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वाह जिन्दगी !

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।

January 10, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

जोश दमखम के स्वामी थे हम, बताना चाहिए

बच्चे क्या करें, न पूछें फिर भी, बताना चाहिए,

गुमराह न हों, सत्य से वाकिफ कराना चाहिए।

सफेदी यूँही नहीं आई है, ये भी जताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।1।

देश की सीमाएं बदलीं कैसे ये सुनाना चाहिए।

पुनः गलती न हो कहीं राह तो दिखाना चाहिए,

कहाँ, क्या चूक हुई खुल करके जताना चाहिए,

उम्र कुछ नहीं संख्या है यह भी बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।2।

जवानी के दिशा बोधक किस्से सुनाना चाहिए,

जो गलत है गलत है बुरी शै से बचाना चाहिए,

नशा छोड़कर,आदर्श का पाठ पढ़ाना चाहिए,

गन्दा साहित्य नाश करेगा, भेद बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।3।

मूल्य अवरोहण न हो, सत्पथ दिखाना चाहिए,

ग़मों से जूझते कैसे, वह रास्ता बताना चाहिए,

कुछ मानें न मानें मगर, साम्य बैठाना चाहिए,

मगरूर न हों वे, सेहत के राज बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

जितना सम्भव हो, समय दर्पण दिखाना चाहिए,

मर्यादा सीमा रेखाएं, बे झिझक बताना चाहिए,

अस्तित्वबोध जरूरी है, दॉँवपेच सिखाना चाहिए,

गुर आत्मरक्षार्थ सभी, बेटियों को बताना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

ठोकरों से बचें कैसे अनुभव से सिखाना चाहिए,

कार्यनिर्वहन कहकर नहीं करके दिखाना चाहिए,

निज समस्या छोड़, देशहित पाठ पढ़ाना चाहिए,

‘नाथ’ यथा समय विश्वबन्धुत्व राग सुनाना चाहिए।

सचमुच बुजुर्गों को युवा दिवस मनाना चाहिए।।

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शिक्षा

रबीन्द्र नाथ टैगोर (1861 -1941) RABINDRANATH TAGORE

January 6, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments


जीवन परिचय (Life Sketch)

इनका जन्म एक समृद्ध, सुसंस्कृत तथा प्रतिष्ठित परिवार में 6 मई 1861 को कलकत्ता में हुआ इनके पिताश्री देवेन्द्र नाथ टैगोर विद्वान, धर्मनिष्ठ, कलाप्रेमी, समाज सेवक, राष्ट्रभक्त व सज्जन प्रकृति के थे। सादा जीवन और उच्च विचार परिवार की पहचान थी। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा ‘ओरिएन्टल सेमेनरी स्कूल’ में हुई। यहाँ पढ़ाई में मन न लगने के कारण इन्हें हटा लिया गया और नार्मल स्कूल में प्रवेश दिलाया गया जिसमें ये ब्रिटिश कालीन शिक्षा व्यवस्था के सम्पर्क में आये और इन्हें कई कटु अनुभव हुए जिससे शिक्षा में सुधार का भाव इनके मानस में जाग्रत हुआ।

                विद्यालय ये नाम मात्र को गए समृद्ध पिता ने अध्ययन की सम्पूर्ण व्यवस्था घर पर ही कर दी, इन्हें घर पर बंगला, संस्कृत, अंग्रेजी, संगीत व चित्रकला आदि की अच्छी शिक्षा प्राप्त हुई पृथक विषय के अध्ययनार्थ पृथक अध्यापक की व्यवस्था की गयी। 1878 में उच्च शिक्षार्थ ये इंग्लैण्ड गए रूचि अनुसार व्यवस्था न हो पाने के कारण 1880 में वापस स्वदेश लौट आये। 1881 में कानून की शिक्षा प्राप्त करने हेतु ये पुनः इंग्लैण्ड गए लेकिन विचार परिवर्तन के कारण पुनः भारत लौट आये। सन 1901 में इन्होने शान्ति निकेतन की स्थापना बोलपुर के निकट की, जो आज विश्व भारती विश्वविद्यालय के नाम से विश्व विख्यात है।

                1910 में इनका महत्त्वपूर्ण काव्य ग्रन्थ ‘गीताञ्जलि’ प्रकाशित हुआ जिसके द्वारा किसी भारतीय को प्रथम बार नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसकी सम्पूर्ण राशि इन्होने शान्ति निकेतन को भेंट कर दी। 1915 में इन्हे डी० लिट्०  की मानक उपाधि कलकत्ता विश्व विद्यालय ने प्रदान की। तत्कालीन भारत सरकार ने इन्हे ‘नाइट हुड’ (सर)  की उपाधि सम्मानार्थ दी। इस उपाधि को इन्होने अंग्रेजों की कुटिल नीतियों के विरोध में त्याग दिया और इन्हे गाँधीजी द्वारा ‘गुरुदेव’ की उपाधि से नवाजा गया। गुरुदेव ने देश को गौरवान्वित करते हुए जीवन पर्यन्त कार्य किया। 7 अगस्त 1941 को गुरुदेव ने महाप्रयाण किया और इस प्रकार परम यशस्वी साहित्य कार, संगीतकार,कला और शिक्षा का सूर्य अस्ताचल गामी हो गया।

जीवन दर्शन  (PHILOSOPHY OF LIFE)-

रबीन्द्र नाथ टैगोर के जीवन दर्शन पर इनके सुसंस्कृत परिवार की धार्मिकता का गहन प्रभाव पारिलक्षित होता है सादा जीवन और उच्च विचार की पृष्ठभूमि में गठित इनके जीवन दर्शन को इस प्रकार क्रम दे सकते हैं। –

1 – ईश्वर की निराकार और साकार दोनों सत्ताओं में विश्वास।

2 – अद्वैत वादी।

3 – सर्वोच्च मानव (Supreme Man ) के रूप में ईश्वर की स्वीकारोक्ति।

4 – सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम् जैसे आध्यात्मिक मूल्यों को समर्थन।

5 – ईश्वर की अभिव्यक्ति ही है सृष्टि।

6 – मानव मानव में समानता के पोषक।     

7 – उच्चकोटि के दार्शनिक व समाज सुधारक।

8 – प्रखर राष्ट्रवादी।

9 – आत्मिकबल के उत्कर्ष हेतु सम्मान व स्वतन्त्रता के पोषक।

10 – छुआ छूत व निर्धनता पर कुठाराघात।

11 – प्रकृति और मानव की एकता पर बल।

12 – उच्च कोटि के मानवतावादी।

शिक्षा दर्शन और इसके आधारभूत सिद्धान्त (Educational Philosophy and its Basic Principles)-

टैगोर ने शिक्षा को एक ऐसे साधन के रूप में स्वीकार किया जो मानव मात्र को उत्थित करके उसमें परस्पर प्रेम, मेल, सद्भावना, विश्व बन्धुत्व की भावना का विकास कर सके। वे बालकों को राष्ट्रीयता, अन्तर्राष्ट्रीयता, वास्तविक जीवन से परिचय कराते हुए विस्तृत दृष्टिकोण से युक्त करना चाहते थे। प्रकृति और मानव के अटूट प्रेम पूर्ण रिश्ते बनें व सामाजिक सम्बन्धों का ताना बाना मजबूत हो।

सुनील चन्द सरकार ने ठीक ही लिखा है –

”He discovered for himself all the theories and principles of education which he was later to formulate for himself and use in his Shantiniketan experiment.”

”उन्होंने शिक्षा के उन सभी सिद्धान्तों की खोज स्वयं ही की, जिनका प्रतिपादन उन्हें आगे चलकर अपने लिए ही करना था तथा जिन्हें शांतिनिकेतन व्यावहारिक रूप देना था।”

 इनके दर्शन, शिक्षा सम्बन्धी विचारों, व्यवहारों व पाश्चात्य ज्ञान के घालमेल में इनके शिक्षा दर्शन के निम्न आधारभूत सिद्धान्त सहज दृष्टिगत होते हैं-

01 – भारत की आत्मा को आधुनिक भारत की आत्मा में प्रतिस्थापित करने का हर सम्भव प्रयास होना चाहिए।

02 – सजीव व गतिशील होना शिक्षा की प्रमुख विशेषता होनी चाहिए।

03 – शिक्षा का सामुदायिक जीवन से अटूट सम्बन्ध होना चाहिए उन्होंने लिखा भी है –

      ”Next to nature the child should be brought into touch with the stream of social behaviour.”

     ”प्रकृति के पश्चात बालक को सामाजिक व्यवहार की धारा के सम्पर्क में लाना चाहिए।”

04 – मातृ भाषा ही बालक की शिक्षा का माध्यम होना चाहिए।

05 – रहस्यवाद को यथार्थ पर अवलम्बित होना चाहिए।

06 – प्राकृतिक वातावरण में शिक्षा की व्यवस्था की जानी चाहिए।

07 – स्वशासन व सामाजिक साहचर्य की भावना विकसित की जानी चाहिए।

08 – सङ्गीत, चित्रकला, अभिनय, स्वाभाविक स्वछन्दता का विकास किया जाना चाहिए।

09 – मानवता वाद का पोषण जीवन के हर स्तर पर होना चाहिए।

10 – भारतीय सांस्कृतिक विरासत आधारित सामाजिक व्यवहार सिखाया जाना चाहिए।

11 – भारत के मौलिक चिन्तन व विशुद्ध भारतीयता से परिचय अवश्य कराया जाना चाहिए।

12 – व्यक्तित्व का सामन्जस्य पूर्ण सर्वांगीण विकास बालक की जन्मजात शक्तियों के आधार पर किया जाना चाहिए।

13 – सामाजिक मूल्यों व भारतीय दर्शन को शैक्षिक पाठ्य क्रम में लिया जाना चाहिए।

14 – पाठ्यक्रम अवलम्बित ज्ञान हेतु बालक को बाध्य न किया जाए बल्कि प्रत्यक्ष स्रोतों ज्ञान प्राप्ति के अवसर प्रदान किये जाएँ।

15 – सृजनात्मक शक्तियों के विकास हेतु आत्म अभिव्यक्ति के अवसर प्रदान किये जाएँ।

16 – प्राथमिक पाठशालाओं को आवश्यकतानुसार विकसित किया जाए।

17- विश्व नागरिकता के भाव का पोषण किया जाए।

शिक्षा के उद्देश्य (Aim of Education )-

रबीन्द्र नाथ टैगोर शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य समरसता के भाव के उन्नयन को मानते हैं उन्होंने कहा भी है –

”The highest education is that which makes our life in harmony with all existence.”

