिक शान्ति में योग देती है।

04 – फल, सब्जी और सुपाच्य भोजन (Fruits, vegetables and nutritious food) –

शारीरिक गर्मी पर नियन्त्रण हेतु भोजन सुपाच्य ही किया जाना चाहिए और भूख से कुछ कम लिया जाना चाहिए रात्रि के भोजन पर सर्वाधिक नियंत्रण की  आवश्यकता है और यह सोने से कम से कम दो घण्टे पहले किया जाना चाहिए। भोजन से पहले आप पानी पी सकते हैं लेकिन भोजन के उपरान्त कम से कम आधा घण्टे जल न पीएं।

05 – मसालेदार, अधिक तले भुने,अधिक नमक व कैफीन युक्त पदार्थों का सेवन नहीं

       (Do not consume spicy, excessive fried, high salt and caffeinated substances) –

       इस प्रकार के पदार्थ शरीर में अनावश्यक गर्मी का कारण बनाते हैं शरीर में पित्त ,एसिड आदि की वृद्धि के साथ वात, पित्त, कफ में असंतुलन पैदा कर विकार का कारण बनते हैं।

06 –मौसम के अनुसार वस्त्र (Clothing according to the season) –

 गर्मियों में हल्के, ढीले वाले सूती वस्त्रों का प्रयोग किया जाना चाहिए।टाइट ,शरीर से चिपके वस्त्र नहीं पहनने से बचना चाहिए। रंगों के चयन में सावधानी रखें हुए हलके रंग प्रयोग में लाएं जाएँ। वस्त्र ऐसे हों जिससे शरीर को आराम मिले पूरी बाँह के वस्त्र पहनें।आवश्यकतानुसार अँगोछा लिया जा सकता है।

07 – नींद और स्नान (Sleep and bath) –

जहाँ सुबह उठकर दैनिक क्रियाओं में स्नान को स्थान मिला हुआ है वहीं निद्रा पूर्व स्नान अच्छी आरामदायक नीं दिलाता  और शरीर की गर्मी पर नियन्त्रण रखता है यदि उस समय स्नान कर सकते तो पैरों को अच्छी तरह धोना अति आवश्यक है। 

08 – पैर के तलवे की देखभाल (Foot care) –

रात्रि में सोने से पहले पैर धोने की बात ऊपर आ चुकी है यह क्रिया शीतल नैसर्गिक जल से हो बर्फ के पानी या फ्रिज के पानी से नहीं। इसके पश्चात अच्छी तरह गोले के असली तेल से तलवों की मसाज अवश्य करें और तलवे के प्रत्येक भाग को अंगुलियों के दवाब का अहसास कराएं आनन्द आएगा। इतनी मसाज करें की तेल सूख जाए।

            यद्यपि गर्मी के प्रकोप के निदान में चिकित्सकीय परामर्श सर्वाधिक आवश्यक है लेकिन इलाज से पहले सावधानी के महत्त्व को नकारा नहीं जा सकता।

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काव्य

वन्दन हो जाता है ।

May 14, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


जब प्रारब्ध के फलने से

शिशु आगमन हो जाता है।

मात पिता के चिन्तन से

कर्मों का वरण हो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है  । 1 ।

केवल एक हाथ के चलने से

वह तो थप्पड़ हो जाता है।

क्रोध संचरण हो मन से

प्रेम विघटन हो जाता है ।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 2 ।

अँगुष्ठ अंगुलियाँ कसने से

मुष्टिका स्वरुप हो जाता है।

क्रोध धधकता नेत्रों से

प्रेम भाव भी खो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 3 ।

इन हाथों के टकराने से

ताली का चलन हो जाता है।

यह ताली बजती जब लय से

भावों का वरण हो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 4 ।

दाएं बांयें इन हाथों से

कुछ नाम पुकारे जाते हैं।

उनकी कर्त्तव्य निपुणता से

कहने का चलन हो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 5 ।

यह हस्त छुलें जब चरणों से

सुब कुछ पावन हो जाता है।

शक्ति मिलती उन चरणों से

आशीष वरण हो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 6 ।

जब हाथ जुड़ उठें श्रद्धा से

दुआ का मन हो जाता है।

पावस विचार उठते मन से

पावन आचरण हो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 7 ।

जब हाथ बढ़ें कुछ लम्बे से

तब आलिङ्गन हो जाता है।

जय माल युक्त इन हाथों से

वर वधु मिलन हो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 8 ।

इन हाथों के स्पर्शों से

मृदुता संचरण हो जाता है।

श्रद्धा और नमन के भावों से

बस अभिनन्दन हो जाता है।

दोनों हाथों के जुड़ने से

देखो वन्दन हो जाता है । 9 ।

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शिक्षा

वैदिक कालीन शिक्षा[2500 ई ०पू ०-500 ई ०पू ०]