”सर्वोच्च शिक्षा वह है जो हमारे जीवन और समस्त सृष्टि के बीच समरसता स्थापित करती है।”

गुरुदेव के मनोभावों को इनके द्वारा प्रदत्त शैक्षिक उद्देश्यों से समझ सकते हैं जिन्हे बिन्दुवार इस प्रकार क्रम दे सकते हैं।–

[1]- शारीरिक विकास [Physical Development] [2]- आध्यात्मिक एवम् नैतिक विकास [Spiritual and Moral Development]

[3]- बौद्धिक विकास [Intellectual Development] [4]- सामाजिक विकास [Social Development] [5]- व्यावसायिक विकास [Vocational Development] [6]- सांस्कृतिक विकास [Cultural Development] [7]- राष्ट्रीयता का विकास [Development of Nationalism] [8]- अंतर्राष्ट्रीय दृष्टिकोण का विकास [Development of International Attitude]

उक्त उद्देश्यों की प्राप्ति में यह बताना प्रासंगिक होगा कि उक्त का आधार केवल पुस्तकें नहीं हो सकतीं बल्कि जानने की इच्छा अधिक महत्त्व पूर्ण है इसीलिये उन्होंने कहा –

”In comparison with book learning, knowing the real living directly is true education. It not only promotes the acquiring of some knowledge but develops the curiosity and faculty of knowing and learning so powerfully that no class room teaching can match it.”

”पुस्तकों की अपेक्षा प्रत्यक्ष रूप से जीवित व्यक्ति को जानने का प्रयास करना ही सच्ची शिक्षा है। इससे कुछ ज्ञान ही प्राप्त नहीं होता अपितु जानने की शक्ति का इतना विकास हो जाता है। जितना कक्षा में दिए जाने वाले व्याख्यानों द्वारा होना असम्भव है।”

पाठ्यक्रम [Curriculum]-

इन्होने प्राकृतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक विकास को महत्ता प्रदान की है अपनी भाषा के साथ विश्वबन्धुत्व हेतु क्रिया प्रधान पाठ्यचर्या पर जोर दिया पूर्ण मानव बनाने के लिए बालक के विकास हेतु व्यापक पाठ्यक्रम को समर्थन प्रदान किया हालांकि कोई निश्चित योजना प्रदान नहीं की। इनके द्वारा समर्थित विषय व तत्सम्बन्धी क्रियाऐं इस प्रकार हैं –

विषय – मातृ भाषा, इतिहास, भूगोल, संस्कृत, अंग्रेजी, साहित्य, विज्ञान, प्रकृति अध्ययन आदि।

आवश्यक क्रियाएं – कृषि, बागवानी, भ्रमण, नाटक, क्षेत्रीय अध्ययन, प्रायोगिक कार्य, कला, विविध वस्तु संग्रह, मौलिक रचना आदि।

पाठ्य सहगामी क्रियाएं – खेलकूद,समाजसेवा, संगीत,नृत्य, रचना, छात्र स्वशासन आदि।

शिक्षण विधियाँ [Methods of Teaching ]-टैगोर महोदय ने कृत्रिमता के आगोश से उद्भवित नीरस तथा बालकों को निष्क्रिय करने वाली शिक्षण पद्धतियों का विरोध किया एवम् शिक्षण को प्रभावशाली बनाने हेतु निम्न विधियों का समर्थन किया –

[1]-  भ्रमण के समय पढ़ाना। (Teaching while Walking) 

[2]- प्रश्नोत्तर विधि। (Question Answer Method)

[3]- वादविवाद विधि। (Discussion Method)

[4]- मातृ भाषा द्वारा शिक्षण। (Teaching by Mother Tongue)

[5]- क्रिया द्वारा शिक्षण। (Teaching through Activity)

[6]- खेल द्वारा शिक्षण। (Teaching through Play)

[7]- प्रयोग विधि द्वारा शिक्षण। (Teaching through Experiment)

[8]- विश्लेषण व संश्लेषण विधि। (Analytic and Synthesis Method)

[9]- तर्क विधि। (Logical Method)

[10]- स्व अनुभव द्वारा शिक्षण। (Teaching through Experience)

शिक्षक (Teacher)-

टैगोर को परम्परावादी कहा जाता है वे अध्यापक को महत्त्व पूर्ण स्थान प्रदान करते हैं और कहते हैं कि –

”मनुष्य केवल मनुष्य से ही सीख सकता है।“

                इससे यह तथ्य स्पष्ट है कि अधिगम के स्थान्तरण में अध्यापक की महत्ता को नकारा नहीं जा सकता। वे अध्यापक के कार्य निर्धारण इस प्रकार करते हैं।

1 – बालक को स्वानुभव से सीखने हेतु उचित वातावरण का निर्माण करना।

2 – सृजनात्मक शक्ति का विकास करना।

3 – राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय अवबोध विकसित करना।

4 – शिक्षक प्रशिक्षण की महत्ता समझ मानस में गरिमा पूर्ण स्थान देना।

5 – व्यक्तिगत भिन्नता के आधार पर शिक्षण।

6 – स्वयं के आचरण व नैतिक बोध द्वारा आदर्श स्थापित करना।

7 – सहानुभूति व प्रेम पूर्ण व्यवहार।

8 – प्रकृति और मानव के सह अस्तित्व का प्रकाशन।

अधिगमार्थी (Learner)

  गुरुवर बालक के व्यक्तित्व का आदर करते थे और उनसे ब्रह्मचर्य के नियमों का अनुपालन करने की आशा करते थे ब्रह्मचर्य हेतु मन, वचन, कर्म शुद्धि व इन्द्रिय निग्रह पर विशेष बल देते थे। बालक को शुचिता, आज्ञा पालक, प्रकृति प्रेमी, सांसारिक व आध्यात्मिक ज्ञान पिपासु तथा जिज्ञासु होना चाहिए। श्रद्धालुता , विनम्रता, दयालुता व्यवहार में पारिलक्षित होनी चाहिए।

अनुशासन (Discipline)

                प्रकृति प्रेमी होने के साथ ये बालक की मूल प्रकृति से विशेष प्रेम करते थे और किसी भी प्रकार की दण्ड व्यवस्था के विरोधी थे ये चाहते थे कि बालक पर अनुशासन थोपा न जाए बल्कि स्वानुशासन की भावना का विकास किया जाए। अनुशासन व्यवस्थापन हेतु साहित्यिक,सांस्कृतिक व सामूहिक खेलों को प्रोत्हासित किया जाए।

टैगोर के शिक्षा सम्बन्धी अन्य विचार (Other Educational Views of Tagore)

  • 1 – जन शिक्षा। (Mass Education)
  • 2 – स्त्री शिक्षा। (women Education)
  • 3 – धार्मिक शिक्षा। (Religious Education)
  • 4 – व्यावसायिक शिक्षा। (Vocational Education)
  • 5 – राष्ट्रीयता व अन्तर्राष्ट्रीयता के विकास हेतु शिक्षा। (Education for National and International Development)
  • 6 – शिक्षा में स्वतन्त्रता।  (Freedom in Education)
  • उक्त आधार पर निर्विवाद रूप से यह माना जा सकता है कि शिक्षा शास्त्री के रूप में शिक्षा को यथोचित स्थान तक पहुँचने का मार्ग गुरुवर ने प्रशस्त किया।
  • शिक्षा के उद्देश्य, पाठ्यक्रम, शिक्षणविधि, शिक्षक, शिक्षार्थी, अनुशासन के सम्बन्ध में अमूल्य विचार देने के साथ व्यावसायिक शिक्षा, स्त्री शिक्षा,जन शिक्षा व विश्व बन्धुत्व हेतु जो निर्देश दिए वे उन्हें आज भी प्रासंगिक बनाते हैं.
  •          इसीलिये एच० बी० मुखर्जी (H. B. Mukherjee) ने कहा –
  •       ”Tagore was the greatest prophet of educational renaissance in modern India. He waged a ceaseless battle to uphold the highest educational idea before the country, and conducted educational experiments at his own institutions, which made them living symbols of what an ideal should be.“
  • ”टैगोर वर्तमान भारत के शैक्षिक पुनुरुत्थान के सबसे बड़े पैगम्बर थे। उन्होंने देश के सम्मुख शिक्षा के सर्वोच्च आदर्शों को स्थापित करने के लिए आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने अपनी शैक्षिक संस्थाओं में ऐसे शैक्षिक प्रयोग किए जिन्होंने उन्हें आदर्श का सजीव प्रतीक बना दिया।” 

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शिक्षा

महात्मा गाँधी/ MAHATMAGANDHI

January 1, 2022 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

महात्मा गाँधी का नाम किसी परिचय का मुहताज नहीं है इनका पूरा नाम मोहन दास करम चन्द्र गाँधी था और वास्तव में इनके कार्यों ने व्यवहार में परिणति पाकर शैक्षिक जगत के कई विषयों में स्थान पाया अर्थ शास्त्र, राजनीति शास्त्र, इतिहास, समाज शास्त्र, हिन्दी, दर्शन शास्त्र, शिक्षाशास्त्र  आदि विभिन्न विषयों में हम सब इनका अध्ययन करते हैं।

गाँधीजी के व्यक्तित्व व कृतित्व से प्रभावित होकर एम0 एस0 पटेल महोदय ने कहा –

” Gandhiji  has secured a unique place in the galaxy of the great teachers who have brought fresh light in the field of education.”