May 12, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

वैदिक कालीन शिक्षा एवम् सामाजिक व्यवस्था पर ब्राह्मणों का एक मात्र अधिकार था इसलिए वैदिक शिक्षा को ब्राह्मणीय शिक्षा के नाम से भी जानते हैं कुछ इतिहासकार इसे वैदिक काल,उत्तर वैदिक काल,ब्राह्मण काल,उपनिषद काल,सूत्र काल और स्मृतिकाल में विभक्त कर वर्णित करते हैं परन्तु इन सभी कालों में वेदों की प्रधानता रही अतः इस सम्पूर्ण काल को वैदिक काल कहते हैं।

वैदिक शिक्षा का अर्थ – वैदिक साहित्य में ‘शिक्षा’ शब्द विद्या,ज्ञान, प्रबोध एवम् विनय आदि अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। वैदिक शिक्षा का तात्पर्य शिक्षा के उस प्रकार से था जिससे व्यक्ति का सर्वांगीण विकास हो सके और वह धर्म के आधार पर वर्णित मार्ग पर चलकर मानव जीवन के चरम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सके जैसा  अल्तेकर महोदय ने लिखा –

“शिक्षा को ज्ञान, प्रकाश और शक्ति का ऐसा स्रोत माना जाता था जो हमारीशारीरिक,मानसिक,भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों तथा क्षमताओं का उत्तरोत्तर और सामन्जस्य पूर्ण विकास करके हमारे स्वभाव को परिवर्तित करती है और उत्कृष्ट बनाती है।”

“Education was regarded as a source of illumination and power which transforms and ennobles our nature by the progressive and harmonious development of our physical, mental, intellectual and spiritual powers and faculties.

 A.S.Altekar; Education in Ancient India    

1973, p. 8

शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श –

चूंकि जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना था इसलिए इसके अनुसार ही शिक्षा के उद्देश्य एवम् आदर्श निर्धारित किये गए जैसा कि अल्तेकर महोदय ने लिखा –

 “प्राचीन भारतीय उद्देश्यों एवम् आदर्शों का वर्णन इस प्रकार किया जा सकता है – ईश्वर भक्ति की भावना एवम् धार्मिकता का समावेश, चरित्र का निर्माण,व्यक्तित्व का विकास, सामाजिक कर्तव्यों को समझाना,सामाजिक कुशलता की उन्नति तथा संस्कृति का संरक्षण तथा प्रसार।”

“Infusion of a spirit of piety and religiousness, formation of character, development of personality, inculcation of civic and social duties, promotion of social efficiency and preservation and spread of national culture may be described as the chief aims and ideals of ancient Indian Education.” – A. S. Altekar,pp8-9

1 – धर्म परायणता की भावना एवम् धार्मिकता का समावेश

      (Infusion of a spirit of piety and religiousness)

2 – सामाजिक कुशलता की उन्नति (Promotion of Social Efficiency)

3 – चरित्र निर्माण (Formation of character)

4 – व्यक्तित्व का विकास (Development of personality)

5 – नागरिक एवम् सामाजिक कर्त्तव्यों की समझ (Inculcation of civic and social duties)

6 – राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण व प्रसार (Preservation and spread of National culture)