”गाँधीजी ने उन महान शिक्षकों और उपदेशकों की गौरवपूर्ण मण्डली में स्थान प्राप्त किया है जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में नवज्योति दी है।” 

PHILOSOPHY OF LIFE

जीवन दर्शन

आजाद भारत के प्रणेता महात्मा गाँधी का जीवन दर्शन जिन आधारों पर अवलम्बित है उन्हें इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है। –

→ सृष्टि के सभी मानवों में आध्यात्मिक समानता है क्योंकि सृष्टि के सभी मानव आत्माधारी हैं।

→ परमात्मा का अंश आत्मा है और परमात्मा सत्य है अतः आत्मा भी सत्य है।

→ मानव को ज्ञान प्राप्ति में भौतिकता व आध्यात्मिकता का यथायोग्य सामन्जस्य करना चाहिए।

→ आत्मानुभूति मानव जीवन का मुख्य उद्देश्य है।

→ भक्ति आत्मानुभूति का पवित्र साधन है।

→ गाँधीजी के दर्शन का मूल आधार सत्य और अहिंसा हैं।

    सत्य के बारे में इनका मानना है की साधारणतः सत्य का अर्थ सच बोलना मात्र समझा जाता है पर मैंने विशाल अर्थ में सत्य का प्रयोग किया है। विचार में वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है।

गाँधीजी अपने दूसरे अमोघ शस्त्र अहिंसा के बारे में कहते हैं -”अहिंसा बिना सत्य की खोज असम्भव है अहिंसा और सत्य ऐसे ओतप्रोत हैं जैसे सिक्के के दोनों रूप ,उसमें किसे उल्टा कहें और किसे सीधा, फिर भी अहिंसा को साधन और सत्य को साध्य मानना चाहिए। साधन  हाथ की बात है सत्य परमेश्वर है।”

→जीवन दर्शन के व्यावहारिक पक्ष में सत्याग्रह और निर्भयता दीख पड़ता है।

गाँधीजी सत्याग्रह को सामाजिक व राजनीतिक बुराई से लड़ने की अचूक प्राविधि मानते थे इसीलिए उन्होंने 8 अक्टूबर 1952 के यंग इंडिया में लिखा –

”मैं अत्याचारी की तलवार की धार को पूरी तरह कुण्ठित करना चाहता हूँ इसके विरोध में एक से अधिक तेज शस्त्र को रखकर नहीं,किन्तु उसकी इस आशा को कि मैं उसका शारीरिक प्रतिरोध करूँगा,निराशा में बदलकर। “

वे मानते थे कि जो निडर नहीं होगा वह सत्य और अहिंसा का अनुयायी हो ही नहीं सकता भय कई प्रकार का हो सकता है शारीरिक आघात का भय, बीमारी का भय,अधिकार या पद छिनने का भय। हमें सभी प्रकार के भय से मुक्त हो निर्भय होना चाहिए।

→ गाँधीजी के जीवन दर्शन में उनके सर्वोदय सिद्धान्त का महत्त्वपूर्ण स्थान है।

EDUCATIONAL THOUGHT OF GANDHIJI

गाँधीजी के शैक्षिक विचार

Or

GANDHIJI’S PHILOSOPHY OF EDUCATION

गाँधीजी का शिक्षा दर्शन

गाँधीजी कोई शिक्षाविद नहीं थे ये राजनैतिक पटल से उभरे व्यावहारिक पक्ष का मूर्तिमान स्वरुप थे इन्होने स्वीकार किया –

”जो शिक्षा चित्त की शुद्धि न करे, निर्वाह का साधन न बनाये तथा स्वतंत्र रहने का हौसला और सामर्थ्य न उपजाए,उस शिक्षा में चाहे जितनी जानकारी का खजाना, तार्किक कुशलता और भाषा पाण्डित्य मौजूद हो वह सच्ची शिक्षा नहीं। “

CONCEPT OF EDUCATION

शिक्षा का सम्प्रत्यय

गाँधीजी शिक्षा का दायरा विकसित कर इसमें पढ़ने लिखने के साथ हाथ, मस्तिष्क और हृदय के विकास को भी शामिल करना चाहते हैं। इसीलिये इन्होने कहा है कि –

”By education I mean an all round drawing out of the best, in child and man-body,mind and spirit.”

”शिक्षा से मेरा अभिप्राय बालक और मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा के उच्चतम विकास से है। “

ये केवल पढ़ना लिखना या साक्षरता को शिक्षा की श्रेणी में नहीं रखते बल्कि स्पष्ट कहते हैं कि –

”Literacy is not the end of education nor even the biginning. It is only one of the means whereby men and women can be educated.”

”साक्षरता न तो शिक्षा का अन्त है और न प्रारम्भ। यह केवल एक साधन है जिसके द्वारा पुरुष और स्त्रियों को शिक्षित किया जा सकता है।”

Aims of Education

शिक्षा के उद्देश्य

गाँधीजी के शिक्षा सम्बन्धी विचारों के आधार पर उद्देश्यों को दो भागों में बाँटकर अभिव्यक्त किया जा सकता है। यथा –

→Immediate Aim of Education

   शिक्षा के तात्कालिक उद्देश्य 

A – शारीरिक विकास (Physical Development)-

गाँधीजी ने अपने जीवन के अनुभव के आधार पर आत्मिक विकास  हेतु शारीरिक विकास को अवलम्ब के रूप में स्वीकार किया।

B — Intellectual and Mental Development

बौद्धिक व मानसिक विकास  

गाँधीजी शारीरिक विकास के साथ बुद्धि एवं मानसिक विकास को आवश्यक मानते थे सत्य व अहिंसा का आचरण सशक्त बौद्धिक व मानसिक स्थिति वाला व्यक्तित्व ही कर सकता है।

C – Individual and Social Development

वैयक्तिक तथा सामाजिक विकास

गाँधीजी समाज को पुष्ट करने हेतु उसकी प्रत्येक इकाई को सशक्त करने के पक्षधर थे ये शासन द्वारा प्रदत्त साधनों को समाज केअन्तिम व्यक्ति तक पहुँचाना व्यवस्था का धर्म समझते थे।मानव मानव में प्रेम के बढ़ने से सामाजिक समरसता का विकास होगा जो अन्ततः विश्व बन्धुत्व की भावना को बलवती करेगा।

D – Character Development

      चारित्रिक विकास

गाँधीजी शिक्षा के माध्यम से व्यक्ति को चारित्रिक उत्कृष्टता प्रदान करना चाहते थे इन्होने अपनी आत्म कथा में लिखा –

”मैंने सदैव हृदय की संस्कृति अथवा चरित्रनिर्माण को प्रथम स्थान दिया है तथा चरित्र निर्माण को शिक्षा का उचित आधार माना है । “

उत्तम चरित्र में ये सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, अपरिग्रह, निर्भयता आदि को शामिल करना चाहते थे इन्होने विद्यालय को चरित्र निर्माण की उद्योगशाला मानते हुए लिखा। –

”The end of all knowledge must be the building up of character, personal purity.”

”सभी ज्ञान का उद्देश्य उत्तम चरित्र का निर्माण व्यक्तिगत पवित्रता होना चाहिए।”

E – Spiritual and  Cultural Development

आध्यात्मिक तथा  सांस्कृतिक विकास

वे गीता से बहुत प्रभावित थे इसलिए ज्ञान कर्म भक्ति तथा योग आदि सद्गुणों का समर्थन करते थे और बालक के आध्यात्मिक पक्ष को प्रबल करना चाहते थे।  सांस्कृतिक विकास के बारे में  गाँधीजी का विचार था –

 ”मैं शिक्षा के साहित्यिक पक्ष के स्थान पर सांस्कृतिक पक्ष को अधिक महत्त्व देता हूँ। संस्कृति शिक्षा का आधार तथा विशेष अंग है। अतः मानव के प्रत्येक व्यवहार पर संस्कृति की छाप  होनी चाहिए। “

F – Vocational Aim

जीविकोपार्जन का उद्देश्य –

गाँधीजी की बेसिक शिक्षा की अवधारणा बालक को किसी एक शिल्प में दक्ष करने की थी ये स्पष्ट कहा करते थे –

”Education ought to be a kind of insurance against unemployment.

”शिक्षा को बेरोजगारी के विरुद्ध एक बीमा होना चाहिए।”

Ultimate Aim of Education

शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य

यहाँ गाँधीजी के विचारों में आदर्शवादी दर्शन का प्रभाव पारिलक्षित होता है ये ईश्वर प्राप्ति और आत्मानुभूति को सर्वोच्च वरीयता प्रदान करते हैं और स्वीकार करते हैं कि शिक्षा के द्वारा अंतिम वास्तविकता से साक्षात्कार कराया जाना चाहिए। आत्मानुभूति की महत्ता प्रतिपादित करते हुए उद्देश्य निर्धारित करते हैं –

”Realization of ultimate reality, a knowledge of God and self realization.”

”अन्तिम वास्तविकता का अनुभव, ईश्वर और आत्मानुभूति का ज्ञान। “

Curriculum

पाठ्यक्रम

गाँधीजी देश के नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाकर वर्गविहीन समाज को स्थापित करना चाहते थे। इनके पाठ्यक्रम में सत्य, कल्याण व सौन्दर्यबोध जाग्रत करने वाले विषयों को स्थान मिला है जिन्हे इस प्रकार क्रम दिया जा सकता है।

1 – मातृ भाषा

2 – विभिन्न शिल्प यथा चर्म कार्य, कताई, बुनाई, बागवानी, कृषि, काष्ठ कला, मछली पालन, मिट्टी का काम व क्षेत्र आधारित अन्य शिल्प। 

3 – अंक गणित, बीज गणित, रेखा गणित, नाप तौल आदि।

4 – भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति विज्ञान,स्वास्थ्य विज्ञान, शरीर विज्ञान, गृह विज्ञान, प्रकृति ज्ञान, नक्षत्र ज्ञान आदि। 

5 – खेलकूद व व्यायाम। 

6 – कला व संगीत।

7 – इतिहास, भूगोल, नागरिक शास्त्र, अर्थ शास्त्र व सामाजिक अध्ययन।

8 – नैतिक शिक्षा व सामाजिक कार्य।

9 – हिन्दी जहाँ यह मातृ भाषा नहीं है ।

Methods of Teaching

शिक्षण विधि  

गाँधीजी इस प्रकार की शिक्षण विधियों को प्रयोग करना चाहते थे जिसमें शिक्षार्थी भी सक्रिय रहे वह प्रयोग कर्त्ता ,शोध कर्त्ता, निरीक्षण कर्त्ता के रूप में कार्य करे।

उन्होंने करके सीखना(Learning by doing), अनुभव द्वारा सीखना (Learning by experience), सीखने की प्रक्रिया में समन्वयन (Correlation in the process of learning), प्रशिक्षण द्वारा सीखना (Learning by training) आदि पर जोर दिया।

Teacher

अध्यापक

गाँधीजी कहते थे कि जो शिक्षण कार्य को व्यवसाय न मानकर सेवा धर्म के रूप में स्वीकार करता है वही अध्यापक बन सकता है वे चाहते थे कि सेवा भावी,सहिष्णु, सत्य का आचरण करने वाले, धैर्यवान, ज्ञान पुञ्ज,साधन की पवित्रता समझने वाले लोग इस पावन कार्य से जुड़ें।     

Discipline

अनुशासन

गाँधीजी आत्म अनुशासन के पक्षधर थे ऊपर से थोपे जाने वाले अनुशासन इन्हें स्वीकार्य नहीं था ये चाहते थे की अध्यापक अपने मर्यादित आचरण व अनुकरणीय व्यवहार द्वारा विद्यार्थी में अनुशासन का समावेशन करे।

Student

विद्यार्थी

गाँधीजी बालकों के शारीरिक, मानसिक, नैतिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक उत्थान हेतु ब्रह्मचर्य पर बल देते थे। वे चाहते थे की बालक संयमी, धैर्यवान,आत्म विश्वासी व आध्यात्मिक बल से युक्त हों।

Other aspects of Education

शिक्षा के अन्य पक्ष

गाँधीजी भारतीय जनमानस से घुले मिले विशिष्ट व्यक्तित्व थे, उन्हें भारतीय सामाजिक संरचना का विशेष ज्ञान था इसीलिए वे शिक्षा से प्रत्येक वर्ग को बिना विवाद के जोड़ना चाहते थे.समग्र को शिक्षा से जोड़ने के क्रम में उन्होंने निम्न कारकों को भी स्थान प्रदान किया।

धर्म शिक्षा (Education of Religion)

महिला शिक्षा(Women Education)

जन शिक्षा(Mass Education)

सह शिक्षा(Co Education)

व्यावसायिक शिक्षा (Vocational Education)

Evaluation of Educational Thought of Mahatma Gandhi

महात्मा गाँधी के शैक्षिक विचारों का मूल्यांकन

 गाँधीजी के विचार भारतीय पृष्ठभूमि में भारत की आवश्यकता के अनुसार तत्कालीन परिस्तिथियों की उपज हैं और उस समय के इनके विचार एक प्रयोग के रूप में भारत में धारित भी किये गए और आधिकांश को विद्वतजनों का व जन समर्थन भी प्राप्त हुआ। बालकों की सक्रिय साझेदारी व बाल केन्द्रित शिक्षण विधियाँ आज भी आवश्यक हैं प्रभावात्मक विधि द्वारा अनुशासन स्थापन भी शिक्षा शास्त्रियों को स्वीकार्य हैं। आज की परिस्थितियों में भी लोग शिक्षक में आदर्श तलाशते हैं भले ही वह बाजारवादी व्यवस्था का शिकार हो गया हो। इन्होने जन शिक्षा,सह शिक्षा, स्त्री शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा आदि के विषय में जो अमूल्य विचार दिए उनके लिए देश उनका चिर ऋणी रहेगा।

अध्यापक, धर्म शिक्षा,बेसिक शिक्षा, आत्म निर्भर शिक्षण संस्थान आदि से जुड़े उनके विचार कालातीत हुए से लगते हैं यद्यपि गाँधीजी के विचारों पर गीता दर्शन का प्रभाव स्पष्ट पारिलक्षित होता है और यह प्रभाव कुछ पाश्चात्य दर्शनों से मेल खाता लगता है एम0 एस0 पटेल महोदय कहते हैं-

“It is naturalistic in its setting, Idealistic in its aim and pragmatic in its method and programme of work. The real greatness of Gandhiji as educational philosopher consists in the fact that the dominant tendencies of naturalism, idealism and pragmatism are not seprate and independent in his philosophy, but they fuse into a unity.”

“दार्शनिक के रूप में गांधीजी की महानता इस बात में है की उनके शिक्षा दर्शन में प्रकृतिवाद, आदर्शवाद और प्रयोजनवाद की मुख्य प्रवृत्तियां अलग और स्वतंत्र नहीं हैं वरन वे सब मिलजुलकर एक हो गयी हैं जिससे ऐसे शिक्षा दर्शन का जन्म हुआ जो आज की आवश्यकताओं के लिए उपयुक्त होगा, मानव आत्मा की सर्वोच्च आकांक्षाओं को सन्तुष्ट करेगा।”

उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है की शिक्षा जगत के निरभ्र आकाश में महात्मा गांधीजी एक जाज्वलयमान नक्षत्र के रूप में युगों तक अपनी आभा से मानवता को आलोकित करते रहेंगे। उनके जैसे शिक्षाविद की मौलिकता हमेशा संसार का इतिहास संजोकर रखेगा।

——————————————————————धन्यवाद। ————————————————————-                                                                       

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वाह जिन्दगी !

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

December 26, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

इस जहाँ में भाग्य लेखा बुनने का अधिकार किसको?

किस भरम में हाथ देखा, हाथ का श्रम दान किसको?

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

श्रम साध्य अवलम्ब देखा,बढ़ने का अधिकार उसको।

श्रम का बहुप्रकार देखा, सारे जगत का प्यार उसको।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

काम देखा कौशल देखा, श्रम का है प्रतिदान उसको।

वीर रस प्रतिमान देखा, आधार देता नव फलक को।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

 भाग्य ने कुछनहीं फेंका दिग्भ्रमित करते हो किसको?

भाग्य का है किसका ठेका, भाग्य लिखना है हमीं को।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

 भाग्य गर कोई लिखके देता,सारे फल मिलते उसीको।

सड़क पर बोरे पर बैठा, वह हाथ देखे जाल किस को।

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

 जाल में क्यों फँस कर देखा, सत्कर्म लेता ताड़ उनको।

जाहिलों ने ये पाश फेंका,क्यों बे वजह प्रणाम उनको ?

भाग्य होता, करम रेखा, गढ़ने का अधिकार हमको।

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काव्य

एकता तोड़ देती हैं।

December 23, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

ये दुनियाँ है ये रिश्तों को नया आयाम देती है,

जहाँ हम लड़खड़ाते हैं ये बढ़कर थाम लेती है,

पर भारत में हमारे जन, भरोसा तोड़ देते हैं।

गद्दारों को यदि पकड़ें सियासत साथ देती है।

यही बातें,  यही बातें,  एकता तोड़ देती हैं  ।1।

उर्वर है यही धरती ये शिव को जन्म देती है

ये भी इसकी आदत है भस्मासुर को सेती है

ये भस्मासुर देश का विकासपथ तोड़ देते हैं

इन मौकापरस्तों का कुछ कौमें साथ देती हैं   

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं।2।

इतने घने कुहासे में राष्ट्रवादिता जन्म लेती है

जननी की ही शक्ति है सीमा को लाल देती है

देश रक्षा हितार्थ लाल प्राण भी छोड़ देते हैं

ये अबकी सियासत है जो उलटा बोल देती है      

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।3।

जवानी का लालच ऐसा बचपना छीन लेती है

अमीरी का भरम ऐसा, जवानी लील लेती है

कैसे बन्धन हैं दिल के वो सपने मोल देते हैं

कीमत देने के बाद भी भौतिकता तोड़ देती है     

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।4।

जातीयता, प्रान्तीयता जहर सा घोल देती है

प्रेम के पावन -पथ पर, लावा उड़ेल देती है

लोगों का शगल ये है गलती को हवा देते हैं

हवा बदले है अन्धड़ में,बस्ती उजाड़ देती है       

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।5।

अस्पृश्यता क्षेत्रीयता बातों को झोल देती है

लिपटी हुई ये बातें कलई सब खोल देती हैं

हमारे ही विविध नेता विष बेल रूप देते हैं

बेलें विषवमन करके तमस सा घोल देती हैं

यही बातें, यही बातें, एकता तोड़ देती हैं ।6।       

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शिक्षा

EDUCATION FOR NATIONAL INTEGRATION/राष्ट्रीय एकता के लिए शिक्षा

December 20, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

Meaning and Definition of National Integration

राष्ट्रीय एकता का अर्थ तथा परिभाषा–

राष्ट्रीय एकता वह विचारधारा है जो देश के सभी नागरिकों को सामन्जस्य पूर्ण तथा सहयोग पूर्ण जीवन यापन हेतु प्रेरित करती है, यही वह भाव है जो सारी विभिन्नताओं का परित्याग कर राष्ट्रीय हिट में परित्याग हेतु विवश करता है राष्ट्र के लोगों में भ्रातृत्व, एकीकरण, देश-भक्ति,देश प्रेम का उद्भव ही राष्ट्रीय एकता का परिचायक है। 1961 में राष्ट्रीय एकता को ‘राष्ट्रीय एकता सम्मलेन’ में इस प्रकार पारिभाषित किया गया –

“National Integration is a psychological and educational process involving the development of a feeling of unity, solidarity, and cohesion in the heart of people, a sense of common citizenship and a feeling of loyality to the nation.”- Report of ‘National Integration conference 1961’

” राष्ट्रीय एकता एक मनोवैज्ञानिक एवं शैक्षिक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा लोगों के दिलों में एकता, संगठन एवं सन्निकटता के भावना,सामान नागरिकता की अनुभूति तथा राष्ट्र के प्रति भक्ति की भावना का विकास किया जाता है।”

राष्ट्रीय एकता के अर्थ को समझाते हुए डॉ 0 जे 0 एस 0 बेदी कहते हैं –

”National Integration means bringing about economic, social, cultural and linguistic differences among the people of various states in the country within  tolerable range and imparting to the people a feeling of the oneness of India.”