शिक्षा व्यवस्था (Organization of Education) –

01 – गुरुकुल प्रवेश

02 – उपनयन संस्कार

03 – पाठ्य क्रम

04 – शिक्षण विधि

05 – शिक्षा की अवधि

06 – शिक्षण सत्र

07 – अवकाश

08 – शिक्षण संस्थाओं का समय

09 – शिक्षण शुल्क व अर्थ व्यवस्था

10 – शिक्षा वाह्य नियन्त्रण से मुक्त

11 – परीक्षाएं व उपाधियाँ

12 – समावर्तन संस्कार

विशिष्ट शिक्षाएं –

1 – स्त्री शिक्षा

2 – व्यावसायिक शिक्षा

3 – पुरोहितीय शिक्षा

4 – सैनिक शिक्षा

5 – वाणिज्य शिक्षा

6 – कला कौशल की शिक्षा

7 – आयुर्वेद शास्त्र 

8 – पशु चिकित्सा

वैदिक शिक्षा का मूल्याँकन –

गुण :-

1 – धार्मिक भावना का विकास

2 – चरित्र निर्माण

3 – व्यक्तित्व का विकास

4 – नागरिक व सामाजिक उत्तरदायित्व भावना का विकास

5 – सामाजिक सुख समृद्धि की वृद्धि

6 – राष्ट्रीय संस्कृति का संरक्षण व विकास

7 – गुरु छात्र सम्बन्ध

8 – पवित्र प्राकृतिक वातावरण

दोष :-

1 – धार्मिकता पर अधिक बल

2 – भौतिक विज्ञानों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान

3 – लोक भाषाओँ की उपेक्षा

4 – विषयों में समन्वय का अभाव

5 – हस्त कार्य के प्रति हे भावना

6 – स्त्री शिक्षा की उपेक्षा

7 – शूद्रों के साथ न्याय नहीं

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समाज और संस्कृति

सामाजिक परिवर्तन और शिक्षा Social Change & Education

May 11, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

हर समाज के अपने नियम होते हैं मर्यादाएं होती हैं परम्पराएं होती हैं। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में कहा जा सकता है कि प्रत्येक समाज परिवर्तन व विकास को परिलक्षित कर रहा है। आज सामाजिक परिवर्तन करने वाले बहुत से साधन दीख पड़ते हैं उनमें से शिक्षा परिवर्तन का सशक्त साधन है। डॉ०राधा कृष्णन महोदय कहते हैं :-

 “शिक्षा परिवर्तन का साधन है। जो कार्य साधारण समाजों में परिवार,धर्म और सामाजिक एवम् राजनीतिक संस्थाओं द्वारा किया जाता था, वह आज शिक्षा संस्थाओं द्वारा किया जाता है।”

मूलतः आज शिक्षा का एक महत्वपूर्ण कार्य सामाजिक परिवर्तन हो चला है।

सामाजिक परिवर्तन [Social Change] –

परिवर्तन प्रकृति का नियम है और सभी परिक्षेत्रों में परिवर्तन दिखाई पड़ रहे हैं इस क्रम में समाज में परिवर्तन भी स्वाभाविक है हाँ परिवर्तन कहीं और किसी समय तीव्र या मन्द देखे जा सकते हैं। गिलिन एवम् गिलिन महोदय कहते हैं –

“We may define social change as variation from the accepted modes of life.”

“सामाजिक परिवर्तन को हम जीवन की स्वीकृत विधियों में होने वाले परिवर्तन के रूप में परिभाषित कर सकते हैं।”

एम ० डी ० जेन्सन (M.D. Jensan ) महोदय का कहना है –

“Social change may be defined as modification in the ways of doing and thinking of people.”

“सामाजिक परिवर्तन को व्यक्तियों की क्रियाओं और विचारों में होने वाले परिवर्तनों के रूप में पारिभाषित किया जा सकता है।”

गिन्सबर्ग (Ginsberg) महोदय का मानना है कि –

“By social change, I understand a change in social structure,e.g, the size of society, the composition or balance of its parts or the types of its organization.”

“सामाजिक परिवर्तन से हमारा तात्पर्य सामाजिक ढाँचे में परिवर्तन होना है, अर्थात समाज के आकार इसके विभिन्न अंगों के बीच सन्तुलन अथवा समाज के संगठन में होने वाला परिवर्तन ही सामाजिक परिवर्तन है।”

उक्त के आधार पर कहा जा सकता है कि सामाजिक संरचना,सामाजिक सम्बन्धों,सामाजिक संस्थानों, सामाजिक संगठनों और विविध समाजों में आने वाले परिवर्तनों को सामाजिक परिवर्तन कहा जाएगा।

सामाजिक परिवर्तन में शिक्षा की भूमिका

(Role of education in social change)

शिक्षा समाज  में किस तरह परिवर्तन ला सकती है इसे हम इन बिंदुओं से अधिगमित कर सकते हैं –

1 – शाश्वत मूल्यों को संरक्षण (Preservation of eternal values)

2 – संस्कृति का हस्तान्तरण (Transmission of Culture)

3 – परिवर्तन ग्राह्यता (Change acceptability)

4 – परिवर्तनों का मूल्याँकन (Evaluation of changes)

5 – सामाजिक बुराइयों के अन्त में सहायक (Helpful in ending social evils)

6 – ज्ञान के नए परिक्षेत्रों का विकास (Development of new domains of knowledge)

7 – मानव और समाज के सम्बन्धों को बनाये रखना (Maintaining human and society relations)

8 – सामाजिक परिवर्तनों का नेतृत्व (Leader ship of social change)

9 – सामाजिक परिवर्तन के लिए शिक्षा (Education for social change)

10 – सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)

         इस प्रकार हम देखते हैं कि शिक्षा सामाजिक परिवर्तन की सशक्त वाहक है तथा मैकाइवर महोदय का यह मानना यथार्थ है कि –

“….our direct concern as sociologists is with social relationships. It is the change in these which alone we shall regard as social change.”