”राष्ट्रीय एकता का अर्थ है -देश के विभिन्न राज्यों के व्यक्तियों की आर्थिक, सामजिक, सांस्कृतिक एवं भाषा विषयक विभिन्नताओं को वांछनीय सीमा के अन्तर्गत रखना और उसमें भारत की एकता का समावेश करना।”

Need of National Integration

राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता –

देश की समृद्धि एवं विकास हेतु संकीर्ण मनोवृत्तियों व स्वार्थपरता का परित्याग कर राष्ट्रीय एकता का समावेशन परमावश्यक है इसीलिये  के0 एल 0 श्रीमाली  महोदय ने कहा-

“The process of national integration must continue and be strengthened, if we are to preserve and enrich our hard one freedom.”    – K.L. Shrimali

“यदि हम मुश्किल से प्राप्त अपनी स्वतन्त्रता की सुरक्षा एवं समृद्धि चाहते हैं, तो हमें राष्ट्रीय एकता की प्रक्रिया को जारी रखना और शक्तिशाली बनाना पड़ेगा।”

राष्ट्रीय एकता राष्ट्र के अस्तित्व के लिए परमावश्यक है राष्ट्रीय एकता की समस्या प्रत्येक राष्ट्रवादी को व्यथित करती है इसीलिये डॉ 0 राधाकृष्णन जी ने कहा –

“National Intrregation is a problem with which our survival as a civilized nation as a bound up.”-             Dr. Radha Krishanan

”राष्ट्रीय एकता एक ऐसी समस्या है, जिससे सभ्य राष्ट्र के रूप में हमारे अस्तित्व का घनिष्ठ सम्बन्ध है।”

Factors Against National Integration-

राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्व –

राष्ट्र को समुन्नत बनाने और विकास की ओर अग्रसर करने हेतु राष्ट्रीय एकता की परम आवश्यकता है किन्तु भारत में राष्ट्र्रीय एकता के मार्ग में कई बाधाएं हैं जिन्हे हम इस प्रकार क्रम दे सकते हैं –

Casteism  (जातिवाद ) – लोगों का संकीर्ण दृष्टिकोण तथा राजनीतिक दलों का जातीयता भड़काने वाला भाव लोगों को भ्रमित कर देता है इससे राष्ट्रीयता की भावना को ठेस लगती है,इस सम्बन्ध में G.S.Ghuriye (जी0 एस0 घुरिये) का विचार है –

“The feeling of casteism creates the feeling of hatred for other casts and prepares unhealthy atmosphere for the development of national consciousness.”

“यह जाति प्रेम की भावना है जो अन्य जातियों में कटुता उत्पन्न करती है तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास के लिए अनुपयुक्त वातावरण तैयार करती है।”

Noncivilized  thinking-

असभ्य सोच –

कुछ लोगों की सोच संकीर्णता में इतनी जकड़ी है की वे सभ्य समाज और देश के भविष्य का चिन्तन न कर केवल खुद का क्षणिक लाभ देखते हैं और भविष्य के सार्थक क्रिया कलापों की बाधा बन जाते हैं जैसा कि जवाहर लाल नेहरू ने स्पष्ट कहा –

“National Integration and cohesion is a matter of vital importance today. It is the basic of all other activities which we try to further.”

“राष्ट्रीय एकता एवं सामंजस्य आज एक महत्वपूर्ण विषय है। यह उन सभी क्रिया कलापों का आधार है जिन्हे हम भविष्य में करना चाहते हैं।”

Provincialism (प्रान्तीयता) –

भारत के प्रान्तों में स्वस्थ विकासात्मक प्रतिस्पर्धा का अभाव देखने को मिलता है यह प्रान्तीयता की भावना हिन्सात्मक आन्दोलन व आतंक वाद में परिणित हो जाती है और राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ जाती है।

Communalism (साम्प्रदायिकता)-

इस देश की एकता के समक्ष साम्प्रदायिकता बहुत विकराल समस्या के रूप में उभरी है जो सम्प्रदाय हमारी भारतीय सनातन सभ्यता की उदारता से पनपे वही अलगाववादी दुष्प्रभाव से युक्त हो विषवमन कर रहे हैं आए दिन साम्प्रदायिक दंगे  की सूचना सम्प्रेषित होती रहती है यह खूनी होली निर्दोषों की बलि लेती रहती है। राष्ट्रीय एकता के समक्ष यह बहुत बड़ा खतरा है।

Political Parties (राजनीतिक दल)-

भारतीय परिदृश्य में निहित स्वार्थ वाले, संकीर्ण मानसिकता से युक्त राजनीतिक दल अस्तित्व में आ गए हैं जो उत्तेजना,भावनात्मक उन्माद फैलाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं लेश मात्र भी राष्ट्रवादी भावना से युक्त नहीं हैं। जाति, सम्प्रदाय, धर्म, भाषा के आधार पर राष्ट्र को विघटित करने वाले राजनीतिक दलों ने एकता को विघटित करने का  कार्य किया है। गैर राष्ट्रवादी दलों से देश की एकता को बड़ा खतरा है।

Communication System (संचार व्यवस्था )-

संचार के बहुत से साधन अस्तित्व में आये हैं लेकिन गलत तथ्य सम्प्रेषण पर रोक की कोइ प्रभावी व्यवस्था नहीं है इसीलिये इन साधनों से अनर्गल तथ्य दुष्प्रचार कर राष्ट्रीय एकता के समक्ष बाधा उपस्थिति की जा रही है।

Lack of Effective Leadership (प्रभावशाली नेतृत्व का अभाव) –

परिवार वाद, भाई भतीजा वाद, धन ,आपराधिक मनोवृत्ति आदि नेतृत्व शक्ति पर हावी होकर उन्हें पथ भ्रमित कर देता है,चारित्रिक दृढ़ता के अभाव में प्रभावशीलता खो जाती है और  देश राजनीतिक अपवंचना का शिकार हो जाता है, घोटाले बाज हावी हो जाते हैं।  कुशल नेतृत्व के अभाव में राष्ट्रवादी चेतना जाग्रत नहीं हो पाती और राष्ट्रीय एकता खतरे में पड़ जाती है।

Social, Economic Status (सामाजिक, आर्थिक स्तर)-

सामाजिक हीन दृष्टिकोण और वास्तविक आर्थिक कमजोरी का दुष्प्रभाव वही समझ पाता है जिसने इसे भोगा है अस्तित्व रक्षा में लगे मानव से उच्च मूल्य निष्पादन की आशा कैसे की जा सकती है मूलभूत सुविधाओं से वंचित व समाज की अपवंचना का शिकार राष्ट्रीय एकता जैसे बिन्दु पर सोच भी नहीं पाता। शोषक धन लिप्सा में और शोषित अस्तित्व रक्षा को प्रधान मान एकता को तिलाञ्जलि दे देते हैं।

Language Controversy (भाषा विवाद) –

प्रत्येक विकसित राष्ट्र का राष्ट्र ध्वज, राष्ट्र गीत, राष्ट्र गान, राष्ट्र भाषा निर्विवादित है, सनातन संस्कृति के उदारवादी दृष्टिकोण के चलते ही हिन्दी आज भी राष्ट्र भाषा के रूप में गरिमामयी स्थान नहीं पा सकी।जबकि सुशीला नायर ने 21 नवम्बर 1967 को लोक सभा डिबेट में कहा –

“Hindi should be accepted as the common medium of instruction in all the universities of India.”

“भारत के सभी विश्व विद्यालयों में शिक्षण के सामान्य माध्यम के रूप में हिन्दी स्वीकृत की जानी चाहिए।”        

 भाषा के नाम पर पंजाब,असम, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु में अपमान जनक घटनाएं घटीं। यह विवाद एकता के समक्ष बाधा उपस्थित करता है। 

उक्त के अतिरिक्त सांस्कृतिक विविधता, संवैधानिक भूल, रोजगार नीति व शिक्षा की विफलता भी राष्ट्रीय एकता के बाधक तत्वों में शुमार हैं।

Suggestions to remove the obstacles of National Integration (राष्ट्रीय एकता की बाधाओं को दूर करने के उपाय) –

सन 1961 में शिक्षा मंत्रालय,भारत सरकार ने डॉ सम्पूर्णा नन्द की अध्यक्षता में समिति ने राष्ट्रीय एकता हेतु निम्न सुझाव दिए –

(1 )- सभी स्तरों के पाठ्यक्रम में धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के अनुरूप परिवर्तन व सुधार किया जाए।

(2 )- पाठ्य सहगामी क्रिया जैसे राष्ट्रीय महत्त्व की घटनाओं, पर्वों, खेलकूद ,शैक्षिक भ्रमण, एन ० सी ० सी ०, स्काउट व गाइड, नाटक,युवा समारोह आदि का प्रचुर मात्रा में आयोजन किया जाए।

(3)- विश्व व राष्ट्र की सामजिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक व सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का बोध कराया जाए। देशभक्तों व महान व्यक्तित्वों की कहानियाँ व जीवन वृत्त पढ़ाया जाना चाहिए।

(4)- पाठ्य क्रम में सुधार कर भावात्मक व राष्ट्रीय एकता में वृद्धि की जा सकती है ,

(5)- राष्ट्र गान, राष्ट्रध्वज, तथा राष्ट्रीय दिवसों के प्रति सम्मान दिखाया जाना चाहिए।

(6)- प्रतिदिन राष्ट्रीय एकता की प्रतिज्ञा के साथ शुरू होना चाहिए।

Suggestion of Kothaari Commission (कोठारी आयोग के सुझाव)-

राष्ट्रीय एकता सम्मलेन के पश्चात जो आयोग अस्तित्व में आया वह कोठारी आयोग था जो शिक्षा को राष्ट्रीय एकता हेतु परमावश्यक मानते हैं उन्होंने राष्ट्रीय एकता हेतु सुझाव इस प्रकार दिए। –

(1 )- सामान विद्यालय व समान अवसर प्रणाली सिद्धान्त प्रयुक्त करना।

(2 )  -सामान्य राष्ट्रीय विकास व सामजिक राष्ट्रीय एकीकरण को शिक्षा के सभी स्टारों पर अभिन्न अंग बनाना।

(3 )- राष्ट्रीय एकता का सम्यक विकास।

(4 )- सभी आधुनिक भाषाओं का विकास करते हुए हिन्दी का तीव्र गति से विकास जिससे इसे केंद्र की सरकारी भाषा का दर्जा मिल       सके।

Contribution of Education (शिक्षा का योगदान) –

संसार की किसी भी समस्या का समाधान करने की महती शक्ति शिक्षा धारण करती है राष्ट्रीय एकता हेतु भी शिक्षा का आश्रय लिया जा सकता है भारतीय परिप्रेक्ष्य में निम्न बिंदुओं पर ध्यान देकर राष्ट्रीय एकता की भावना पुष्ट की जा सकती है –

a -राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था

b -पाठ्य क्रम

c -धार्मिक एवम् नैतिक शिक्षा

d -पाठ्य सहगामी क्रियाएं

e -प्रौढ़ शिक्षा

f – अध्यापक

g – संचार के साधनों का सम्यक उपयोग 

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वाह जिन्दगी !

जड़ से मिटाना चाहिए ।

December 16, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

काव्य की गहराई में यूँ डूब जाना चाहिए।

जिन्दगी का दर्दोग़म सब छूट जाना चाहिए।।

छा रही है कालिमा हर सम्त दुनियाँ में यहाँ।

चमचमाता एक सूरज अब उगाना चाहिए।।

दुष्टता बढ़ने लगे जब शान्ति के मैदान में ।

मर्दानगी मुर्दानगी में युद्ध होना चाहिए ।।

लग रहे हों दाग जब बिलकुल गलत अन्दाज में ।

दाग का यह चलन ही बल से मिटाना चाहिए ।।

वार्ता के दौर से हासिल न कुछ होता हो गर ।

‘नाथ’ दौरे दुश्मनी जड़ से मिटाना चाहिए ।।

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दर्शन

Relationship between Philosophy and Education./दर्शन व शिक्षा का सम्बन्ध

December 14, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

दर्शन और शिक्षा (Philosophy and Education ) –  जीवन के पवित्र आवश्यकताओं की ओर निर्दिष्ट करने वाला प्रमुख कारक दर्शन है यह सिद्धान्त है तो शिक्षा इसका व्याहारिक पक्ष। दोनों में बहुत घनिष्ट सम्बन्ध है। जेण्टाइल महोदय ने कहा –

“The belief that men may continue to educate without concerning themselves with philosophy means a failure to understand the precise nature of education. The process of education cannot go on right lines without the help of philosophy.”

“जो व्यक्ति इस बात में विश्वास रखते हैं की दर्शन से सम्बन्ध बनाये बगैर कोई प्रक्रिया आम रीति से चल सकती है, शिक्षा के विशुद्ध स्वरुप को समझने में असमर्थता प्रकट करते हैं। शिक्षा प्रक्रिया दर्शन की सहायता के अभाव में उचित मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकती।”

Butler (बटलर ) महोदय ने कहा –

“Philosophy is a guide to educational practice, education as a field of investigation yields certain data for philosophical judgement.”

“दर्शन शिक्षा के प्रयोगों के लिए पथ प्रदर्शक है। शिक्षा, अनुसन्धान के क्षेत्र के रूप में दार्शनिक निर्णय के लिए निश्चित सामग्री को आधार के रूप में प्रदान करती है। ”

वस्तुतः दर्शन व शिक्षा एक विशिष्ट सम्मिश्रण है इसीलिए  जितने दार्शनिक हुए सभी शिक्षा शास्त्री भी रहे। बुद्ध, अरस्तु, शंकराचार्य, गाँधी, विवेकानन्द सभी दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री भी रहे। 

Impact of philosophy on Education (दर्शन का शिक्षा पर प्रभाव ) –

दर्शन और शिक्षा के उद्देश्य(Philosophy and Aims of education) –

दर्शन का तत्वमीमांसीय आधार मानव जीवन के उद्देश्य अर्थात शैक्षिक उद्देश्य निर्धारित करता है दर्शन के पथ प्रदर्शन के आलोक में इन्हें प्राप्त किया जाता है जॉन डीवी कहते हैं –

“Philosophy is concerned with determining the ends of education.”

“दर्शन का सम्बन्ध शिक्षा के लक्ष्यों को निर्धारित करने से है।”

दर्शन और शिक्षा की पाठ्यचर्या(Philosophy and Curriculum) –

दर्शन के आधार पर ही यह निर्धारित होता है की किस काल में क्या विषय वस्तु पढ़ानी आवश्यक है और क्या त्याज्य है पाठ्यक्रम स्थाई नहीं है यह काल ,दशा ,आवश्यकता के अनुसार दर्शन निर्धारित करता है इसीलिए रस्क महोदय ने कहा –

“Nowhere  there  is dependence of education on philosophy more marked than in the question of curriculum.”

“शिक्षा, दर्शन पर पाठ्यक्रम के सम्बन्ध में जितनी निर्भर है, उतनी अन्य किसी शैक्षिक समस्या के सम्बन्ध में नहीं।”

दर्शन व शिक्षण विधियाँ  (Philosophy and Methods of teaching) –

ये किसी एक शिक्षण विधि के भक्त नहीं थे बल्कि दार्शनिक की अंतर्दृष्टि द्वारा स्वीकारा साधन मात्र था इसी लिए R. W. Sellers ने कहा –

“Philosophy is a persistent attempt to gain insight into the nature of the world and of ourselves by means of systematic reflection.”

“दर्शन एक ऐसा अनवरत प्रयत्न है जिसके द्वारा हम संसार और अपनी प्रकृति के विषय में क्रमबद्ध अनुभवों द्वारा अन्तर्दृष्टि प्राप्त करते हैं।”

इसी लिए विभिन्न दार्शनिकों ने  अलग शिक्षण विधियों का समर्थन किया। 

सुकरात – वार्तालाप व प्रश्नोत्तर विधि।

रूसो – स्वानुभव व स्वक्रिया द्वारा सीखना।

बेकन  – प्रयोग व निरीक्षण विधि।

हर्बर्ट  – पञ्चपदी।

मॉन्टेसरी – इन्द्रिय प्रशिक्षण।

फ्रोबेल – किण्डर गार्टन पद्धति।

दूसरे शब्दों में कह सकते हैं की आदर्शवादियों ने प्रश्नोत्तर व वाद विवाद पद्धति ,प्रकृतिवादियों ने इंद्रियों द्वारा सीखने, प्रयोजनवादियों ने इकाई व प्रोजेक्ट विधि तथा यथार्थ वादियों ने निरीक्षण व स्वानुभव पद्धति को समर्थन दिया। 

दर्शन व अनुशासन (Philosophy and Discipline)–

अनुशासन प्रत्यक्षतः दर्शन से प्रभावित होता है जैसे प्रकृतिवादी प्राकृतिक परिणामों द्वारा स्वतन्त्रता को स्वीकारते हैं आदर्शवादी अध्यापक के व्यक्तित्व की प्रभावशीलता से अनुशासन स्थापन चाहते हैं प्रयोजनवादी सामजिक और सहयोगी क्रिया द्वारा अनुशासन स्थापित करना चाहते हैं Rusk (रस्क ) महोदय ने कहा –

“Discipline reflects the philosophical prepossessions of an individual or an age more directly than any other aspect of school work.”