“समाजशास्त्री के रूप में हमारा प्रत्यक्ष सम्बन्ध केवल सामाजिक सम्बन्धों से होता है। इस दृष्टिकोण से केवल सामाजिक सम्बन्धों में होने वाले परिवर्तनों को ही हम सामाजिक परिवर्तन कहते हैं।”

उक्त समस्त बिन्दु सामाजिक बदलाव का सशक्त संकेत देते हैं शिक्षा आयोग की रिपोर्ट में उचित कहा गया कि –

“Education can be used as a powerful instrument of social, economic and political change.”

“शिक्षा को सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक परिवर्तन के शक्तिशाली साधन के रूप में प्रयोग किया जा सकता है।” 

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वाह जिन्दगी !

अपनी कमजोरी को ताक़त में बदलें।Convert your weakness into strength.

May 9, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

साथियो, हम सब मानव हैं और मानवीय गुणों व मानवीय कमजोरियों से युक्त रहते हैं हमारा अपना मस्तिष्क हमारी सोच ,हमारे विचारों का उद्गम स्थल है जो बहुत सारी बाहरी शक्तियों से प्रभावित होता है और इसी क्रम में हमारा परिचय अपनी कमजोरियों से होता है  जो हमारी प्रगति यात्रा का सबसे बड़ा अवरोधक है आज की प्रस्तुति का मंतव्य ही यह है कि हम अपनी कमजोरियों को ताक़त में कैसे बदलें ?

कमजोरी है क्या ?-

What is weakness?

यह हमारी विचार प्रक्रिया का वह उत्पादन है जो हमारे मस्तिष्क ने हमें दिया है। मस्तिष्क जब किसी कार्य, विचार या कटु अनुभव के आधार पर पलायनवादी दृष्टिकोण अपनाने को विवश करता है वही हमारा कमजोर

बिन्दु है और हमारे व्यक्तित्व का सबसे बड़ा दुश्मन। कोई भी कमजोरी तब तक कमजोरी है जब तक उसके सशक्तीकरण के प्रयास न किये जाएँ।

एक कमजोर रस्सी कुछ और रेशों के सहयोग से मजबूत हो सकती है इसी तरह कमजोरी सशक्त विचारों से दृढ़ इच्छा शक्ति का रूप धारणकर सबसे सशक्त पहलू का रूप धारण कर सकता है आपने देखा होगा  भौंरा विज्ञान के नियमों को धता बता अपने कमजोर पँखों से बखूबी उड़ता है।

कमजोरी को ताक़त में बदलने के आठ उपाय

Eight steps to turn weakness into strength –

इससे पहले की उन आठ अद्भुत उपायों से आपका परिचय कराऊँ। उनके सुदृढ़ीकरण हेतु मजबूत आधार बनाना आवश्यक होगा। इसीक्रम में आप सभी दिव्य चेतन आत्माओं से यह कहना प्रासंगिक होगा। कि जो कुछ हमारे अवचेतन मन से जुड़ जाता है वह फलीभूत होता है इसीलिए यह तथ्य कि ‘मैं अपनी कमजोरी को ताक़त में बदल सकता हूँ’ गहनता से दोहराएं और इसे चेतना की गहराई तक समाने दें।

यह कमजोरी वास्तव में एक चुनौती पूर्ण अवसर है जिसे पहचानने का अवसर हमें मिला है और इसी लिए कमजोरी का ताक़त में बदलना निश्चित है इसे अवश्यम्भावी बनाने वाले आठ कदम इस प्रकार हैं –

1 – कमजोरी का क्षेत्र पहचानें। (Recognize the region of weakness)

2 – सकारात्मक सोच। (Positive Approach)-

3 – डर का मुकाबला करें। (Face your fears)

4 – सभी विमाओं का गहन चिन्तन (Deep thinking about all dimensions)

5 – सकारात्मक व्यक्तित्वों का साथ (Associate with positive personalities)

6 – एक एक कर कमजोरी का निवारण करें। (Tackle a weakness at a time)

7 – विश्वास सुदृढ़ीकरण (Strengthening belief system)-

8 – स्व व्यक्तित्वानुसार सशक्तीकरण (Empowerment through self personalities)

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वाह जिन्दगी !