“विद्यालय कार्य के अन्य किसी पक्ष की अपेक्षा अनुशासन किसी व्यक्ति या युग की पूर्वधारणाओं को अधिक प्रत्यक्ष रूप से प्रतिबिम्बित करता है।” 

दर्शन और पाठ्य पुस्तकें (Philosophy and Textbooks)-

पाठ्यपुस्तकें दर्शन से प्रभावित होकर मानदण्डों के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करती हैं वे बताती हैं की शिक्षक क्या जाने और विद्यार्थी क्या सीखे।

वेस्ले महोदय के शब्दों में -“पाठ्य पुस्तक, मानदण्डों को प्रतिबिम्बित एवं स्थापित करती हैं यह अधिकतर इस बात का संकेत देती हैं की शिक्षक को क्या जानना चाहिए और बालकों को क्या सीखना चाहिए। यह शिक्षण विधियों को प्रभावित करती हैं। तथा विद्वता के बढ़ते हुए मानदण्डों को प्रकट करती हैं।”`

दर्शन और शिक्षक (Philosophy and Teacher )-

क्षेत्र ,समाज,राष्ट्र के अनुरूप शिक्षक का जीवन दर्शन उसके व्यक्तित्व को गढ़ता है और विद्यार्थियों को दिशा देता है डॉ के 0 एल 0 श्रीमाली के शब्दों में –

“Thus, not merely must the teacher have a philosophy of education. He must come prepared to develop among his students a philosophy of life.”

“इस प्रकार शिक्षक का कोई शिक्षा दर्शन अवश्यमेव होना चाहिए केवल यही नहीं, शिक्षक को छात्रों में जीवन दर्शन का विकास करने के लिए तैयार होकर इस व्यवसाय में प्रवेश करना चाहिए।”

Influence of Education on Philosophy (शिक्षा का दर्शन पर प्रभाव) –

शिक्षा, दर्शन के निर्माण का आधार – 

शिक्षा के आधार पर ही हमारी भाषा पर पकड़ होती है इसी के द्वारा हम विचार, मन्थन, अवलोकन, मनन सीखते हैं इसी से अन्तर्दृष्टि विकसित होती है अतः शिक्षा को दर्शन के निर्माण का आधार कहना युक्ति संगत है इसीलिए G. E. Patrtidge (जी 0 ई 0 पैट्रिज ) ने कहा –

“In a very deep sense, it is quite as reasonable to say that philosophy is based upon education as education is based upon philosophy.”

“अत्यंत गंभीर अर्थ में यह कहना बिल्कुल उचित है की जिस प्रकार शिक्षा दर्शन पर आधारित है उसी प्रकार दर्शन शिक्षा पर आधारित है।”

शिक्षा, दर्शन को प्राणवायु देने वाला कारक –

बिना शिक्षा के दार्शनिक सिद्धान्तों का ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता, शिक्षा सृष्टि -सृष्टा, जड़- चेतन, जन्म -मरण   की दार्शनिक  व्याख्या के अधिगम का आधार बनती है इसीलिए जॉन डीवी ने कहा –

“It is ultimately the most significant phase of philosophy, for it is through the process of education that knowledge is obtained.”

“यह दर्शन का महत्त्वपूर्ण पक्ष है, क्योंकि शिक्षा प्रक्रिया द्वारा ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।”

शिक्षा द्वारा दर्शन के निर्धारित मार्ग अनुसरण –

शिक्षा ही वह कारक है जो दर्शन कोप्रवाह में बनाये रखता है शिक्षा प्रक्रिया द्वारा दार्शनिक उद्देश्यों की प्राप्ति होती है यही गतिशील पक्ष है इसी लिए डीवी कहते हैं -“Education is the dynamic side of philosophy. It is the active aspect of philosophical belief, the practical means of realising the ideals of life.”

“शिक्षा दर्शन का गतिशील पहलू है यह दार्शनिक विकास का सक्रिय पक्ष है और जीवन के आदर्शों को प्राप्त करने का वास्तविक साधन है।”

नवीन समस्याओं का परिचायक शिक्षा –

समस्या मानव की विकास यात्रा का महत्त्वपूर्ण पहलू है और शिक्षा ही दर्शन को इसका साक्षात्कार कराती है इसीलिए के 0 एल 0 श्रीमाली ने कहा –

“The task of educationist is to reconstruct the country’s philosophy and redefine values so that they may interpret our changing life and thought.”

 “शिक्षाशास्त्री का कार्य देश के दर्शन की पुनः रचना करना और मूल्यों को पुनः परिभाषित करना है जिससे कि वे मूल्य हमारे परिवर्तनशील जीवन एवम् विचार का स्पष्टीकरण कर सकें।”

उक्त विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है की शिक्षा और दर्शन में घनिष्ठ सम्बन्ध है इसीलिये उच्चकोटि के शिक्षाशास्त्री चाहे भारतीय हों या पाश्चात्य, शिक्षा दर्शन की समस्याओं पर मन्थन करते दृष्टिगोचर होते हैं इसीलिए डीवी ने कहा –

“Philosophy is the theory of education in its most general phases.”

“दर्शन शिक्षा का अत्यन्त सामान्य सिद्धान्त ही है। ”

कोई किसी को काम ज्यादा नहीं आंक सकता इसी लिए जॉन डीवी ने स्पष्टतः कहा –

“The philosophy of education is not a poor relation of general philosophy though it is so treated even by philosophers. It is ultimately the most significant phase of philosophy, for it is through the process of education that knowledge is obtained.”

“शिक्षा-दर्शन सामान्य दर्शन का दीन सम्बन्धी नहीं है यद्यपि दार्शनिकों ने भी अभी तक यही माना है। अन्ततः यह दर्शन का महत्त्वपूर्ण पक्ष है, क्योंकि शिक्षा प्रक्रिया द्वारा ही ज्ञान प्राप्त होता है।”

जे 0 एस 0 रॉस महोदय ने अपने तत्सम्बन्धी विचार का प्रगटन सुन्दर ढंग से इस प्रकार किया –

“Philosophy and  education like the two sides of the same coin, present different views of same thing.”

-J.S.Ross

“दर्शन और शिक्षा एक सिक्के के दो पहलुओं के समान एक वस्तु के भिन्न पक्षों का बोध कराते हैं। ”

                                                                …………………………………………………………..   

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वाह जिन्दगी !

यह नई सरगम जोड़ दें।

December 11, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

मौत गर सिर पर खड़ी

क्या खिलखिलाना छोड़ दें ?

सिर तो हथेली पर रखें

और मौत का मुँह मोड़ दें

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

गर मुश्किलें पीछे पड़ीं

क्या मुस्कुराना छोड़ दें ?

कोई दम समस्या में नहीं

क्यों हल बताना छोड़ दें ?

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

ठण्ड जो इतनी पड़ रही,

क्या कँपकँपाना छोड़ दें ?

काँपना तो कोई हल नहीं,

कुछ दण्ड बैठक जोड़ लें।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

दुश्मन की संख्या बढ़ रही,

क्या घर को जाना छोड़ दें ?

घर जाना बिल्कुल न छोड़ें,

दुश्मन की टँगड़ी तोड़ दें।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

गर गलतियाँ होती रहीं,

क्या कसमें वादे तोड़ दें ?

दोनों पक्षों की मर्जी है,

सब भूल दिल को जोड़ लें।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

गूँज अधिकार की होती रही,

क्या अपने स्वर भी जोड़ दें ?

अधिकार तो भूलें मियाँ

कर्त्तव्य का स्वर जोड़ दें ।

यह नई सरगम जोड़ दें,यह नई सरगम जोड़ दें।

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शिक्षा

EDUCATION – MEANING AND NATURE( शिक्षा -अर्थ तथा प्रकृति)

December 3, 2021 by Dr. Shiv Bhole Nath Srivastava No Comments

शिक्षा का अर्थ-

शिक्षा शब्द का अंग्रेजी पर्याय एजुकेशन (Education )है Education शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन (Latin) भाषा के निम्न शब्दों से हुई है 

Educatum (एडुकेटम )

Educere (एडुसीयर)

Educare (एडुकेयर)

Educatum (एडुकेटम ) – शिक्षित करना

E – अन्दर से

Duco – आगे बढ़ाना

इस प्रकार एजूकेशन का अर्थ है — बालक की आन्तरिक शक्तियों को बाहर की ओर प्रगट करने की क्रिया

Educere (एडुसीयर) – विकसित करना अथवा निकालना ( To lead out )

Educare (एडुकेयर) – बाहर निकालना अथवा विकसित करना (To Educate, To bring up or To raise )

उक्त सभी आशयों से स्पष्ट है कि शिक्षा बालकों की आन्तरिक शक्तियों के पूर्ण विकास से सम्बन्धित है।

शिक्षा शब्द को भारतीय दृष्टिकोण से देखें तो संस्कृत शिक्षा शब्द शिक्ष धातु में अ प्रत्यय लगाने से बना है शिक्ष का अर्थ है सीखना और सिखाना। इस प्रकार श्क़्श का शाब्दिक अर्थ हुआ –

सीखने सिखाने की क्रिया

Narrower Meaning of Education –

शिक्षा का संकुचित अर्थ –

J.S. Mackenzi के अनुसार –

“Education may be taken to mean any consciously direct effort to develop and cultivate our powers.”

अर्थात संकुचित अर्थ में शिक्षा का अभिप्राय – हमारी शक्तियों के विकास और उन्नति के लिए चेतना पूर्वक किये गए किसी भी प्रयास से हो सकता है।

जब कि Drever महोदय का विचार है –

”Education is a process in which and by which, the knowledge, character and behaviour of the young are shaped and moulded . ”

(” शिक्षा एक प्रक्रिया है जिसमें तथा जिसके द्वारा बालक के ज्ञान, चरित्र और व्यवहार को एक विशेष सांचे में ढाला जाता है। “)

Wider meaning of education

शिक्षा का व्यापक अर्थ –

J.S. Mackenzi के अनुसार

“In wider sense, It is a process that goes on throughout life and is promoted by almost every experience in life.”

(जे ० एस ० मैकेन्जी – व्यापक अर्थ में शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है जो आजीवन चलती रहती है और जीवन के प्रायः प्रत्येक अनुभव से उसके भण्डार में वृद्धि होती है। “)

जबकि Dumville महोदय कहते हैं –

“Education in its wider sense includes all the influences which act upon an individual during his passage from the cradle to the grave.”

(” शिक्षा के  व्यापक अर्थ में वे सभी प्रभाव आते हैं जो व्यक्ति को जन्म से लेकर मृत्यु तक प्रभावित करते हैं।”- प्रो ० डम्विल  )

Analytical meaning of Education

शिक्षा का विश्लेष्णात्मक अर्थ –

A-शिक्षा एक आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है।

 -शिक्षा एक द्विध्रुवीय प्रक्रिया है।

Teacher –   Student

B-शिक्षा एक त्रिमुखी प्रक्रिया है।

Teacher –   Student   – Curriculum

C-शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है।

D-शिक्षा एक गतिशील प्रक्रिया है। –

टी ० रेमण्ट – ” शिक्षा विकास का वह क्रम है जिसमें व्यक्ति के शैशव से प्रौढ़ता तक की वह क्रिया निहित है जिसके द्वारा वह अपने को धीरे धीरे विभिन्न विधियों से अपने भौतिक सामाजिक, आध्यात्मिक वातावरण के अनुकूल बनाता है। ”

E-शिक्षा विकास की प्रक्रिया है-

हॉर्न के अनुसार –

“शारीरिक और मानसिक दृष्टि से विकसित, स्वतन्त्र और सचेतन मानव, मानव की ईश्वर के प्रति उत्कृष्ट अनुकूलन की निरन्तर प्रक्रिया ही शिक्षा है जो मनुष्य के बौद्धिक भावात्मक एवम् इच्छा शक्ति से जुड़े वातावरण में अभिव्यक्त होती है ।” 

F-जन्मजात शक्तियों के विकास का प्रमुख कारक शिक्षा है। –

एडिसन महोदय के अनुसार –

 “शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा मनुष्य में निहित उन शक्तियों और गुणों का दिग्दर्शन होता है जिनका ऐसा होना शिक्षा के बिना असम्भव है।” 

G-शिक्षा का अर्थ केवल विद्यालयों में प्रदत्त ज्ञान तक सीमित नहीं है।

शिक्षा का वास्तविक अर्थ (True meaning of Education)-

शिक्षा वह गतिशील एवम् सामाजिक प्रक्रिया है जो मनुष्य की आंतरिक शक्तियों का सर्वांगीण विकास करने में सहायता देती है उसे विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों से सामंजस्य करने में योग देती है उसे जीवन एवं नागरिकता के कर्त्तव्यों एवम् दायित्वों को पूर्ण करने के लिए तैयार करती है तथा उसमें ऐसा विवेक जाग्रत करती है जिससे वह अपने समाज राष्ट्र विश्व और सम्पूर्ण मानवता के हित में चिन्तन संकल्प और कार्य कर सके।

Different concepts of Education

शिक्षा की विभिन्न धारणाएं –

1-शिक्षा मानव का विकास है (Education is the development of man)-

डीवी के अनुसार –

“शिक्षा उन सब शक्तियों का विकास है जिनसे वह अपने वातावरण पर अधिकार प्राप्त कर सके और अपनी भावी आशाओं को पूर्ण कर सके।”

“Education is the development of all those capacities in an individual which will enable him to control his environment and fulfill his possibilities.”   -John Dewey 

दूसरे शब्दों में शिक्षा अभिवृद्धि (Growth) है।

प्रशिक्षण व वातावरण के अनुसार – क्रिया प्रतिक्रिया

शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक, नैतिक, सौन्दर्यात्मक, सामजिक, सांवेगिक

2 –शिक्षा वातावरण से अनुकूलन की प्रक्रिया है (Education is a process of adjustment to environment.)-

बटलर के अनुसार -“शिक्षा प्रजाति की आध्यात्मिक सम्पत्ति के साथ व्यक्ति का क्रमिक सामञ्जस्य है। ”

“Education is a gradual adjustment of the individual to the spiritual possession of the race.” –Butler

3 – शिक्षा समूह में परिवर्तन करने की प्रक्रिया है (Education is the process of producing a change in the group)-

“शिक्षा चैतन्य रूप में एक नियन्त्रित प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति के व्यवहार में परिवर्तन किये जाते हैं तथा व्यक्ति के द्वारा समाज में। “

“Education is the consciously controlled process whereby changes in behaviour are produced in the person and through the person within the group.” – Brown

शिक्षा के अंग या घटक ( Data or factors of Education)-

अंग्रेज विद्वान जॉन एडम – (1 ) – प्रभावित होने वाला ( शिक्षार्थी )

                                       (2 )- प्रभावित करने वाला ( शिक्षक )

अमेरिकन विद्वान् जॉन डीवी के अनुसार -1 – मनोवैज्ञानिक (सीखने वाले की मानसिक स्थिति)

                                                           2- सामाजिक (सीखने वाले का सामाजिक पर्यावरण )

अंग्रेज विद्वान रायबर्न –

1 -शिक्षार्थी

2 – शिक्षक

3 -पाठ्यचर्या

उक्त विवेचन और समकालीन साहित्य के विश्लेषणोपरान्त सामान्यतः निम्न घटक स्वीकार किए जा सकते हैं –

1 -शिक्षार्थी

2 – शिक्षक

3 -पाठ्यचर्या

4 -शिक्षण विधियाँ और शिक्षोपकरण

5 – प्राकृतिक पर्यावरण

6- सामाजिक पर्यावरण

7- मापन तथा मूल्याँकन

शिक्षा की कुछ विशिष्ट परिभाषाएं –

Some specific definition of Education-

“Education is a natural harmonious and progressive development of man’s innate powers.” -Pestalozi

पेस्टालॉजी – ” शिक्षा मनुष्य की जन्मजात शक्तियों का स्वाभाविक समरूप तथा प्रगतिशील विकास है। ”

“Education means to enable the child to find out the ultimate truth ……..  making truth its own and giving expression to it.”- R. N. Tagore

रवीन्द्र नाथ टैगोर –

“शिक्षा का अर्थ मनुष्य को इस योग्य बनाना है कि वह सत्य की खोज कर सके … तथा अपना बनाते हुए उसको व्यक्त कर सके।”

“Education should be man-making and society making.”-Dr.Radha Krishan

डॉ राधा कृष्णन-

“शिक्षा को मनुष्य और समाज का निर्माण करना चाहिए। “

“Education is a process by which a child makes its internal-external.” Frobel

फ्रोबेल महोदय के अनुसार –

“शिक्षा वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा बालक अपनी आन्तरिक शक्तियों को बाहर की ओर प्रकट करता है।”

“Education is that process whereby he adopts himself gradually in various ways to his physical, social, and spiritual environment. – T. Remant

 टी ० रेमांट के अनुसार –

“शिक्षा वह क्रम है जिससे मानव अपने को आवश्यकतानुसार भौतिक, सामाजिक तथा आध्यात्मिक वातावरण के अनुकूल बना लेता है।”

Swami Viveka Nand-

“Education is the manifestation of perfection already reached in man.”

 प्रसिद्ध सन्त विवेकानन्द के मत में –

“शिक्षा मनुष्य के अन्दर सन्निहित पूर्णता का प्रदर्शन है।”

Kant – “Education is the development in the individual of all the perfections of which he is capable.”

काण्ट – “शिक्षा व्यक्ति की उस पूर्णता का विकास है जिसकी उसमें क्षमता है। “

John Dewey -“Education is a process of living and not a preparation for future living.”

डीवी के अनुसार -“शिक्षा भावी जीवन की तैयारी मात्र नहीं है वरन जीवन यापन की प्रक्रिया है। “

Krishna Murti –

“To understand life is to understand ourselves and that is both the beginning and the end of education.”

“जीवन को समझना अपने आप को समझना है और वह दोनों शिक्षा का प्रारम्भ तथा अन्त है।”-कृष्ण मूर्ति

Herbert Spencer- “Education means the establishment of coordination between the inherent powers and the outer life.”

हर्बर्ट स्पेन्सर –

“शिक्षा का अर्थ अन्तः शक्तियों का वाह्य जीवन से समन्वय स्थापित करना है। “

Nature of Education

शिक्षा की प्रकृति  –

(1 )- शिक्षा एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसके तीन प्रमुख अंग हैं सीखने वाला, सिखाने वाला और सीखने सिखाने की विषय सामग्री अथवा क्रिया।

(2 )-संकुचित अर्थ में माना जाता है की शिक्षा की प्रक्रिया विद्यालय में ही चलती है जबकि व्यापक अर्थ में यह प्रक्रिया समाज में निरन्तर चलती रहती है।

(3 )-शिक्षा के उद्देश्य समाज द्वारा निश्चित होते हैं और विकासोन्मुख होते हैं शिक्षा इस उद्देश्य की प्राप्ति की क्रमक व्यवस्था है यह सोद्देश्य प्रक्रिया है।

(4 )- व्यापक अर्थ में शिक्षा की विधियां अति व्यापक होती हैं परन्तु संकुचित अर्थ में निश्चित प्राय होती हैं।

(5 )-व्यापक अर्थ में शिक्षा की विषय सामग्री अति व्यापक होती हैं जिसका सीमांकन सम्भव नहीं परन्तु संकुचित अर्थ में इसकी विषय सामग्री निश्चित पाठ्यचर्या तक सीमित होती हैं।लेकिन दोनों ही अर्थों में यह सामाजिक वकास में योग देती है।

(6 )-शिक्षा का स्वरुप समाज के स्वरुप शासन तन्त्र, अर्थतन्त्र,और वैज्ञानिक प्रगति आदि पर निर्भर करता है।

(7 )- शिक्षाकी प्रकृति गतिशील होती है क्योंकि समाज के स्वरुप, शासन तन्त्र, अर्थतन्त्र,और वैज्ञानिक परिवर्तनों के साथ साथ उसकी शिक्षा के स्वरुप में भी परिवर्तन होता रहता है।

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