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।

May 8, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जोश दमखम के स्वामी थे हम, बताना चाहिए

बच्चे क्या करें, न पूछें फिर भी, बताना चाहिए,

गुमराह न हों, सत्य से वाकिफ कराना चाहिए।

सफेदी यूँही नहीं आई है, ये भी जताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।1।

देश की सीमाएं बदलीं कैसे ये सुनाना चाहिए।

पुनः गलती न हो कहीं राह तो दिखाना चाहिए,

कहाँ, क्या चूक हुई खुल करके जताना चाहिए,

उम्र कुछ नहीं संख्या है यह भी बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।2।

जवानी के दिशा बोधक किस्से सुनाना चाहिए,

जो गलत है गलत है बुरी शै से बचाना चाहिए,

नशा छोड़कर,आदर्श का पाठ पढ़ाना चाहिए,

गन्दा साहित्य नाश करेगा, भेद बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।3।

मूल्य अवरोहण न हो, सत्पथ दिखाना चाहिए,

ग़मों से जूझते कैसे, वह रास्ता बताना चाहिए,

कुछ मानें न मानें मगर, साम्य बैठाना चाहिए,

मगरूर न हों वे, सेहत के राज बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

जितना सम्भव हो, समय दर्पण दिखाना चाहिए,

मर्यादा सीमा रेखाएं, बे झिझक बताना चाहिए,

अस्तित्वबोध जरूरी है, दॉँवपेच सिखाना चाहिए,

गुर आत्मरक्षार्थ सभी, बेटियों को बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

ठोकरों से बचें कैसे अनुभव से सिखाना चाहिए,

कार्यनिर्वहन कहकर नहीं करके दिखाना चाहिए,

निज समस्या छोड़, देशहित पाठ पढ़ाना चाहिए,

‘नाथ’ यथा समय विश्वबन्धुत्व राग सुनाना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

मुक्तक 

शरीर में लहू लावे की तरह बहता है

इसका वही अन्दाज़ दिखाना चाहिए

सौंप रहे हैं, विरासत जिस पीढ़ी को

संरक्षण संवर्द्धन पाठ पढ़ाना चाहिए। 

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काव्य

मातृ दिवस(Mother’s Day)

May 7, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

यह अद्भुत संयोग – सुखद है

माँ की ममता याद दिलाने का। 

हाँ उऋण नहीं हो सकता जन है

उस करुणा रस के बरसाने का।

मातृ दिवस एक मात्र दिवस है

माँ का ऋण याद दिलाने का ।1।

सम्मान सुनो एक मात्र शब्द है,

भावों को वसन पहनाने का।

यह प्रयत्न है सफल उतना ही,

जैसे सूर्य को दीप दिखाने का। 

मातृ दिवस एक मात्र दिवस है

माँ का ऋण याद दिलाने का ।2।

बचपन की स्मृतियाँ क्षीण हैं

कारण तेरे जग में आने का।

आज दीखता जो तन मन है ,

प्रमाण है तेरे कष्ट उठाने का।

मातृ दिवस एक मात्र दिवस है

माँ का ऋण याद दिलाने का ।3।

जो सर्वस्व हँसकर खो देती है,

सर्व त्याग माँ रूप ले लेती है।

खो निस्वार्थ नहीं कुछ लेने का

माँ कृत्यों से सिद्ध कर देती है।

मातृ दिवस एक मात्र दिवस है

माँ का ऋण याद दिलाने का ।4।

कष्ट उठा बच्चे को सुख दे देती है 

जीवन में  वो खुशियाँ  बरसा देती है

न चाह सम्मान निधि को पाने का

माँ भाव जड़ को चेतन कर देती है।

मातृ दिवस एक मात्र दिवस है

माँ का ऋण याद दिलाने का ।5।

वह धरती के सर्वगुण ले लेती है

ममता,दया,क्षमा गुण धर लेती है।

नहीं चाहती बदले में कुछ लेने का

माँ नाम जीवन में सार्थक कर देती है         

            मातृ दिवस एक मात्र दिवस है

माँ का ऋण याद दिलाने का ।6।

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